भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

२७८ | मुद्राराक्षसम्

( बुद्धिजलनिर्झरैः सिच्यमाना देशकालकलशैः । दर्शयिष्यति कार्यफलं गुरुकं चाणक्यनीतिलता ॥१॥ )

अन्वय — देशकालकलशैः बुद्धिजलनिर्झरैः सिच्यमाना चाणक्यनीतिलता गुरुकं कार्यफलं दर्शयिष्यति ॥१॥

व्याख्या — देशकालकलशैः — देशश्च स्थानं च कालश्च समयश्च तौ एव कलशौ कुम्भौ येषां तानि, बुद्धिजलनिर्झरैः — बुद्धयः धिय एव भानि तेषां निर्झरैः प्रवाहैः, सिच्यमाना — आर्द्रीक्रियमाणा, चाणक्यनीतिलता — चाणक्यस्य कौटिल्यस्य या नीतिः नयः तद्रूपा लता वल्ली, गुरुकम् — अधिकम्, कार्यफलम् — कार्यस्य प्रारब्धस्य राक्षसग्रहणरूपस्य कर्मणः फलं परिणामं, दर्शयिष्यति — प्रकटयिष्यति ॥१॥

हिन्दी अनुवाद — [ तदनन्तर लेख और ( राक्षस की मुद्रा से ) मुद्रित आभूषणों की पेटी को लेकर सिद्धार्थक प्रवेश करता है । ]

सिद्धार्थक — आश्चर्य ! आश्चर्य !!

देश और काल रूपी घड़ों वाले बुद्धि रूपी जलों के प्रवाहों से सींची जाती हुई चाणक्य की नीति रूपी लता अधिक कार्य रूपी फल को दिखलाएगी ॥१॥

टिप्पणी — इस अंक से निर्वहणसन्धि प्रारम्भ होती है । निर्वहण का लक्षण यह है — 'बीजवन्तो मुखाद्यर्था विप्रकीर्णा यथायथम् । ऐकार्थ्यमुपनीयन्ते यत्र निर्वहणं हि तत् ॥' अलङ्करणस्थगिकाम् — आभूषणों की पेटी को । स्थगयति इति √स्थग् + णिच् + अच् कर्तरि = स्थग । मन्त्रेव स्थगकः स्थग् + कन् । स्त्रियां स्थगिका । अलङ्करणानां स्थगिका षष्ठीतत्०, ताम् । बुद्धिजलनिर्झरैः — निर् √सृ + अप् भावे निर्झराः । बुद्धेर्जलस्य निर्झराः, तैः । बुद्धिजलस्य निर्झरा निर्झरीणानि बुद्धिजलानि, भावानयने द्रव्यानयनम् । इस पद्य में उपमा और साङ्गरूपक अलङ्कारों का सन्देहमङ्कर है और आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण १, ५ में देखिए ॥१॥

गहीदो मए अज्जचाणक्केण पढमलेहिदो लेहो, अमच्चरक्खसस्स मुद्दालञ्छिदो । तस्स ज्जेव्व मुद्दालञ्छिदा इअं आहरणपेडिआ । चलिदेहिं किल पाडलिउत्तं, ता जाव गच्छिह्नि । [ परिक्रम्यावलोक्य च ] कहं

पञ्चमोऽङ्कः २७६

क्खवणओ आअच्छदि ? जाब मे असउगभूदं इमस्स दंसणं, ता आदित्तदंसणेण पडिहणामि । ( गृहीतो मयाऽऽर्यचाणक्येन प्रथमलेखितो लेखः, अमात्यराक्षसस्य मुद्रालाञ्छितः । तस्यैव मुद्रालाञ्छितेयमाभरण-पेटिका । चलितोऽस्मि किल पाटलिपुत्रं, तद्यावत् गच्छामि । कथं क्षपणक आगच्छति ? यावन्मेऽशकुनभूतंमस्य दर्शनं, तस्मादादित्यदर्शनेन प्रतिहन्मि । )

[ ततः प्रविशति क्षपणकः । ]

क्षपणकः

अलिहन्ताणं प्पणमामो जे दे गंभीलदाए बुद्धीए ।
लोउत्तलेहिं लोए सिद्धि मग्गेहिं मग्गन्ति ॥२॥

( अर्हतां प्रणमामो ये ते गम्भीरतया बुद्धेः ।
लोकोत्तरैर्लोके सिद्धिं मार्गैर्मार्गयन्ति ॥२॥ )

अन्वयः—अर्हतां प्रणमामः, ये ते बुद्धेः गम्भीरतया लोके लोकोत्तरैः मार्गैः सिद्धिं मार्गयन्ति ॥२॥

व्याख्याअर्हतां—बौद्धसंन्यासिनां, प्रणमामः—नमस्कुर्मः, ये ते—अर्हन्तः, बुद्धेः—मत्यादिपञ्चात्मकज्ञानस्य, गम्भीरतया—धीरतया, लोके—संसारे, लोकोत्तरैः—अलौकिकैः, मार्गैः—वर्त्मभिः, सिद्धिं—मोक्षं, मार्गयन्ति—अन्वेषयन्ति ॥२॥

हिन्दी अनुवाद—मैंने आर्य चाणक्य द्वारा पहले ही लिखवाया गया (वह कूट-) लेख ले लिया है, जिस पर अमात्य राक्षस की मुद्रा की छाप पड चुकी है। उसी की मुद्रा से चिह्नित यह आभूषणों की पेटी है। मैं झूठमूठ में पाटलिपुत्र के लिए चला हूँ। तो जाता हूँ। [ घूमकर और देखकर ] कैसे क्षपणक आ रहा है ? इसका दर्शन तो मेरे लिए असगुन हो गया। इसलिए सूर्य के दर्शन से (इस दोष का) निराकरण करता हूँ।

[ तब क्षपणक प्रवेश करता है । ]

हम बौद्ध संन्यासियों को प्रणाम करते हैं जो वे बुद्धि की गंभीरता के कारण संसार में दिव्य मार्गों से सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥२॥

टिप्पणीप्रथमलेखितः—प्रथम अंक में आ चुका है कि चाणक्य ने

२८० मुद्राराक्षसम्

सिद्धार्थक के द्वारा शकटदास से एक लेख लिखवाया था। वही यह लेख है। तस्यैव मुद्रालान्छितेयम्—दूसरे अंक में राक्षस ने सिद्धार्थक को पारितोषिक के रूप में कुछ आभूषण दिये थे, जो मलयकेतु ने राक्षस को पहनने के लिए कञ्चुकी के हाथ भिजवाए थे। उन आभूषणों को सिद्धार्थक ने राक्षस की मुद्रा से मुद्रित करके उसी के पास रख छोड़ा था। उन्हीं आभूषणों की यह पेटी है। अर्हताम्—√अर्ह् + शतृ = अर्हन्त तेषाम्। कर्मणः शेषत्वविवक्षायां षष्ठी। लोकोत्तरैः—लोकेभ्य उत्तरा लोकोत्तरा = लोकातिगा प्रशस्ता इत्यर्थः, तैः। इस पद्य में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार और श्लेष अलंकार का सङ्कर है। इसमें भी आर्या छन्द है ॥२॥

