संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६१ जपयज्ञं ततः कुर्याद्गायत्रीं वेदमातरम्। त्रिविधो जपयज्ञः स्यात्तस्य भेदं निबोधत ॥ ७८ वाचिकश्च उपांशुश्च मानसस्त्रिविधः स्मृतः। त्रयाणां जपयज्ञानां श्रेयः स्यादुत्तरोत्तरम् ॥ ७९ यदुच्चनीचस्वरितैः स्पष्टशब्दवदक्षरैः। शब्दमुच्चारयेद्वाचा जपयज्ञः स वाचिकः ॥ ८० शनैरुच्चारयेन्मन्त्रमीषदोष्ठौ प्रचालयेत्। किंचिन्मन्त्रं स्वयं विन्द्यादुपांशुः स जपः स्मृतः ॥ ८१ धिया यदक्षरश्रेण्या वर्णाद्वर्णं पदात्पदम्। शब्दार्थचिन्तनं ध्यानं तदुक्तं मानसं जपः ॥ ८२ जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति। प्रसन्ना विपुलान् भोगान्दद्यान्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८३ यक्षरक्षःपिशाचाश्च ग्रहाः सूर्यादिदूषणाः। जापिनं नोपसर्पन्ति दूरादेवापयान्ति ते ॥ ८४ ऋक्षादिकं परिज्ञाय जपयज्ञमतन्द्रितः। जपेदहरहः स्नात्वा सावित्रीं तन्मना द्विजः ॥ ८५ सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्। गायत्रीं यो जपेन्नित्यं न स पापैर्हि लिप्यते ॥ ८६ अथ पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा भानवे चोर्ध्वबाहुकः। उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ॥ ८७ प्रदक्षिणमुपावृत्य नमस्कुर्याद्दिवाकरम्। स्वेन तीर्थेन देवाद्दीनद्भिः संतर्पयेद्बुधः ॥ ८८ देवान् देवगणांश्चैव ऋषीन्ऋषिगणांस्तथा। पितॄन् पितृगणांश्चैव नित्यं संतर्पयेद्बुधः ॥ ८९ स्नानवस्त्रं ततः पीड्य पुनराचमनं चरेत्। दर्भेषु दर्भपाणिः स्याद्ब्रह्मयज्ञविधानतः ॥ ९० प्राङ्मुखो ब्रह्मयज्ञं तु कुर्याद्बुद्धिसमन्वितः। ततोऽर्धं भानवे दद्यात्तिलपुष्पजलान्वितम् ॥ ९१ तत्पश्चात् वेदमाता गायत्रीका जप करते हुए जपयज्ञ करे। जपयज्ञ तीन प्रकारका होता है; उसका भेद बताते हैं, आप लोग सुनें। वाचिक, उपांशु और मानस—तीन प्रकारका जप कहा गया है। इन तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर जप श्रेष्ठ है, अर्थात् वाचिक जपकी अपेक्षा उपांशु और उसकी अपेक्षा मानस जप श्रेष्ठ है। अब इनके लक्षण बताते हैं। जप करनेवाला पुरुष आवश्यकतानुसार ऊँचे, नीचे और समान स्वरोंमें बोले जानेवाले स्पष्ट शब्दयुक्त अक्षरोंद्वारा जो वाणीसे सुस्पष्ट शब्दोच्चारण करता है, वह 'वाचिक जप' कहलाता है। इसी प्रकार जो तनिक-सा ओठोंको हिलाकर धीरे-धीरे मन्त्रका उच्चारण करता है और मन्त्रको स्वयं ही कुछ-कुछ सुनता या समझता है, उसका वह जप 'उपांशु' कहलाता है। बुद्धिके द्वारा मन्त्राक्षरसमूहके प्रत्येक वर्ण, प्रत्येक पद और शब्दार्थका जो चिन्तन एवं ध्यान किया जाता है, वह 'मानस जप' कहा गया है। जपके द्वारा प्रतिदिन जिसका स्तवन किया जाता है, वह देवता प्रसन्न होता है और प्रसन्न होनेपर वह विपुल भोग तथा नित्य मोक्ष-सुखको भी देता है। यक्ष-राक्षस-पिशाच आदि और सूर्यादि देवताओंको दूषित करने-वाले अन्य (राहु-केतु आदि) ग्रह भी जप करनेवाले पुरुषके निकट नहीं जाते, दूरसे ही भाग जाते हैं॥ ७८-८४॥ द्विजको चाहिये कि वह आलस्यका त्याग करके प्रतिदिन तारोंको देखकर अर्थात् तारोंके रहते-रहते स्नान करके, गायत्रीके अर्थमें मन लगा गायत्री-मन्त्रका जप करे। जो द्विज अधिक-से-अधिक एक हजार, साधारणतया एक सौ अथवा कम-से-कम दस बार प्रतिदिन गायत्रीका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता ॥ ८५-८६ ॥ इसके बाद सूर्यदेवको पुष्पाञ्जलि अर्पित करके अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर 'ॐ उदुत्यं जातवेदसम्....' तथा 'ॐ तच्चक्षुर्देवहितम्....' इन मन्त्रोंका जप करे। फिर प्रदक्षिणा करके सूर्यदेवको प्रणाम करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष प्रतिदिन देवतीर्थसे (उँगलियोंद्वारा) देवताओंका तर्पण करे। विज्ञ पुरुषको देवताओं और उनके गणोंका, ऋषियों और उनके गणोंका तथा पितरों और पितृगणोंका प्रतिदिन तर्पण करना चाहिये। तदनन्तर स्नानके बाद उतारे हुए वस्त्रको निचोड़कर पुनः आचमन करे। फिर हाथमें कुश लेकर कुशासनपर बैठ जाय और ब्रह्मयज्ञकी विधिके अनुसार पूर्वाभिमुख हो बुद्धिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ (वेदका स्वाध्याय) करे। तदनन्तर खड़ा होकर तिल, फूल और जलसे युक्त अर्घ्यपात्रको अपने मस्तक तक In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
[संस्कृत श्लोक]
उत्थाय मूर्धपर्यन्तं हंसः शुचिषदित्यृचा। जले देवं नमस्कृत्य ततो गृहगतः पुनः॥ ९२ विधिना पुरुषसूक्तेन तत्र विष्णुं समर्चयेत्। वैश्वदेवं ततः कुर्याद्वलिकर्म यथाविधि॥ ९३ गोदोहमात्रमतिथिं प्रतीवीक्षेत वै गृही। अदृष्टपूर्वमतिथिमागतं प्राक् समर्चयेत्॥ ९४ आगत्य च पुनर्द्वारं प्रत्युत्थानेन साधुना। स्वागतेनाग्नयस्तुष्टा भवन्ति गृहमेधिनाम्॥ ९५ आसनेन तु दत्तेन प्रीतो भवति देवराट्। पादशौचेन पितरः प्रीतिमायान्ति तस्य च॥ ९६ अन्नाद्येन च दत्तेन तृप्यतीह प्रजापतिः। तस्मादतिथये कार्यं पूजनं गृहमेधिना॥ ९७ भक्त्या च भक्तिमान्नित्यं विष्णुमभ्यर्च्य चिन्तयेत्। भिक्षां च भिक्षवे दद्यात्परिव्राड्ब्रह्मचारिणे॥ ९८ आकल्पितान्नादुद्धृत्य सर्वव्यञ्जनसंयुतम्। दद्याच्च मनसा नित्यं भिक्षां भिक्षोः प्रयत्नतः॥ ९९ अकृते वैश्वदेवे तु भिक्षौ भिक्षार्थमागते। अवश्यमेव दातव्यं स्वर्गसोपानकारकम्॥ १०० उद्धृत्य वैश्वदेवान्नं भिक्षां दत्त्वा विसर्जयेत्। वैश्वदेवाकृतं दोषं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम्॥ १०१ सुवासिनीः कुमारीश्च भोजयित्वाऽऽतुरानपि। बालवृद्धांस्ततः शेषं स्वयं भुञ्जीत वै गृही॥ १०२ प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि मौनी च मितभाषणः। अन्नं पूर्वं नमस्कृत्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ १०३ पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात्समन्त्रेण पृथक् पृथक्। ततः स्वादुकरं चान्नं भुञ्जीत सुसमाहितः॥ १०४
[हिन्दी अनुवाद]
ऊँचे उठा ‘हंसः शुचिषत्·····’ इस ऋचाका पाठ करते हुए सूर्यदेवके लिये अर्घ्य दे। फिर जलमें स्थित वरुणदेवको नमस्कार कर पुनः घरपर आ जाय और वहाँ पुरुषसूक्तसे भगवान् विष्णुका विधिवत् पूजन करे। तदनन्तर विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करे॥ ८७—९३॥ इसके बाद जितनी देरमें गौ दुही जाती है, उतनी देरतक द्वारपर अतिथिके आनेकी प्रतीक्षा करे। यदि कई अतिथि आ जायँ तो उनमेंसे जिसे पहले कभी न देखा हो, उसका सम्मान सबसे पहले करना चाहिये। द्वारपर आकर अतिथिकी खड़े होकर भलीभाँति अगवानी करनेसे गृहस्थके ऊपर दक्षिण, गार्हपत्य और आहवनीय—तीनों अग्नि प्रसन्न होते हैं; आसन देनेसे देवराज इन्द्रको प्रसन्नता होती है, अतिथिके पैर धोनेसे उस गृहस्थके पितृगण तृप्त होते हैं, अन्न आदि भोज्य पदार्थ अर्पण करनेसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं। इसलिये गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वह अतिथिका पूजन करे॥ ९४—९७॥ इसके पश्चात् भक्तिमान् पुरुष प्रतिदिन भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करके उनका चिन्तन करे। फिर संन्यासी, विरक्त एवं ब्रह्मचारीको भिक्षा दे। सब प्रकारसे तैयार किये हुए अन्नमेंसे समस्त व्यञ्जनोंसे युक्त कुछ अन्न निकालकर प्रतिदिन यत्नपूर्वक भिक्षु (संन्यासी)-को देना चाहिये। बलिवैश्वदेव करनेके पहले भी यदि भिक्षु भिक्षाके लिये आ जाय तो उसे अवश्य भिक्षा देनी चाहिये; क्योंकि यह दान स्वर्गमें जानेके लिये सीढ़ीका काम देता है। विश्वेदेवसम्बन्धी अन्नमेंसे लेकर भिक्षुको भिक्षा देकर उसे विदा करे। वैश्वदेव कर्म न करनेके दोषको वह भिक्षु दूर कर सकता है। फिर सुवासिनी (सुहागिन) और कुमारी कन्याओं तथा रोगी व्यक्तियोंको और बालकों एवं वृद्धोंको पहले भोजन कराके उनसे बचे हुए अन्नको गृहस्थ पुरुष स्वयं भोजन करे॥ ९८—१०२॥ भोजन करते समय पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके बैठे और मौन रहे अथवा कम बोले। भोजनसे पहले प्रसन्नचित्तसे अन्नको नमस्कार करके पृथक्-पृथक् पाँच प्राणवायुओंके नाम-मन्त्रसे अर्थात् ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’—इस प्रकार उच्चारण करते हुए पाँच बार प्राणाग्निहोत्र करे। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर उस स्वादिष्ट अन्नको स्वयं भोजन करे। भोजनके
