नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( १२६ ) 1 आवर्जितं मया चञ्च्वा हृदयात्तव शोणितम् । अनेन धैर्येण पुनस्त्वया हृदयमेव नः ॥ १७ ॥ तत्कस्त्वमिति श्रोतुमिच्छामि । नायकः - एवं क्षुदुपतप्तो न श्रवणयोग्यस्त्वम् । कुरुष्व तावन्मम मांसशोणितेन तृप्तिम् । शङ्खचूडः - (सहसोपसृत्य) तार्क्ष्य ! न खलु न खलु साहस- मनुष्ठेयम् । नायं नागः । परित्यजैनम् । मां भक्षय । अहं तवाहारार्थं प्रेषितोऽस्मि वासुकिना । [इत्युरो ददाति] नायकः-(शङ्खचूडं दृष्ट्वा सविषादमात्मगतम्) कष्टं ! विफलीकृतो मे मनोरथः शङ्खचूडेनागच्छता । गरुड़ः - (उभौ निरूप्य) द्वयोरपि भवतोर्वध्यचिह्नम् । कः खलु नाग इति नावगच्छामि । शङ्खचूडः- अस्थान एव भ्रान्तिः । श्लोक न०: १७, अन्वयः- मया चञ्च्वा तव हृदयात् शोणितम् (एव) आवर्जितम् । त्वया पुनः अनेन धैर्येण नः हृदयमेव (आवर्जितम्) ।
५. पञ्चम अङ्क: गरुड़-हृदय परिवर्तन, बोधिसत्त्व धर्म व नाग-जीवन रक्षा
( २२७ ) मैं ने तो अपनी चोंच से आपके हृदय से रक्त ही निकाला है ; पर आपने तो इस धैर्य से हमारा हृदय ही हर लिया है (वश में कर लिया है) । अतः मैं यह सुनना चाहता हूँ कि आप कौन हैं। नायक — इस प्रकार भूख से पीड़ित तुम (अभी) सुनने योग्य नहीं हो । अतः (पहिले) मेरे मांस तथा रक्त से अपनी तृप्ति कर लो । शङ्खचूड— (सहसा पास जा कर) हे गरुड़ ! मत करो, ऐसा साहस मत करो । यह नाग नहीं है । इसे छोड़ दो । मुझे खाओ । मैं ही वासुकि के द्वारा तुम्हारे भोजन के लिए भेजा गया हूँ । [यह कहकर अपनी छाती भेंट करता है] (शङ्खचूड़ को देखकर, दुःख के साथ, मन ही मन) — हाय, शङ्खचूड ने आकर मेरे मनोरथ को निष्फल कर दिया ! गरुड— (दोनों को देखकर) तुम दोनों के वध्यचिह्न है । तो कौन (वस्तुतः) नाग है यह मैं नहीं समझ सका । शङ्खचूड़—आप का भ्रम उचित नहीं । (क्योंकि—)
- निकालना; वश में करना; हरना ।
( २२८ ) आस्तां स्वस्तिकलक्ष्म वक्षसि तनौ नालोक्यते कञ्चुको जिह्वे जल्पत एव मे न गणिते नाम त्वया द्वे अपि ? तिस्रस्तोत्रविषाग्निधूमपटलव्याजिह्मरत्नत्विषो नैता दुःसहशोकफूत्कृतमरुत्स्फीताः फणाः पश्यसि? ॥१८॥ गरुडः- (उभौ निरूप्य, शङ्खचूडस्य फणां दृष्ट्वा)-तत्कः खल्वयं मया व्यापादितः ? शङ्खचूडः-विद्याधरवंशतिलको जीमूतवाहनः । कथमकारु- णिकेन त्वया इदमनुष्ठितम् ? गरुडः - (स्वगतम्) अये, अयमसौ विद्याधरकुमारो जीमूतवाहनः ! मेरौ मन्दरकन्दरासु हिमवत्सानौ महेन्द्राचले कैलासस्य शिलातलेषु मलयप्राग्भारदेशेष्वपि दिक्कुञ्जेषु च तेषु बहुशो यस्य श्रुतं तन्मया लोकालोकविचारिचारणगणैरुद्गीयमानं यशः ॥१६॥ श्लोक नं०: १८, अन्वयः— वक्षसि स्वस्तिकलक्ष्म आस्ताम् तनौ । कञ्चुको नालोक्यते । जल्पत एव मे द्वे जिह्वे अपि त्वया न गणिते नाम ? तीव्रविषा- ग्निधूमपटलव्याजिह्मरत्नत्विषः, दुःसहशोकफूत्कृतमरुत्स्फीताः एताः तिस्रः फणाः (अपि किं त्वं) न पश्यसि ? श्लोक नं०: १६, अन्वयः— पश्य तत् यशः मेरौ, मन्दरकन्दरासु, हिमवत्सानौ, महेन्द्राचले, कैलासस्य शिलातलेषु, मलयप्राग्भारदेशेषु अपि, तेषु दिक्कुञ्जेषु च लोकालोकविचारिचारणगणैः उद्गीयमानं मया श्रुतम् ।
