संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ११
४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ११ नमः कमलनाभाय नमः कमलमालिने। | जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है तथा लोकनाथ नमस्तेऽस्तु वीरभद्र नमोऽस्तु ते॥ १५ | जो कमलकी माला पहने हुए हैं, उन भगवान्को नमस्त्रैलोक्यनाथाय चतुर्मूर्ते जगत्पते। | नमस्कार है। लोकनाथ! वीरभद्र! आपको बार-बार नमो देवाधिदेवाय नमो नारायणाय ते॥ १६ | नमस्कार है। चतुर्व्यूहस्वरूप जगदीश्वर! आप त्रिभुवननाथ देवाधिदेव नारायणको नमस्कार है। पीताम्बरधारी वासुदेवको नमस्ते वासुदेवाय नमस्ते पीतवाससे। | प्रणाम है, प्रणाम है। शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले नमस्ते नरसिंहाय नमस्ते शार्ङ्गधारिणे॥ १७ | नरसिंहस्वरूप आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है, नमस्कार है। भुवनेश्वर! चक्रधारी विष्णु, कृष्ण, राम नमः कृष्णाय रामाय नमश्चक्रायुधाय च। | और भगवान् शिवके रूपमें वर्तमान आपको बार-बार नमः शिवाय देवाय नमस्ते भुवनेश्वर॥ १८ | नमस्कार है। सबके स्वामी श्रीधर! अच्युत! वेदान्त नमो वेदान्तवेद्याय नमोऽनन्ताय विष्णवे। | शास्त्रके द्वारा जाननेयोग्य आप अन्तरहित भगवान् नमस्ते सकलाध्यक्ष नमस्ते श्रीधराच्युत॥ १९ | विष्णुको बारम्बार नमस्कार है। लोकाध्यक्ष! जगत्पूज्य परमात्मन्! आपको नमस्कार है॥ १५-१९१/२॥ लोकाध्यक्ष जगत्पूज्य परमात्मन् नमोऽस्तु ते। | आप ही समस्त संसारकी माता और आप ही त्वं माता सर्वलोकानां त्वमेव जगतः पिता॥ २० | सम्पूर्ण जगत्के पिता हैं। आप पीड़ितोंके सुहृद् हैं; आप त्वमार्तानां सुहृन्मित्रं प्रियस्त्वं प्रपितामहः। | सबके मित्र, प्रियतम, पिताके भी पितामह, गुरु, गति, त्वं गुरुस्त्वं गतिः साक्षी त्वं पतिस्त्वं परायणः॥ २१ | साक्षी, पति और परम आश्रय हैं। आप ही ध्रुव, वषट्कर्ता, हवि, हुताशन (अग्नि), शिव, वसु, धाता, त्वं ध्रुवस्त्वं वषट्कर्ता त्वं हविस्त्वं हुताशनः। | ब्रह्मा, सुरराज इन्द्र, यम, सूर्य, वायु, जल, कुबेर, मनु, त्वं शिवस्त्वं वसुर्धाता त्वं ब्रह्मा त्वं सुरेश्वरः॥ २२ | दिन-रात, रजनी, चन्द्रमा, धृति, श्री, कान्ति, क्षमा और त्वं यमस्त्वं रविर्वायुस्त्वं जलं त्वं धनेश्वरः। | धराधर शेषनाग हैं। चराचरस्वरूप मधुसूदन! आप ही त्वं मनुस्त्वमहोरात्रं त्वं निशा त्वं निशाकरः। | जगत्के स्रष्टा, शासक और संहारक हैं तथा आप ही त्वं धृतिस्त्वं श्रियः कान्तिस्त्वं क्षमा त्वं धराधरः॥ २३ | समस्त संसारके रक्षक हैं। आप ही करण, कारण, कर्ता और परमेश्वर हैं। हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण त्वं कर्ता जगतामीशस्त्वं हन्ता मधुसूदन। | करनेवाले माधव! आप मेरा उद्धार करें। कमलदललोचन त्वमेव गोप्ता सर्वस्य जगतस्त्वं चराचर॥ २४ | प्रियतम! शेषशय्यापर शयन करनेवाले पुरुषोत्तम आपको करणं कारणं कर्ता त्वमेव परमेश्वरः। | ही मैं सदा भक्तिके साथ प्रणाम करता हूँ। देव! जिसमें शङ्खचक्रगदापाणे भो समुद्धर माधव॥ २५ | श्रीवत्सचिह्न शोभा पाता है, जो जगत्का आदिकारण है, जिसका वर्ण श्यामल और नेत्र कमलके समान हैं तथा प्रिय पद्मपलाशाक्ष शेषपर्यङ्कशायिनम्। | जो कलिके दोषोंको नष्ट करनेवाला है, आपके उस त्वामेव भक्त्या सततं नमामि पुरुषोत्तमम्॥ २६ | श्रीविग्रहको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २०-२७॥ श्रीवत्साङ्कं जगद्बीजं श्यामलं कमलेक्षणम्। | जो लक्ष्मीजीको अपने हृदयमें धारण करते हैं, नमामि ते वपुर्देव कलिकल्मषनाशनम्॥ २७ | जिनका शरीर सुन्दर है, जो दिव्यमालासे विभूषित लक्ष्मीधरमुदाराङ्गं दिव्यमालाविभूषितम्। | हैं, जिनका पृष्ठदेश सुन्दर और भुजाएँ बड़ी-बड़ी चारुपृष्ठं महाबाहुं चारुभूषणभूषितम्॥ २८ | हैं, जो सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत हैं, जिनकी नाभिसे पद्म प्रकट हुआ है, जिनके नेत्र कमलदलके पद्मनाभं विशालाक्षं पद्मपत्रनिभेक्षणम्। | समान सुन्दर और विशाल हैं, नासिका बड़ी ऊँची दीर्घतुङ्गमहाघ्राणं नीलजीमूतसंनिभम्॥ २९ | और लम्बी है, जो नील मेघके समान श्याम हैं, जिनकी भुजाएँ लम्बी, शरीर सुरक्षित और वक्षःस्थल दीर्घबाहुं सुगुप्ताङ्गं रत्नहारोज्ज्वलोरसम्। | रत्नोंके हारसे प्रकाशमान है, जिनकी भौंहें, ललाट सुभ्रूललाटमुकुटं स्निग्धदन्तं सुलोचनम्॥ ३० | और मुकुट-सभी सुन्दर हैं, दाँत चिकने और नेत्र In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ११ ] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४५ चारुबाहुं सुताम्रोष्ठं रत्नोज्ज्वलितकुण्डलम् । मनोहर हैं, जो सुन्दर भुजाओं और रुचिर अरुण वृत्तकण्ठं सुपीनांसं सरसं श्रीधरं हरिम् ॥ ३१ अधरोंसे सुशोभित हैं, जिनके कुण्डल रत्नजटित होनेके कारण जगमगा रहे हैं, कण्ठ वर्तुलाकार है और कंधे सुकुमारमजं नित्यं नीलकुञ्चितमूर्धजम् । मांसल हैं, उन रसिकशेखर श्रीधर हरिको नमस्कार उन्नतांसं महोरस्कं कर्णान्तायतलोचनम् ॥ ३२ है ॥ २८-३१ ॥ जो अजन्मा एवं नित्य होनेपर भी सुकुमारस्वरूप हेमारविन्दवदनमिन्दिरायनमीश्वरम् । धारण किये हुए हैं, जिनके केश काले-काले और सर्वलोकविधातारं सर्वपापहरं हरिम् ॥ ३३ घुंघराले हैं, कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल विशाल हैं, आँखें कानोंतक फैली हुई हैं, मुखारविन्द सुवर्णमय कमलके सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वसत्त्वमनोरमम् । समान परम सुन्दर है, जो लक्ष्मीके निवासस्थान एवं विष्णुमच्युतमीशानमनन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ३४ सबके शासक हैं, सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त पापोंको हर लेनेवाले हैं, समग्र शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न नतोऽस्मि मनसा नित्यं नारायणमनामयम् । और सभी जीवोंके लिये मनोरम हैं तथा जो सर्वव्यापी, वरदं कामदं कान्तममन्तं सूनृतं शिवम् ॥ ३५ अच्युत, ईशान, अनन्त एवं पुरुषोत्तम हैं, वरदाता, कामपूरक, कमनीय, अनन्त, मधुरभाषी एवं कल्याणस्वरूप हैं, उन नमामि शिरसा विष्णो सदा त्वां भक्तवत्सल । निरामय भगवान् नारायण श्रीहरिको मैं सदा हृदयसे अस्मिन्नेकार्णवे घोरे वायुस्कम्भितचञ्चले ॥ ३६ नमस्कार करता हूँ ॥ ३२-३५ ॥ भक्तवत्सल विष्णो ! मैं सदा आपको मस्तक झुकाकर अनन्तभोगशयने सहस्रफणशोभिते । प्रणाम करता हूँ। इस भयंकर एकार्णवमें, जो प्रलयकालिक विचित्रशयने रम्ये सेविते मन्दवायुना ॥ ३७ वायुकी प्रेरणासे विक्षुब्ध एवं चञ्चल हो रहा है, सहस्र फणोंसे सुशोभित 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीरकी भुजपञ्जरसंसक्तकमलालयसेवितम् । विचित्र एवं रमणीय शय्यापर, जहाँ मन्द-मन्द वायु चल इह त्वां मनसा सर्वमिदानीं दृष्टवानहम् ॥ ३८ रही है, आपके भुजपाशमें बँधी हुई श्रीलक्ष्मीजीसे आप सेवित हैं; मैंने इस समय सर्वस्वरूप आपके रूपका इदानीं तु सुदुःखार्तो मायया तव मोहितः । यहाँपर जी भरकर दर्शन किया है ॥ ३६-३८ ॥ एकोदके निरालम्बे नष्टस्थावरजङ्गमे ॥ ३९ इस समय आपकी मायासे मोहित होकर मैं अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो रहा हूँ। दुःखरूपी पङ्कसे शून्ये तमसि दुष्पारे दुःखपङ्के निरामये । भरे हुए, व्याधिपूर्ण एवं अवलम्बशून्य इस एकार्णवमें शीतातपजरारोगशोकतृष्णादिभिः सदा ॥ ४० समस्त स्थावर-जङ्गम नष्ट हो चुके हैं। सब ओर शून्यमय अपार अन्धकार छाया हुआ है। मैं इसके भीतर पीडितोऽस्मि भृशं तात सुचिरं कालमच्युत । शीत, आतप, जरा, रोग, शोक और तृष्णा आदिके शोकमोहग्रहग्रस्तो विचरन् भवसागरे ॥ ४१ द्वारा सदा चिरकालसे अत्यन्त कष्ट पा रहा हूँ। तात ! अच्युत ! इस भवसागरमें शोक और मोहरूपी ग्राहसे इहाद्य विधिना प्राप्तस्तव पादाब्जसंनिधौ । ग्रस्त होकर भटकता हुआ आज मैं यहाँ दैववश आपके एकार्णवे महाघोरे दुस्तरे दुःखपीडितः ॥ ४२ चरणकमलोंके निकट आ पहुँचा हूँ। इस महाभयानक दुस्तर एकार्णवमें बहुत कालतक भटकते रहनेके कारण चिरभ्रमपरिश्रान्तस्त्वामद्य शरणं गतः । दुःखपीड़ित एवं थका हुआ मैं आज आपकी शरणमें प्रसीद सुमहामाय विष्णो राजीवलोचन ॥ ४३ आया हूँ। महामायी कमललोचन भगवन् ! विष्णो ! आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३९-४३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११
४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ११ विश्वयोने विशालाक्ष विश्वात्मन् विश्वसम्भव। अनन्यशरणं प्राप्तमतोऽत्र कुलनन्दन॥ ४४ त्राहि मां कृपया कृष्ण शरणागतमातुरम्। नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुराणपुरुषोत्तम॥ ४५ अब्जनाभ हृषीकेश मायामय नमोऽस्तु ते। मामुद्धर महाबाहो मग्ने संसारसागरे ॥ ४६ गह्वरे दुस्तरे दुःखक्लिष्टे क्लेशमहाग्रहैः। अनाथं कृपणं दीनं पतितं भवसागरे। मां समुद्धर गोविन्द वरदेश नमोऽस्तु ते॥ ४७ नमस्त्रैलोक्यनाथाय हरये भूधराय च। देवदेव नमस्तेऽस्तु श्रीवल्लभ नमोऽस्तु ते ॥ ४८ कुलनन्दन कृष्ण! आप विश्वकी उत्पत्तिके स्थान, विशाललोचन, विश्वोत्पादक और विश्वात्मा हैं; अतः दूसरेकी शरणमें न जाकर एकमात्र आपकी ही शरणमें आये हुए मुझ आतुरका आप कृपापूर्वक यहाँ उद्धार करें। पुराण-पुरुषोत्तम पुण्डरीकलोचन! आपको नमस्कार है। कज्जलके समान श्याम कान्तिवाले हृषीकेश! मायाके आश्रयभूत महेश्वर! आपको नमस्कार है। महाबाहो! संसार-सागरमें डूबे हुए मुझ शरणागतका उद्धार कर दें। वरदाता ईश्वर! गोविन्द! क्लेशरूपी महान् ग्राहोंसे भरे हुए, दुःख और क्लेशोंसे युक्त, दुस्तर एवं गहरे भवसागरमें गिरे हुए मुझ दीन, अनाथ एवं कृपणका उद्धार करें। त्रिभुवननाथ विष्णु और धरणीधर अनन्तको नमस्कार है। देवदेव! श्रीवल्लभ! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ४४-४८॥ कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भवान्। संसारार्णवमग्नानां प्रसीद मधुसूदन॥ ४९ त्वामेकमाद्यं पुरुषं पुराणं जगत्पतिं कारणमच्युतं प्रभुम्। जनार्दनं जन्मजरार्तिनाशनं सुरेश्वरं सुन्दरमिन्दिरापतिम्॥ ५० बृहद्भुजं श्यामलकोमलं शुभं वराननं वारिजपत्रनेत्रम्। तरंगभङ्गायतकन्तलं हरिं सुकान्तीमीशं प्रणतोऽस्मि शाश्वतम्॥ ५१ सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्त्वदर्पितम्। तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ त्वत्पूजाकरौ करौ॥ ५२ जन्मान्तरसहस्रेषु यन्मया पातकं कृतम्। तन्मे हर त्वं गोविन्द वासुदेवेति कीर्तनात्॥ ५३ कृष्ण! कृष्ण! आप दयालु और आश्रयहीनके आश्रय हैं। मधुसूदन! संसार-सागरमें निमग्न हुए प्राणियोंपर आप प्रसन्न हों। आज मैं एक (अद्वितीय), आदि, पुराणपुरुष, जगदीश्वर, जगत्के कारण, अच्युतस्वरूप, सबके स्वामी और जन्म-जरा एवं पीड़ाको नष्ट करनेवाले, देवेश्वर, परम सुन्दर लक्ष्मीपति भगवान् जनार्दनको प्रणाम करता हूँ। जिनकी भुजाएँ बड़ी हैं, जो श्यामवर्ण, कोमल, सुशोभन, सुमुख और कमलदललोचन हैं, क्षीरसागरकी तरंगभङ्गीके समान जिनके लम्बे-लम्बे घुँघराले केश हैं, उन परम कमनीय, सनातन ईश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! वही जिह्वा सफल है, जो आप श्रीहरिका स्तवन करती है; वही चित्त सार्थक है, जो आपके चरणोंमें समर्पित हो चुका है तथा केवल वे ही हाथ श्लाघ्य हैं, जो आपकी पूजा करते हैं। गोविन्द! हजारों जन्मान्तरोंमें मैंने जो-जो पाप किये हों, उन सबको आप 'वासुदेव' इस नामका कीर्तन करनेमात्रसे हर लीजिये ॥ ४९-५३॥ व्यास उवाच इति स्तुतस्ततो विष्णुर्मार्कण्डेयेन धीमता। संतुष्टः प्राह विश्वात्मा तं मुनिं गरुडध्वजः॥ ५४ व्यासजी बोले—तदनन्तर बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर गरुडचिह्नित ध्वजावाले विश्वात्मा भगवान् विष्णुने संतुष्ट होकर उनसे कहा॥ ५४॥ श्रीभगवानुवाच प्रीतोऽस्मि तपसा विप्र स्तुत्या च भृगुनन्दन। वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रार्थितं दद्मि ते वरम्॥ ५५ श्रीभगवान् बोले—विप्र! भृगुनन्दन! मैं तुम्हारी तपस्या और स्तुतिसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम मुझसे वर माँगो। मैं तुम्हें मुँहमाँगा वर दूँगा॥ ५५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ११] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४७
अध्याय ११] मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्का स्तवन ४७ मार्कण्डेय उवाच त्वत्पादपद्मे देवेश भक्तिं मे देहि सर्वदा। यदि तुष्टो ममाद्य त्वमन्यदेकं वृणोम्यहम्॥ ५६ स्तोत्रेणानेन देवेश यस्त्वां स्तोष्यति नित्यशः। स्वलोकवसतिं तस्य देहि देव जगत्पते॥ ५७ दीर्घायुष्ट्वं तु यद्दत्तं त्वया मे तप्यतः पुरा। तत्सर्वं सफलं जातमिदानीं तव दर्शनात्॥ ५८ वस्तुमिच्छामि देवेश तव पादाब्जमर्चयन्। अत्रैव भगवन् नित्यं जन्ममृत्युविवर्जितः॥ ५९ मार्कण्डेयजी बोले—देवेश्वर! यदि आज आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगता हूँ कि 'आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे।' इसके सिवा एक दूसरा वर भी मैं माँग रहा हूँ—'देव! देवेश्वर! जगत्पते! जो इस स्तोत्रसे आपकी नित्य स्तुति करे, उसे आप अपने वैकुण्ठधाममें निवास प्रदान करें।' पूर्वकालमें तपस्या करते हुए मुझको जो आपने दीर्घायु होनेका वरदान दिया था, वह सब आज आपके दर्शनसे सफल हो गया। देवेश! भगवन्! अब मैं आपके चरणारविन्दोंका पूजन करता हुआ जन्म और मृत्युसे रहित होकर यहाँ ही नित्य निवास करना चाहता हूँ॥ ५६–५९॥ श्रीभगवानुवाच मय्यस्तु ते भृगुश्रेष्ठ भक्तिरव्यभिचारिणी। भक्त्या मुक्तिर्भविष्यत्येव तव कालेन सत्तम॥ ६० यस्त्विदं पठते स्तोत्रं सायं प्रातस्त्वरितम्। मयि भक्तिं दृढां कृत्वा मम लोके स मोदते॥ ६१ यत्र यत्र भृगुश्रेष्ठ स्थितस्त्वं मां स्मरिष्यसि। तत्र तत्र समेष्यामि दान्तो भक्तवशोऽस्मि भोः॥ ६२ श्रीभगवान् बोले—भृगुश्रेष्ठ! मुझमें तुम्हारी अनन्य भक्ति बनी रहे तथा साधुशिरोमणे! समय आनेपर इस भक्तिसे तुम्हारी मुक्ति भी अवश्य ही हो जायगी। तुम्हारे कहे हुए इस स्तोत्रका जो लोग नित्य प्रातःकाल और संध्याके समय पाठ करेंगे, वे मुझमें सुदृढ़ भक्ति रखते हुए मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक रहेंगे। भृगुश्रेष्ठ! मैं दान्त (स्ववश) होनेपर भी भक्तोंके वशमें रहता हूँ; अतः तुम जहाँ-जहाँ रहकर मेरा स्मरण करोगे, वहाँ-वहाँ मैं पहुँच जाऊँगा॥ ६०–६२॥ व्यास उवाच इत्युक्त्वा तं मुनिश्रेष्ठं मार्कण्डेयं स माधवः। विरराम स सर्वत्र पश्यन् विष्णुं यतस्ततः॥ ६३ इति ते कथितं विप्र चरितं तस्य धीमतः। मार्कण्डेयस्य च मुनेस्तेनैवोक्तं पुरा मम॥ ६४ ये विष्णुभक्त्या चरितं पुराणं भृगोस्तु पौत्रस्य पठन्ति नित्यम्। ते मुक्तपापा नरसिंहलोके वसन्ति भक्तैरभिपूज्यमानाः॥ ६५ व्यासजी बोले—मुनिवर मार्कण्डेयसे यों कहकर भगवान् लक्ष्मीपति मौन हो गये तथा वे मुनि इधर-उधर विचरते हुए सर्वत्र भगवान् विष्णुका साक्षात्कार करने लगे। विप्र! बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस चरित्रका, जिसे पूर्वकालमें उन्होंने स्वयं ही मुझसे कहा था, मैंने तुमसे वर्णन किया। जो लोग भृगुके पौत्र मार्कण्डेयजीके इस पुरातन चरित्रका भगवान् विष्णुमें भक्ति रखते हुए नित्य पाठ करते हैं, वे पापोंसे मुक्त हो, भक्तोंसे पूजित होते हुए भगवान् नृसिंहके लोकमें निवास करते हैं॥ ६३–६५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरितं नाम एकादशोऽध्यायः॥ ११॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेय-चरित' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२
४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२ बारहवाँ अध्याय यम और यमीका संवाद * सूत उवाच सूतजी बोले- समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली श्रुत्वेमाममृतां पुण्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । और अमृतके समान मधुर इस पावन कथाको सुनकर धर्मात्मा शुकदेवजी तृप्त न हुए—उनकी श्रवणविषयक अवितृप्तः स धर्मात्मा शुको व्यासमभाषत ॥ १ इच्छा बढ़ती ही गयी; अतः वे व्यासजीसे बोले ॥ १ ॥ श्रीशुक उवाच श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! बुद्धिमान् अहोऽतीव तपश्चर्या मार्कण्डेयस्य धीमतः । मार्कण्डेयजीकी तपस्या बड़ी भारी और अद्भुत है, जिन्होंने साक्षात् भगवान् विष्णुका दर्शन किया और मृत्युपर येन दृष्टो हरिः साक्षाद्येन मृत्युः पराजितः ॥ २ विजय पायी । तात ! पापोंको नष्ट करनेवाली इस विष्णु- न तृप्तिरस्ति मे तात श्रुत्वेमां वैष्णवीं कथाम् । सम्बन्धिनी पावन कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही पुण्यां पापहरां तात तस्मादन्यत्तु मे वद ॥ ३ है; अतः अब मुझसे कोई दूसरी कथा कहिये । महामते ! नराणां दृढचित्तानामकार्यं नेह कुर्वताम् । जिनका मन सुदृढ़ है, जो इस जगत्में कभी निषिद्ध कर्म यत्पुण्यमृषिभिः प्रोक्तं तन्मे वद महामते ॥ ४ नहीं करते, उन मनुष्योंको जिस पुण्यकी प्राप्ति ऋषियोंने बतायी है, उसे ही आप कहिये ॥ २-४ ॥ व्यास उवाच व्यासजी बोले- मुनिश्रेष्ठ शुकदेव ! स्थिर चित्तवाले नराणां दृढचित्तानामिह लोके परत्र च। पुरुषोंको इस लोकमें या परलोकमें जो पुण्य प्राप्त होता पुण्यं यत् स्यान्मुनिश्रेष्ठ तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ है, उसे मैं बतलाता हूँ; तुम सुनो। इसी विषयमें विद्वान् अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्। पुरुष यमीके साथ महात्मा यमके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं। अदितिके पुत्र जो यम्या च सह संवादं यमस्य च महात्मनः ॥ ६ विवस्वान् (सूर्य) हैं, उनके दो तेजस्वी संतानें हुईं। विवस्वानदितेः पुत्रस्तस्य पुत्रौ सुवर्चसौ। उनमें प्रथम तो 'यम' नामक पुत्र था और दूसरी उससे जज्ञाते स यमश्चैव यमी चापि यवीयसी ॥ ७ छोटी 'यमी' नामकी कन्या थी। वे दोनों अपने पिताके तौ तत्र संविवर्धेते पितुर्भवन उत्तमे। उत्तम भवनमें दिनोंदिन भलीभाँति बढ़ने लगे। वे बाल- क्रीडमानौ स्वभावेन स्वच्छन्दगमनावुभौ ॥ ८ स्वभावके अनुसार साथ-साथ खेलते-कूदते और इच्छानुसार घूमते-फिरते थे। एक दिन यमकी बहिन यमीने अपने यमी यमं समासाद्य स्वसा भ्रातरमब्रवीत् ॥ ९ भाई यमके पास जाकर कहा- ॥ ५-९॥
- यह 'यम-यमी-संवाद' ऋग्वेदके एक सूक्तपर आधारित है। वहाँ प्रसंग यह है कि यम और यमी, जो परस्पर भाई और बहन हैं, कुमारावस्थामें बालोचित खेलसे मन बहला रहे थे। उनके सामने एक ऐसा दृश्य आया, जिसमें कोई वर बाजे-गाजेके साथ विवाहके लिये जा रहा था। यमीने पूछा- 'भैया ! यह क्या है?' यमने उसे बताया कि 'यह बारात है। इसमें वर-वेषधारी पुरुष किसी कुमारी स्त्रीके साथ विवाह करेगा। फिर वे दोनों पति-पत्नी होकर गृहस्थ-जीवन व्यतीत करेंगे।' यमी बालोचित सरलताके साथ प्रस्ताव कर बैठी- 'भैया ! आओ, हम और तुम भी परस्पर विवाह कर लें।' यमने उसे समझाया कि भाईके साथ बहनका विवाह नहीं होता। तुम्हें मुझसे भिन्न किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अपना पति चुनना होगा- 'अन्यं वृणुष्व सुभगे पतिं मत्।' इसी वैदिक उपाख्यानको यहाँ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, मानो यमी कामवेदनासे पीड़ित हो यमसे यह प्रार्थना कर रही हो कि-वे उसे अपनी पत्नी बनाकर उसकी इच्छा पूर्ण करें। इसमें यमीका विकारोत्पादक चित्र प्रस्तुत किया गया है और 'विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः।' (विकारका कारण उपस्थित होनेपर भी जिनके चित्तमें विकार नहीं होता, वे ही पुरुष धीर- ज्ञानी और संयमी हैं-) इस उक्ति के अनुसार यमकी जितेन्द्रियता, उनकी धर्मविषयक अविचल निष्ठा, धैर्य और विवेकको लोकके समक्ष प्रकाशमें लाया गया। जैसे सोना आगमें तपकर खरा उतरता है, उसी प्रकार यम यमीकी अग्नि-परीक्षामें उत्तीर्ण हो सुदृढ़ धर्मात्मा, संयमी और विवेकी सिद्ध हुए हैं। यमके उज्ज्वल चरित्रको और भी चमत्कारी रूपमें सामने लाना इस कथाका उद्देश्य है। इससे प्रत्येक भाई तथा नवयुवकको सदाचारी, संयमी तथा धर्ममें अविचलभावसे स्थित रहनेकी शिक्षा और प्रेरणा मिलती है। यमीके चरित्रसे यह शिक्षा प्राप्त होती है कि प्रत्येक कुमारीका विवाहयोग्य अवस्था होनेपर अविलम्ब किसी योग्य वरके साथ विवाह कर देना चाहिये। वास्तवमें यम और यमी दोनों ही सूर्यदेवकी दिव्य संतानें हैं। उनमें किसी प्रकारके विकारकी लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है। लोगोंको सदाचार और संयमकी शिक्षा देनेके लिये ही व्यासजीने उस वैदिक उपाख्यानको यहाँ इस प्रकार चित्रित किया है। In Public Domain. Digitzed by 'Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय १२ ] यम और यमीका संवाद ४९
