मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
विवाहप्रकरण १८४ शुभ नवांश कार्मुकतौलिककन्यायुग्मलवे झषगे वा। र्यहि भवेदुपयामस्तर्हि सती खलु कन्या ॥ ८४ ॥ अन्वयः—कार्मुकतौलिककन्यायुग्मलवे वा झषगे (लवे) र्यहि उपयामः भवेत् तर्हि (सा) कन्या खलु [निश्चयेन] सती (स्यात्) ॥ ८४ ॥ धनु, तुला, कन्या और मिथुन के नवांश में यदि विवाह हो तो कन्या पतिव्रता होती है। ग्रन्थकार ने मीन का नवांश भी विकल्प से शुभ बताया है, किन्तु प्राचीन मुनियों ने मीन का नवांश त्याज्य कहा है ॥ ८४ ॥ विहित नवांशों में भी किसी का निषेध अन्त्यनवांशे न च परिणेया काचन वर्गोत्तममिह हित्वा । नो चरलग्ने चरलवयोगं तौलिमृगस्थे शशभृति कुर्यात् ॥ ८५ ॥ अन्वयः—इह वर्गोत्तमं हित्वा अन्त्यनवांशे काचन (कन्या) न च परिणेया, तौलमृगस्थे शशभृति चरल
१४६ मुहूर्तचिन्तामणि स्थान में लग्नेश, शुक्र और चन्द्रमा शुभ नहीं होते। आठवें स्थान में चन्द्रमा, लग्नेश, शुभग्रह और मंगल शुभ नहीं होते। और सातवें स्थान में सम्पूर्ण शुभाशुभ ग्रह शुभ नहीं होते ॥ ८६ ॥ विवाहकालिक शुभग्रह त्र्यायाष्टषट्सु रविकेतुतमोऽर्कपुत्रा- स्त्र्यायारिगः क्षितिसुतो द्विगुणायगोऽब्जः । सप्तव्ययाष्टरहितौ ज्ञगुरू सितोष्ट- त्रिद्यूनषड्व्ययगृहान्परिहृत्य शस्तः ॥ ८७ ॥ अन्वयः—त्र्यायाष्टषट्सु रविकेतुतमोऽर्कपुत्राः (शस्ताः स्युः) । क्षितिसुतः त्र्याया- रिगः, अब्जः द्विगुणायगः (शुभः) । ज्ञगुरू सप्तव्ययाष्टरहितौ (शुभौ), अष्टत्रिद्यूनषड्- व्ययगृहान् परिहृत्य सितः शस्तः (स्यात्) ॥ ८७ ॥ लग्न से तीसरे, गेरहवें, आठवें और छठे स्थान में सूर्य शुभ होता है। इन्हीं स्थानों में केतु, राहु और शनैश्चर भी शुभ होते हैं। तीसरे, गेरहवें, छठे स्थान में मंगल शुभ होता है। दूसरे, तीसरे, गेरहवें स्थान में चन्द्रमा शुभ होता है। सातवें, बारहवें, आठवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में बुध और बृहस्पति शुभ होते हैं। आठवें, तीसरे, सातवें, छठे, बारहवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में शुक्र शुभ होता है ॥ ८७ ॥ कर्तरी आदि महादोषों का परिहार पापौ कर्तरिकारकौ रिपुगृहे नीचास्तगौ कर्तरी- दोषो नैव सितेऽरिनीचगृहगे तत्षष्ठदोषोऽपि न । भौमेऽस्ते रिपुनीचगे नहि भवेद्भौमोऽष्टमो दोषकृ- न्नीचे नीचनवांशके शशिनि रिष्फाष्टारिदोषोऽपि न ॥ ८८ ॥ अन्वयः—कर्तरिकारकौ पापौ (यदि) रिपुगृहे (वा) नीचास्तगौ (तदा) कर्तरी- दोषो नैव (भवति), अरिनीचगृहगे सिते तत्षष्ठदोषः अपि न (भवेत्), भौमे अस्ते रिपुनीचगे अष्टमो भौमः दोषकृत् नहि भवेत्, शशिनि नीचे नीचनवांशके (स्थिते) रिष्फाष्टारिदोषः अपि न भवेत् ॥ ८८ ॥ यदि कर्तरी कारक दोनों ग्रह क्रूर हों, अथवा अपने शत्रु के स्थान में स्थित हों या अपने नीच स्थान में हों, अथवा अस्त हों तो कर्तरी दोष नहीं होता। यदि शुक्र अपने शत्रु के स्थान में या नीच स्थान में स्थित हो तो लग्न से छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता। यदि मंगल अपने शत्रु के स्थान
विवाहप्रकरण १४७ में या नीच स्थान में स्थित हो अथवा अस्त हो, तो लग्न से आठवें स्थान में रहकर भी दोषकारक नहीं होता। यदि चन्द्रमा अपने नीच स्थान में या नीच राशि के नवांश में स्थित हो तो लग्न से बारहवें, आठवें, छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता ॥ ८८ ॥ वर्ष आदि अनेक दोषों का परिहार अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिराऽङ्गमुखाश्च दोषाः । नश्यन्ति विद्गुरुसितेष्विह केन्द्रकोणे तद्वच्च पापविधयुक्तनवांशदोषः ॥ ८९ ॥ अन्वयः—विद्गुरुसितेषु केन्द्रकोणे (स्थितेषु) इह अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्ध- तिथ्यन्धकाणबधिरांगमुखाः दोषाः नश्यन्ति च पुनः तद्वत् पापविधयुक्तनवांशदोषः नश्यति ॥ ८६ ॥ लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बुध, बृहस्पति और शुक्र के रहते सम-विषमादि वर्षदोष, अयनदोष, ऋतुदोष, रिक्तादि तिथिदोष, मास- दोष, क्रूरग्रहसहितादि नक्षत्रदोष, तेरह दिन का पक्षदोष, दग्धातिथिदोष अन्ध-काण-बधिरादि लग्नदोष और अकालवृष्टि आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही चन्द्रयुक्त राशि के नवांश में पापग्रह के रहने का भी दोष नष्ट हो जाता है ॥ ८९ ॥ अन्य दोषों का परिहार केन्द्रे कोणे जीव आये रवौ वा लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमे वा । सर्वे दोषा नाशमायान्ति चन्द्रे लाभे तद्वद्दुर्मुहूतांशदोषाः ॥ ९० ॥ अन्वयः—जीवे केन्द्रे वा कोणे, वा रवौ आये, वा लग्ने वर्गोत्तमे, अपि वा चन्द्रे वर्गोत्तमे [स्थिते] सर्वे दोषाः नाशं आयान्ति, तद्वत् चन्द्रे लाभे (सति) दुर्मुहूर्तांशदोषाः नाशं आयान्ति ॥ ९० ॥ लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बृहस्पति, लग्न से गेरहवें स्थान में सूर्य तथा लग्न के वर्गोत्तम में या अपने वर्गोत्तम में चन्द्रमा के रहते सब दोष नष्ट हो जाते हैं । ऐसे ही लग्न से गेरहवें स्थान में चन्द्रमा के रहते दुष्टमुहूर्त्तदोष तथा पापग्रह के नवांश का दोष नष्ट हो जाता है ॥ ९० ॥ सामान्य दोषों का परिहार त्रिकोणे केन्द्रे वा मदनरहिते दोषशतकं हरेत्सौम्यः शुक्नो द्विगुणमपि लक्षं सुरगुरुः ।