( २२६ ) छाती पर के स्वस्तिक चिह्न को रहने दो; (किन्तु) मेरे शरीर पर की केंचुली (भी क्या आप को) दिखाई नहीं देती ? मेरे बोलते हुए की दो जिह्वाओं को भी आपने नहीं गिना ? भयानक विष की अग्नि के धुँए के समूह से जिन के रत्नों की चमक मलीन हो गई है और जो दुःसह शोक के कारण सू सू कर के निकलती हुई हवा से फैल रहे हैं ऐसे मेरे इन तीन फणों को भी क्या आप नहीं देख रहे ? गरुड़- (दोनों को अच्छी तरह देखकर, शङ्खचूड़ के फण को देखकर) तो यह कौन मेरे द्वारा मारा गया है ? शङ्खचूड़- विद्याधरों के वंश का तिलक जीमूतवाहन । निर्दय हो कर तुम ने ऐसा क्यों किया ? गरुड़- (मन ही मन) अरे, क्या यह वही विद्याधर कुमार जीमूतवाहन है जिस का यश मेरु पर्वत पर, मन्दराचल की कन्दराओं में, हिमालय के उन्नत प्रदेशों में महेन्द्र पर्वत पर, कैलाश पर्वत की चट्टानों पर, मलय पर्वत की चोटियों पर तथा दिशाओं की कुक्षों में लोकालोक पर्वत पर विचरण करने वाले चारणों से गाया जाता हुआ मैं ने बहुत बार सुना है।
- जल्प + शतृ + पु० + षष्ठी एक वचन ।
- सचमुच; शायद; सम्भवतः; कदाचित् ।
- मलीन; धुंदली। 4. चमक; कान्ति ।
- श्रेष्ठ; शिरोमणि । 6. प्राग्भार = चोटी, शिखर ।
- विभिन्न दिशाओं की कन्दराओं अथवा लताभवनों में ।
( २३० ) सर्वथा महत्यंहःपङ्के निमग्नोऽस्मि । नायकः— भो फणिपते ! किमेवमुद्विग्नोऽसि ? शङ्खचूडः— किमस्थानमिदमावेगस्य? स्वशरीरेण शरीरं ताद्यत् परिरक्षतो मदीयमिदम् । युक्तं नेतुं भवता पातालतलादपि तलं माम् ॥२०॥ गरुडः—अये ! करुणार्द्रचेतसानेन महात्मनास्मद्ग्रासगोचर- पतितस्यास्य फणिनः प्राणान् रक्षितुं स्वदेह आहारार्थ- मुपनीतः। तन्महदकृत्यमेतन्मया कृतम् । किं बहुना, बोधिसत्त्व एवायं व्यापादितः । तस्य महतः पापस्याग्नि- प्रवेशादृते नान्यत् प्रायश्चित्तं पश्यामि। तत् क्व नु खलु वह्निं समासादयामि ? (दिशः पश्यन्—) अये ! अमी केऽपि गृहीताग्नय इत एवागच्छन्ति। तद्याव- देतान् प्रतिपालयामि । शङ्खचूडः — कुमार ! पितरौ ते प्राप्तौ । नायकः— (ससम्भ्रमम् ) शङ्खचूड ! समुपविश्यानेनोत्तरीये- णाच्छादितशरीरं कृत्वा धारय माम् । अन्यथा कदा- चिदीदृशं सहसैवं मां दृष्ट्वा पितरौ जीवितं जहाताम् ।
श्लोक नं०: २०, अन्वयः— स्वशरीरेण ताद्यत् मदीयम् इदं शरीरं परिरक्षता भवता मां पातालतलादपि तलं नेतुं युक्तम् ॥
