संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६३] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २८१ पतिहीना यथा नारी नाथहीनं यथा बलम्। गोकुलं कृष्णहीनं तु तथेन्द्रेणामरावती ॥ ११३ जपः क्रिया तपो दानं ज्ञानं तीर्थं च वै प्रभो। वासवस्य समाख्याहि यतः स्त्रीत्वाद्दिमुच्यते ॥ ११४ ब्रह्मोवाच निहन्तुं न मुनेः शापं समर्थोऽहं न शङ्करः। तीर्थं चान्यन्न पश्यामि मुक्त्वैकं विष्णुपूजनम् ॥ ११५ अष्टाक्षरेण मन्त्रेण पूजनं च तथा जपम्। करोतु विधिवच्छक्रः स्त्रीत्वाद्येन च मुच्यते ॥ ११६ एकाग्रमनसा शक्र स्नात्वा श्रद्धासमन्वितः। ॐ नमो नारायणायेति जप त्वमात्मशुद्धये ॥ ११७ लक्षद्वये कृते जाप्ये स्त्रीभावान्मुच्यसे हरे। इति श्रुत्वा तथाकार्षीद्ब्रह्मोक्तं वचनं हरिः। स्त्रीभावाच्च विनिर्मुक्तस्तदा विष्णोः प्रसादतः ॥ ११८ मार्कण्डेय उवाच इति ते कथितं सर्वं विष्णुमाहात्म्यमुत्तमम्। मया भृगुनियुक्तेन कुरु सर्वमतन्द्रितः ॥ ११९ शृण्वन्ति ये विष्णुकथामकल्मषा वीर्यं हि विष्णोऽखिलकारणस्य। ते मुक्तपापाः परदारगामिनो विशन्ति विष्णोः परमं पदं ध्रुवम् ॥ १२० सूत उवाच इति सम्बोधितस्तेन मार्कण्डेयेन पार्थिवः। नरसिंहं समाराध्य प्राप्तवान् वैष्णवं पदम् ॥ १२१ एतत्ते कथितं सर्वं भरद्वाज मुने मया। सहस्रानीकचरितं किमन्यत् कथयामि ते ॥ १२२ कथामिमां यस्तु शृणोति मानवः पुरातनीं सर्वविमुक्तिदां च। सम्प्राप्य स ज्ञानमतीव निर्मलं तेनैव विष्णुं प्रतिपद्यते जनः ॥ १२३ परंतु अब जैसे पतिके बिना नारी, सेनापतिके बिना सेना और श्रीकृष्णके बिना व्रजकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार इन्द्रके बिना अमरावती सुशोभित नहीं होती। प्रभो! अब इन्द्रके लिये कोई जप, क्रिया, तप, दान, ज्ञान और तीर्थ-सेवन आदि उपाय बताइये, जिससे स्त्रीभावसे इनका उद्धार हो सके ॥ ११२-११४॥ ब्रह्माजी बोले—उस मुनिके शापको अन्यथा करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न भगवान् शङ्कर ही। इसके लिये एकमात्र भगवान् विष्णुके पूजनको छोड़कर दूसरा कोई उपाय भी सफल नहीं दीख पड़ता। बस, इन्द्र अष्टाक्षर-मन्त्रके द्वारा भगवान् विष्णुका विधिपूर्वक पूजन करें और उस मन्त्रका जप करते रहें; इससे वे स्त्रीभावसे मुक्त हो सकते हैं। इन्द्र! स्नान करके, श्रद्धायुक्त हो, आत्मशुद्धि-के लिये एकाग्रचित्तसे 'ॐ नमो नारायणाय' —इस मन्त्रका जप करो। देवेन्द्र! इस मन्त्रका दो लाख जप हो जानेपर तुम स्त्री-योनिसे मुक्त हो सकते हो। यह सुनकर इन्द्रने ब्रह्माजीकी आज्ञाका यथावत् पालन किया, तब वे भगवान् विष्णुकी कृपासे स्त्रीभावसे छुटकारा पा गये ॥ ११५-११८॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार मैंने भृगुजीकी आज्ञासे तुम्हारे समक्ष परम उत्तम भगवान् विष्णुके माहात्म्यको पूर्णरूपसे सुना दिया। अब तुम आलस्य त्यागकर भगवान् विष्णुकी आराधना करो। जो लोग अखिल जगत्के कारणभूत भगवान् विष्णुके पराक्रमसे सम्बन्ध रखनेवाली उनकी कथाको सुनते हैं, वे यदि परस्त्रीगामी रहे हों तो भी पापहीन एवं कल्मषरहित होकर निश्चय ही भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ ११९-१२०॥ सूतजी कहते हैं—मुनिवर मार्कण्डेयजीके द्वारा इस तरह सम्यक् प्रकारसे उपदिष्ट होकर राजा सहस्रानीक भगवान् नृसिंहकी आराधना करके विष्णुके अविनाशी पदको प्राप्त हो गये। भरद्वाज मुने! इस प्रकार मैंने आपको यह सम्पूर्ण सहस्रानीक-चरित्र सुनाया; इसके बाद आपसे और क्या कहूँ? ॥ १२१-१२२॥ जो मानव सब प्रकारसे मोक्ष देनेवाली इस प्राचीन कथाका श्रवण करता है, वह अत्यन्त निर्मल ज्ञान प्राप्त करके उसीके द्वारा भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है ॥ १२३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरितेऽष्टाक्षरमन्त्रकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत 'अष्टाक्षर-मन्त्रकी महिमाका कथन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४
२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४ चौंसठवाँ अध्याय भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान
[मूल संस्कृत श्लोक]
श्रीभरद्वाज उवाच सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे। सांख्यं केचित्प्रशंसन्ति योगमन्ये प्रचक्षते॥ १ ज्ञानं केचित्प्रशंसन्ति समलोष्टाश्मकाञ्चनाः। क्षमां केचित्प्रशंसन्ति तथैव च दयार्जवम्॥ २ केचिद्दानं प्रशंसन्ति केचिदाहुः परं शुभम्। सम्यग्ज्ञानं परं केचित्केचिद्वैराग्यमुत्तमम्॥ ३ अग्निष्टोमादिकर्माणि तथा केचित्परं विदुः। आत्मध्यानं परं केचित्सांख्यतत्त्वार्थवेदिनः॥ ४ धर्मार्थकाममोक्षाणां चतुर्णामिह केवलम्। उपायः पदभेदेन बहुधैवं प्रचक्ष्यते॥ ५ एवं चावस्थिते लोके कृत्याकृत्यविधौ नराः। व्यामोहमेव गच्छन्ति विमुक्ताः पापकर्मभिः॥ ६ यदेतेषु परं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः। वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मम सर्वार्थसाधकम्॥ ७ सूत उवाच श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम्। अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्॥ ८ पुण्डरीकस्य संवादं देवर्षेर्नारदस्य च। ब्राह्मणः श्रुतसम्पन्नः पुण्डरीको महामतिः॥ ९ आश्रमे प्रथमे तिष्ठन् गुरूणां वशगः सदा। जितेन्द्रियो जितक्रोधः संध्योपासनधिष्ठितः॥ १० वेदवेदाङ्गनिपुणः शास्त्रेषु च विचक्षणः। समिद्भिः साधुयत्नेन सायं प्रातर्हुताशनम्॥ ११
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! कुछ लोग 'सत्य' को ही पुरुषार्थका साधक बताकर उसकी प्रशंसा करते हैं, दूसरे लोग 'तपस्या' और 'पवित्रता' को उत्तम बताते हैं। कुछ लोग 'सांख्य' और कुछ लोग 'योग' की प्रशंसा करते हैं। ढेले, पत्थर और सोनेको समान समझनेवाले कुछ अन्य लोग 'ज्ञान' को ही पुरुषार्थ-साधनके लिये उत्तम मानते हैं। कुछ लोग 'क्षमा' की प्रशंसा करते हैं तो कुछ लोग 'दया' और 'सरलता' की। कुछ लोग ऐसे हैं, जो 'दान' को उत्तम बताते हैं, कुछ लोग और ही किसी उपायको शुभ कहते हैं। दूसरे लोग 'सम्यग्ज्ञान' को उत्तम मानते हैं और अन्य जन 'वैराग्य' को श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ याज्ञिक लोग 'अग्निष्टोम' आदि यज्ञोंको ही सबसे बढ़कर मानते हैं। सांख्यतत्त्वका मर्म जाननेवाले कुछ लोग 'आत्माके ध्यान' को श्रेष्ठ मानते हैं। इस प्रकार यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंका उपाय ही नाम-भेदसे नाना प्रकारका बताया जाता है। ऐसी स्थितिमें जगत्में पापकर्मसे विमुक्त पुरुष भी कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें कुछ निश्चय न हो सकनेके कारण मोहमें ही पड़े रहते हैं। सर्वज्ञ! इन उपर्युक्त 'सत्य' आदि उपायोंमें जो सबसे उत्तम उपाय हो और महात्माओंद्धारा अवश्यकर्तव्य हो, सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उस उपायका आप हमसे वर्णन करें॥ १–७॥ सूतजी कहते हैं—संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले इस अत्यन्त गूढ उपायको लोग सुनें। इस विषयमें महात्माजन देवर्षि नारद और भक्तवर पुण्डरीकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं॥ ८१/२॥ महामति पुण्डरीकजी एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे सदा गुरुजनोंके वशमें रहते हुए ब्रह्मचर्य आश्रमके नियमोंका पालन करते थे। उन्होंने अपनी इन्द्रियों और क्रोधको जीत लिया था तथा वे नियमानुसार संध्योपासन किया करते थे। वेद और वेदाङ्गोंमें वे निष्णात थे तथा अन्य शास्त्रोंके भी पण्डित थे। वे प्रतिदिन समिधा एकत्रकर सायं और प्रातःकाल अत्यन्त यत्नपूर्वक अग्निकी उपासना
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अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८३
ध्यात्वा यज्ञपतिं विष्णुं सम्यगाराधयन् विभुम्। | किया करते थे। साक्षात् ब्रह्मपुत्र नारदजीके समान वे सर्वव्यापी तपःस्वाध्यायनिरतः साक्षाद्ब्रह्मसुतो यथा॥ १२ | यज्ञपति भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक आराधना करते हुए | उनका ध्यान किया करते थे और सदा तपस्या तथा स्वाध्यायमें उदकेन्धनपुष्पार्थैरसकृत्तर्पयन् गुरून्। | ही लगे रहते थे। जल, ईंधन और फूल आदि आवश्यक मातापितृभ्यां शुश्रूषुर्भिक्षाहारी जनप्रियः॥ १३ | सामान लाकर वे सदा ही गुरुजनोंको संतुष्ट रखते और | उनकी अपने माता-पिताके समान शुश्रूषा किया करते थे। ब्रह्मविद्यामधीयानः प्राणायामपरायणः। | भिक्षा माँगकर भोजन करते थे और अपने सद्व्यवहारोंके तस्य सर्वार्थभूतस्य संसारेऽत्यन्तनिःस्पृहा॥ १४ | कारण लोगोंके परम प्रिय हो गये थे। वे सदा ब्रह्मविद्याका | अध्ययन और प्राणायामका अभ्यास करते रहते थे। महाराज! बुद्धिरासीन्महाराज संसारार्णवतारणी। | समस्त पदार्थोंको वे अपना स्वरूप ही समझते थे; अतः पितरं मातरं चैव भ्रातॄनथ पितामहान्॥ १५ | संसारके विषयोंमें उनकी बुद्धि अत्यन्त निःस्पृह हो भवसागरसे | पार उतारनेवाली हो गयी थी॥ ९-१४ १/२॥ पितृव्यान्मातुलांश्चैव सखीन् सम्बन्धिबान्धवान्। | भरद्वाजजी! उनका वैराग्य यहाँतक बढ़ गया कि वे महान् परित्यज्य महोदारस्तृणानीव यथासुखम्॥ १६ | उदार पुण्डरीकजी पिता, माता, भाई, पितामह, चाचा, मामा, | मित्र, सम्बन्धी तथा बान्धवजनोंको तृणके समान त्यागकर, विचचार महीमेतां शाकमूलफलाशनः। | शाक और मूल-फलादिका आहार करते हुए इस पृथ्वीपर अनित्यं यौवनं रूपमायुष्यं द्रव्यसंचयम्॥ १७ | आनन्दपूर्वक विचरने लगे। उन्होंने यौवन, रूप, आयु और | धन-संग्रहकी अनित्यताका विचार करके समस्त त्रिभुवनको इति संचिन्तयानेन त्रैलोक्यं लोष्ठवत् स्मृतम्। | मिट्टीके ढेलेके समान तुच्छ समझ लिया था और अपने पुराणोदितमार्गेण सर्वतीर्थानि वै मुने॥ १८ | मनमें यह निश्चय करके कि 'मैं पुराणोक्त मार्गसे यथासमय | सभी तीर्थोंकी यात्रा करूँगा', वे महाबाहु, महातेजस्वी और गमिष्यामि यथाकालमिति निश्चितमानसः। | महाव्रती पुण्डरीकजी गङ्गा, यमुना, गोमती, गण्डकी, शतद्रू, गङ्गां च यमुनां चैव गोमतीमथ गण्डकीम्॥ १९ | पयोष्णी, सरयू और सरस्वतीके तटपर, प्रयागमें, नर्मदा | आदि महानदियों तथा नदोंके तटपर, गयामें तथा विन्ध्याचल शतद्रूं च पयोष्णीं च सरयूं च सरस्वतीम्। | और हिमालयके तीर्थोंमें एवं इनके अतिरिक्त अन्यान्य प्रयागं नर्मदां चैव महानद्यो नदानपि॥ २० | तीर्थोंमें भी यथासमय विधिपूर्वक भ्रमण करते रहे। इसी | तरह घूमते हुए, पुण्यकर्मोंके अधीन हो वे तपस्वी वीर महाभाग गयां च विन्ध्यतीर्थानि हिमवत् प्रभवाणि च। | पुण्डरीक शालग्रामक्षेत्रमें जा पहुँचे॥ १५-२२ १/२॥ अन्यानि च महातेजास्तीर्थानि स महाव्रतः॥ २१ | वह तीर्थ तत्त्वज्ञानी तपस्वी ऋषियोंद्वारा सेवित था। | वहाँ मुनियोंके सुरम्य आश्रम थे, जो पुराणोंमें प्रसिद्ध संचचार महाबाहुर्यथाकालं यथाविधि। | हैं। वह तीर्थ चक्रनदीसे भूषित है और वहाँके कदाचित् प्राप्तवान् वीरः शालग्रामं तपोधनः॥ २२ | शिलाखण्ड भगवान्के चक्रसे चिह्नित हैं। वह तीर्थ | जितना ही सुरम्य था, उतना ही एकान्त। उसका विस्तार पुण्डरीको महाभागः पुण्यकर्मवशानुगः। | बड़ा था और वहाँ चित्त स्वतः प्रसन्न रहता था। वहाँपर आसेव्यमानमृषिभिस्तत्त्वविद्भिस्तपोधनैः ॥ २३ | कुछ चक्रसे चिह्नित प्राणी रहते थे, जिनका दर्शन | बहुत ही पावन था। वहाँ पुण्यतीर्थके यात्री यथेष्ट मुनीनामा श्रमं रम्यं पुराणेषु च विश्रुतम्। | विचरते रहते थे। उस महापवित्र शालग्रामक्षेत्रमें महामति भूषितं चक्रनद्या च चक्राङ्कितशिलातलम्॥ २४ | पुण्डरीकजी प्रसन्नचित्त हो तीर्थ-सेवन करने लगे। रम्यं विविक्तं विस्तीर्णं सदा चित्तप्रसादकम्। केचिच्चक्राङ्कितास्तस्मिन् प्राणिनः पुण्यदर्शनाः॥ २५ विचरन्ति यथाकामं पुण्यतीर्थप्रसङ्गिनः। तस्मिन् क्षेत्रे महापुण्ये शालग्रामे महामतिः॥ २६
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२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ पुण्डरीकः प्रसन्नात्मा तीर्थानि समसेवत। | वे नियमपूर्वक वहाँ देवह्रद तीर्थमें, पूर्वजन्मकी स्मृति स्नात्वा देवह्रदे तीर्थे सरस्वत्यां च सुव्रतः॥ २७ | दिलानेवाली सरस्वतीके जलमें, चक्र-कुण्डमें और जातिस्मर्यां चक्रकुण्डे चक्रनद्यामृतेष्वपि। | चक्र-नदी (नारायणी)-के जलमें भी स्नान करके उसी तथान्यान्यपि तीर्थानि तस्मिन्नेव चचार सः॥ २८ | क्षेत्रके अन्तर्गत अन्यान्य तीर्थोंमें भ्रमण करते रहते | थे॥ २३-२८॥ ततः क्षेत्रप्रभावेण तीर्थानां चैव तेजसा। | तदनन्तर उस क्षेत्रके प्रभावसे और वहाँके तीर्थोंके मनः प्रसादमगमत्तस्य तस्मिन्महात्मनः॥ २९ | तेजसे उन महात्माका चित्त वहाँ बहुत ही शुद्ध एवं प्रसन्न सोऽपि तीर्थे विशुद्धात्मा ध्यानयोगपरायणः। | हो गया। इस प्रकार शुद्धचित्त एवं ध्यानयोगमें तत्पर हो, वहाँ तत्रैव सिद्धिमाकाङ्क्षन् समाराध्य जगत्पतिम्॥ ३० | ही सिद्धिकी इच्छासे परमभक्तियुक्त हो, वे शास्त्रोक्त विधिसे शास्त्रोक्तेन विधानेन भक्त्या परमया युतः। | जगत्पति भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। अपनी उवास चिरमेकाकी निर्द्वन्द्वः संयतेन्द्रियः॥ ३१ | इन्द्रियोंको वशमें करके निर्द्वन्द्व रहते हुए उन्होंने अकेले ही | बहुत दिनोंतक वहाँ निवास किया। वे शाक और मूल- शाकमूलफलाहारः संतुष्टः समदर्शनः। | फलादिका आहार करते और सदा संतुष्ट रहते थे। उनकी यमैश्च नियमैश्चैव तथा चासनबन्धनैः॥ ३२ | सर्वत्र समान दृष्टि थी। वे यम, नियम, आसन-बन्ध, तीव्र प्राणायामैः सुतीक्ष्णैश्च प्रत्याहारैश्च संततैः। | प्राणायाम, निरन्तर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधिके धारणाभिस्तथा ध्यानैः समाधिभिरतन्द्रितः॥ ३३ | द्वारा निरालस्यभावसे भलीभाँति योगाभ्यास करते रहे। इस | प्रकार समस्त पुरुषार्थोंके ज्ञाता निष्पाप महामना पुण्डरीकजीने योगाभ्यासं तदा सम्यक् चक्रे विगतकल्मषः। | देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुमें चित्त लगाकर उनकी आराधना आराध्य देवदेवेशं तद्गतेनान्तरात्मना॥ ३४ | की और उन्हींमें मन लगाये हुए वे उनके परम अनुग्रहकी पुण्डरीको महाभागः पुरुषार्थविशारदः। | आकाङ्क्षासे भजन करने लगे॥ २९-३५॥ | राजेन्द्र! महात्मा पुण्डरीकको उस शालग्रामक्षेत्रमें प्रसादं परमाकाङ्क्षन् विष्णोस्तद्गतमानसः॥ ३५ | निवास करते बहुत समय बीत गया। तब एक दिन तस्य तस्मिन्निवसतः शालग्रामे महात्मनः। | साक्षात् सूर्यके समान महातेजस्वी, वैष्णवहितकारी, पुण्डरीकस्य राजेन्द्र कालोऽगच्छन्महांस्ततः॥ ३६ | परमार्थवेत्ता एवं विष्णुभक्तिपरायण देवर्षि नारदजी तपोनिधि मुने कदाचित्तं देशं नारदः परमार्थवित्। | पुण्डरीक मुनिको देखनेकी इच्छासे उस क्षेत्रमें गये। | समस्त आगमोंके ज्ञाता, महाबुद्धिमान्, महाप्राज्ञ, पूर्णतेजस्वी जगाम सुमहातेजाः साक्षादादित्यसंनिभः॥ ३७ | एवं प्रभापुञ्जसे उपलक्षित नारदजीको वहाँ आया देख तं द्रष्टुकामो देवर्षिः पुण्डरीकं तपोनिधिम्। | पुण्डरीकके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विनीतभावसे विष्णुभक्तिपरीतात्मा वैष्णवानां हिते रतः॥ ३८ | हाथ जोड़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन किया, फिर यथोचितरूपसे स दृष्ट्वा नारदं प्राप्तं सर्वतेजःप्रभान्वितम्। | उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् परम कान्तिमान् महामतिं महाप्राज्ञं सर्वागमविशारदम्॥ ३९ | विप्रवर पुण्डरीकजी मन-ही-मन यह सोचने लगे कि प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना। | 'ये अद्भुत दिव्य शरीरवाले, मनोरमवेषधारी, तेजस्वी अर्घं दत्त्वा यथायोग्यं प्रणाममकरोत् ततः॥ ४० | महापुरुष कौन हैं? अहो! इनका मुखमण्डल कितना | प्रसन्न है! इनके मस्तकपर जटा-जूट सुशोभित हो रहा कोऽयमत्यद्भुताकारस्तेजस्वी हृद्यवेषधृक्। | है। इन्होंने हाथमें वीणा ले रखी है। इस रूपमें ये साक्षात् आतोद्यहस्तः सुमुखो जटामण्डलभूषणः॥ ४१ | सूर्य ही तो नहीं हैं? अथवा अग्निदेव, इन्द्र और विवस्वानथ वा वह्निरिन्द्रो वरुण एव वा। | वरुणमेंसे तो कोई नहीं हैं?' यों सोचते हुए किसी इति संचिन्तयन् विप्रः पप्रच्छ परमद्युतिः॥ ४२ | निश्चयपर न पहुँचनेके कारण उन्होंने पूछा॥ ३६-४२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८५
पुण्डरीक उवाच को भवानिह सम्प्राप्तः कुतो वा परमद्युते। त्वद्दर्शनं ह्यपुण्यानां प्रायेण भुवि दुर्लभम्॥ ४३
नारद उवाच नारदोऽहमनुप्राप्तस्त्वद्दर्शनकुतूहलात् । पुण्डरीक हरेर्भक्तस्त्वादृशः सततं द्विज॥ ४४ स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तम। पुनाति भगवद्भक्तश्चाण्डालोऽपि यदृच्छया॥ ४५ दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः। इत्युक्तो नारदेनासौ भक्तिपर्याकुलात्मना॥ ४६ प्रोवाच मधुरं विप्रस्तद्दर्शनसुविस्मितः।
पुण्डरीक उवाच धन्योऽहं देहिनामद्य सुपूज्योऽहं सुरैरपि॥ ४७ कृतार्थाः पितरो मेऽद्य सम्प्राप्तं जन्मनः फलम्। अनुगृह्णीष्व देवर्षे त्वद्भक्तस्य विशेषतः॥ ४८ किं किं करोम्यहं विद्वन् भ्राम्यमाणः स्वकर्मभिः। कर्तव्यं परमं गुह्यमुपदेष्टुं त्वमर्हसि॥ ४९ त्वं गतिः सर्वलोकानां वैष्णवानां विशेषतः।
नारद उवाच अनेकानीह शास्त्राणि कर्माणि च तथा द्विज॥ ५० धर्ममार्गाश्च बहवस्तथैव प्राणिनः स्मृताः। वैलक्षण्यं च जगतस्तस्मादेव द्विजोत्तम॥ ५१
पुण्डरीकजी बोले—परम कान्तिमान् दिव्य पुरुष ! आप कौन हैं और कहाँसे पधारे हैं? इस पृथ्वीपर जिन्होंने कभी पुण्य नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये आपका दर्शन प्रायः दुर्लभ ही है॥ ४३॥
नारदजी बोले—पुण्डरीक ! मैं नारद हूँ। तुम्हारे दर्शनकी उत्कण्ठासे ही यहाँ आया हूँ। तुम-जैसा निरन्तर भगवद्भक्तिपरायण पुरुष दुर्लभ है। द्विजोत्तम ! भगवद्भक्त पुरुष यदि जातिका चण्डाल हो तो भी वह स्मरणमात्रसे, वार्तालापसे अथवा सम्मानित होकर, अथवा स्वेच्छासे ही लोगोंको पवित्र कर देता है; फिर तुम्हारे-जैसे भक्त ब्राह्मणके सत्सङ्गकी पावनताके विषयमें तो कहना ही क्या है। द्विज ! मैं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवदेव भगवान् वासुदेवका दास हूँ॥ ४४-४५१/२॥
नारदजीके इस प्रकार अपना परिचय देनेपर उनके दर्शनसे अत्यन्त विस्मित हुए विप्रवर पुण्डरीकजी प्रेम-भक्तिसे विह्वलचित्त होकर मधुर वाणीमें बोले॥ ४६१/२॥
