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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( २६३ ) यह स्वर्ण चक्र तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हो (अथवा, है); और चार दान्तों वाला यह सफेद हाथी, काले रंग वाला घोड़ा और मलयवती भी। ये तुम्हारे रत्न हैं। हे चक्रवर्ती (राजा) ! अच्छी तरह देख लो। और भी, देखो मेरे द्वारा प्रेरित, शरत् कालीन चन्द्रमा के समान निर्मल छोटे २ चँवर हाथों में लिए हुए, चञ्चल चूड़ामणि की किरणों से इन्द्रधनुष की पंक्तियां सी बनाते हुए, भक्ति भाव से सिर झुकाए हुए, ये मतङ्गदेव आदि विद्याधरों के राजालोग तुम्हें प्रणाम कर रहे हैं। तो कहो इस से अधिक और तुम्हारा क्या उपकार करूँ ? नायक- (घुटनों के बल बैठ कर) क्या इस से भी अधिक कोई प्रिय वस्तु है ? गरुड़ के मुख से यह शङ्खचूड बचा लिया गया है; गरुड़ विनीत हो गया है; उस के द्वारा पहिले खाए गए जो नागराज थे वे भी सब पुनर्जीवित हो गए हैं; मेरे फिर से प्राण धारण करने से माता पिता ने प्राण नहीं त्यागे; चक्रवर्ती पद भी मिल गया; (और) देवी, आप के साक्षात् दर्शन हो गए। फिर इस से बढ़ कर अधिक प्रिय वस्तु कौनसी हो सकती है जिस के लिए प्रार्थना की जाए ?

  1. हरिः = घोड़ा।
  2. विनता का पुत्र, गरुड़।

( २६४ ) तथापीदमस्तु - [भरत वाक्यम्] - वृष्टिं हृष्टशिखण्डिताण्डवभृतो मुञ्चन्तु काले घनाः, कुर्वन्तु प्रतिरूढसन्ततहरिच्छस्योत्तरीयां क्षितिम् । चिन्वानाः सुकृतानि वीतविपदो निर्मत्सरैर्मानसै— मोदन्तां घनबद्धबान्धवसुहृद्गोष्ठीप्रमोदाः प्रजाः ॥४०॥ अपि च— शिवमस्तु सर्वजगतां परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः । दोषाः प्रयान्तु नाशं सर्वत्र सुखी भवतु लोकः ॥४१॥ [इति निष्क्रान्ताः सर्वे] ॥ इति पञ्चमोऽङ्कः ॥ ॥ इति नागानन्दम् ॥ श्लोक नं०: ४०, अन्वयः — हृष्टशिखण्डिताण्डवभृतो घनः काले वृष्टिं मुञ्चन्तु; प्रतिरूढ- सन्ततहरिच्छस्योत्तरीयां क्षितिं कुर्वन्तु; प्रजाः वीतविपदः निर्मत्सरैः मानसैः सुकृतानि चिन्वानाः घनबद्धबान्धवसुहृद्गोष्ठी- प्रमोदाः मोदन्ताम् ॥ श्लोक नं०: ४१, अन्वयः — सर्वजगतां शिवमस्तु; भूतगणाः परहितनिरता भवन्तु; दोषाः नाशं प्रयान्तु; लोकः सर्वत्र सुखी भवतु ॥

( २६५ ) फिर भी यह हो— (भरतवाक्य)— प्रसन्न हुए मोरों को नचाते हुए वादल समय पर वर्षा करें और पृथ्वी को उगे हुए घने हरे धानों की चादर से ढक दें। [तथा प्रजा के लोग विपत्तियों से मुक्त हो ईर्ष्या-रहित मनों से पुण्य सञ्चय करते हुए बन्धुओं तथा मित्रों के साथ घनी गोष्ठियों में आनन्द मनाते हुए प्रसन्न रहें। और भी— सारे विश्व का कल्याण हो। सब प्राणी दूसरों के हित करने में लगे रहें। सब दोष न हों। (और) लोग सर्वत्र सुखी हों। [सब का प्रस्थान] ॥ पाँचवां अङ्क समाप्त ॥ ॥ नागानन्द (नाटक) समाप्त ॥

  1. चि+शानच्+प्रथमा बहुवचन ।

“परिशिष्ट”