यम्युवाच यमी बोली—जो भाई अपनी योग्य बहिनको उसके चाहनेपर भी न चाहे, जो बहिनका पति न हो सके, न भ्राता भगिनीं योग्यां कामयन्तीं च कामयेत्। उसके भाई होनेसे क्या लाभ? जो स्वामीकी इच्छा भ्रातृभूतेन किं तस्य स्वसुर्यो न पतिर्भवेत् ॥ १० रखनेवाली अपनी कुमारी बहिनका स्वामी नहीं बनता, उस भ्राताको ऐसा समझना चाहिये कि वह पैदा ही अभूत इव स ज्ञेयो न तु भूतः कथञ्चन। नहीं हुआ। किसी तरह भी उसका उत्पन्न होना नहीं अनाथां नाथमिच्छन्तीं स्वसारं यो न नाथति ॥ ११ माना जा सकता। भैया ! यदि बहिन अपने भाईको ही अपना स्वामी—अपना पति बनाना चाहती है, इस दशामें काङ्क्षन्तीं भ्रातरं नाथं भर्तारं यस्तु नेच्छति । जो बहिनको नहीं चाहता, वह पुरुष मुनिशिरोमणि ही भ्रातेति नोच्यते लोके स पुमान् मुनिसत्तमः ॥ १२ क्यों न हो, इस संसारमें भ्राता नहीं कहा जा सकता। यदि किसी दूसरेकी ही कन्या उसकी पत्नी हो तो भी स्याच्चान्यतनया तस्य भार्या भवति किं तया। उससे क्या लाभ, यदि उस भाईकी अपनी बहिन उसके ईक्षतस्तु स्वसा भ्रातुः कामेन परिदह्यते ॥ १३ देखते-देखते कामसे दग्ध हो रही है। मेरे होश, इस समय अपने ठिकाने नहीं हैं। मैं इस समय जो काम यत्कार्यमहमिच्छामि त्वमेवेच्छ तदेव हि । करना चाहती हूँ, तुम भी उसीकी इच्छा करो; नहीं तो अन्यथाहं मरिष्यामि त्वामिच्छन्ती विचेतना ॥ १४ मैं तुम्हारी ही चाह लेकर प्राण त्याग दूँगी, मर जाऊँगी। भाई! कामकी वेदना असह्य होती है। तुम मुझे क्यों कामदुःखमसह्यं नु भ्रातः किं त्वं न चेच्छसि । नहीं चाहते? प्यारे भैया ! कामाग्निसे अत्यन्त संतप्त होकर कामाग्निना भृशं तप्ता प्रलीयाम्यङ्ग मा चिरम् ॥ १५ मैं मरी जा रही हूँ; अब देर न करो। कान्त ! मैं कामपीड़िता स्त्री हूँ। तुम शीघ्र ही मेरे अधीन हो जाओ। अपने कामार्तायाः स्त्रियाः कान्त वशगो भव मा चिरम्। शरीरसे मेरे शरीरका संयोग होने दो ॥ १०-१६ ॥ स्वेन कायेन मे कायं संयोजयितुमर्हसि ॥ १६ ॥ यम बोले—बहिन ! सारा संसार जिसकी निन्दा यम उवाच करता है, उसी इस पापकर्मको तू धर्म कैसे बता रही है? भद्रे ! भला कौन सचेत पुरुष यह न करने योग्य पाप- किमिदं लोकविद्विष्टं धर्मं भगिनि भाषसे । कर्म कर सकता है? भामिनि ! मैं अपने शरीरसे तुम्हारे अकार्यमिह कः कुर्यात् पुमान् भद्रे सुचेतनः ॥ १७ शरीरका संयोग न होने दूँगा। कोई भी भाई अपनी काम- पीड़िता बहिनकी इच्छा नहीं पूरी कर सकता। जो बहिनके न ते संयोजयिष्यामि कायं कायेन भामिनि। साथ समागम करता है, उसके इस कर्मको महापातक न भ्राता मदनार्तायाः स्वसुः कामं प्रयच्छति ॥ १८ बताया गया है—शुभे ! यह तिर्यग्-योनिमें पड़े हुए पशुओंका धर्म है—देवता या मनुष्यका नहीं ॥ १७-१९ ॥ महापातकर्मित्याहुः स्वसारं योऽधिगच्छति। पशूनामेष धर्मः स्यात् तिर्यग्योनिवतां शुभे ॥ १९ यमी बोली—भैया ! हम दोनों जुड़वी संतानें हैं और माताके गर्भमें एक साथ रहे हैं। पहले माताके यम्युवाच गर्भमें एक ही स्थानपर हम दोनोंका जो संयोग हुआ था, वह जैसे दूषित नहीं माना गया, उसी प्रकार यह एकस्थाने यथा पूर्वं संयोगो नौ न दुष्यति । संयोग भी दूषित नहीं हो सकता। भाई ! अभीतक मुझे मातृगर्भे तथैवायं संयोगो नौ न दुष्यति ॥ २० पतिकी प्राप्ति नहीं हुई है। तुम मेरा भला करना क्यों नहीं चाहते? 'निर्ऋति' नामक राक्षस तो अपनी बहिनके किं भ्रातरप्यनाथां त्वं मम नेच्छसि शोभनम् । साथ नित्य ही समागम करता है ॥ २०-२१ ॥ स्वसारं निर्ऋती रक्षः संगच्छति च नित्यशः ॥ २१
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५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२
५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२ यम उवाच स्वयम्भुवापि निन्द्येत लोकवृत्तं जुगुप्सितम्। प्रधानपुरुषाचीर्णं लोकोऽयमनुवर्तते॥ २२ तस्मादनिन्दितं धर्मं प्रधानपुरुषश्चरेत्। निन्दितं वर्जयेद्यत्नादेतद्धर्मस्य लक्षणम्॥ २३ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २४ अतिपापमहं मन्ये सुभगे वचनं तव। विरुद्धं सर्वधर्मेषु लोकेषु च विशेषतः॥ २५ मत्तोऽन्यो यो भवेद्यो वै विशिष्टो रूपशीलतः। तेन सार्धं प्रमोदस्व न ते भर्ता भवाम्यहम्॥ २६ नाहं स्पृशामि तन्वा ते तनुं भद्रे दृढव्रतः। मुनयः पापमाहुस्तं यः स्वसारं निगृह्णति॥ २७ यम बोले— बहिन! कुत्सित लोकव्यवहारकी निन्दा ब्रह्माजीने भी की है। इस संसारके लोग श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मका ही अनुसरण करते हैं। इसलिये श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि वह उत्तम धर्मका ही आचरण करे और निन्दित कर्मको यत्नपूर्वक त्याग दे—यही धर्मका लक्षण है। श्रेष्ठ पुरुष जिस-जिस कर्मका आचरण करता है, उसीको अन्य लोग भी आचरणमें लाते हैं और वह जिसे प्रमाणित कर देता है, लोग उसीका अनुसरण करते हैं। सुभगे! मैं तो तुम्हारे इस वचनको अत्यन्त पापपूर्ण समझता हूँ। इतना ही नहीं, मैं इसे सब धर्मों और विशेषतः समस्त लोकोंके विपरीत मानता हूँ। मुझसे अन्य जो कोई भी रूप और शीलमें विशिष्ट हो, उसके साथ तुम आनन्दपूर्वक रहो; मैं तुम्हारा पति नहीं हो सकता। भद्रे! मैं दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला हूँ, अतः अपने शरीरसे तुम्हारे शरीरका स्पर्श नहीं करूँगा। जो बहिनको ग्रहण करता है, उसे मुनियोंने 'पापी' कहा है॥ २२—२७॥ यम्युवाच दुर्लभं चैव पश्यामि लोके रूपमिहेदृशम्। यत्र रूपं वयश्चैव पृथिव्यां क्व प्रतिष्ठितम्॥ २८ न विजानामि ते चित्तं कुत एतत् प्रतिष्ठितम्। आत्मरूपगुणोपेतां न कामयसि मोहिताम्॥ २९ लतेव पादपे लग्ना कामं त्वच्चरणं गता। बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य निवसामि शुचिस्मिता॥ ३० यमी बोली— मैं देखती हूँ, इस संसारमें ऐसा (तुम्हारे समान) रूप दुर्लभ है। भला, पृथ्वीपर ऐसा स्थान कहाँ है, जहाँ रूप और समान अवस्था—दोनों एकत्र वर्तमान हों। मैं नहीं समझती, तुम्हारा यह चित्त इतना स्थिर कैसे है, जिसके कारण तुम अपने समान रूप और गुणसे युक्त होनेपर भी मुझ मोहिता स्त्रीकी इच्छा नहीं करते हो। वृक्षमें संलग्न हुई लताके समान मैं स्वेच्छानुसार तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। मेरे मुखपर पवित्र मुसकान शोभा पाती है। अब मैं अपनी दोनों भुजाओंसे तुम्हारा आलिङ्गन करके ही रहूँगी॥ २८—३०॥ यम उवाच अन्यं श्रयस्व सुश्रोणि देवं देव्यसितेक्षणे। यस्तु ते काममोहेन चेतसा विभ्रमं गतः। तस्य देवस्य देवी त्वं भवेथा वरवर्णिनि॥ ३१ ईप्सितां सर्वभूतानां वर्यां शंसन्ति मानवाः। सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं संस्कृतां परिचक्षते॥ ३२ तत्कृतेऽपि सुविद्वांसो न करिष्यन्ति दूषणम्। परितापं महाप्राज्ञे न करिष्ये दृढव्रतः॥ ३३ चित्तं मे निर्मलं भद्रे विष्णौ रुद्रे च संस्थितम्। अतः पापं नु नेच्छामि धर्मचित्तो दृढव्रतः॥ ३४ यम बोले— श्यामलोचने! सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करनेमें असमर्थ हूँ। तुम किसी दूसरे देवताका आश्रय लो। वरवर्णिनि! तुम्हें देखकर काममोहसे जिसका चित्त विभ्रान्त हो उठे, उसी देवताकी तुम देवी हो जाओ। जिसे समस्त प्राणी चाहते हैं, मानवगण जिसे वरणीय बतलाते हैं, कल्याणमयी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सुसंस्कृता कहते हैं, उसके लिये भी विद्वान् पुरुष कभी दूषित कर्म नहीं करेंगे। महाप्राज्ञे! मेरा व्रत अटल है। मैं यह पश्चात्तापजनक पाप कदापि नहीं करूँगा। भद्रे! मेरा चित्त निर्मल है, भगवान् विष्णु और शिवके चिन्तनमें लगा हुआ है। इसलिये मैं दृढ़संकल्प एवं धर्मात्मा होकर निश्चय ही यह पापकर्म नहीं करना चाहता॥ ३१—३४॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५१
व्यास उवाच असकृत् प्रोच्यमानोऽपि तया चैवं दृढव्रतः। कृतवान् न यमः कार्यं तेन देवत्वमाप्तवान् ॥ ३५ नराणां दृढचित्तानामेवं पापमकुर्वताम्। अनन्तं फलमित्याहुस्तेषां स्वर्गफलं भवेत् ॥ ३६ एतत्तु यम्युपाख्यानं पूर्ववृत्तं सनातनम्। सर्वपापहरं पुण्यं श्रोतव्यमनसूयया ॥ ३७ यश्चैतत् पठते नित्यं हव्यकव्येषु ब्राह्मणः। संतृप्ताः पितरस्तस्य न विशन्ति यमालयम् ॥ ३८ यश्चैतत् पठते नित्यं पितृणामनृणो भवेत्। वैवस्वतीभ्यस्तीव्राभ्यो यातनाभ्यः प्रमुच्यते ॥ ३९ पुत्रैतदाख्यानमनुत्तमं मया तवोदितं वेदपदार्थनिश्चितम्। पुरातनं पापहरं सदा नृणां किमन्यदद्यैव वदामि शंस मे ॥ ४०