सिद्धार्थक—भदन्त ! प्पणमामि। ( भदन्त ! प्रणमामि। )

क्षपणक—सावका ! धम्मलाहो दे होदु। [ सिद्धार्थकं निर्वर्ण्य ] सावका ! पत्थाणसमुव्वहणे किदव्ववसाअं विअ दे हिअअं पेक्खामि। ( उपासक ! धर्मलाभस्ते भवतु। उपासक ! प्रस्थानसमुद्वहने कृतव्यवसायमिव ते हृदय पश्यामि। )

सिद्धार्थक—कहं भदन्तो जाणादि ? [ कथं भवन्तो जानाति ? ]

क्षपणक—सावका ! किं एत्थ जाणिदव्वं ? एसो दे मग्गादेसकुसलो सउणो करगदो लेहो अ सूचेदि। ( उपासक ! किमत्र ज्ञातव्यम् ? एष ते मार्गादेशकुशल शकुन करगतो लेखश्च सूचयति। )

सिद्धार्थक—जाणिदं भदन्तेण देसन्तरं चलिदोम्हि। ता कहेदु भदन्तो कीदिसो अज्ज दिअसो ? ( ज्ञातं भदन्तेन देशान्तर चलितोऽस्मि। तत् कथयतु भदन्त कीदृशोऽद्य दिवस ? )

क्षपणक—[ विहस्य ] सावका ! मुण्डिअमुण्डो तुम णक्खत्ताइ पुच्छसि ? ( उपासक ! मुण्डितमुण्डस्त्वं नक्षत्राणि पृच्छसि ? )

सिद्धार्थक—भदन्त ! सम्पदं पि किं जादं ? ता कहेहि, जइ अत्तणो अणुऊल भविस्सदि, ता गमिस्सं, अण्णधा णिवत्तिस्स ( भदन्त ! साम्प्रतमपि किं जातम् ! तत् कथय, यद्यात्मनोऽनुकूलं भवेत्, तदा गमिष्यामि, अन्यथा निर्वर्तिष्ये । )

पञ्चमोऽङ्कः २८१

क्षपणकः—साबकाणं सम्पदं एदस्सिं मलयकेदुकडए अणण्ऊलेण बा किं ? अगहीदमुद्देण ण गच्छीअदि । ( उपासकानां साम्प्रतमेतस्मिन् मलयकेतुकटके अनुकूलेनाऽनुकूलेन वा किम् ? अगृहीतमुद्रेण न गम्यते । )

सिद्धार्थंकः—भदन्त ! कहेहि, कुदो क्खु अअं । ( भदन्त ! कथय, कुतः खल्वयम् ? )

हिन्दी अनुवादसिद्धार्थक—भदन्त ! प्रणाम करता हूँ ।

क्षपणक—उपासक ! तुम्हे धर्म का लाभ हो । [ सिद्धार्थक को अच्छी तरह देखकर ] उपासक ! यात्रा की तैयारी में कृतनिश्चय के समान तुम्हारे हृदय को देख रहा हूँ।

सिद्धार्थक—भदन्त कैसे जानते हैं ?

क्षपणक—उपासक ! इसमें जानना क्या है ? यह तुम्हारे मार्ग की सूचना देने में निपुण शकुन तथा हाथ में लिया लेख बता रहा है ।

सिद्धार्थक—भदन्त ने जान लिया कि मैं परदेश को जा रहा हूँ। इसलिए भदन्त बताएँ कि आज दिन कैसा है ।

क्षपणक—[ हँसकर ]—उपासक ! तुम मूंड़ मुंडाकर नक्षत्रो को पूछ रहे हो ?

सिद्धार्थक—भदन्त ! अभी भी क्या हुआ है ? इसलिए बताइये, यदि ( दिन ) अपना अनुकूल होगा तो जाऊँगा नहीं तो लौट जाऊँगा ।

क्षपणक—उपासको के लिए इस समय इस मलयकेतु के शिविर मे अनुकूल या प्रतिकूल होने से क्या ? बिना मुद्रा के नही जा सकते ।

सिद्धार्थक—भदन्त ! कहिए, यह कैसे ?

टिप्पणीप्रस्थानसमुद्वहने—यात्रासम्पादने विषये इत्यर्थः । प्रस्थानस्य समुद्वहनम्, तस्मिन् । मागर्दिशकुशलः—अध्वसूचननिपुण । मार्गस्य आदेशः । तस्मिन् कुशलः । शकुनः—प्रस्थानसामयिकमुहूर्तविशेष इत्यर्थः । शवनोति सूचयितुम् इति √ शक्+उन कर्तरि औणादिक = शकुनः । मुण्डितमुण्डः..... सिर मुंड़ाकर पूछ रहे हो कि मुंडन का नक्षत्र कैसा है, अरे ! यात्रा करने से

२८२ मुद्राराक्षसम्

पहले ही तुम्हे पूछना चाहिए था कि दिन कैसा है, अब यात्रा कर लेने के बाद दिन की बात क्या पूछते हो ?

क्षपणक — सावका ! णिसामेहि, पढमं दाव एत्य मलयकेदुकडए लोअस्स अणिवारिअणिक्कमणप्पवेमो आसी । दाणी इदो पच्चासण्णे कुसुमउरे, ण कोवि अमुद्दालञ्छिदो णिक्कमिदुं पबिसिदु वा अणुमोदीअदि । ता जइ भाउरायणस्स मुद्दालञ्छिदोसि, तदो गच्छ वोम-श्रो अण्णथा णिवत्तित्र णिउक्कण्ठ चिट्ठ । मा तुमं गुम्मट्ठाणाधिवेहिं मजमिडकडचरणो राजउल पवेसीअसि । ( उपासक ! निशामय, प्रथमं तावदत्र मलयकेतुकटके लोकस्यानिवारितनिष्क्रमणप्रवेशावास्ताम् । इदानीमितः प्रत्यासन्ने कुसुमपुरे, न कोऽप्यमुद्रालान्छितो निष्क्रमितुं प्रवेष्टुं वाऽनुमोद्यते । तद् यदि भागुरायणस्य मुद्रालान्छितोऽसि, तदा गच्छ विरब्धम् , अन्यथा निवृत्य निरुत्कण्ठ तिष्ठ । मा त्वं गुल्मस्थानाधिपैः संयमितकरचरणो राजकुलं प्रवेश्यसे । )

सिद्धार्थक — किं ण आणादि भदन्तो, जया अमच्चरक्वसस्स केलिअरो अन्तिओ सिद्धत्थओ अह त्ति ? ता अमुद्दालञ्छिद्रं वि मं णिक्कमन्त कस्स सत्ती णिबारेदु ? ( किं न जानाति भदन्तः, यथा अमात्यराक्षसस्य केलिकरोऽन्तिकः सिद्धार्थकोऽहमिति ? तद् अमुद्रालान्छनमपि मां निष्क्रामन्तं कस्य शक्तिर्निवारयितुम् ? )

क्षपणक — सावका ! रक्खसस्स पिसाचस्स वा केलिअरो होहि । णत्थि उग दे अमुद्दानञ्छिद्रस्स इदो णिक्कमणोवाओ । ( उपासक ! राक्षसस्य पिशाचस्य वा केलिकरो भव । नास्ति पुनस्ते अमुद्रालान्छितस्येतो निष्क्रमणोपायः । )