( २३१ ) मैं तो सब प्रकार से महान पाप के पङ्क में डूब गया हूँ । नायक- हे नागराज (शङ्खचूड़) ! तुम ऐसे घबराए हुए क्यों हो ? शङ्खचूड़ - क्या यह घबराने का कारण नहीं ? अपना शरीर देकर गरुड़ से मेरे इस शरीर की रक्षा करते हुए मुझे पाताल से भी नीचे (नरक में) ले जाना क्या आप के लिए उचित था ? गरुड़ - अरे, दया से आर्द्र चित्त वाले इस महात्मा ने हमारे आहारार्थ आए हुए इस नाग के प्राणों की रक्षा करने के लिए अपने शरीर को (मेरे) खाने के लिए अर्पित कर दिया। तब तो यह मैंने बड़ा अनर्थ किया है। अधिक क्या, यह तो बोधिसत्त्व को ही मार डाला है। इस महान पाप का प्रायश्चित्त अग्नि में जलकर मरने के सिवाय कोई और दूसरा नहीं देख रहा हूँ । तो अग्नि कहाँ पाऊँ ? (चारों ओर देख कर) अरे, यह कुछ लोग आग लिए हुए इधर ही आ रहे हैं। तब तक इन की प्रतीक्षा करता हूँ । शङ्खचूड़- कुमार ! आप के माता पिता आगए । नायक- (घबराहट के साथ) शङ्खचूड़ ! तुम मेरे पास बैठ कर इस चादर से मेरे शरीर को ढक कर मुझे पकड़े रहो । नहीं तो कहीं सहसा ही मुझे इस दशा में देख कर मेरे माता पिता अपने प्राण ही छोड़ दें ।
- अस्थानम् = अनुचित स्थान; अकारण; अनुचित ।
- अकृत्यम् = बुरा काम; पाप; अनिष्ट ।
- ,ऋते' के योग में पञ्चमी आती है । अर्थ = बिना, अतिरिक्त ।
- जहाताम् = हा + विधिलिङ् + प्रथम पुरुष + द्विवचन । 'छोड़ें' ।
( २३२ ) [शङ्खचूडः पार्श्वपतितमुत्तरीयं गृहीत्वा तथा करोति।] [ततः प्रविशति पत्नीवधूसमेतो जीमूतकेतुः।] जीमूतकेतुः- (सास्रम्) हा पुत्र जीमूतवाहन ! - आत्मीयः पर इत्ययं खलु कुतः सत्यं कृपायाः क्रमः ? किं रक्षामि बहून् किमेकमिति ते जाता न चिन्ता कथम् ? तार्क्ष्यात्त्रातुमहिं स्वजीवितपरित्यागं त्वया कुर्वता, येनात्मा पितरौ वधूरिति हतं निःशेषमेतत्कुलम् ॥२१॥ वृद्धो- (मलयवतीमुद्दिश्य) जादे ! विरम मुहुत्तअं । अविरत- जाते ! विरम मुहूर्त्तकम् । अविरत- णिवडंतबाष्पबिंदूहिं अहिहवीअदि अअंअग्गी । निपतद्बाष्पबिन्दुभिर् अभिभूयतेऽयमग्निः । [सर्वे परिक्रामन्ति] जीमूतकेतुः- हा पुत्र जीमूतवाहन ! गरुडः- (श्रुत्वा) 'हा पुत्र जीमूतवाहन ! इति ब्रवीति। तद् व्यक्तमयमस्य पिता। तत् किमेतदीयेनाग्निना आत्मान- मुद्दीपयामि ? न शक्नोम्यस्य पुत्रघाताल्लज्जया मुखं श्लोक नं ०: २१, अन्वयः - अयं आत्मीयः (अयं) परः इति कृपायाः क्रमः कुतः ? (तत्) खलु सत्यम्। (परं) किं बहून् रक्षामि, किमेकं (वा) इति चिन्ता ते कथं न जाता ? येन तार्क्ष्यात् अहिं स्वजीवितपरित्यागं कुर्वता त्वया आत्मा पितरौ वधूरिति निःशेषमेतत्कुलं हतम् ।
[Page Header: ( २३३ )]
[शङ्खचूड़ पास ही में पड़ी हुई चादर ले कर वैसे ही करता है] [पत्नी और पुत्रवधू के साथ जीमूतकेतु का प्रवेश] जीमूतकेतु - (आंसुओं के साथ) हाय पुत्र जीमूतवाहन ! यह सच है कि कृपा करते हुए यह विचार नहीं किया जाता कि यह अपना है और यह पराया है। परन्तु तुम्हें यह विचार क्यों नहीं हुआ कि बहुतों की रक्षा करूँ अथवा एक की । क्योंकि गरुड़ से सांप को बचाने के लिए तुमने अपने प्राणों का