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६३ आचम्य देवतामिष्टां संस्मरेदुदरं स्पृशन्। बाद मुँह-हाथ धो, आचमन (कुल्ला) करके, अपने इतिहासपुराणाभ्यां कंचित्कालं नयेद्बुधः ॥ १०५ उदरका स्पर्श करते हुए इष्टदेवका स्मरण करे। फिर विद्वान् पुरुष इतिहास-पुराणोंके अध्ययनमें कुछ समय ततः संध्यामुपासीत बहिर्गत्वा विधानतः। व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकाल आनेपर बाहर (नदी कृतहोमश्च भुञ्जीत रात्रावतिथिमार्चयेत् ॥ १०६ या जलाशयके तटपर) जाकर विधिपूर्वक संध्योपासन करे। पुनः रात्रिकालमें हवन करके अतिथि-सत्कारके सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम्। पश्चात् भोजन करे। द्विजातियोंके लिये प्रातः और सायं— नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ॥ १०७ दो ही समय भोजन करना वेदविहित है; इसके बीचमें भोजन नहीं करना चाहिये। जैसे अग्निहोत्र प्रातः और शिष्यानध्यापयेत्तद्वदनध्यायं विवर्जयेत् । सायंकालमें किया जाता है, वैसे ही दो ही समय भोजनकी स्मृत्युक्तान् सकलान् पूर्वपुराणोक्तानपि द्विजः ॥ १०८ भी विधि है ॥ १०३–१०७॥ इसके अतिरिक्त विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपि चैव हि। प्रतिदिन शिष्योंको पढ़ाये, परंतु अध्ययनके लिये वर्जित तथाक्षय्यतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्बुधः ॥ १०९ समयका त्याग करे। स्मृतिमें बताये हुए तथा पहलेके पुराणोंमें वर्णित सम्पूर्ण अनध्याय-कालको त्याग दे। माघमासे तु सप्तम्यां रथ्यामध्ययनं त्यजेत् । महानवमी (आश्विन शुक्ला नवमी) और द्वादशी तिथि, अध्यापनमथाभ्यज्य स्नानकाले विवर्जयेत् ॥ ११० भरणी नक्षत्र और अक्षयतृतीयामें विद्वान् पुरुष शिष्योंको न पढ़ाये। माघ मासकी सप्तमीको अध्ययन न करे, दानं च विधिना देयं गृहस्थेन हितैषिणा । सड़कपर चलते समय और उबटन लगाकर स्नान करते हिरण्यदानं गोदानं भूमिदानं विशेषतः ॥ १११ समय भी अध्ययनका त्याग करे ॥ १०८–११० ॥ एतानि यः प्रयच्छेत श्रोत्रियेभ्यो द्विजोत्तमः । अपना हित चाहनेवाले गृहस्थको चाहिये कि विधिपूर्वक सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते ॥ ११२ दान करे। विशेषतः सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करे। जो द्विजश्रेष्ठ सुवर्ण आदि पूर्वोक्त वस्तुएँ श्रोत्रिय मङ्गलाचारयुक्तश्च शुचिः श्रद्धापरो गृही। ब्राह्मणोंको दानमें देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर श्राद्धं च श्रद्धया कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम् ॥ ११३ स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। जो गृहस्थ शुभाचरणोंसे युक्त, पवित्र और श्रद्धालु रहकर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता जातावुत्कर्षमायाति नरसिंहप्रसादतः । है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वह भगवान् नरसिंहकी स तस्मान्मुक्तिमाप्नोति ब्रह्मणा सह सत्तमाः ॥ ११४ कृपासे जातिमें उत्कर्ष प्राप्त करता है और सत्तमो ! ब्रह्माजीके साथ ही वह मुक्त हो जाता है। विप्रगण ! इस प्रकार मैंने एवं हि विप्राः कथितो मया वः आप लोगोंसे यह सनातन धर्मसमूहका संक्षेपसे वर्णन समासतः शाश्वतधर्मराशिः । किया। जो पुरुष सद्गृहस्थके उक्त धर्मका भलीभाँति सम्यग्गृहस्थस्य सतो हि धर्मं प्रयत्नपूर्वक पालन करता है, वह मुक्त होकर भगवान् कुर्वन् प्रयत्नाद्धरिमेति मुक्तः ॥ ११५ श्रीहरिको प्राप्त करता है ॥ १११–११५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे गृहस्थधर्मो नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'गृहस्थधर्म' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५९
२६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५९ उनसठवाँ अध्याय वानप्रस्थ-धर्म हारीत उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि वानप्रस्थस्य लक्षणम्। धर्ममग्र्यं महाभागाः कथ्यमानं निबोधत॥ १ गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन् दृष्ट्वा पलितमात्मनः। स्वभार्यां तनये स्थाप्य स्वशिष्यैः प्रविशेद्वनम्॥ २ जटाकलापचीराणि नखगात्ररुहाणि वा। धारयञ्जुहुयादग्नौ वैतानविधिना स्थितः॥ ३ भृतपर्णैर्मृत्सम्भूतैर्नीवाराद्यैरतन्द्रितः । कंदमूलफलैर्वापि कुर्यान्नित्यक्रियां बुधः॥ ४ त्रिकालं स्नानयुक्तस्तु कुर्यात्तीव्रं तपः सदा। पक्षे गते वा अश्नीयान्मासान्ते वा पराककृत्॥ ५ चतुःकालेऽपि चाश्नीयात्कालेऽप्युत तथाष्टमे। षष्ठाह्निकाले ह्यथवा अथवा वायुभक्षकः॥ ६ घर्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो धारावर्षामु वै नयेत्। हैमन्तिके जले स्थित्वा नयेत्कालं तपश्चरन्॥ ७ एवं स्वकर्मभोगेन कृत्वा शुद्धिमथात्मनः। अग्निं चात्मनि वै कृत्वा व्रजेद्धाथोत्तरां दिशम्॥ ८ आदेहपाताद्वनगो मौनमास्थाय तापसः। स्मरन्नतीन्द्रियं ब्रह्म ब्रह्मलोके महीयते॥ ९ तपो हि यः सेवति काननस्थो वसेन्महत्सत्त्वसमाधियुक्तः । विमुक्तपापो हि मनःप्रशान्तः प्रयाति विष्णोः सदनं द्विजेन्द्रः॥ १० श्रीहारीत मुनि बोले—महाभागगण! इसके बाद मैं वानप्रस्थका लक्षण और श्रेष्ठ धर्म बताऊँगा; आप लोग मेरे द्वारा बताये जानेवाले उस धर्मको सुनें॥ १॥ गृहस्थ पुरुष जब यह देख ले कि मेरे पुत्र-पौत्र हो गये हैं तथा बाल भी पक गये हैं, तब वह अपनी भार्याको पुत्रोंकी देख-रेखमें सौंपकर स्वयं अपने शिष्योंके साथ वनमें प्रवेश करे। जटा, चीर (वल्कल) वस्त्र, नख, लोम आदि धारण किये हुए ही यज्ञोक्त विधिसे अग्निमें हवन करे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पत्तोंवाले साग आदिसे या धरतीसे स्वयं उत्पन्न हुए नीवार आदिसे अथवा कंद-मूल-फल आदिसे प्रतिदिन आहारक्रियाका निर्वाह करे। प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों कालोंमें स्नान करके सदा कठोर तपस्या करे। ‘पराक’ आदि व्रतोंका पालन करता हुआ वानप्रस्थ पुरुष एक पक्ष या एक मासके बाद भोजन करे अथवा दिन-रातके चौथे या आठवें भागमें एक बार भोजन करे। अथवा छठे दिन कुछ भोजन करे या वायु पीकर ही रहे॥ २-६॥ ग्रीष्म-कालमें पञ्चाग्निके मध्य बैठे, वर्षाकालमें धारावृष्टि होनेपर बाहर आकाशके ही नीचे समय व्यतीत करे और हेमन्त-ऋतुमें तप करते हुए वह जलमें खड़ा रहकर समय बिताये। इस प्रकार कर्मभोगद्वारा आत्मशुद्धि करके, अग्निको भावनाद्वारा अन्तःकरणमें स्थापितकर उत्तरदिशाको चला जाय। वह तपस्वी देहपात होनेतक वनमें मौन रहकर इन्द्रियातीत ब्रह्मका स्मरण करता हुआ देह त्यागकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो द्विजश्रेष्ठ वनवासी (वानप्रस्थ) होकर महान् सत्त्वगुण और समाधिसे युक्त हो तपका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित और प्रशान्तचित्त होकर विष्णुधामको प्राप्त होता है॥ ७-१०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे वानप्रस्थधर्मो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः॥ ५९॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वानप्रस्थधर्म' नामक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६० ] यतिधर्म २६५
अध्याय ६० ] यतिधर्म २६५
साठवाँ अध्याय
यतिधर्म
हारीत उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यतिधर्ममनुत्तमम्। श्रद्धया यदनुष्ठाय यतिर्मुच्येत बन्धनात्॥ १
एवं वनाश्रमे तिष्ठंस्तपसा दग्धकिल्बिषः। चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् संन्यस्य विधिना द्विजः॥ २
दिव्यं ऋषिभ्यो देवेभ्यः स्वपितृभ्यश्च यत्नतः। दत्त्वा श्राद्धमृषिभ्यश्च मनुजेभ्यस्तथाऽऽत्मने॥ ३
इष्टिं वैश्वानरीं कृत्वा प्राजापत्यमथापि वा। अग्निं स्वात्मनि संस्थाप्य मन्त्रवत्प्रव्रजेत् पुनः॥ ४
ततः प्रभृति पुत्रादौ सुखलोभादि वर्जयेत्। दद्याच्च भूमावुदकं सर्वभूताभयंकरम्॥ ५
त्रिदण्डं वैणवं सौम्यं सत्वचं समपर्वकम्। वेष्टितं कृष्णगोवालरज्ज्वा च चतुरङ्गुलम्॥ ६
ग्रन्थिभिर्वा त्रिभिर्युक्तं जलपूतं च धारयेत्। गृह्णीयाद्दक्षिणे हस्ते मन्त्रेणैव तु मन्त्रवित्॥ ७
कौपीनाच्छादनं वासः कुथां शीतनिवारिणीम्। पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम्॥ ८
एतानि तस्य लिङ्गानि यतेः प्रोक्तानि धर्मतः। संगृह्य कृतसंन्यासो गत्वा तीर्थमनुत्तमम्॥ ९
स्नात्वा ह्याचम्य विधिवज्जलयुक्तांशुकेन वै। वारिणा तर्पयित्वा तु मन्त्रवद्भास्करं नमेत्॥ १०
आसीनः प्राङ्मुखो मौनी प्राणायामत्रयं चरेत्। गायत्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा ध्यायेत्परं पदम्॥ ११
स्थित्यर्थमात्मनो नित्यं भिक्षाटनमथाचरेत्। सायाह्नकाले विप्राणां गृहाणि विचरेद्यतिः॥ १२
हिन्दी अनुवाद
श्रीहारीत मुनि कहते हैं—इसके बाद अब मैं संन्यासियोंका सर्वोत्तम धर्म बताऊँगा, जिसका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करके संन्यासी भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। द्विजको चाहिये कि पूर्वोक्त रीतिसे वानप्रस्थ-आश्रममें रहते हुए तपस्याद्वारा पापोंको भस्म करके, विधिपूर्वक संन्यास ले चौथे आश्रममें प्रवेश करे। पहले यत्नपूर्वक देवताओं, ऋषियों और अपने पितरोंके लिये दिव्य श्राद्ध-सामग्रीका दान करे; इसी प्रकार ऋषियों, मनुष्यों तथा अपने लिये भी श्राद्धीय वस्तुका दान करे। फिर वैश्वानर अथवा प्राजापत्य याग करके, मन्त्रपाठपूर्वक अपने अन्तःकरणमें अग्निस्थापन करके संन्यासी हो, वहाँसे चला जाय। उस दिनसे पुत्र आदिके प्रति आसक्तिको और सुख-लोभ आदिको त्याग दे। पृथ्वीपर समस्त प्राणियोंको अभय देनेके निमित्त जलकी अञ्जलि दे। वेणु (बाँस)-का बना हुआ त्रिदण्ड धारण करे, जो सुन्दर और त्वचायुक्त हो, उसके पोर बराबर हों, काली गौके बालोंकी रस्सीसे वह चार अंगुलतक लपेटा गया हो। अथवा वह दण्ड तीन गाँठोंसे युक्त हो, उसे जलसे पवित्र करके धारण करे। मन्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह मन्त्रपाठपूर्वक ही उस दण्डको दायें हाथमें ग्रहण करे॥ १–७॥
कौपीन (लँगोटी), चादर, जाड़ा दूर करनेवाली एक गुदड़ी तथा खड़ाऊँ—इन्हीं वस्तुओंको अपने पास रखे, अन्य वस्तुओंका संग्रह न करे। संन्यासीके ये ही चिह्न बताये गये हैं। इन वस्तुओंका धर्मतः संग्रह करके संन्यासी पुरुष उत्तम तीर्थमें जा, स्नान करके विधिवत् आचमन करे। स्नानके बाद भीगे वस्त्रके जलसे सूर्यदेवका मन्त्रपाठपूर्वक तर्पण करके उन्हें प्रणाम करे। फिर पूर्वाभिमुख बैठकर, मौन हो, तीन प्राणायाम—पूरक, कुम्भक और रेचक करे तथा यथाशक्ति गायत्रीका जप करके परब्रह्मका ध्यान करे। शरीरकी स्थिति (रक्षा)-के लिये प्रतिदिन भिक्षाटन करे। यतिको चाहिये कि संध्याके समय ब्राह्मणोंके घरोंपर भिक्षाके लिये भ्रमण करे॥ ८–१२॥