१४८ मुहूर्तचिन्तामणि भवेदाये केन्द्रेऽङ्गप उत लवेशो यदि तदा समूहं दोषाणां दहन इव तूलं शमयति ॥ ९१ ॥ अन्वयः—सौम्यः त्रिकोणे वा मदनरहिते केन्द्रे (स्थितः) दोषशतकं हरेत् । अपि शुक्रः द्विगुणं, सुरगुरुः लक्षं [लक्षगुणं] दोषं हरेत् । अंगपः उत् लवेशः यदि आये वा केन्द्रे भवेत् तदा दोषाणां समूह दहनः तूलं इव शमयति ॥ ६१ ॥ यदि लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें या दशवें स्थान में बुध स्थित हो तो सौ दोषों को हरता है। यदि इन्हीं स्थानों में शुक्र स्थित हो तो पूर्व से द्विगुण, अर्थात् दो सौ दोषों को हरता है। यदि इन्हीं स्थानों में बृहस्पति स्थित हो तो एक लाख दोषों को हरता है। लग्न का स्वामी अथवा नवांश का स्वामी यदि लग्न, चौथे, दशवें, गेरहवें स्थान में स्थित हो तो दोषों के समूह को वैसे ही नष्ट करता है जैसे अग्नि रुई के ढेर को भस्म करती है ॥ ९१ ॥ लग्न का विंशोपक बल द्वौ द्वौ ज्ञभृग्वोः पञ्चेन्दौ रवौ सार्द्धत्रयो गुरौ । रामा मन्दागुकेत्वारे सार्द्धैकैकं विंशोपकाः ॥ ९२ ॥ अन्वयः—ज्ञभृग्वोः द्वौ द्वौ, इन्दौ पञ्च, रवौ सार्धत्रयः, गुरौ रामः, मन्दागुकेत्वारे सार्धैकैकं विंशोपकाः (भवन्ति) ॥ ६२ ॥ इसी प्रकरण के सत्तासी श्लोक में कहे हुए अपने शुभ स्थानों में स्थित रहते बुध का दो बिस्वा, शुक्र का दो बिस्वा, चन्द्रमा का पाँच बिस्वा, सूर्य का साढ़े तीन बिस्वा, बृहस्पति का तीन बिस्वा, शनैश्चर का डेढ़ बिस्वा और राहु, केतु तथा मंगल का डेढ़-डेढ़ बिस्वा बल होता है। उक्त स्थानों से अन्यत्र स्थित रहते सूर्य आदि ग्रह शून्यबल होते हैं। प्रयोजन यह है कि विवाहकाल में यह सब बल मिलकर पन्द्रह से बीस बिस्वा तक हो तो लग्न शुभ और दश से पन्द्रह बिस्वा तक हो तो मध्यम और पाँच से दस बिस्वा तक हो तो अशुभ होती है। पाँच बिस्वा से कम हो तो वह लग्न वर्जित होती है ॥ ९२ ॥ इवश्ववादि के सुख-दुःख जानने का उपाय श्वश्रूः सितोऽर्कः श्वशुरस्तनुस्तनुर्जामित्रपः स्याद्दयितो मनः शशी । एतद्बलं संप्रतिभाव्य तान्त्रिकस्तेषां सुखं संप्रवदेद्विवाह्रतः ॥ ९३ ॥
विवाहप्रकरण १४९
अन्वयः—सितः श्वश्रूः, अर्कः श्वशुरः, तनुः [लग्नं] तनुः [शरीरं] जामित्रपः दयितः, शशी मनः स्यात् । तान्त्रिकः एतद्बलं संप्रतिभाव्य विवाहतः तेषां सुखं संप्रवदेत् ॥ ६३ ॥ शुक्र सासुसंज्ञक, सूर्य ससुरसंज्ञक, लग्न देहसंज्ञक, लग्न से सातवें स्थान का स्वामी पतिसंज्ञक और चन्द्रमा मनसंज्ञक होता है । विवाहकाल में इन ग्रहों के बल का विचार करके ज्योतिषी को चाहिए कि कन्या के ससुर आदि के सुख दुःख को कहे । विवाहकाल में यदि शुक्र बली हो तो कन्या की सासु को पतोहू की ओर से सुख, यदि सूर्य बली हो तो ससुर को सुख, यदि लग्न बली हो तो कन्या के शरीर को सुख, यदि लग्न से सातवें स्थान का स्वामी बली हो तो कन्या के पति को सुख और चन्द्रमा बली हो तो कन्या के मन को सुख देता है ॥ ९३ ॥ संकरवर्णों के विवाह का मुहूर्त कृष्णे पक्षे सौरिकुजार्केऽपि च वारे वर्ज्ये नक्षत्रे यदि वा स्यात्करपीडा । संकीर्णानां तर्हि सुतायुर्धनलाभ- प्रीतिप्राप्त्यै सा भवतीह स्थितिरेशा ॥ ९४ ॥ अन्वयः—कृष्णे पक्षे अपि च सौरिकुजार्के वारे वर्ज्ये नक्षत्रे वा यदि संकीर्णानां करपीडा स्यात् (तदा) सा (करपीडा) सुतायुर्धनलाभप्रीतिप्राप्त्यै भवति, इह एषा स्थितिः (स्यात्) ॥ ६४ ॥ कृष्णपक्ष में, शनैश्चर, मंगल वा रविवार में, और विवाह में वर्जित नक्षत्रों में यदि संकर वर्णों का विवाह हो तो उनको पुत्र, आयु, धन, लाभ और प्रीति की प्राप्ति होती है ॥ ९४ ॥ गान्धर्वादि विवाह और त्रिपदीचक्र में नक्षत्रशुद्धि गान्धर्वादिविवाहेऽर्काद्वेदनेत्रगुणेन्दवः । कुयुगाङ्गाग्निभूरामास्त्रिपद्यामशुभाः शुभाः ॥ ९५ ॥ अन्वयः—गान्धर्वादिविवाहे त्रिपद्यां अर्कात् (अर्कनक्षत्रात्) वेदनेत्रगुणेन्दवः कुयुगां- गाग्निभूरामाः (क्रमात्) अशुभाः शुभाः (स्मृताः) ॥ ६५ ॥ गान्धर्वादि विवाह में सूर्य के नक्षत्र से चार नक्षत्र अशुभ, फिर दो नक्षत्र शुभ, फिर तीन नक्षत्र अशुभ, फिर एक नक्षत्र शुभ, फिर एक नक्षत्र
१५० मुहूर्तचिन्तामणि अशुभ, फिर चार नक्षत्र शुभ, फिर छः नक्षत्र अशुभ, फिर तीन नक्षत्र शुभ, फिर एक नक्षत्र अशुभ, फिर तीन नक्षत्र शुभ होते हैं। ऐसे ही त्रिपदीचक्र में भी ये नक्षत्र क्रम से अशुभ और शुभ होते हैं ॥ ९५ ॥ सूर्य के नक्षत्र से अशुभ और शुभ नक्षत्र | ४ | २ | ३ | १ | १ | ४ | ६ | ३ | १ | ३ | | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | विवाह से पूर्व होनेवाले कार्यों का मुहूर्त विधोर्बलमवेक्ष्य वा दलनकण्डनं वारकं गृहांगणविभूषणान्यथ च वेदिकामण्डपान् । विवाहविहितोडुभिर्विरचयेत्तथोद्वाहतो न पूर्वमिदमाचरेत्त्रिनवषण्मिते वासरे ॥ ९६ ॥ अन्वयः—विधोः बलं अवेक्ष्य विवाहत्रिहितोडुभिः दलनकण्डनं वारकं गृहाङ्गण- विभूषणानि (कार्याणि) अथ वेदिकामण्डपान् च विरचयेत् तथा उद्वाहतः पूर्वं त्रिनवषण्मिते वासरे इदं (पूर्वोक्तं कर्म) न आचरेत् ॥ ९६ ॥ विवाह के लिए जो नक्षत्र शुभ कहे गये हैं उन नक्षत्रों में तथा वर-कन्या के चन्द्रबल को विचारकर विवाह दिन से पूर्व तीसरे, छठे, नवें दिन को छोड़ अन्य दिनों में, आटा पीसना, दाल दलना, चावल कूटना, कलशस्थापन करना, घर और आँगन की सफाई करना, वेदी बनाना, मंडप छवाना आदि कार्य करे ॥ ९६ ॥ वेदी के लक्षण तथा मंडप का उद्वासन हस्तोच्छ्राया वेदहस्तैः समन्तात्तुल्या वेदी सद्मनो वामभागे । युग्मे घस्रे षष्ठहीने च पञ्चसप्ताहे स्यान्मण्डपोद्वासनं सत् ॥ ९७ ॥ अन्वयः—सद्मनः वामभागे हस्तोच्छ्राया समन्तात् वेदहस्तैः तुल्या वेदी (कार्या), च षष्ठहीने युग्मे घस्रे पञ्चसप्ताहे मण्डपोद्वासनं सत् स्यात् ॥ ९७ ॥ घर के बायें भाग में हाथ भर ऊँची, हाथ भर लम्बी और हाथ भर चौड़ी वेदी बनाना चाहिए, और विवाह के दिन से छठे दिन को छोड़ सम दिनों में तथा विषम दिनों में पाँचवें या सातवें दिन मंडप का विसर्जन करना चाहिए ॥ ९७ ॥