त्याग करके अपने आप को, माता पिता को, अपनी बहू को, इस प्रकार इस समस्त कुल को (ही) नष्ट कर दिया है । वृद्धा - (मलयवती से) बेटी ! थोड़ी देर ठहर । लगातार गिरते हुए तेरे आंसुओं की बून्दों से यह अग्नि बुझी जा रही है । [सब घूमते हैं] जीमूतकेतु - हाय, पुत्र जीमूतवाहन ! गरुड़ - (सुनकर) यह तो "हाय पुत्र जीमूतवाहन !" ऐसा कह रहा है । अतः स्पष्ट ही यह इस का पिता होगा । तो क्या मैं इस की अग्नि से अपने आप को जलाऊँ ? इस के पुत्र को मारने के कारण लज्जा से मैं अपना मुंह नहीं दिखा सकता। अथवा,
- रघुवंश - "अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन्विचारमूढ़ः प्रतिभासि मे त्वम् ।"
( २३४ ) दर्शयितुम् । अथवा किमग्निहेतोः पर्याकुलोऽस्मि ? समीपस्थ एवास्मि जलनिधेः । तद्यावदिदानीम्— ^1ज्वालाभङ्गैस्त्रिलोकीग्रसनरसचलत्कालजिह्वाग्रकल्पैः सर्पद्भिः सप्त सर्पिष्कणमिव कवलीकर्तुमीशे^2 समुद्रान् । स्वैरेवोत्पातवातप्रसरपटुतरैर्धुक्षिते पक्षवातै- रस्मिन् कल्पावसानज्वलनभयकरे वाडवाग्नौ पतामि ॥२२॥ [ इत्युत्थातुमिच्छति ] ^3नायकः- भोः पक्षिराज ! अलमनेनाध्यवसायेन । नायं प्रतीकारोऽस्य पाप्मनः । गरुडः- (जानुभ्यां स्थित्वा कृताञ्जलिः) भो महात्मन् ! कस्तर्हि कथ्यताम् ? नायकः- प्रतिपालय क्षणमेकम् । पितरौ मे प्राप्तौ । यावदेतौ प्रणमामि । गरुडः- एवं क्रियताम् । जीमूतकेतुः- (दृष्ट्वा सहर्षम्)- देवि ! दिष्ट्या वर्द्धसे । अयमसौ वत्सो जीमूतवाहनो न केवलं ध्रियते, प्रत्युत पुरः कृताञ्जलिना ^4गरुडेन शिष्येणेव पर्युपास्यमानस्तिष्ठति । श्लोक न० : २२, अन्वयः- त्रिलोकीग्रसनरसचलत्कालजिह्वाग्रकल्पैः सर्पद्भिः ज्वालाभङ्गैः सप्तसमुद्रान् सर्पिष्कणमिव कवलीकर्त्तुमीशे उत्पातवातप्रसर पटुतरैः स्वैरेव पक्षवातैः धुक्षिते कल्पावसानज्वलनभयकरे अस्मिन् वाडवाग्नौ पतामि :
( २३५ ) अग्नि के लिए मैं इतना व्याकुल क्यों होता हूँ ? मैं तो समुद्र के पास ही हूं। अतः इस समय— त्रिलोकी को ग्रास करने के आनन्द से चलने वाली काल की जिह्वा के अग्रभाग के समान फैलने वाली अपनी ज्वाला की लहरों से सातों समुद्रों को घी की बूँद की तरह भस्म करने में समर्थ, (तथा) प्रलयकाल की हवा के प्रसार से भी अधिक वेगवान अपने पंखों की हवा से संदीप्त, (और) प्रलयकाल की अग्नि की भांति भयंकर इस वडवाग्नि में (ही मैं) गिर जाऊँगा। [यह कह कर उठना चाहता है] नायक—हे पक्षिराज ! ऐसा प्रयत्न मत करो। (इस निश्चय को रहने दो)। इस पाप का यह प्रायश्चित्त नहीं। गरुड़— (घुटने के बल बैठ कर, हाथ जोड़ कर) हे महात्मा ! तो फिर क्या है, कहिए। नायक — क्षण भर इन्तज़ार करो। मेरे माता पिता आगए हैं। इन्हें (पहिले) प्रणाम कर लूँ। गरुड— ऐसा ही कीजिए। जीमूतकेतु — (देखकर, हर्षपूर्वक) हे देवी, बड़ी प्रसन्नता की बात है। तुम्हें बधाई हो। यह पुत्र जीमूतवाहन केवल जीवित ही नहीं है अपितु सामने ही शिष्य के समान हाथ जोड़े हुए गरुड के द्वारा सेवा किया जा रहा है।