२६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६१
२६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६१ स्यादर्थी यावतान्नेन तावद्भैक्षं समाचरेत्। ततो निवृत्य तत्पात्रमभ्युक्ष्याचम्य संयमी ॥ १३ सूर्यादिदैवतेभ्यो हि दत्त्वान्नं प्रोक्ष्य वारिणा। भुञ्जीत पर्णपुटके पात्रे वा वाग्यतो यतिः ॥ १४ वटकाश्वत्थपत्रेषु कुम्भीतिन्दुकपत्रयोः। कोविदारकरञ्जेषु न भुञ्जीत कदाचन ॥ १५ भुक्त्वाऽऽचम्य निरुद्धासुरुपतिष्ठेत भास्करम्। जपध्यानेतिहासैस्तु दिनशेषं नयेद्यतिः ॥ १६ पलाशाः सर्व उच्यन्ते यतयः कांस्यभोजिनः। कांस्यस्येव तु यत्पात्रं गृहस्थस्य तथैव च। कांस्यभोजी यतिः सर्वं प्राप्नुयात्किल्बिषं पुनः। भुक्तपात्रे यतिर्नित्यं भक्षयेन्मन्त्रपूर्वकम्। न दुष्येत्तस्य तत्पात्रं यज्ञेषु चमसा इव। कृतसंध्यस्ततो रात्रिं नयेद्देवगृहादिषु। हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायन्नारायणं हरिम्। तत्पदं समवाप्नोति यत्प्राप्य न निवर्तते ॥ १७ जितने अन्नकी उसे उस समय आवश्यकता हो, उतनी ही भिक्षा माँगे। फिर लौटकर उस भिक्षापात्रपर जलके छींटे देकर संयमी यति स्वयं भी आचमन करे। इसके बाद उस अन्नपर भी जलके छींटे देकर, उसे सूर्य आदि देवताओंको निवेदन कर, पत्तेके दोने या पत्तलमें रखकर, वह संन्यासी पुरुष मौनभावसे भोजन करे। वट, पीपल, जलकुम्भी और तिन्दुकके पत्तोंपर तथा कोविदार और करंजके पत्तोंपर भी कभी भोजन न करे। भोजन समाप्त करके मुँह-हाथ धो, आचमन करके, प्राणवायुको रोक, सूर्यदेवको प्रणाम करे। नैत्यिक नियमोंके बाद जितना दिन शेष रहे, उसे संन्यासी पुरुष जप, ध्यान और इतिहास-पाठ आदिके द्वारा व्यतीत करे। काँसेके पात्रमें भोजन करनेवाले सभी यति 'पलाश' कहलाते हैं। यदि संन्यासी काँसेका पात्र रखे तो वह गृहस्थके ही समान है; क्योंकि गृहस्थका भी तो वैसा ही पात्र होता है। काँसेके पात्रमें भोजन करनेवाला यति समस्त पापोंका भागी होता है। यति जिस काष्ठ या मिट्टी आदिके पात्रमें एक बार भोजन कर चुका है, उसे धोकर पुनः उसमें मन्त्रपाठपूर्वक भोजन कर सकता है; उसका वह पात्र यज्ञ-पात्रोंके समान कभी दूषित नहीं होता। इसके बाद यथासमय संध्याकालिक नियमोंका पालन करके देवमन्दिर आदिमें रात्रि व्यतीत करे और अपने हृदय-कमलके आसनपर भगवान् नारायणका ध्यान करे। यों करनेसे वह यति उस परमपदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर पुनः लौटना नहीं पड़ता ॥ १३–१७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यतिधर्मो नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यतिधर्मका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥ इकसठवाँ अध्याय योगसार हारीत उवाच वर्णानामाश्रमाणां च कथितं धर्मलक्षणम्। यतः स्वर्गापवर्गौ तु प्राप्नुयुस्ते द्विजादयः ॥ १ योगशास्त्रस्य वक्ष्यामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्। यस्याभ्यासबलाद्यान्ति मोक्षं चेह मुमुक्षवः ॥ २ ॥ श्रीहारीत मुनि कहते हैं—मुनियो! मैंने चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके धर्मका स्वरूप बतलाया, जिसके पालनसे उपर्युक्त ब्राह्मणादि वर्णके लोग स्वर्ग और मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। अब मैं संक्षेपमें योगशास्त्रका उत्तम सारांश वर्णन करूँगा, जिसके अभ्याससे मुमुक्षु पुरुष इसी जन्ममें मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं ॥ १-२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६१ ] योगसार २६७
अध्याय ६१ ] योगसार २६७
योगाभ्यासरतस्येह नश्येयुः पातकानि च। | योगाभ्यासपरायण पुरुषके समस्त पाप नष्ट हो जाते तस्माद्योगपरो भूत्वा ध्यायेन्नित्यं क्रियान्तरे॥ ३ | हैं, अतः कर्तव्य कर्मसे अवकाश मिलनेपर प्रतिदिन | योगनिष्ठ होकर ध्यान करना चाहिये। पहले प्राणायामके प्राणायामेन वचनं प्रत्याहारेण चेन्द्रियम्। | द्वारा वाणीको, प्रत्याहारसे इन्द्रियोंको और धारणाके द्वारा धारणाभिर्वशीकृत्य पुनर्दुर्धर्षणं मनः॥ ४ | दुर्धर्ष मनको वशमें करे। तत्पश्चात् जो सबके एकमात्र | कारण, ज्ञानानन्दस्वरूप, अनामय और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म एकं कारणमानन्दबोधं च तमनामयम्। | तत्त्व हैं, उन जगदाधार अच्युतका ध्यान करे। एकान्त सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं ध्यायेज्जगदाधारमच्युतम्॥ ५ | स्थानमें अकेले बैठकर अपने हृदयमें कमलके आसनपर | विराजमान, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् अपने आत्मानमरविन्दस्थं तप्तचामीकरप्रभम्। | आत्मस्वरूप भगवान्का चिन्तन करे। जो सबके प्राणों रहस्येकान्तमासीत ध्यायेदात्महृदि स्थितम्॥ ६ | और चित्तकी चेष्टाओंको जानता है, सभीके हृदयमें विराजमान | है तथा समस्त प्राणियोंद्वारा जाननेयोग्य है—वह परमात्मा यः सर्वप्राणचित्तज्ञो यः सर्वेषां हृदि स्थितः। | मैं ही हूँ, ऐसी भावना करे। जबतक आत्मसाक्षात्कारजन्य यश्च सर्वजनैर्ज्ञेयः सोऽहमस्मीति चिन्तयेत्॥ ७ | सुखकी प्रतीति हो, तभीतक ध्यान करना आवश्यक | बताया गया है। उसके उपरान्त श्रौत और स्मार्त कर्मोंका आत्मलाभसुखं यावत्तावद्ध्यानमुदाहृतम्। | आचरण सुचारूरूपसे करे॥ ३-८॥ श्रुतिस्मृत्युदितं कर्म तत्तदूर्ध्वं समाचरेत्॥ ८ | जैसे रथके बिना घोड़े और घोड़ोंके बिना रथ यथाश्वा रथहीनाश्च रथाश्चाश्वैर्विना यथा। | उपयोगी नहीं हो सकते, उसी प्रकार तपस्वीके तप और एवं तपश्च विद्या च उभावपि तपस्विनः॥ ९ | विद्याकी सिद्धि भी एक-दूसरेके आश्रित हैं। जिस | प्रकार अन्न मधु (चीनी आदि)-से युक्त होनेपर मीठा यथान्नं मधुसंयुक्तं मधु चान्नेन संयुतम्। | होता है और मधु भी अन्नके साथ ही सुस्वादु प्रतीत एवं तपश्च विद्या च संयुक्ते भेषजं महत्॥ १० | होता है, उसी प्रकार तप और विद्या—दोनों साथ रहकर | ही भवरोगके महान् औषध होते हैं। जिस प्रकार पक्षी द्वाभ्यामेव हि पक्षाभ्यां यथा वै पक्षिणां गतिः। | दोनों पंखोंसे ही उड़ सकते हैं, उसी प्रकार ज्ञान और तथैव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम्॥ ११ | कर्म—दोनोंसे ही सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो सकती है। | विद्या और तपसे सम्पन्न योगतत्पर ब्राह्मण दैहिक द्वन्द्वोंको विद्यातपोभ्यां सम्पन्नो ब्राह्मणो योगतत्परः। | शीघ्र ही त्यागकर भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। देहद्वन्द्वं विहायाशु मुक्तो भवति बन्धनात्॥ १२ | जबतक देवयानमार्गसे जाकर जीवको परमपदकी प्राप्ति | नहीं होती, तबतक लिङ्गशरीरका विनाश कभी हो नहीं न देवयानमार्गेण यावत्प्राप्तं परं पदम्। | सकता। द्विजवरो! इस प्रकार वर्णों और आश्रमोंके न तावद्देहलिङ्गस्य विनाशो विद्यते क्वचित्॥ १३ | विभागपूर्वक मैंने उन आश्रमोंके सम्पूर्ण सनातन धर्मका | संक्षेपसे वर्णन कर दिया॥ ९-१४॥ मया वः कथितः सर्वो वर्णाश्रमविभागशः। संक्षेपेण द्विजश्रेष्ठा धर्मस्तेषां सनातनः॥ १४ | मार्कण्डेयजी कहते हैं—इस प्रकार हारीत मुनिके मार्कण्डेय उवाच | मुखसे स्वर्ग और मोक्षरूप फलको देनेवाले धर्मका श्रुत्वैवमृषयो धर्मं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्। | वर्णन सुनकर वे ऋषिगण उन मुनीश्वरको प्रणाम प्रणम्य तमृषिं जग्मुर्मुदितास्ते स्वमालयम्॥ १५ | कर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६२
२६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६२ धर्मशास्त्रमिदं यस्तु हारीतमुखनिस्सृतम्। श्रुत्वा च कुरुते धर्मं स याति परमां गतिम्॥ १६ मुखजस्य तु यत्कर्म कर्म यद्वाहुजस्य तु। ऊरुजस्य तु यत्कर्म पादजस्य तथा नृप॥ १७ स्वं स्वं कर्म प्रकुर्वाणा विप्राद्या यान्ति सद्गतिम्। अन्यथा वर्तमानो हि सद्यः पतति यात्यधः॥ १८ यस्य येऽभिहिता धर्माः स तु तैस्तैः प्रतिष्ठितः। तस्मात्स्वधर्मं कुर्वीत नित्यमेवमनापदि॥ १९ चतुर्वर्णांश्च राजेन्द्र चत्वारश्चापि चाश्रमाः। स्वधर्मं येऽनुतिष्ठन्ति ते यान्ति परमां गतिम्॥ २० स्वधर्मेण यथा नृणां नरसिंहः प्रतुष्यति। वर्णधर्मानुसारेण नरसिंहं तथार्चयेत्॥ २१ उत्पन्नवैराग्यबलेन योगाद् ध्यायेत् परं ब्रह्म सदा क्रियावान्। सत्यात्मकं चित्सुखरूपमाद्यं विहाय देहं पदमेति विष्णोः॥ २२ जो भी हारीत मुनिके मुखसे निर्गत इस धर्मशास्त्रका श्रवण करके इसके अनुसार आचरण करता है वह परमगतिको प्राप्त होता है। नरेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके जो-जो कर्म बताये गये हैं, उन-उन अपने-अपने वर्णोचित कर्मोंका पालन करनेवाले ब्राह्मण आदि सद्गतिको प्राप्त होते हैं; इसके विपरीत आचरण करनेवाला पुरुष तत्काल नीचे गिर जाता है। जिसके लिये जो धर्म बताये गये हैं, वह पुरुष उन्हीं धर्मोंसे प्रतिष्ठित होता है। इसलिये आपत्तिकालके अतिरिक्त सदा ही अपने धर्मका पालन करना चाहिये। राजेन्द्र! चार ही वर्ण और चार ही आश्रम हैं। जो लोग अपने वर्ण एवं आश्रमके उचित धर्मका पूर्णतया पालन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। भगवान् नरसिंह जिस प्रकार स्वधर्मका आचरण करनेसे मनुष्यपर प्रसन्न होते हैं, वैसे दूसरे प्रकारसे नहीं; इसलिये वर्णधर्मके अनुसार भगवान् नरसिंहका पूजन करना चाहिये। जो पुरुष स्वकर्ममें तत्पर रहकर उत्पन्न हुए वैराग्यके बलसे योगाभ्यासपूर्वक सदा सच्चिदानन्दस्वरूप अनादि ब्रह्मका ध्यान करता है, वह देह त्यागकर साक्षात् श्रीविष्णुपदको प्राप्त होता है॥ १५-२२॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे योगाध्यायो नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'योगाध्याय' नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥ बासठवाँ अध्याय श्रीविष्णुपूजनके वैदिक मन्त्र और स्थान श्रीमार्कण्डेय उवाच वर्णानामाश्रमाणां च कथितं लक्षणं तव। भूयः कथय राजेन्द्र शुश्रूषा तव का नृप॥ १ श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! मैंने तुम्हें वर्णों और आश्रमोंका स्वरूप बताया। राजेन्द्र! अब कहो, तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है॥ १॥ सहस्रानीक उवाच स्नात्वा वेश्मनि देवेशमर्चयेदच्युतं त्विति। त्वयोक्तं मम विप्रेन्द्र तत्कथं पूजनं भवेत्॥ २ यैर्मन्त्रैरर्च्यते विष्णुर्येषु स्थानेषु वै मुने। तानि स्थानानि तान्मन्त्रांस्त्वमाचक्ष्व महामुने॥ ३ सहस्रानीक बोले—विप्रेन्द्र! आपने बताया कि प्रतिदिन स्नान करके अपने घरमें भगवान् अच्युतका पूजन करना चाहिये। अतः वह पूजन किस प्रकार होना चाहिये? महामुने! जिन मन्त्रोंद्वारा और जिन आधारोंमें भगवान् विष्णुकी पूजा होती है, वे आधार और वे मन्त्र आप मुझे बताइये॥ २-३॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६२ ] श्रीविष्णुपूजनके वैदिक मन्त्र और स्थान २६९
अध्याय ६२ ] श्रीविष्णुपूजनके वैदिक मन्त्र और स्थान २६९
[बायाँ स्तम्भ]
श्रीमार्कण्डेय उवाच अर्चनं सम्प्रवक्ष्यामि विष्णोरमिततेजसः। यत्कृत्वा मुनयः सर्वे परं निर्वाणमाप्नुयुः॥ ४ अग्नौ क्रियावतां देवो हृदि देवो मनीषिणाम्। प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां योगिनां हृदये हरिः॥ ५ अतोऽग्नौ हृदये सूर्ये स्थण्डिले प्रतिमासु च। एतेषु च हरेः सम्यगर्चनं मुनिभिः स्मृतम्॥ ६ तस्य सर्वमयत्वाच्च स्थण्डिले प्रतिमासु च। आनुष्टुभस्य सूक्तस्य विष्णुस्तस्य च देवता॥ ७ पुरुषो यो जगद्बीजं ऋषिर्नारायणः स्मृतः। दद्यात्पुरुषसूक्तेन यः पुष्पाण्यप एव च॥ ८ अर्चितं स्याज्जगत्सर्वं तेन वै सचराचरम्। आद्ययाऽऽवाहयेद्देवमृचा तु पुरुषोत्तमम्॥ ९ द्वितीययाऽऽसनं दद्यात्पाद्यं दद्यात्तृतीयया। चतुर्थ्यार्घ्यः प्रदातव्यः पञ्चम्याऽऽचमनीयकम्॥ १० षष्ठ्या स्नानं प्रकुर्वीत सप्तम्या वस्त्रमेव च। यज्ञोपवीतमष्टम्या नवम्या गन्धमेव च॥ ११ दशम्या पुष्पदानं स्यादेकादश्या च धूपकम्। द्वादश्या च तथा दीपं त्रयोदश्यार्चनं तथा॥ १२ चतुर्दश्या स्तुतिं कृत्वा पञ्चदश्या प्रदक्षिणम्। षोडश्योद्वासनं कुर्याच्छेषकर्माणि पूर्ववत्॥ १३ स्नानं वस्त्रं च नैवेद्यं दद्यादाचमनीयकम्। षण्मासात्सिद्धिमाप्नोति देवदेवं समर्चयन्॥ १४ संवत्सरेण तेनैव सायुज्यमधिगच्छति। हविषाग्नौ जले पुष्पैर्ध्यानेन हृदये हरिम्॥ १५
[दायाँ स्तम्भ]
**श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—**अच्छा, मैं अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके पूजनकी विधि बता रहा हूँ, जिसके अनुसार पूजन करके सभी मुनिगण परम निर्वाण (मोक्ष) पदको प्राप्त हुए हैं। अग्निमें हवन करनेवालेके लिये भगवान्का वास अग्निमें है। ज्ञानियों और योगियोंके लिये अपने-अपने हृदयमें ही भगवान्की स्थिति है तथा जो थोड़ी बुद्धिवाले हैं, उनके लिये प्रतिमामें भगवान्का निवास है। इसलिये अग्नि, सूर्य, हृदय, स्थण्डिल (वेदी) और प्रतिमा—इन सभी आधारोंमें भगवान्का विधिपूर्वक पूजन मुनियोंद्वारा बताया गया है। भगवान् सर्वमय हैं, अतः स्थण्डिल और प्रतिमाओंमें भी भगवत्पूजन उत्तम है॥ ४-६१/२॥ अब पूजनका मन्त्र बताते हैं। शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायीमें जो पुरुषसूक्त है, उसका उच्चारण करते हुए भगवान्का पूजन करना चाहिये। पुरुषसूक्तका अनुष्टुप् छन्द है, जगत्के कारणभूत परम पुरुष भगवान् विष्णु देवता हैं, नारायण ऋषि हैं और भगवत्पूजनमें उसका विनियोग है। जो पुरुषसूक्तसे भगवान्को फूल और जल अर्पण करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण चराचर जगत् पूजित हो जाता है। पुरुषसूक्तकी पहली ऋचासे भगवान् पुरुषोत्तमका आवाहन करना चाहिये। दूसरी ऋचासे आसन और तीसरीसे पाद्य अर्पण करे। चौथी ऋचासे अर्घ्य और पाँचवींसे आचमनीय निवेदित करे। छठी ऋचासे स्नान कराये और सातवींसे वस्त्र अर्पण करे। आठवींसे यज्ञोपवीत और नवमी ऋचासे गन्ध निवेदन करे। दसवींसे फूल चढ़ाये और ग्यारहवीं ऋचासे धूप दे। बारहवींसे दीप और तेरहवीं ऋचासे नैवेद्य, फल, दक्षिणा आदि अन्य पूजन-सामग्री निवेदित करे। चौदहवीं ऋचासे स्तुति करके पंद्रहवींसे प्रदक्षिणा करे। अन्तमें सोलहवीं ऋचासे विसर्जन करे। पूजनके बाद शेष कर्म पहले बताये अनुसार ही पूर्ण करे। भगवान्के लिये स्नान, वस्त्र, नैवेद्य और आचमनीय आदि निवेदन करे। इस प्रकार देवदेव परमात्माका पूजन करनेवाला पुरुष छः महीनेमें सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इसी क्रमसे यदि एक वर्षतक पूजन करे तो वह भक्त सायुज्य मोक्षका अधिकारी हो जाता है॥ ७-१४१/२॥ विद्वान् पुरुष अग्निमें आहुतिके द्वारा, जलमें पुष्पके
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२७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ अर्चन्ति सूर्यो नित्यं जपेन रविमण्डले। द्वारा, हृदयमें ध्यानद्वारा और सूर्यमण्डलमें जपके द्वारा आदित्यमण्डले दिव्यं देवदेवमनामयम्। भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं। वे भक्तजन सूर्यमण्डलमें शङ्खचक्रगदापाणिं ध्यात्वा विष्णुमुपासते॥ १६ दिव्य, अनामय, देवदेव शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए उनकी उपासना करते हैं। जो ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती केयूर, मकराकृतिकुण्डल, किरीट, हार आदि आभूषणोंसे नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः। भूषित हो, हाथमें शङ्ख-चक्र धारण किये कमलासनपर केयूरवान्मकरकुण्डलवान् किरीटी विराजमान हैं तथा जिनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥ १७ समान देदीप्यमान है, सूर्यमण्डलके मध्यमें विराजमान उन भगवान् नारायणका सदा ध्यान करे। जो प्रतिदिन एतत्पठन् केवलमेव सूक्तं बुद्धिमें भगवान् विष्णुकी भावना करके केवल इस दिने दिने भावितविष्णुबुद्धिः। 'ध्येयः सदा…………' इत्यादि सूक्तका पाठमात्र ही कर लेता स सर्वपापं प्रविहाय वैष्णवं है, वह भगवान् विष्णुको संतुष्ट करनेवाला पुरुष सब पदं प्रयात्यच्युततुष्टिकृन्नरः॥ १८ पापोंसे मुक्त हो विष्णुधामको पहुँच जाता है। बिना मूल्यके ही मिलनेवाले पूजनोपचार-पत्र, पुष्प, फल पत्रेषु पुष्पेषु फलेषु तोये- और जलके सदा रहते हुए तथा एकमात्र भक्तिसे ही ष्वक्रीतलभ्येषु सदैव सत्सु। सुलभ होनेवाले भगवान् पुराण-पुरुषके होते हुए मनुष्यद्वारा भक्त्यैकलभ्ये पुरुषे पुराणे मुक्तिके लिये प्रयत्न क्यों नहीं किया जाता? अर्थात् उक्त मुक्त्यै किमर्थं क्रियते न यत्नः॥ १९ सुलभ उपचारोंसे भगवान्का पूजन करके लोग मोक्ष पानेके लिये यत्न क्यों नहीं करते? ॥ १५-१९॥ इत्येवमुक्तः पुरुषस्य विष्णो- नृपवर! इस प्रकार यह परमपुरुष भगवान् विष्णुकी रर्चाविधिस्तेऽद्य मया नृपेन्द्र। पूजा-विधि आज मैंने तुम्हें बतायी है। यदि तुम्हें वैष्णव- अनेन नित्यं कुरु विष्णुपूजां पद प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो इस विधिके द्वारा सदा प्राप्तुं तदिष्टं यदि वैष्णवं पदम्॥ २० भगवान् विष्णुकी पूजा करो ॥ २० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोरर्चाविधिर्नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'भगवान् विष्णुकी पूजा-विधि' नामक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥ ──❖── तिरसठवाँ अध्याय अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार सहस्रानीक उवाच सहस्रानीक बोले- ब्रह्मन्! इस समय आपने सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन् वैदिकः परमो विधिः। देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके पूजनकी यह उत्तम वैदिक विष्णोर्देवातिदेवस्य पूजनं प्रति मेऽधुना॥ १ विधि बतायी, वह बिलकुल ठीक है; परंतु ब्रह्मन्! इस विधिसे तो केवल वेदज्ञ पुरुष ही मधुसूदनकी पूजा कर अनेन विधिना ब्रह्मन् पूज्यते मधुसूदनः सकते हैं, दूसरे लोग नहीं; इसलिये आप ऐसी कोई वेदज्ञैरेव नान्यैस्तु तस्मात्सर्वहितं वद॥ २ विधि बताइये, जो सबके लिये उपयोगी हो॥ १-२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७१