विवाहप्रकरण १५१ मंडप के खम्भ गाड़ने का मुहूर्त्त सूर्येऽङ्गनासिंहघटेषु शैवे स्तम्भोऽलिकोदण्डमृगेषु वायौ । मीनाजकुम्भे निर्ऋतौ विवाहे स्थाप्योऽग्निकोणे वृषयुग्मकर्कै ॥ ९८ ॥ अन्वयः—अंगनासिंहघटेषु (स्थिते) सूर्ये शैवे (ईशानकोणे) अलिकोदण्डमृगेषु वायौ, मीनाजकुम्भे निर्ऋतौ वृषयुग्मकर्कै अग्निकोणे विवाहे स्तम्भः स्थाप्यः ॥ ६८ ॥ कन्या, सिंह और तुला में सूर्य के स्थित रहते घर के ईशानकोण में; वृश्चिक, धनु, मकर में स्थित रहते वायव्यकोण में; मीन, कुम्भ, मेष में स्थित रहते नैर्ऋत्यकोण में और वृष, मिथुन, कर्क में स्थित रहते आग्नेय- कोण में खम्भ गाड़ना चाहिए ॥ ९८ ॥
स्तम्भचक्र
| सिंह | कन्या | तुला | ईशान |
|---|---|---|---|
| वृश्चिक | धन | मकर | वायव्य |
| कुम्भ | मीन | मेष | नैर्ऋत्य |
| वृष | मिथुन | कर्क | आग्नेय |
गोधूलिप्रशंसा नास्यामृक्षं न तिथिकरणं नैव लग्नस्य चिन्ता नो वारो न च लवविधिर्नो मुहूर्त्तस्य चर्चा । नो वा योगो न मृतिभवनं नैव जामित्रदोषो गोधूलिः सा मुनिभिरुदिता सर्वकार्येषु शस्ता ॥ ९९ ॥ अन्वयः—अस्यां (गोधूल्यां) ऋक्षं न (चिन्त्यं) तिथिकरणं न, लग्नस्य चिन्ता नैव, वा वारः न, च लग्नविधिः न, मुहूर्त्तस्य चर्चा नो, नो वा योगः, मृतिभवनं नैव, जामित्र- दोषः नैव, (यतः) सा गोधूलिः मुनिभिः सर्वकार्येषु शस्ता उदिता ॥ ६६॥ सम्पूर्ण कार्यों में गोधूलि को मुनियों ने ऐसी शुभ कही है कि इसमें नक्षत्र, तिथि, करण, वार नवांशविधान, योग, आठवें स्थान की शुद्धि, जामित्रदोष ये सब विशेष नहीं विचारे जाते । लग्न का भी विशेष विचार नहीं किया जाता, और मुहूर्त्त का तो कुछ चर्चा ही नहीं है । इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि बहुत से सुयोगों के रहते कोई एक कुयोग भी हो तो गोधूलि में विवाह शुभ होता है । अथवा अन्य समय के लग्न में सब सुयोग ही हों और गोधूलि की लग्न में कुछ दोष भी हो तो गोधूलि ही श्रेष्ठ होती
४. संक्रान्ति, गोचर विचार, विविध कार्य-सिद्धि मुहूर्त एवं ग्रन्थ उपसंहार
है। अथवा पूर्व देशों में तथा कलिंग देश में गोधूलि मुख्य होती है। अथवा गांधर्वविवाह तथा वैश्य आदि के विवाह में गोधूलि श्रेष्ठ है। अथवा कोई शुभ लग्न न हो और कन्या युवती हो गई हो तो विधवा आदि भारी दोषों को छोड़कर गोधूलि में विवाह श्रेष्ठ होतस है ॥ ९९ ॥ समयभेद से गोधूलिकाल पिण्डीभूते दिनकृति हेमन्ततौ स्यादर्धास्ते तपसमये गोधूलिः । संपूर्णस्ते जलधरमालाकाले त्रेधा योज्या सकलशुभे कार्यादौ ॥ १०० ॥ अन्वयः—हेमन्ततौ दिनकृति (सूर्ये) पिण्डीभूते (सति), तपसमये अर्धास्ते (सति) जलधरमालाकाले सम्पूर्णास्ते [सूर्ये सति] गोधूलिः स्यात्, एवं त्रेधा [गोधूलिः] सकल- शुभकार्यादौ योज्या ॥ १०० ॥ हेमन्त ऋतु से यहाँ प्रयोजन शीतकाल से है, जाड़े के चार महीनों में कुहिरा आदि से ढककर सायंकाल में जब सूर्य भात के गोले के समान स्वच्छ तेजरहित देख पड़े तब, और चैत्रादि गर्मी के चार महीनों में सूर्य के आधे अस्त हो जाने पर और वर्षाकाल अर्थात् श्रावण आदि चार महीनों में सूर्य के सम्पूर्ण अस्त हो जाने पर गोधूलि होती है। यह गोधूलि का समय संपूर्ण कार्यों में शुभ होता है। गोधूलिपद का अर्थ यह है कि जब सायं काल में इकट्ठी होकर वन से घर की ओर आती हुई गौओं के खुरों से उठी हुई धूलि से आकाश भर जाता है, उस समय का नाम गोधूलि काल है ॥ १०० ॥ गोधूलि समय में त्याज्य दोष अस्तं यात गुरुदिवसे सौरे सार्के लग्नान्मृत्यो रिपुभवने लग्ने चेन्दौ । कन्यानाशस्तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोढुर्लाभे धनसहजे चन्द्रे सौख्यम् ॥ १०१ ॥ अन्वयः—गुरुदिवसे अस्तं याते (सूर्ये), सौरे सार्के गोधूलिः भवति लग्नात् मृत्यौ रिपुभवने, च लग्ने इन्दौ कन्यानाशः स्यात् तथा तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोढुः मृत्युः स्यात्, लाभे धनसहजे चन्द्रे (सति) सौख्यं भवेत् ॥ १०१ ॥ बृहस्पति के दिन सूर्यास्त होने के बाद और शनैश्चर के दिन सूर्यास्त होने के पूर्व गोधूलि शुभ होती है। बृहस्पति के दिन सूर्यास्त से पूर्व अर्द्धयाम दोष और शनैश्चर के दिन सूर्यास्त के बाद कुलिक दोष रहता है, इसलिए इन दोनों कालों की गोधूलि निषिद्धि होती है। लग्न से आठवें या छठे स्थान में अथवा लग्न में चन्द्रमा के स्थित रहते कन्या की