- ज्वालाओं की लहरों से; अर्थात् लहरों के समान एक पर एक आने वाली ज्वालाओं से। 2. ईशे = समर्थे।
- कार्य, निश्चय, प्रयत्न। 4 सेवित सम्मानित पूजित। परि + उप + आस् + कर्मणि + शानच्।
( २३६ ) वृद्धा - महोराअ ! किअत्थम्हि । अक्खदसरीरस्स एव्व महाराज ! कृतार्थास्मि । अक्षतशरीरस्यैव पुत्तअस्स मुहं दिट्ठं । पुत्रकस्य मुखं दृष्टम् । मलयवती- अहं अज्जउतं पेक्खन्ती वि असंभावणीयं ति अहमार्यपुत्रं प्रेक्षमाणापि असम्भावनीयमिति करिअ ण पत्तिआमि । कृत्वा न प्रत्येमि । जीमूतकेतुः - (उपसृत्य) वत्स ! एह्येहि, परिष्वजस्व माम् । [ नायकः उत्थातुमिच्छन् पतितोत्तरीयो मूर्च्छति ] शङ्खचूडः- कुमार, समाश्वसिहि, समाश्वसिहि । जीमूतकेतुः-- हा वत्स ! कथं मां दृष्ट्वापि परित्यज्य गतोऽसि? वृद्धा--हा पुत्तअ ! कहं वाआमेत्तकेण वि, तुए ण संभाविदम्हि ? हा पुत्रक ! कथं वाङ्मात्रेणापि त्वया न सम्भावितास्मि ? मलयवती- हा अज्जउत्त ! कहं गुरुअणो वि दे ण पेक्खिदव्वो ? हा आर्यपुत्र ! कथं गुरुजनोऽपि ते न प्रेक्षितव्यः? (सर्वे मोहं गच्छन्ति) शङ्खचूडः — हा शङ्खचूडहतक ! कथं गर्भ एव न विपन्नो- ऽसि, येनैवं क्षणे क्षणे, मरणातिगं दुःखमनुभवसि ? गरुडः - सर्वमिदं मम नृशंसस्यासमीक्ष्यकारिताया विजृम्भि- तम् । तदेवं तावत् करोमि । (पक्षाभ्यां वीजयन् )—
( २३७ ) वृद्धा — महाराज, मैं कृतार्थ हो गई। जो मैं ने स्वस्थ शरीर वाले पुत्र का मुख देख लिया। मलयवती — मैं आर्यपुत्र को देखती हुई भी, इसे असम्भव जान कर, विश्वास नहीं कर रही। जीमूतकेतु — (पास जा कर) आओ, पुत्र, आओ। मुझे आलिङ्गन करो। [नायक उठना चाहता है; परन्तु चादर गिर जाती है और वह अचेत हो जाता है] शङ्खचूड — होश में आओ, कुमार होश में आओ। जीमूतकेतु — हाय पुत्र, क्या मुझे देखकर भी छोड़ कर चले गए हो ? वृद्धा — हाय पुत्र, क्या केवल वचन से भी तुमने मेरा सम्मान नहीं किया। मलयवती — हाय नाथ, क्या आप ने गुरुजनों का भी ध्यान नहीं करना था ? [सब मूर्च्छित हो जाते हैं] शङ्खचूड — हाय रे अभागे शङ्खचूड ! तू गर्भ में ही क्यों नहीं मर गया। जो इस प्रकार प्रतिक्षण मरण से भी अधिक दुःख अनुभव कर रहा है। गरुड — यह सब मुझ पापी के बिना विचारे काम करने का फल है। तो ऐसा करता हूँ। (पंखों से हवा करता हुआ) हे महात्मन्, १. हतक = अभागा; नीच; घातक। २. नृशंस = क्रूर; पापी। ३. प्रकट होना; फल।
( २३८ )