I भौगोलिक तथा ऐतिहासिक उल्लेख प्रथम अंक:- १. अनङ्ग=कामदेव ! जब देवताओं को यह पता लगा कि राक्षस तारक से बचाने में पार्वती का पुत्र ही सहायक हो सकता है और पार्वती शिवजी को छोड़ और किसी से विवाह नहीं करेगी तो कामदेव ने कहा कि मैं प्रयत्न करता हूँ कि शिवजी पार्वती से शादी करने पर राज़ी हो जाएँ । शिवजी उस समय तपस्या में लीन थे । कामदेव द्वारा तपस्या भङ्ग होने से शिवजी अति क्रुद्ध हुए और उनके तृतीय नेत्र से ऐसी अग्नि निकली जिसने कामदेव के शरीर को जला कर राख कर दिया । फिर कामदेव की पत्नी रति के अनुनय विनय करने पर शिवजी ने कामदेव को जिला तो दिया परन्तु शरीर नहीं दिया। अतएव उसे अनङ्ग अर्थात् अङ्गरहित कहते हैं । २. बुद्ध=जिस को अन्तर्ज्ञान प्राप्त हो गया हो । बौद्धमत के प्रवर्तक शाक्यमुनि को बुद्ध कहते हैं क्योंकि उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हो गई थी ! उन का जन्मनाम सिद्धार्थ था । वे कपिलवस्तु में उत्पन्न हुए थे और ५४३ पूर्वैसा उनका देहान्त हुआ । उनके पिता शाक्यराज शुद्धोदन थे और उनकी माता का नाम था माया देवी । उन का विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ था ! उस से उनके राहुल नामी एक पुत्र भी हुआ था । पुराणों में बुद्ध को विष्णु का नवाँ अवतार भी माना है ! (२६८)

( २६६ ) ३. जिन = विजयी। बुद्ध को जिन भी कहते हैं क्योंकि उन्हों ने जीवन इन्धनों पर विजय प्राप्त की थी। मार की अप्सराओं की चेष्टाओं का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था और वे पूर्ण रूप से शान्त रहे थे। ४. इन्द्रोत्सव = देवराज इन्द्र के उपलक्ष में मनाया जाने वाला महोत्सव। इस को इन्द्रध्वज महोत्सव भी कहते हैं। रघुवंश में भी इस का उल्लेख मिलता है। वर्षा की यथेष्ट प्राप्ति के लिए राजालोग भाद्रशुक्लद्वादशी को इन्द्र के झण्डे का जलूस निकालते थे। कहते हैं सर्व प्रथम संस्कृत नाटक इसी अवसर पर अभिनीत हुआ था। ५. मतङ्ग = यह जीमूतवाहन का प्रतिपक्षी है। जब जीमूतवाहन वन में माता पिता की सेवा के लिए गया हुआ था तो उस की अनुपस्थिति में मतङ्ग ने उसके राज्य को आत्मसात् कर लिया। परन्तु जब गौरी ने जीमूतवाहन को विद्याधरोंका सम्राट् नियुक्त कर दिया तो मतङ्ग भी आकर उनके आगे नतमस्तक हुआ। ६. मलयपर्वत = दक्षिण भारत में एक पर्वत श्रेणी है। इस में चन्दन वृक्षों का बाहुल्य है। कवि लोग प्रायः ऐसा वर्णन करते हैं कि दक्षिण की ओर से आने वाली वायु इन चन्दनवृक्षों की सुगन्धि को लेकर आती है। ७. शशभृत् = चन्द्रमा ! कहते हैं कि चन्द्रमा के बीच जो कलङ्क सा है वह आकार में खरगोश से मिलता जुलता है। अतएव चन्द्र को शशभृत् अथवा शशाङ्क (खरगोश के चिन्ह वाला) कहते हैं।