विवाहप्रकरण १५३ मृत्यु तथा सातवें या आठवें स्थान में अथवा लग्न में मंगल के स्थित रहते वर की मृत्यु होती है, इसलिए गोधूलिकाल में ऐसा लग्न निषिद्ध होता है। लग्न से ग्यारहवें, दूसरे या तीसरे स्थान में चन्द्रमा के स्थित रहते कन्या और वर दोनों को सौख्य होता है, इसलिए गोधूलिकाल में ऐसा लग्न श्रेष्ठ होता है ॥ १०१ ॥ सूर्य की स्पष्टगति मेषादिगेऽर्केऽष्टशरा ५८ नागाक्षाः ५७ सप्तेषवः ५७ सप्तशरा ५७ गजाक्षाः ५८ । गोऽक्षाः ५९ खतर्काः ६० कुरसाः ६१ कुतर्काः ६१ क्वङ्गानि ६१ षष्टि ६० र्नवपञ्च ५९ भुक्तिः ॥ १०२ ॥ अन्वयः—मेषादिगे अर्के अष्टशराः नागाक्षाः सप्तेषवः, सप्तशराः, गजाक्षाः, गोऽक्षाः, खतर्काः, कुरसाः, कुतर्काः, क्वंगानि, षष्टिः, नवपञ्च, भुक्तिः ॥ १०२ ॥ मेषादि बारह राशियों में इस क्रम से सूर्य की ५८ । ५७ । ५७ । ५७ । ५८ । ५९ । ६० । ६१ । ६१ । ६१ । ६० । ५९ । कला गति होती है ॥ १०२ ॥ सूर्यस्पष्ट करने की रीति संक्रान्तियातघस्राद्यैर्गतिर्निघ्ना खषट् ६० हृता । लब्धेनांशादिना योज्यं यातक्षं स्पष्टभास्करः ॥ १०३ ॥ अन्वयः—संक्रान्तियातघस्राद्यैः गतिः निघ्ना खषट्हृता लब्धेन अंशादिना यातर्क्षं योज्यं, स स्पष्टभास्करः स्यात् ॥ १०३ ॥ जिस दिन जितने दण्ड-पल पर सूर्य की संक्रान्ति लगी हो उस दिन से इष्टकाल पर्यन्त जितने दण्ड-पल हों उनको पूर्व कही हुई कलारूप गति से गुणकर उसमें साठ का भाग दे । जो कुछ अंशादि लब्ध हों उसमें बीती हुई संक्रान्ति की राशि जोड़ दे तो तात्कालिक सूर्य स्पष्ट होता है । उदा- हरण—यथा संवत् १९४९ माघ कृष्ण दशमी बृहस्पतिवार को १२ दण्ड ६ पल पर मकर की संक्रान्ति लगी और माघ कृष्ण त्रयोदशी रविवार को २५ दण्ड ६ पल पर सूर्य स्पष्ट करना है । इसलिए संक्रान्तिकाल से इष्टकाल तक बीते हुए ३ दिन १३ दण्ड ०० पल को पूर्व कही हुई मकर संक्रान्ति की ६० कलारूप गति से गुणकर उसमें ६० का भाग देने से ३
१५४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अंश १३ कला ०० विकला लब्ध हुए । इनमें बीती हुई धनु संक्रान्ति की नवीं राशि जोड़ी गई, तब ९ । ३ । १३ । ०० हुए । यही तात्कालिक स्पष्ट सूर्य हुआ ॥ १०३ ॥ लग्नघटिकासाधनार्थ लग्नभुक्तांशसाधन तनोरिष्टांशकात्पूर्वं नवांशा दशसंगुणाः । रामाप्ता लब्धमंशाद्यं तनोर्वर्गादिसाधने ॥ १०४ ॥ अन्वयः-तनोः इष्टांशकात् पूर्वं नवांशाः दशसंगुणाः रामाप्ताः लब्धं वर्गादिसाधने तनोः अंशाद्यं (स्यात्) ॥ १०४ ॥ विवाहादि शुभ कार्य के लिए जिस बली शुभ लग्न का जो दोषरहित विहित नवांश विचारा गया हो उससे पूर्व जितने नवांश उस लग्न के हों उनकी संख्या को दश से गुणाकर तीन का भाग देने से जो कुछ लब्ध हों वही उस लग्न के तात्कालिक भुक्त अंश-कला आदि होंगे और वही उस लग्न के गृह होरा द्रेष्काणादि पूर्वोक्त षड्वर्गसाधन में काम आते हैं । उदाहरण-तथा मिथुन लग्न का सातवाँ नवांश शुद्ध विचारा गया तो उससे पूर्व नवांशों की छः संख्या को दश से गुणा तो साठ हुए । इनमें तीन का भाग देने से २० । ०० लब्ध हुए । यही मिथुन लग्न के भुक्तांशादि होंगे ॥ १०४ ॥ लग्न और सूर्य से इष्टकाल साधन अर्काल्लिग्नात् सायनाद्भोग्यभुक्तै- र्भागैर्निघ्नात् स्वोदयात् खाग्निभक्तात् । भोग्यं भुक्तं चान्तरालोदयाढ्यं षष्ट्या भक्तं स्वेष्टनाड्यो भवेयुः ॥ १०५ ॥ अन्वयः-सायनात् अर्कात् लग्नात् भोग्यभुक्तैः भागैः निघ्नात् स्वोदयात् खाग्नि- भक्तात् भोग्यं भुक्तं (तत्) अन्तरालौदाढ्यं षष्ट्या भक्तं तदा स्वेष्टनाड्यः भवेयुः ॥ १०५ ॥ अयनांशसंयुक्त तात्कालिक सूर्य के भोग्य अंशों से और अयनांशसंयुक्त तात्कालिक लग्न के भुक्त अंशों से गुणे हुए अपने देश के मेषादि लग्नों के मान में तीस का भाग देने से लब्ध हुआ सूर्य का भोग्य अर्थात् भोग करने के लिए बाकी, और लग्न का भुक्त, अर्थात् भोग किया हुआ पलात्मक काल होता है । इन दोनों को तथा सूर्य और लग्न के मध्य लग्नों के पलात्मक प्रमाण को
विवाहप्रकरण १५५ जोड़कर उसमें साठ का भाग देने से लब्ध हुए इष्टकालिक दण्ड पल होते हैं। उदाहरण—यथा शाके १८१४ माघ कृष्ण दशमी बृहस्पतिवार को २५ दण्ड ६ पल तात्कालिक सूर्य के ९। ३। १३। ०० स्पष्ट में अयनांश जोड़ने से ९। २६। ३। ०० यह सूर्य का सायन स्पष्ट हुआ। इसके २६। ३। ०० अंशादि को ३० अंशों में घटाने पर शेष ३। ५७। ०० सूर्य के भोग्य अंशादि हुए। मकरराशि में रहने के कारण सूर्य के ३। ५७। ०० भोग्य अंशों से लखनऊ की ३०३ पलात्मक मकरोदय प्रमाण को गुणने पर ११९६। ५१। ०० पलादि हुए। इनमें ३० तीस का भाग देने से ३९। ५३ लब्ध सायन सूर्य के भोग्य पलादि हुए। ऐसे ही तात्कालिक २। २६। ४०। ०० लग्न में २२। ५० अयनांश जोड़ने से ३। १९। ३०। ०० सायन लग्न हुई। कर्कराशि होने के कारण इसके १९। ३०। ०० भुक्तांशों से लखनऊ की पलात्मक ३४३ कर्कोदय प्रमाण को गुणने से ६६८८। ३०। ०० पलादि हुए। इनमें ३० का भाग देने से २२२। ५७ लब्ध सायन लग्न के भुक्त पलादि हुए। सूर्य के ३९। ५३ भोग्य और लग्न के २२२। ५७ भुक्त पलों को तथा मकर और कर्क के मध्य की कुम्भ के २५१, मीन के २१८, मेष के २१८, वृष के २५१, मिथुन के ३०३ पलात्मक प्रमाणों को जोड़ने से १५०४ पल हुए। इनमें साठ का भाग देने से २५। ४ लब्ध इष्ट दण्ड हुए। वहाँ सूर्यादि प्रतिविकलादि छूटने के कारण इष्ट में दो पलों का भेद हुआ है ॥ १०५॥ लखनऊ का लग्नमान
| मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २१८ | २५१ | ३०३ | ३४३ | ३४७ | ३३८ | ३३८ | ३४७ | ३४३ | ३०३ | २५१ | २१८ |
| इष्टकाल बनाने की विशेष रीति | |||||||||||
| चेल्लग्नाकौ सायनावेकराशौ तद्विश्लेषघ्नोदयः खाग्निभक्तः । | |||||||||||
| स्वेष्टः कालो लग्नमूनं यदार्काद्राशौ शेषोऽर्कात्सषड्भं निशायाम् ॥ १०६॥ | |||||||||||
| अन्वयः—चेत् सायनौ लग्नाकौ एकराशौ (तदा) तद्विश्लेषघ्नोदयः खाग्निभक्तः | |||||||||||
| स्वेष्टः कालः (स्यात्), यदा लग्नं अर्कात् ऊनं (तदा) रात्रेः शेषः स्यात् तथा, निशायां | |||||||||||
| सषड्भात् अर्कात् ॥ १०६॥ |
१५६ मुहूर्त्तचिन्तामणि यदि अयनांशयुक्त लग्न और अयनांशयुक्त सूर्य दोनों एक ही राशि में हों तो दोनों के आपस में घटने पर शेष से गुणी हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो, वह सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। यदि सायन लग्न तथा सूर्य ये दोनों एक ही राशि में स्थित हों और सूर्य के अंशों से लग्न के अंश कम हों तो उन कम अंशों से गुणी हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो वह सूर्योदय से पूर्व रात्रि का बाकी काल होता है। इसको साठ में घटाने से शेष पूर्व दिन के सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। रात्रि में सूर्य की राशि में छः जोड़कर उक्त रीति करने पर इष्टकाल स्पष्ट होता है। एक राशि में स्थित सूर्य से अधिक लग्न का उदाहरण—यथा ९। २५। ६। ३६ इस लग्न में ९। १६। ५९। २६ सूर्य को घटाया तो ०। ८। ७। १० शेष रहे। इन शेष अंकों को लग्न तथा सूर्य के मकरराशि में रहने के कारण मकर की ३०३ उदय से गुण दिया, तो २४६०। ११। ३० हुए। इनमें तीस का भाग दिया तो ८२। २२। १ पलादि लब्ध हुए। सूर्योदय से लेकर यही इष्टकाल हुआ। कम लग्न का उदाहरण—यथा ९। २६। ५०। ४० सूर्य में ९। २२। ४५। ३६ लग्न को घटाया तो ०। ४। ५। ४ शेष रहे। इनको मकर की स्वदेशी ३०३ उदय से गुण दिया तो १२३५। ३५। १२ हुए। इनमें तीस का भाग दिया तो ४१। १५। १० पलादि लब्ध हुए। सूर्योदय से पूर्व इतना रात्रिशेष हुआ। इसको साठ में घटाया तो ५९। १८। ४४। ५० दण्डादि शेष रहे। यही इष्टकाल हुआ। रात्रि में इष्टकाल का उदाहरण तो पूर्व श्लोक में कहे हुए उदाहरण के सायन सूर्य में छः राशि जोड़कर उक्त क्रिया करने से हो जायगा, इसलिये यहाँ नहीं कहा ॥ १०६ ॥ शुभ कार्यों में अवश्य त्यागने योग्य दोष उत्पातान्सह पातदग्धतिथिविद्धृष्टांश्च योगांस्तथा चन्द्रेज्योशनसामथास्तमयनं तिथ्याः क्षयर्द्धी तथा। गण्डान्तं च सविष्टिसंक्रमदिनं तन्वंशपास्तं तथा तन्वंशेशविधूनथाष्टरिपुगान्पापस्य वर्गांस्तथा ॥ १०७ ॥ सेन्दूक्रूरखगोदयांशमुदयास्ताशुद्धिचण्डायुधान् खार्जूरं दशयोगयोगसहितं जामित्रलत्ताव्यधम्।
विवाहप्रकरण १५७ बाणोपग्रहपापकर्त्तरि तथा तिथ्यर्क्षयोगोत्थितं दुष्टं योगमथार्द्धयामकुलिकाद्यान्वारदोषानपि ॥ १०८ ॥ क्रूराक्रान्तविमुक्तभं ग्रहणभं यत्क्रूरगन्तव्यभं त्रेधोत्पातहतं च केतुहतभं सन्ध्योदितं भं तथा । तद्वच्च ग्रहभिन्नयुद्धगतभं सर्वानिमान्संत्यजे- दुद्वाहे शुभकर्मसु ग्रहकृतान् लग्नस्य दोषानपि ॥ १०९ ॥ अन्वय:—पातदग्धतिथिभिः सह उत्पातान्, तथा दुष्टान् योगान् अथ चन्द्रे- ज्योशनसां अस्तमयनं तथा तिथ्याः क्षयवृद्धी, च सविष्टिसंक्रमदिनं, गण्डान्तं, तथा तन्वंशपास्तं, अथ तन्वंशेशविधून् तथा अष्टरिपुगान् पापस्य वर्गान् सेन्दुक्रूरखगोदयांशं उदयास्तशुद्धिश्चण्डायुधान्, दशयोगयोगसहितं खार्जूरं जामित्रलत्ताव्यधम्, तथा बाणोप- ग्रहपापकर्त्तरि, तिथ्यर्क्षयोगोत्थितं दुष्टं योगं अथ अर्धयामकुलिकाद्यान् वारदोषान् अपि [तथा] क्रूराक्रान्तविमुक्तभं, ग्रहणभं, तथा यत् क्रूरगन्तव्यभं, त्रेधोत्पातहतं च पुनः केतुहतभं तथा सन्ध्योदितं भं च (पुनः) तद्वत् ग्रहभिन्नयुद्धगतभं, ग्रहकृतान् लग्नस्य दोषान् अपि इमान् सर्वान् उद्वाहे शुभकर्मसु सन्त्यजेत् ॥ १०७-१०६ ॥ दिग्दाह प्रसिद्ध वृक्ष या मकान आदि का अकस्मात् गिरना, पानी का बरसना, उल्कापात, बड़ी आँधी का आना, बिजली का गिरना, बिना मेघ का गरजना, भूकम्प आना, चन्द्र-सूर्य में मण्डल होना, सियारी का चिल्लाना, और भी ग्रामसम्बन्धी उत्पात तथा क्रान्तिसाम्य, दग्धातिथि, व्यतीपात, वैधृति इत्यादि दुष्टयोग, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति का अस्त, दक्षि- णायन, तिथि की हानि-वृद्धि, नक्षत्र, तिथि, लग्न के गण्डान्त, भद्रा, संक्रान्ति दिन, लग्न और नवांश के स्वामी का अस्त, लग्न से आठवें वा छठे स्थान में स्थित लग्न वा नवांश का स्वामी, लग्न में पापग्रहों के गृह, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश, चन्द्रमा वा क्रूरग्रह से युक्त लग्न वा नवांश, लग्नशुद्धि, सातवें स्थान की शुद्धि, पात और खर्जूर दोष, दशयोगों के सहित जामित्र वा लत्तादोष, वेध दोष, बाणदोष, उपग्रह- दोष, पापकर्त्तरीदोष तथा तिथि-नक्षत्र से, तिथि-वार से, नक्षत्र-वार से, वा तिथि-नक्षत्र-वार से उत्पन्न दुष्योग, अर्द्धयाम, कुलिकादि वारदोष, क्रूरग्रहयुक्त नक्षत्र, क्रूरग्रह का भोग किया नक्षत्र, जिसमें क्रूरग्रह आनेवाला हो या सूर्य-चन्द्रग्रहण हुआ हो वह नक्षत्र, जिसमें पूर्वोक्त उत्पात हुए हों या केतु का उदय हुआ हो वह नक्षत्र, सूर्य के अस्तकाल में प्रारम्भ होनेवाला, अर्थात् सूर्य के नक्षत्र से चौदहवाँ नक्षत्र, जिसमें ग्रहों का युद्ध हुआ
१५८ मुहूर्त्तचिन्तामणि हो वह नक्षत्र और लग्न के दोष इन सबका विवाहादि सम्पूर्ण शुभ कार्यों में त्याग करे ॥ १०७-१०९ ॥ कन्यादि के तेल आदि लगाने की संख्या मेषादिराशिशजवधूवरयोर्वटोश्च तैलादिलापनविधौ कथितात्र संख्या । शैला दिशः शरदिगक्षनगाद्रिबाणबाणाक्षबाणगिरयो ७।१०।५ १०। ५ । ७ । ७ । ५ । ५ । ५ । ५ । ७ विबुधैस्तु कश्चित् ॥ ११० ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ विवाहप्रकरणं समाप्त ॥ ६ ॥ अन्वयः—अत्र मेषादिराशिशजवधूवरयोः वटोः (बालकस्य) च तैलादिलापनविधौ कैश्चित् विबुधैः (क्रमेण) शैलाः दिशः शरदिगक्षनगाद्रिबाणबाणाक्षबाणगिरयः (इति) संख्या कथिता ॥ ११० ॥ मेषादि राशियों में उत्पन्न कन्या, वर और जिसका यज्ञोपवीत होनेवाला हो उसके तेल-उबटन आदि लगाने में कुछ पण्डितों ने ७।१०।५।१०।५।७।७।५। ५।५।५।७ यह संख्या कही है, अर्थात् मेष राशिवालों को विवाह और यज्ञो- पवीत दिन से पूर्व सात दिन, वृष राशिवालों को दश दिन, मिथुन राशि- वालों को पाँच दिन, कर्क राशिवालों को दश दिन, सिंह राशिवालों को पाँच दिन, कन्या राशिवालों को सात दिन, तुला राशिवालों को सात दिन, वृश्चिक राशिवालों को पाँच दिन, धनु राशिवालों को पाँच दिन, मकर राशि- वालों को पाँच दिन, कुम्भ राशिवालों को पाँच दिन, मीन राशिवालों को सात दिन तेल और उबटन लगाना चाहिए ॥ ११० ॥ वधूप्रवेशप्रकरण —:०:— समाद्रिपञ्चाङ्कदिने विवाहाद्वधूप्रवेशोऽष्टदिनान्तराले । शुभः परस्ताद्विषमाब्दमासदिनेऽक्षवर्षात्परतो यथेष्टम् ॥ १ ॥ अन्वयः—विवाहात् अष्टदिनान्तराले समाद्रिपञ्चाङ्कदिने वधूप्रवेशः शुभः स्यात्, परस्तात् [षोडशदिनेभ्यः पश्चात्] विषमाब्दमासदिने शुभः स्यात्, अथ अक्षवर्षात् परतः यथेष्टम् [यदा कदाचित् शुभदिने] वधूप्रवेशः शुभः (स्यात्) ॥ १ ॥ विवाह के दिन से सोलह दिन के भीतर सम अर्थात् दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, दशवें, बारहवें, चौदहवें तथा सातवें, पाँचवें, नवें दिन में और सोलह
वधूप्रवेशप्रकरणम् १५९ दिनों के बाद पहिले, तीसरे, पाँचवें वर्ष में, और पहिले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें, गेरहवें मास में और पाँच वर्ष के ऊपर अपनी इच्छा के अनुसार सम-विषम वर्ष मास दिन का विचार न करके अथवा हो सके तो करके भी गोचर में वर की जन्मराशि से सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति के बली रहते, दुष्ट भद्रा आदि दोषरहित काल में किया हुआ वधूप्रवेश शुभ होता है ॥ १ ॥ वधूप्रवेश का मुहूर्त्त ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले । वधूप्रवेशः सन्नष्टो रिक्तारार्के बुधे परैः ॥ २ ॥ अन्वयः—ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले वधूप्रवेशः सत्, रिक्तारार्के नेष्टः, परैः बुधे अपि नेष्टः ॥ २ ॥ रोहिणी, तीनों उत्तरा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा, मूल, मघा और स्वाती नक्षत्र में किया हुआ वधूप्रवेश शुभ होता है । चौथ, नवमी और चतुर्दशी तिथि में; रविवार और मंगलवार में तथा कुछ आचार्यों के मत से बुध दिन में भी अशुभ होता है ॥ २ ॥ विवाह के बाद प्रथम वर्ष के महीनों में स्वामी के घर में स्त्री के रहने का फल ज्येष्ठे पतिज्येष्ठमथाधिके पतिं हन्त्यादिमे भर्तृगृहे वधूः शुचौ । श्वश्रूं सहस्ये श्वशुरं क्षये तनुं तातं मधौ तातगृहे विवाहतः ॥ ३ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ वधूप्रवेशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥ अन्वयः—विवाहतः आदिमे ज्येष्ठे भर्तृगृहे स्थिता वधूः पतिज्येष्ठं, अथ आदिमे अधिके [अधिमासे] पतिं तथा आदिमे शुचौ श्वश्रूं आदिमे सहस्ये श्वशुरं, आदिमे क्षये [क्षयमासे] तनुं हन्ति । तथा आदिमे मधौ तातगृहे स्थिता वधूः तातं हन्ति ॥ ३ ॥ विवाह होने के बाद पहिले ज्येष्ठ में यदि स्वामी के घर में स्त्री रहे तो स्वामी के ज्येष्ठ भाई को, पहिले मलमास में स्वामी को, पहिले आषाढ़ में सासु को, पौष मास में ससुर को, पहिले क्षयमास में अपनी देह को और पिता के घर में यदि पहिले चैत्र में रहे तो पिता को नष्ट करती है, अर्थात् विवाह के बाद पहिले ज्येष्ठ, मलमास, आषाढ़, पूस और क्षयमास में स्त्रियों को
१६० मुहूर्तचिन्तामणि पिता के घर में और पहिले चैत्र मास में पति के घर में रहना चाहिए। जिन महीनों में जहाँ रहने से जिन लोगों को दोष कहा है, उस स्त्री के यदि वे लोग जीवित न हों तो उन महीनों में वहाँ रहने का कोई दोष नहीं है ॥ ३ ॥
द्विरागमनप्रकरण -:०:- चरेदथौजहायने घटालिमेषगे रवौ रवीज्यशुद्धियोगतः शुभग्रहस्य वासरे । नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके द्विरागमं लघुध्रुवे चरेऽस्रपे मृदूडुभिः ॥ १ ॥ अन्वयः—अथ (वधूप्रवेशानन्तरं) ओजहायने घटालिमेषगे रवौ, रवीज्यशुद्धि- योगतः शुभग्रहस्य वासरे नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके लघुध्रुवे चरे अस्रपे मृदूडुभिः द्विरागमं चरेत् ॥ १ ॥ विवाह के दिन से पहिले, तीसरे, पाँचवें आदि विषम वर्षों में तथा कुम्भ, वृश्चिक, मेष इन राशियों में से किसी में सूर्य के रहते; सूर्य और बृहस्पति के शुद्ध रहते; सोमवार, बुध, बृहस्पति या शुक्रवार में; मिथुन, मीन, कन्या, तुला वा वृष लग्न में तथा अश्विनी, पुष्य, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, मूल, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती नक्षत्र में स्त्री दूसरी बार अपने स्वामी के घर में जाय तो शुभ होता है ॥ १ ॥ सम्मुख और दक्षिण शुक्र का दोष दैत्येज्यो ह्यभिमुखदक्षिणे यदि स्याद्गच्छेयुर्नहि शिशुगर्भिणीनवोढाः । बालश्चेद्व्रजति विपद्यते नवोढा चेद्वन्ध्या भवति च गर्भिणी त्वगर्भा ॥ २ ॥ अन्वयः—यदि दैत्येज्यः अभिमुखदक्षिणे स्यात् (तदा) शिशुगर्भिणीनवोढाः न गच्छेयुः । हि चेत् [यदि] बालः व्रजति तदा विपद्यते, नवोढा व्रजति तदा वन्ध्या भवति, च गर्भिणी अगर्भा भवति ॥ २ ॥ यदि शुक्र सामने या दाहिनी ओर पडते हों तो बालकयुक्त, गर्भवती और नववधू स्त्रियाँ दूसरी बार अपने पति के घर को न जायें; क्योंकि सम्मुख या दक्षिण शुक्र के रहते स्वामी के घर जानेवाली बालकयुक्त स्त्री का बालक मर जाता है, गर्भवती का गर्भ नष्ट हो जाता है और नववधू स्त्री का यदि द्विरागमन होता है तो वह वन्ध्या होती है ॥ २ ॥
द्विरागमनप्रकरण १६१ शुक्रदोष का परिहार नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विबुधतीर्थयात्रयोः । नृपपीडने नववधूप्रवेशने प्रतिभार्गवो भवति दोषकृन्नहि ॥ ३ ॥ पित्र्ये गृहे चेत्कुचपुष्पसंभवः स्त्रीणां न दोषः प्रतिशुक्रसंभवः । भृग्वंगिरोवत्सवशिष्ठकश्यपात्रीणां भरद्वाजमुनेः कुले तथा ॥ ४ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ द्विरागमनप्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥ अन्वयः—नगरप्रवेशविषयाद्युपद्रवे करपीडने विबुधतीर्थयात्रयोः नृपपीडने नववधू- प्रवेशने प्रतिभार्गवः दोषकृत् नहि भवति । चेत् पित्र्ये गृहे स्त्रीणां कुचपुष्पसम्भवः तदा प्रतिशुक्रसम्भवः दोषः न भवेत् । तथा भृग्वङ्गिरोवत्सवसिष्ठकश्यपात्रीणां तथा भरद्वाजमुनेः कुले प्रतिशुक्रसम्भवः दोषः न (स्यात्) ॥ ३-४ ॥ नगर को जाने में, देश या गाँव में किसी प्रकार का उपद्रव होने पर, देश या गाँव छोड़ने में तथा विवाह, देवयात्रा, तीर्थयात्रा, राजदण्ड और वधूप्रवेश में सम्मुख शुक्र दोषकारक नहीं होता । पिता के ही घर में जिनके पूरे स्तन तथा रजोदर्शन हुआ हो, अर्थात् जवानी हो गई हों, उन स्त्रियों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता । ऐसे ही भृगु, अंगिरा, वत्स, वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि और भरद्वाज मुनि के कुल में सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता ॥ ३-४ ॥ अग्न्याधानप्रकरण —:०:— स्यादाग्निहोत्रविधिरुत्तरगे दिनेशे मिश्रध्रुवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये । रिक्तासु नो शशिकुजेज्यभृगौ न नीचे नास्तंगते न विजिते न च शत्रुगेहे ॥ १ ॥ अन्वयः—उत्तरगे दिनेशे, मिश्रध्रुवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये, अग्निहोत्रविधिः (शुभः) स्यात् । रिक्तासु नो, शशिकुजेज्यभृगौ नीचे न, अस्तं गते न, विजिते न, च शत्रुगृहे स्थिते न (शस्तः) ॥ १ ॥ उत्तरायण सूर्य के रहते कृत्तिका, विशाखा, रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मृगशिरा, ज्येष्ठा व पुष्य नक्षत्र में अग्न्याधान हो तो शुभ होता है । चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि में, और चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और शुक्र अपने-अपने नीच स्थान में हों, अस्त हों, अन्य ग्रहों से पराजित हुए हों, अथवा शत्रु के स्थान में हों तो अग्न्याधान नहीं करना चाहिए ॥ १ ॥
१६२ मुहूर्तचिन्तामणि लग्नशुद्धि नो कर्कनक्रझषकुम्भनवांशलगने नोऽब्जे तनौ रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे । केन्द्रक्षषट्त्रिभवगे च परैस्त्रिलाभषट्खस्थितैर्निधनशुद्धियुते विलग्ने ॥ २ ॥ अन्वयः—कर्कनक्रझषकुम्भनवांशलगने (अग्निहोत्रविधिः) नो, अब्जे तनौ नो शुभः । रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे केन्द्रक्षषट्त्रिभवगे परैः (बुधशुक्रशनैश्चरैः) तिलाभषट्खस्थितैः निधनशुद्धियुते विलग्ने [सति अग्निहोत्रविधिः शुभः स्यात्] ॥ २ ॥ कर्क, मकर, मीन, कुम्भ लग्न में और इनके नवांशों में तथा लग्न में चन्द्रमा के (किसी के मत से शुक्र के भी) रहते अग्न्याधान नहीं करना चाहिए। पाँचवें, नवें, लग्न, चौथे, सातवें, दशवें और छठे स्थान में सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति और मंगल हों, तीसरे, गेरहवें, छठे और दशवें स्थान में बुध, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु हों, जन्मलग्न से आठवीं को छोड़ अन्य लग्न में, अथवा जिससे आठवें स्थान में कोई ग्रह हो उस लग्न में अग्न्याधान शुभ होता है ॥ २ ॥ अग्न्याधानकालिक लग्नदश से यज्ञकारक योग वापे जीवे तनुस्थे वा मेषे भौमेऽम्बरे द्युने । षट्त्र्यायेऽब्जे रवौ वा स्याज्जाताग्निर्यजति ध्रुवम् ॥ ३ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणावग्न्याधानप्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥ अन्वयः—जीवे चापे तनुस्थे, वा भौमे मेषे (तनुस्थे), अम्बरे द्युने, वा अब्जे [चन्द्रे] षट् त्र्याये, वा रवौ षट्त्र्याये तदा जाताग्निः ध्रुवं यजति ॥ ३ ॥ धनु राशि में स्थित बृहस्पति लग्न में हो, अथवा मेष राशि में स्थित मंगल लग्न में हो, अथवा मंगल लग्न से सातवें या दशवें स्थान में हो, अथवा चन्द्रमा लग्न से तीसरे, छठे या गेरहवें स्थान में हो अथवा सूर्य लग्न से तीसरे, छठे या गेरहवें स्थान में हो तो अग्न्याधान करनेवाला निश्चय करके ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करता है ॥ ३ ॥ ——— राजाभिषेकप्रकरण —:०:— राजाभिषेकः शुभ उत्तरायणे गुर्विन्दुशुक्रैरूदितैर्बलान्वितैः । भौमार्कलग्रेशदशेशजन्मपैर्नो चैत्ररिक्तारनिशामलिम्लुचे ॥ १ ॥
राजाभिषेकप्रकरण १६३ अन्वयः—उत्तरायणे गुर्विन्दुशुक्रैः उदितैः, भौमार्क लग्नेशदशेशजन्मपैः बलान्वितैः राजाभिषेकः शुभः (स्यात्) । चैत्ररिक्तारनिशामलिम्लुचे नो (शुभः स्यात्) ॥ १ ॥ उत्तरायण सूर्य के रहते तथा बृहस्पति, शुक्र और चन्द्रमा ग्रहों के उदित रहते और मंगल, सूर्य, तात्कालिक लग्न का स्वामी, तात्कालिक दशा का स्वामी और जन्मलग्न का स्वामी बली हो तो राजाभिषेक शुभ होता है । चैत्रमास, मलमास, चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि और मंगल दिन तथा रात्रि का समय अशुभ होता है, इसलिए इनमें राज्याभिषेक न करना चाहिए ॥ १ ॥ नक्षत्र तथा लग्नशुद्धि शाक्रश्रवः क्षिप्रमृदुध्रुवोडुभिः शीर्षोदये वोपचये शुभे तनौ । पापैस्त्रिषष्ठायगतैः शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थितैः ॥ २ ॥ अन्वयः—शाक्रश्रवः क्षिप्रमृदुध्रुवोडुभिः शीर्षोदये वा उपचये शुभे तनौ, पापै- स्त्रिषष्ठायगतैः, शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थितैः (राजाभिषेकः शुभः स्यात्) ॥२॥ ज्येष्ठा, श्रवण, हस्त, अश्विनी, पुष्य, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, रोहिणी, तीनों उत्तरा, इन नक्षत्रों में; मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक वा कुम्भ लग्न में रहते अथवा जन्मलग्न वा जन्मराशि से तीसरी, छठी, गेरहवीं लग्न में और लग्न से तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रहों के रहते तथा लग्न, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें गेरहवें, दूसरे, तीसरे स्थान में शुभग्रहों के रहते राजाभिषेक शुभ होता है ॥ २ ॥ राजाभिषेक काल में ग्रहस्थित फल पापैस्तनौ रुङ्निधने मृतिः सुते पुत्रार्तिरर्थव्ययगैर्दरिद्रता । स्यात् खेडलसो भ्रष्टपदो द्युनाम्बुगैः सर्वं शुभं केन्द्रगतैः शुभग्रहैः ॥ ३ ॥ अन्वयः—पापैः तनौ रुग्, निधने पापैः मृतिः, सुते पापैः पुत्रार्तिः, अर्थव्ययगैः पापैः दरिद्रता, खे पापैः अलसः, द्युनाम्बुगैः पापैः भ्रष्टपदः स्यात्, केन्द्रगतैः शुभग्रहैः सर्वं शुभम् स्यात् ॥ ३ ॥ पापग्रह लग्न में हो तो रोग, आठवें स्थान में हो तो मृत्यु, पाँचवें स्थान में हो तो पुत्र-क्लेश, दूसरे या बारहवें स्थान में हो तो निर्धनता दशवें स्थान में हो तो निरुद्योग, सातवें या चौथे स्थान में हो तो राज्यच्युत और पूर्ण चन्द्रमा यदि लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में स्थित हो तो
१६४ मुहूर्तचिन्तामणि राजा का मरण होता है। किन्तु यदि शुभग्रह केन्द्र में स्थित हो तो सब शुभ हो जाता है ॥ ३ ॥ सम्पत्ति तथा पृथ्वीस्थिति ये दो योग गुर्लग्नकोणे कुजोऽरौ सितः खे स राजा सदा मोदते राजलक्ष्म्या । तृतीयायगौ सौरिसूर्यौ खबन्ध्वोगु॑रुश्चेद्धरित्री स्थिरा स्यान्नृपस्य ॥ ४ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ राजाभिषेकप्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥ अन्वयः-[यस्य राजाभिषेकसमये] गुरुः लग्नकोणे, कुजः अरौ, सितः खे स राजा सदा राजलक्ष्म्या मोदते चेत् यदि सौरिसूर्यौ तृतीयायगौ, गुरुः खबन्ध्वोः तदा नृपस्य धरित्री स्थिरा स्यात् ॥ ४ ॥ जिस राजा के अभिषेककाल में बृहस्पति लग्न में या नवें, पाँचवें स्थान में, मंगल लग्न से छठे और शुक्र दशवें स्थान में स्थित हो वह राजा सदा राजलक्ष्मीयुक्त होकर आनन्द करता है। शनैश्चर लग्न से तीसरे, सूर्य गेरहवें और बृहस्पति चौथे या दशवें स्थान में स्थित हो तो उस राजा का राज्य सदा स्थिर रहता है ॥ ४ ॥
यात्राप्रकरण ---------:०:--------- यात्रायां प्रविदितजन्मनां नृपाणां दातव्यं दिवसमबुद्धजन्मनां च । प्रश्नाद्यैरुदयनिमित्तमूलभूतैर्विज्ञाते ह्यशुभशुभे बुधः प्रदद्यात् ॥ १ ॥ अन्वयः-प्रविदितजन्मनां नृपाणां यात्रायां दिवसं दातव्यम्। अबुद्धजन्मनां नृपाणां च प्रश्नाद्यैः उदयनिमित्तमूलभूतैः अशुभशुभे विज्ञाते बुधः यात्रायां दिवसं प्रदद्यात् ॥ १ ॥ किसी कार्य की सिद्धि के लिए अन्य देशादि में जाने का नाम यात्रा है। वह कार्यभेद से दो प्रकार की होती है। एक वह जो कि आगे कहे हुए योग, लग्न और जन्मकुण्डली में राजयोग, शुभलग्न के रहते होती है, यथा समरयात्रा । और दूसरी वह जो कि साधारण पंचांगादि की शुद्धि रहते होती है। यथा द्रव्यादि के कमाने या तीर्थादि करने के लिए साधारण यात्रा। इन दोनों के विशेष विचार करने की इच्छा से पहिले उसके अधिकारी को कहते हैं।