श्रीव्यासजी कहते हैं— शुकदेव! यमीके बारंबार कहनेपर भी दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले यमने वह पाप-कर्म नहीं किया; इसलिये वे देवत्वको प्राप्त हुए। इस प्रकार स्थिरचित्त होकर पाप न करनेवाले मनुष्योंके लिये अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति बतलायी गयी है। ऐसे लोगोंको स्वर्गरूप फल उपलब्ध होता है। यह यमीका उपाख्यान, जो प्राचीन एवं सनातन इतिहास है, सब पापोंको दूर करनेवाला और पवित्र है। असूया त्यागकर इसका श्रवण करना चाहिये। जो ब्राह्मण देवयाग और पितृयागमें सदा इसका पाठ करता है, उसके पितृगण पूर्णतः तृप्त होते हैं। उन्हें कभी यमराजके भवनमें प्रवेश नहीं करना पड़ता। जो इसका नित्य पाठ करता है, वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है तथा उसे तीव्र यम-यातनाओंसे छुटकारा मिल जाता है। बेटा शुकदेव! मैंने तुमसे यह सर्वोत्तम एवं पुरातन उपाख्यान कह सुनाया, जो वेदके पदों तथा अर्थोंद्वारा निश्चित है। इसका पाठ करनेपर यह सदा ही मनुष्योंका पाप हर लेता है। मुझे बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ ? ॥ ३५—४० ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे यमीयमसंवादो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमी-यम-संवाद' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद; माताकी रक्षा परम धर्म है, इसका उपदेश
श्रीशुक उवाच विचित्रेयं कथा तात वैदिकी मे त्वयेरिता। अन्याः पुण्याश्च मे ब्रूहि कथाः पापप्रणाशिनीः ॥ १
व्यास उवाच अहं ते कथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्। पतिव्रतायाः संवादं कस्यचिद्ब्रह्मचारिणः ॥ २ कश्यपो नीतिमान् नाम ब्राह्मणो वेदपारगः। सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो व्याख्याने परिनिष्ठितः ॥ ३
श्रीशुकदेवजी बोले— तात! आपने जो यह वैदिक कथा मुझे सुनायी है, बड़ी विचित्र है। अब दूसरी पापनाशक कथाओंका मेरे सम्मुख वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
व्यासजी बोले— बेटा! अब मैं तुमसे उस परम उत्तम प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा, जो किसी ब्रह्मचारी और एक पतिव्रता स्त्रीका संवादरूप है। (मध्यदेशमें) एक कश्यप नामक ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े ही नीतिज्ञ, वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान्, समस्त शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वके ज्ञाता, व्याख्यानमें प्रवीण,
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५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३
५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३ स्वधर्मकार्यनिरतः परधर्मपराङ्मुखः। | अपने धर्मके अनुकूल कार्योंमें तत्पर और परधर्मसे विमुख ऋतुकालाभिगामी च अग्निहोत्रपरायणः॥ ४ | रहनेवाले थे। वे ऋतुकाल आनेपर ही पत्नी-समागम करते सायंप्रातर्महाभाग हुत्वाग्निं तर्पयन् द्विजान्। | और प्रतिदिन अग्निहोत्र किया करते थे। महाभाग! कश्यपजी अतिथीनागतान् गेहं नरसिंहं च पूजयत्॥ ५ | नित्य सायं और प्रातःकाल अग्निमें हवन करनेके पश्चात् तस्य पत्नी महाभागा सावित्री नाम नामतः। | ब्राह्मणों तथा घरपर आये हुए अतिथियोंको तृप्त करते हुए पतिव्रता महाभागा पत्युः प्रियहिते रता॥ ६ | भगवान् नृसिंहका पूजन किया करते थे। उनकी परम भर्तुः शुश्रूषणेनैव दीर्घकालमनिन्दिता। | सौभाग्यशालिनी पत्नीका नाम सावित्री था। महाभागा सावित्री परोक्षज्ञानमापन्ना कल्याणी गुणसम्मता॥ ७ | पतिव्रता होनेके कारण पतिके ही प्रिय और हित-साधनमें तया सह स धर्मात्मा मध्यदेशे महामतिः। | लगी रहती थी। अपने गुणोंके कारण उसका बड़ा सम्मान नन्दिग्रामे वसन् धीमान् स्वानुष्ठानपरायणः॥ ८ | था। वह कल्याणमयी अनिन्दिता सती-साध्वी दीर्घकालतक अथ कौशलिको विप्रो यज्ञशर्मा महामतिः। | पतिकी शुश्रूषामें संलग्न रहनेके कारण परोक्ष-ज्ञानसे सम्पन्न तस्य भार्याभवत् साध्वी रोहिणी नाम नामतः॥ ९ | हो गयी थी—परोक्षमें घटित होनेवाली घटनाओंका भी उसे सर्वलक्षणसम्पन्ना पतिशुश्रूषणे रता। | ज्ञान हो जाता था। मध्यदेशके निवासी वे धर्मात्मा एवं परम सा प्रसूता सुतं त्वेकं तस्माद्भर्तुरनिन्दिता॥ १० | बुद्धिमान् कश्यपजी अपनी उसी धर्मपत्नीके साथ नन्दिग्राममें स यायावरवृत्तिस्तु पुत्रे जाते विचक्षणः। | रहते हुए स्वधर्मके अनुष्ठानमें लगे रहते थे॥ २-८॥ जातकर्म तदा चक्रे स्नात्वा पुत्रस्य मन्त्रतः॥ ११ | उन्हीं दिनों कोशलदेशमें उत्पन्न यज्ञशर्मा नामक एक द्वादशेऽहनि तस्यैव देवशर्मेति बुद्धिमान्। | परम बुद्धिमान् ब्राह्मण थे, जिनकी सती-साध्वी स्त्रीका पुण्याहं वाचयित्वा तु नाम चक्रे यथाविधि॥ १२ | नाम रोहिणी था। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी उपनिष्क्रमणं चैव चतुर्थे मासि यत्नतः। | और पतिकी सेवामें सदा तत्पर रहती थी। उस उत्तम तथाऽन्नप्राशनं षष्ठे मासि चक्रे यथाविधि॥ १३ | आचार-विचारवाली स्त्रीने अपने स्वामी यज्ञशर्मासे एक संवत्सरे ततः पूर्णे चूडाकर्म च धर्मवित्। | पुत्र उत्पन्न किया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर यायावर- कृत्वा गर्भाष्टमे वर्षे व्रतबन्धं चकार सः॥ १४ | वृत्तिवाले बुद्धिमान् पण्डित यज्ञशर्माने स्नान करके सोपनीतो यथान्यायं पित्रा वेदमधीतवान्। | मन्त्रोंद्वारा उसका जातकर्म-संस्कार किया और जन्मके स्वीकृते त्वेकवेदे तु पिता स्वर्लोकमास्थितः॥ १५ | बारहवें दिन उन्होंने विधिपूर्वक पुण्याहवाचन कराकर मात्रा सहास दुःखी स पितुर्युपरते सुतः। | उसका 'देवशर्मा' नाम रखा। इसी प्रकार चौथे महीनेमें धैर्यमास्थाय मेधावी साधुभिः प्रेरितः पुनः॥ १६ | यत्नपूर्वक उसका उपनिष्क्रमण हुआ अर्थात् वह घरसे प्रेतकार्याणि कृत्वा तु देवशर्मा गतः सुतः। | बाहर लाया गया और छठे मासमें उन्होंने उस पुत्रका गङ्गादिषु सुतीर्थेषु स्नानं कृत्वा यथाविधि॥ १७ | विधिपूर्वक अन्नप्राशन-संस्कार किया॥ ९-१३॥ तमेव प्राप्तवान् ग्रामं यत्रास्ते सा पतिव्रता। | तदनन्तर एक वर्ष पूर्ण होनेपर धर्मज्ञ पिताने उसका सम्प्राप्य विश्रुतः सोऽथ ब्रह्मचारी महामते॥ १८ | चूडाकर्म और गर्भसे आठवें वर्षपर उपनयन-संस्कार किया। पिताके द्वारा यथोचितरूपसे उपनयन-संस्कार हो जानेपर उसने वेदाध्ययन किया। उसके द्वारा एक वेदका अध्ययन पूर्ण हो जानेपर उसके पिता स्वर्गगामी हो गये। पिताकी मृत्यु होनेपर वह अपनी माताके साथ बहुत दुःखी हो गया। फिर श्रेष्ठ पुरुषोंकी आज्ञासे उस बुद्धिमान् पुत्रने धैर्य धारण करके पिताका प्रेतकार्य किया। इसके पश्चात् ब्राह्मणकुमार देवशर्मा घरसे निकल गया (विरक्त हो गया)। वह गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंमें विधिपूर्वक स्नान करके घूमता हुआ वहीं जा पहुँचा, जहाँ वह पतिव्रता सावित्री निवास करती थी। महामते! In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५३ भिक्षाटनं तु कृत्वासौ जपन् वेदममन्द्रितः। | वहाँ जाकर वह 'ब्रह्मचारी' के रूपमें विख्यात हुआ। कुर्वन्नेवाग्निकार्यं तु नन्दिग्रामे च तस्थिवान् ॥ १९ | भिक्षाटन करके जीवन-निर्वाह करता हुआ वह | आलस्यरहित हो वेदके स्वाध्याय तथा अग्निहोत्रमें तत्पर मृते भर्तरि तन्माता पुत्रे प्रव्रजिते तु सा। | रहकर उसी नन्दिग्राममें रहने लगा। इधर उसकी माता दुःखाद्दुःखमनुप्राप्ता नियतं रक्षकं विना ॥ २० | अपने स्वामीके मरने और पुत्रके विरक्त होकर घरसे | निकल जानेके बाद किसी नियत रक्षकके न होनेसे अथ स्नात्वा तु नद्यां वै ब्रह्मचारी स्वकर्पटम्। | दुःख-पर-दुःख भोगने लगी ॥ १४-२० ॥ क्षितौ प्रसार्य शोषार्थं जपन्नासीत वाग्यतः ॥ २१ | तदनन्तर एक दिन ब्रह्मचारीने नदीमें स्नान करके | अपना वस्त्र सुखानेके लिये पृथ्वीपर फैला दिया और काको बलाका तद्वस्त्रं परिगृह्याशु जग्मतुः। | स्वयं मौन होकर जप करने लगा। इसी समय एक तौ दृष्ट्वा भर्त्सयामास देवशर्मा ततो द्विजः ॥ २२ | कौआ और बगुला—दोनों वह वस्त्र लेकर शीघ्रतासे | उड़ चले। तब उन्हें इस प्रकार करते देख देवशर्मा विष्ठामुत्सृज्य वस्त्रे तु जग्मतुस्तस्य भर्त्सनात्। | ब्राह्मणने डाँट बतायी। उसकी डाँट सुनकर वे पक्षी उस रोषेण वीक्षयामास खे यान्तौ पक्षिणौ तु सः ॥ २३ | वस्त्रपर बीट करके उसे वहीं छोड़कर चले गये। तब | ब्राह्मणने आकाशमें जाते हुए उन पक्षियोंकी ओर क्रोधपूर्वक तद्रोषवह्निना दग्धौ भूम्यां निपतितौ खगौ। | देखा। वे पक्षी उसकी क्रोधाग्निसे भस्म होकर पृथ्वीपर स दृष्ट्वा तौ क्षितिं यातौ पक्षिणौ विस्मयं गतः ॥ २४ | गिर पड़े। उन्हें पृथ्वीपर गिरा देख ब्रह्मचारी बहुत ही | विस्मित हुआ। फिर वह यह समझकर कि इस पृथ्वीपर तपसा न मया कश्चित् सदृशोऽस्ति महीतले। | तपस्यामें मेरी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है, अनायास इति मत्वा गतो भिक्षामटितुं ग्राममञ्जसा ॥ २५ | ही गाँवमें भिक्षा माँगने चला ॥ २१-२५ ॥ | अटन् ब्राह्मणगेहेषु ब्रह्मचारी तपःस्मयी। | वत्स ! तपस्याका अभिमान रखनेवाला वह ब्रह्मचारी प्रविष्टस्तद्गृहं वत्स गृहे यत्र पतिव्रता ॥ २६ | ब्राह्मणोंके घरोंमें भीख माँगता हुआ उस घरमें गया, जहाँ | वह पतिव्रता सावित्री रहती थी। पतिव्रताने उसे देखा, तं दृष्ट्वा याच्यमानापि तेन भिक्षां पतिव्रता। | ब्रह्मचारीने भिक्षाके लिये उससे याचना की, तो भी वाग्यता पूर्वं विज्ञाय भर्तुः कृत्वानुशासनम् ॥ २७ | वह मौन ही रही। पहले उसने अपने स्वामीके | आदेशकी ओर ध्यान दे उसीका पालन किया; फिर क्षालयामास तत्पादौ भूय उष्णेन वारिणा। | गरम जलसे पतिके चरण धोये—इस प्रकार स्वामीको आश्वास्य स्वपतिं सा तु भिक्षां दातुं प्रचक्रमे ॥ २८ | आराम देकर वह भिक्षा देनेको उद्यत हुई। तब ब्रह्मचारी | क्रोधसे लाल आँखें करके अपने तपोबलके द्वारा ततः क्रोधेन रक्ताक्षो ब्रह्मचारी पतिव्रताम्। | पतिव्रताको जला देनेकी इच्छासे उसकी ओर बारंबार दग्धुकामस्तपोवीर्यात् पुनः पुनरुदैक्षत। | देखने लगा। सावित्री उसे यों करते देख हँसती हुई सावित्री तु निरीक्ष्यैवं हसन्ती सा तमब्रवीत् ॥ २९ | बोली—'ऐ क्रोधी ब्राह्मण! मैं कौआ और बगुला नहीं | हूँ, जो आज नदीके तटपर तुम्हारे कोपसे जलकर भस्म न काको न बलाकाहं त्वत्क्रोधेन तु यौ मृतौ। | हो गये थे। मुझसे यदि भीख चाहते हो, तो चुपचाप नदीतीरेऽद्य कोपात्मन् भिक्षां मत्तो यदीच्छसि ॥ ३० | ले लो' ॥ २६-३० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३