पुण्डरीकजीने कहा—आज मैं समस्त देहधारियोंमें धन्य हूँ, देवताओंन्द्वारा भी सम्माननीय हूँ। आज मेरे पितर कृतार्थ हो गये। मेरा जन्म सफल हो गया। देवर्षे! मैं आपका भक्त हूँ; आप मुझपर अब विशेषरूपसे अनुग्रह करें। विद्वन्! मैं अपने पूर्वजन्मकृत कर्मोंसे प्रेरित हो संसारमें भटक रहा हूँ। बताइये, इससे छुटकारा पानेके लिये मैं क्या-क्या करूँ? मेरे लिये जो परम कर्तव्य हो, वह गोपनीय हो तो भी आप मुझे उसका उपदेश कीजिये। मुने! यों तो आप समस्त लोकोंको ही सहारा देनेवाले हैं, परंतु वैष्णवोंके लिये तो आप विशेषरूपसे शरणदाता हैं॥ ४७-४९१/२॥
नारदजी बोले—द्विज ! इस जगत्में अनेक शास्त्र और अनेक प्रकारके कर्म हैं। इसी तरह यहाँ अनेकों प्राणी हैं और उनके लिये धर्मके मार्ग भी बहुत हैं। द्विजोत्तम ! इसीसे इस जगत्में विचित्रता दिखायी देती है॥ ५०-५१॥
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[ अध्याय ६४
२८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
अव्यक्ताज्जायते सर्वं सर्वात्मकमिदं जगत्। इत्येवं प्राहुरपरे तत्रैव लयमेव च॥ ५२ आत्मानो बहवः प्रोक्ता नित्याः सर्वगतास्तथा। अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठ तत्त्वालोकनतत्परैः॥ ५३ एवमाद्यनुसंचिन्त्य यथामति यथाश्रुतम्। वदन्ति ऋषयः सर्वे नानामतविशारदाः॥ ५४ शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् कथयामि तवानघ। परमार्थमिदं गुह्यं घोरसंसारमोचनम्॥ ५५ अनागतमतीतं च विप्रकृष्टमतीव यत्। न गृह्णाति नृणां दृष्टिर्वर्तमानार्थनिश्चिता ॥ ५६ शृणुष्वावहितं तात कथयामि तवानघ। यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वं पृच्छतो मम सुव्रत ॥ ५७ कदाचिद्ब्रह्मलोकस्य पद्मयोनिं पितामहम्। प्रणिपत्य यथान्यायं पृष्टवानहमव्ययम् ॥ ५८
कुछ लोगोंका मत है कि यह सम्पूर्ण जगत् सर्वथा अव्यक्तसे उत्पन्न होता है और समय आनेपर उसीमें लीन भी हो जाता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ! कुछ अन्य तत्त्वदर्शी पुरुष आत्माको अनेक, नित्य एवं सर्वत्र व्यापक मानते हैं। अनघ! ब्रह्मन्! इन सब बातोंपर विचार करके नाना मतोंका ज्ञान रखनेवाले समस्त ऋषिगण अपनी बुद्धि और विद्याके अनुसार जिस सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं, उसे सावधान होकर सुनो; वह सब मैं तुमसे बतलाता हूँ। यह बताया जानेवाला गोप्य परमार्थतत्त्व इस घोरतर संसारसे मुक्ति दिलानेवाला है। मनुष्योंकी दृष्टि प्रायः वर्तमान विषयोंको ही निश्चितरूपसे ग्रहण करती है; वह सुदूरवर्ती भूत और भविष्यको नहीं ग्रहण कर सकती। उत्तम व्रतके पालक एवं पापशून्य तात पुण्डरीक! इस विषयमें श्रीब्रह्माजीने पहले मेरे प्रश्न करनेपर मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो। एक समयकी बात है, ब्रह्मलोकमें विराजमान अविनाशी कमलयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके मैंने उनसे यथोचित-रूपसे प्रश्न किया॥ ५२-५८॥
नारद उवाच किं तज्ज्ञानं परं देव कश्च योगः परस्तथा। एतन्मे तत्त्वतः सर्वं त्वमाचक्ष्व पितामह ॥ ५९
नारदजी बोले- देव! लोकपितामह! सबसे उत्तम ज्ञान और सबसे उत्कृष्ट योग कौन-सा है? इस विषयमें सारी बातें आप मुझे ठीक-ठीक बतायें॥ ५९॥
ब्रह्मोवाच यः परः प्रकृतेः प्रोक्तः पुरुषः पञ्चविंशकः। स एव सर्वभूतानां नर इत्यभिधीयते॥ ६० नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः। तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणः स्मृतः ॥ ६१ नारायणाज्जगत्सर्वं सर्गकाले प्रजायते। तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ॥ ६२ नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परम्। नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः॥ ६३
ब्रह्माजी बोले- जो तेईस विकारोंके कारणभूत चौबीसवें तत्त्व प्रकृतिसे भिन्न पचीसवाँ तत्त्व है, वही सम्पूर्ण प्राणिशरीरोंमें 'नर' (पुरुष या आत्मा) कहलाता है। सम्पूर्ण तत्त्व नरसे उत्पन्न हैं, इसलिये 'नार' कहलाते हैं। ये नार जिनके अयन (आश्रय) हैं, अर्थात् जो इनमें व्यापक हैं, वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं। सृष्टिकालमें सम्पूर्ण जगत् भगवान् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयके समय फिर उन्हींमें लीन हो जाता है। नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तत्त्व हैं, नारायण ही
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अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८७ परादपि परश्चासौ तस्मान्नातिपरं मुने। परमज्योति और नारायण ही परम आत्मा हैं। मुने! वे यच्च किंचिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ॥ ६४ भगवान् नारायण परसे भी पर हैं। उनसे बढ़कर या उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। इस जगत्में जो कुछ देखा अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः। या सुना जाता है, सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके एवं विदित्वा तं देवाः साकारं व्याहरन्मुहुः ॥ ६५ भगवान् नारायण स्थित हैं। इस प्रकार उन्हें साकार वस्तुओंमें व्यापक जानकर ही देवताओंने बार-बार उनको 'साकार' नमो नारायणायेति ध्यात्वा चानन्यमानसाः। कहा है तथा 'ॐ नमो नारायणाय'-इस मन्त्रका ध्यान (मानसिक जप) करते हुए अनन्यभावसे उनमें मन किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ॥ ६६ लगाया है। जो अनन्यचित्त हो सदा भगवान् नारायणका ध्यान करता है, उसको दान, तीर्थसेवन, तपस्या और यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः। यज्ञोंसे क्या काम है? भगवान् नारायणका ध्यान ही एतज्ज्ञानं वरं नातो योगश्चैव परतस्तथा ॥ ६७ सर्वोत्तम ज्ञान है तथा इससे बढ़कर दूसरा कोई योग भी नहीं है। परस्परविरुद्ध अर्थको व्यक्त करनेवाले दूसरे- परस्परविरुद्धार्थैः किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। दूसरे शास्त्रोंके विस्तारसे क्या लाभ ? जिस प्रकार एक बहवोऽपि यथा मार्गा विशन्त्येकं महत्पुरम् ॥ ६८ ही बड़े नगरमें बहुत-से मार्गोंका प्रवेश होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके सम्पूर्ण ज्ञान उन परमेश्वर तथा ज्ञानानि सर्वाणि प्रविशन्ति तमीश्वरम्। नारायणमें प्रवेश करते हैं ॥ ६०-६८१/२ ॥ स हि सर्वगतो देवः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ॥ ६९ वे भगवान् विष्णु अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त हैं, सूक्ष्म तत्त्व हैं, सदा रहनेवाले सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण हैं; परंतु उनका न तो आदि है न अन्त ही। जगदादिरनाद्यन्तः स्वयम्भूद्भूतभावनः। स्वयं वे किसी दूसरेसे उत्पन्न नहीं हैं, अतएव 'स्वयम्भू' विष्णुर्विभुरचिन्त्यात्मा नित्यः सदसदात्मकः ॥ ७० हैं, किंतु इन सम्पूर्ण भूतप्राणियोंको स्वयं ही प्रकट करते हैं। वे विभु, अचिन्त्य, नित्य और कार्य-कारणस्वरूप हैं। वासुदेवो जगद्वासः पुराणः कविरव्ययः। सम्पूर्ण जगत्का उनमें ही निवास है, इसलिये वे 'वासुदेव' यस्मात्प्राप्तं स्थितिं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ७१ कहे गये हैं। वे पुराणपुरुष, त्रिकालदर्शी और अविकारी हैं। यह सम्पूर्ण चराचरमय त्रिभुवन उन्हीं भगवान्के द्वारा तस्मात् स भगवान्देवो विष्णुरित्यभिधीयते। व्याप्त होनेसे स्थित है, इसलिये वे 'विष्णु' कहलाते हैं। यस्माद्वा सर्वभूतानां तत्त्वादीनां युगक्षये ॥ ७२ अथवा युगका क्षय होनेपर महत्तत्त्व आदि समस्त भूतोंका उन्हीं सृष्टिके आश्रयभूत परमात्मामें निवास होता है, इसलिये तस्मिन्निवासः संसर्गे वासुदेवस्ततस्तु सः। वे 'वासुदेव' कहे गये हैं। कुछ लोग उनको पुरुष (आत्मा) तमाहुः पुरुषं केचित्केचिदीश्वरमव्ययम् ॥ ७३ कहते हैं और कुछ लोग अविनाशी ईश्वर बताते हैं। कुछ अन्य लोग उन्हें केवल 'विज्ञानस्वरूप' मानते हैं, कितने विज्ञानमात्रं केचिच्च केचिद्ब्रह्म परं तथा। ही उन्हें परब्रह्म कहते हैं। कुछ विचारक उन्हें आदि- केचित्कालमनाद्यन्तं केचिज्जीवं सनातनम् ॥ ७४ अन्तरहित 'काल' कहते हैं और कुछ मनुष्य उनको 'सनातन जीव' मानते हैं। कुछ लोग 'परमात्मा' कहते केचिच्च परमात्मानं केचिच्चैवमनामयम्। हैं, कुछ उन्हें एक 'निरामय तत्त्व' मानते हैं, कुछ विद्वान् उन्हें 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं और कुछ उन्हें तेईस केचित्क्षेत्रज्ञमित्याहुः केचित्षड्विंशकं तथा ॥ ७५ विकारोंके कारण चौबीसवें तत्त्व प्रकृति और पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे भिन्न 'छब्बीसवाँ तत्त्व' (पुरुषोत्तम) अङ्गुष्ठमात्रं केचिच्च केचित्पद्मरजोपमम्। मानते हैं। कुछ लोग आत्माको अँगूठेके बराबर बताते एते चान्ये च मुनिभिः संज्ञाभेदाः पृथग्विधाः ॥ ७६ हैं और कुछ विद्वान् कमल-पुष्पकी धूलिके एक In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