सिद्धार्थक — भदन्त ! ण कुप्य, भग मे कज्जसिद्धी होदु त्ति (भदन्त न कुप्य, भग मे कार्यसिद्धिर्भवतु इति । )

क्षपणक — सावका ! गच्छ, होदु दे कज्जसिद्धी । अहंपि भागुराअणादो पाडलिउत्त गन्तु मुद्द पडिच्छेमि । ( उपासक ! गच्छ, भवतु ते कार्यसिद्धिः । अहमपि भागुरायणात् पाटलिपुत्रं गन्तुं मुद्रां प्रतीच्छामि ।)

[ इत्युभौ निष्क्रान्तौ । ]
[ इति प्रवेशकः ]

पञ्चमोऽङ्कः २८३

**हिन्दी अनुवाद—क्षपणक—**उपासक ! सुनो, पहले तो यहाँ मलयकेतु के शिविर में बिना रोक-टोक के लोगों का आना-जाना होता था । अब यहाँ से पाटलिपुत्र के समीप आ जाने पर किसी को भी बिना मुद्रा से चिह्नित हुए बाहर जाने या भीतर प्रविष्ट होने के लिए अनुमति नहीं दी जाती है। इसलिए यदि भागुरायण का मुद्रा-चिह्न हो तो बेखटके चले जाओ, अन्यथा लौटकर उत्सुकता से रहित होकर रहो । ताकि शिविर के अधिकारियों के द्वारा हाथ-पैर बाँधे हुए तुम राज-गृह में प्रविष्ट न करा दिये जाओ ।

**सिद्धार्थक—**क्या भदन्त नहीं जानते हैं कि मैं अमात्य राक्षस का विनोदी सेवक सिद्धार्थक हूँ । इसलिए बिना मुद्रा-चिह्न के भी बाहर जाते हुए मुझे रोकने की किसकी शक्ति है ?

**क्षपणक—**उपासक ! राक्षस या पिशाच का विनोदी रहो, किन्तु, बिना मुद्रा-चिह्न के तुम्हारे लिए यहाँ से बाहर निकलने का ( कोई ) उपाय नहीं है ।

**सिद्धार्थक—**भदन्त ! क्रोध मत कीजिए, कहिए कि मेरा कार्य सिद्ध हो जाय ।

**क्षपणक—**उपासक ! जाओ, तुम्हारा कार्य सिद्ध हो । मैं भी पाटलिपुत्र जाने के लिए भागुरायण से मुद्रा लेता हूँ ।

[ दोनों चले जाते हैं । ]

[ प्रवेशक समाप्त ]

**टिप्पणी—निशामय—**सुनो । नि √ शम् (चुरादि) + णिच् + लोट्—हि । अमुद्रालाञ्छितः—√ लाञ्छ् + क्त कर्मणि = लाञ्छितः । मुद्र्यते अनया इति √ मुद् + णिच् + अ करणे = मुद्रा । तया लाञ्छितः । न तथा इति अमुद्रा-लाञ्छितः नञ्तत्० । **निरुत्कण्ठम्—**निरुत्सुकम् यथा स्यात् तथा । **गुल्मस्थाना-धिपैः—**प्रहरिभिः । **संयमितकरचरणः—**करौ च चरणौ च इति करचरणम् प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः । संयमितं करचरणमस्य इति संयमितकरचरणः । **राजकुलम्—**नृपालयम् । **प्रवेश्यसे—**प्र √ विश् + णिच् + लट् कर्मणि । इस वाक्य में 'मा' माङ् वाला नहीं है, अपि तु निषेधार्थक शुद्ध मा है । इसीलिए 'प्रवेश्यसे' में 'माङि लुङ्' से लुङ् लकार नहीं हुआ । **केलिकरः—**हास्यकरः । **अन्तिकः—**निकटवर्ती । कुप्य—√ कुप् ( दिवादि ) + लोट्—हि । भागु-

१८४ मुद्राराक्षसम्

रायणात्—अत्र अपादाने पञ्चमी । प्रवेशक —प्रवेशयति कथाप्रसङ्गं गमयति पात्रं प्रवेशयति वा इति प्र√विश्+ण्वुल् कर्तरि । दो अंकों के बीच एक प्रकार के अंक को प्रवेशक कहते हैं, जिसमें नीच पात्र न दिखायी हुई तथा भावी घटनाओं की सूचना देते हैं—'वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः । प्रवेशकस्तु नाट्यऽङ्के नीचपात्रप्रयोजितः ॥'

[ ततः प्रविशति पुरुषेणानुगम्यमानो भागुरायणः । ]

भागुरायणः —[ आत्मगतम् ] अहो ! विचित्रतैर्यचाणक्यनीतेः । कुतः —

मुहर्लक्ष्योद्भेदा मुहुरविगमाभावगहना मुहुः सम्पूर्णाङ्गी मुहुरतिकृशा कार्यवशात् । मुहुर्भ्रश्यद्वीजा मुहुरपि बहुप्रापितफले- त्यहो ! चित्राकारा नियतिरिव नीतिर्नयविदः ॥३॥

अन्वय —मुहुः लक्ष्योद्भेदा, मुहुः अधिगमाभावगहना, मुहुः सम्पूर्णाङ्गी, मुहुः कार्यवशात् अतिकृशा, मुहुः भ्रश्यद्वीजा मुहुः बहुप्रापितफला अपि इति अहो नियतिः इव नयविदः नीतिः चित्राकारा ॥३॥

व्याख्यामुहुः —वार वार, लक्ष्योद्भेदा—लक्ष्यं अनुमेय उद्भेद आविर्भाव यस्याः तादृशी, मुहुः —पुनरपि, अधिगमाभावगहना—अधिगमस्य उपलब्धे अभावात् विरहात् गहना दुर्बोधा, मुहुः —क्षणे क्षणे, सम्पूर्णाङ्गी—प्रथितावयवा, मुहुः —पुनरपि, कार्यवशात् —कृत्यानुरोधात्, अतिकृशा—अतिक्षीणा मुहुः —असकृत्, भ्रश्यद्वीजा—भ्रश्यत् नश्यत् बीजं कारणं यस्या तादृशी, मुहुः —पुनरपि, बहुप्रापितफला—बहु प्रचुरं यथा स्यात् तथा प्रापितानि ज्ञापितानि फलानि यया तादृशी, अपि, इति—अनेन प्रकारेण, अहो—आश्चर्यम्, नियतिः —दैवम्, इव—तद्वत्, नयविदः —नीतिज्ञस्य, नीतिः —नयः, चित्राकारा—बहुप्रकारा । पक्षान्तरेमुहुः, लक्ष्योद्भेदा—मुखसन्धौ अल्पोद्दिष्टा सती बहुधा विस्तारिणी, मुहुः, अधिगमाभावगहना—प्रतिमुखे लक्ष्यालक्ष्यव्यक्तेः दुर्बोधा, मुहुः, सम्पूर्णाङ्गा—विमर्शे बीजस्य स्पष्टदर्शनात् परिपूर्णावयवा, मुहुः, कार्यवशात्, अतिकृशा—प्रतिमुखे लक्ष्यालक्ष्यव्यक्तेरतीक्ष्णा, मुहुः, भ्रश्यद्वीजा