भो महात्मन् ! समाश्वसिहि, समाश्वसिहि । 1 नायकः—(समाश्वस्य) शङ्खचूड ! समाश्वासय गुरून् । शङ्खचूडः— तात ! समाश्वसिहि, समाश्वसिहि । अम्ब, समाश्वसिहि, समाश्वसिहि । समाश्वसितो जीमूतवाहनः । किं न पश्यथ ? प्रत्युत युष्मानेव समाश्वासयितु- मुपविष्टस्तिष्ठति । [उभौ समाश्वसितः] वृद्धा—पुत्त । कहं पेक्खंताणं ज्जेव अम्हाणं किदंतहदएण पुत्र ! कथं प्रेक्षमाणानामेवास्माकं कृतान्तहतकेना- अवहारीअसि ? पह्रियसे ? जीमूतकेतुः— देवि ! मैवममङ्गल्यवादिनी भव । ध्रियत एवा- युष्मान् । तद् वधूः समाश्वास्यताम् । वृद्धा- (मुखं वस्त्रेणावृत्य रुदती) पडिहदममंगलम् । णा रो- प्रतिहतममङ्गलम्^२ । न रो- इस्सम् । मलअवदि ! समस्सस ! वच्छे ! उट्ठेहि दिष्यामि । मलयवति ! समाश्वसिहि । वत्से ! उत्तिष्ठ, उट्ठेहि । वरं एतिअवेलां तुमं भत्तुणोमुहं पेक्ख । उत्तिष्ठ । ^३वरमेतस्यां वेलायांत्त्वं भर्तृमुखं प्रेक्षस्व । मलयवती — (समाश्वसिहि) हा अज्जउत्त ! हा आर्यपुत्र ! वृद्धा-मलयवत्या मुखं पिधाय) वच्छे ! मा एव्वं करोहि । वत्से ! मैवं कुरु ।
( २३६ )
होश में आइए, होश में आइए । नायक — (सचेत हो कर) शङ्खचूड ! मातापिता जी को सचेत करो। शङ्खचूड — हे तात ! सचेत होइए, होश में आइए । हे माता जी, होश में आइए, सचेत होइए । जीमूतवाहन सचेत हो गए हैं। क्या आप उसे देख नहीं रहे ? उल्टे आप लोगों को धीरज बन्धाने के लिए उठ बैठे हैं। [दोनों होश में आते हैं] वृद्धा — पुत्र, क्या हमारे देखते ही देखते नीच यमराज तुम्हें लिए जा रहा है ? जीमूतकेतुः — देवि, ऐसी अमंगल बात मत कहो। चिरञ्जीवी पुत्र अभी जीवित है। अतः बहू को धीरज बन्धाओ। वृद्धा — (मुख को कपड़े से ढक कर रोती हुई) अमंगल नष्ट हो ! (अब) मैं नहीं रोऊंगी। मलयवती, धीरज कर। बच्ची, उठ, उठ। इस समय (तो) पति के मुख को अच्छी तरह देख ले। मलयवती — (होश में आकर) हाय प्राणनाथ ! वृद्धा — (मलयवती का मुख बन्द करके) बेटी, ऐसा मत कर। यह
- सम् + आ + श्वस् + णिच् + लोट् + मध्यम पुरुष + एक वचन।
- यह अमंगल दूर हो गया। ईश्वर करे कि यह अमंगल दूर हो !
- भली प्रकार। अथवा, यह अच्छा है कि......।
( २४० ) पडिहदं क्खु एदं । प्रतिहतं खल्वेतत् । जीमूतकेतुः - (सास्रमात्मगतम् )- विलुप्तशेषाङ्गतया प्रयातान् निराश्रयत्वादिव कण्ठदेशम् । प्राणांस्त्यजन्तं तनयं निरीक्ष्य कथं न पापः शतधा व्रजामि? ॥२३॥ मलयवती - हा अज्जउत्त ! अदिदुक्खरकारिणी क्खु अहं जा हा आर्यपुत्र ! अतिदुष्करकारिणी खल्वहं या ईदिसं अज्जउत्तं पेक्खंती अज्जवि जीविअं ण परिच्चआमि । ईदृशमार्यपुत्रं प्रेक्षमाणापि जीवितं न परित्यजामि वृद्धा-(नायकस्याङ्गानि स्पृशन्ती गरुडमुद्दिश्य) णिसंस ! नृशंस ! कहं दाणिं तुए एदं आपूरिअमाणाणवरूवजोव्वणसोहं कथमिदानीं त्वया एतदापूर्यमाणनवरूपयौवनशोभं तं ज्जेव्व एदावत्थं पुत्तअस्स मे सरीरं किदम् ? तदेवैतदवस्थं पुत्रकस्य मे शरीरं कृतम् ? नायकः-अम्ब ! मा मैवम् । किमनेन कृतम् ? ननु पूर्वमप्ये- तदीदृशमेव परमार्थतः । पश्य - श्लोक नं०: २३, अन्वयः - विलुप्त शेषाङ्गतया निराश्रयत्वात् इव कण्ठदेशं प्रयातान् प्राणान् त्यजन्तं तन निरीक्ष्य (अहं) पापः कथं न शतधा व्रजामि ?
( २४१ ) अमंगल नष्ट हो ! ! जीमूतकेतु — (आंसुओं के साथ, मन ही मन) शेष सब अङ्गों के नष्ट हो जाने के कारण मानों आश्रय हीन हो कर गले में आए हुए प्राणों को छोड़ते हुए (अपने) पुत्र को देख कर मुझ पापी के हज़ार टुकड़े क्यों नहीं हो जाते ? मलयवती — हाय प्राणनाथ ! मैं बड़ी कठोर हृदया हूँ जो आप को इस दशा में देखती हुई भी प्राण नहीं छोड़ती। वृद्धा — (नायक के अङ्गों को छूती हुई, गरुड़ के प्रति) अरे निर्दय ! नए रूप तथा यौवन से शोभायमान मेरे पुत्र के शरीर को तू ने अब इस दशा में कैसे कर दिया ? नायक — नहीं, माता जी ऐसा मत कहिए ! इसने क्या किया है ? यह शरीर तो वस्तुतः पहिले भी ऐसा ही था। देखिए —
- त्यज्+शतृ+द्वितीय+एक वचन ।
- कठोर कार्य करने वाली; कठोर हृदया ।
( २४२ )! मेदोऽस्थिमांसमज्जाऽसृक् सङ्घातेऽस्मिंस्त्वचावृते । शरीरे खलु का शोभा सदा बीभत्सदर्शने ? ॥२४॥ गरुडः— भो महात्मन् ! नरकानलज्वालावलीढमिवात्मानं मन्यमानो दुःखं तिष्ठामि । तदुपदिश्यतां, येन मुच्येऽहमस्मादेनसः³ नायकः— अनुजानातु मां तातः, यावदस्य पापस्य प्रतिपत्तमुपदिशामि । जीमूतकेतुः— वत्स ! एवं क्रियताम् । नायकः— वैनतेय ! श्रूयताम् । गरुडः- (जानुभ्यां स्थित्वा कृताञ्जलिः) आज्ञापयतु भगवान् , नायकः—नित्यं प्राणाभिघातात् प्रतिविरम कुरु प्राक्कृते चानुतापं। यत्नात् पुण्यप्रवाहं समुपचिनु दिशन् सर्वसत्त्वेष्वभीतिम् । मग्नं येनात्र नैनः फलति परिमित प्राणिहिंसात्तमेतद् दुग्धापारावारेलवणपलमिव क्षिप्तमन्तर्ह्रदस्य ॥२५। श्लोक न०: २४, अन्वयः — मेदोऽस्थिमांसमज्जाऽसृक्सङ्घाते त्वचावृते सदा बीभत्सदर्शने अस्मिन् शरीरेः खलु का शोभा ? श्लोक न०: २५, अन्वयः- नित्यं प्राणाभिघातात् प्रतिविरम, प्राक्कृते चानुतापं कुरु । सर्वसत्त्वेष्वभीतिं दिशन् यत्नात् पुण्यप्रवाहं समुपचिनु येन दुग्धापारावारेः ह्रदस्यान्तः क्षिप्तं लवणपलमिव परिमितप्राणिहिंसात्तमेतद् एनः अत्र मग्नं न फलति ।
( २४३ ) चर्बी, हड्डी, मांस, मज्जा तथा रक्त के समूह, (ऊपर से) चमड़े से ढके हुए, सदा वीभत्स (घृणा युक्त) दिखाई देने वाले इस शरीर में भला कौन सी सुन्दरता है ? गरुड़— हे महात्मन् ! नरक की आग की ज्वाला से अपने आप को जला हुआ सा मानता हुआ मैं (बड़े) दुःख से ठहरा हूँ । अतः ऐसा उपदेश दीजिए जिस से मैं इस पाप से छूट जाऊँ । नायक — पिता जी, मुझे आज्ञा दें ताकि मैं (इसे) इस पाप का प्रतिकार (प्रायश्चित) बताऊँ । जीमूतकेतु — पुत्र, ऐसा (ही) करो । नायक—हे विनता के पुत्र (गरुड़) ! सुनो । गरुड — (घुटनों के बल बैठकर, हाथ जोड़ कर) आप आज्ञा करें । नायक — प्रतिदिन प्राणियों की हिंसा से रुको और पहिले किए (पाप) का पश्चात्ताप करो। सब प्राणियों को अभय दान करके यत्न- पूर्वक पुण्यप्रवाह का संग्रह करो जिस से अथाह तथा विस्तृत सरोवर के बीच डाले गए नमक के टुकड़े के समान. (इन) थोड़े से प्राणियों को मारने से उत्पन्न हुआ यह पाप इस में डूब कर (बुरा) फल न दे ।
- असृक् = रक्त, खून ।
- सङ्घात = समूह
- एनसः = एनस् + ५ मी + एक वचन
- सम् + उप + चि + लोट् + मध्यम पु० + एक वचन ।
- आत्तम् = जातम् ।
( २४४ ) गरुडः-- यदाज्ञापयति भगवान् — अज्ञाननिद्राशयितो भवता प्रतिबोधितः । सर्वप्राणिवधदेष विरतोऽद्यप्रभृत्यहम् ॥२६॥ सम्प्रति हि— क्वचिद् द्वीपाकारः पुलिनविपुलैर्भोगनिवहैः १ कृतावर्त्तभ्रान्तिर्वलयितशरीरः क्वचिदपि । व्रजन् कूलात्कूलं क्वचिदपि च सेतुप्रतिसमः समाजो नागानां विहरतु महोदन्वति सुखम् ॥२७॥ अपि च, स्रस्तानापादलम्बाँस्तिमिरचयनिभान्केशहस्तान् वहन्त्यः, सिन्दूरेणेव दिग्धैः २ प्रथमरविकरस्पर्शताम्रैः कपोलैः । आयासेनालसाङ्ग्योऽप्यवगणितरुजः कानने चन्दनानाम्- अस्मिन् गायन्तु रागादुरगयुवतयः कीर्तिमेतां तवैव ॥२८॥ श्लोक न०: २६, अन्वयः-अज्ञाननिद्राशयितो (ऽहं) भवता प्रतिबोधितः । एषः अद्य प्रभृत्यहं सर्वप्राणिवधाद् विरतः । श्लोक न०: २७, अन्वयः- क्वचित् पुलिनविपुलैर्भोगनिवहैः द्वीपाकारः, क्वचिदपि वलयितशरीरः कृतावर्त्तभ्रान्तिः, क्वचिदपि च कूलात्कूलं व्रजन् सेतुप्रतिसमः नागानां समाजः महोदन्वति सुखं विऽहरतु । श्लोक नं०: २८, अन्वयः— स्रस्तानापादलम्बान् तिमिरचयनिभान् केशहस्तान् वहन्त्यः, प्रथम- रविकरस्पर्शताम्रैः सिन्दूरेणेव दिग्धैः कपोलैः, आयासेनाल- साङ्ग्योऽप्यवगणितरुजः, उरगयुवतयः चन्दनानामस्मिन् कानने रागात् तवैव एतां कीर्तिं गायन्तु ।
( २४५ ) गरुड - जो आप की आज्ञा । अज्ञान रूपी निद्रा में सोए हुए मुझे आप ने जगा दिया है। यह (लो) आज से मैं सब प्राणियों को मारने से हट गया। अब निश्चय ही— कहीं रेतीले किनारे के समान विशाल शरीरों से द्वीप की तरह दिखाई देता हुआ, कहीं शरीर को कुण्डलित करने से आवर्त्त (भंवर) का भ्रम उत्पन्न करता हुआ, और कहीं एक किनारे से दूसर किनारे तक जाता हुआ पुल के समान लगता हुआ नागों का समूह (आज से इस) महासागर में सुखपूर्वक विहार करे । और भी,— खुले हुए, पैरों तक लटकने वाले, अन्धकार के समूह के समान (काले), लम्बे बालों को धारण करने वाली, पहिले पहिल दिखाई देने वाली सूर्य की किरणों के स्पर्श से लाल वर्ण हुए सिन्दूर से रंगे हुए से दीखने वाले कपोलों से (सुशोभित), परिश्रम से अलसगात्र होने पर भी क्लेश को न गिनने वाली ये नाग युवतियां इस चन्दन वन में प्रेम से तुम्हारी ही कीर्त्ति गा* ।
- समूहों में पड़े हुए नाग द्वीपों की भान्ति दिखाई देते हैं और उनके श्वेत फण रेतीले किनारे के समान ।
- लिप्त, लेप लिए हुए, रंगे हुए।