( २७० ) द्वितीय अंक:- ८. कुसुमायुध=कामदेव । फूल ही जिस के हथियार हैं । कहते हैं कामदेव फूलों के तीरों का प्रयोग करता है । पांच प्रकार के पुष्प उसके बाण बताये हैं— अरविन्द, अशोक, आम्र पुष्प नवमल्लिका तथा नीलोत्पल । ९. गान्धर्व विवाह=विवाह आठ प्रकार के बताए हैं:— ब्राह्म; दैव; आर्ष; प्राजापत्य; आसुर; गान्धर्व; राक्षस तथा पैशाच । गान्धर्व रूप में विवाह बिना किसी आडम्बर तथा संस्कारों के निश्चित हो जाता हैं । वर तथा वधू ज्यों ही मिलते हैं देखते ही प्रेमासक्त हो जाते हैं और वहीं विवाह बन्धन में बन्धे जाते हैं । तृतीय अंक:- १०. बलदेव=श्री कृष्ण के बड़े भाई । वसुदेव तथा देवकी की सातवीं सन्तान । जब यह गर्भ में थे तो देवकी का गर्भ रोहिणी में डाल दिया गया था ताकि कंस इन्हें न मार सके । श्री कृष्ण तथा बलराम दोनों का पालन पोषण गोकुल में नन्द के घर हुआ था इन को आसव (शराब) का बहुत शौक था और इस के प्रभाव से कई विस्मय जनके कार्य किया करते थे । इन का हथियार प्रायः हल होता था; अतएव इन्हें हलायुध भी कहते हैं । इन का विवाह रेवती के साथ हुआ था । कामदेव=प्रेम के देवता । श्री कृष्ण तथा रुक्मणि के पुत्र । रति पति । वसन्त के घनिष्ट मित्र । अनिरुद्ध के पिता । इन के

( २७१ ) हथियार तीरकमान हैं--- तीर फूलों के (देखो ऊपर नं०: ८) और कमान की डोरी भँवरों की पंक्ति। अधिक विस्तार के लिए देखिए ऊपर टिप्पण (१) १२. पितामह = दादा = पिता के पिता। प्रायः ब्रह्मा को पितामह कहते हैं क्योंकि वे दस प्रजापतियों के पिता हैं, जिन से कि सारी सृष्टि की उत्पत्ति हुई। चतुर्थ अंक: — १३. वैनतेय = विनता का पुत्र, गरुड़। विनता के दो पुत्र थे। दूसरा, अरुण, सूर्य का सारथि है। इन के पिता का नाम कश्यप था। गरुड़ पक्षियों का राजा कहलाता है। वह सांपों का शत्रु है। गरुड़ विष्णु की सवारी है। कहते हैं एक बार विनता तथा सांपों की माता कद्रु में झगड़ा हो गया कि इन्द्र के घोड़े का रंग क्या है। इसमें विनता को हार हुई और शर्त के अनुसार उसे कद्रु की दासी बन कर रहना पड़ा। उसे मुक्त कराने के लिए गरुड़ इन्द्र से लड़ कर अमृत लाया। विनता तो मुक्त हो गई परन्तु अमृत को इन्द्र सांपों से छीन ले गया। १४. विश्वामित्र = वस्तुतः विश्वामित्र एक क्षत्रिय राजा थे। वे गाधि के पुत्र थे उनकी राजधानी कान्यकुब्ज थी। एक दिन शिकार खेलते खेलते वे वसिष्ठ जी के आश्रम में पहुंचे। वहां उन्हों ने कामधेनु देखी। उसे पाने के लिए उन्हों ने अमित धन सम्पत्ति देने को कहा, परन्तु वसिष्ठ जी ने उसे स्वीकार नहीं किया। विश्वामित्र बलात् ले जाना चाहते थे, परन्तु मुँह की खाई। इस पराजय से वे बहुत खिसियाना हुए।

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ब्राह्मण्य की शक्ति का उन पर बड़ा प्रभाव हुआ । अतः वे भी घोर तपस्या करने लगे । यहां तक कि लोग उन्हें क्रमशः राजर्षि, ऋषि, महर्षि और ब्रह्मर्षि कहने लगे । परन्तु जब तक स्वयं वसिष्ठ जी ने आकर उन्हें ब्रह्मर्षि नहीं कहा तब तक उन को सन्तोष नहीं हुआ। इस को कई सहस्र वर्ष लग गए। परन्तु इन की शक्ति इस से कहीं पहिले भी दृष्टिगोचर होने लगी थी । एक बार इन्द्र के हाथों से शुनःशेप को छुड़ाने के लिए इन्होंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग को भेज दिया । श्री रामचन्द्र जी को भी इन्होंने कई दिव्य जृम्भकास्त्रादि दिए थे ।

एक बार घोर अकाल पड़ा । भोजन की खोज में घूमते घूमते विश्वामित्र जी चांडालों के एक ग्राम में पहुंचे । वहां एक घर में उन्हें कुत्ते का मांस दिखाई दिया । रात्री के समय जब घर वाले सो रहे थे तो उन्हों ने वह मांस चुराने का प्रयत्न किया परन्तु एक चंडाल जाग रहा था । उस ने पकड़ लिया । जब उसे यह ज्ञान हुआ कि यह विश्वामित्र हैं तो उनसे वाद- विवाद करने लगा कि क्या यह आप के लिए उचित था। उन्हों ने उत्तर दिया कि जब अपना जीवन संकट में हो तो अपने प्राणों की रक्षा के लिए चोरी करना कोई पाप नहीं ! यह कह कर मांस का थोड़ा भाग देवी को बलि देकर शेष स्वयं खा गए।

१५. गौतम = यह चोल देश के किसी गाँव का एक ब्राह्मण था । आजीविका के लिए घर छोड़ शबरों में जा मिला और एक शबरी विधवा से विवाह कर लिया । एक वन में रह कर पशु पक्षियों को मार कर निर्वाह किया करता था। कुछ समय के

(२७३) पश्चात् एक काफ़िला से जा मिला। एक घोर वन में एक दुष्ट हाथी ने इस के सब साथियों को मार दिया। कई दिन घूमने के पश्चात् यह राजा नाड़ीजङ्घ के हां पहुँचा। उसने अपने मित्र राक्षसराज विरूपाक्ष के पास भेज दिया। वहां से अमित धन सम्पत्ति प्राप्त करके आप नाडीजङ्घ के पास लौट आए। घर लौटते समय स्वयं नाडीजङ्घ को मार कर उस के मांस को भून कर साथ ले लिया। परन्तु विरूपाक्ष ने पकड़ कर उसे वहीं ला मारा। जब इन्द्र को नाडीजङ्घ की मृत्यु का पता चला तो वह अमृत लेकर आया और उसे पुनर्जीवित कर दिया। नाडीजङ्घ की प्रार्थना पर गौतम को भी जिला दिया गया और नाडीजङ्घ ने बहुत से उपहार देकर उसे विदा किया। परन्तु देवताओं ने उसे शाप दिया कि उस शबरी विधवा से तेरे जैसे दुष्ट कई पुत्र उत्पन्न हों और मृत्यु के पश्चात् तू घोर नरक में पड़े ! १६. दक्षिणगोकर्ण = गोकर्ण दक्षिण मे एक तीर्थ का नाम है। यह शैवों का तीर्थस्थान है। इस के साथ दक्षिण शब्द लगाना इस लिए आवश्यक है क्योंकि इसी नाम का एक तीर्थस्थान उत्तर में नेपाल में भी है। पञ्चम अङ्कः— १७. जाह्नवी = गङ्गा। इस नाम की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताते हैं कि जब अपने प्रपितामहों का उद्धार करने के लिए राजा भगीरथ गङ्गा को लिए जा रहे थे तो मार्ग मे इस के जल से राजा जह्नु का यज्ञस्थान प्लावित हो गया। राजा ने क्रोध करके इस के समस्त जल को पी लिया। तदनन्तर देवताओं तथा भगीरथ के प्रार्थना करने पर उन्हों ने कानों द्वारा उसे मुक्त कर दिया।

( २७४ ) १८. मेरु = कहते हैं मेरु पर्वत पृथ्वी के मध्य में स्थित है। और इस के इर्द गिर्द सारे सितारे घूमते हैं। यह सोने तथा रत्नों की खान बताई-गई है। सात वर्षपर्वतों में से एक है। १९. मन्दर = जब देवताओं तथा राक्षसों ने क्षीर सागर में से अमृत मन्थन किया था तो मन्दर पर्वत को ही मथनी बनाया था। २०. हिमवत् = हिमालय भारत के उत्तर में स्थित पर्वत श्रेणी। यह भी सात वर्षपर्वतों में से एक है। २१. महेन्द्र = यह सात कुलपर्वतों में से एक पर्वत है। पूर्वी घाट पर्वतमाला का वह भाग जो उड़ीसा प्रान्त के ज़िला गञ्जम में स्थित है। २२. कैलास = यह हिमालय की एक चोटी है जो शिव तथा कुबेर का निवासस्थान बताई गई है। २३. मलय = महेन्द्र के समान सात कुलपर्वतों में से एक। (देखो ऊपर नं० : ६) २४. लोकालोक = हिन्दू पौराणिक भूगोल के अनुसार पृथ्वी सात द्वीपों की बनी हुई है जिन के चारों ओर सात ही समुद्र हैं। लोकालोक एक ऐसा पर्वत है जो सारे विश्व को घेरे हुए है और सातवें द्वीप को घेरने वाले समुद्र से भी आगे स्थित है। इस पर्वत से आगे पूर्ण अन्धकार है। प्रकाश केवल इस की इस ओर ही है। इस प्रकार यह पर्वत दृश्य लोक को अन्धकारमय देश से पृथक् करता है।