पञ्चमोऽङ्कः २८५

दृष्टनष्टान्वेषणान्नश्यदुद्योगा, 'मुहुः, 'बहुप्रापितफला—निर्वहणे सर्वार्थोपसहारादुपगतसाफल्या ॥३॥

हिन्दी अनुवाद—[ तत्पश्चात् एक अनुचर के साथ भागुरायण प्रवेश करता है । ]

भागुरायण—[ मन मे ] आर्य चाणक्य की नीति की विचित्रता अद्भुत है। क्योकि—

बार-बार अनुमान करने योग्य प्राकट्य वाली, फिर भी उपलब्धि के अभाव के कारण दुर्बोध, क्षण-क्षण में परिपुष्ट अगो वाली, फिर भी कार्य के अनुरोध से अत्यन्त क्षीण, बार-बार नष्ट बीज वाली, फिर भी अत्यधिक फल प्राप्त कराने वाली नीतिज्ञ की नीति भाग्य के समान बहुरंगी होती है, यह आश्चर्य है ॥३॥

टिप्पणीसम्पूर्णाङ्गी—सम्पूर्णानि अङ्गानि अस्याः इति सम्पूर्णाङ्गी बहुव्रीहि स०, ङीप् । इस श्लोक मे सन्धियो का विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है—मुहुर्लक्ष्योद्भेदा—मुखसन्धि । मुहुर्धगमाभावगहना मुहुर्तिकृशा कार्यवशतः—प्रतिमुखसन्धि । मुहुर्नश्यद्वीजा—गर्भसन्धि । मुहुः सम्पूर्णाङ्गी—विमर्शसन्धि । मुहुपि बहुप्रापितफला—निर्वहणसन्धि । इस पद्य मे काव्यलिंग से अनुप्राणित उपमा और अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकारो की ससृष्टि है । इसमें प्रसाद गुण है, पाञ्चाली रीति है और शिखरिणी छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥३॥

[ प्रकाशम् ] भद्र भासुरक ! न मां दूरीभवन्तमिच्छति कुमारः । अतोऽस्मिन्नेवास्थानमण्डपे विन्यस्यतामासनम् ।

पुरुषः—एदं आसणं, उपविसदु अज्जो । ( एतदासनम्, उपविशत्वार्यः । )

भागुरायणः—[ उपविश्य ] भद्र भासुरक ! यः कश्चिन्मुद्रार्थी मां द्रष्टुमिच्छति, स त्वया प्रवेशयितव्यः ।

पुरुषः—जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

[ इति निष्क्रान्तः ]

२८६ | मुद्राराक्षसम्

भागुरायणः— [ स्वगतम् ] कष्टमेवमप्यस्मासु स्नेहवान् कुमारो मलयकेतुरतिसन्धातव्य इत्यहो दुष्करम् । अथवा—

कुले लज्जायाञ्च स्वयशसि च माने च विमुखः
शरीरं विक्रीय क्षणिकधनलाभाद्धनवति ।
तदाज्ञां कुर्वाणो हितमहितमित्येतदधुना
विचारातिक्रान्तं किमिति परतन्त्रो विमृशति ॥४॥

अन्वयः— क्षणिकधनलाभात् लज्जायां माने च स्वयशसि च कुले च विमुखः ( भूत्वा ) धनवति शरीरं विक्रीय विचारातिक्रान्तः परतन्त्र अधुना तदाज्ञां कुर्वाण इति हितम् एतत् अहितम् इति किं विमृशति ? ॥४॥

व्याख्या— क्षणिकधनलाभात्—क्षणिकम् अल्पकालिकं यत् धनं वित्तं तस्य लाभ प्राप्तिः तस्माद्धेतो, लज्जायां—त्रपायां, माने च—प्रतिष्ठायां च, स्वयशसि च—आत्मकीर्त्तौ च, कुले च—( स्व- ) वंशे च, विमुख—विरक्तः ( भूत्वा ), धनवति—वित्तशालिनि ( जने ), शरीर—वपु, विक्रीय—तदायत्तं कृत्वा, विचारातिक्रान्त—विचारम् विवेकम् अतिक्रान्तः अतीत, परतन्त्रः—पराधीनः, ( मादृशो जन ) अधुना—साम्प्रतम्, तदाज्ञा—तस्य धनवत प्रभो आज्ञा नियोग, कुर्वाण—विदधत्, इति—इदम्, हितम्—पथ्यम्, एतद्—इदम्, अहितम्—अपथ्यम्, इति—एतत्, कि—कथ, विमृशति—विचारयति ? ॥४॥

हिन्दी अनुवाद— [ प्रकट ] भद्र भासुरक ! कुमार मुझे दूर होता हुआ नहीं देखना चाहते हैं । इसलिए इसी सभा-मण्डप में आसन लगा दो ।

पुरुष— यह आसन है, आर्य बैठें ।

भागुरायणः— [ बैठकर ] भद्र भासुरक ! जो कोई मुद्रा चाहने वाला व्यक्ति मुझसे मिलना चाहे, उसे तुम भीतर ले आना ।

पुरुष— आर्य की जो आज्ञा ।

[ बाहर चला जाता है । ]

भागुरायणः— [ मन में ] कष्ट की बात है कि इस प्रकार मुझसे स्नेह

पञ्चमोऽङ्कः २८७

करने वाले कुमार मलयकेतु को भी धोखा देना है—यह कठिन एवम् आश्चर्यजनक (विषय) है। अथवा—

क्षणिक धन की प्राप्ति के कारण लज्जा, सम्मान, अपने यश और कुल से भी विमुख होकर धनवान् के हाथ शरीर को बेचकर विवेक का अतिक्रमण करके पराधीन होकर इस समय उस (धनवान्) की आज्ञा का अनुसरण करता हुआ (मेरे जैसा व्यक्ति) यह हितकारी है और यह अहितकारी है, ऐसा क्यो सोचता है? ॥४॥

टिप्पणीआस्थानमण्डपे—सभामण्डपे। आ√स्था + ल्युट् भावे = आस्थानम्। तस्य मण्डपः, तस्मिन्। 'मण्डपोऽस्त्री जनाश्रयः' इत्यमरः। अतिसन्धातव्यः—प्रतारणीयः। विचारातिक्रान्त—परित्यक्तसदसद्विवेकः। इस पद्य मे पदार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार है, प्रसाद गुण है, वैदर्भी रीति है और शिखरिणी छन्द है ॥४॥

[ ततः प्रविशति प्रतीहार्यनुगतो मलयकेतुः । ]

मलयकेतुः—[ स्वगतम् ] अहो ! राक्षसं प्रति मे विकल्पबाहुल्या-दाकुला बुद्धिर्न निश्चयमधिगच्छति । कुतः—

भक्त्या नन्दकुलानुरागदृढया नन्दान्वयालम्बिना किं चाणक्यनिराकृतेन कृतिना मौर्येण सन्धास्यते । स्थैर्यं भक्तिगुणस्य वा विगणयन् किं सत्यसन्धो भवे- दित्यारूढकुलालचक्रमिव मे चेतश्चिरं भ्राम्यति ॥५॥