५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३ [संस्कृत श्लोक] तयैवमुक्तः सावित्र्या भिक्षामदाय सोऽग्रतः। चिन्तयन् मनसा तस्याः शक्तिं दूरार्थवेदिनीम्॥ ३१ एत्याश्रमे मठे स्थाप्य भिक्षापात्रं प्रयत्नतः। पतिव्रतायां भुक्तायां गृहस्थे निर्गते पतौ॥ ३२ पुनरागम्य तद्गेहं तामुवाच पतिव्रताम्। ब्रह्मचार्युवाच प्रब्रूह्येतन्महाभागे पृच्छतो मे यथार्थतः॥ ३३ विप्रकृष्टार्थविज्ञानं कथमाशु तवाभवत्। इत्युक्ता तेन सा साध्वी सावित्री तु पतिव्रता॥ ३४ तं ब्रह्मचारिणं प्राह पृच्छन्तं गृहमेत्य वै। शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ३५ तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि स्वधर्मपरिबृंहितम्। स्त्रीणां तु पतिशुश्रूषा धर्म एषः परःस्थितः॥ ३६ तमेवाहं सदा कुर्यां नान्यमस्मि महामते। दिवारात्रमसंदिग्धं श्रद्धया परितोषणम्॥ ३७ कुर्वन्त्या मम सम्भूतं विप्रकृष्टार्थदर्शनम्। अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं यदीच्छसि॥ ३८ पिता यायावरः शुद्धस्तस्माद्वेदमधीत्य वै। मृते पितरि कृत्वा तु प्रेतकार्यमिहागतः॥ ३९ उत्सृज्य मातरं द्रष्टुं वृद्धां दीनां तपस्विनीम्। अनाथां विधवामत्र नित्यं स्वोदरपोषकः॥ ४० यया गर्भे धृतः पूर्वं पालितो लालितस्तथा। तां त्यक्त्वा विपिने धर्मं चरन् विप्र न लज्जसे॥ ४१ यया तव कृतं ब्रह्मन् बाल्ये मलनिकृन्तनम्। दुःखितां तां गृहे त्यक्त्वा किं भवेद्विपिनेऽटतः॥ ४२ मातृदुःखेन ते वक्त्रं पूतिगन्धमिदं भवेत्। पित्रैव संस्कृतो यस्मात् तस्माच्छक्तिरभूदियम्॥ ४३ [हिन्दी अनुवाद] सावित्रीके यों कहनेपर उससे भिक्षा लेकर वह आगे चला और उसकी दूरवर्ती घटनाको जान लेनेवाली शक्तिका मन-ही-मन चिन्तन करता हुआ अपने आश्रमपर पहुँचा। वहाँ भिक्षापात्रको यत्नपूर्वक मठमें रखकर जब पतिव्रता भोजनसे निवृत्त हो गयी और जब उसका गृहस्थ पति घरसे बाहर चला गया, तब वह पुनः उसके घर आया और उस पतिव्रतासे बोला॥ ३१-३२१/२॥ ब्रह्मचारीने कहा— महाभागे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, तुम मुझे यथार्थरूपसे बताओ, तुम्हें दूरकी घटनाका ज्ञान इतना शीघ्र कैसे हो गया?॥ ३३१/२॥ उसके यों कहनेपर वह साध्वी पतिव्रता सावित्री घर आकर प्रश्न करनेवाले उस ब्रह्मचारीसे यों बोली—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछते हो, उसे सावधान होकर सुनो—स्वधर्म-पालनसे बढ़े हुए अपने परोक्षज्ञानके विषयमें मैं तुमसे भलीभाँति बताऊँगी। पतिकी सेवा करना ही स्त्रियोंका सुनिश्चित परम धर्म है। महामते! मैं सदा उसी धर्मका पालन करती हूँ, किसी अन्य धर्मका नहीं। निस्संदेह मैं दिन-रात श्रद्धापूर्वक पतिको संतुष्ट करती रहती हूँ, इसीलिये मुझे दूर होनेवाली घटनाका भी ज्ञान हो जाता है। मैं तुम्हें कुछ और भी बताऊँगी; तुम्हारी इच्छा हो, तो सुनो—'तुम्हारे पिता यज्ञशर्मा यायावर-वृत्तिके शुद्ध ब्राह्मण थे। उनसे ही तुमने वेदाध्ययन किया था। पिताके मर जानेपर उनका प्रेतकार्य करके तुम यहाँ चले आये। दीन-अवस्थामें पड़कर कष्ट भोगती हुई उस अनाथ विधवा वृद्धा माताकी देख-भाल करना छोड़कर तुम यहाँ रोज अपना ही पेट भरनेमें लगे हुए हो। ब्राह्मण! जिसने पहले तुम्हें गर्भमें धारण किया और जन्मके बाद तुम्हारा लालन-पालन किया, उसे असहायावस्थामें छोड़कर वनमें धर्माचरण करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? ब्रह्मन्! जिसने बाल्यावस्थामें तुम्हारा मल-मूत्र साफ किया था, उस दुखिया माताको घरमें अकेली छोड़कर वनमें घूमनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? माताके कष्टसे तुम्हारा मुँह दुर्गन्धयुक्त हो जायगा। तुम्हारे पिताने ही तुम्हारा उत्तम संस्कार कर दिया था, जिससे तुम्हें यह In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५५ पक्षी दग्धः सुदुर्बुद्धे पापात्मन् साम्प्रतं वृथा। शक्ति प्राप्त हुई है। दुर्बुद्धि पापात्मन् ! तुमने व्यर्थ ही वृथा स्नानं वृथा तीर्थं वृथा जप्तं वृथा हुतम् ॥ ४४ पक्षियोंको जलाया। इस समय तुम्हारा किया हुआ स्नान, तीर्थसेवन, जप और होम—सब व्यर्थ है। ब्रह्मन् ! जिसकी स जीवति वृथा ब्रह्मन् यस्य माता सुदुःखिता। माता अत्यन्त दुःखमें पड़ी हो, वह व्यर्थ ही जीवन धारण यो रक्षेत् सततं भक्त्या मातरं मातृवत्सलः ॥ ४५ करता है। जो पुत्र मातापर दया करके भक्तिपूर्वक निरन्तर उसकी रक्षा करता है, उसका किया हुआ सब कर्म यहाँ तस्येहानुष्ठितं सर्वं फलं चामुत्र चेह हि। और परलोकमें भी फलप्रद होता है। ब्रह्मन् ! जिन उत्तम मातृश्च वचनं ब्रह्मन् पालितं यैर्नरोत्तमैः ॥ ४६ पुरुषोंने माताके वचनका पालन किया है, वे इस लोक ते मान्यास्ते नमस्कार्या इह लोके परत्र च। और परलोकमें भी माननीय तथा नमस्कारके योग्य हैं। अतस्त्वं तत्र गत्वाद्य यत्र माता व्यवस्थिता ॥ ४७ अतः जहाँ तुम्हारी माता है, वहाँ जाकर उसके जीते-जी उसीकी रक्षा करो। उसकी रक्षा करना ही तुम्हारे लिये तां त्वं रक्षय जीवन्तीं तद्रक्षा ते परं तपः। परम तपस्या है। इस क्रोधको त्याग दो; क्योंकि यह क्रोधं परित्यजैनं त्वं दृष्टादृष्टविघातकम् ॥ ४८ तुम्हारे दृष्ट और अदृष्ट—सभी कर्मोंको नष्ट करनेवाला है। उन पक्षियोंकी हत्याके पापसे अपनी शुद्धिके लिये तयोः कुरु वधे शुद्धिं पक्षिणोरात्मशुद्धये। तुम प्रायश्चित्त करो। यह सब मैंने तुमसे यथार्थ बातें कही याथातथ्येन कथितमेतत्सर्वं मया तव ॥ ४९ हैं। ब्रह्मचारिन् ! यदि तुम सत्पुरुषोंकी गतिको प्राप्त करना चाहते हो तो मेरे कहे अनुसार करो' ॥ ३४-४९१/२ ॥ ब्रह्मचारिन् कुरुष्व त्वं यदीच्छसि सतां गतिम्। इत्युक्त्वा विररामाथ द्विजपुत्रं पतिव्रता ॥ ५० ब्राह्मणकुमारसे यों कहकर वह पतिव्रता चुप हो गयी। तब ब्रह्मचारी भी पुनः अपने अपराधके लिये सोऽपि तामाह भूयोऽपि सावित्रीं तु क्षमापयन्। क्षमा माँगता हुआ सावित्रीसे बोला—'वरवर्णिनि ! अनजानमें अज्ञानात्कृतपापस्य क्षमस्व वरवर्णिनि ॥ ५१ किये हुए मेरे इस पापको क्षमा करो। महाभागे! पतिव्रते ! तुमने मेरे हितकी ही बात कही है। मैंने जो क्रोधपूर्वक मया तवाहितं यच्च कृतं क्रोधनिरीक्षणम्। तुम्हारी ओर देखकर तुम्हारा अपराध किया था, उसे तत् क्षमस्व महाभागे हितमुक्तं पतिव्रते ॥ ५२ क्षमा कर दो। शुभव्रते ! अब मुझे माताके पास जाकर जिन कर्तव्योंका पालन करना चाहिये, उन्हें बताओ, तत्र गत्वा मया यानि कर्माणि तु शुभव्रते। जिनके करनेसे मेरी शुभगति हो' ॥ ५०-५३ ॥ कार्याणि तानि मे ब्रूहि यथा मे सुगतिर्भवेत् ॥ ५३ उसके इस प्रकार कहनेपर उस पूछनेवाले ब्राह्मणसे तेनैवमुक्ता साप्याह तं पृच्छन्तं पतिव्रता। पतिव्रता सावित्री पुनः बोली— 'ब्रह्मन् ! वहाँ तुमको यानि कार्याणि वक्ष्यामि त्वया कर्माणि मे शृणु ॥ ५४ जो कर्म करने चाहिये, उन्हें बतलाती हूँ; सुनो— 'तुम्हें भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हुए वहाँ माताका पोष्या माता त्वया तत्र निश्चयं भैक्षवृत्तिना। निश्चय ही पोषण करना चाहिये और पक्षियोंकी हत्याका अत्र वा तत्र वा ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं च पक्षिणोः ॥ ५५ प्रायश्चित्त यहाँ अथवा वहाँ अवश्य करना चाहिये। यज्ञशर्माकी* पुत्री तुम्हारी पत्नी होगी। उसे ही तुम यज्ञशर्मसुता कन्या भार्या तव भविष्यति। धर्मपूर्वक ग्रहण करो। तुम्हारे जानेपर यज्ञशर्मा अपनी तां गृह्णीष्व च धर्मेण गते त्वयि स दास्यति ॥ ५६ कन्या तुम्हें दे देंगे। उसके गर्भसे तुम्हारी वंश-परम्पराको बढ़ानेवाला एक पुत्र होगा। पिताकी भाँति यायावर- पुत्रस्ते भविता तस्यामेकः संततिवर्धनः । यायावरधनाद्वृत्तिः पितृवत्ते भविष्यति ॥ ५७ वृत्तिसे प्राप्त हुए धनसे ही तुम अपनी जीविका चलाओगे।
- ये यज्ञशर्मा देवशर्माके पितासे भिन्न थे।
५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १४ पुनर्मृतायां भार्यायां भविता त्वं त्रिदण्डकः। फिर तुम अपनी पत्नीकी मृत्युके बाद त्रिदण्डी (संन्यासी) स यत्याश्रमधर्मेण यथोक्त्यानुष्ठितेन च। हो जाओगे। वहाँ संन्यासाश्रमके लिये शास्त्रविहित नरसिंहप्रसादेन वैष्णवं पदमाप्स्यसि॥ ५८ धर्मका यथावत् रूपसे पालन करनेपर भगवान् नरसिंहकी प्रसन्नतासे तुम विष्णुपदको प्राप्त कर लोगे।' तुम्हारे भाव्यमेतत्तु कथितं मया तव हि पृच्छतः। पूछनेपर मैंने ये भविष्यमें होनेवाली बातें तुमसे बतला मन्यसे नानृतं त्वेतत् कुरु सर्वं हि मे वचः॥ ५९ दी हैं। यदि तुम इन्हें असत्य नहीं मानते, तो मेरे सब वचनोंका पालन करो'॥ ५४—५९॥ ब्राह्मण उवाच ब्राह्मण बोला—पतिव्रते! मैं माताकी रक्षाके लिये गच्छामि मातृरक्षार्थमद्यैवाहं पतिव्रते। आज ही जाता हूँ। शुभेक्षणे! वहाँ जाकर तुम्हारी सब करिष्ये त्वद्वचः सर्वं तत्र गत्वा शुभेक्षणे॥ ६० बातोंका मैं पालन करूँगा॥ ६०॥ इत्युक्त्वा गतवान् ब्रह्मन् देवशर्मा ततस्त्वरन्। ब्रह्मन्! यों कहकर देवशर्मा वहाँसे शीघ्रतापूर्वक संरक्ष्य मातरं यत्नात् क्रोधमोहविवर्जितः॥ ६१ चला गया और क्रोध तथा मोहसे रहित होकर उसने यत्न-पूर्वक माताकी रक्षा की। फिर विवाह करके एक कृत्वा विवाहमुत्पाद्य पुत्रं वंशकरं शुभम्। सुन्दर वंशवर्धक पुत्र उत्पन्न किया और कुछ कालके मृतभार्यश्च संन्यस्य समलोष्टाश्मकाञ्चनः। बाद पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर संन्यासी होकर ढेले और नरसिंहप्रसादेन परां सिद्धिमवाप्तवान्॥ ६२ मिट्टीको बराबर समझते हुए उसने भगवान् नृसिंहकी पतिव्रताशक्तिरियं तवेरिता कृपासे परमसिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर ली। यह मैंने तुमसे धर्मश्च मातुः परिरक्षणं परम्। पतिव्रताकी शक्ति बतायी और यह भी बतलाया कि संसारवृक्षं च निहत्य बन्धनं माताकी रक्षा करना परम धर्म है। संसारवृक्षका उच्छेद छित्त्वा च विष्णोः पदमेति मानवः॥ ६३ करके सब बन्धनोंको तोड़ देनेपर मनुष्य विष्णुपदको प्राप्त करता है॥ ६१—६३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्रह्मचारिसंवादो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पतिव्रता और ब्रह्मचारीका संवाद' विषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥ चौदहवाँ अध्याय तीर्थसेवन और आराधनसे भगवान्की प्रसन्नता; 'अनाश्रमी' रहनेसे दोष तथा आश्रमधर्मके पालनसे भगवत्प्राप्तिका कथन व्यास उवाच व्यासजी बोले—महाबुद्धिमान् पुत्र शुकदेव! तुम शृणु वत्स महाबुद्धे शिष्याश्चैतां परां कथाम्। और मेरे अन्य शिष्यगण भी मेरे द्वारा कही जानेवाली मयोच्यमानां शृण्वन्तु सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १ इस पापहारिणी कथाको सुनो॥ १॥ पूर्वकालमें कोई वेदशास्त्रविशारद श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी पुरा द्विजवरः कश्चिद्वेदशास्त्रविशारदः। पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर तीर्थमें गया और वहाँ उसने मृतभार्यो गतस्तीर्थं चक्रे स्नानं यथाविधि॥ २ विधिपूर्वक स्नान किया और विजन (एकान्त)-में रहकर तपः सुतप्तं विजने निःस्पृहो दारकर्मणि। उत्तम तपस्या की। तत्पश्चात् दारकर्म (विवाह)-की भिक्षाहारः प्रवसितो जपस्नानपरायणः॥ ३ इच्छा न रखकर वह परदेशमें रहता हुआ भिक्षा माँगकर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
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अध्याय १४ ] तीर्थसेवन और आराधनासे भगवान्की प्रसन्नता ५७
[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]
स्नात्वा स गङ्गां यमुनां सरस्वतीं पुण्यां वितस्तामथ गोमतीं च। गयां समासाद्य पितॄन् पितामहान् संतर्पयन् सन् गतवान् महेन्द्रम्॥ ४ तत्रापि कुण्डेषु गिरौ महामतिः स्नात्वा नु दृष्ट्वा भृगुनन्दनोत्तमम्। कृत्वा पितृभ्यस्तु तथैव तृप्तिं व्रजन् वनं पापहरं प्रविष्टः॥ ५ धारां पतन्तीं महतीं शिलोच्चयात् संधार्य भक्त्या त्वनु नारसिंहे। शिरस्यशेषाघविनाशिनीं तदा विशुद्धदेहः स बभूव विप्रः॥ ६ विन्ध्याचले सक्तमनन्तमच्युतं भक्तैर्मुनीन्द्रैरपि पूजितं सदा। आराध्य पुष्पैर्गिरिसम्भवैः शुभै- स्तत्रैव सिद्धिं त्वभिकांक्ष्य संस्थितः॥ ७ स नारसिंहो बहुकालपूजया तुष्टः सुनिद्रागतमाह भक्तम्। अनाश्रमित्वं गृहभङ्गकारणं ह्यतो गृहाणाश्रममुत्तमं द्विज॥ ८ अनाश्रमीति द्विजवेदपारगा- नपि त्वहं नानुगृहामि चात्र। तथापि निष्ठां तव वीक्ष्य सत्तम त्वयि प्रसन्नेन मयेत्युदीरितम्॥ ९ तेनैवमुक्तः परमेश्वरेण द्विजोऽपि बुद्ध्या प्रविचिन्त्य वाक्यम्। हरेरलङ्घ्यं नरसिंहमूर्ते- र्बाधं च कृत्वा स यतिर्बभूव॥ १० त्रिदण्डवृक्षाक्षपवित्रपाणि- राप्लुत्य तोये त्वघहारिणि स्थितः। जपन् सदा मन्त्रमपास्तदोषं सावित्रीमिशं हृदये स्मरन् हरिम्॥ ११ यथाकथंचित् प्रतिलभ्य शाकं भैक्ष्याभितुष्टो वनवासवासी। अभ्यर्च्य विष्णुं नरसिंहमूर्तिं ध्यात्वा च नित्यं हृदि शुद्धमाद्यम्॥ १२
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
जीवननिर्वाह करने और जप, स्नान आदि उत्तम कर्ममें तत्पर रहने लगा। गङ्गा, यमुना, सरस्वती, पावन वितस्ता (झेलम) और गोमती आदिमें स्नान करके वह गयामें पहुँचा और वहाँ अपने पिता-पितामह आदिका तर्पण करके महेन्द्र पर्वतपर गया। वहाँ उस परम बुद्धिमान् द्विजने पर्वतीय कुण्डोंमें स्नान करनेके पश्चात् ऋषिश्रेष्ठ भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया; फिर पूर्ववत् पितरोंके लिये तर्पण करके चलते-चलते एक वनमें प्रवेश किया, जो पापोंका नाश करनेवाला था॥ २—५॥
वहाँ एक पर्वतसे बहुत बड़ी धारा गिरती थी, जो निश्शेष पापराशिका विनाश करनेवाली थी। उसके जलको लेकर ब्राह्मणने भक्तिपूर्वक भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ाया। इससे उसी समय उसका शरीर विशुद्ध हो गया। फिर विन्ध्याचल पर्वतपर स्थित होकर भक्तों और मुनीश्वरोंसे सदा पूजित होनेवाले अनन्त अच्युत भगवान् विष्णुकी सुन्दर पर्वतीय पुष्पोंसे पूजा करता हुआ वह ब्राह्मण सिद्धिकी कामनासे वहीं ठहर गया॥ ६-७॥
इस तरह दीर्घकालतक उसने पूजा की। उससे प्रसन्न होकर वे भगवान् नृसिंह गाढ़ निद्रामें सोये हुए अपने उस भक्तसे स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘ब्रह्मन्! किसी आश्रमधर्मको स्वीकार करके न चलना गृहस्थकी मर्यादाके भङ्गका कारण होता है; अतः यदि तुम्हें गृहस्थ नहीं रहना है तो किसी दूसरे उत्तम आश्रमको ग्रहण करो। ब्रह्मन्! जो किसी आश्रममें स्थित नहीं है, वह यदि वेदोंका पारगामी विद्वान् हो, तो भी मैं यहाँ उसपर अनुग्रह नहीं करता; परंतु साधुवर! तुम्हारी निष्ठा देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, इसीसे मैंने तुमसे यह बात कही है'॥ ८-९॥
उन परमेश्वरके इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने भी अपनी बुद्धिसे नृसिंहस्वरूप श्रीहरिके उस कथनपर विचार करके उसे अलङ्घनीय माना और सम्पूर्ण जगत्का बाध (त्याग) करके वह संन्यासी हो गया॥ १०॥
फिर प्रतिदिन उस पापहारी जलमें डुबकी लगाकर तथा उसीमें खड़ा रहकर त्रिदण्ड और अक्षमाला धारण करनेसे पवित्र हाथोंवाला वह ब्राह्मण मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करता हुआ निर्दोष गायत्री-मन्त्रका जप करने लगा। नित्यप्रति शुद्ध आदिदेव भगवान् विष्णुका हृदयमें ध्यान करके उनके नृसिंह-विग्रहका पूजन करता
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५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १५
५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १५
विविक्तदेशे विपुले कुशासने निवेश्य सर्वं हृदयेऽस्य सर्वम्। बाह्यं समस्तं गुणमिन्द्रियाणां विलीय भेदं भगवत्यनन्ते॥ १३
विज्ञेयमानन्दमजं विशालं सत्यात्मकं क्षेमपदं वरेण्यम्। संचिन्त्य तस्मिन् प्रविहाय देहं बभूव मुक्तः परमात्मरूपी॥ १४
इमां कथां मुक्तिपरां यथोक्तां पठन्ति ये नारसिंहं स्मरन्तः। प्रयागतीर्थप्लवने तु यत्फलं तत् प्राप्य ते यान्ति हरेः पदं महत्॥ १५
इत्येतदुक्तं तव पुत्र पृच्छतः पुरातनं पुण्यतमं पवित्रकम्। संसारवृक्षस्य विनाशनं परं पुनः कमिच्छस्यभिवाञ्छितं वद॥ १६
(हिन्दी अनुवाद): और वनवासी हो किसी प्रकार शाक आदि खाकर भिक्षावृत्तिसे ही संतोषपूर्वक रहता था। विस्तृत एकान्त प्रदेशमें कुशासनपर बैठकर वह इन्द्रियोंके समस्त बाह्य विषयों तथा भेदबुद्धिको हृदयस्थित भगवान् अनन्तमें विलीन करके विज्ञेय, अजन्मा, विराट्, सत्यस्वरूप, श्रेष्ठ, कल्याणधाम आनन्दमय परमेश्वरका चिन्तन करता हुआ आयु पूरी होनेपर शरीर त्यागकर मुक्त एवं परमात्मस्वरूप हो गया॥ ११-१४॥ जो लोग मोक्ष-सम्बन्धिनी अथवा मोक्षको ही उत्कृष्ट बनानेवाली इस कथाको भगवान् नृसिंहका स्मरण करते हुए पढ़ते हैं, वे प्रयागतीर्थमें स्नान करनेसे जो फल होता है, उसे पाकर अन्तमें भगवान् विष्णुके महान् पदको प्राप्त कर लेते हैं। बेटा! तुम्हारे पूछनेसे मैंने यह उत्तम, पवित्र, पुण्यतम एवं पुरातन उपाख्यान, जो संसारवृक्षका नाश करनेवाला है, तुमसे कहा है; अब और क्या सुनना चाहते हो? अपना मनोरथ प्रकट करो॥ १५-१६॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥
पंद्रहवाँ अध्याय
संसारवृक्षका वर्णन तथा इसे नष्ट करनेवाले ज्ञानकी महिमा
श्रीशुक उवाच श्रोतुमिच्छाम्यहं तात साम्प्रतं मुनिभिः सह। संसारवृक्षं सकलं येनेदं परिवर्तते॥ १ वक्तुमर्हसि मे तात त्वयैतत् सूचितं पुरा। नान्यो वेत्ति महाभाग संसारोच्चारलक्षणम्॥ २
श्रीशुकदेवजी बोले— तात! मैं इस समय मुनियोंके साथ संसारवृक्षका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जिसके द्वारा यह परिवर्तनका सम्पूर्ण चक्र चलता रहता है। तात! आपने ही पहले इस वृक्षको सूचित किया है; अतः आप ही इसका वर्णन करनेके योग्य हैं। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इस संसारवृक्षका लक्षण नहीं जानता॥ १-२॥
सूत उवाच स पुत्रैणैवमुक्तस्तु शिष्याणां मध्यगेन च। कृष्णद्वैपायनः प्राह संसारतरुलक्षणम्॥ ३
सूतजी बोले— भरद्वाज! अपने शिष्योंके बीचमें बैठे हुए पुत्र शुकदेवजीके इस प्रकार पूछनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-ने उन्हें संसारवृक्षका लक्षण इस प्रकार बताया॥ ३॥
व्यास उवाच शृण्वन्तु शिष्याः सकला वत्स त्वं शृणु भावितः। संसारवृक्षं वक्ष्यामि येन चेदं समावृतम्॥ ४
श्रीव्यासजी बोले— मेरे सभी शिष्य इस विषयको सुनें; तथा वत्स! तुम भी सावधान होकर सुनो—मैं