श्रीमार्कण्डेय उवाच | श्रीमार्कण्डेयजी बोले—मनुष्यको चाहिये कि वह अष्टाक्षरेण देवेशं नरसिंहमनामयम्। | अष्टाक्षर मन्त्रसे निरामय देवेश्वर भगवान् नरसिंहका गन्धपुष्पादिभिर्नित्यमर्चयेदच्युतं नरः॥ ३ | गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंद्वारा प्रतिदिन पूजन करे। राजन्! राजन्नष्टाक्षरो मन्त्रः सर्वपापहरः परः। | यह अष्टाक्षर मन्त्र समस्त पापोंको हर लेनेवाला, समस्त समस्तयज्ञफलदः सर्वशान्तिकरः शुभः॥ ४ | यज्ञोंका फल देनेवाला, सब प्रकारकी शान्ति प्रदान ॐ नमो नारायणाय। | करनेवाला एवं परम शुभ है। मन्त्र यों है—'ॐ नमो गन्धपुष्पादिसकलमनेनैव निवेदयेत्। | नारायणाय।' इसी मन्त्रसे गन्ध आदि समस्त सामग्रियोंको अनेनाभ्यर्चितो देवः प्रीतो भवति तत्क्षणात्॥ ५ | अर्पित करे। इस मन्त्रसे पूजा करनेपर भगवान् विष्णु किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तस्य बहुभिर्व्रतैः। | तत्काल प्रसन्न होते हैं। मनुष्यके लिये अन्य बहुत-से ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः॥ ६ | मन्त्रों और व्रतोंकी क्या आवश्यकता है। केवल 'ॐ इमं मन्त्रं जपेद्यस्तु शुचिर्भूत्वा समाहितः। | नमो नारायणाय'—यह मन्त्र ही समस्त मनोरथोंको सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्॥ ७ | सिद्ध करनेवाला है। जो स्नानादिसे पवित्र होकर एकाग्रचित्तसे सर्वतीर्थफलं ह्येतत् सर्वतीर्थवरं नृप। | इस मन्त्रका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो हरेरर्चनमव्यग्रं सर्वयज्ञफलं नृप॥ ८ | भगवान् विष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता है॥ ३-७॥ तस्मात्कुरु नृपश्रेष्ठ प्रतिमादिषु चार्चनम्। | नरेश्वर! शान्तभावसे भगवान् विष्णुका पूजन करना दानानि विप्रमुख्येभ्यः प्रयच्छ विधिना नृप। | ही सब तीर्थों और यज्ञोंका फल है तथा सम्पूर्ण तीर्थोंसे एवं कृते नृपश्रेष्ठ नरसिंहप्रसादतः। | बढ़कर पवित्र है। अतः नरेश्वर! तुम प्रतिमा आदिमें प्राप्नोति वैष्णवं तेजो यत्काङ्क्षन्ति मुमुक्षवः॥ ९ | विधिपूर्वक भगवान्का पूजन करो और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको पुरा पुरंदरो राजन् स्त्रीत्वं प्राप्तोऽपधर्मतः। | दान दो। नृपश्रेष्ठ! यों करनेसे भक्त पुरुष उस तेजोमय तृणबिन्दुमुनेः शापान्मुक्तो ह्यष्टाक्षराज्जपात्॥ १० | वैष्णवधामको प्राप्त होते हैं, जिसकी मुमुक्षुलोग सदा सहस्रानीक उवाच | अभिलाषा किया करते हैं। राजन्! पूर्वकालमें इन्द्र एतत्कथय भूदेव देवेन्द्रस्याघमोचनम्। | धर्मके विपरीत आचरण करके तृणबिन्दु मुनिके शापसे कोऽपधर्मः कथं स्त्रीत्वं प्राप्तो मे वद कारणम्॥ ११ | स्त्री-योनिको प्राप्त हो गये थे; परंतु इस अष्टाक्षर श्रीमार्कण्डेय उवाच | मन्त्रका जप करनेसे वे पुनः उस योनिसे मुक्त हो राजेन्द्र महदाख्यानं शृणु कौतूहलान्वितम्। | गये॥ ८-१०॥ विष्णुभक्तिप्रजननं शृण्वतां पठतामिदम्॥ १२ | सहस्रानीक बोले—भूमिदेव! देवराज इन्द्रको जो पुरा पुरंदरस्यैव देवराज्यं प्रकुर्वतः। | पाप एवं शापसे छुटकारा मिला, उस प्रसङ्गका वर्णन वैराग्यस्यापि जननं सम्भूतं बाह्यवस्तुषु॥ १३ | कीजिये। उन्होंने कौन-सा अधर्म किया था और किस इन्द्रस्तदाभूद्विषमस्वभावो | कारण स्त्रीयोनिको प्राप्त हुए—वह सब भी बताइये॥ ११॥ राज्येषु भोगेष्वपि सोऽप्यचिन्तयत्। | श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—राजेन्द्र! सुनो, यह ध्रुवं विरागीकृतमानसानां | उपाख्यान बहुत बड़ा तथा कौतूहलसे भरा हुआ है। जो स्वर्गस्य राज्यं न च किंचिदेव॥ १४ | लोग इसे सुनते और पढ़ते हैं उनके हृदयमें यह | आख्यान विष्णुभक्ति उत्पन्न करता है॥ १२॥ | पूर्वकालकी बात है, एक समय देवलोकका राज्य | भोगते हुए इन्द्रके लिये उनका वह राज्य ही बाह्य वस्तुओंमें | वैराग्यका कारण बन गया। उस समय इन्द्रका स्वभाव | राज्य-कार्यों और भोगोंके प्रति विषम (वैराग्यपूर्ण) हो | गया। वे सोचने लगे—'यह निश्चित है कि विरक्त हृदयवाले
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२७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ राज्यस्य सारं विषयेषु भोगो | पुरुषोंकी दृष्टिमें स्वर्गका राज्य कुछ भी महत्त्व नहीं भोगस्य चान्ते न च किंचिदस्ति। | रखता। राज्यका सार है—विषयोंका भोग तथा भोगके विमृश्य चैतन्मुनयोऽप्यजस्रं | अन्तमें कुछ भी नहीं रह जाता। यही सोचकर मुनिगण मोक्षाधिकारं परिचिन्तयन्ति ॥ १५ | सदा ही मोक्षाधिकारके विषयमें ही विचार करते हैं। सदैव भोगाय तपःप्रवृत्ति- | लोगोंकी सदा भोगके लिये ही तपमें प्रवृत्ति हुआ करती र्भोगावसाने हि तपो विनष्टम्। | है और भोगके अन्तमें तप नष्ट हो जाता है। परंतु जो मैत्र्यादिसंयोगपराङ्मुखानां | लोग मैत्री आदिके द्वारा विषय-सम्पर्कसे विमुख हो गये विमुक्तिभाजां न तपो न भोगः ॥ १६ | हैं, उन मोक्षभागी पुरुषोंको न तपकी आवश्यकता होती विमृश्य चैतत् स सुराधिनाथो | है न योगकी।' इन सब बातोंका विचार करके देवराज विमानमारुह्य सकिङ्किणीकम्। | इन्द्र क्षुद्रघण्टिकाओंकी ध्वनिसे युक्त विमानपर आरूढ़ नूनं हराराधनकारणेन | हो भगवान् शंकरकी आराधनाके लिये कैलासपर्वतपर कैलासमभ्येति विमुक्तिकामः ॥ १७ | चले आये। उस समय उनके मनमें एकमात्र मोक्षकी स एकदा मानसमागतः सन् | कामना रह गयी थी ॥ १३—१७ ॥ संवीक्ष्य तां यक्षपतेश्च कान्ताम्। | कैलासपर रहते समय इन्द्र एक दिन घूमते हुए समर्चयन्तीं गिरिजांघ्रियुग्मं | मानससरोवरके तटपर आये। वहाँ उन्होंने पार्वतीजीके ध्वजामिवानङ्गमहारथस्य ॥ १८ | युगलचरणारविन्दोंका पूजन करती हुई यक्षराज कुबेरकी प्रधानजाम्बूनदशुद्धवर्णां | प्राणवल्लभा चित्रसेनाको देखा। जो कामदेवके महान् कर्णान्तसंलग्नमनोज्ञनेत्राम् । | रथकी ध्वजा-सी जान पड़ती थी। उत्तम 'जाम्बूनद' सुसूक्ष्मवस्त्रान्तरदृश्यगात्रां | नामक सुवर्णके समान उसके अङ्गोंकी दिव्य कान्ति नीहारमध्यादिव चन्द्ररेखाम् ॥ १९ | थी। आँखें बड़ी-बड़ी और मनोहर थीं, जो कानके तां वीक्ष्य वीक्षणसहस्रभरेण कामं | पासतक पहुँच गयी थीं। महीन साड़ीके भीतरसे उसके कामाङ्गमोहितमतिर्न ययौ तदानीम्। | मनोहर अङ्ग इस प्रकार झलक रहे थे, मानो कुहासेके दूराध्वगं स्वगृहमेत्य सुसंचितार्थ- | भीतरसे चन्द्रलेखा दृष्टिगोचर हो रही हो। अपने हजार स्तस्थौ तदा सुरपतिर्विषयाभिलाषी ॥ २० | नेत्रोंसे उस देवीको इच्छानुसार निहारते ही इन्द्रका हृदय पूर्वं वरं स्यात् सुकुलेऽपि जन्म | कामसे मोहित हो गया। उस समय वे दूरके रास्तेपर ततो हि सर्वाङ्गशरीररूपम्। | स्थित अपने आश्रमपर नहीं गये और सम्पूर्ण मनोरथोंको ततो धनं दुर्लभमेव पश्चा- | मनमें लिये देवराज इन्द्र विषयाभिलाषी हो खड़े हो द्धनाधिपत्यं सुकृतेन लभ्यम् ॥ २१ | गये। वे सोचने लगे—'पहले तो उत्तम कुलमें जन्म पा स्वर्गाधिपत्यं च मया प्रलब्धं | जाना ही बहुत बड़ी बात है, उसके बाद सर्वाङ्ग-सौन्दर्य तथापि भोगाय न चास्ति भाग्यम्। | और उसपर भी धन तो सर्वथा ही दुर्लभ है। इन सबके यः स्वं परित्यज्य विमुक्तिकाम- | बाद धनाधिप (कुबेर) होना तो पुण्यसे ही सम्भव है। स्तिष्ठामि मे दुर्मतिरस्ति चित्ते ॥ २२ | मैंने इन सबसे बड़े स्वर्गके आधिपत्यको प्राप्त किया | है, फिर भी मेरे भाग्यमें भोग भोगना नहीं बदा है। | मेरे चित्तमें ऐसी दुर्बुद्धि आ गयी है कि मैं स्वर्गका | सुखभोग छोड़कर यहाँ मुक्तिकी इच्छासे आ पड़ा हूँ। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७३ मोक्षोऽमुना यद्यपि मोहनीयो मोक्षेऽपि किं कारणमस्ति राज्ये। क्षेत्रं सुपक्वं परिहृत्य द्वारे किं नाम चारण्यकृषिं करोति ॥ २३ संसारदुःखोपहता नरा ये कर्तुं समर्था न च किंचिदेव। अकर्मिणो भाग्यविवर्जिताश्च वाञ्छन्ति ते मोक्षपथं विमूढाः ॥ २४ एतद्विमृश्य बहुधा मतिमान् प्रवीरो रूपेण मोहितमना धनदाङ्गनायाः। सर्वाधिराकुलमतिः परिमुक्तधैर्यः सस्मार मारममराधिपचक्रवर्ती ॥ २५ समागतोऽसौ परिमन्दमन्दं कामोऽतिकामाकुलचित्तवृत्तिः । पुरा महेशेन कृताङ्गनाशो धैर्याल्लयं गच्छति को विशङ्कः ॥ २६ आदिश्यतां नाथ यदस्ति कार्यं को नाम ते सम्प्रति शत्रुभूतः। शीघ्रं समादेशय मा विलम्बं तस्यापदं सम्प्रति भो दिशामि ॥ २७ श्रुत्वा तदा तस्य वचोऽभिरामं मनोगतं तत्परमं तुतोष। निष्पन्नमर्थं सहसैव मत्वा जगाद वाक्यं स विहस्य वीरः ॥ २८ रुद्रोऽपि येनार्धशरीरमात्र- श्चक्रेऽप्यनङ्गत्वमुपागतेन । सोढुं समर्थोऽथ परोऽपि लोके को नाम ते मार शराभिघातम् ॥ २९ एकाग्रचित्ता गिरिजार्चनेऽपि या मोहयत्येव ममात्र चित्तम्। एतामनङ्गायतलोचनाख्यां मदङ्गसङ्गैकरसां विधेहि ॥ ३० स एवमुक्तः सुरवल्लभेन स्वकार्यभावाधिकगौरवेण । संधाय बाणं कुसुमायुधोऽपि सस्मार मारः परिमोहनं सुधीः ॥ ३१ मोक्ष-सुख तो इस राज्य-भोगद्वारा मोह लिया जा सकता है, परंतु क्या मोक्ष भी राज्य-प्राप्तिका कारण हो सकता है? भला, अपने द्वारपर पके अन्नसे युक्त खेतको छोड़कर कोई जंगलमें खेती करने क्यों जायगा? जो सांसारिक दुःखसे मारे-मारे फिरते हैं और कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं रखते, वे ही अकर्मण्य, भाग्यहीन एवं मूढजन मोक्षमार्गकी इच्छा करते हैं' ॥ १८-२४॥ इन सब बातोंपर बारंबार विचार करके देवेश्वरोंके चक्रवर्ती सम्राट् बुद्धिमान् वीरवर इन्द्र कुबेरपत्नी चित्रसेनाके रूपपर मोहित हो गये। समस्त मानसिक वेदनाओंसे व्याकुल हो, धैर्य खोकर वे कामदेवका स्मरण करने लगे। इन्द्रके स्मरण करनेपर अत्यन्त कामनाओंसे व्याप्त चित्तवृत्तिवाला कामदेव बहुत धीरे- धीरे डरता हुआ वहाँ आया; क्योंकि वहीं पूर्वकालमें शंकरजीने उसके शरीरको जलाकर भस्म कर दिया था। क्यों न हो, प्राणसंकटके स्थानपर धीरतापूर्वक और निर्भय होकर कौन जा सकता है? कामदेवने आकर कहा-'नाथ! मुझसे जो कार्य लेना हो, आज्ञा कीजिये; बताइये तो सही, इस समय कौन आपका शत्रु बना हुआ है? शीघ्र बताइये, विलम्ब न कीजिये; मैं अभी उसे आपत्तिमें डालता हूँ' ॥ २५-२७॥ उस समय कामदेवके उस मनोभिराम वचनको सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करके इन्द्र बहुत संतुष्ट हुए। अपने मनोरथको सहसा सिद्ध होते जान वीरवर इन्द्रने हँसकर कहा-'कामदेव ! अनङ्ग बन जानेपर भी तुमने जब शंकरजीको भी आधे शरीरका बना दिया, तब संसारमें दूसरा कौन तुम्हारे उस शराघातको सह सकता है? अनङ्ग! जो गिरिजापूजनमें एकाग्रचित्त होनेपर भी मेरे मनको निश्चय ही मोहे लेती है, उस विशाल नयनोंवाली सुन्दरीको तुम एकमात्र मेरे अङ्ग-सङ्गकी सरस भावनासे युक्त कर दो' ॥ २८-३०॥ अपने कार्यको अधिक महत्त्व देनेवाले सुरराज इन्द्रके यों कहनेपर उत्तम बुद्धिवाले कामदेवने भी अपने पुष्पमय धनुषपर बाण रखकर मोहन-मन्त्रका स्मरण किया।