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२८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ [मूल संस्कृत श्लोक] शास्त्रेषु कथिता विष्णोर्लोकव्यामोहकारकाः। एकं यदि भवेच्छास्त्रं ज्ञानं निस्संशयं भवेत् ॥ ७७ बहुत्वादिह शास्त्राणां ज्ञानतत्त्वं सुदुर्लभम्। आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ ७८ इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा। त्यक्त्वा व्यामोहकान् सर्वान् तस्माच्छास्त्रार्थविस्तरान् ॥ ७९ अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमतन्द्रितः। एवं ज्ञात्वा तु सततं देवदेवं तमव्ययम् ॥ ८० क्षिप्रं यास्यसि तत्रैव सायुज्यं नात्र संशयः। श्रुत्वेदं ब्रह्मणा प्रोक्तं ज्ञानयोगं सुदुर्लभम् ॥ ८१ ततोऽहमासं विप्रेन्द्र नारायणपरायणः। नमो नारायणायेति ये विदुर्ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ८२ अन्तकाले जपन्तस्ते यान्ति विष्णोः परं पदम्। तस्मान्नारायणस्तात परमात्मा सनातनः ॥ ८३ अनन्यमनसा नित्यं ध्येयस्तत्त्वविचिन्तकैः। नारायणो जगद्व्यापी परमात्मा सनातनः ॥ ८४ जगतां सृष्टिसंहारपरिपालनतत्परः। श्रवणात्पठनाच्चैव निदिध्यासनतत्परैः ॥ ८५ आराध्यः सर्वथा ब्रह्मन् पुरुषेण हितैषिणा। निःस्पृहा नित्यसंतुष्टा ज्ञानिनः संयतेन्द्रियाः ॥ ८६ निर्ममा निरहंकारा रागद्वेषविवर्जिताः। अपक्षपतिताः शान्ताः सर्वसंकल्पवर्जिताः ॥ ८७ ध्यानयोगपरा ब्रह्मन् ते पश्यन्ति जगत्पतिम्। त्यक्तत्रया महात्मानो वासुदेवं हरिं गुरुम् ॥ ८८ कीर्तयन्ति जगन्नाथं ते पश्यन्ति जगत्पतिम्। तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र नारायणपरो भव ॥ ८९ [हिन्दी अनुवाद] कणके बराबर 'अणु' मानते हैं। ऊपर भगवान् विष्णुके जिन नामोंका उल्लेख किया गया है, ये तथा अन्य भी बहुत-से भिन्न-भिन्न नाम मुनियोंद्वारा शास्त्रोंमें कहे गये हैं, जो साधारण लोगोंमें भेद-भ्रमका उत्पादन कर उन्हें मोहमें डालनेवाले हैं। यदि एक ही शास्त्र होता तो सबको संदेहरहित निश्चयात्मक ज्ञान होता। किंतु यहाँ तो बहुतेरे शास्त्र हैं और सबका अलग-अलग सिद्धान्त है; अतः ज्ञानका तत्त्व बड़ा ही दुर्ज्ञेय हो गया है। परंतु मैंने सम्पूर्ण शास्त्रोंका मथन करके विचार किया तो एक यही बात सब सिद्धान्तोंके साररूपसे ज्ञात हुई कि सदा 'भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।' इसलिये मोहमें डालनेवाले सम्पूर्ण शास्त्र-विस्तारोंका त्याग करके एकचित्त होकर उत्साहपूर्वक भगवान् नारायणका ध्यान करो। इस प्रकार सतत चिन्तनके द्वारा उन अविनाशी देवदेव नारायणका तत्त्व जानकर तुम शीघ्र ही उनमें सायुज्य-मुक्ति प्राप्त कर लोगे, इसमें संदेह नहीं है॥ ६९-८०१/२॥ विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माजीके कहे हुए इस परम दुर्लभ ज्ञानयोगको सुनकर मैं तभीसे भगवान् नारायणकी परिचर्यामें लग गया। जो लोग 'ॐ नमो नारायणाय'- इस सनातन ब्रह्मस्वरूप मन्त्रको जानते हैं, वे अन्तकालमें इसका जप करते हुए विष्णुके परमधामको प्राप्त कर लेते हैं। अतः तात! तत्त्व-विचार करनेवाले पुरुषोंको सदा ही सनातन परमात्मा नारायणका अनन्यचित्तसे ध्यान करना चाहिये। भगवान् नारायण जगद्व्यापी सनातन परमेश्वर हैं। ये भिन्न-भिन्न रूपसे सम्पूर्ण लोकोंके सृष्टि, पालन तथा संहार-कार्यमें लगे रहते हैं। इनके नाम, गुण एवं लीलाओंका श्रवण और कीर्तन करते हुए उनके ध्यानमें संलग्न हो उनकी आराधना करनी चाहिये। ब्रह्मन्! अपना हित चाहनेवाले पुरुषके लिये सर्वथा भगवान् नारायणकी आराधना ही कर्तव्य है। विप्रवर! जो लोग निःस्पृह, नित्य- संतुष्ट, ज्ञानी, जितेन्द्रिय और ममता-अहंता, राग-द्वेष आदि विकारोंसे रहित हैं तथा जो पक्षपातशून्य, शान्त एवं सब प्रकारके संकल्पोंसे वर्जित हैं, वे भगवान्के ध्यानयोगमें तत्पर हो उन जगदीश्वरका साक्षात्कार कर लेते हैं। जो महात्मा त्रिभुवनसे नाता तोड़कर जगद्गुरु जगन्नाथ भगवान् वासुदेवका कीर्तन करते हैं, वे उन जगत्पत्तिका दर्शन पा जाते हैं। इसलिये विप्रवर! तुम भी भगवान् नारायणकी समाराधनामें तत्पर हो जाओ ॥ ८१-८९॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८९ तदन्यः को महोदारः प्रार्थितं दातुमीश्वरः । हेलया कीर्तितो यो वै स्वं पदं दिशति द्विज ॥ ९० अपि कार्यस्त्वया चैव जपः स्वाध्याय एव च। तमेवोद्दिश्य देवेशं कुरु नित्यमतन्द्रितः ॥ ९१ किं तत्र बहुभिर्मन्त्रैः किं तत्र बहुभिर्व्रतैः। नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ ९२ चीरवासा जटाधारी त्रिदण्डी मुण्ड एव वा। भूषितो वा द्विजश्रेष्ठ न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ९३ ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचाररताः सदा। तेऽपि यान्ति परं स्थानं नरा नारायणाश्रयाः ॥ ९४ जन्मान्तरसहस्रेषु यस्य स्याद्बुद्धिरीदृशी। दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः ॥ ९५ प्रयाति विष्णुसालोक्यं पुरुषो नात्र संशयः। किं पुनस्तद्गतप्राणः पुरुषः संयतेन्द्रियः ॥ ९६ द्विज! जो अवहेलनापूर्वक नाम लेनेपर भी भक्तको अपना परमधाम दे देते हैं, उन भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा महान् उदार है, जो माँगी हुई वस्तुको देनेमें समर्थ हो ? तुम्हें जप अथवा स्वाध्याय-जो कुछ भी करना हो, उसे उन देवेश्वर भगवान् नारायणके उद्देश्यसे ही सदा आलस्य त्यागकर करते रहो। बहुत-से मन्त्र और व्रतोंसे क्या काम ? 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। द्विजश्रेष्ठ ! कोई चीर वस्त्र पहननेवाला, जटा धारण करनेवाला, त्रिदण्डी, सदा माथा मुँड़ाये रहनेवाला अथवा तरह-तरहके उपकरणोंसे विभूषित ही क्यों न हो, उसके ये बाह्य चिह्न धर्मके कारण नहीं हो सकते; किंतु जो मनुष्य भगवान् नारायणकी शरणमें जा चुके हैं, वे पहले निर्दयी, दुष्ट और सदा पापरत रहे हों तो भी भगवान्के परमधामको पधारते हैं। हजारों जन्मोंमें भी जिसकी ऐसी बुद्धि हो जाय कि 'मैं देवदेव, शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् वासुदेवका दास हूँ', वह मनुष्य निःसंदेह भगवान् विष्णुके सालोक्यको प्राप्त होता है; फिर जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर सदा भगवान्में ही अपने प्राणोंको लगाये रहता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ९०-९६ ॥ सूत उवाच इत्युक्त्वा देवदेवर्षिस्तत्रैवान्तरधीयत । परोपकारनिरतस्त्रैलोक्यस्यैकभूषणः ॥ ९७ पुण्डरीकोऽपि धर्मात्मा नारायणपरायणः । नमोऽस्तु केशवायेति पुनः पुनरुदीरयन् ॥ ९८ प्रसीदस्व महायोगिन्नित्यमुच्चार्य सर्वदा। हृत्पुण्डरीके गोविन्दं प्रतिष्ठाप्य जनार्दनम् ॥ ९९ तपःसिद्धिकरेऽरण्ये शालग्रामे तपोधनः । उवास चिरमेकाकी पुरुषार्थविचक्षणः ॥ १०० स्वप्नेऽपि केशवादन्यन्न पश्यति महातपाः । निद्रापि तस्य नैवासीत्पुरुषार्थविरोधिनी ॥ १०१ तपसा ब्रह्मचर्येण शौचेन च विशेषतः । जन्मजन्मान्तरारूढसंस्कारेण च स द्विजः ॥ १०२ प्रसादाद्देवदेवस्य सर्वलोकैकसाक्षिणः । अवाप परमां सिद्धिं वैष्णवीं वीतकल्मषः ॥ १०३ सूतजी कहते हैं—सदा दूसरोंके ही उपकारमें लगे रहनेवाले त्रिभुवनभूषण देवर्षि नारदजी उपर्युक्त बातें बताकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। अब धर्मात्मा पुण्डरीक भी एकमात्र भगवान् नारायणके भजनमें तत्पर हो बार-बार इस प्रकार उच्चारण करने लगे—'भगवान् केशवको नमस्कार है; हे महायोगिन् ! आप मुझपर प्रसन्न हों।' निरन्तर यों कहते हुए पुरुषार्थ-साधनमें कुशल वे तपस्वी पुण्डरीकजी अपने हृदय-कमलके आसनपर जनार्दन भगवान् गोविन्दको स्थापितकर तपस्याकी सिद्धि करनेवाले उस 'शालग्राम' नामक तपोवनमें बहुत कालतक अकेले ही रहे। महातपस्वी पुण्डरीक स्वप्नमें भी भगवान् केशवके सिवा दूसरा कुछ नहीं देखते थे। उनकी नींद भी उन्हें पुरुषार्थ-साधनमें बाधा नहीं देती थी। उन पापरहित द्विजवर पुण्डरीकने तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा विशेषतः शौचाचारके पालनसे और जन्म-जन्मान्तरोंकी साधनासे सुदृढ़ हुए भगवद्भक्तिसाधक संस्कारसे सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र साक्षी देवदेव भगवान् विष्णुकी कृपाद्वारा परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि प्राप्त कर ली। उनके निकट
२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ सिंहव्याघ्रास्तथान्येऽपिमृगाः प्राणिविहिंसकाः। सिंह, व्याघ्र तथा दूसरे-दूसरे हिंसक जीव आपसके विरोधं सहजं हित्वा समेतास्तस्य संनिधौ। स्वाभाविक वैर-विरोधको त्याग एक साथ मिलकर निवसन्ति द्विजश्रेष्ठ प्रशान्तेन्द्रियवृत्तयः ॥ १०४ रहते थे। द्विजवर भरद्वाजजी! उनके समीप उन हिंसक जन्तुओंकी इन्द्रियवृत्तियाँ अत्यन्त शान्त रहती थीं॥ ९७-१०४॥ ततः कदाचिद्भगवान् पुण्डरीकस्य धीमतः। तत्पश्चात् एक दिन बुद्धिमान् पुण्डरीकजीके समक्ष प्रादुरासीज्जगन्नाथः पुण्डरीकायतेक्षणः ॥ १०५ जगदीश्वर भगवान् नारायण प्रकट हुए। उनके नेत्र कमल- दलके समान विशाल थे। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः स्रगुज्ज्वलः। गदा सुशोभित थी। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः कौस्तुभेन विभूषितः ॥ १०६ दिव्य पुष्पोंकी माला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्न और लक्ष्मीका निवास था। वे कौस्तुभमणिसे विभूषित थे। कज्जलगिरिके समान आरुह्य गरुडं श्रीमानञ्जनाचलसंनिभः। श्यामवर्ण एवं पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु सुनहली मेरुशृङ्गमिवारूढः कालमेघस्तडिद्युतिः ॥ १०७ कान्तिवाले गरुडपर आरूढ़ हो इस प्रकार सुशोभित होते थे, मानो मेरुगिरिके शिखरपर बिजलीकी कान्तिसे युक्त श्याममेघ शोभा पा रहा हो। भगवान्के ऊपर रजतमय राजतेनातपत्रेण मुक्तादामविलम्बिना। श्वेत छत्र तना था, जिसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं। विराजमानो देवेशश्चामरव्यजनादिभिः ॥ १०८ उस समय उस छत्रसे तथा चँवर-व्यजन आदिसे उन देवेश्वरकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १०५-१०८॥ तं दृष्ट्वा देवदेवेशं पुण्डरीकः कृताञ्जलिः। उन देवदेवेश्वर भगवान् नारायणका प्रत्यक्ष दर्शन पपात शिरसा भूमौ साध्वसावनतो द्विजः ॥ १०९ पाकर पुण्डरीकने दोनों हाथ जोड़ लिये। आदरमिश्रित भयसे उनका मस्तक झुक गया। उन्होंने धरतीपर माथा टेक दिया-साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वे विह्वल होकर उन पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां समाकुलः। भगवान् हृषीकेशकी ओर आँखें फाड़-फाड़कर इस प्रकार जगाम महतीं तृप्तिं पुण्डरीकस्तदानघः ॥ ११० देखने लगे, मानो उन्हें पी जायँगे। जिनके दर्शनके लिये वे चिरकालसे प्रार्थना कर रहे थे, उन भगवान्को आज तमेवालोकयन् वीरश्चिरप्रार्थितदर्शनः। सामने पाकर उन्हींकी ओर निर्निमेष नयनोंसे देखते हुए ततस्तमाह भगवान् पद्मनाभस्त्रिविक्रमः ॥ १११ पापरहित धीरचित्त पुण्डरीकजीको आज बड़ी ही तृप्ति हुई। तब तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लेनेवाले भगवान् पद्मनाभने पुण्डरीकसे कहा- ॥ १०९-१११॥ प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पुण्डरीक महामते। 'वत्स पुण्डरीक ! तुम्हारा कल्याण हो। महामते ! मैं वरं वृणीष्व दास्यामि यत्ते मनसि वर्तते ॥ ११२ तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसीको वरके रूपमें माँग लो; उसे मैं अवश्य दूँगा'॥ ११२॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं- देवदेव नारायणके कहे हुए इस एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदेवेन भाषितम्। वचनको सुनकर महामति पुण्डरीकने उनसे यों निवेदन इदं विज्ञापयामास पुण्डरीको महामतिः ॥ ११३ किया ॥ ११३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ देवनागरी में प्रस्तुत है:
अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २९१
[संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुण्डरीक उवाच<br>क्वाहमत्यन्तदुर्बुद्धिः क्व चात्महितवीक्षणम्।<br>यद्धितं मम देवेश तदाज्ञापय माधव ॥ ११४ | पुण्डरीक बोले—देवेश्वर ! कहाँ मुझ-जैसा अत्यन्त दुर्बुद्धि पुरुष और कहाँ अपने वास्तविक हितको देखनेका कार्य ? अतः माधव ! मेरे लिये जो हितकर हो, उसके लिये आप ही कृपापूर्वक आज्ञा करें ॥ ११४ ॥ |
| एवमुक्तोऽथ भगवान् सुप्रीतः पुनरब्रवीत्।<br>पुण्डरीकं महाभागं कृताञ्जलिमुपस्थितम् ॥ ११५ | उनके यों कहनेपर भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने सामने हाथ जोड़े खड़े हुए महाभाग पुण्डरीकसे बोले ॥ ११५ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>आगच्छ कुशलं तेऽस्तु मयैव सह सुव्रत।<br>मद्रूपधारी नित्यात्मा ममैव पार्षदो भव ॥ ११६ | श्रीभगवान्ने कहा—सुव्रत ! तुम्हारा कल्याण हो; तुम मेरे साथ ही आ जाओ और मेरे ही समान रूप धारणकर मेरे नित्य-पार्षद हो जाओ ॥ ११६ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्तवति प्रीत्या श्रीधरे भक्तवत्सले।<br>देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात च ॥ ११७<br><br>देवाः सेन्द्रास्तथा सिद्धाः साधु साध्वित्यथाब्रुवन्।<br>जगुश्च सिद्धगन्धर्वाः किंनराश्च विशेषतः ॥ ११८<br><br>अथैनं समुपादाय वासुदेवो जगत्पतिः।<br>जगाम गरुडारूढः सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११९<br><br>तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र विष्णुभक्तिसमन्वितः।<br>तच्चित्तस्तद्गतप्राणस्तद्भक्तानां हिते रतः ॥ १२०<br><br>अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम्।<br>शृणुष्व तत्कथाः पुण्याः सर्वपापप्रणाशिनीः ॥ १२१<br><br>येनोपायेन विप्रेन्द्र विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः।<br>प्रीतो भवति विश्वात्मा तत्कुरुष्व सुविस्तरम् ॥ १२२<br><br>अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतैरपि।<br>नाप्नुवन्ति गतिं पुण्यां नारायणपराङ्मुखाः ॥ १२३ | सूतजी कहते हैं—भक्तवत्सल भगवान् श्रीधरके प्रेमपूर्वक यों कहनेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और वहाँ आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उस समय इन्द्र आदि सभी देवता और सिद्धगण 'यह बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ'—इस प्रकार कहकर साधुवाद देने लगे। सिद्ध, गन्धर्व और किंनरगण विशेषरूपसे यशोगान करने लगे। इधर सर्वदेववन्दित जगदीश्वर भगवान् वासुदेव पुण्डरीकको साथ ले, गरुडपर आरूढ़ हो, वैकुण्ठधामको चले गये। इसलिये विप्रवर भरद्वाज ! आप भी विष्णुभक्तिसे युक्त हो, अपने मन और प्राणोंको भगवान्में ही लगाकर उनके भक्तोंके हित-साधनमें तत्पर रहिये और यथाशक्ति भगवान्का पूजन करते हुए उन पुरुषोत्तमका भजन कीजिये। समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान्की कथाएँ सदा सुनते रहिये। विप्रवर ! अधिक क्या कहें, सर्वेश्वरेश्वर विश्वात्मा भगवान् विष्णु जिस उपायसे प्रसन्न हों, उसीको आप विस्तारपूर्वक करें। भगवान् नारायणसे विमुख हुए पुरुष हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय करनेसे भी पावन गतिको नहीं प्राप्त कर सकते ॥ ११७–१२३ ॥ |
| अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं<br>सगुणविगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम्।<br>निरुपममुपमेयं योगिनां ज्ञानगम्यं<br>त्रिभुवनगुरुमीशं त्वां प्रपन्नोऽस्मि विष्णो ॥ १२४ | ( भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये ) 'भगवन् विष्णो ! आप अजर, अमर, अद्वितीय, सबके ध्यान करनेयोग्य, आदि-अन्तसे रहित, सगुण-निर्गुण, स्थूल-सूक्ष्म और अनुपम होकर भी उपमेय हैं। योगियोंको ज्ञानके द्वारा आपके स्वरूपका अनुभव होता है तथा आप इस त्रिभुवनके गुरु और परमेश्वर हैं; अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ' ॥ १२४ ॥ |
[अध्याय-समाप्ति (पुष्पिका)]
इति श्रीनरसिंहपुराणे पुण्डरीकनारदसंवादे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पुण्डरीक-नारद-संवाद' विषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
२९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६५
२९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६५ पैंसठवाँ अध्याय भगवत्सम्बन्धी तीर्थ और उन तीर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाले भगवान्के नाम भरद्वाज उवाच | भरद्वाजजी बोले—सूतजी! अब मैं आपसे भगवान् त्वत्तो हि श्रोतुमिच्छामि गुह्यक्षेत्राणि वै हरेः। | विष्णुके गुप्त तीर्थोंका और उन तीर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाले नामानि च सुगुह्यानि वद पापहराणि च॥ १ | भगवान्के गुप्त नामोंका वर्णन सुनना चाहता हूँ; कृपया | आप उन पापनाशक नामोंका मेरे समक्ष वर्णन सूत उवाच | कीजिये॥ १॥ मन्दरस्थं हरिं देवं ब्रह्मा पृच्छति केशवम्। | सूतजी बोले—एक समय मन्दराचलपर विराजमान भगवन्तं देवदेवं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २ | शंख-चक्र-गदाधारी देवदेव भगवान् विष्णुसे श्रीब्रह्माजीने | पूछा॥ २॥ ब्रह्मोवाच | केषु केषु च क्षेत्रेषु द्रष्टव्योऽसि मया हरे। | ब्रह्माजी बोले—सुरश्रेष्ठ! हरे! मुझे तथा मुक्ति चाहनेवाले भक्तैरन्यैः सुरश्रेष्ठ मुक्तिकामैर्विशेषतः॥ ३ | अन्यान्य भक्तोंको किन-किन क्षेत्रोंमें जाकर आपका | विशेषरूपसे दर्शन करना चाहिये। जगत्पते! कमललोचन! यानि ते गुह्यनामानि क्षेत्राणि च जगत्पते। | आपके जो-जो गुप्त तीर्थ और नाम हैं, उन्हें मैं आपके तान्यहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तः पद्मायतेक्षण॥ ४ | ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। सुरेश्वर! मनुष्य आलस्य किं जपन् सुगतिं याति नरो नित्यमतन्द्रितः। | त्यागकर प्रतिदिन किसका जप करनेसे सद्गतिको प्राप्त हो त्वद्भक्तानां हितार्थाय तन्मे वद सुरेश्वर॥ ५ | सकता है? अपने भक्तोंका हित-साधन करनेके लिये यह | बात आप हमें बताइये॥ ३-५॥ श्रीभगवानुवाच | शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् गुह्यनामानि मेऽधुना। | श्रीभगवान् बोले—ब्रह्मन्! तुम सावधान होकर क्षेत्राणि चैव गुह्यानि तव वक्ष्यामि तत्त्वतः॥ ६ | सुनो; मेरे जो गुह्य नाम और क्षेत्र हैं, उन्हें मैं ठीक- | ठीक बता रहा हूँ॥ ६॥ कोकामुखे तु वाराहं मन्दरे मधुसूदनम्। | कोकामुख-क्षेत्रमें मेरे वाराहस्वरूपका, मन्दराचलपर अनन्तं कपिलद्वीपे प्रभासे रविनन्दनम्॥ ७ | मधुसूदनका, कपिलद्वीपमें अनन्तका, प्रभासक्षेत्रमें सूर्यनन्दनका, माल्योदपाने वैकुण्ठं महेन्द्रे तु नृपात्मजम्। | माल्योदपानतीर्थमें भगवान् वैकुण्ठका, महेन्द्रपर्वतपर ऋषभे तु महाविष्णुं द्वारकायां तु भूपतिम्॥ ८ | राजकुमारका, ऋषभतीर्थमें महाविष्णुका, द्वारकामें भूपाल पाण्डुसह्ये तु देवेशं वसुरूढे जगत्पतिम्। | श्रीकृष्णका, पाण्डुसह्य पर्वतपर देवेशका, वसुरूढतीर्थमें वल्लीवटे महायोगं चित्रकूटे नराधिपम्॥ ९ | जगत्पतिका, वल्लीवटमें महायोगका, चित्रकूटमें राजा In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद) प्रस्तुत है:
अध्याय ६५ ] भगवत्सम्बन्धी तीर्थ और उन तीर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाले भगवान्के नाम २९३
[संस्कृत मूल श्लोक] निमिषे पीतवासं च गवां निष्क्रमणे हरिम्। शालग्रामे तपोवासमचिन्त्यं गन्धमादने ॥ १० कुब्जागारे हृषीकेशं गन्धद्वारे पयोधरम्। गरुडध्वजं तु सकले गोविन्दं नाम सायके ॥ ११ वृन्दावने तु गोपालं मथुरायां स्वयम्भुवम्। केदारे माधवं विन्द्याद्वाराणस्यां तु केशवम् ॥ १२ पुष्करे पुष्कराक्षं तु धृष्टद्युम्ने जयध्वजम्। तृणबिन्दुवने वीरमशोकं सिन्धुसागरे ॥ १३ कसेरटे महाबाहुममृतं तैजसे वने। विश्वासयूपे विश्वेशं नरसिंहं महावने ॥ १४ हलाङ्गरे रिपुहरं देवशालां त्रिविक्रमम्। पुरुषोत्तमं दशपुरे कुब्जके वामनं विदुः ॥ १५ विद्याधरं वितस्तायां वाराहे धरणीधरम्। देवदारुवने गुह्यं कावेर्यां नागशायिनम् ॥ १६ प्रयागे योगमूर्तिं च पयोष्ण्यां च सुदर्शनम्। कुमारतीर्थे कौमारं लोहिते हयशीर्षकम् ॥ १७ उज्जयिन्यां त्रिविक्रमं लिङ्गकूटे चतुर्भुजम्। हरिहरं तु भद्रायां दृष्ट्वा पापात् प्रमुच्यते ॥ १८ विश्वरूपं कुरुक्षेत्रे मणिकुण्डे हलायुधम्। लोकनाथमयोध्यायां कुण्डिने कुण्डिनेश्वरम् ॥ १९ भाण्डारे वासुदेवं तु चक्रतीर्थे सुदर्शनम्। आढ्ये विष्णुपदं विद्याच्छूकरे शूकरं विदुः ॥ २० ब्रह्मेशं मानसे तीर्थे दण्डके श्यामलं विदुः। त्रिकूटे नागमोक्षं च मेरुपृष्ठे च भास्करम् ॥ २१ विरजं पुष्पभद्रायां बालं केरलके विदुः। यशस्करं विपाशायां माहिष्मत्यां हुताशनम् ॥ २२ क्षीराब्धौ पद्मनाभं तु विमले तु सनातनम्। शिवनद्यां शिवकरं गयायां च गदाधरम् ॥ २३ [हिन्दी अनुवाद] रामका, नैमिषारण्यमें पीताम्बरका, गौओंके विचरनेके स्थान ब्रजमें हरिका, शालग्रामतीर्थमें तपोवासका, गन्धमादन पर्वतपर अचिन्त्य परमेश्वरका, कुब्जागारमें हृषीकेशका, गन्धद्वारमें पयोधरका, सकलतीर्थमें गरुडध्वजका, सायकमें गोविन्दका, वृन्दावनमें गोपालका, मथुरामें स्वयम्भू भगवान्का, केदारतीर्थमें माधवका, वाराणसी (काशी)-में केशवका, पुष्करतीर्थमें पुष्कराक्षका, धृष्टद्युम्न-क्षेत्रमें जयध्वजका, तृणबिन्दु वनमें वीरका, सिन्धुसागरमें अशोकका, कसेरटमें महाबाहुका, तैजस वनमें भगवान् अमृतका, विश्वासयूप (या विशाखयूप)-क्षेत्रमें विश्वेशका, महावनमें नरसिंहका, हलाङ्गरमें रिपुहरका, देवशालामें भगवान् त्रिविक्रमका, दशपुरमें पुरुषोत्तमका, कुब्जकतीर्थमें वामनका, वितस्तामें विद्याधरका, वाराह-तीर्थमें धरणीधरका, देवदारुवनमें गुह्यका, कावेरीतटपर नागशायीका, प्रयागमें योगमूर्तिका, पयोष्णीतटपर सुदर्शनका, कुमारतीर्थमें कौमारका, लोहितमें हयग्रीवका, उज्जयिनीमें त्रिविक्रमका, लिङ्गकूटपर चतुर्भुजका और भद्राके तटपर भगवान् हरिहरका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ७-१८ ॥ इसी प्रकार कुरुक्षेत्रमें विश्वरूपका, मणिकुण्डमें हलायुधका, अयोध्यामें लोकनाथका, कुण्डिनपुरमें कुण्डिनेश्वरका, भाण्डारमें वासुदेवका, चक्रतीर्थमें सुदर्शनका, आढ्यतीर्थमें विष्णुपदका, शूकरक्षेत्रमें भगवान् शूकरका, मानसतीर्थमें ब्रह्मेशका, दण्डकतीर्थमें श्यामलका, त्रिकूटपर्वतपर नागमोक्षका, मेरुके शिखरपर भास्करका, पुष्पभद्राके तटपर विरजका, केरलतीर्थमें बालरूप भगवान्का, विपाशाके तटपर भगवान् यशस्करका, माहिष्मतीपुरीमें हुताशनका, क्षीरसागरमें भगवान् पद्मनाभका, विमलतीर्थमें सनातनका, शिवनदीके तटपर भगवान् शिवका, गयामें गदाधरका
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२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६ सर्वत्र परमात्मानं यः पश्यति स मुच्यते । और सर्वत्र ही परमात्माका जो दर्शन करता है, वह मुक्त अष्टषष्टिश्च नामानि कथितानि मया तव ॥ २४ हो जाता है ॥ १९-२३१/२ ॥ ब्रह्माजी ! ये अड़सठ नाम हमने तुम्हें बताये तथा क्षेत्राणि चैव गुह्यानि कथितानि विशेषतः । विशेषतः गुप्त तीर्थोंका भी वर्णन किया। प्रजापते ! जो एतानि मम नामानि रहस्यानि प्रजापते ॥ २५ पुरुष प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मेरे इन गुह्यनामोंका यः पठेत् प्रातरुत्थाय शृणुयाद्वापि नित्यशः । पाठ या श्रवण करेगा, वह नित्य एक लाख गोदानका गवां शतसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ २६ फल पायेगा। नित्यप्रति पवित्र होकर जो इन नामोंका दिने दिने शुचिर्भूत्वा नामान्येतानि यः पठेत् । पाठ करता है, उसको मेरी कृपासे कभी दुःस्वप्नका दुःस्वप्नं न भवेत् तस्य मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २७ दर्शन नहीं होता, इसमें संदेह नहीं है। जो पुरुष इन अड़सठ नामोंका प्रतिदिन तीनों काल, अर्थात् प्रातः, अष्टषष्टिस्तु नामानि त्रिकालं यः पठेन्नरः । मध्याह्न और सायंकालमें पाठ करता है, वह सब पापोंसे विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मम लोके स मोदते ॥ २८ मुक्त होकर मेरे लोकमें आनन्द भोगता है। सभी मनुष्यों और विशेषतः वैष्णवोंको चाहिये कि यथाशक्ति पूर्वोक्त द्रष्टव्यानि यथाशक्त्या क्षेत्राण्येतानि मानवैः । तीर्थोंका दर्शन करें। जो लोग ऐसा करते हैं, उन्हें मैं वैष्णवैस्तु विशेषेण तेषां मुक्तिं ददाम्यहम् ॥ २९ मुक्ति देता हूँ ॥ २४-२९ ॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं- जो पुरुष सदा और विशेषतः हरिं समभ्यर्च्य तदग्रसंस्थितो हरिवासर (एकादशी या द्वादशीको) भगवान् विष्णुकी हरिं स्मरन् विष्णुदिने विशेषतः । पूजा करके उनके सामने खड़ा हो भगवत्स्मरणपूर्वक इस इमं स्तवं यः पठते स मानवः स्तोत्रका पाठ करता है, वह विष्णुके अमृतपदको प्राप्त प्राप्नोति विष्णोरमृतात्मकं पदम् ॥ ३० कर लेता है ॥ ३० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे आद्ये धर्मार्थमोक्षदायिनि विष्णुवल्लभे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'आदि धर्मार्थमोक्षदायक विष्णुवल्लभस्तोत्र' विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥ छाछठवाँ अध्याय अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य सूत उवाच सूतजी कहते हैं - भगवान् विष्णु पुनः बोले- उक्तः पुण्यः स्तवो ब्रह्मन् हरेरेभिश्च नामभिः । ब्रह्मन् ! उपर्युक्त अड़सठ नामोंसे भगवान् विष्णुकी पावन पुनरन्यानि नामानि यानि तानि निबोध मे ॥ १ स्तुतिका वर्णन किया गया। अब जो दूसरे-दूसरे पावन तीर्थ और नाम हैं, उनका वर्णन मुझसे सुनिये ॥ १ ॥ गङ्गा तु प्रथमं पुण्या यमुना गोमती पुनः । सर्वप्रथम गङ्गा पवित्र है; फिर यमुना, गोमती, सरयू, सरयूः सरस्वती च चन्द्रभागा चर्मण्वती ॥ २ सरस्वती, चन्द्रभागा और चर्मण्वती- ये नदियाँ पावन हैं। कुरुक्षेत्रं गया चैव पुष्कराणि तथार्बुदम् । इसी प्रकार कुरुक्षेत्र, गया, तीनों पुष्कर और अर्बुद-क्षेत्र तथा नर्मदा च महापुण्या तीर्थान्येतानि चोत्तरे ॥ ३ परम पावन नर्मदा नदी-ये उत्तरमें परम पावन तीर्थ हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९५ तापी पयोष्णी पुण्ये द्वे तत्सङ्गात्तीर्थमुत्तमम्। | तापी, पयोष्णी—ये दो पावन नदियाँ हैं। इनके संगमसे तथा ब्रह्मगिरेश्चापि मेखलाभिः समन्विताः ॥ ४ | एक बहुत उत्तम तीर्थ हो गया है तथा ब्रह्मगिरिकी | मेखलाओंसे मिले हुए भी बहुत-से उत्तम तीर्थ हैं। विरजं च तथा तीर्थं सर्वपापक्षयंकरम्। | विरज-तीर्थ भी समस्त पापोंको क्षीण करनेवाला है तथा गोदावरी महापुण्या सर्वत्र चतुरानन ॥ ५ | चतुरानन! गोदावरी नदी सर्वत्र परमपावन है। कमलोद्भव! तुङ्गभद्रा महापुण्या यत्राहं कमलोद्भव। | तुङ्गभद्रा नदी भी अत्यन्त पवित्र करनेवाली है, जिसके हरेण सार्धं प्रीत्या तु वसामि मुनिपूजितः ॥ ६ | तटपर मैं मुनियोंद्वारा पूजित हो भगवान् शङ्करके साथ | स्वयं निवास करता हूँ। दक्षिण गङ्गा, कृष्णा और विशेषतः दक्षिणगङ्गा कृष्णा तु कावेरी च विशेषतः । | कावेरी—ये पुण्य नदियाँ हैं। इनके अतिरिक्त, कमलोद्भव ! सह्ये त्वामलकग्रामे स्थितोऽहं कमलोद्भव ॥ ७ | मैं सह्यपर्वतपर आमलक ग्राममें स्वयं निवास करता हूँ। | वहाँ 'देवदेव' नामसे प्रसिद्ध मेरे श्रीविग्रहका तुम स्वयं देवदेवस्य नाम्ना तु त्वया ब्रह्मन् सदार्चितः । | ही सदा पूजन करते हो। वहाँ समस्त पापोंको हर लेनेवाले तत्र तीर्थान्यनेकानि सर्वपापहराणि वै॥ | अनेक तीर्थ हैं, जिनमें स्नान और आचमन करके मनुष्य येषु स्नात्वा च पीत्वा च पापान्मुच्यति मानवः ॥ ८ | पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २–८ ॥ सूत उवाच | इत्येवं कथयित्वा तु तीर्थानि मधुसूदनः । | सूतजी कहते हैं—भरद्वाज ! ब्रह्माजीसे इन तीर्थोंका ब्रह्मणो गतवान् ब्रह्मन् ब्रह्मापि स्वपुरं गतः ॥ ९ | वर्णन करके भगवान् मधुसूदन अपने धामको चले गये | और ब्रह्मा भी ब्रह्मलोक सिधारे ॥ ९ ॥ भरद्वाज उवाच | | भरद्वाजजी बोले—धर्मज्ञ ! उस आमलक ग्राममें तस्मिन्नामलकग्रामे पुण्यतीर्थानि यानि वै। | जो-जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका आप विस्तारके साथ यथार्थ- तानि मे वद धर्मज्ञ विस्तरेण यथार्थतः ॥ १० | रूपमें वर्णन करें। जहाँ देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं क्षेत्रोत्पत्तिं च माहात्म्यं यात्रापर्व च यत्र तत् । | ब्रह्माजीके द्वारा पूजित होते हैं, उस क्षेत्रकी उत्पत्ति- तत्रासौ देवदेवेशः पूज्यते ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ११ | कथा, माहात्म्य और यात्रापर्वका विस्तृत विवरण प्रस्तुत | कीजिये ॥ १०-११ ॥ सूत उवाच | शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापप्रणाशनम्। | सूतजी कहते हैं—विप्र ! महामुने ! सह्यपर्वतपर स्थित सह्यामलाकतीर्थस्य उत्पत्त्यादि महामुने ॥ १२ | 'आमलक' तीर्थके आविर्भाव आदिकी पवित्र एवं पापनाशक | कथा मैं आपसे कह रहा हूँ, सुनें ॥ १२ ॥ पुरा सह्यावनोद्देशे तरुरामलको महान्। | ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें सह्यपर्वतके वनमें एक बहुत आसीद्ब्रह्मन् महोग्रोऽयं नाम्नायं चोच्यते बुधैः ॥ १३ | बड़ा आँवलेका वृक्ष था। उसे बुद्धिमान् लोगोंने फलानि तस्य वृक्षस्य महान्ति सुरसानि च । | 'महोग्र' नाम दे रखा था। महामुने ! उस वृक्षके फल दर्शनीयानि दिव्यानि दुर्लभाानि महामुने ॥ १४ | बड़े रसीले, दर्शनीय, दिव्य एवं दुर्लभ होते थे। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६ परेषां ब्राह्मणानां तु परेण ब्रह्मणा पुरा। स दृष्टस्तु महावृक्षो महाफलसमन्वितः ॥ १५ किमेतदिति विप्रेन्द्र ध्यानदृष्टिपरोऽभवत् । ध्यानेन दृष्टवांस्तत्र पुनरामलकं तरुम् ॥ १६ तस्योपरि तु देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम् । उत्थाय च पुनः पश्येत्प्रतिमामेव केवलाम् ॥ १७ तत्पादं भूतले देवः प्रविवेश महातरुः । ततस्त्वाराधयामास देवदेवेशमव्ययम् ॥ १८ गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं ब्रह्मा लोकपितामहः। द्वादशभिः सप्तभिस्तु संख्याभिः पूजितो हरिः ॥ १९ तस्मिन् क्षेत्रे मुनिश्रेष्ठ माहात्म्यं तस्य को वदेत् । श्रीसह्यामलग्रामे देवदेवेशमव्ययम् ॥ २० आराध्य तीर्थे सम्प्राप्ता द्वादश प्रति चतुर्मुखम् । तस्य पादतले तीर्थं निस्सृतं पश्चिमामुखम् ॥ २१ तच्चक्रतीर्थमभवत्पुण्यं पापप्रणाशनम् । चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२ बहुवर्षसहस्त्राणि ब्रह्मलोके महीयते । शङ्खतीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ २३ पौषे मासे तु पुष्यार्के तद्यात्रादिवसं मुने। ब्रह्मणः कुण्डिका पूर्वं गङ्गातोयप्रपूरिता ॥ २४ तस्याद्रौ पतिता ब्रह्मंस्तत्र तीर्थेऽशुभं हरेत् । नाम्ना तत्कुण्डिकातीर्थं शिलागृहसमन्वितम् ॥ २५ तत्तीर्थे मनुजः स्नात्वा तदानीं सिद्धिमाप्नुयात् । त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा यस्तत्र स्नाति मानवः ॥ २६ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते। कुण्डिकातीर्थादुत्तरे पिण्डस्थानाच्च दक्षिणे ॥ २७ समस्त उत्तम ब्राह्मणोंमें उत्कृष्ट श्रीब्रह्माजीने पूर्वकालमें महान् फलोंसे युक्त उस महावृक्षको देखा था। विप्रेन्द्र! उसे देखकर, यह क्या है—यह जाननेके लिये ब्रह्माजी ध्यानमग्न हो गये। उन्होंने ध्यानमें उस स्थानपर महान् आँवलेके वृक्षको देखा और उसके ऊपर शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् विष्णुको विराजमान देखा। फिर उन्होंने जब ध्यानसे निवृत्त हो खड़े होकर दृष्टिपात किया, तब वहाँ वृक्षके स्थानमें केवल भगवान् विष्णुकी एक प्रतिमा दिखायी दी। उसका आधारभूत वह दिव्य महावृक्ष भूतलमें धँस गया! तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माजी गन्ध-पुष्प आदिसे नित्य ही उन अविनाशी देवदेवेश्वरकी आराधना करने लगे। उस समय उनके द्वारा बारह और सात बार भगवान्की पूजा सम्पन्न हुई ॥ १३-१९ ॥ मुनिश्रेष्ठ! उस आमलकक्षेत्रमें विराजमान भगवान्के माहात्म्यका कौन वर्णन कर सकता है। श्रीसह्यपर्वतस्थ आमलक ग्राममें इस प्रकार अविनाशी देवेश्वर भगवान्की आराधना करनेके पश्चात् ब्रह्माजीको वहाँ बारह तीर्थ और प्राप्त हुए। भगवान्के चरणके नीचे पश्चिमाभिमुख एक तीर्थ प्रकट हुआ। वह 'चक्रतीर्थ' के नामसे विख्यात हुआ। वह पावन तीर्थ पापोंको नष्ट करनेवाला है। मनुष्य चक्रतीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और हजारों वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसके बाद 'शङ्खतीर्थ' है। उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। मुने! पौष मासमें जब सूर्य पुष्य नक्षत्रपर स्थित हों, उसी समय वहाँकी यात्राका पर्व है। पूर्वकालमें एक समय सह्यपर्वतपर गङ्गाजलसे भरा हुआ ब्रह्माजीका कमण्डलु गिर पड़ा था, तबसे वह स्थान 'कुण्डिका' तीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह तीर्थ सारे अशुभोंको हर लेता है। वहाँ एक शिलामय गृह भी है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य तत्काल सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य उस तीर्थमें तीन राततक उपवास करके स्नान करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कुण्डिका-तीर्थसे उत्तर और 'पिण्डस्थान' नामक तीर्थसे In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९७
ऋणमोचनतीर्थं हि तीर्थानां गुह्यमुत्तमम्। | दक्षिण 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें त्रिरात्रमुषितो यस्तु तत्र स्नानं समाचरेत्॥ २८ | उत्तम और गुह्य है। ब्रह्मन्! वहाँ तीन राततक निवास | करके जो स्नान करता है, वह निस्संदेह तीनों ऋणोंसे ऋणैस्त्रिभिरसौ ब्रह्मन् मुच्यते नात्र संशयः। | मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य पिण्डस्थानमें श्राद्ध करके श्राद्धं कृत्वा पितृभ्यश्च पिण्डस्थानेषु यो नरः॥ २९ | वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे विधिपूर्वक पिण्डदान करेगा, | उसके पितर पूर्ण तृप्त होकर अवश्य ही पितृलोकको पितॄनुद्दिश्य विधिवत्पिण्डान्निर्व्वापयिष्यति। | प्राप्त होंगे॥ २८-३०॥ सुतृप्ताः पितरो यान्ति पितृलोकं न संशयः॥ ३० | | इसके बाद 'पाप-मोचन' तीर्थ है। उस तीर्थमें पाँच पञ्चरात्रोषितस्नायी तीर्थे वै पापमोचने। | राततक निवास करते हुए जो नित्य स्नान करता है, वह सर्वपापक्षयं प्राप्य विष्णुलोके स मोदते॥ ३१ | अपने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करके विष्णुलोकमें आनन्दका | भागी होता है। वहीं एक बहुत बड़ी धारा बहती है। तत्रैव महतीं धारां शिरसा यस्तु धारयेत्। | उसके जलको जो अपने सिरपर धारण करता है, वह सर्वक्रतुफलं प्राप्य नाकपृष्ठे महीयते॥ ३२ | समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित | होता है॥ ३१-३२॥ धनुःपाते महातीर्थे भक्त्या यः स्नानमाचरेत्। | इसके बाद 'धनुःपात' नामक एक महान् तीर्थ है। आयुर्भोगफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते॥ ३३ | उसमें जो भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह पूर्ण आयुका | भोग करके अन्तमें स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। 'शरबिन्दु' शरबिन्दौ नरः स्नात्वा शतक्रतुपुरं व्रजेत्। | तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य मृत्युके बाद इन्द्रपुरीमें जाता वाराहतीर्थे विप्रेन्द्र सह्ये यः स्नानमाचरेत्॥ ३४ | है तथा जो सह्यपर्वतपर 'वाराहतीर्थ' में स्नान करता | और वहाँ एक दिन-रात निवास करता है, वह विष्णुलोकमें अहोरात्रोषितो भूत्वा विष्णुलोके महीयते। | पूजित होता है। इसके बाद सह्यके शिखरपर 'आकाशगङ्गा' आकाशगङ्गानाम्ना च सह्याग्रे तीर्थमुत्तमम्॥ ३५ | नामक एक उत्तम तीर्थ है। वहाँकी शिलाओंके नीचेसे | सफेद मिट्टी निकलती है। विप्रवर! उसमें जो भक्तिपूर्वक शिलातलात्ततो ब्रह्मन्निर्गता श्वेतमृत्तिका। | स्नान करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्तकर तस्यां भक्त्या तु यः स्नाति नरो द्विजवरोत्तम॥ ३६ | विष्णुलोकमें पूजित होता है॥ ३३-३६१/२॥ | सर्वक्रतुफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। | ब्रह्मन्! उस निर्मल सह्यगिरिसे जहाँ-जहाँ जलके ब्रह्मन्नमलसह्याद्रेर्यद्यत्तोयविनिर्गमः ॥ ३७ | झरने गिरते हैं, वहाँ-वहाँ सब जगह तीर्थ समझना | चाहिये। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त तत्र तीर्थं विजानीहि स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते। | हो जाता है। जो नित्य ही सह्यपर्वतकी यात्रा करके सह्याद्रिं गत्वान्नित्यं स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते॥ ३८ | वहाँ स्नान करता है, वह निष्पाप हो जाता है। द्विजेन्द्र! | जो मनुष्य सह्यपर्वतके इन पावन तीर्थोंमें स्नान करके एतेषु तीर्थेषु नरो द्विजेन्द्र | भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुको पुष्प चढ़ाता है, वह पुण्येषु सह्याद्रिसमुद्भवेषु। | पापोंसे रहित हो भगवान् विष्णुमें ही लीन हो जाता दत्त्वा सुपुष्पाणि हरिं स भक्त्या | विहाय पापं प्रविशेत्स विष्णुम्॥ ३९ |
२९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
२९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
सकृत्तीर्थाद्रितोयेषु गङ्गायां तु पुनः पुनः। | है। अन्य सभी तीर्थोंके पर्वतोंसे बहनेवाले जलमें सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्वदेवमयो हरिः ॥ ४० | यथासम्भव एक बार स्नान कर लेना चाहिये, परंतु | गङ्गामें बार-बार स्नान करे; क्योंकि गङ्गामें सम्पूर्ण तीर्थ सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वधर्मो दयापरः। | हैं, भगवान् विष्णुमें सभी देवता वर्तमान हैं, गीता एवं ते कथितं विप्र क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४१ | सर्वशास्त्रमयी है और सभी धर्मोंमें जीवदया श्रेष्ठ | है ॥ ३७—४०१/२ ॥ श्रीसह्यामलकग्रामे तीर्थे स्नात्वा फलानि च। | विप्र ! इस प्रकार मैंने आपसे इस क्षेत्रके उत्तम तीर्थानामपि यत्तीर्थं तत्तीर्थं द्विजसत्तम। | माहात्म्यका वर्णन किया। साथ ही सह्य और आमलक देवदेवस्य पादस्य तलाद्भूवि विनिस्सृतम् ॥ ४२ | ग्रामके तीर्थोंमें स्नान करनेके फल भी बताये। द्विजश्रेष्ठ ! | वही उत्तम तीर्थ है, जो तीर्थोंका भी तीर्थ हो। यह | आमलकग्राम तीर्थ देवदेव भगवान् विष्णुके चरण- अम्भोगुगं तुरगमेधसहस्रतुल्यं | तलसे प्रकट हुआ है, अतः यह सर्वोत्तम तीर्थ है। तच्चक्रतीर्थमिति वेदविदो वदन्ति। | यहाँपर जो जल है, उसमें स्नान करना हजार अश्वमेध स्नानाच्च तत्र मनुजा न पुनर्भवन्ति | यज्ञ करनेके बराबर है। उसीको वेदवेत्ता पुरुष 'चक्रतीर्थ' पादौ प्रणम्य शिरसा मधुसूदनस्य ॥ ४३ | कहते हैं। वहाँ स्नान करके भगवान् मधुसूदनके | चरणोंमें मस्तक झुकानेसे मनुष्यका इस संसारमें | पुनर्जन्म नहीं होता। गङ्गा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर, गङ्गाप्रयागगमनैमिषपुष्कराणि | कुरुजाङ्गलप्रदेश और यमुना-तटवर्ती तीर्थ—ये सभी पुण्यायुतानि कुरुजाङ्गलयामुनानि। | पुण्यतीर्थ हैं। इन तीर्थोंके जलमें स्नान करनेपर वे कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापान् | कुछ समयके बाद पवित्र करते हैं; किंतु भगवान् पादोदकं भगवतस्तु पुनाति सद्यः ॥ ४४ | विष्णुका चरणोदकरूप यह 'चक्रतीर्थ' तत्काल पवित्र | कर देता है ॥ ४१—४४ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे तीर्थप्रशंसायां षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'तीर्थप्रशंसा' विषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सड़सठवाँ अध्याय मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार अबतक तीर्थानि कथितान्येवं भौमानि द्विजसत्तम। | मैंने भूतलके प्रसिद्ध तीर्थोंका वर्णन किया; किंतु इन मानसानि हि तीर्थानि फलदानि विशेषतः ॥ १ | तीर्थोंकी अपेक्षा मानसतीर्थ विशेष फल देनेवाले हैं।
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अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९
अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९ मनोनिर्मलता तीर्थं रागादिभिरनाकुला। सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः॥ २ गुरुशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा। स्वधर्माचरणं तीर्थं तीर्थमग्नेरुपासनम्॥ ३ वास्तवमें राग-द्वेषादिसे रहित मनकी स्वच्छता ही उत्तम तीर्थ है। सत्य, दया, इन्द्रियनिग्रह, गुरुसेवा, माता- पिताकी सेवा, स्वधर्मपालन और अग्निकी उपासना— ये परम उत्तम तीर्थ हैं। यह तो पावन तीर्थोंका वर्णन हुआ, अब व्रतोंका वर्णन सुनिये॥१-३१/२॥ एतानि पुण्यतीर्थानि व्रतानि शृणु मेऽधुना। एकभुक्तं तथा नक्तमुपवासं च वै मुने॥ ४ मुने! दिन-रातमें एक बार भोजन करके रहना और विशेषतः रातमें भोजन न करना—यह व्रत है। पूर्णिमा और अमावास्याको एक ही बार भोजन करके रहना चाहिये। इन तिथियोंमें एक बार भोजन करके रहनेवाला मनुष्य पावन गतिको प्राप्त करता है। जो चतुर्थी, चतुर्दशी, सप्तमी, अष्टमी और त्रयोदशीको रातमें उपवास करता है, उसे मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होती है॥४-६॥ पूर्णमास्याममावास्यामेकभुक्तं समाचरेत्। तत्रैकभुक्तं कुर्वाणः पुण्यां गतिमवाप्नुयात्॥ ५ चतुर्थ्यां तु चतुर्दश्यां सप्तम्यां नक्तमाचरेत्। अष्टम्यां तु त्रयोदश्यां स प्राप्नोत्यभिवाञ्छितम्॥ ६ उपवासो मुनिश्रेष्ठ एकादश्यां विधीयते। नरसिंहं समभ्यर्च्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७ मुनिश्रेष्ठ! एकादशीको दिन-रात उपवास करनेका विधान है। उस दिन भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि हस्त नक्षत्रसे युक्त रविवार हो तो उस दिन रात्रिमें उपवास करके सौरनक्त-व्रतका पालन करना चाहिये। उस दिन स्नानके पश्चात् सूर्यमण्डलमें भगवान् विष्णुका ध्यान करके मनुष्य रोगमुक्त हो जाता है। जब सूर्य अपनी दुगुनी छायामें स्थित हों, उस दिन सौर नक्तव्रतका समय है। उस समयसे लेकर राततक भोजन न करे॥७-९॥ हस्तयुक्तेऽर्कदिवसे सौरनक्तं समाचरेत्। स्नात्वार्कमध्ये विष्णुं च ध्यात्वा रोगात्प्रमुच्यते॥ ८ आत्मनो द्विगुणां छायां यदा संतिष्ठते रविः। सौरनक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम्॥ ९ जो पुरुष बृहस्पतिवारको त्रयोदशी तिथि होनेपर अपराह्नकालमें जलमें स्नान करके तिल और तण्डुलोंद्वारा देवता, ऋषि एवं पितरोंका तर्पण करता है तथा भगवान् नरसिंहका पूजन करके उपवास करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १०-११॥ गुरुवार त्रयोदश्यामपराह्ने जले ततः। तर्पयित्वा पितृन्देवानृषींश्च तिलतण्डुलैः॥ १० नरसिंहं समभ्यर्च्य यः करोत्युपवासकम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ११ महामुने! जब अगस्त्य तारेका उदय हो, उस समयसे लगातार सात रात्रियोंतक अगस्त्य- मुनिको पूजा करके उन्हें अर्घ्य देना चाहिये। यदागस्त्योदये प्राप्ते तदा सप्तसु रात्रिषु। अर्घ्यं दद्यात् समभ्यर्च्य अगस्त्याय महामुने॥ १२ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
३०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
शङ्खे तोयं विनिक्षिप्य सितपुष्पाक्षतैर्युतम्। मन्त्रेणानेन वै दद्याच्छितपुष्पादिनार्चिते ॥ १३ काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव। मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते ॥ १४ आतापी भक्षितो येन वातापी च महासुरः। समुद्रः शोषितो येन सोऽगस्त्यः प्रीयतां मम ॥ १५ एवं तु दद्याद्यो सर्वमगस्त्ये वै दिशं प्रति। सर्वपापविनिर्मुक्तस्तमस्तरति दुस्तरम् ॥ १६ शङ्खमें श्वेत पुष्प और अक्षतसहित जल रखकर श्वेत पुष्प आदिसे पूजित हुए अगस्त्यजीके प्रति निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्य पढ़कर अर्घ्य निवेदन करे—'अग्नि और वायु देवतासे प्रकट हुए अगस्त्यजी! काश पुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले कुम्भज मुने! मित्र और वरुणके पुत्र भगवान् कुम्भयोने! आपको नमस्कार है। जिन्होंने महान् असुर आतापी और वातापीको भक्षण कर लिया और समुद्रको भी सोख डाला, वे अगस्त्यजी मुझपर प्रसन्न हों।' इस प्रकार कहकर जो पुरुष अगस्त्यकी दिशा (दक्षिण)-के प्रति अर्घ्य अर्पण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो, दुस्तर मोहान्धकारसे पार हो जाता है॥ १२—१६॥
एवं ते कथितं सर्वं भरद्वाज महामुने। पुराणं नारसिंहं च मुनीनां संनिधौ मया ॥ १७ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव सर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥ १८ ब्रह्मणैव पुरा प्रोक्तं मरीच्यादिषु वै मुने। तेभ्यश्च भृगुणा प्रोक्तं मार्कण्डेयाय वै ततः ॥ १९ मार्कण्डेयेन वै प्रोक्तं राज्ञो नागकुलस्य ह। प्रसादान्नारसिंहस्य प्राप्तं व्यासेन धीमता ॥ २० तत्प्रसादान्मया प्राप्तं सर्वपापप्रणाशनम्। पुराणं नरसिंहस्य मया च कथितं तव ॥ २१ मुनीनां संनिधौ पुण्यं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्। महामुने! भरद्वाजजी! इस प्रकार मैंने मुनियोंके निकट यह पूरा 'नरसिंहपुराण' आपको सुनाया। इसमें मैंने सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—सभीका वर्णन किया है। मुने! इस पुराणको सर्वप्रथम ब्रह्माजीने मरीचि आदि मुनियोंके प्रति कहा था। उन मुनियोंमेंसे भृगुजीने मार्कण्डेयजीके प्रति इसे कहा और मार्कण्डेयजीने नागकुलोत्पन्न राजा सहस्रानीकको इसका श्रवण कराया। फिर भगवान् नरसिंहकी कृपासे इस पुराणको बुद्धिमान् श्रीव्यासजीने प्राप्त किया। उनकी अनुकम्पासे मैंने इस सर्वपापनाशक पवित्र पुराणका ज्ञान प्राप्त किया और इस समय मैंने यह नरसिंहपुराण इन मुनियोंके निकट आपसे कहा। अब आपका कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ॥ १७—२११/२॥
यः शृणोति शुचिर्भूत्वा पुराणं ह्येतदुत्तमम् ॥ २२ माघे मासि प्रयागे तु स स्नानफलमाप्नुयात्। यो भक्त्या श्रावयेद्भक्तान्रित्यं नरहरेरिदम् ॥ २३ सर्वतीर्थफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। जो मनुष्य पवित्र होकर इस उत्तम पुराणका श्रवण करता है, वह माघ मासमें प्रयागतीर्थमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस नरसिंहपुराणको भगवान्के भक्तोंके प्रति नित्य सुनाता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २२—२३१/२॥
श्रुत्वैवं स्नातकौः सार्धं भरद्वाजो महामतिः ॥ २४ सूतमभ्यर्च्य तत्रैव स्थितवान् मुनयो गताः। इस प्रकार स्नातकोंके साथ इस पुराणको सुन महामति भरद्वाजजीने सूतजीका पूजन-सत्कार किया और स्वयं वहीं रह गये। अन्य सब मुनि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २४१/२॥
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