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अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ५९ अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्मादग्रे तथोत्थितः । संसारवृक्षका वर्णन करता हूँ, जिसने इस सारे दृश्य- बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ ५ प्रपञ्चको व्याप्त कर रखा है। यह संसारवृक्ष अव्यक्त परमात्मारूपी मूलसे प्रकट हुआ है। उन्हींसे प्रकट होकर महाभूतविशाखश्च विशेषैः पत्रशाखवान्। हमारे सामने इस रूपमें खड़ा है। बुद्धि (महत्तत्त्व) धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः ॥ ६ उसका तना है, इन्द्रियाँ ही उसके अङ्कुर और कोटर हैं, पञ्चमहाभूत उसकी बड़ी-बड़ी डालियाँ हैं, विशेष आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्म वृक्षः सनातनः। पदार्थ ही उसके पत्ते और टहनियाँ हैं, धर्म-अधर्म फूल एतद् ब्रह्म परं चैव ब्रह्म वृक्षस्य तस्य तत् ॥ ७ हैं, उससे 'सुख' और 'दुःख' नामक फल प्रकट होते हैं, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाला यह संसारवृक्ष ब्रह्मकी इत्येवं कथितं वत्स संसारवृक्षलक्षणम्। भाँति सभी भूतोंका आश्रय है। यह अपरब्रह्म और वृक्षमेनं समारूढा मोहमायान्ति देहिनः ॥ ८ परब्रह्म भी इस संसारवृक्षका कारण है। पुत्र ! इस प्रकार मैंने तुमसे संसारवृक्षका लक्षण बतलाया है। इस वृक्षपर संसरन्तीह सततं सुखदुःखसमन्विताः । चढ़े हुए देहाभिमानी जीव मोहित हो जाते हैं। प्रायः प्रायेण प्राकृता मर्त्या ब्रह्मज्ञानपराङ्मुखाः॥ ९ ब्रह्मज्ञानसे विमुख प्राकृत मनुष्य सदा सुख-दुःखसे युक्त होकर इस संसारमें फँसे रहते हैं, ब्रह्मज्ञानी विद्वान् इस छित्त्वैनं कृतिनो यान्ति नो यान्ति ब्रह्मज्ञानिनः। संसारवृक्षको नहीं प्राप्त होते । वे इसका उच्छेद करके कर्मक्रिये महाप्राज्ञ नैनं छिन्दन्ति दुष्कृताः ॥ १० मुक्त हो जाते हैं। महाप्राज्ञ शुकदेव ! जो पापी हैं, वे कर्म-क्रियाका उच्छेद नहीं कर पाते। ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी एनं छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना । उत्तम खड्गके द्वारा इस वृक्षको छिन्न-भिन्न करके उस ततोऽमरत्वं ते यान्ति यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ ११ अमरपदको प्राप्त करते हैं, जहाँसे जीव पुनः इस संसारमें नहीं आता। शरीर तथा स्त्रीरूपी बन्धनोंसे दृढ़तापूर्वक देहदारमयैः पाशैर्दृढं बद्धोऽपि मुच्यते । बँधा हुआ पुरुष भी ज्ञानके द्वारा मुक्त हो जाता है; अतः ज्ञानमेव परं पुंसां श्रेयसामभिवाञ्छितम्। श्रेष्ठतम पुरुषोंको ज्ञानकी प्राप्ति ही परम अभीष्ट होती है; तोषणं नरसिंहस्य ज्ञानहीनः पशुः पुमान् ॥ १२ क्योंकि ज्ञान ही भगवान् नृसिंहको संतोष देता है। ज्ञानहीन पुरुष तो पशु ही है। मनुष्योंके आहार, निद्रा, भय और आहारनिद्राभयमैथुनानि मैथुन आदि कर्म तो पशुओंके ही समान होते हैं; उनमें समानमेतत्पशुभिनराणाम् । केवल ज्ञान ही अधिक होता है। जो ज्ञानहीन हैं, वे ज्ञानं नराणामधिकं हि लोके पशुओंके ही तुल्य हैं ॥ ४-१३ ॥ ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥ १३ । इति श्रीनरसिंहपुराणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥ सोलहवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन श्रीशुक उवाच | श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! जो संसारवृक्षपर संसारवृक्षमारुह्य द्वन्द्वपाशशतैर्दृढैः । आरूढ़ हो; राग-द्वेषादि द्वन्द्वमय सैकड़ों सुदृढ़ पाशों बध्यमानः सुतैश्वर्यैः पतितो योनिसागरे ॥ १ | तथा पुत्र और ऐश्वर्य आदिके बन्धनसे बँधकर योनि- In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६
६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६ यः कामक्रोधलोभैस्तु विषयैः परिपीडितः । | समुद्रमें गिरा हुआ है तथा काम, क्रोध, लोभ और बद्धः स्वकर्मभिर्गौणैः पुत्रदारैषणादिभिः ॥ २ | विषयोंसे पीड़ित होकर अपने कर्ममय मुख्य बन्धनों | तथा पुत्रैषणा और दारैषणा आदि गौण बन्धनोंसे आबद्ध स केन निस्तरत्याशु दुस्तरं भवसागरम् । | है, वह मनुष्य इस दुस्तर भवसागरको कैसे शीघ्र पार पृच्छामाख्याहि मे तात तस्य मुक्तिः कथं भवेत् ॥ ३ | कर सकता है ? उसकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? | हमारे इस प्रश्नका समाधान कीजिये ॥ १-३ ॥ श्रीव्यास उवाच | | श्रीव्यासजी बोले- महाप्राज्ञ पुत्र ! मैंने पूर्वकालमें शृणु वत्स महाप्राज्ञ यज्ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नुयात् । | नारदजीके मुखसे जिसका श्रवण किया था और जिसे तच्च वक्ष्यामि ते दिव्यं नारदेन श्रुतं पुरा ॥ ४ | जान लेनेपर मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उस दिव्य | ज्ञानका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। यमराजके भवनमें नरके रौरवे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिताः । | जहाँ घोर रौरव नरकके भीतर धर्म और ज्ञानसे रहित स्वकर्मभिर्महादुःखं प्राप्ता यत्र यमालये ॥ ५ | प्राणी अपने पापकर्मोंके कारण महान् कष्ट पाते हैं, | वहाँ एक बार नारदजी गये। उन्होंने देखा, पापी जीव महापापकृतं घोरं सम्प्राप्ताः पापकृज्जनाः । | अपने महान् पापोंके फलस्वरूप घोर संकटमें पड़े हैं। आलोक्य नारदः शीघ्रं गत्वा यत्र त्रिलोचनः ॥ ६ | यह देखकर नारदजी शीघ्र ही उस स्थानपर गये, जहाँ | त्रिलोचन महादेवजी थे। वहाँ पहुँचकर सिरपर गङ्गाजीको गङ्गाधरं महादेवं शंकरं शूलपाणिनम् । | धारण करनेवाले महान् देवता शूलपाणि भगवान् प्रणम्य विधिवद्देवं नारदः परिपृच्छति ॥ ७ | शंकरको उन्होंने विधिवत् प्रणाम किया और इस | प्रकार पूछा ॥ ४-७ ॥ नारद उवाच | | नारदजी बोले- 'भगवन् ! जो संसारमें महान् द्वन्द्वों, यः संसारे महाद्वन्द्वैः कामभोगैः शुभाशुभैः । | शुभाशुभ कामभोगों और शब्दादि विषयोंसे बँधकर शब्दादिविषयैर्बद्धः पीड्यमानः षडूर्द्मिभिः ॥ ८ | छहों ऊर्मियोंद्वारा * पीड़ित हो रहा है, वह मृत्युमय कथं नु मुच्यते क्षिप्रं मृत्युसंसारसागरात् । | संसार-सागरसे किस प्रकार शीघ्र ही मुक्त हो सकता भगवन् ब्रूहि मे तत्त्वं श्रोतुमिच्छामि शंकर ॥ ९ | है ? कल्याणस्वरूप भगवान् शिव ! यह बात मुझे बताइये। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य त्रिलोचनः । | मैं यही सुनना चाहता हूँ।' नारदजीका वह वचन सुनकर उवाच तमृषिं शम्भुः प्रसन्नवदनो हरः ॥ १० | त्रिनेत्रधारी भगवान् हरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल | उठा। वे उन महर्षिसे बोले ॥ ८-१० ॥ महेश्वर उवाच | | श्रीमहेश्वरने कहा - मुनिश्रेष्ठ ! सुनो; मैं सब प्रकारके ज्ञानामृतं च गुह्यं च रहस्यमृषिसत्तम । | बन्धनोंका भय और दुःख दूर करनेवाले गोपनीय वक्ष्यामि शृणु दुःखघ्नं सर्वबन्धभयापहम् ॥ ११ | रहस्यभूत ज्ञानामृतका वर्णन करता हूँ। तृणसे लेकर तृणादि चतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् । | चतुरानन ब्रह्माजीतक, जो चार प्रकारका प्राणिसमुदाय चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं यस्य मायया ॥ १२ | है, वह अथवा समस्त चराचर जगत् जिनकी मायासे तस्य विष्णोः प्रसादेन यदि कश्चित् प्रबुध्यते । | सुप्त हो रहा है, उन भगवान् विष्णुकी कृपासे यदि स निस्तरति संसारं देवानापि दुस्तरम् ॥ १३ | कोई जाग उठता है - ज्ञानवान् हो जाता है तो वही | देवताओंके लिये भी दुस्तर इस संसार-सागरको पार भोगैश्वर्यमदोन्मत्तस्तत्त्वज्ञानपराङ्मुखः । | कर जाता है। जो मनुष्य भोग और ऐश्वर्यके मदसे संसारसुमहापङ्के जीर्णा गौरिव मज्जति ॥ १४ | उन्मत्त और तत्त्वज्ञानसे विमुख है, वह संसाररूपी
- भूख, प्यास, जरा, मृत्यु, शोक और मोह-ये छः दुःख 'ऊर्मि' कहे गये हैं।
अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ६१ यस्त्वात्मानं निबध्नाति कर्मभिः कोशकारवत्। महान् पङ्कमें उस तरह डूब जाता है, जैसे कीचड़में तस्य मुक्तिं न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि॥ १५ फँसी हुई बूढ़ी गाय। जो रेशमके कीड़ेकी भाँति अपनेको कर्मोंके बन्धनसे बाँध लेता है, उसके लिये करोड़ों जन्मोंमें तस्मान्नारद सर्वेशं देवानां देवमव्ययम्। भी मैं मुक्तिकी सम्भावना नहीं देखता। इसलिये नारद! आराधयेत्सदा सम्यग् ध्यायेद्विष्णुं समाहितः॥ १६ सदा समाहितचित्त होकर सर्वेश्वर अविनाशी देवदेव भगवान् विष्णुका सदा भलीभाँति आराधन और ध्यान यस्तं विश्वमनाद्यन्तमाद्यं स्वात्मनि संस्थितम्। करना चाहिये॥ ११-१६॥ सर्वज्ञममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १७ जो सदा उन विश्वस्वरूप, आदि-अन्तसे रहित, सबके आदिकारण, आत्मनिष्ठ, अमल एवं सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका निर्विकल्पं निराकाशं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। जो विकल्पसे वासुदेवमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १८ रहित, अवकाशशून्य, प्रपञ्चसे परे, रोग-शोकसे हीन एवं अजन्मा हैं, उन वासुदेव (सर्वव्यापी भगवान्) विष्णुका निरञ्जनं परं शान्तमच्युतं भूतभावनम्। सदा ध्यान करनेवाला पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो देवगर्भं विभुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १९ जाता है। जो सब दोषोंसे रहित, परम शान्त, अच्युत, प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा देवताओंके भी उत्पत्ति- सर्वपापविनिर्मुक्तमप्रमेयमलक्षणम् । स्थान हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला निर्वाणमनघं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २० पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है। जो सम्पूर्ण पापोंसे शून्य, प्रमाणरहित, लक्षणहीन, शान्त तथा अमृतं परमानन्दं सर्वपापविवर्जितम्। निष्पाप हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा चिन्तन करनेवाला ब्रह्मण्यं शंकरं विष्णुं सदा संकीर्त्य मुच्यते॥ २१ मनुष्य कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो अमृतमय, परमानन्दस्वरूप, सब पापोंसे रहित, ब्राह्मणप्रिय तथा सबका योगेश्वरं पुराणाख्यमशरीरं गुहाशयम्। कल्याण करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुका निरन्तर नाम- अमात्रमव्ययं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २२ कीर्तन करनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो योगोंके ईश्वर, पुराण, प्राकृत देहहीन, बुद्धिरूप गुहामें शुभाशुभविनिर्मुक्तमूर्भिष्टकपरं विभुम्। शयन करनेवाले, विषयोंके सम्पर्कसे शून्य और अविनाशी अचिन्त्यममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २३ हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है॥ १७-२२॥ सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तं सर्वदुःखविवर्जितम्। जो शुभ और अशुभके बन्धनसे रहित, छः ऊर्मियोंसे अप्रतर्क्यमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २४ परे, सर्वव्यापी, अचिन्तनीय तथा निर्मल हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसारसे मुक्त हो अनामगोत्रमद्वैतं चतुर्थं परमं पदम्। जाता है। जो समस्त द्वन्द्वोंसे मुक्त और सब दुःखोंसे तं सर्वहृद्गतं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २५ रहित हैं, उन तर्कके अविषय, अजन्मा भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। जो अरूपं सत्यसंकल्पं शुद्धमाकाशवत्परम्। नाम-गोत्रसे शून्य, अद्वितीय और जाग्रत् आदि तीनों एकाग्रमनसा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २६ अवस्थाओंसे परे तुरीय परमपद हैं, समस्त भूतोंके हृदय- मन्दिरमें विद्यमान उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान सर्वात्मकं स्वभावस्थमात्मचैतन्यरूपकम्। करनेवाला पुरुष मुक्त हो जाता है। जो रूपरहित, सत्यसंकल्प शुभ्रमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २७ और आकाशके समान परम शुद्ध हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा एकाग्रचित्तसे चिन्तन करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त अनिर्वाच्यमविज्ञेयमक्षरादिमसम्भवम् । कर लेता है। जो सर्वरूप, स्वभावनिष्ठ और आत्मचैतन्यरूप एकं नूतं सदा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २८ हैं, उन प्रकाशमान एकाक्षर (प्रणवमय) भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६
६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६ विश्वाद्यं विश्वगोप्तारं विश्वादं सर्वकामदम्। जो अनिर्वचनीय, ज्ञानातीत, प्रणवस्वरूप और जन्म- स्थानत्रयातिगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ २९ रहित हैं, उन एकमात्र नित्यनूतन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो विश्वके सर्वदुःखक्षयकरं सर्वशान्तिकरं हरिम्। आदिकारण, विश्वके रक्षक, विश्वका भक्षण (संहार) करनेवाले सर्वपापहरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३० तथा सम्पूर्ण काम्यवस्तुओंके दाता हैं, तीनों अवस्थाओंसे अतीत उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः। मुक्त हो जाता है। समस्त दुःखोंके नाशक, सबको शान्ति योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३१ प्रदान करनेवाले और सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाले भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसार-बन्धनसे विष्णौ प्रतिष्ठितं विश्वं विष्णुर्विश्वे प्रतिष्ठितः। मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा आदि देवता, गन्धर्व, मुनि, विश्वेश्वरमजं विष्णुं कीर्तयन्नेव मुच्यते ॥ ३२ सिद्ध, चारण और योगियोंद्वारा सेवित भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष पाप-तापसे मुक्त हो जाता संसारबन्धनान्मुक्तिमिच्छन् काममशेषतः। है। यह विश्व भगवान् विष्णुमें स्थित है और भगवान् भक्त्यैव वरदं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३३ विष्णु इस विश्वमें प्रतिष्ठित हैं। सम्पूर्ण विश्वके स्वामी, अजन्मा भगवान् विष्णुका कीर्तन करनेमात्रसे मनुष्य व्यास उवाच मुक्त हो जाता है। जो संसार-बन्धनसे मुक्ति तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह यदि भक्तिपूर्वक वरदायक नारदेन पुरा पृष्ट एवं स वृषभध्वजः। भगवान् विष्णुका ध्यान करे तो सफलमनोरथ होकर यदुवाच तदा तस्मै तन्मया कथितं तव ॥ ३४ संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २३-३३ ॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—बेटा ! इस प्रकार पूर्वकालमें तमेव सततं ध्याहि निर्बीजं ब्रह्म केवलम्। देवर्षि नारदजीके पूछनेपर उन वृषभचिह्नित अवाप्स्यसि ध्रुवं तात शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ३५ ध्वजावाले भगवान् शंकरने उस समय उनके प्रति जो कुछ कहा था, वह सब मैंने तुमसे कह सुनाया। तात ! श्रुत्वा सुरर्षिर्विष्णोः प्राधान्यमिदमीश्वरात् । निर्बीज ब्रह्मरूप उन अद्वितीय विष्णुका ही निरन्तर ध्यान स विष्णुं सम्यगाराध्य परां सिद्धिमवाप्तवान् ॥ ३६ करो; इससे तुम अवश्य ही सनातन अविनाशी पदको प्राप्त करोगे ॥ ३४-३५ ॥ यश्चैनं पठते चैव नृसिंहकृतमानसः । देवर्षि नारदने शंकरजीके मुखसे इस प्रकार भगवान् शतजन्मकृतं पापमपि तस्य प्रणश्यति ॥ ३७ विष्णुकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन सुनकर उनकी भलीभाँति आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली। जो भगवान् विष्णोः स्तवमिदं पुण्यं महादेवेन कीर्तितम्। नृसिंहमें चित्त लगाकर इस प्रसंगका नित्य पाठ करता प्रातः स्नात्वा पठेन्नित्यममृतत्वं स गच्छति ॥ ३८ है, उसका सौ जन्मोंमें किया हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है। महादेवजीके द्वारा कथित भगवान् विष्णुके इस पावन ध्यायन्ति ये नित्यमनन्तमच्युतं स्तोत्रका जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके पाठ करता हृत्पद्ममध्येऽथ कीर्तयन्ति ये। है, वह अमृतपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है। जो उपासकानां प्रभुमीश्वरं परं लोग अपने हृदय-कमलके मध्यमें विराजमान अनन्त ते यान्ति सिद्धिं परमां तु वैष्णवीम् ॥ ३९ ॥ भगवान् अच्युतका सदा ध्यान करते हैं और उपासकोंके प्रभु उन परमेश्वर भगवान् विष्णुका कीर्तन करते हैं, वे परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि (विष्णु-सायुज्य) प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३६-३९ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोःस्तवराजनिरूपणे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीविष्णुस्तवराजनिरूपण' विषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
सत्रहवाँ अध्याय
यहाँ पृष्ठ की पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी प्रतिलिपि प्रस्तुत है:
अध्याय १७ ] $\qquad\qquad$ अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य $\qquad\qquad$ ६३ सत्रहवाँ अध्याय अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य
श्रीशुक उवाच किं जपन् मुच्यते तात सततं विष्णुतत्परः। संसारदुःखान् सर्वेषां हिताय वद मे पितः॥ १ व्यास उवाच अष्टाक्षरं प्रवक्ष्यामि मन्त्राणां मन्त्रमुत्तमम्। यं जपन् मुच्यते मर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात्॥ २ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्। एकाग्रमनसा ध्यात्वा विष्णुं कुर्याज्जपं द्विजः॥ ३ एकान्ते निर्जनस्थाने विष्ण्वग्रे वा जलान्तिके। जपेदष्टाक्षरं मन्त्रं चित्ते विष्णुं निधाय वै॥ ४ अष्टाक्षरस्य मन्त्रस्य ऋषिनारायणः स्वयम्। छन्दश्च दैवी गायत्री परमात्मा च देवता॥ ५ शुक्लवर्णं च ॐकारं नकारं रक्तमुच्यते। मोकारं वर्णतः कृष्णं नाकारं रक्तमुच्यते॥ ६ राकारं कुङ्कुमाभं तु यकारं पीतमुच्यते। णाकारमञ्जनाभं तु यकारं बहुवर्णकम्॥ ७ ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः। भक्तानां जपतां तात स्वर्गमोक्षफलप्रदः। वेदानां प्रणवेनैष सिद्धो मन्त्रः सनातनः॥ ८ सर्वपापहरः श्रीमान् सर्वमन्त्रेषु चोत्तमः। एनमष्टाक्षरं मन्त्रं जपन्नारायणं स्मरेत्॥ ९ संध्यावसाने सततं सर्वपापैः प्रमुच्यते। एष एव परो मन्त्र एष एव परं तपः॥ १० एष एव परो मोक्ष एष स्वर्ग उदाहृतः। सर्ववेदरहस्येभ्यः सार एष समुद्धृतः॥ ११ विष्णुना वैष्णवानां हि हिताय मनुजां पुरा। एवं ज्ञात्वा ततो विप्रो ह्यष्टाक्षरमिमं स्मरेत्॥ १२
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीशुकदेवजी बोले—तात! पिताजी! मनुष्य सदा भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर रहकर किस मन्त्रका जप करनेसे सांसारिक कष्टसे मुक्त होता है? यह मुझे बताइये। इससे सब लोगोंका हित होगा॥ १॥ श्रीव्यासजी बोले—बेटा! मैं तुम्हें सभी मन्त्रोंमें उत्तम अष्टाक्षरमन्त्र बतलाऊँगा, जिसका जप करनेवाला मनुष्य जन्म और मृत्युसे युक्त संसाररूपी बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २॥ द्विजको चाहिये कि अपने हृदय-कमलके मध्यभागमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका एकाग्रचित्तसे ध्यान करते हुए जप करे। एकान्त, जनशून्य स्थानमें, श्रीविष्णुमूर्तिके सम्मुख अथवा जलाशयके निकट मनमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए अष्टाक्षरमन्त्रका जप करना चाहिये। साक्षात् भगवान् नारायण ही अष्टाक्षरमन्त्रके ऋषि हैं, दैवी गायत्री छन्द है, परमात्मा देवता हैं, ॐकार शुक्लवर्ण है, 'न' रक्तवर्ण है, 'मो' कृष्णवर्ण है, 'ना' रक्त है, 'रा' कुङ्कुम-रंगका है, 'य' पीतवर्णका है, 'णा' अञ्जनके समान कृष्णवर्णवाला है और 'य' विविध वर्णोंसे युक्त है। तात! यह 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र समस्त प्रयोजनोंका साधक है और भक्तिपूर्वक जप करनेवाले लोगोंको स्वर्ग तथा मोक्षरूप फल देनेवाला है॥ ३—७ १/२ ॥ यह सनातन मन्त्र वेदोंके प्रणव (सारभूत अक्षरों)- से सिद्ध होता है। यह सभी मन्त्रोंमें उत्तम, श्रीसम्पन्न और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो सदा संध्याके अन्तमें इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करता हुआ भगवान् नारायणका स्मरण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। यही उत्तम मन्त्र है और यही उत्तम तपस्या है। यही उत्तम मोक्ष तथा यही स्वर्ग कहा गया है। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वैष्णवजनोंके हितके लिये सम्पूर्ण वेद-रहस्योंसे यह सारभूत मन्त्र निकाला है। इस प्रकार जानकर ब्राह्मणको चाहिये कि इस अष्टाक्षर-मन्त्रका स्मरण (जप) करे॥ ८—१२॥
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