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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

हिन्दीटीकासहित ६१ धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रांश्च विष्णोः प्रीतिकरान् सदा । जप-होमार्चनध्यान-दानादिषु विशेषतः ॥६७॥ वैष्णव भक्त अपने जप, होम, दान तथा अर्चन, ध्यानादि के अवसर पर भगवत्सेवा की परमयोग्यता के आपादनार्थ विशेषरूप में श्रीविष्णु के प्रीति के सदैव आधारभूत रहनेवाले ऊर्ध्व तिलक को अवश्य धारण करे॥६७॥ नश्यन्ति सकलाः क्लेशा नराणां पापसम्भवाः । अभीष्टान्यखिलानि स्युरूर्ध्वपुण्ड्रस्य धारणात् ॥६८॥ इस ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक के धारण करने से मनुष्यों के पापों से उत्पन्न होने वाले समस्त क्लेशों का उपशम या नाश होता है तथा सभी अभीष्ट प्रयोजनों की संप्राप्ति होती है॥६८॥ त्रयोदश द्वादश वाप्यूर्ध्वपुण्ड्राणि धारयेत् । एकं चत्वारि षट् चाष्टावपि वाञ्छन्ति केचन ॥६९॥ इन ऊर्ध्वपुण्ड्रों के धारण में त्रयोदश या द्वादश संख्या की स्थिति मान्य है परन्तु कुछ विष्णुभक्त एक, चार, छः तथा आठ संख्या भी ऊर्ध्वपुण्ड्रों की बतलाते हैं॥६९॥ ऋजूनि स्फुटपार्श्वानि सान्तरालाानि विन्यसेत् । ऊर्ध्वपुण्ड्राणि दण्डाब्जमत्स्यदीपनिभानि च ॥७०॥ ये ऊर्ध्वपुण्ड्र आकार में सीधे होने के साथ साथ इनकी दोनों रेखा या वस्तुएं स्पष्ट होनी चाहिए तथा इनके बीच के भाग स्पष्ट अलग दिखना चाहिए तथा इनका आकार लम्बा, चक्र, अब्ज (शंख) तथा दीप के आकारों से समानता लिये हुए श्रीहरि के पादाब्ज के समान होना चाहिए॥७०॥ विष्णोरूर्ध्वतया क्षेत्रे पर्वतादौ प्रशस्तया । मृदोर्ध्वपुण्ड्रं देवानामन्त्यैर्वा छिद्रमेव वा ॥७१॥ श्रीविष्णु के पर्वतादि क्षेत्रों के प्रशस्त होने के कारण उसी पर्वतादि की मिट्टी से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण होता है। अतः उसे ही धारण करना चाहिए। देवताओं की अर्चनाकारी अन्य कस्तूरी आदि द्रव्यों से भी ऊर्ध्वपुण्ड्र किया जाता है। मनुष्यों का ऊर्ध्वपुण्ड्र बीच में छिद्रवाला होता है तथा यहाँ मिट्टी सफेद होनी चाहिए॥७१॥ निघर्षणादि विधिवत्कृत्वा ध्यायन् जगद्गुरुम् । आसीनोऽङ्गुलिभिर्दद्यादूर्ध्वपुण्ड्रान् स्वयं क्रमात् ॥७२॥ विधिवत् संसार के प्रभु श्रीनारायण का ध्यान करते हुए (स्मरण करते हुए) श्वेत

६२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता मृत्तिका का सव्यहस्त के द्वारा निघर्षण कर उससे ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाकर धारण करे। यह कार्य वह आसीन होकर स्वयं की अंगुलि में मृत्तिका से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे॥७२॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रं ललाटे तु कुर्वीत चतुरङ्गुलम् । उदरे हृदि कण्ठे च दशाष्टचतुरङ्गुलान् ॥७३॥ ललाट पर यह ऊर्ध्वपुण्ड्र चार अंगुल के प्रमाण का उन्नत रखना चाहिए तथा उदर, हृदय तथा कण्ठ देश पर क्रमशः दस, आठ तथा चतुरंगुल प्रमाण का रखना चाहिए॥७३॥ दक्षिणोदरबाह्वंसेष्वेवं त्रीणीतरस्य च । आद्यवत् पृष्ठतो द्वे च मूर्ध्नि चैवं त्रयोदश ॥७४॥ उदर के दक्षिण भाग पर, दक्षिण बाहु तथा स्कन्ध पर तथा उदर के वामभाग, बाहु तथा स्कन्ध पर इसी क्रम से दस, आठ तथा चार अंगुलों वाले ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे। ललाट के ऊर्ध्वपुण्ड्र की तरह ही पृष्ट देश में दो तथा मूर्धा पर एक ऊर्ध्वपुण्ड्र रखें। इसी प्रकार शरीर पर इनकी संख्या तेरह रहती है॥७४॥ त्रिधा सर्वत्र विस्तारश्चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलं क्रमात् । उत्तमो मध्यमो हीनः पार्श्वद्व्यङ्गुलिकौ स्मृतौ ॥७५॥ इन सभी ऊर्ध्वपुण्ड्रों में चार, तीन तथा दो अंगुलों की लम्बाई का विस्तार क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा हीन माना जाता है। अतएव इनके अतिरिक्त मध्यम तथा हीन बाजुओं में ये अंगुलि मात्र प्रमाण के रहते हैं॥७५॥ तत्र तत्र स्मरन् मन्त्रैः केशवादीन्न्यसेत् क्रमात् । पाणिना दक्षिणेनैव वासुदेवं त्रयोदशे ॥७६॥ इनमें जहाँ तहाँ ललाटादि प्रदेश में रहनेवाले ऊर्ध्वपुण्ड्रों में केशवादिरूपों का ध्यान करते हुए उनके मन्त्रों से क्रमशः केशवादि का वहाँ न्यास करे। इन शिर आदि त्रयोदश ऊर्ध्वपुण्ड्रों में वासुदेव मन्त्र से दक्षिण हस्त के द्वारा ही वासुदेव का न्यास करें॥७६॥ प्रणवेन तथा व्यूहैः षडष्टद्वादशाक्षरैः । मन्त्रैरन्यैश्च ताँस्तान् वै धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रकान् ॥७७॥ प्रणव के द्वारा तथा केशव के षड् आठ तथा द्वादशाक्षर वाले अपने उपदिष्ट मन्त्रों से या उनके व्यूह चतुष्टय के त्रिगुण होकर द्वादश मन्त्रों से उन उन ऊर्ध्वपुण्ड्रों को धारण करना चाहिए॥७७॥

हिन्दीटीकासहित ६३ ततो दिव्यञ्च हारिद्रं सहेम-तुलसीदलम् । मन्त्रेण धारयेच्चूर्णं ललाटे मस्तके तथा ॥७८॥ इसके उपरान्त श्री भगवदर्पित सुवर्ण तुलसीदल चूर्ण मिश्रित हरिद्रा चूर्ण को ललाट तथा मस्तक पर मन्त्र के साथ (अधिकारानुसारी ‘श्रियो जात’ इत्यादि मन्त्रादि के साथ) धारण करना चाहिए॥७८॥ पवित्राण्यब्जबीजानि शङ्खचक्राङ्कभूषणम् । धारयेद् वैष्णवं नाम वैष्णवाश्रयमेव वा ॥७९॥ पवित्रारोपणादि उत्सव के अवसर पर श्रीभगवान् विष्णु के द्वारा धारण किये गये तन्तुमय पद्माक्ष बीज के वलयों (तुलसी काष्ठ निर्मित अक्ष वलय और अन्य वैष्णवों के इष्ट कण्ठी आदि को) तथा शंख चक्रादि से अङ्कित मुद्रिकादिभूषणों को जो वैष्णवाश्रय होकर नाम से भी वैष्णव भूषण हो गये हों तथा भगवत्सम्बन्धित भूषणों को धारण करना चाहिए॥७९॥ अयुक्सूत्रैर्व्यतिस्यूतं धारयेत् कटिबन्धनम् । कौपीनं वस्त्रयुग्मञ्च यथार्हमितराणि च ॥८०॥ उसे अयुग्म या तीन सूत्रों से बट कर बनाया हुआ कटिसूत्र का धारण करना चाहिए, कौपीन के दो वस्त्रखण्डों को रखना चाहिए तथा यथायोग्य आवश्यकतानुरूप अन्य वस्त्रों (उष्णीष आदि) को शरीर पर धारण करना चाहिए॥८०॥ लक्षणानि स्फुटान्येव क्रियासिद्धिकराणि तु । धारयेन्नोपहन्येत कदाचित् किङ्करादिभिः ॥८१॥ शंख, चक्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्षणों को स्पष्ट रूप में प्रकट होने वाले आकारों में धारण करने से ये क्रियाओं के सिद्धि-कारक भगवान् श्रीविष्णु के किंकरभाव की योग्यता के सम्पादक होकर भी रहने से इनका धारण करना इष्ट है जिससे कभी भी यम देवता के किङ्कर दूतादि से बाधा नहीं होती है॥८१॥ सत्सेवाधिकार- दण्डवत्प्रणमेद् भूमावुपैत्य गुरुमन्वहम् । दिशे वाऽपि नमस्कुर्याद् यत्रासौ वसति स्वयम् ॥८२॥ आचार्यायाहरेदर्थानात्मानञ्च निवेदयेत् । तदधीनश्च वर्तेत साक्षान्नारायणो हि सः ॥८३॥ अपने अहंकार को हटाकर प्रतिदिन अपने उपदेष्टा पूज्य गुरु को दण्डवत् प्रणाम पृथ्वी पर झुककर करना चाहिए अथवा जिस स्थान पर वह निवास करता हो उसी दिशा को गुरु का आवास स्थान मानकर (गुरु के न मिलने पर) प्रणाम कर लेना

६४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता चाहिए। अपने आचार्य के लिये धनादि देने को लावे तथा अपना परिचय निवेदन क उनकी आज्ञा का अनुसरण कर स्थित रहे, क्योंकि आचार्य स्वयं नारायण स्वरूप होता है (आशय यह कि भगवद्विषयक सारी वृत्तियां तथा श्रद्धा को गुरु के लिये भी किय जाना चाहिये)॥८२-८३॥ कुर्वीत परमां भक्तिं गुरौ तत्प्रियवत्सलः । तदनिष्टापवादी च तन्नामगुणहर्षितः ॥८४॥ आचार्य का भक्तवत्सल होकर अपने पूज्य गुरु के प्रति परम भक्ति रखे तथा अपनी ओर से गुरु के अनिष्ट का विरोध करे तथा उनके वचन, नाम तथा गुणों का अनुवाद सुनकर प्रसन्नता दिखलाए॥८४॥ नित्यं गुरुमुपासीत तद्वचःश्रवणोत्सुकः । विग्रहालोकनपरस्तस्यैवाज्ञाप्रतीक्षकः ॥८५॥ नित्य ही वह अपने आचार्य या उपदेष्टा गुरु की उपासना करता रहे तथा उनके कथन (उपदेश वचन) को सुनने को उत्सुक रहे। उनके शरीर की सेवा में सदैव तत्पर रहे तथा उनके द्वारा दी जाने वाली आज्ञाओं की सदा प्रतीक्षा करत रहे॥८५॥ प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे प्रणिपत्योपयुज्य च । नित्यं विधिवदर्घ्याद्यैरादृतोऽभ्यर्चयेद् गुरुम् ॥८६॥ वह अपने आचार्य के चरणों को पात्र में स्थापित कर उन्हें प्रक्षालित करे तथ दण्डवत् प्रणाम कर पादप्रक्षालन के जल का आचमन कर ग्रहण करे तथा प्रतिदिन अर्घ्यादि लेकर आदर करते हुए आचार्य का अर्चन करे॥८६॥ इच्छाप्रकृत्यनुगुणैरुपचारैः सदोचितैः । भजन्नवहितश्चात्र हितमावेदयेद् रहः ॥८७॥ वह सदा उनकी इच्छा तथा प्रकृति के अनुरूप उपचारों से सेवा करे तथ सावधानीपूर्वक रहते हुए आचार्य के हितों को अलग एकान्त होने पर उन बतलावे॥८७॥ यथानुजीवी नृपतिं यथा भक्तस्तु दैवतम् । तथैव देशिकं शिष्यः सेवेत विनयान्वितः ॥८८॥ १ आचार्य भगवद्रूप है। यह पारम्परिक वचन है-'साक्षात्नारायणो देवः कृत्वा मर्त्यमयीं तनुम् मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्रपाणिना।।' अतएव भगवद्विषयक वृत्ति के समान उस आचार्य के प्रति भी आचरण प्रमाण सम्मत है।

हिन्दीटीकासहित ६५ जैसे कोई राजसेवक अपने स्वामी राजा का अथवा जैसे कोई भक्त अपने इष्टदेव की विनयपूर्वक सेवा करता रहता है उसी प्रकार वह शिष्य अपने देशिक (गुरु) की सेवा करे॥८८॥ स्नातञ्च गुरुणा यत्र तीर्थं नान्यत्ततोऽधिकम् । यच्च कर्म तदर्थन्तद्विष्णोराराधनात् परम् ॥८९॥ अपने गुरु ने जिस जलाशय (नदी, सरोवर या कूप) में स्नान किये उससे अधिक अन्य श्रेष्ठ तीर्थ नहीं है१ तथा जो भी कार्य उनके लिये किया जाता है वह स्वयं श्रीविष्णु की आराधना के समान श्रेष्ठ कार्य है॥८९॥ अपदिश्य पितॄन् देवान् गुरौ यत् प्रतिपाद्यते । देश-काल-क्रिया-मन्त्र-निरपेक्षं तदक्षयम् ॥९०॥ अपने पितरों तथा देवताओं को भी न देते हुए जो हव्य कव्य पदार्थ आचार्य को प्रदान किया जाता है वह देश, काल, क्रिया तथा मन्त्रों की बिना अपेक्षा किये हुए भी अक्षय होता है॥९०॥ आत्मनो ह्यतिनीचस्य योगिध्येयपदार्हताम् । कृपयैवोपकर्त्तारमाचार्यं संस्मरेत् सदा ॥९१॥ अतिशय हीनात्मा को भी योगिजन से ध्यान करने (प्राप्तव्य) योग्य पद की योग्यता को जो अपनी करुणामयी कृपा के द्वारा उपदेशों के उपकार से शक्य बनाता है, अतः ऐसे उपदेष्टा आचार्य का सदैव स्मरण करना चाहिए॥९१॥ स्वयं देहानुकूलानि धर्मार्थोपयिकानि च । कुर्यादप्रतिषिद्धानि गुरोः कर्म्माण्यशेषतः ॥९२॥ वह सदां आचार्य के शरीर के अनुकूल पादसंवाहन आदि सेवा तथा धर्म और अर्थ के उपयुक्त अग्नि परिचर्या देवपूजन आदि शास्त्र के अनुगत तथा अप्रतिषिद्ध कर्मों को स्वयं सम्पन्न करे॥९२॥ योऽसौ मन्त्रवरं प्रादात् संसारोच्छेदसाधनम् । प्रतीच्छेद् गुरुवर्यस्य तस्योच्छिष्टं सुपावनम् ॥९३॥ जो आचार्य मोक्ष के हेतुभूत श्रेष्ठ मन्त्र को प्रदान करता है उस आचार्य का पवित्रभूत उच्छिष्ट प्रासादं पवित्र भगवत्प्रसादवत् आचार्यके वदनसे स्पृष्ट अन्नादि को स्वीकार करे॥९३॥ १ गुरु के स्नान से पवित्र तीर्थ का भागवत् में इस प्रकार माहात्म्य दिखलाया है- 'भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो । तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तस्थेन गदाभृता ॥' अतएव ऐसे पवित्रभूत जल से स्नान करना आचार तथा विनयाचार भी शास्त्रसम्मत है।

६६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता ये चोपकुर्वते ज्ञानं किमप्यच्युतसंशयम् । विनोच्छिष्टाशनं कुर्याद् वृत्तिं तेष्वपि गौरवात् ॥९४॥ श्रीमद्भगवान् अच्युत विषयक मोक्ष साधक ज्ञान का जिस गुरु के उच्छिष्टाशन कर्म से उपकार होता है या ऐसे ज्ञान को जो प्रदान करता है, ऐसे अन्य गुरुजन उच्छिष्टाशन से वर्जित अपने गुरु के समान ही वृत्ति का आचरण करे॥९४॥ गुरोश्च पत्नीपुत्रादिष्वन्येष्वप्यमलात्मसु । कुर्यादाचार्यवद्वृत्तिं तत्र तत्र व्यवस्थया ॥९५॥ अपने पूज्य गुरु की पत्नी तथा पुत्रादि भ्राता आदि तथा उनके अंतरंग ऐसे शिष्टजन सहृदयादि निर्मल स्वभाव वाले हों तो उन सभी में यथा पर्या उच्छिष्टाशनादिवर्ज्य पादोपसंग्रहणादि आचार का पालन करे॥९५॥ आचार्योऽपि तथा शिष्यं स्निग्धो हितपरः सदा । प्रबोध्य बोधनीयानि वृत्तिमाचारयेत् स्वयम् ॥९६॥ गुरु भी विनयादि सम्पन्न शिष्य के प्रति कृपापूर्ण तथा सदैव शिष्यहित की चिन्ता रहकर उन्हें बतलाने योग्य सभी विषयों का उपदेश देते हुए सदा प्रबुद्ध करे तथा स्व अपनी वृत्ति का यापन करे॥९६॥ निजधर्मानुरोधेन वैष्णवैरेव वैष्णवः । कुर्यात् सर्वाणि कार्याणि न कदाचिदवैष्णवैः ॥९७॥ अधिकैः सदृशैर्वाऽपि कुर्यादेव तु सङ्गमम् । हीनांश्च नावमन्येत न च दोषं विभावयेत् ॥९८॥ वह शिष्य अपने से अधिक योग्य अथवा अपने समान बुद्धिवाले अन्य शिष्यों क संगति रखे। वह अपने से कम योग्यता या स्थिति वालों की अवहेलना न करे और ही उनमें दोषों की चिन्ता या निदर्शन करे॥९८॥ वृद्धानाचारसम्पन्नान् विष्णुभक्तान् दृढव्रतान् । सतः सत्सेवनपरान्नित्यं सेवेत सन्नतः ॥९९॥ वह सदा विनम्र भाव से ऐसे सन्तजन की जो श्रीहरि के भक्त तथा इष्ट के प्रति दृ आस्था एवं व्रतशील रहते हो आचार सम्पन्न हों तथा सज्जनों के सेवी हों तो उनक सदा सेवन (सेवा) करना चाहिए॥९९॥ १ इस विषय में विहगेन्द्रसंहिता का यह वचन-‘आचार्यपत्नीं पुत्रं वा मातापितरौ सोदरम् आचार्यमेव मन्येत अन्यथा नाशमाप्नुयात् ॥”

हिन्दीटीकासहित ६७ एवं स्वकर्मणि ज्ञाने भक्तौ च परिनिष्ठितः । वैराग्येण च संयुक्तो न चेह जायते पुनः ॥१००॥ इस प्रकार वह अपने विहित आचारों में इष्ट के दृष्टज्ञान तथा भक्ति वैराग्यादि में परिपक्व या दृढ़ धारणा रखकर वर्तत करने पर पुनः इस लोक में जन्म ग्रहण नहीं करता है॥१००॥ (इति सत्सेवनाधिकारः) इति श्रीभारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ (भारद्वाज संहिता के न्यासोपदेश का तृतीय अध्याय समाप्त)

६८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रीतिरूपाँस्तथा विष्णोः स्वधर्मानाचरेद् यथा । तथैवाप्रीतिरूपाणि प्रतिषिद्धानि वर्जयेत् ॥१॥ प्रपत्ति या न्यास-योग में स्थित साधक भक्त को अपने इष्टभूत श्रीविष्णु के प्रीतिरूप या प्रीतिकारक स्वधर्म का आचरण जैसे इष्ट होता है उनका अनुगमन करे वैसे ही उन्हें अप्रीतिरूप जो प्रतिषिद्ध धर्म है उनको निषिद्ध मान कर वह उनका परित्याग भी करे॥१॥ विष्णोर्ध्यानप्रणाभार्चास्तुतिचिह्नादिवर्जितम् । समारब्धन्तु यत् कर्म तत्कर्म विफलं भवेत् ॥२॥ जिस धर्माचरणभूत कर्म में श्रीविष्णु के ध्यान, प्रणाम, अर्चन, स्तुति तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र जैसे चिह्न का विधान न रहे और यदि ऐसा कोई कर्म आरम्भ किया गया हो तो वह कर्म निष्फल होता है॥२॥ विष्वक्सेनः स्मृतो नेता भगवांच्छुद्धकर्मणाम् । तस्मान्नान्यमुपासीत कर्मणां विघ्नशान्तये ॥३॥ आरब्ध एवं अनुष्ठित सभी शुद्धकर्मों के भगवान् विष्वक्-सेन (श्रीविष्णु) ही प्रभु या पूर्णकर्ता माने गये हैं। अतएव विघ्नादि की शान्ति हेतु भी अन्य देवता की उपासना नहीं करना चाहिए॥३॥ ब्रह्मारुद्रदिगीशार्कतच्छक्तिप्रसवादयः । नित्यसम्पर्चने वर्ज्याः काम्योऽपि स्यान्न तन्मुखः ॥४॥ ब्रह्मा, रुद्र, दिक्पाल, सूर्य, इन ब्रह्मादि की शक्तियां (मातृकाएं) तथा इन देवगणों के पुत्रादि देवगणों की नित्य अर्चा (कर्मविशेष में कभी अपेक्षित होने पर भी) वर्जित मानी गयी है। अतएव काम्य कर्म के रहने की अपेक्षा पर भी इनकी अर्चा में अभिमुख न रहे॥४॥ न जातु परमां वृत्तिं कुर्वीत विरसाशयः । प्रमादालस्यनास्तिक्यकामाद्यैर्न च हापयेत् ॥५॥ उस निष्पार्कन की निष्ठा गयी वृत्ति को भक्तिहीन भाव से कभी न रखे तथा उसे

हिन्दीटीकासहित ६९ प्रमाद, आलस्य नास्तिक बुद्धि के काम क्रोध आदि के कारण भी कभी न छोड़े (क्योंकि यह चर्या नित्यविधि है, अपरिहार्य है)॥५॥ देश-काल-गुणादीनां विना पापेन संविदः । आस्त्रीभ्यश्चाखिलाचारान्नातिक्रमेत् कदाचन ॥६॥ वह देश, काल तथा कुलादि के निर्धारित आचारों को बिना निषिद्ध किये हुए तथा स्त्रियों के भी इसी प्रकार के विहित आचारों का उल्लंघन (भी) न करे॥६॥ न वृत्तेरधिकामृद्धिं न मृत्युं न च जीवितम् । न चाप्रशस्तान् विषयानिच्छेदिह परत्र वा ॥७॥ इस लोक में वह अपनी वृत्ति से अधिक समृद्धिकी मृत्यु की या जीवन की अभिलाषा न करे। इसी प्रकार वह वेदादि से निषिद्ध अप्रशस्त विषयों की इस या परलोक के विषय में भी अभिलाषा न रखे॥७॥ न पापेन न पुण्येन नात्यायासेन कर्मणा । सम्पदां सङ्ग्रहं कुर्याद्विपदाञ्च प्रतिक्रियाम् ॥८॥ वह अपनी सम्पत्ति का संग्रह तथा आपत्तियों का प्रतीकार चौर्य या हिंसादि कृत्यों के कारण पापों के द्वारा प्राप्त सम्पत्ति कारणभूत लक्ष्मीव्रतादि पुण्याचरणों के द्वारा अथवा अविहित या प्रतिषिद्ध काम्यकर्मों को अतिशय प्रयत्नों के द्वारा सम्पादित नहीं करे। (विहित तथा अप्रतिषिद्ध ऐसे कर्म जो अतिशय प्रयासकारी न हो-उन्हीं से सम्पत्ति का संग्रह तथा विपत्ति का प्रतीकार करना चाहिए)॥८॥ विनैव प्रतिषिद्धेन सर्वार्थान् साधयेत् सुधीः । नोपेक्षेत च भूतानां व्यसनं शक्यवारणम् ॥९॥ उत्तमबुद्धि सम्पन्न पुरुष बिना किसी प्रतिषिद्ध कर्म के आचरण के अपने तथा आचार्यादि के सभी अभीष्ट अर्थों की सिद्धि करे। तथा असद्भूत चेतन के जो स्वयं के द्वारा निवारण योग्य व्यसन (कष्ट विपत्तियां) की उपेक्षा न करे (अर्थात् शक्य भूतादि व्यसनों की संभव विपत्तियों को स्वयं ही दूर करने का उद्यम करे) किन्तु पूज्य गुरु आदि सत्पुरुषों की अशक्य विपत्तियों के निवारणार्थ स्वयं के अतिशय प्रयास के द्वारा भी निवारण किया जाना उचित है॥९॥ न विषज्ज्वरभूतादिहरणं स्तम्भनादि च । नाद्भुतानि तथान्यानि साधयेत् सत्वसंश्रयः ॥१०॥ वह सत्वादि का आश्रय या शक्ति को प्राप्त कर उसके द्वारा न सर्पादि के विष या ज्वरादि व्याधि, ब्रह्मराक्षस आदि का मन्त्रों से निवारण, अग्नि तथा जल का

७० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता स्तम्भन, उच्चाटन आदि अन्य अद्भूत कर्मों की साधना न करे॥१०॥ न विपत्तिषु वैकल्यं नोदयेषु समुन्नतिम् । न कामेषु प्रसक्तिञ्च भजेदच्युतमानसः ॥११॥ वह विपत्ति के अवसर पर अधीरता (वैकलव्य) तथा उदय एव उन्नति की दशा में उन्नतभाव न रखे। वह भोगादि में अतिशय संगभाव भी न रखकर एकाग्रमन से स बिना स्थितियों के प्रभावों के श्री अच्युत का भजन करता रहे॥११॥ विनिन्दितः प्रशस्तो वा विमतः सम्मतोऽपि वा । विलुप्तोऽभ्यर्चितो वापि विक्रियेत न तत्ववित् ॥१२॥ वह तत्वभूत श्रीविष्णु का स्मरण तथा ज्ञान रखते हुए अपनी दुर्जनों के द्वारा निन्द के किये जाने या सद्गुणों के कारण स्तुति किये जाने, किसी के अविश्वास से चाहने पर अथवा किसी के विश्वासपात्र हो जाने की स्थिति में, किसी से अपमानित (विलप्त) अथवा आदर प्रदान करने की दशा में (को प्राप्त करने पर) हर्ष य शोकादि विकारों को प्राप्त न करे॥१२॥ न च क्रियान्तरङ्गाणां नायस्येदप्यसम्भवे । हानिं निवेद्य देवाय मनसैव प्रपूरयेत् ॥१३॥ वह अपने इष्टदेव की अर्चना में अपेक्षित द्रव्यों के सम्भव या प्राप्त न होने प अधिक प्रयास न करे या बिल्कुल ही न मिलने पर अधिक प्रयास न करे या बिल्कु ही न मिलने पर दुष्करायास भी न करते हुए इष्टदेव को उस पदार्थ का अभा निवेदित करते हुए केवल उस पदार्थ को मन से निवेदित कर दे (तथा वह न प्राप्त हो वाले पदार्थों की मानसिक भाव से पूर्ति कर लेवे)॥१३॥ वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि सर्वाण्यस्खलितः शुचिः । प्रवृत्तेः कारणञ्चात्र कामक्रोधादिकं त्यजेत् ॥१४॥ वह पवित्रभाव में स्थित रहते हुए बिना किसी अर्चनादि की त्रुटि करते हुए सभ निषिद्ध कार्यों तथा पदार्थों का परित्याग कर दे तथा इन प्रतिषिद्धों में अपनी प्रवृ जाने के कारणभूत काम तथा क्रोधादि की वृत्तियों का भी वह परित्याग क देवे॥१४॥ अगम्यागमनं हिंसामभक्ष्याणाञ्च भक्षणम् । असत्यवचनं स्तेयं तद्गत्सङ्गाँश्च वर्जयेत् ॥१५॥ वह परदारादि अगम्यगमन, हिंसादि कर्मों, अभक्ष्यपदार्थों का भक्षण, अस सम्भाषण जैसे कर्मों, चोरी आदि दुष्कर्मों (पापाचरण) को तथा ऐसे कार्यों करनेवालों की संगति का भी परित्याग कर दे॥१५॥

हिन्दीटीकासहित ७१ पातकानि समस्तानि गुरूणि च लघूनि च । विभोः कालुष्यकारीणि मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥१६॥ वह गुरु तथा लघु रूपवाले सभी पातकों को भी जो इष्टदेव के प्रति मन में कलुषता उत्पन्न करते हो तो ऐसे कार्यों की मन से भी चिन्तना छोड़ देवे॥१६॥ इति विहिताचार विरुद्धवर्जन ज्ञानन्तु स्वपरोपायफलान्वयविरोधिनाम् । अन्यथा विपरीतं वा ज्ञानं हानिकरं परम् ॥१७॥ वह ऐसे ज्ञान को (दृष्टि को) जिसमें प्रत्यगात्म स्व तथा प्राप्य ब्रह्म के उपाय, फल तथा सम्बन्ध के विरोधि अन्यथाज्ञान या विपरीतज्ञान को अतिशय हानिकारक समझे॥१७॥ छन्दांसि सरहस्यानि दिव्यशास्त्रान्विताः स्मृतीः । न जातु विचिकित्सीत पुराणादि च सात्विकम् ॥१८॥ वह रहस्यों से सम्पन्न वेदों तथा उपनिषद् आदि की, दिव्य शास्त्र पंचरात्र आगम आदि तथा शास्त्रानुगत स्मृतियों की तथा सात्विक पुराणों (श्री विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवतादि) आदि की न तो निन्दा करे न व्यर्थ ही उनके वचनों पर संशय या अप्रासंगिक विवेचन ही करे॥१८॥ शरण्यमिज्यं लक्ष्मीशं सदा सेव्यमनिच्छताम् । नेच्छेद् दृष्टिं कुदृष्टीनां सुधीः श्रुत्यर्थनिर्णयात् ॥१९॥ जो परमेश शरणागत की रक्षण करने में समर्थ है तथा जिससे यज्ञादि सम्पन्न होते हैं ऐसे श्री लक्ष्मीपति की सेवा को न चाहने वाले तथा उनके ज्ञान को न रखनेवाले को वह पुराण, इतिहास, पंचरात्र तथा श्रुत्यादि के अर्थों के विनिश्चय को ध्यान में रखते हुए न चाहे और न ही संगति में रहे॥१९॥ ज्ञानं ज्ञेयञ्च तत्वेन कारणं चाच्युतं परम् । अजानद्भिर्वृथा नीतान् नाश्रयेन्न्यायविस्तरान् ॥२०॥ जिनसे श्रीहरि जाने जाते हो ऐसे ज्ञान, शास्त्ररूप, ज्ञेय तथा तात्विकभूत इस जगत् के जो कारणभूत तथा इन सभी से जो परे भी हैं वह श्री अच्युत ही हैं, यह न जानने वाले पण्डितों के साथ न्याय तथा उनके विस्तारों को व्यर्थ या बिना ही हेतु या अर्थ के

७२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता दिखलाने वाले समझ कर उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिए (परन्तु तात्त्विक¹ न्यायपरिशुद्ध ऐसी वस्तु की सहमति रखे जो कुदृष्टि से रहित हो।।२०।। प्रकृतिं पुरुषं योगं परं पाप्यञ्च माधवम् । अन्यथा मन्यमानानां स्मृतीश्च परिवर्जयेत् ॥२१॥ त्रिगुणात्मक स्वरूप वाली प्रकृति तथा चिद्विशिष्ट पुरुष के सम्बन्ध अथवा जीवात्मा परमात्म सम्बन्ध को मुक्त्युपाय से प्राप्य माधव से अन्यथा या दूसरे कार्यादि में² प्राप्य मोक्ष को बतलाने वाले सांख्य, योग दर्शन, स्मृति आदि को भी (श्रीहरि की भक्ति के तथा सिद्धान्त के प्रतिकूल समझते हुए) अनन्यभाव के प्रति बाधक समझना चाहिए॥२१॥ नाद्रियेत् पुराणादीन् राजसाँस्तामसाँस्तथा । अनीशानां परेशत्वं वृथा यत्रोपवर्ण्यते ॥२२॥ इसी तरह रजोगुण की प्रधानता तथा तमोगुण की प्रमुखता के प्रतिपादक ऐसे पुराणों को भी जिनमें ईश श्रीमन्नारायण की परमप्रभुता से भिन्न अन्य देवेश ब्रह्मादि की प्रमुखता वर्णित हो॥२२॥ तथा रुद्रेण कथितं मोहनं क्षुद्रकामदम् । तन्त्रं बहुविरुद्धञ्च तामसं परिवर्जयेत् ॥२३॥ इसी प्रकार तामस तत्व से अनुप्राणित श्रीरुद्र द्वारा कथित सामान्य एवं लौकिक इच्छाओं की पूर्ति करने तथा उन्हें प्रदान कर देने में समर्थ पाशुपतादि तन्त्रों को भी भगवन्निष्ठा में बाधक मानकर परिहार्य माने॥२३॥ अन्येषां त्रिदशादीनां स्तुतीर्मन्त्राँश्च वर्जयेत् । निबन्धनं गुणादीनां निबन्धाँश्चान्यचेतसाम् ॥२४॥ अन्य उपास्य देवगणों की स्तुति तथा उनके मन्त्रादि का भी काम्य पाठ नहीं किया जावे जिनमें उन उन देवगणों के आपदादि उद्धारक गुणों का विवरण दिया जावे तो १ यद्यपि अष्टादश स्थानों में प्रमाण से वस्तु परीक्षण हेतु न्याय का स्थान महत्वपूर्ण हैं फिर भी ऐसे न्याय का कुदृष्टि को छोड़कर ग्रहण करना निरापद है। ऐसा न्याय परिशुद्ध तथा परमेश की ऐकान्त्यभावना में सहायक ही होता है अतः इसे स्वीकार करना उचित है। २ इसका समर्थन-'या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फला ज्ञेया तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।' यह मनूक्तवचन भी करता है कि राजस तथा तामस मूलक स्मृतियों के विधानों का ग्रहण उपादेय नहीं। कपिलादि की प्रणीत सांख्यदर्शन की तथा योग का भी बादरायण ने-अतएव 'एतेन योगः प्रत्युक्त' जैसे सूत्र से प्रत्याख्यान किया था। इसी तथ्य को यहाँ उपर्युक्त कारिका में दिखलाया गया है।

हिन्दीटीकासहित ७३ इष्ट प्रभुनारायण से मन को हटानेवाले हो तो उनका भी परित्याग करे॥२४॥ बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं विपरीतमनर्थकम् । मतं न सौगतादीनां मनसाऽपि विचिन्तयेत् ॥२५॥ तथा इसी प्रकार वेदबाह्य तथा वेदादि के विपरीत रहने वाले कुतर्ककारी तमोनिष्ठ तथा व्यर्थ के विषयों का विवेचन करनेवाले सौगतादि (बौद्धादि) धर्म तथा दर्शनादि के मत हैं उनका अतःकरण को लगाकर चिन्तन नहीं करना चाहिए॥२५॥ कामं मतानि चान्येषां पश्येत् प्राज्ञोऽपनुत्तये । न च तेषु प्रसज्येत नानुमन्येत नाभ्यसेत् ॥२६॥ चाहे बुद्धिमान् पण्डित वेद बाह्य मत के प्रतिपादक धर्मग्रन्थों तथा दर्शनों को उनके खण्डन के लिये ही देखें तथा उनका अध्ययन करे किन्तु वह उन उन मतों में मन को न लगाये और न उनके तर्कों का अनुमोदन मन में लाये और उनका आदरपूर्वक अध्ययन ही करे॥२६॥ इति दृष्ट-विरोधाधिकार भक्तिविरुद्धवर्जन अपचारांश्च विविधान् हरेर्यत्नेन वर्जयेत् । महानपायो माध्यस्थ्यं किम्पुनर्विपरीतता ॥२७॥ श्रीहरि के विषय में अन्य मतों के द्वारा आक्षेपों से पूर्ण विविध चिन्तनों तथा तर्कों का प्रयत्नपूर्वक निराकरण करना चाहिए। इस कार्य में मध्यस्थता या तटस्थता और भी अनर्थकारी होती है फिर विपरीत भाव रखना तो और भी अनर्थकारी होगा॥२७॥ विष्ण्वर्चारहिते ग्रामे विष्ण्वर्चारहिते गृहे । न कुर्यादन्नपानादि न तत्र दिवसं वसेत् ॥२८॥ ऐसे ग्राम में जहाँ श्रीविष्णु का अर्चन न होता हो (जहाँ श्रीविष्णु का कोई स्थान या मन्दिर न हो), जिस घर में श्रीविष्णु की उपासना तथा नित्य अर्चन न होता हो वहां अन्न तथा जल ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा ऐसे स्थान पर एक दिन भी निवास या विश्राम न किया जावे॥२८॥ न च मन्त्रोपजीवी स्यान्नचाप्यर्थोपजीविकः । नानिवेदितभोगश्च न च निन्द्यनिवेदकः ॥२९॥

७४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीहरि का प्रपत्तिशील भक्त अपनी जीविका मन्त्रों के पाठ तथा जप करके न चलावे और न ही देवपूजक होकर रहे। वह श्रीहरि को बिना अर्पण किये भोजन करनेवाला और भगवान् को प्रसादरूप में नित्यवर्ज्य खाद्यादि को अर्पण करनेवाला भी नहीं होना चाहिए॥२९॥ वर्ज्याः पाखण्डशैवाद्यैः स्थापिताश्च तथार्चिताः । अन्यत्र च स्वतो बद्धा नियमात् सर्वदेवताः ॥३०॥ ऐसी भगवत् प्रतिमाएं जिन्हें वैदिक ब्राह्मण पाखण्डजन तथा अन्य शैवादि ने स्थापित तथा पूजित की हो उनकी भी पूजनादि से दूर रहना चाहिए। नियमतः तु कर्मवश सभी देवता भगवत् शरीरभाव के बिना उपासना के योग्य नहीं माने जाते हैं॥३०॥ गृहे यस्यान्यदेवार्चा व्यक्तो न च जनार्दनः । न तस्य किञ्चिदश्नीयादपि वेदान्तवेदिनः ॥३१॥ जिस पुरुष के घर में अन्य देवगण की पूजन में श्रीविष्णु का पूजन व्यक्त रूप में नहीं होता हो तो यदि वह वेद या वेदान्तवेत्ता विद्वान् भी (अनेक यज्ञादिं का कर्त्ता विद्वान् ब्राह्मण भी) हो तो उसके यहाँ पर (कुछ भी) अन्नादि ग्रहण नहीं करना चाहिए॥३१॥ वर्जयेदन्यदेवानामाल्याद्युपसर्पणम् । तथा गोपुरहर्म्यार्चयानास्त्राद्यवलोकनम् ॥३२॥ इसी प्रकार श्रीविष्णु के अतिरिक्त अन्य देवताओं के मन्दिरों में दर्शनार्थ भक्ति से न तो जाना ही चाहिए और न उनके गोपुर, निवास भवन तथा रथोत्सवादि का अवलोकन या उनके त्रिशूलादि अस्त्रों की अर्चना ही करना चाहिए॥३२॥ गीतवादित्रघण्टादिशब्दानां श्रवणं तथा । कर्माणि च समस्तानि बाह्यान्याभ्यन्तराणि च ॥३३॥ उनके मन्दिर में होनेवाले गीत, वादन तथा घण्टादि शब्दों का श्रवण तथा वहाँ सम्पन्न होनेवाले अर्चनादि समस्त कर्म जो मन्दिर के अन्दर किये जाएं या जो मन्दिरों के बाहर हो रहे हों तो उनको भी नहीं देखना या कार्यों में सम्मिलित होना ही उचित है॥३३॥ द्रव्याणां भुक्तभोगानां स्वीकारं स्पर्शनन्तथा । भोगादीनां तदर्थञ्चाप्यर्थनां प्रतिपादनम् ॥३४॥ उन अन्य देवताओं के द्वारा भुक्त या अर्पित (प्रसादादि) अन्यान्य अन्नादि का स्वीकार करना उनका स्पर्श करते हुए या उनके वन्दनादि में झुक कर पृथ्वी को

हिन्दीटीकासहित ७५ स्पर्श करना या उनके देवताओं को अर्पित किये जानेवाले भोग्य पदार्थों (अन्नादि पक्व या अपक्व पदार्थों) को समर्पित करना भी उचित नहीं है॥३४॥ प्रणामं स्पर्शनं सेवां स्मरणं कीर्तनं तथा । निन्दाञ्च तद्भक्तिपराण्यप्येतानि विवर्जयेत् ॥३५॥ इसी प्रकार उन सभी अन्य देवताओं को प्रणाम करने, उनका श्रद्धा से स्पर्श करने, उनके मन्दिरों में सम्मार्जन या सफाई के लिये उनके स्थानों को लीपने पोतने की सेवा करने, उनके स्वरूप का स्मरण या स्तुति आदि करने या अन्य देवगण को भक्ति के साथ मन से प्रणाम करने जैसी क्रियाएं भी उचित नहीं है॥३५॥ इति भक्तिविरुद्धाधिकारः अथ लक्ष्म विरुद्धाधिकार शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यैश्चिह्नैः प्रियतमैर्हरेः । रहितः सर्वधर्मेभ्यः प्रच्युतो नैनमाप्नुयात् ॥३६॥ जो श्रीनारायण के अतिशय प्रिय शङ्ख, चक्र तथा उर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्ष्म कहे गये हैं उनसे यदि कोई दीक्षित भक्त रहित है तो वह सभी धर्मों के अधिकारों से पतित होकर अन्त में श्रीनारायण को प्राप्त करने के योग्य नहीं रह जाता है॥३६॥ चक्राम्बुजगदाशार्ङ्ग- खड्गेभ्योऽन्यैर्हरेरपि । न लक्षणैर्दहेच्चाङ्गानान्यदग्धोऽर्हति क्रियाम् ॥३७॥ श्रीनारायण के लक्ष्मभूत जो शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग और खड्ग है, इन पांचो के अतिरिक्त उनके अन्य किसी लक्ष्म से दग्ध पुरुष उनकी अर्चानादि क्रिया के योग्य किङ्करभाव भी प्राप्त करने के योग्य नहीं है॥३७॥ धारयेन्नान्यचिह्नानि विशेषेणाङ्कनं क्वचित् । धारणादन्यचिह्नानां महदाप्नोति किल्विषम् ॥३८॥ अन्य देवगण के चिन्हों का तथा विशेषकर शरीर पर तप्त मुद्रा के दाह चिन्हों को धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन अन्य देवताओं के चिन्हों को धारण करने (या श्रीविष्णु के ही इन चिन्हों से भिन्न किसी लक्ष्मकी धारण करने) पर अतिशय किल्विष (ऐकान्त्यभंगरुपदोष या उसके कारण आपराधिकता) को प्राप्त करता है॥३८॥

७६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अन्यचिह्नाङ्कितान् मर्त्यान् दूरतः परिवर्जयेत् । पयोऽस्थिचर्ममांसादि पशूनाञ्चातिगर्हितम् ॥३९॥ जो मनुष्य या प्राणी श्रीनारायण के शंखचक्रादि चिह्नों से अंकित नहीं हो तो उसका परित्याग करना चाहिए तथा ऐसे पशुओं का दूध अस्थि, चर्म तथा मांसादि की भी (जो अतिशय अपवित्र हैं उन्हें भी) दूर से ही परित्याग करे॥३९॥ वृक्षादीनाञ्च सर्वेषामकर्मण्यं फलादिकम् । अन्यचिह्नाङ्कितञ्चैव गृहक्षेत्रादिकं त्यजेत् ॥४०॥ ऐसे वृक्षादि जो अन्य चिह्नों से अंकित वृक्ष तथा लता आदि हों तो उनके फल तथा पत्रादि को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा इसी प्रकार अन्य चिह्नांकित गृह तथा क्षेत्रादि के रहने पर उनका भी परित्याग करना योग्य है॥४०॥ वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं ह्रस्वं दीर्घन्ततं तनुम् । वक्रं स्वरूपं बद्धाग्रं छिन्नमूलं पदच्युतम् ॥४१॥ अशुभं रूक्षमासक्तं तथानङ्गुलिकल्पितम् । विगन्धमपसंख्यञ्च पुण्ड्रमाहुरनर्थकम् ॥४२॥ त्रिपुण्ड्र- स्वरूपादि विचार- इसी प्रकार जो पुण्ड्र (तिलक) केवल मालाकार हो, तिरछे आकार में हो, छिद्र हीन हो, छोटे आकार का हो या बहुत बड़े आकार का हो, अपने विस्तार से न्यून या अधिक परिमाण वाला हो, अपने टेढ़े आकार में हो, असुन्दर या सीधे आकार में न हो, दोनों भौहों के मूलभाग में न मिलता हो, अपने निर्धारित स्थान से हट गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान से हट गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान पर धारण करने का स्थान फोड़े आदि के कारण सूखा सा रहता हो, अन्य पुण्ड्र से लगा हुआ हो, जो स्वयं की (हस्त की) अंगुलियों के द्वारा किया हुआ न हो, जो किसी गन्ध से रहित हो, निर्धारित संख्या के अनुरूप धारण किया हुआ न हो तो ऐसा 'पण्ड्र' धारण करने पर भी अनर्थकारी या व्यर्थ समझना चाहिए॥४१-४२॥ न चन्दनादिभिर्गन्धैः कर्तव्यं न च भस्मना । न मृद्भिश्वाप्रशस्ताभिरूर्ध्वपुण्ड्रं कदाचन ॥४३॥ इसे चन्दन अगर आदि गन्धों से युक्त वस्तुओं से तथा भस्म आदि के द्वारा नहीं किया जाता है तथा इसी प्रकार साधारण मिट्टी जो कि प्रशस्त न हो तो उससे भी ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करने (क्षेत्र या पर्वतादि की प्रशस्त मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र

हिन्दीटीकासहित ७७ किया जावे।)॥४३॥ तमसो भस्म रजसो गन्धः सत्वस्य मृत्तिका । तस्माद् भस्मादिभिर्नेच्छेदेकान्ती शुद्धिमात्मनः ॥४४॥ भस्म आदि पदार्थ तामसिक, गन्धयुक्त पदार्थ राजस तथा मृत्तिका सात्विक कारण वाली होती है, अतः नैष्ठिक वैष्णव (एकान्ती) आत्मशुद्धि के कारणभूत तिलक को स्वयं करने में भस्मादि पदार्थों की इच्छा न करे या उनका उपयोग न करे (किन्तु सात्विक मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र स्वयं सम्पादित करे)॥४४॥ रौद्रव्रतादिनियतैस्तथा मोहनतान्त्रिकैः । शवेन्धनकरीषादिभस्मभिः कर्म साध्यते ॥४५॥ क्योंकि रुद्रादि के उपासनादि व्रतों में उपयोग की जाने वाली तथा मोहनादि कर्मों में तान्त्रिकादिजन के उपयोग में रहनेवाली भस्म जो कि शव, ईन्धन तथा करीषादि (सूखे गोवरों) से प्राप्त होती है तथा जिससे तन्त्रादि कर्मों की साधना की जाती है। अतः ऐसी निषिद्ध भस्म से कभी ऊर्ध्वपुण्ड्र नहीं किया जावे॥४५॥ मूलजं गन्धसारादि मृगनाभ्यादि जीवजम् । मनःशिलादि धातूत्थं त्रयं पुण्ड्रेषु कामिनाम् ॥४६॥ किसी वृक्ष की जड़ से प्राप्त सुगन्धित द्रव्य, किसी प्राणी के शरीर से प्राप्त होने वाले कस्तूरी आदि द्रव्य तथा धातु या पत्थर से निकलने वाले मनःशिला (मैनसिल) जैसे सुगन्धित द्रव्य इन तीनों से पुण्ड्र किसी पदार्थादि के कामीजन तिलकरूप में लगाते हैं। (अतः इनसे भी ऊर्ध्वपुण्ड्र नहीं करना चाहिए)॥४६॥ कुर्याद् रक्षाविधानञ्च नान्यैः पञ्च विना मृदः । गोरजो गोकरीषञ्च चूर्णं हारिद्रमेव च ॥४७॥ विहित तथा ग्राह्य पांच मृदा (मिट्टियों) को छोड़कर तथा गोरज, गोबर की राख, हरिद्रा के चूर्ण तथा पांच प्रकार की मृत्तिका को छोड़कर अन्य भस्मादि से रक्षाविधान कर्म नहीं करना चाहिए॥४७॥ न च भागवतः कुर्यादूर्ध्वपुण्ड्रममृत्तिकम् । धारणादेव मृत्स्नायाः प्रीयते धरणीधरः ॥४८॥ बिना विहित सात्विक मृत्तिका के अन्य किसी वस्तु से भागवत वैष्णव ऊर्ध्वपुण्ड्र न करे क्योंकि मृत्तिका के तिलक मात्र के धारण से धरणीधर श्रीविष्णु तुष्ट हो जाते हैं॥४८॥ यः प्रपन्नोऽपि लक्ष्मीशं न चक्रादिभिरङ्कितः । न वहत्यूर्ध्वपुण्ड्रं वा नैकान्त्यन्तस्य विद्यते ॥४९॥ ४

७८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जो वैष्णव श्रीविष्णु के प्रति प्रपत्ति अर्पित करने के पश्चात् चक्रादि से अंकित न तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करता हो तो उसकी श्रीहरि के प्रति एकान्तिक निष्ठा रहेगी (अतः उसे ऊर्ध्वपुण्ड्रादि अवश्य धारण करना चाहिए) ॥४९॥ राजसाँस्तामसाँश्चैव व्यपदेशान् विवर्जयेत् । ध्रुवं व्यपेति भक्तोऽपि व्यपदेशैरसात्विकैः ॥५०॥ अतएव प्रपन्न वैष्णवों को राजस तथा तामस पदार्थों से तिलकादि के धारण कार्यों को नहीं करना चाहिए क्योंकि भक्त होने पर भी सात्विक पदार्थों से र होनेवाला वैष्णव विशेषरूप में पतित हो जाता है॥५०॥ सात्त्विकं नाम शुद्धानामशुद्धानान्तु राजसम् । बाह्यादितन्त्रसिद्धानां देवादीनान्तु तामसम् ॥५१॥ जो अनन्यभाव से इष्ट की अर्चना करते हो, ऐसे शुद्धजन का सात्विक अशुद्ध अन्यभावादि से इष्ट की अर्चनादि करनेवाले राजस तथा अवैदिक विधियों तान्त्रिक तथा उनके द्वारा इष्ट की अर्चना करनेवालों का 'तामस' नाम कहा है॥५१॥ दास्यं हि नामकरणमपि तद्वाचकैर्विना । गुणकर्मादिभिः स्वैश्च रूढं श्लाघ्यैः सनातनम् ॥५२॥ इसी प्रकार श्रीभगवद्दास के बोधक शब्दों के बिना अशुद्धार्थ बोधक तथा अवै नाम भी न रखें जावें। यहां शुद्ध तथा वैदिक नाम के अतिरिक्त भी अपने शू दास्य कर्म जो गुण तथा कर्मों के बोधक हों तो ऐसे रूढ़ तथा संकेतितार्थ वाले रखे जाने उचित हैं॥५२॥ युग्मैर्विवर्त्तितं रौद्रमयुग्मैर्ब्राह्ममुच्यते । उभयैस्तैर्व्यतिस्यूतमयुग्मैर्वैष्णवं गुणैः ॥५३॥ उपवीतं सदा ब्राह्मं वैष्णवं कटिबन्धनम् । उभयं धारयेद् रौद्रं साधयन् कर्म तामसम् ॥५४॥ जो युग्म भाव (दो तन्तुओं) से पूर्ण हो उसे 'रौद्र' तथा अयुग्म या तीन से पूर्ण तथा इन दोनों को मिलाकर गुणोंसे बँटा हुआ हो वह वैष्णव 'उपवीतक' कहलात इनमें सदा ब्राह्म तथा वैष्णव उपवीत को कटिबन्ध प्रदेश तक धारण करे इन उपवीतों को धारण करना चाहिए तथा तामस कर्मों की साधना करते समय उपवीत धारण करना चाहिए॥५३-५४॥ तामसं नग्नमेकन्तु राजसं वसनद्वयम् । कौपीनसहितं तत्तु सात्विकं मुनिभिः स्मृतम् ॥५५॥

हिन्दीटीकासहित ७९ शरीर पर एक वस्त्र का धारण करना 'तामस' दो वस्त्रों का धारण करना 'राजस' तथा कौपीन सहित दो वस्त्रों का धारण करना 'सात्विक' होने से सात्विक विधान से वस्त्रधारण करना अधिक उचित है॥५५॥ दर्भाक्षसूत्रवस्त्राङ्कनामपुण्ड्रविभूषणम् । अन्यत्तु तामसं सर्वं विशेषेण विवर्जयेत् ॥५६॥ इसी तरह जो तामस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले दर्भ, रुद्राक्ष, अन्य चिन्हादि से अंकित वस्त्रादि अथवा सूत्रादि या अयुग्म गुण (सूत्रों) से निर्मित कटिबन्धादि तथा त्रिशूलादि से या देवनामादि से अङ्कित अशुद्ध पुण्ड्रादि भूषण या त्रिशूलादि आकार के भूषण तथा इनके अतिरिक्त भी ऐसे तामस उपकरणों को ध्यान देते हुए छोड़ना उचित है॥५६॥ अन्यतन्त्रैकसिद्धानि काम्यानि विविधानि च । द्रव्यनामादिरूपाणि लक्षणानि विवर्जयेत् ॥५७॥ अन्य आगमों के द्वारा विहित काम्य विविध कर्मों को एवं तन्त्रमात्र में व्यवहृत पारिभाषिक द्रव्यादि तन्त्रसिद्धरूप वाले द्रव्य तथा उनके विशेष आकारों (के बोधक चिन्हादि ) का भी व्यवहार न करे॥५७॥ इति लक्ष्म विरुद्धाधिकारः गुरोरपह्नवात् त्यागात् साम्याद्विस्मरणादपि । लोभमोहादिभिश्चान्यैरपचारैर्विनश्यति ॥५८॥ सत्सेवाविरुद्ध अपने गुरु के नामादि को न बतलाते हुए, उनका परित्याग करने उनकी बराबरी या तुलना करने या उन्हें विस्मृत कर देने के कारण लोभ, मोह आदि गुरु के वैभव का ज्ञान न रखकर उनके प्रति उपचार या उपेक्षाभूत तिरस्कार के भाव रखने पर शिष्य का पतन होता है॥५८॥ विशेषाद् विष्णुभक्तेषु दम्भं लोभं नृशंसताम् । क्रोधमीर्ष्यां मदं मानं साम्यञ्च परिवर्जयेत् ॥५९॥ विशेषरूप में जो विष्णुभक्त हैं उन्हें ही बिना धर्म का आचरण किये हुए उनको बतलानेकी मिथ्या घोषणा के दम्भों, लोभ करना, किसी दीन के प्रति करुणा न रखना, क्रोध करना तथा दूसरों से समानता को देखने का भाव भी नहीं रखना चाहिए॥५९॥

८० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वैष्णव के दो प्रभेद— स एकान्त्यन्यविमुखो हरिं सर्वेश्वरं प्रभुम् । यः समाश्रयते किञ्चित्फलमभ्यर्थयन्नरः ॥६०॥ जो भक्त मनुष्य दूसरे देवताओं से हटकर श्रीविष्णु के पाद सेवन भक्ति या उन ज्ञान के प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हुए सर्व जगत के अधिपति श्रीहरि प्रपत्ति या आश्रय को ग्रहण करता हो तो वह 'एकान्ती' वैष्णव कहला है॥६०॥ न्यस्ताशेषभरः श्रीशे यस्तु दास्यैकजीवितः । स एष परमैकान्ती द्वावेतौ वैष्णवौ स्मृतौ ॥६१॥ तथा जो भक्त नर अपने आत्मा के समस्त भर को श्रीहरि के प्रति अर्पित कर न्यस्त करता हो और उनके दासभाव के अतिरिक्त अन्य सत्तामय स्थिति की काम नहीं रखता हो तो ऐसा पुरुष 'परमैकान्ती' वैष्णव कहलाता है॥६१॥ अन्ये त्ववैष्णवाः सर्वे मनुष्या जिह्मदृष्टयः । असतस्तन् विदुर्दैवास्तैः सतां नास्ति सङ्गमः ॥६२॥ इन दो प्रकार के वैष्णवो को छोड़कर शेष सभी कुटिल बुद्धि के कारण अवैष्णव म गये हैं, जिन्हें देवगण असन्त भूत मानकर उनके साथ सन्तों के समागम को स्वीक नहीं करते हैं॥६२॥ अवैष्णवात् स्वधर्मस्थाद् वैष्णवः स्खलितोऽपि सन् । श्रेयानेव हि मन्तव्यो मूलात् स न परिच्युतः ॥६३॥ जो अपने वर्ण तथा आश्रम धर्मों मे अवस्थित होने वाले किन्तु अवैष्णव हों उन अपेक्षा अपने धर्म तथा कर्त्तव्यों से किञ्चित् स्खलित हो जानेवाला भी यदि वैष्णव तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वह अपनी मूलस्थिति से पतित न है॥६३॥ स्वेशसम्बन्धविज्ञानं मूलमन्याः क्रियाः पुनः । तस्य शाखाः प्रशाखाश्च काश्च ता मूलवर्जिताः ॥६४॥ इसका कारण अपने इष्ट देव आराध्य श्रीविष्णु तथा उनके साथ अपने दास्यभ का उसे ज्ञान है जो मूल माना जाता है तथा अन्य कार्य इसी मूल की शाखा, प्रशा तथा उपशाखाएं होती हैं ये अपने मूल से रहित होने से अर्थ नहीं (होत रखती है॥६४॥ बाह्यानां जिह्मदृष्टीनामज्ञानां संशयात्मनाम् । नालोकमपि कुर्वीत न च तैः किञ्चिदाचरेत् ॥६५॥