( २७५ ) २५. लोकपालाः = आठों दिशाओं के रक्षक देवता। पूर्व से घड़ी की सुई के अनुसार वे इस प्रकार हैं:— इन्द्र, अग्नि यम, नैऋत वरुण, मरुत्, कुबेर और ईश । २६ त्रिदशपति = इन्द्र । देवताओं का स्वामी । देवता को त्रिदश इस लिए कहते हैं कि वह सदा तीस वर्षों का ही रहता है, अथवा उस की तीन दिशाएँ होती हैं । जन्म, सत्ता और अविनाश । अथवा, "तृतीया यौवनाख्या दशा सदा येषाम्", अर्थात् जो सदा जवान रहते हैं, कभी बूढ़े नहीं होते । II. नाट्य-कला-सम्बन्धी परिभाषाएँ:— १. नान्दी — प्रस्तावना अथवा स्थापना के आरम्भ में आने वाले श्लोकों को नान्दी कहते हैं इस में किसी देवता का स्तुतिगान होता है अथवा सामाजिकों के लिए आशीर्वाद । कभी कभी इस में नाटक की कथावस्तु की ओर भी संकेत होता है कभी श्लोक-रचना ऐसी होती है कि वर्णों को विशेष रूप से मिलाने से नाटक के प्रधानपात्रों के नाम बन जाते हैं । भरत-नाट्य-शास्त्र में लिखा है:— "पूर्वं कृता मया नान्दी आशीर्वचनसंयुता।" मल्लिनाथ ने इस का लक्षण यह दिया है:— "आशीर्नमस्क्रियारूप श्लोकः काव्यार्थसूचकः ।" नान्दी शब्द नन्द् धातु से निकला है, जिसका अर्थ है 'प्रसन्न होना' । तो नान्दी का अर्थ हुआ 'हर्ष' अथवा 'प्रसन्नता' । नाट्यप्रदीप में यही अर्थ मिलता है:—

( २७६ ) 'नन्दन्ति काव्यानि कवीन्द्रवर्गाः कुशीलवाः पारिषदाश्च सन्तः । यस्मादलं सज्जनसिन्धुहंसी तस्मादियं सा कथितेह नान्दी ॥' कभी इससे देवता के अतिरिक्त ब्राह्मण तथा राजादिकों की भी आशीर्वाद-युक्त स्तुति की जाती है:— “आशीर्वचन संयुक्ता स्तुतिर्यस्मात्प्रयुज्यते । देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ।” २. सूत्रधार — सूत्रधार का शब्दार्थ है 'सूत्र को धारण करने वाला', 'शिल्पी', अथवा 'गृहकार' । नाटक में सूत्रधार एक विशेष पात्र होता है जो नाटक के खेले जाने का प्रबन्ध करता है । प्रस्तावना अथवा स्थापना में आकर सूत्रधार नाटक की कथावस्तु, अथवा नाटककार, अथवा नायक के गुणों की सूचना देता है । और वह रङ्गमञ्च को सजाने में भी बड़ा चतुर होता है ।:— “आसूत्रयन् गुणान् नेतुः कवेरपि च वस्तुनः । रङ्गप्रसाधनप्रौढः सूत्रधार इहोदितः ॥” ३. नेपथ्य — इस शब्द की व्युत्पत्ति सन्दिग्ध है। इसका अर्थ है किसी पात्र के कपड़े अथवा वेष-भूषा । विस्तृत रूप में इसका अर्थ पात्रों के 'वस्त्र पहिनने का कमरा' हो जाता है जिसे रंगमञ्च से एक पर्दे के द्वारा पृथक् किया जाता है ।:—

( २७७ ) “कुशीलवकुटुम्बस्य स्थलं नेपथ्यमुच्यते” कभी कभी परिमित रूप में नेपथ्य का अर्थ ‘पर्दा’ ही लिया जाता है। त्रिश्वलोचन ने पर्दे को नेपथ्य भी कहा है। ३. स्थापना (अथवा प्रस्तावना) — भास नाटकचक्र तथा ‘मत्तविलास’ आदि में ‘स्थापना’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस अर्थ में साधारणतः ‘प्रस्तावना’ शब्द का ही प्रयोग होता है। साहित्य-दर्पण में इस का यह लक्षण दिया गया है :— “नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा। सूत्रधारेण सहितः संलापं यत्र कुर्वते॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः। आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा॥” नाट्य-शास्त्र के अनुसार इस का लक्षण इस प्रकार है:— “प्रसाद्य रङ्गं विधिवत् कवेर्नाम च कीर्तयेत्। प्रस्तावनां नटः कुर्यात् काव्यप्रख्यापनाश्रयाम्॥” इस लक्षण से यह स्पष्ट है कि स्थापना तथा प्रस्तावना एक ही हैं। ‘भरत’ के अनुसार स्थापना ‘स्थापक’ के द्वारा कही जानी चाहिए:— ‘स्थापकेन स्थाप्यत इति स्थापना।’ इस में सूत्रधार, नटी, विदूषक अथवा पारिपार्श्विक से अपने कार्य के विषय में विचित्र उक्ति से इस प्रकार बातचीत करता है जिस से प्रस्तुत कथा की सूचना मिलती है।

( २७८ ) ५. काञ्चुकीय (कंचुकी) —यह शब्द कञ्च् धातु से निकला है जिस का अर्थ है बान्धना या चमकना। काञ्चुकीय का अर्थ है कंचुक को धारण करने वाला। अन्तःपुर के विशेष वृद्ध ब्राह्मण सेवक को काञ्चुकीय कहते हैं। इस का वर्णन इस प्रकार से किया गया है:— “अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः । सर्वकार्यार्थकुशलः कंचुकीत्यभिधीयते ॥” मातृगुप्त ने इस का लक्षण यह बताया है:— “ये नित्यं सत्यसंपन्नाः काम-दोष-विवर्जिताः । ज्ञान-विज्ञान-कुशलाः कंचुकीयास्तु ते स्मृताः ॥” अर्थात् कञ्चुकी सदा सत्य बोलता है, कामदोषों से रहित होता है और ज्ञान तथा विज्ञान में कुशल होता है। ६. प्रवेशक — यह एक ऐसा दृश्य है जिसे दो अंकों के बीच में रखा जाता है। इस में नीच पात्र (भृत्य आदि) काम करते हैं जो प्राकृत बोलते हैं। इस से दो अङ्कों को परस्पर जोड़ा जाता है। इसके द्वारा उन घटनाओं का उल्लेख किया जाता है जो रङ्गमञ्च पर नहीं दिखाई गईं या नहीं दिखाई जा सकतीं ! दो अङ्कों के बीच में आने के कारण प्रथम अङ्क में इस का प्रयोग निषिद्ध है:— “नासूचितस्य पात्रस्य प्रवेशः क्वचिदिष्यते । प्रवेशं सूचयेत्तस्मादमुख्याङ्के प्रवेशकात् ॥”

( २७६ ) नीच पात्रों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इस में उक्तियां उत्कृष्ट अथवा रमणीय नहीं होतीं:— “प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ।” ७. विदूषक — जो अपने विकृत अङ्गों से, ऊटपटांग बातों से और अनोखे वेष से सामाजिकों को हंसाता है उसे विदूषक- कहते हैं । ८. स्वगतम् (अथवा आत्मगतम्) — “अश्राव्यं खलु यद्वस्तु तदिह स्वगतं मतम्” । जो बात रङ्गमञ्च पर ठहरे हुए शेष पात्रों को सुनाने योग्य नहीं होती उसे 'स्वगतम्' कहते हैं। ऐसी बात को एक पात्र दूसरे पात्र अथवा पात्रों से नहीं कहता वरन् अपने मन में ही कहता है; परन्तु इस प्रकार कहता है कि सामाजिक सुन सकते हैं। ६. प्रकाशम् — “सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यात् ।” 'स्वगत' के पश्चात् जो बात सब को सुनानी होती है उसे. 'प्रकाशम्' अथवा 'प्रकट' कहते हैं । १०. मिश्रविष्कम्भक— वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः । संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥ मध्येन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां सम्प्रयोजितः । शुद्धः स्यात् स तु सङ्कीर्णो नीचमध्यमकल्पितः ॥ बीती हुई और आगे होने वाली कथांशों का सूचक अङ्क के-

( २८० ) आरम्भ में आने वाला विष्कम्भक कहलाता है। एक या अधिक मध्यम पात्रों के द्वारा प्रयोग किया गया विष्कम्भक ‘शुद्ध कहलाता है और नीच तथा मध्यम दोनों प्रकार के पात्रों द्वारा प्रयोग किए हुए को ‘मिश्र विष्कम्भक’ कहते हैं। प्रवेशक तथा विष्कम्भक में यह अन्तर है कि ‘प्रवेशक’ में सब पात्र नीच होते हैं और ‘विष्कम्भक’ के मध्यम या नीच और मध्यम। दूसरे, ‘विष्कम्भक’ के प्रथम अङ्क के आरम्भ में भी आने के लिए कोई निषेध नहीं परन्तु ‘प्रवेशक’ प्रथम अङ्क के आरम्भ में नहीं आ सकता। ११. भरत-वाक्य — नाटक के अन्त में, आशीर्वचन युक्त अथवा शुभकामना सूचक श्लोक अथवा श्लोकों को भरतवाक्य कहते हैं। नाट्यशास्त्र के जन्मदाता भरत मुनि के सम्मान में भरतवाक्य का प्रयोग होने से इस का नाम भरतवाक्य पड़ गया है। इस में राष्ट्र और जाति आदि केलिए मंगल-कामना की जाती है। भरतवाक्य से पहिले ‘तथापीदमस्तु’ वाक्य का प्रयोग प्रायः होता है। III प्राकृत— प्राकृत संस्कृत से ही निकली कही जाती है: — “प्रकृतिः संस्कृतम्। तत आगतं प्राकृतम्॥ कई कहते हैं कि संस्कृत और प्राकृत दो बहिने हैं। जिस समय शिक्षित समाज के बोलने की भाषा अथवा साहित्यिक भाषा संस्कृत थी, उस समय साधारण लोगों की भाषा उस से भिन्न थी जिसे प्राकृत के नाम से पुकारा जाता था: — “प्रकृतानां (प्राकृत जनानां) भाषा प्राकृतम्”

( २८१ )

प्राकृत के भी कई रूप हैं- महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी, पैशाची, अवन्ति इत्यादि । प्राचीन साहित्यिक प्राकृत के नमूने हमें ईसा-पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक के शिलालेखों में मिलते हैं। इस से पूर्व बौद्ध धर्म-ग्रन्थ थे। इन शिलालेखों की भाषा पाली थी। यदि हम प्राकृत को विस्तृत अर्थ में लें तो हमें पाली को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान देना पड़ता है। परन्तु साधारणतया पाली-साहित्य प्राकृत-साहित्य में नहीं लिया जाता। अतः यदि पाली साहित्य को पृथक् लिया जाए तो हम देखते हैं कि प्राकृत साहित्य का प्रधान अंश जैन साहित्य है जो अर्ध मागधी, महाराष्ट्री तथा जैन शौरसेनी में लिखा गया। काव्यों के लिए, प्राचीन काल से ही सर्व प्रधान प्राकृत महाराष्ट्री ही रही। यही प्राकृत-महाकाव्यों तथा गीतों की भाषा थी। और प्राकृत के वैयाकरणों ने अपना कार्य इसी के आधार पर प्रारम्भ किया। महाकाव्यों में सब से अधिक प्रसिद्ध ‘सेतु-बन्ध’ है। रावणवहो (अथवा, दहमुहवहो), गौडवहो तथा हेमचन्द्र के कुमारपालचरित के नाम भी उल्लेखनीय हैं। परन्तु महाराष्ट्री के अध्ययन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति हाल की सत्तसई है। इन के पश्चात् हम नाटकीय प्राकृत के तीन रूप देखते हैं- महाराष्ट्री, शौरसेनी तथा मागधी। प्राकृत के विभिन्न रूपों का प्रयोग ‘मृच्छकटिकम् ’ में प्रचुर मात्रा में मिलता है। ‘कर्पूरमञ्जरी’ में तो सभी पात्र प्राकृत ही बोलते हैं। विदूषक तथा स्त्री पात्रों की साधारण बोलचाल की भाषा शौरसेनी होती है। इन्हीं के द्वारा बोले जाने वाले पद्यों की भाषा महाराष्ट्री होती है। और मागधी का प्रयोग प्रायः