२७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ सम्मोहिता पुष्पशरेण बाला तब कामदेवद्वारा पुष्पबाणसे मोहित की हुई वह बाला कामेन कामं मदविह्वलाङ्गी। अपने सम्पूर्ण अङ्गमें मदके उद्रेकसे विह्वल हो गयी विहाय पूजां हसते सुरेशं और पूजा छोड़ इन्द्रकी ओर देखकर मुस्काने लगी। कः कामकोदण्डरवं सहेत॥ ३२ भला, कामदेवके धनुषकी टंकार कौन सह सकता विलोलनेत्रे अयि कासि बाले है॥ ३१-३२॥ सुराधिपो वाक्यमिदं जगाद। इन्द्र उसको अपनी ओर निहारते देखकर यह वचन सम्मोहयन्तीव मनांसि पुंसां बोले—'चञ्चल नेत्रोंवाली बाले! तुम कौन हो, जो पुरुषोंके कस्येह कान्ता वद पुण्यभाजः॥ ३३ मनको इस प्रकार मोहे लेती हो? बताओ तो, तुम किस उक्तापि बाला मदविह्वलाङ्गी पुण्यात्माकी पत्नी हो?' इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर उसके रोमाञ्चसंस्वेदसकम्पगात्रा । अङ्ग मदसे विह्वल हो उठे। शरीरमें रोमाञ्च, स्वेद और कृताकुला कामशिलीमुखेन कम्प होने लगे। वह कामबाणसे व्याकुल हो गद्गद- सगद्गदं वाक्यमुवाच मन्दम्॥ ३४ कण्ठसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोली—'नाथ! मैं धनाधिप कान्ता धनेशस्य च यक्षकन्या कुबेरकी पत्नी एक यक्षकन्या हूँ। पार्वतीजीके चरणोंकी प्राप्ता च गौरीचरणार्चनाय। पूजा करनेके लिये यहाँ आयी थी। आप अपना कार्य प्रब्रूहि कार्यं च तवास्ति नाथ बताइये; आप कौन हैं? जो साक्षात् कामदेवके समान रूप कस्त्वं वदेतिष्ठसि कामरूपः॥ ३५ धारण किये यहाँ खड़े हैं?'॥ ३३—३५॥ इन्द्र उवाच इन्द्र बोले—प्रिये! मैं स्वर्गका राजा इन्द्र हूँ। तुम मेरे सा त्वं समागच्छ भजस्व मां चिरा- पास आओ और मुझे अपनाओ तथा चिरकालतक मेरे न्मदङ्गसङ्गोत्सुकतां व्रजाशु। अङ्ग-सङ्गके लिये शीघ्र ही उत्सुकता धारण करो। देखो, त्वया विना जीवितमप्यनल्पं तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन और स्वर्गका विशाल राज्य स्वर्गस्य राज्यं मम निष्फलं स्यात्॥ ३६ भी व्यर्थ हो जायगा॥ ३६॥ उक्ता च सैवं मधुरं च तेन इन्द्रने मधुर वाणीमें जब इस प्रकार कहा, तब उसका कंदर्पसंतापितचारुदेहा । सुन्दर शरीर कामवेदनासे पीडित होने लगा और वह विमानमारुह्य चलत्पताकं फहराती हुई पताकाओंसे सुशोभित विमानपर आरूढ हो सुरेशकण्ठग्रहणं चकार॥ ३७ देवराजके कण्ठसे लग गयी। तब स्वर्गके राजा इन्द्र शीघ्र जगाम शीघ्रं स हि नाकनाथः ही उसके साथ मन्दराचलकी उन कन्दराओंमें चले गये, साकं तया मन्दरकन्दरासु। जहाँका मार्ग देवता और असुर—दोनोंकी ही दृष्टिमें नहीं अदृष्टदेवासुरसंचरासु आया था और जो विचित्र रत्नोंकी प्रभासे प्रकाशित थीं। विचित्ररत्नाङ्कुरभासुरासु ॥ ३८ आश्चर्य है कि देवताओंके राज्यके प्रति आदर न रखते रेमे तया साकमुदारवीर्य- हुए भी वे उदारपराक्रमी इन्द्र उस सुन्दरी यक्ष-बालाके श्चित्रं सुरैश्वर्यगतादरोऽपि। साथ वहाँ रमण करने लगे तथा कामके वशीभूत हो परम स्वयं च यस्या लघुपुष्पशय्यां चतुर इन्द्रने अपने हाथों चित्रसेनाके लिये शीघ्रतापूर्वक चकार चातुर्यनिधिः सकामः॥ ३९ छोटी-सी पुष्पशय्या तैयार की। कामोपभोगमें परम चतुर जातः कृतार्थोऽमरवृन्दनाथः देवराज इन्द्र चित्रसेनाके समागमसे कृतार्थताका अनुभव सकामभोगेषु सदा विदग्धः। करने लगे। स्नेहरससे अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाला वह मोक्षाधिकं स्नेहरसातिमृष्टं परस्त्रीके आलिङ्गन और समागमका सुख उन्हें मोक्षसे भी पराङ्गनालिङ्गनसङ्गसौख्यम् ॥ ४० बढ़कर जान पड़ा॥ ३७—४०॥ 1113 Narsingpuran_Section_11_1_Back In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७५
अथागता यक्षपतेः समीपं | इधर, इन्द्र जब चित्रसेनाको लेकर मन्दराचलपर चले नार्योऽनुवव्र्ज्यैव च चित्रसेनाम्। | आये, तब उसकी सङ्गिनी स्त्रियाँ उसे साथ लिये बिना ससम्भ्रमाः सम्भ्रमखिन्नगात्राः | ही यक्षराज कुबेरके समीप वेगपूर्वक आयीं। वे दुस्साहससे सगद्गदं प्रोचुरसाहसज्ञाः ॥ ४१ | अनभिज्ञ थीं, अतः घबराहटके कारण उनके सारे शरीरमें नूनं समाकर्णय यक्षनाथ | व्यथा हो रही थी। वे गद्गद कण्ठसे बोलीं—‘यक्षपते! विमानमारोप्य जगाम कश्चित्। | निश्चय ही आप हमारी यह बात सुनें—आपकी भार्या संवीक्षमाणः ककुभोऽपि कान्तां | चित्रसेनाको किसी अज्ञात पुरुषने पकड़कर विमानपर विगृह्य वेगादिह सोऽपि तस्करः ॥ ४२ | बिठा लिया और चारों ओर सशङ्कदृष्टिसे देखता हुआ वह वचो निशम्याथ धनाधिनाथो | चोर बड़े वेगसे कहीं चला गया है' ॥ ४१-४२ ॥ विषोपमं जातमषीनिभाननः। | विषके समान दुस्सह प्रतीत होनेवाली इस बातको जगाद भूयो न च किंचिदेव | सुननेसे धनाधिप कुबेरका मुँह काला पड़ गया। वे बभूव वै वृक्ष इवाग्निदग्धः ॥ ४३ | अग्निसे जले हुए वृक्षके समान हो गये। उस समय विज्ञापितार्थो वरकन्यकाभि- | उनके मुखसे कोई बात नहीं निकली। इसी समय र्यश्चित्रसेनासहचारिणीभिः । | चित्रसेनाकी सहचरी श्रेष्ठ यक्ष-कन्याओंसे यह समाचार मोहापनोदाय मतिं दधानः | जानकर कुबेरका मन्त्री कण्ठकुब्ज भी अपने स्वामीका स कण्ठकुब्जोऽपि समाजगाम ॥ ४४ | मोह दूर करनेके विचारसे वहाँ आया। उसका आगमन श्रुत्वाऽऽगतं वीक्ष्य स राजराज | सुन राजराज कुबेरने आँखें खोलकर उसकी ओर देखा उन्मीलिताक्षो वचनं जगाद। | और लंबी साँस खींचते हुए अपने चित्तको यथासम्भव विनिःश्वसन् गाढसकम्पगात्रः | शीघ्र सँभालकर वे दीनभावसे बोले। उस समय उनका स्वस्थं मनोऽप्याशु विधाय दीनः ॥ ४५ | शरीर अत्यन्त कम्पित हो रहा था ॥ ४३-४५ ॥ तद्यौवनं यद्युवतीविनोदो | वे कहने लगे—'वही यौवन सफल है, जिससे धनं तु चैतत्स्वजनोपयोगि। | युवतीका मनोरञ्जन हो सके; धन भी वही सार्थक है, तज्जीवितं यत्क्रियते सुधर्म- | जो आत्मीय जनोंके उपयोगमें आ सके। जीवन वह स्तदाधिपत्यं यदि नष्टविग्रहम् ॥ ४६ | सफल है, जिससे सद्धर्म किया जाय और प्रभुत्व वही धिङ्मे धनं जीवितमत्यनल्पं | सार्थक है, जिसमें युद्ध और कलहके मूल नष्ट हो गये राज्यं बृहतसम्प्रति गुह्यकानाम्। | हों। इस समय मेरे इस विपुल धनको, गुह्यकोंके इस विशामि चाग्निं न च वेद कश्चित् | विशाल राज्यको और मेरे इस जीवनको भी धिक्कार पराभवोऽस्तीति च को मृतानाम् ॥ ४७ | है! अभीतक मेरे इस अपमानको कोई नहीं जानता; पार्श्वे स्थितस्यापि च जीवतो मे | अतः इसी समय अग्निमें जल मरूँगा। पीछे यदि इस गता तडागं गिरिजार्चनाय। | समाचारको लोग जान भी लें तो क्या? मृत पुरुषोंका हृता च केनापि वयं न विद्मो | क्या अपमान होगा? हा! वह मानसरोवरके तटपर ध्रुवं न तस्यास्ति भयं च मृत्योः ॥ ४८ | गिरिजा-पूजनके लिये गयी थी। यहाँ निकट ही था और जगाद वाक्यं स च कण्ठकुब्जो | जीवित भी रहा; तो भी किसीने उसे हर लिया। हम मोहापनोदाय विभोः स मन्त्री। | नहीं जानते वह कौन है। मैं समझता हूँ, अवश्य ही उस आकर्ण्यतां नाथ न चास्ति योग्यः | दुष्टको मृत्युका भय नहीं है' ॥ ४६-४८ ॥ कान्तावियोगे निजदेहघातः ॥ ४९ | स्वामीकी यह बात सुनकर उनका मोह दूर | करनेके लिये कुबेरके उस मन्त्री कण्ठकुब्जने | यह वचन कहा—'नाथ! सुनिये, स्त्रीके वियोगमें | शरीर-त्याग करना आपके लिये उचित नहीं है।
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२७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
एका पुरा रामवधूर्हता च निशाचरेणापि मृतो न सोऽपि। अनेकशः सन्ति तवात्र नार्यः को नाम चित्ते क्रियते विषादः॥ ५० विमुच्य शोकं कुरु विक्रमे मतिं धैर्यं समालम्ब्य यक्षराज। भृशं न जल्पन्ति रुदन्ति साधवः पराभवं बाह्यकृतं सहन्ते॥ ५१ कृतं हि कार्यं गुरु दर्शयन्ति सहायवान् वित्तप कातरोऽसि किम्। सहायकार्यं कुरुते हि सम्प्रति स्वयं हि यस्यावरजो विभीषणः॥ ५२ धनद उवाच विभीषणो मे प्रतिपक्षभूतो दायादभावं न विमुञ्चतीति। ध्रुवं प्रसन्ना न भवन्ति दुर्जनाः कृतोपकारा हरिवज्रनिष्ठुराः॥ ५३ न चोपकारैर्न गुणैर्न सौहृदैः प्रसादमायाति मनो हि गोत्रिणः। उवाच वाक्यं स च कण्ठकुब्जो युक्तं त्वयोक्तं च धनाधिनाथ॥ ५४ परस्परं घ्नन्ति च ते विरुद्धा- स्तथापि लोके न पराभवोऽस्ति। पराभवं नान्यकृतं सहन्ते नोष्णं जलं ज्वालयते तृणानि॥ ५५ तस्मात्समागच्छ धनाधिनाथ पार्श्वं च वेगेन विभीषणस्य। स्वबाहुवीर्यार्जितवित्तभोगिनां स्वबन्धुवर्गेषु हि को विरोधः॥ ५६ इत्युक्तः स तदा तेन कण्ठकुब्जेन मन्त्रिणा। विभीषणस्य सामीप्यं जगामाशु विचारयन्॥ ५७ ततो लङ्काधिपः श्रुत्वा बान्धवं पूर्वजं तदा। प्राप्तं प्रत्याजगामाशु विनयेन समन्वितः॥ ५८ ततो विभीषणो दृष्ट्वा तदा दीनं च बान्धवम्। संप्ततमानसो भूप जगादेदं वचो महत्॥ ५९
[हिन्दी अनुवाद]
पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी एकमात्र पत्नी सीताको भी निशाचर रावणने हर लिया था, परंतु श्रीरामचन्द्रजीने प्राण नहीं त्यागा। आपके यहाँ तो अनेक स्त्रियाँ हैं, फिर आप मनमें यह कैसा विषाद ला रहे हैं? यक्षराज! शोक त्यागकर पराक्रममें मन लगाइये; धैर्य धारण कीजिये। साधु पुरुष बहुत बातें नहीं बनाते और न बैठकर रोते ही हैं; वे दूसरोंके द्वारा परोक्षमें किये हुए अपने अपमानको उस समय चुपचाप सह लेते हैं। वित्तपते! महापुरुष समय आनेपर महान् कार्य कर दिखाते हैं। आपके तो अनेक सहायक हैं, आप क्यों कातर हो रहे हैं? इस समय तो आपके छोटे भाई विभीषण स्वयं ही आपकी सहायता कर रहे हैं॥ ४९—५२॥
**कुबेर बोले—**विभीषण तो मेरे विपक्षी ही बने हुए हैं, वे अब भी मेरे साथ कौटुम्बिक विरोधका त्याग नहीं करते। यह निश्चित बात है कि दुर्जन पुरुष उपकार करनेपर भी प्रसन्न नहीं होते, वे इन्द्रके वज्रके सदृश कठोर होते हैं। सगोत्रका मन उपकारोंसे, गुणोंसे अथवा मैत्रीसे भी प्रायः प्रसन्न नहीं होता॥ ५३१/२॥
यह सुनकर कण्ठकुब्जने कहा—'धनाधिनाथ! आपने ठीक कहा है। विरोध होनेपर सगोत्र पुरुष अवश्य ही परस्पर घात-प्रतिघात करते हैं, तथापि लोकमें उनका पराभव नहीं देखा जाता; क्योंकि कुटुम्बीजन दूसरेके द्वारा किये हुए अपने बन्धुजनके अपमानको नहीं सह सकते। जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे तप्त हुआ जल अपने भीतरके तृणोंको नहीं जलाता, उसी प्रकार दूसरोंसे अपमानित कुटुम्बी जन अपने पार्श्ववर्ती बन्धुओंको नहीं सताते। इसलिये धनाधिप! आप बहुत शीघ्र विभीषणके पास चलिये। जो लोग अपने बाहुबलसे उपार्जित धनका उपभोग करते हैं, उन्हें भाई-बन्धुओंके साथ क्या विरोध हो सकता है'॥ ५४—५६॥
अपने मन्त्री कण्ठकुब्जके इस प्रकार कहनेपर कुबेर मन-ही-मन उसपर विचार करते हुए शीघ्र ही विभीषणके पास गये। लङ्कापति विभीषणने जब अपने ज्येष्ठ भ्राताका आगमन सुना, तब उन्होंने बड़ी विनयके साथ उनकी अगवानी की। राजन्! फिर विभीषणने अपने भाईको जब दीनदशामें देखा, तब उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर उनसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही॥ ५७—५९॥
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७७
विभीषण उवाच | विभीषण बोले—'यक्षराज! आप दीन क्यों हो कथं दीनोऽसि यक्षेश किं कष्टं तव चेतसि। | रहे हैं? आपके मनमें क्या कष्ट है? इस समय आप निवेदयाधुनास्माकं निश्चयान्मार्जयामि तत्॥ ६० | उस कष्टको मुझे बताइये। मैं निश्चय ही उसका मार्जन तदैकान्तं समासाद्य कथयामास वेदनाम्। | करूँगा।' तब कुबेरने एकान्तमें जाकर विभीषणसे अपनी | मनोवेदना बतलायी॥ ६०१/२॥ धनद उवाच | कुबेर बोले—भाई! कुछ दिनोंसे मैं अपनी मनोरमा गृहीता किं स्वयं याता निहता केनचिद्द्विषा॥ ६१ | भार्या चित्रसेनाको नहीं देख रहा हूँ। न जाने उसे किसीने भ्रातः कान्तां न पश्यामि चित्रसेनां मनोरमाम्। | पकड़ लिया या वह स्वयं किसीके साथ चली गयी एतद्वन्धो महत्कष्टं मम नारीसमुद्भवम्॥ ६२ | अथवा किसी शत्रुने उसे मार डाला। बन्धो! मुझे अपनी प्राणान् वै घातयिष्यामि अनासाद्य च वल्लभाम्। | स्त्रीके वियोगका महान् कष्ट हो रहा है। यदि वह प्राणवल्लभा | न मिली तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा॥ ६१-६२१/२॥ विभीषण उवाच | विभीषण बोले—'प्रभो! आपकी भार्या जहाँ- आनयिष्यामि ते कान्तां यत्र तत्र स्थितां विभो॥ ६३ | कहीं भी होगी, मैं उसे ला दूँगा। नाथ! इस समय कः समर्थोऽधुनास्माकं हर्तुं नाथ तृणस्य च। | संसारमें किसकी सामर्थ्य है जो हमारा तृण भी चुरा ततो विभीषणस्तत्र नाडीजङ्घां निशाचरीम्॥ ६४ | सके।' यह कहकर विभीषणने नाना प्रकारकी मायाके भृशं संजल्पयामास नानामायागरीयसीम्। | ज्ञानमें बढ़ी-चढ़ी 'नाडीजङ्घा' नामकी निशाचरीसे धनदस्य च या कान्ता चित्रसेनाभिधानतः॥ ६५ | बहुत कुछ कहा और बताया—"कुबेरकी जो 'चित्रसेना' सा च केन हृता लोके मानसे सरसि स्थिता। | नामकी पत्नी है, वह एक दिन जब मानससरोवरके तां च जानीहि संवीक्ष्य देवराजादिवेश्मसु॥ ६६ | तटपर थी, तभी वहाँसे किसीने उसे हर लिया। तुम ततो निशाचरी भूप कृत्वा मायामयं वपुः। | इन्द्र आदि लोकपालोंके भवनोंमें देखकर उसका पता जगाम त्रिदिवं शीघ्रं देवराजादिवेश्मसु॥ ६७ | लगाओ"॥ ६३-६६॥ यया दृष्ट्या क्षणं दृष्टो मोहं यास्यति चोपलः। | भूप! तब वह निशाचरी मायामय शरीर धारणकर यस्याः समं ध्रुवं रूपं विद्यते न चराचरे॥ ६८ | इन्द्रादि देवताओंके भवनोंमें खोज करनेके लिये शीघ्र ही एतस्मिन्नेव काले च देवराजोऽपि भूपते। | स्वर्गलोकमें गयी। उस निशाचरीने ऐसा सुन्दर रूप सम्प्राप्तो मन्दराच्छीघ्रं प्रेरितश्चित्रसेनया॥ ६९ | बनाया था, जिसकी एक ही दृष्टि पड़नेसे पत्थर भी ग्रहीतुं दिव्यपुष्पाणि नन्दनप्रभवाणि च। | मोहित हो सकता था। अवश्य ही उस समय वैसा तत्र पश्यन् स तां तन्वीं निजस्थाने समागताम्॥ ७० | मोहन रूप चराचर जगत्में कहीं नहीं था। भूपते! इसी अतीवरूपसम्पन्नां गीतगानपरायणाम्। | समय देवराज इन्द्र भी चित्रसेनाके भेजनेसे उतावलीके तां वीक्ष्य देवराजोऽपि स कामवशगोऽभवत्॥ ७१ | साथ नन्दनवनके दिव्य पुष्प लेनेके लिये मन्दराचलसे ततः सम्प्रेरयामास देववैद्यौ सुराधिपः। | स्वर्गलोकमें आये थे। वहाँ अपने स्थानपर आयी हुई तस्याः पार्श्वे समानेतुं ध्रुवं चान्तःपुरे तदा॥ ७२ | उस अत्यन्त रूपवती रमणीको जो मधुर गान गा रही थी, देववैद्यौ तदाऽऽगत्य जल्पतश्चाग्रतः स्थितौ। | देख देवराज भी कामके वशीभूत हो गये। तब देवेन्द्रने आगच्छ भव तन्वङ्गि देवराजसमीपगा॥ ७३ | उसे जैसे भी हो, अपने अन्तःपुरमें बुला लानेके लिये | देववैद्य अश्विनीकुमारोंको उसके पास भेजा। दोनों | अश्विनीकुमार उसके सामने जाकर खड़े हुए और कहने | लगे—"कृशाङ्गि! आओ, देवराज इन्द्रके निकट चलो।"
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२७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ [संस्कृत-मूल] इत्युक्त्वा सा तदा ताभ्यां जगाद मधुराक्षरम्। नाडीजङ्घोवाच देवराजः स्वयं यन्मे पार्श्वं चात्रागमिष्यति॥ ७४ तस्य वाच्यं च कर्तव्यं नान्यथा सर्वथा मया। तौ तदा वासवं गत्वा ऊचतुर्वचनं शुभम्॥ ७५ वासव उवाच समादेशय तन्वङ्गि किं कर्तव्यं मयाधुना। सर्वदा दासभूतस्ते याचसे तद्ददाम्यहम्॥ ७६ तन्वङ्ग्युवाच याचितं यदि मे नाथ दास्यसीति न संशयः। ततोऽहं वशगा देव भविष्यामि न संशयः॥ ७७ अद्य त्वं दर्शयास्माकं सर्वः कान्तापरिग्रहः। मम रूपसमा रामा कान्ता ते चास्ति वा न वा॥ ७८ तया चोक्ते च वचने स भूयो वासवोऽवदत्। दर्शयिष्यामि सर्वं ते देवि कान्तापरिग्रहम्॥ ७९ स सर्वं दर्शयामास वासवोऽन्तःपुरं तदा। ततो जगाद भूयः सा किंचिद्गूढं मम स्थितम्॥ ८० विमुच्यैकां च युवतीं सर्वं ते दर्शितं मया। इन्द्र उवाच सा रामा मन्दरे चास्ति अविज्ञाता सुरासुरैः॥ ८१ तां च ते दर्शयिष्यामि नाख्येयं कस्यचित्त्वया। ततः स देवराजोऽपि तया सार्धं च भूपते॥ ८२ गच्छन्नेवाम्बरे भूप मन्दरं प्रति भूधरम्। तस्य वै गच्छमानस्य विमानेनार्कवर्चसा॥ ८३ दर्शनं नारदस्यापि तस्य जातं तदाम्बरे। तं वीक्ष्य नारदं वीरो लज्जमानोऽपि वासवः॥ ८४ नमस्कृत्य जगादोच्चैः क्व यास्यसि महामुने। ततः कृताशीः स मुनिरवदत्त्रिदिवेश्वरम्॥ ८५ गच्छामि मानसे स्नातुं देवराज सुखी भव। नाडीजङ्घेऽस्ति कुशलं राक्षसानां महात्मनाम्॥ ८६ [हिन्दी-अनुवाद] उन दोनोंके द्वारा यों कही जानेपर उस सुन्दरीने मधुर वाणीमें उत्तर दिया॥ ६७—७३१/२॥ नाडीजङ्घा बोली— यदि देवराज इन्द्र स्वयं ही मेरे पास आयेंगे तो मैं उनकी बात मान सकती हूँ; अन्यथा बिलकुल नहीं॥ ७४१/२॥ तब अश्विनीकुमारोंने इन्द्रके पास जाकर उसका शुभ संदेश कहा॥ ७५॥ तब इन्द्र स्वयं आकर बोले— कृशाङ्गि! आज्ञा दो, मैं इस समय तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ? मैं सदाके लिये तुम्हारा दास हो गया हूँ; तुम जो कुछ माँगोगी, वह सब दूँगा॥ ७६॥ कृशाङ्गीने कहा— नाथ! यदि आप मेरी माँगी हुई वस्तु अवश्य दे देंगे, तो निःसंदेह मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी। आज आप अपनी समस्त भार्याओंको मुझे दिखाइये; देखूँ, आपकी कोई भी स्त्री मेरे रूपके सदृश है या नहीं?॥ ७७-७८॥ उसके यों कहनेपर इन्द्रने पुनः कहा—‘देवि! चलो, मैं तुम्हें अपनी समस्त भार्याओंको दिखाऊँगा।’ यह कहकर इन्द्रने उसी समय उसे अपना सारा अन्तःपुर दिखाया। तब उस सुन्दरीने पुनः कहा—‘अभी मुझसे कुछ छिपाया गया है। केवल एक युवतीको छोड़कर और सब कुछ आपने दिखा दिया'॥ ७९-८०१/२॥ इन्द्रने कहा— ‘वह रमणी मन्दराचलपर है। देवता और असुर—किसीको भी उसका पता नहीं है। मैं उसे भी तुम्हें दिखा दूँगा, परंतु यह रहस्य किसीपर प्रकट न करना।’ भूपाल! यह कहकर देवराज इन्द्र उसके साथ आकाशमार्गसे मन्दराचलकी ओर चले। जिस समय वे सूर्यके समान कान्तिमान् विमानसे चले जा रहे थे, उसी समय उन्हें आकाशमें देवर्षि नारदका दर्शन हुआ। नारदजीको देखकर वीरवर इन्द्र यद्यपि लज्जित हुए, तथापि उन्हें नमस्कार करके पूछा—‘महामुने! आप कहाँ जायेंगे?'॥ ८१—८४१/२॥ तब मुनिवर नारदजीने आशीर्वाद देते हुए स्वर्गाधिपति इन्द्रसे कहा—‘देवराज! आप सुखी हों, मैं इस समय मानसरोवरपर स्नान करने जा रहा हूँ।' [फिर उन्होंने नाडीजङ्घाको पहचानकर कहा—] 'नाडीजङ्घे! कहो तो महात्मा राक्षसोंका कुशल तो है न?