अन्वयः—कृतिना चाणक्यनिराकृतेन नन्दान्वयालम्बिना मौर्य्येण नन्द-कुलानुरागदृढया भक्त्या सन्धास्यते किम्, वा भक्तिगुणस्य स्थैर्यम् विगणयन् सत्यसन्धो भवेत् किम् इति मे चेतः आरूढकुलालचक्रम् इव चिरं भ्राम्यति ॥५॥

व्याख्याकृतिना—कुशलेन, चाणक्यनिराकृतेन—चाणक्येन कौटिल्येन निराकृतः परित्यक्तः तथाभूतेन, नन्दान्वयालम्बिना—नन्दान्वयं नन्दवंशम् अवलम्बते आश्रयते यः तादृशेन, मौर्येण—वृषलेन, नन्दकुलानुरागदृढया—नन्दकुले यः अनुरागः स्नेहः तेन दृढा स्थिरा तथाभूतया, भक्त्या—सेवया हेतुना,

२८८ मुद्राराक्षसम्

सन्धास्यते किम्—सन्धिं करिष्यति किम्, वा—अथवा, भक्तिगुणस्य—भक्ति अनुराग एव गुण तस्य, स्थैर्यं—स्थिरता, विगणयन्—विचारयन्, सत्यसन्धः—सत्या यथार्था सन्धा प्रतिज्ञा यस्य तथाभूत, भवेत् किम्—स्यात् किम्, इति अनेन प्रकारेण, मे—मम, चेत—चित्तम्, आरूढकुलालचक्रम्—आरूढम् अधिष्ठितम् कुलालचक्रम् कुम्भकारचक्रम् येन तादृशम्, इव—तद्वत, चिर—बहुकाल, भ्राम्यति—सन्देहास्पद भवतीत्यर्थः ॥५॥

हिन्दी अनुवाद—[ तदनन्तर मलयकेतु और साथ-साथ प्रतीहारी का प्रवेश ]

मलयकेतु—[मन में] ओह ! राक्षस के प्रति संदेहों की बहुलता से व्याकुल मेरी बुद्धि निश्चय नहीं कर पा रही है । क्योकि—

कुशल, चाणक्य से परित्यक्त और नन्दवंश का अवलम्बन करने वाले चन्द्रगुप्त के साथ ( वह राक्षस ) नन्द-वश म अनुराग होने से दृढ भक्ति के कारण क्या संधि कर लेगा । अथवा मया (मेरी) भक्ति रूपी गुण की दृढता का विचार करत हुए सत्यप्रतिज्ञ होगा, इस प्रकार मेरा चित्त कुम्हार के चक्र पर चढ़े हुए के समान चिरकाल से घूम रहा है ॥५॥

टिप्पणीविकल्पबाहुल्यात्—सन्देहाधिक्यात् । विशेषेण कल्प्यते इति विकल्प कर्मणि घञ् । तस्य बाहुल्यम् । तस्मात् । हेतो पञ्चमी । कृतिना—कुशलेन या कृतार्थ । इस श्लोक में उत्प्रेक्षा अलंकार से संसृष्ट परिकर अलंकार का विकल्प नामक अलंकार के साथ साङ्कर्य है । इसमे शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण २, १२ में देखिए ॥५॥

[ प्रकाशम् ] विजये ! क्व भागुरायण !

प्रतीहारी—कुमार ! एसा खु कडआदो णिक्कमिदुकामाण मुुद्दा-प्पदाणं अणु चिट्ठदि । ( कुमार ! एष खलु कटकान्निष्क्रमितुकामानां मुद्राम्प्रदानमधितिष्ठति । )

मलयकेतु—विजये ! मुहूर्त्तं निभृतपदसञ्चारा भव, यावदस्य पराङ्मुखस्यैव पाणिभ्यां नयने पिदधामि ।

प्रतीहारी—जं कुमारो आणवेदि । ( यत् कुमार आज्ञापयति ! )

भासुरक—[ प्रविश्य ] अज्ज ! एसो क्खु क्खवणओ मुुद्दाणिमित्त

पञ्चमोऽङ्कः २८६

अज्जं पेक्खिदुमिच्छदि । ( आर्य ! एष खलु क्षपणको मुद्रानिमित्तमार्यं प्रेक्षितुमिच्छति । )

**भागुरायणः—**प्रवेशय ।

**भासुरकः—**जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

[ इति निष्क्रान्तः । ]

क्षपणकः—[ प्रविश्य ] साबकाणं धम्मविद्धी होदु । ( उपासकानां धर्मवृद्धिर्भवतु । )

भागुरायणः—[ नाट्येनावलोक्य स्वगतम् ] अये ! राक्षसस्य मित्रं जीवसिद्धिः । [ प्रकाशम् ] भदन्त ! न खलु राक्षसस्य प्रयोजनमेव किञ्चिदुद्दिश्य गम्यते ?

हिन्दी अनुवाद—[ प्रकट ] विजये ! भागुरायण कहाँ है ?

**प्रतीहारी—**कुमार ! ये शिविर से बाहर जाने की इच्छा करने वालों को मुद्रा दे रहे हैं ।

**मलयकेतु—**विजये ! क्षण भर के लिए पैरों की गति को रोक दो, जबतक कि मैं दूसरी ओर मुंह किये हुए ही इसकी आंखो को ( अपने ) हाथों से बंद कर दूं ।

**प्रतीहारी—**जो कुमार की आज्ञा ।

भासुरक—[ प्रवेश करके ] आर्य ! ये क्षपणक मुद्रा के लिए आर्य से मिलना चाहते हैं ।

**भागुरायण—**प्रवेश कराओ ।

**भासुरक—**जो आर्य की आज्ञा ।

[ बाहर चला जाता है । ]

क्षपणक—[ प्रवेश करके ] उपासकों का धर्म बढ़े ।

भागुरायण—[ अभिनय के साथ देखकर मन में ] अरे ! राक्षस का मित्र जीवसिद्धि है । [ प्रकट ] भदन्त ! राक्षस के ही किसी प्रयोजन को लक्ष्य करके तो नहीं जा रहे हैं ?

मु० रा०—१९

२६०मुद्राराक्षसम्

टिप्पणी—निष्क्रमितुकामानाम्—बाहर जाने के इच्छुको को । निष्क्रमितुम् इत्यत्र भावे तुमुन् 'अव्ययकृतो भावे' इति नियमात् । अतएव निष्क्रमितुम् अर्थात् निष्क्रमणे कामः एषाम् इति निष्क्रमितुकामा व्यधिकरणबहुव्रीहि स०, 'तुङ्काममनसोरपि' इति कारिकया मलोप । तेषाम् । मुद्रासम्प्रदानम्—गमनागमनादेशपत्रमित्यर्थः, पारपत्र ( पासपोर्ट ) । निभृतपदसञ्चारा—त्यक्तचरणक्षेपता निवृत्तगमनेति यावत् । पिदधामि—अत्र 'वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयो । आपञ्चापि हलन्ताना यथा वाचा निशा दिशा ॥' इति कारिकया अप्युपसर्गाकारस्य लोप । राक्षसस्य मित्रम् भागुरायण को यह नही मालूम है कि जीवसिद्धि चाणक्य का मित्र एव गुप्तचर है, इसीलिए उसने ऐसा स्वगत कहा है ।

क्षपणक —[ कर्णौ विधाय ] सन्त, पाव, सन्त पाव । सावका ! र्तार्ह ज्जेव गमिस्स जहिं रक्खसस्स पिसाचस्स वा णाम पि ण सुणीअदि । ( शान्तं पाप शान्त पापम् । उपासक ! तत्रैव गमिष्यामि, यत्र राक्षसस्य पिशाचस्य वा नामापि न श्रूयते । )

भागुरायण —भदन्त ! बलीयास्ते सुहृदि प्रणयकोप । तत् किमपराद्धं राक्षसेन भदन्तस्य ?