भृत्य, वामन, वैदेशिक आदि करते हैं; यथा अभिज्ञानशाकुन्तल में दोनों रक्षी तथा धीवर की भाषा मागधी ही है । प्राकृत साहित्य का एक विशेष भाग प्राकृत व्याकरण हैं। भारतीय नाट्य शास्त्र सब से पुराना प्रमाण है । प्राचीनतम प्राकृत व्याकरण जो हस्तगत हुआ है वह वररुचि कात्यायन का 'प्राकृत प्रकाश' है, परन्तु इस विषय का सब से श्रेष्ठ निरूपण जैन-आचार्य हेमचन्द्र (१०८८-११७२) ने अपने व्याकरण "सिद्ध हेम-चन्द्र" के आठवें अध्याय में किया है । संस्कृत से प्राकृत और प्राकृत से संस्कृत बनाने की रीति जानने के लिए प्राकृत की विशेषताएँ जानना बहुत आवश्यक है । आगे हम यही विशेषताएँ देते हैं: — १. द्विवचनस्य बहुवचनम्ः — प्राकृत में दो ही वचन होते हैं:- एक वचन और बहु वचन । इस में द्विवचन नहीं होता । द्विवचन के स्थान पर बहुवचन ही कर दिया जाता है । २. चतुर्थ्याः षष्ठी — प्राकृत में चतुर्थी के स्थान में षष्ठी होती है । ३. प्राकृत में आत्मनेपद नहीं होता । प्रत्येक धातु परस्मैपद में होती है । ४. प्राकृत में निम्न लिखित स्वर होते ही नहीं: — ऋ; ॠ; ऌ; ॡ; ऐ; औ; अः । (i) संस्कृत के 'ऋ' के स्थान में अगले वर्ण का स्वर आ जाता है:— तृण से तण; ऋषि से इसि इत्यादि । अपवाद — वृद्ध से वुढ्ढ और ऋण से रिण ।

( २४३ ) (ii) ‘लृ’ को ‘इलि’ हो जाता है जैसे: —क्लृप्त से किलित्त। (iii) ऐ; औ के स्थान में क्रमशः ए, ओ आते हैं:— शैल से सेल; औरस से ओरस; सौम्य से सोम्य । ऐ को अ + इ और औ को अ + उ भी होता है: — दैव से दइव; दैत्य से दइच्च; भैरव से भइरव; कौरव से कउरव इत्यादि । ५. 'नो णः सर्वत्र' । प्राकृत में सब स्थान पर न को ण होता- है:— नदी से णई इत्यादि । ६. 'शषयोः स'— श् तथा ष् के स्थान में स् हो जाता है:—निशा से णिसा; कषाय से कसाय । ७. "आदेर्यो जः"—संस्कृत में जिन शब्दों के आदि में य् होता है प्राकृत में य् के स्थान पर ज् होता है:— यशः से जसो; यदि से जइ; यज्ञ से जक्खो । अपवाद— यष्टि से लट्ठी । ८. परन्तु यदि 'य्' आदि में न होकर मध्य अथवा अन्त में हो तो इसके स्थान में 'अ' हो जाता है:— जय से जअ । ९. "मो बिन्दु"ः— पदान्त 'म्' को अनुस्वार हो जाता है:— भद्रम् से भद्दं । १०. अकारान्त— शब्द के अन्त में यदि विसर्ग आए तो उस विसर्ग को 'उ' हो जाता है। यह 'उ' पहिले 'अ' से मिलकर 'ओ' हो जाता है :— पुरुषः से पुरिसो ।