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७९
विभीषणोऽपि ते भ्राता सुखी तिष्ठति सर्वदा । | तुम्हारे भाई विभीषण तो सुखपूर्वक हैं न ?' नारदजीकी एवमुक्ता च मुनिना सा कृष्णावदनाभवत् ॥ ८७ | यह बात सुनते ही उसका मुख भयसे काला पड़ गया। विस्मितो देवराजोऽपि छलितो दुष्टयानया । | देवराज इन्द्र भी बहुत आश्चर्यमें पड़े और मन-ही- नारदोऽपि गतः स्नातुं कैलासे मानसं सरः ॥ ८८ | मन कहने लगे—'इस दुष्टाने मुझे छल लिया।' नारदजी | भी वहाँसे कैलास पर्वतके निकट मानससरोवरमें स्नान इन्द्रस्तां हन्तुकामोऽपि आगच्छन्मन्दराचलम् । | करनेके लिये चले गये। तब इन्द्र भी उस राक्षसीका यत्राश्रमोऽस्ति वै नूनं तृणबिन्दोर्महात्मनः ॥ ८९ | वध करनेके लिये मन्दराचलपर, जहाँ महात्मा तृणबिन्दु का | आश्रम था, आये और वहाँ थोड़ी देरतक विश्राम करके क्षणं विश्रम्य तत्रैव धृत्वा केशेषु राक्षसीम् । | वे उस नाडीजङ्घा राक्षसीके केश पकड़कर उसे मारना हन्तुमिच्छति देवेशो नाडीजङ्घां निशाचरीम् ॥ ९० | ही चाहते थे कि इतनेमें महात्मा तृणबिन्दु अपने आश्रमसे तावत्तत्र समायातस्तृणबिन्दुन्निजाश्रमात् । | निकलकर वहाँ आ गये ॥ ८५—९०१/२ ॥ धृता क्रन्दति सा राजन्निन्द्रेणापि निशाचरी ॥ ९१ | राजन् ! इधर इन्द्रके द्वारा पकड़ी जानेपर वह राक्षसी | भी करुण विलाप करने लगी—'हा! मैं मारी जा रही मा मां रक्षति पुण्यात्मा हन्यमानां च साम्प्रतम् । | हूँ; इस समय कोई भी पुण्यात्मा पुरुष मुझ दीनाको तदाऽऽगत्य मुनिश्रेष्ठस्तृणबिन्दुर्महातपाः ॥ ९२ | नहीं बचा रहा है' ॥ ९११/२ ॥ जगाद पुरतः स्थित्वा मुञ्चेमां महिलां वने । | उसी समय महातपस्वी तृणबिन्दु मुनि वहाँ आ जल्पत्येवं मुनौ तस्मिन् महेन्द्रेण निशाचरी ॥ ९३ | पहुँचे और इन्द्रके सामने खड़े हो बोले—'हमारे तपोवनमें | इस महिलाको न मारो, छोड़ दो' ॥ ९२१/२ ॥ वज्रेण निहता भूयः कोपयुक्तेन चेतसा । | भूप ! तृणबिन्दु मुनि यों कह ही रहे थे कि महेन्द्रने स चुकोप मुनिश्रेष्ठः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ९४ | क्रुद्ध होकर वज्रसे उस राक्षसीको मार ही तो डाला। यदेषा युवती दुष्टा निहता मे तपोवने । | तब वे मुनिवर इन्द्रकी ओर बार-बार देखते हुए बहुत ततस्त्वं मम शापेन निश्चयात् स्त्री भविष्यसि ॥ ९५ | ही कुपित हुए और बोले—'रे दुष्ट ! तूने मेरे तपोवनमें | इस युवतीका वध किया है, इसलिये तू मेरे शापसे इन्द्र उवाच | निश्चय ही स्त्री हो जायगा' ॥ ९३—९५ ॥ एषा नाथ महादुष्टा राक्षसी निहता मया । | इन्द्र बोले—नाथ! मैं देवताओंका स्वामी इन्द्र हूँ अहं स्वामी सुराणां च शापं मा देहि मेऽधुना ॥ ९६ | और यह स्त्री महादुष्टा राक्षसी थी; इसलिये मैंने इसका | वध किया है। आप इस समय मुझे शाप न दें ॥ ९६ ॥ मुनिरुवाच | मुनि बोले—अवश्य ही मेरे तपोवनमें भी दुष्ट और नूनं तपोवनेऽस्माकं दुष्टास्तिष्ठन्ति साधवः । | साधु पुरुष भी रहते हैं, परंतु वे मेरी तपस्याके प्रभावसे ममात्र तपसो भावान्न निघ्नन्ति परस्परम् ॥ ९७ | परस्पर किसीका वध नहीं करते। (तूने मेरे तपोवनकी | मर्यादा भङ्ग की है, अतः तू शापके ही योग्य है।) ॥ ९७ ॥ इत्युक्तो हि तदा चेन्द्रः प्राप्तः स्त्रीत्वं न संशयः । | भूप ! मुनिके यों कहनेपर इन्द्र निःसंदेह स्त्रीयोनिको प्राप्त जगाम त्रिदिवं भूप हतशक्तिपराक्रमः ॥ ९८ | हो गये और पराक्रम तथा शक्ति खोकर स्वर्गको लौट आये। | उन्होंने सदा ही लज्जा और दुःखसे खिन्न रहनेके कारण नासीनो हि भवत्येव सर्वदा देवसंसदि । | देवताओंकी सभामें बैठना ही छोड़ दिया। इधर देवता भी देवा दुःखं समापन्ना दृष्ट्वा स्त्रीत्वं गतं हरिम् ॥ ९९ | इन्द्रको स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हुआ देखकर बहुत दुःखी
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२८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ ततो देवगणाः सर्वे वासवेन समन्विताः। हुए। तत्पश्चात् सभी देवता और दीना शची इन्द्रको साथ जग्मुश्च ब्रह्मसदनं तथा दीना शची तदा॥ १०० लेकर ब्रह्माजीके धामको गये। जबतक ब्रह्माजी समाधिसे ब्रह्मा भग्नसमाधिश्च यावत् तत्रैव संस्थिताः। विरत हुए, तबतक वे सभी वहीं ठहरे रहे और इन्द्रके देवा ऊचुश्च ते सर्वे वासवेन समन्विताः॥ १०१ साथ ही सब देवता ब्रह्माजीसे बोले॥ ९८-१०१॥ तृणबिन्दोर्मुनेः शापाद्यातः स्त्रीत्वं सुराधिपः। 'ब्रह्मन्! सुरराज इन्द्र तृणबिन्दु मुनिके शापसे स्त्रीयोनिको स मुनिः कोपवान् ब्रह्मन्नैव गच्छत्यनुग्रहम्॥ १०२ प्राप्त हो गये हैं; वे मुनि बड़े क्रोधी हैं, किसी प्रकार पितामह उवाच अनुग्रह नहीं करते'॥ १०२॥ ब्रह्माजी बोले—इसमें उन महात्मा तृणबिन्दु मुनिका न मुनेरपराधः स्यात्तृणबिन्दोर्महात्मनः। कोई अपराध नहीं है। इन्द्र स्त्रीवधरूपी अपने ही स्वकर्मणोपयातोऽसौ स्त्रीत्वं स्त्रीवधकारणात्॥ १०३ कर्मसे स्त्रीभावको प्राप्त हुए हैं। देवताओ! देवराज इन्द्रने भी मदमत्त होकर बड़ा ही अन्याय किया है, जो चकार दुर्नयं देवा देवराजोऽपि दुर्मदः। कुबेरकी पत्नी चित्रसेनाका गुप्तरूपसे अपहरण कर लिया। जहार चित्रसेनां च सुगुप्तां धनदाङ्गनाम्॥ १०४ यही नहीं, इन्होंने तृणबिन्दुके तपोवनमें एक युवतीका तथा जघान युवतीं तृणबिन्दोस्तपोवने। वध किया है, अतः अपने इस निन्द्य कर्मके परिणामस्वरूप तेन कर्मविपाकेन स्त्रीभावं वासवो गतः॥ १०५ ही ये इन्द्र स्त्रीभावको प्राप्त हुए हैं॥ १०३-१०५॥ देवा ऊचुः देवगण बोले—नाथ इन्होंने दुर्बुद्धिसे प्रेरित होकर जो शंकरप्रिय कुबेरका अपमान किया है, उसके लिये यदसौ कृतवाञ्शम्भोरुर्नयं नाथ दुर्मतिः। हम सब लोग शचीके साथ कुबेरको प्रसन्न करनेका यत्न तत्सर्वं साधयिष्यामो वयं शच्या समन्विताः॥ १०६ करेंगे। विभो! कुबेरकी पत्नी चित्रसेना मन्दराचलपर कान्ता धनाधिनाथस्य गूढा तिष्ठति या विभो। गुप्तरूपसे रहती है, हम सभी लोग सम्मति करके उसे तां च तस्मै प्रदास्यामः सर्वे कृत्वा परां मतिम्॥ १०७ कुबेरको अर्पित कर देंगे। देवराज इन्द्र भी प्रति त्रयोदशी त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां देवराजः शचीयुतः। और चतुर्दशीको नन्दनवनमें शचीको साथ लेकर यक्ष नन्दने चार्चनं कर्ता सर्वदा यक्षरक्षसाम्॥ १०८ और राक्षसोंकी पूजा करेंगे॥ १०६-१०८॥ तत्पश्चात् शची अपने प्रियतमको कष्टमें डालनेवाली ततः शची तदा गूढं चित्रसेनां विगृह्य च। चित्रसेनाको गुप्तरूपसे ले जाकर यक्षराज कुबेरके भवनमें मुमोच यक्षभवनं प्रियकष्टानुवर्तिनीम्॥ १०९ छोड़ आयीं। इसी समय कुबेरका दूत असमयमें ही एतस्मिन्नन्तरे दूतोऽकाले लङ्कां समागतः। लङ्कामें पहुँचा और कुबेरसे चित्रसेनाके लौट आनेका धनेशं कथयामास चित्रसेनासमागमम्॥ ११० समाचार सुनाया—'हे धनाधिप! आपकी प्रिय पत्नी चित्रसेना शचीके साथ घर लौट आयी है। वह शची- शच्या साकं समायाता तव कान्ता धनाधिप। जैसी अनुपम सखीको पाकर कृतार्थ हो चुकी है।' तब सखीं स्वामतुलां प्राप्य चरितार्था बभूव सा॥ १११ कुबेर भी कृतकृत्य होकर अपने घरको लौट आये। धनेशोऽपि कृतार्थोऽभूज्जगाम निजवेश्मनि। इसके बाद देवगण पुनः ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे॥ १०९-११११/२॥ देवा ऊचुः देवगण बोले—ब्रह्मन्! आपकी कृपासे सर्वमेतत्कृतं ब्रह्मन् प्रसादात्ते न संशयः॥ ११२ यह सारा काम तो हो गया—इसमें संदेह नहीं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth