मुकुन्दमाला स्तोत्रम् (कुलशेखर आलवार - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Mukundamala Stotram of Kulasekhara Alwar with Commentary
कुलशेखर आलवार (राजा कुलशेखर) द्वारा
५८ मुकुन्दमाल स्वामि : निजमु. नी वे सरस्सुनन्दु मुनुगबोवुचुन्नावु? इत्लु महोतापमुचे तपिम्पबडुचुण्डु नीवु नायो द्दकु वच्चि तरलिपोक आलस्यमु चेयुचुन्नावु. कुल : स्वामी! नेनु मुनुग दलचिन स्थलमु नीवे. हरियनु सरस्सुन मुनिगेदनु. स्वामि : सरस्सुनन्दु तामर लुण्डवा? नायं दे तामर लुन्नवि? कुल : नी कर चरणमु लनुनविये सरोजमुलु. स्वामि : नीटियन्दु चेपलुण्डवा? कुल : कान्तिगल नी कन्नुले आ चेपलु. स्वामि : कोलनिलो मुनिगिनवानिकि श्रम परिहार मगुनु. नीकु नावलन ए तापमु तीरुनु? कुल : इतर जलमुलन्दु स्नानमु चेयुटचेत तत्काल तापहर मगुनु. श्रममुषि=ई सरस्सुनन्दु ओक्क पर्य़ायमु मुनिगिननु सकलसांसारिक दुःखमु अनुनट्टि तापमु नटुमाय मगुनु. स्वामि : अल लुण्डवलदा? कुल : साधारणमयिन सरस्सुलकु परिमाणमुण्डुनु. श्वासनु बन्धिञ्चि लोपल प्रवेशिञ्चुनट्लैन दानि लोतुनु कनुगोन नगुनु. हरिसरस्सुयोक्क लोतुकु मुगिम्पु तेलियदु. तमकु भगवन्तुनि लोतु तेलि यदनि वेदमूले चेप्पुचुन्नवि. वेदपुरुषुडु भग वन्मार्गमुनु वेदकुचुण्डियु तेलिसिकोनलेदु. वानि मार्गमु अगाधमु. गट्टुतेलियदु. मन वल्लकादनि निलुववलयुनु गानि दानिकि मुगिम्पुलेदु. गरुडुडु आकसमुन बोयि मरल तिरिगिवच्चेनेनि मीद निंकनु
२. द्वितीय भाग: संसार-वैराग्य, चरण-कमल अनुराग एवं आत्म-निवेदन (श्लोक १६-३०)
मुकुन्दमाल ५९ आकाशमु लेदनि अनुकोननगुना? पक्षुलु तम तम योग्यता कोलदि येगुर गलवु. इट्टि अगाध मयिन हरिसरस्सुन मुनिगि स्नानमाचरिञ्चेदनु. स्वामि : सरस्सुन जलमुण्डवलदा? कुल : वेदमुलन्दु निरूपिम्पबडिन नी कल्याणगुणमुलनेडु तेरोजल मुन्नदि. दानिनि त्रागेदनु. अटुलु त्रावि आध्यात्मिकाधिभौति काधिदैविकमु लनु तापत्रयमुनु बासेदनु. प्रसादे सर्वदुःखानां हानि रस्योपजायते, प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति. -- गीत. २.६५ अनुनत्लु आ जलमुनु त्राविन पिम्मट संसारमुनु विडिचि नित्यमुक्तुलोतोड गूडि यानन्दिम्पवलयुनु. स्वामि : अटु लयिन मुनिगि त्रागितिवा? तापमु तीरेना? कुल : आहा! मुनिगितिनि. तापमु तीरिनदि. स्वामि : अटुलयिन लेचिपोम्मु. कुल : श्रम परिहारमैनगदा लेचिपोवुटु? (अनगा तनिवि तीऱले दनि भावमु). 10 सरसिजनयने सशङ्खचक्रे मुरभिदि मा विरम स्वचित्त रन्तुम्, सुखतर मपरं न जातु जाने हरिचरणस्मरणामृतेन तुल्यम्.
60 ముకుందమాల స్వచిత్త = ఓమనసా, సరసిజనయనే = కమలమునుబోలిన కన్నులు గల వాదును, సశంఖచక్రే = శంఖచక్రములతో గూడినవాడును అగు, ముర భిది = మురాంతకుడయిన శ్రీమహావిష్ణువునందు, రంతుం = విహరించు టకు, మా విరమ = వెనుదీయకుము, హరి = విష్ణువుయొక్క, స్మరణ = సంకీ ర్తనమనెడు, అమృతేన = అమృతముతో, తుల్యం = సమానమయిన, సుఖ తరం = మిక్కిలియానందమును గలుగజేయునట్టి, అపరం = మఱియొక వస్తు వును, జాతు = ఒకప్పుడును, న జానే = గుర్తెఱుగను. ఓ మనసా! పద్మములవంటి కన్నులుగలవాడును, శంఖచక్రములు గలవాడును నగు మురహరుని యందు రమించుటకు వెనుదీయకుము. హరిచరణస్మరణమనెడి అమృతముతో సమానమైన మిక్కిలి యానందమును గలుగుజేయు మఱియొక వస్తువును ఒక కాలమందును ఎఱుగను. అంతిమస్మరణ కలుగుటకుగాను సదా తలచుచుండు మని భగవం తుడు కులశేఖరుల నాజ్ఞాపింపగా, వారు 8వశ్లోకమున “చింతయామి హరిమేవ సంతతమ్” = హరినే సదా తలచెదనని చెప్పియుండిరి. ధ్యానము మనసుచేత కావలసిన కార్యముగాని శరీరముతో చేయున దిగాదు. తత్రైకాగ్రం మనః కృత్వా యతచిత్తేంద్రియక్రియః, ఉపవిశ్యాసనే యుంజ్యాద్ యోగ మాత్మవిశుద్ధయే. -- గీత. 6.12 సంకల్పప్రభవాన్ కామాన్ త్యక్త్వా సర్వానశేషతః, మనసైవేంద్రియగ్రామం వినియమ్య సమంతతః. -- గీత. 6.24 శనై శ్శనై రుపరమే ద్బుద్ధ్యా ధృతిగృహీతయా, ఆత్మసంస్థం మనః కృత్వా న కించిదపి చింతయేత్. -- గీత. 6.25
अन्न श्लोकमुलन्दु संचरिञ्चु मनसुनु वशपरचुकोनि इतर मुनु चिन्तिम्प रादु. संकल्पजन्यविषयमुल नन्निंटिनि निश्शेषमुग मनसु चेत वदलि इन्द्रिय समूहमुनु नलुप्रक्कलनण्डि शब्दादिवि षयमुलनुण्डि मनसुचेत निवर्तिम्पजेसि मेल्लमेल्लग विवेकयुक्तमयिन बुद्धिचेत आत्मकण्टे वेरु विषयमुल नुण्डि विरमिञ्चि मनस्सुनु आत्मयन्दु निलिपि पिम्मट मरिदेनिनि चिन्तिम्पकुण्डवलयुननि चेप्प बडिनदि. स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः, भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्. -- गीत. 4.3 नीवु ना भक्तुडवु, सखुडवु अनि श्रीकृष्णमूर्ति अर्जुनुनितो चेप्पेनु. अट्टि भगवत्संबन्धमुगल अर्जुनुडु-- चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्, तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्. -- गीत. 6.34 "कृष्णा! मनसु चंचलमैनदि. बलात्कारमुग हरिंचुनट्टिदि. अधिकबलमु गलदि. कनक दानिनि त्रिप्पुट गालिनि त्रिप्पुटवले असाध्य" मनि चेप्पेनु. श्रीकृष्ण भगवानु डैननु मनसु साधारण मयिनदनि चेप्पेना? असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्, अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते. -- गीत. 6.35 महाबाहू! अंदुकु संदेहमु लेदनिचेप्पेनु. इट्टि मनसुतो सारिने सदा तलचुटकु वीलगुना? कुलशेखरुलु तामु "चिंतयामि
62 ముకుందమాల హరిమేవ సంతతమ్” అని చెప్పినది పొరపాటని తలచిరి. అట్లు తలచి మన సుతో జరుగవలసిన కార్యముగాన దానిని వేడుకొనుట కర్తవ్యమని యెంచి ఇట్లు ప్రార్థించిరి. కులశేఖరులు: ఓ మనసా! స్వామితో చెప్పితిని. నా మానమును కాపాడుము. నీవు పలుచోట్ల తిరుగుచుంటివేని నాకు గత్యంతరము లేదు. ఉద్ధరేదాత్మనాత్మానం నాత్మాన మవసాదయేత్, ఆత్మైవ హ్యాత్మనో బంధు రాత్మైవ రిపు రాత్మనః. -- గీత. 6.5 అనునట్లు నీవు నాకు బంధువుగ నున్నావు. న రూప మస్యేహ తథోపలభ్యతే నాంతో న చాదిర్న చ సంప్రతిష్ఠా, అశ్వత్థమేనం సువిరూఢమూల మసంగశస్త్రేణ దృఢేన ఛిత్వా. -- గీత. 15.3 శ్రోత్రం చక్షు స్పర్శనం చ రసనం ఘ్రాణమేవ చ, అధిష్ఠాయ మనశ్చాయం విషయా నుపసేవతే. -- గీత. 15.9 అనునట్లు నీవు నేను పోవు స్థలము లన్నింటికిని వచ్చు బంధువుగ నున్నావు. (అనగా నే నే జన్మ మెత్తినను నీవును వచ్చుచుందువు. నిన్ను నమ్మియే 'చింతయామి' అంటిని. నిన్ను భగవంతుని యొద్ద విడిచి పెట్టెదను. నీవచ్చటనే నిల్చి యుండుము). మనస్సు : నీవు చెప్పునట్లు వర్తించుటకు చూచెదను. నీవు విడిచిన చోటు నాకు సుఖముగ నుండెనేని అందే నిలిచెదను. లేని పక్షమున మఱియొక చోటి కేగెదను.
मुकुन्दमाला ६३ कुल : मनसा! अटु लनकुमु. नीकु सुखमु तेलियदु. रुचि तेलियदु. अन्दुचेत परुगेत्तजूचुचुन्नावु. नेनु निन्नु निर्बन्धिञ्चि कूर्चुण्डबेट्टेदनु; कदलकुण्डुमु. ओक चिन्न उद्योगस्थुडु गोप्प युद्योगमुनु गोरि यजमा नुनि दय सम्पादिञ्चुटकै कౙ్జिकाय लनु भक्ष्यमुलनु यजमानुनि किच्चेनु. अत डेन्नडु वाटिनि भक्षिञ्चिनवाडु कानन्दुन दानि कोननु कोरिकि चूचि उप्पु कारमु तीपि मोदलगु ने रसमुनु लेनन्दुन कोपगिञ्चुकोनि तन का तिनुबण्डमु लिच्चिनवानि नुद्योगमु नुण्डि तोलगिञ्चेनु. आ तिनुबण्डमु चूचुटकु मात्रमु अन्दमुग नुण्डि नन्दुन दानि नेत्ति बीरुवायम् दुञ्चियुण्डि रेण्डु मूडु दिनमुलु गडुवगने दानिलोपल ए मुन्नदो चूत मनि विप्पि लोपल पूर्णमुण्डुटनु जूचि, कोन्त नोट वेसि कोनि, दानि रुचिकि सन्तोषिञ्चि दानि निच्चिनवानिगति नधोगति पालुचेसि नन्दुलकै चिन्तिञ्चि वानिनि पिलिपिञ्चि मुनुपटिकण्टेनु गोप्प युद्योग मिप्पिञ्चि मन्निञ्चेनु.
वेदमु योक्क पैभागमुनु कोरिकिन मनकु रुचितेलियदु. नार दादुलु लोपल प्रवेशिञ्चि रुचिचूचिनवारु. वारिके आ रुचि तेलियुनु.
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी, यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः. -- गीत. २.६९
पैश्लोकमट्लु एल्लवारु प्रेमिञ्चु विषयमुलु ब्रह्मज्ञानिकि पट्टवु. आ विषयमु लतनिकि रात्रि. इतरुलकु पट्टनि आत्मविषय मतनिकि पट्टुनु. अदि यतनिकि पगलु.
64 मुकुन्दमाल (मनसा! एमि चेयुटकै वेडलिपोवुचुन्नावु? सुखमु लेनि तावुल संचरिंचेदवु. सुखमुंडु चोट निलुववु. उपनिषत्तु लंदु जेप्पबडिन भगवत्कल्याणगुणमु लनेडु तेनेनु पानमु चेयरादा? निन्नु ईड्चि यीड्चि तेवलसिन ట్లున్నदि (त्लुन्नदि). निन्नु बागुग कूर्चुंड बेट्टिननु नीवु मऱियु परुगेत्ति पोवुचुन्नावु. अट्लुपोयिननु सरियैन स्थलमुनकु पोयितिवा? परधन परदार परगृहमुलनु अपहरिंचु विषयमुन जोच्चेदवु. ने नुंचिन स्थलमुनं दुंडि यनुभविंचि चूचितिवेनि नीकु रुचि तेलियुनु. नीवु पोरानिचोटुलकु बोयिननु नी का वस्तुवुलु लभिंचेना? नी गति परितापकरमुग नुन्नदि. तुदकु नीवु चेडि नन्नुनु चेऱचेदवु. नीवु पदिलमुग नुंडुनेड मन मिरुवुरमुनु सुखपडवच्चुनु गदा अनि योक goप्प (गोप्प) योगीश्वरडु मनसुनु गूर्चि चेप्पेनु.) आ या कारणमुलचेत मनसा! स्वामिनि अनुभविंचुटनु मान कुमु. विडिचिपोक निलुवुमु. मनस्सु : अट्लैन नीवु चेप्पु स्थलमुलो सुखमु गलदा? अट्लु निजमुग सुखमुंडु पक्षमुन ने नक्कडे निवसिंचेदनु. कुल : मनसा! आ शृंगार मेमनि वर्णिंतुनु. सर्वेन्द्रिय मुललो नयनमु प्रधानमयिनदि कदा! आ सर्वेश्व रुनि योक्क कन्नुलु तामरपुष्पमुलवले अंदमुग नुन्नवि. मनस्सु : ओहो! अंत शृंगारमा? अटुलयिन तृप्तिपोंदि तिनि. मऱियोक संगति गलदु. ने नचट वसिंचु नपुडु दुष्टमुलैन इन्द्रियमुलु वच्चि न न्नीड्चुको निपोवुनु. नेनु वानिवेंट बोदुनु. वानिनि शिक्षिंचि दूरमुग तऱिमि नन्नु कापाडुकोनु पक्षमुन नेनु अच्छटने युंदुनु. लेकुन्न निन्द्रियादुलतोड पोवु
ముకుందమాల 65 దును. నీవు చెప్పెడు స్థలము నాకు రక్షకమైన దేనా? కేవలము అందము మాత్రమే యుండి ప్రయోజనమేమి? కుల : మనసా! కేవలసౌందర్యవిగ్రహుడై యుండిన నే నట్లు చెప్పెదునా? అతడు శంఖచక్రములను ధరించియు న్నాడు. అతని చక్రము లోకమునే కాల్చును. అతని శంఖధ్వనిని వినిన యెడల పదునాల్గులోకములు భయ పడును. దుష్టులను పలాయితుల గావించుటకు అతని యొద్ద శంఖచక్రము లున్నవి. మనస్సు : శంఖచక్రము లున్నవని చెప్పుచున్నావు. చిత్రమున లిఖింప బడిన స్వామికి గూడ శంఖచక్రము లున్నవి. వానివలన ప్రయోజనమేమి? నీవు చెప్పు ఆయుధములు చిత్రలిఖిత మైన వానియట్లు పనిచేయకుండునా? లేక ఉపయోగప డునా? కుల : సమయము తటస్థించినపు డవి శత్రునిరసనము గావిం చుచుండును. మనస్సు : ఎవ్వరి నైనను హతము గావించెనా? కుల : నరకాసురుని మిత్రుడును, ఐదుతలలు గలవాడును అగు మురాసురుని చంపెను. మనస్సు : ఏమో! నీ మాట విని ప్రవేశించితిని. నాకేమో సుఖము తెలియదు. సుఖము గలుగునా? కుల : మనసా! నీవు ప్రవేశించియుండు స్థలమునకంటెను మించిన స్థలముండనేరదు. మనస్సు : ఏదేని మంచివస్తువును భుజించినను లేక మంచివస్తువు యొక్క సంగతి వినినను ఇట్లే అనేక విషయములచేత కలుగు సుఖములను బోలియుండునా నీవు చెప్పుసంగతి? కుల : నీవు చెప్పనవి సుఖములని తోచినగదా వానివలెనుండు నని చెప్పగలను. సుఖమన నేను చెప్పనది యొక్కటే 6
सुखमनि नाकु तोचुचुन्नदि. नामाट विनि प्रवे शिंपुमु. पिम्मट तेलियुनु. नीवडिगिन दानिकि बदुलु दीनिवले दानिवले नुंडुननि नेनु चॆप्पुपक्षमुन नीवुनु अट्लैयुंडुननि तलंतुवु. पिम्मट नीवु हरिचरण ध्यानमु चेसितिवेनि आ यमृतमुतो नितरमुनु साटिपेद्दितिवे, अट्लु चेयवच्चुना यनि वादमु चेयुदुवु. अन्दुचेत अनुभविंचिन नीके तेलियगलदु. मनस्सु : दानि स्वारस्यमु तेलिसिनने गदा? कुल : आ सुखमु नारदादुलके तेलियुनु. नामाट मात्रमे नम्मवलदु. नारदादुल नडिगिन चॆप्पुदुरु. अन्दु अंत सुखमु लेकुन्न वारट्लु संबंधपडु दुरा? मनस्सु : दीनिवले दानिवले नुंडुना यनि ने नडुगनु. नीवे बागुग योचिंचि येदैन नॊक्क वस्तुवुनकु बोल्चि यी विधमुग नुंडुननि चॆप्पुमु. कुल : दानितो सरियगु वस्तुवुंडिन गदा चॆप्पगलनु? सर्वें द्रियमुलकुनु सुखमु गलिगिंचुनट्टि दिव्यवस्तु वदि. दानितो समानमैनदि वेटॊक्कटि लेदु. ना माट नम्मुमु. ना माट विनुमु. निन्नु नम्मिये गदा “चिंतयामि हरिमेव संतत” म्मंटिनि. 11 मा भी र्मंदमनो विचिंत्य बहुधा यामीश्चिरं यातना नामीनः प्रभवंति पापरिपव स्स्वामिननु श्रीधरः, आलस्यं व्यपनीय भक्तिसुलभं ध्यायस्व नारायणं लोकस्य व्यसनापनोदनकरो दासस्य किं न क्षमः.
ముకుందమాల 67 మందమనః=ఓ మూఢమైన మనసా, యామీః=యముని సంబంధ మైన, బహుధా=అనేకవిధములైన, యాతనాః=నరకబాధలను, చిరం=బహు కాలము, విచింత్య=తలంచి, మా భీః=భయపడవద్దు. అమీః=ఈ, పాప రిపవః=పాపములనెడు శత్రువులు, నః=మనకొఱకు, న ప్రభవంతి=సమ ర్థములుకావు. శ్రీధరః=విష్ణువు, నః=మనకు, స్వామినను=శేషిగదా, ఆలస్యం=జాగుచేయుటను, వ్యపనీయ=పోగొట్టి, భక్తిసులభం=భక్తిచేత సులు వుగా పొందదగిన, నారాయణం=విష్ణువును, ధ్యాయస్వ=ధ్యానముచే యుము. లోకస్య=ప్రపంచమందలి జనులయొక్క, వ్యసన=దుఃఖము లయొక్క అపనోదన=పోగొట్టుటను, కరః=చేయునట్టి (సః=నారాయణ మూర్తి), దాసస్య=భక్తునియొక్క (వ్యసనాపనోదకరణే=వ్యసనమును పోగొ ట్టుటయందు) న క్షమః కిం=సమర్థుడు కాడా యేమి? ఓ మందమనమా! యమయాతనలను పలుతెఱగుల భావించి భయ పడకుము. ఈ శత్రువులు మనల నేమియు చేయలేరు. శ్రీధరుడుగదా మనకు స్వామి! భక్తిసులభుడగు శ్రీమన్నారాయణుని ఆలస్యము చేయక ధ్యానింపుము. లోకములవ్యసనములను పోగొట్టువాడు దాసుని వ్యసనమును పోగొట్టలేడా? (కులశేఖరులు భగవంతునితో సంబంధపడుమనియు, అచటజేరిన సౌఖ్యము గల్గుననియు, శత్రువులు వచ్చి బాధింప రనియు మనస్సునకు బోధించగా దానికి కొంతధైర్యము గలిగెను. కాని సంపూర్ణమైన నమ్మిక కలుగలేదు. అందుచేతనే కులశేఖరుల నిట్లడిగినది.) మనస్సు : నేను మిగుల దుష్టుడను. నన్ను నమ్మిన యెడల నీవు కుంభీపాకమున కూలవలసినదే. చెడియున్న నాకు సుఖము లేదు. అంత మాత్రమే గాక భయముగను నున్నది. నన్ను నమ్మిన నీవు నరకమునకు బోవుచుండగా నేనును నీతోడ రావలసినదే గదా!
68 ముకుందమాల కులశేఖరులు: మనసా! నాకు నరకము గల్గినగదా నీవును నరకమునకు బోవలయును? నేను పోవుస్థలములందు నీవు సుఖప డుదువు. నన్ను నమ్మియుండు "వీడు చెడును; అతని తోడ నేనును చెడుదునే"యని భయపడకుము. మనస్సు : నన్ను నమ్మియుండు నీవు సుఖపడుదువని నే నెంచలేదు. కుల : కొంచెమైనను జ్ఞానములేని మనసా! ఇతడు చేర్చు స్థలమున చేరిన సుఖపడవచ్చును. ఇతడు చెప్పు నది హితవని తలంపరాదా? అనేక యమయాతనలను దలచి భయపడకుము. బాగుగ యోచింపుము. నేను ని న్నెవని యొద్దకు బొమ్మనుచున్నానో ఆ ప్రభువును గూర్చి యోచించితివేని భయముండదు. మనస్సు : నేను మీయొక్క మనసైయున్నాను. నావలననే ప్రతి కార్యమును జరుగవలసియున్నది. నాయందు మీకు ప్రీతి గలదు. మన యిరువురకు స్థలము కావలసియు న్నది. నాకు ధైర్యము చెప్పుచున్నారు మీరు. నన్ను పంపిన స్థలము మంచిదని మీరు తలచితిరి. అన్నియును సరే. నన్ను నరకమున ద్రోయుటకు వేచియున్నారే. కుల : అట్టివారెవరు? మనస్సు : కామక్రోధాదులు అనేక జన్మార్జితపాపములు అను నా శత్రువులు నరకమున ద్రోయుటకు యత్నింపుదురే. అవి యడ్డిననెట్లు? కుల : మనసా! ఆ ప్రభువు నాశ్రయించినచో పాపములు సమీపమునకు వచ్చునా? భగవచ్చరణారవిందమను పోలీ సుస్టేషను లోనికిపోయి చేరిన పిమ్మట చోరులవలన భయమేల కల్గును? కాననీవు ఈ యల్పశత్రువులను గూర్చి భయపడనవసరము లేదు. నీవు చెప్పునట్టి శక్తి
मुकुन्दमाल 69 वारि कुन्नदि गानि ओक्कटिग चेरियुण्डु मनविषय . मुन वारि शक्ति चेल्लदु. मनस्सु : आ स्वामि येवरु? कुल : श्रीधरुडु गदा मन स्वामि. मनस्सु : मीरु चेप्पिनदि सरे. मनमु योग्युलमै युण्टिमेनि भयपड नवसरमु लेदु. पापुलमै युन्नामु. वानिकि मन यन्दु वात्सल्यमुण्डिननु पाप मेल चेसितिवनि शिक्षिम्पकुण्डुना? कुल : मनसा! अचट मन तल्लि युन्नदि. आमे पुरुषका रमु चेयुनु. मनस्सु : मनमु पोयिनपुडु आमे लेकुण्डु पक्षमुन मन गति एमि? कुल. : मनसा!.. श्रीधरुडु कदा मनस्वामि. मनकु सिफारसु चेयुटकै आमेनु सदा वक्षस्थलमुन धरिञ्चिये युन्नाडु.file: युन्नाडु. అందుवलन नेनु चेप्पनट्टि स्थलमु मञ्चिदै युन्नदि. अचट जेरिनयेडल सुख मुन्नदि. भयमु लेदु. मनस्सु : नी माट विनि प्रवेशिम्प वच्चुना? कुल : ननु=ई सङ्गति नेवरि नडिगिननु जेप्पुदुरे. मनस्सु : प्रसिद्धुडगु आ प्रभुवुन केमि समर्पिम्पवलयुनु? कुल : आयन केमियु समर्पिम्पबनिलेदु. भक्तिनि समर्पिं चिन चालुनु. एवरेवरि केदेदि कावलयुनो दानिने गदा वारि कीयवलयुनु? मनस्सु : भक्ति निच्चिन कापाडुना?