क्षपणक —सावका ! ण मम किं पि रक्खसेण अवलद्ध, सअ ज्जेव्व मन्दभाओ अत्तणो कम्मसु लज्जामि । ( उपासक ! न मे किमपि राक्षसेनापराद्ध, स्वयमेव मन्दभाग्य आत्मनः कर्मसु लज्जे । )

भागुरायण —भदन्त ! वर्धयसि मे कुतूहलम् ।
मलयकेतु —[ स्वगतम् ] मम च ।
भागुरायण —श्रोतुमिच्छामि ।
मलयकेतु —[ स्वगतम् ] अहमपि ।
क्षपणक —सावका ! कि एदिणा असुणिदव्वेण सुदेण ? (उपासक ! किमेतेनाश्रोतव्येन श्रुतेन ? )
भागुरायण—भदन्त ! यदि रहस्य, तदा तिष्ठतु ।
क्षपणक —सावका ! ण हि रहस्स । (उपासक ! न हि रहस्यम् ।)
भागुरायण —तर्हि कथ्यताम् ।

पञ्चमोऽङ्कः २६१

क्षपणकः—साबकां ! णत्थि एदं, तथावि ण कधइस्सं अदिणिसंसं । ( उपासक ! नास्तीदं, तथापि न कथयिष्याम्यतिनृशंसम् । )
भागुरायणः—भदन्त ! अहमपि मुद्रां न दास्यामि ।
क्षपणकः—[ स्वगतम् ] युक्तमिदानीमर्थिने कथयितुम् । [प्रकाशम्] का गदी ? एसे णिवेदेमि, सुणादु साबको । अत्थि दाव हगे अधण्णो पढ़मं पाड़लिउत्ते णिब्समाणो रक्खसस्स मित्तत्तणं उबगदे । तहिं अबसले रक्खसेण गूढं बिकसण्णाप्पओअं समुप्पादिअ घादिदे देव पब्बदीसले । ( का गतिः ? एष निवेदयामि, शृणोतु उपासकः । अस्ति तावदहमधन्यः प्रथम पाटलिपुत्रे निवसन् राक्षसस्य मित्रत्वमुपागतः । तस्मिन्नवसरे राक्षसेन गूढ विषकन्याप्रयोगं समुत्पाद्य घातितो देव पर्वतेश्वरः । )

हिन्दी अनुवादक्षपणक—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो, पाप शान्त हो । उपासक ! मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ राक्षस या पिशाच का नाम भी नही सुना जाता है ।

भागुरायण—भदन्त ! मित्र पर आपका बड़ा भारी प्रेम-कोप है । सो राक्षस ने भदन्त का क्या अपराध किया ?

क्षपणक—उपासक ! राक्षस ने मेरा कुछ भी अपराध नहीं किया, मैं अभागा स्वयं ही अपने कर्मों से लज्जित हूँ ।

भागुरायण—भदन्त ! आप मेरे कुतूहल को बढ़ा रहे हैं ।
मलयकेतु—[ मन में ] मेरे भी ।
भागुरायण—मैं सुनना चाहता हूँ !
मलयकेतु—[ मन में ] मै भी ।
क्षपणक—उपासक ! इस न सुनने योग्य ( विषय ) के सुनने से क्या ( लाभ ) ?
भागुरायण—भदन्त ! यदि गोपनीय हो तो रहने दीजिये ।
क्षपणक—उपासक ! गोपनीय नही है ।
भागुरायण—तब कहिए ।

२६२ मुद्राराक्षसम्

क्षपणक—उपासक ! यह (गोपनीय) नही है, तो भी अत्यन्त कठोर बात मैं नही कहूँगा।

भागुरायण—भदन्त ! मैं भी मुद्रा नहीं दूंगा।

क्षपणक—[ मन मे ] इस समय ( सुनाने के ) प्रार्थी को कहना उचित है। [ प्रकट ] क्या उपाय है ? अभी बताता हूँ, उपासक सुने । यह सत्य है कि पहले पाटलिपुत्र मे रहता हुआ भाग्यहीन मैं राक्षस का मित्र बन गया । उसी समय राक्षस ने गुप्त रूप से विषकन्या का प्रयोग करके महाराज पर्वतेश्वर को मरवा दिया ।

टिप्पणीप्रणयकोप—प्रणयकृत कोप प्रणयकोपः मध्यमपदलोपी स०। अपराद्धम्—अप्‌√राध् ( दिवादि )+क्त भावे अथवा अप√राध्+क्त कर्मणि अपराद्धम् । प्रथम व्युत्पत्ति किम् को प्रश्नवाची मानकर की गई है और दूसरी व्युत्पत्ति किम् को ‘अपराद्धम्’ का विशेषण मानकर दिखाई गई है । भदन्तस्य—यहाँ ‘राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्न’ सूत्र से चतुर्थी होनी चाहिए थी, किन्तु शेष की विवक्षा मे षष्ठी हो गई । अतिनृशंसम्—अतिशयक्रूरम् । घातित पर्वतेश्वर—राक्षस ने पर्वतेश्वर का वध कराया है, यह अफवाह चाणक्य ने फैला दी थी, जो राक्षस को मालूम थी । किन्तु मलयकेतु के कानो तक नही पहुँची थी । अब जीवसिद्धि भागुरायण के द्वारा मलयकेतु को इससे अवगत करा देना चाहता है ।

मलयकेतु—[ सबाष्पमात्मगतम् ] कथं राक्षसेन घातितस्तातो न चाणक्येन ?

भागुरायण—भदन्त ! ततस्ततः ?

क्षपणक—तदो हगे रक्खसस्स मित्तं कदुअ चाणक्कहदएण सणि-काल णअरादो णिव्वासिदो । दाणीं पि रक्खसेण अणेअकज्जकुसलेण किंपि तादिस आलहीअदि, जेण हगे जीअलोआदो णिष्कासिज्जेमि ।

( ततोऽहं राक्षसस्य मित्रं कृत्वा चाणक्यहतकेन मणिकार नगराद्निर्वा-सित । इदानीमपि राक्षसेनानेकाकार्यकुशलेन किमपि तादृशमारभ्यते, येनाहं जीवलोकान्निष्कासिष्ये ।)

पञ्चमोऽङ्कः २६३

भागुरायणः—भदन्त ! प्रतिश्रुतराज्यार्धमयच्छता चाणक्यहतकेनेदमकार्यमनुष्ठितं न राक्षसेनेति श्रुतमस्माभिः ।

क्षपणकः—[ कर्णौ विधाय ] सन्तं पावं । सावका ! चाणक्को बिसकण्णाए णामपि णं जाणादि । तेण ज्जेब दुट्ठबुद्धिणा रक्खसेण एसा अकज्जसिद्धी किना ( शान्तं पापम् ! उपासक ! चाणक्यो विषकन्याया नामापि न जानाति । तेनैव दुष्टबुद्धिना राक्षसेनैषाऽकार्यसिद्धिः कृता ।)

भागुरायणः—भदन्त ! कष्टमिदमियं मुद्रा दीयते, एहि कुमारं संश्रावयावः ।

हिन्दी अनुवादमलयकेतु—[ आँसू के साथ मन में ] कैसे राक्षस ने पिता जी को मरवाया चाणक्य ने नहीं ?

भागुरायण—भदन्त ! तब क्या हुआ ?

क्षपणक—तब मैं राक्षस का मित्र हूँ, ऐसा करके दुष्ट चाणक्य के द्वारा अपमानपूर्वक नगर से निकाल दिया गया । अभी भी अनेक प्रकार के कुकर्मों में निपुण राक्षस ने कुछ वैसा ( काम ) प्रारंभ किया है, जिससे मैं संसार से निकाल दिया जाऊँगा ।

भागुरायण—भदन्त ! प्रतिज्ञा किये हुए राज्य का आधा ( भाग ) न देते हुए दुष्ट चाणक्य ने यह कुकर्म किया राक्षस ने नहीं, ऐसा हमने सुना था ।

क्षपणक—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो । उपासक ! चाणक्य विषकन्या का नाम भी नहीं जानता है । उसी दुष्टबुद्धि राक्षस ने यह कुकर्म का अनुष्ठान किया है ।

भागुरायण—भदन्त ! यह कष्ट की बात है । यह मुद्रा दे रहा हूँ । आइए, कुमार को हम दोनों सुनावें ।

टिप्पणीराक्षसस्य मित्रमिति कृत्वा—पहले अंक में यह संकेत आ चुका है कि जीवसिद्धि को चाणक्य ने राक्षस का मित्र बनकर कार्य सिद्ध करने का आदेश दिया । अतएव जीवसिद्धि ने राक्षस का इतना विश्वास प्राप्त कर लिया कि विषकन्या के द्वारा चन्द्रगुप्त को मरवाने के कार्य में राक्षस ने जीवसिद्धि को ही नियुक्त किया । किन्तु जीवसिद्धि ने विषकन्या का प्रयोग चन्द्रगुप्त के प्रति

२६४मुद्राराक्षसम्

न करके पर्वतेश्वर के प्रति कर दिया । राक्षस ने इस रहस्य को नहीं समझा । अतएव उसने भाग्य को इसके लिए दोषी ठहराया । सनिकारम्—सापमानम् । निर्वासित —निष्कासित । तादृशम्—पर्वतेश्वरघातनसदृशम् । गूढार्थस्तु मलयकेतुनिग्रहरूपं कार्यम् । जीवलोकात्—संसारात् । प्रतिश्रुतराज्यार्धम्—प्रतिश्रुतं च तद्राज्यार्धम् प्रतिश्रुतराज्यार्धम् = प्रतिज्ञा-तराज्यार्धभागम् । अयच्छता—अददता । अकार्यम्—पर्वतेश्वरघातनात्मकं निन्दितं कर्म ।

मलयकेतुः—

श्रुतं सखे ! श्रवणविदारणं वच सुहृन्मुखाद्रिपुमधिकृत्य भाषितम् । पितुर्वधव्यसनमिदं हि येन मे चिरादपि द्विगुणमिवाद्य वर्धते ॥ ६ ॥

अन्वय — सखे ! रिपुमधिकृत्य भाषितं श्रवणविदारणं वचः सुहृन्मुखात् श्रुतम् येन इदं मे पितुर्वधव्यसनं चिरादपि अद्य द्विगुणमिव वर्धते हि ॥ ३ ॥

व्याख्या— सखे !— मित्र !, रिपुम्—शत्रुम्, अधिकृत्य—उद्दिश्य, भाषित—कथित, श्रवणविदारण—श्रवणयोः कर्णयोः विदारणं भेदकमिव, वच —वचनं सुहृन्मुखात्—सुहृद मित्रस्य शत्रोरेव राक्षसस्य सुहृद जीवसिद्धेः मुखात् आननात्, श्रुतम्—आकर्णितम्, येन—श्रवणेन, इदम्—अनुभूयमान, मे—मम, पितुर्वधव्यसन—तातविनाशजन्यदुःख, चिरादपि चिरकालजातमपि, अद्य—अस्मिन् दिने, द्विगुणमिव—अधिकमिव, वर्धते हि—वृद्धते एव ॥६॥

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु— मित्र ! शत्रु को लक्ष्य करके कहा हुआ कर्णभेदी वचन (राक्षस के) मित्र के मुख से सुन लिया, जिससे यह मेरा पितृ-वध से उत्पन्न दुःख बहुत दिन हो जाने से भी आज मानो दूना बढ़ रहा है ॥६॥

टिप्पणी—श्रवणविदारणम्— कानों को विदीर्ण करने वाला । विदारयति इति वि√दृ + णिच् + ल्युट् कर्तरि बाहुलकात् = विदारणम् । श्रवणयोः विदारणम् षष्ठीतत्० । सुहृन्मुखात्—(राक्षस के) मित्र के मुख से । चूंकि राक्षस

पञ्चमोऽङ्कः २६५

का मित्र ही ऐसा कह रहा है, इसलिए इस समाचार पर सन्देह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। सुहृद् और मित्र आदि में अन्तर—'अत्यागसहनो बन्धुः सदैवानुमतः सुहृद् । एकक्रियं भवेन्मित्रं समप्राणः सखा मतः ।' इस पद्य में उत्प्रेक्षा अलंकार है और रुचिरा छंद है। रुचिरा का लक्षण २, ३ में देखिए ।। ६ ।।

क्षपणकः—[स्वगतम्] अये श्रुतं मलयकेतुहतकेन !! कृतार्थोऽस्मि ।

[ इति निष्क्रान्तः । ]

मलयकेतुः—[ प्रत्यक्षवदाकाशे लक्ष्यं बद्ध्वा ] राक्षस ! युक्तमिदम् ।

मित्रं ममायमिति निर्वृतचित्तवृत्तिं विश्रम्भतस्त्वयि निवेशितसर्वकार्यम् । तातं निपात्य सह बन्धुजनाक्षितोयै- रन्वर्थतोऽपि ननु राक्षस ! राक्षसोऽसि ॥ ७ ॥

**अन्वयः—**ननु राक्षस ! अयं मम मित्रम् इति विश्रम्भतः त्वयि निवेशितसर्वकार्यम् निर्वृतचित्तवृत्तिं तातं बन्धुजनाक्षितोयैः सह निपात्य अन्वर्थतोऽपि राक्षसोऽसि ।। ७ ।।

**व्याख्या—**ननु राक्षस—भो राक्षस ! अयं—राक्षसः, मम—मे, मित्रम्—सुहृद, इति—एवम्, विश्रम्भतः—विश्वासात्, त्वयि—राक्षसे, निवेशितसर्वकार्यम्—निवेशितं समर्पितं सर्वकार्य निखिलं राज्यं तादृशम्, निर्वृतचित्तवृत्ति—निर्वृता स्वस्था चित्तवृत्तिः मनोव्यापारः यस्य तादृशम्, तातं—पितरं, बन्धुजनाक्षितोयैः—आत्मीयजनाश्रुभिः, सह—साकम्, निपात्य—धराशायिनं कृत्वा, अन्वर्थतोऽपि—योगार्थादपि, राक्षसोऽसि—असुरोऽसि ॥७॥

हिन्दी अनुवाद—क्षपणक—[ मन में ] अरे ! दुष्ट मलयकेतु ने सुन लिया !! मै कृतार्थ ( हो गया ) हूँ ।

[ बाहर चला जाता है । ]

मलयकेतु—[ आकाश में प्रत्यक्ष की भाँति दृष्टि बाँधकर ] राक्षस ! यह ठीक है ।

राक्षस ! यह मेरा मित्र है—इस प्रकार विश्वास के कारण तुम्हें सम्पूर्ण

२६६ मुद्राराक्षसम्

( राज्य ) कार्य सौंप देने वाले और ( अतएव ) स्वस्थ चित्तवृत्ति वाले पिता ( पर्वतेश्वर ) को बन्धुजनों के आँसुओं के साथ धराशायी करके तुम अर्थ की दृष्टि से भी राक्षस हो ( अर्थात् केवल नाम्ना ही राक्षस नहीं हो अपितु कर्मणा भी राक्षस हो ) ॥७॥

टिप्पणी—अये श्रुतम् क्षपणक को यह नहीं मालूम था कि मलयकेतु उसकी बात सुन रहा है। इसलिए जब मलयकेतु ने कहा कि मैंने सब कुछ सुन लिया तब वह बहुत प्रसन्न हुआ और यह कह उठा कि मैं कृतकृत्य हो गया । क्योंकि वह इसी कार्य के लिए नियुक्त था कि मलयकेतु के मन में पर्वतेश्वर की हत्या राक्षस ने करवाई है चाणक्य ने नहीं—इस बात को जमा दे । सो वह इस कार्य में सफल हो गया । बन्धुजनाक्षितोयै —बन्धुजनानाम् अक्षितोयैः = नेत्रजलै । निपात्य—प्राणैर्वियोज्य इत्यर्थ । अन्वर्थत —अर्थ का अनुसरण करते हुए, यथार्थ मे । अनुगतं अर्थम् अन्वर्थ , तेन । 'तृतीयायास्तसि' इत्यनेन तसिप्रत्यय । इस पद्य में अतिशयोक्तिमूलक सहोक्ति अलंकार है । इसमे वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥७॥

भागुरायण —[ स्वगतम् ] रक्षणीया राक्षसस्य प्राणा इत्यार्यादेश । भवत्वेवं तावत् ! [ प्रकाशम् ] कुमार ! अलमावेगेन । आसनस्थं कुमारं किञ्चिद्विज्ञापयितुमिच्छामि ।

मलयकेतु —[ उपविश्य ] सखे ! किमसि वक्तुकाम ?

भागुरायण —कुमार ! खल्वर्थशास्त्रव्यवहारिणामर्थवशादरिमित्रोदासीनव्यवस्था न लौकिकानामिव स्वेच्छावशात् । यतस्तस्मिन् काले सर्वार्थसिद्धिं राजनमिच्छतो राक्षसस्य चन्द्रगुप्तादपि बलीयस्तया सुगृहीतनामा देव पर्वतेश्वर एवार्थपरिपन्थी महानरातिरासीत् । तस्मिंश्च काले राक्षसेनेदमनुष्ठितमिति नातिदोषमत्र पश्यामि । पश्यतु कुमार —

मित्राणि शत्रुत्वमिवानयन्ती मित्रत्वमर्थस्य वशाच्च शत्रून् । नीतिर्नयत्यस्मृतपूर्ववृत्तं जन्मान्तरं जीवत एव पुंसः ॥८॥

पंचमोऽङ्कः २६७

अन्वयः—अर्थस्य वशात् नीतिः अस्मृतपूर्ववृत्तं मित्राणि शत्रुत्वं शत्रून् च मित्रत्वम् इव आनयन्ती जीवत एव पुंसः जन्मान्तरं नयति ॥८॥

व्याख्याअर्थस्य—प्रयोजनस्य, वशात्—अनुरोधात्, नीतिः—नय-व्यवहारः, अस्मृतपूर्ववृत्तम्—अस्मृतं स्मृतिपथमना रूढं पूर्ववृत्तं प्राग्व्यवहारः यस्मिन् तत् यथा तथा, मित्राणि—सुहृदः, शत्रुत्वं, शत्रून् च—अरींश्च, मित्रत्वम्—सुहृत्त्वम्, इव—तद्वत्, आनयन्ती—प्रापयन्ती, जीवत एव—अमृतानेव, पुंसः—पुरुषान्, जन्मान्तरम्—अन्यज्जन्म, नयति—प्रापयति ॥८॥

हिन्दी अनुवादभागुरायण—[ मन में ] राक्षस के प्राण बचाने चाहिए, यह आर्य (चाणक्य) की आज्ञा है। तब तक ऐसा हो। [ प्रकट रूप से ] कुमार ! क्रोध में न आवें। आसनासीन हुए कुमार से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।

मलयकेतु—[ बैठकर ] मित्र ! क्या कहना चाहते हो ?

भागुरायण—कुमार ! नीतिशास्त्र के अनुसरण करने वालों की शत्रु, मित्र और तटस्थ की व्यवस्था प्रयोजनवश हुआ करती है, साधारण व्यक्तियों की तरह स्वेच्छानुसार नही। क्योकि उस समय सर्वार्थसिद्धि को राजा बनाने की इच्छा करते हुए राक्षस के लिये चन्द्रगुप्त से भी बलवान् प्रातः स्मरणीय महाराज पर्वतेश्वर ही स्वार्थ में बाधक महान् शत्रु थे। (अतएव) उस समय राक्षस ने यह किया, इसलिए इसमें (उसका) बहुत दोष नही देखता हूँ। कुमार देखें—

प्रयोजनवश नीति पहले के व्यवहार को बिना स्मरणपथ में लाये मित्रों को शत्रु और शत्रुओं को मित्र के समान बनाती हुई जीवित ही पुरुषों को दूसरे जन्म मे पहुँचा देती है ॥८॥

टिप्पणीअर्थशास्त्रव्यवहारिणाम्—नीतिशास्त्रानुसरणशीलानाम् । अर्थशास्त्रेण व्यवहर्तुं शीलमेषाम् इति अर्थशास्त्र—वि—अव √हृ + णिनि कर्तरि तच्छील्ये, तेषाम् । अर्थवशात्—अर्थस्य प्रयोजनस्य वशम् आयत्तता, तस्मात् । अरिमित्रोदासीनव्यवस्था—वि-अव √स्था + अङ् भावे = व्यवस्था । अरयश्च मित्राणि च उदासीनाश्च इति द्वन्द्व स०, तेषाम् व्यवस्था । लौकिकानाम्—लोकानुसरणशीलानाम् साधारणजनानामित्यर्थः । लोके भवाः