70 , ముకుందమాల కుల : కాపాడును. అయినను అతని యొద్ద కేగునపుడు ఆలస్య మను దుష్టుని మాత్రము చేర్చుకొని పోకుము. వానిని త్యజింపుము. మనస్సు : కామక్రోధాదులు పాపములు మొదలగువానికి భయపడ వలయును గాని ఆలస్యమునకు భయపడనేల? కుల : ఆలస్యమును విడిచిన యెడల అన్నియును సమకూ రును. ఆలస్యమును త్యజించిన తోడనే విషయములను చక్కగ గ్రహింపవచ్చును. ఆలస్యము వీడెనేని జ్ఞానము కలుగును. దోషము లన్నియు తామే పాఱిపోవును. మనస్సు : ఆలస్యమును నెట్టివేసిన యెడల ఆయన పిలుచునా? కుల : పిలువకేమి? భక్తి సులభుడుగదా! మనస్సు : అత డెచ్చట నున్నాడో! కుల : మనసా! ఇతర ప్రభువులను దర్శింపగోరితిమేని వారుండు చోటికి పోవలసియుండును. ఇతనిని తలచితిమేని మనయొద్దకే యీతడు వచ్చును. అతని దర్శనమునకు పోనక్కరలేదు. ధ్యానింపుము. మనస్సు : మనము పోనియెడల ఆయనయే మన దగ్గరకు రావ లసియుండును. అందుచేత అతనికి మాత్రము శ్రమగలుగదా? కుల : మనసా! ఆయన మన హృదయముననే యున్నాడు. అతడు నారాయణుడు. చరాచర ప్రపంచమునం దుండు వాడు. అన్నిటికిని ఆశ్రయము, ఆధారము. అతడు సర్వాంతర్యామి. గామావిశ్య చ భూతాని ధారయా మ్యహమోజసా, పుష్ణామి చౌషధీ స్సర్వా స్సోమో భూత్వా రసాత్మకః. -- గీత. 15.13
मुकुन्दमाल 71 अनुनट्लु पुरुषोत्तमुडु. अत्लगुटचे तलचिन चोटनुन्नाडु. मनस्सु : एमि रक्षिंचुनो! संदेहमुगने युन्नदि. कुल : रामायणमुन “रक्षिता जीवलोकस्य” अनि चेप्पबडेनुगान आ स्वामि प्राणिकोटिनि रक्षिंचुवाडुग नुन्नाडु. एव्वरु पिलिचिननु वच्चुटकु सिद्धमुग नुन्नाडु. अनन्या श्चिंतयंतो मां ये जनाः पर्युपासते, तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्. -- गीत. 9.22 अन्नट्लु दासुडननि पादमुल बडिनवारिनि कापाडुटकु सिद्धमुग नुन्नाडु. वेर्ऱि मनसा! भय मेल? 12 भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां सुत दुहितृ कलत्र त्राण भारार्दितानाम्, विषमविषयतोये मज्जता मप्लवानां भवतु शरण मेको विष्णुपोतो नराणाम्. भव = संसार मनेडु, जलधि = समुद्रमुनु, गतानाम् = पोंदि नवारुनु, द्वन्द्व = चलि वेडिमि, सुखदुःखमुलु मोदलगु जंट दुःखमु लनेडु, वात = गालिचेतनु, आहतानाम् = कोट्टबडिनवारुनु, सुत = कोडुकुलु, दुहितृ = कोमार्तेलु, कलत्र = भार्यलु -- वीरि यॊक्क, त्राण = रक्षिंचुटयनु, भार = बरुवुचेत, अर्दितानाम् = पीडिं पबडिनवारुनु, विषम = कष्टमुनिच्चु, विषय = इन्द्रियसुखमु लनेडु, तोये = नीटियंदु, मज्जतां = मुनुगुवारुनु, अप्लवानाम् = तॆप्पलेनि वारुनु अगु, नराणाम् = मनुष्युलकु, विष्णुपोतः एकः = विष्ण्वनेडु तॆप्पयॊक्कटॆ, शरणम् = रक्षकमुगा, भवतु = अगुनुगाक
72 ముకుందమాల సంసార సముద్రమును పొందినవారును, ద్వంద్వము లనెడి గాలిచే కొట్టబడినవారును, పుత్రకళత్రాదుల రక్షణభారముచేత పీడింపబడిన వారును, విషమంబులగు విషయము లనెడు నుదకమునందు మునిగిన వారును, తెప్పలేనివారును అగు నరులకు విష్ణువనెడి యోడ ఒకటే శరణ మగును. 10, 11శ్లోకములలో భగవంతునిలో జేరుమని కులశేఖరులు మనసు నకు బోధించగా అదియిట్లు పలికెను. మనసు : భగవంతుని యందు లయించు పక్షమున సుఖపడవ చ్చును. సంసారసాగరమునబడి యుల్లాడుచుండు మీరు దీని నెట్లు దాటగలుగుదురు? కుల : మనసా! నీవు చెప్పినరీతిగా నేను సంసార సాగరమున దిగితిని. మరల గట్టెక్కుద మని చూడగా, శీతోష్ణము లను గాలి కొట్ట నారంభించెను. వివాహసమయమున మేళతాళములు, విందు భోజనములు, బంధుదర్శనము మొదలగు సంభ్రమములతో గూడి యుండినందున కష్టములు తెలియకుండెను. భార్య కాపురమునకు వచ్చి సంతానము కలుగగనే సుఖదుఃఖాది ద్వంద్వము లయొక్క గాలికొట్ట నారంభించి గట్టు నెక్కుటకు శ్రమ మాయెను. అప్పటికిని సహించి గట్టెక్కుటకు ప్రయ త్నించితిని గాని భార్యాపుత్రాదులను కాపాడుట యను భారమును తలయందుంచు కొనియుండుట చేతశ్రమతో నడువవలసివచ్చెను. ఆ భారమును పట్టుకొనియే యెక్కవలసియున్నది. ఆ భారముంచుకొని నిలుచు టకు వీలుపడనేరదు. మునిగిన మాత్ర మేమి? గ్రహణ కాలమందు సముద్రస్నానము చేయలేదా యనిన నే నట్టి స్థలమున మునుగలేదు. తగు స్థలమున మునిగిన యెడల భయములేదు. పూడిపోవు స్థలమున దిగితిని. విష
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యములందు మునిగితిని. విషయవాంఛ యుండరాదా యనిన భగవద్విషయములైన యెడల గట్టెక్కనగును. అనుభవించుటకు ఇంద్రియములు, అనుభవింపబడుటకు విషయములు మొదలగువానిని భగవంతుడు దయచేసి యున్నాడు. ప్రసాదే సర్వదుఃఖానాం హాని రస్యోపజాయతే, ప్రసన్నచేతసో హ్యాశు బుద్ధిః పర్యవతిష్ఠతే. -- గీత. 2.65 పైశ్లోకమునందువలె రాగద్వేషములను త్యజించి విషయముల ననుభ వింపవలయును. నే నట్టి విషయములందు మునుగలేదు. విషతుల్యములైన విషయములందు మునిగితిని. యతతో హ్యాపి కౌంతేయ పురుషస్య విపశ్చితః, ఇంద్రియాణి ప్రమాథీని హరంతి ప్రసభం మనః. -- గీత. 2.60 అనునట్లు ఇంద్రియములకు మంచివిషయమున ప్రవేశింపజేయు స్వభా వము లేదు. అవి దుర్మార్గముననే పోవును. ఈ సంసారజలధి యందు దిగునపుడు ఓడనేదియైనను సహాయము చేసికొని దిగితివా? అట్లును చేయలేదు. మనసా! ఈరీతి నల్లాడు నరులకు విష్ణువను నావయే శరణ మగును. నీవు మాత్రము భగవంతునొద్ద చేరుము. నాకు ఓడ దొరుకును. దాటించువానికేమియు నీయ పనిలేదు. మనసు నర్పించిన యెడల దానినే కూలిగ పుచ్చుకొని ఆయన దరిజేర్చును. దయచేత నతడే తెప్పయగును. సముద్రమునబడి యల్లాడుచున్నావే యని అడుగకుము. నిత్యపరిపూర్ణు డగుటచేత నతని కేమియును ఈయ పని లేదు. అట్టివాడైనను ఒక్కటి మాత్రము కోరును. శివానందలహరి యను గ్రంథమున భక్తు డొకడు పార్వతీశు నుద్దేశించి--
74 मुकुन्दमाल शिवा! नीकु कनकमु समर्पिंत मन्न नी वुंडुनदि कनकगिरि. धनमु नित्तमन्न धनपति यगु कुबेरुडु नी चरणदासुडु. नीवु कोरिनदि यित्तमन्न कल्पवृक्षमु, कामधेनुवु, चिंतामणि मीयिंटि वृक्षमु, मीयिंटियावु, मीयिंटि रायियै युन्नवि. शैत्योपचा- रमु चेयुदमन्न नेल्लवारिनि संतोषिंपजेयु चंद्रुडु नी तललो नुन्नाडु. सकलमु नॊसगुनदि नी चरणमु. इक नीकु कावलसिन देमुन्नदि? भक्तुल मनसु नायंदु चेरुना यनि कोरुचुंदुवु. नन्नु तलचुटके कदा मनसु निच्चिति ननि तलंचुचुंदुवु. अंदुचेत नीकु कावलसिनदि मन स्सोक्कटे अनि विन्नविंचेनु. आ श्लोक मिदि: करस्थे हेमाद्रौ गिरिश निकटस्थे धनपतौ गृहस्थे स्वर्भू जाम॑र सुरभि चिंतामणिगणे, शिरस्थे शीतांशौ चरणयुगलस्थेऽखिलशुभे कमर्थं दास्येऽहं भवतु भवदर्थं मम मनः. भगवद्गीत पंडरेंडव अध्यायमुलो-- ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः, अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते. तेषा महं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्, भवामि न चिरा त्पार्थ मय्यावेशित चेतसाम्. अनु 6,7 श्लोकमुलंदु तनकु मनसुनु समर्पिंचि तन्ने गतिग नम्मि युंडिन येडल अट्टिवारिनि मृत्युरूपमैन संसार सागर मुनुंडि दाटिंतु ननि भगवंतुडु चेप्पियुन्नाडु. तंड्रि व्रासि यिच्चिन पत्रमुलो वयसुवच्चिन पुत्रुडुनु चेव्राुल चेयुनट्लु भागवतमुन ब्रह्मदेवुडु “स्वामी! निन्नु नम्मिनवारु संसारसागरमुनु गोवत्सपदजलमट्लु अनगा दूड कालुंचगा पडिन
పల్లము నందలి జలమును దాటినట్లు, దాట నగునని చెప్పెను. ఇట్టి కారణములచేత మనసా! నీవు పోయి లయించుము. స్వామి గట్టెక్కించును. వానికి కావలసినది కూలి. ఆ కూలి నీవే. నిన్ను సమర్పించిన యెడల గట్టెక్కించును. ఆ స్వామియే యోడ యగును. అందుచే తనే 10, 11 శ్లోకములందు వానిని ధ్యానించవలయు నంటిని. నీవు వెనుకకు రాకుము. పాపినని భయపడకుము. 11శ్లోకమున జెప్పినట్లు అతడు స్వామిగ నున్నాడు. ప్రక్కను తల్లియున్నది. లోకముల వ్యసనము లను బోగొట్టువాడు నమ్మియుండు మనలను -- దైవీ హ్యేషా గుణమయీ మమ మాయాదురత్యయా, మామేవ యే ప్రపద్యంతే మాయా మేతాం తరంతి తే. -- గీత. 7.14 పైశ్లోకమునందు వలె కాపాడును. పైసంసారసాగరమునబడి దాని యందు గల బాధలను పొందియుండు నరులకు విష్ణువను ఓడయే శరణమగును. 13 భవజలధి మగాధం దుస్తరం నిస్తరేయం కథమహ మితి చేతో మా స్మ గాః కాతరత్వమ్, సరసిజదృశి దేవే తావకీ భక్తిరేకా నరకభిది నిషణ్ణా తారయిష్యత్యవశ్యమ్. చేతః=ఓమనసా!, అగాధం=లోతైనదిగనుకనే, దుస్తరం=దాటశక్యము గాని, భవజలధిం=సంసారమనెడు సముద్రమును, కథం=ఎట్లు, అహం=నేను, నిస్తరేయం=దాటగలను, ఇతి=అని, కాతరత్వం=పిరికితనమును, మా స్మ గాః=పొందవద్దు, సరసిజదృశి=కమలములవంటి నేత్రములుగల, దేవే=భగ వంతుడగు, నరకభిది=నరకాసురుని సంహరించిన శ్రీ కృష్ణునియందు,
76 ముకుందమాల నిష్ఠా=కూర్చుండిన, తావకీ=నీదైన, భక్తిః ఏకా=భక్తి యొక్కటే, అవశ్యం=ముఖ్యముగా (త్వామ్=నిన్ను), తారయిష్యతి=దరిజేర్చగలదు. ఓ మనసా! లోతైనదియును, దాటరానిదియు నగు సంసారసాగర మును నే నెట్లు దాటగలనని తల్లడిల్లకుము. తామరసాక్షుడును, నరకాం తకుడును అగు భగవంతునియందు (శ్రీకృష్ణదేవునియందు) నిలుపబడిన నీ భక్తి యొకటియే నిన్ను అవశ్యము ఈ సాగరమును దాటించును. మనస్సు : భగవంతునకు నన్ను సమర్పించిన పక్షమున నతడు కాపాడు నంటివి. ఆ విషయమున నాకు ధైర్యము కలుగలేదు. కులశేఖరులు: మనసా! తనయందు లయింపజేయవలయునను తలంపు తోనే భగవంతుడు నిన్ను దయచేసియున్నాడు. మనసును సాధనముగ జేసి కొనవలయుననియే భగవదభిప్రాయము. ఉద్ధరే దాత్మనాత్మానం నాత్మాన మవసాదయేత్, ఆత్మైవహ్యాత్మనో బంధు రాత్మైవ రిపురాత్మనః. -- గీత. 6.5 అనినట్లు మనసును బంధువుగ జేసికొని సుఖపడవలయునను తలంపు తోనే ని న్నతడు కరుణించెను. దయాపూర్వకముగ నిచ్చిన మనస్సుతో సుఖపడలేని నావలననే వీరు చెదిరిగదా యని స్వామి చింతించును. కాన నిన్ను సమర్పించు పక్షమున నతడు సంసారసాగరమును దాటించును. సంసారసముద్రమునబడి శ్రమపడు చుండు నేను కాపాడ బడుదును. మనస్సు : మీరు చెప్పిన దంతయు యుక్తముగనే యున్నది. మిగుల శ్రమపడు పక్షమున సముద్రమును దాటనగును. హనుమంతు డును దానిని దాటియున్నాడు. సంసారసాగరమును దాటుట మాత్రము కష్టము. నన్ను కూలిగ నిచ్చి సంసారస
मुकुन्दमाल 77 मुद्रमुनु दाटुट यनु संगति कडुविंतैनदिग उन्नदि. एंतचेप्पिननु नाकेमो नम्मकमु कलुगुकुन्नदि. कुल : मनसा! भयपडकमु. लोतैनदियुनु, दाटशक्यमु कानिदियुनु. नगु संसारसागरमु नेट्लु दातुदु ननि अधैर्यमु चेंदकुमु. मनस्सु : एट्लु भयपडकुंदुनु? एंत चेप्पिननु नाकु भयमु गने युन्नदि. कुल : भगवंतुनियंदु भक्तिमात्रमु सल्पुमु. अतनि यंदु लयंिपुमु. अतनिपादमुलनु विडिचिपेट्टि पाटिपोवलदु. अट्लु चेसितिवेनि या भक्ति संसारसागरमुनु दाटिचिये तीरुनु. मनस्सु : पदियव श्लोकमुलो चेप्पिनट्लु अतनि पादमुललो तप्पक नन्नु चेर्पवलयुननि यत्निंचुचुन्नावु. चलिंपव लदनु चुन्नावु. ना स्वभावमे चंचलमैनदि. आ भगवंतुनियं देमैन विशेषमुंदुना? कुल : तामरपुष्पमु रेकुलवलेनुंडु आ कन्नुलयोक्क अंद मुनु जूचिननु चालुने. मनस्सु : ओहो! वट्टि अंदगाडेना? अटुलैन सामान्यप्रभुवेना? कुल : कादु कादु. चराचर प्रपंचमुनकु ज्ञानाज्ञान मोक्षमु लनु लीलतो नीयगलवाडु. ब्रह्मादुलकु स्वामि. मनस्सु : अन्नियुनु सरिये. मन कतडु सहायमु चेयुना? कुल : अतडु नरकांतकुडु. अतनि शरणु पोंदिन पिम्मट पाप भीतिये युंडदु गदा! भक्ति योक्कटि बागुग नुंडिन चालुनु.