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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं०
(दिव्याः पार्थिवाश्च) द्युलोक में होने वाले और पृथिवी में होने
वाले सब काम “इन्द्रे अयंसत ” इन्द्र में उपनिबद्ध या
आश्रित हैं—वही सब कामों का देने वाला है।
प्रत्यक्षकृत ऋचा का लक्षण—
(निरु०–) अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः,
'त्वम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना ॥८॥
'अथ अनन्तर जो मन्त्र (ऋचाएं) मध्यम पुरुष की (जा-
यसे, जहि, आगच्छ आदि) क्रिया से युक्त हों और 'त्वम्'
(युवाम् यूयम्) इस सर्वनाम से देवता कहा गया हो, वे प्रत्यक्ष-
कृत हैं।
प्रत्यक्षकृत ऋचा का उदाहरण—
(निरु०–) “त्वमिन्द्रबलादधि (सहसोजात ओ-
जसः। त्वं वृषं वृषेदासि)” (ऋ० सं० ८,८,११,२)।
इस सूक्त के देवजामि ऋषि हैं और महारात्रिक पर्याय
में प्रशास्ता के स्तोत्र में विनियोग है ।
'इन्द्र!' हे इन्द्र 'त्वम्' तू 'बलात्' बल से 'अधिजायसे'
अधिक होता है। इस मन्त्र में 'त्वम्' यह पद और 'अधि-
जायसे' यह मध्यम पुरुष की क्रिया दोनों देवता के लिये हैं,
इस से यह प्रत्यक्षकृत है।
दूसरी प्रत्यक्षकृत ऋचा—
[निरु०] “विनइन्द्र मृधो जहि” (ऋ०सं० ८,
८,१०,४) इति

हिन्दी निरुक्त (१०) ७ अ० १ पा० २ खं०
इन्द्र !' हे इन्द्र 'नः' हमारे (एतान्) इन 'मृधः' युद्ध करने
वाले शत्रुओं को 'विजहि' नाश कर ।
जहां स्तुति करने वाले (ऋत्विज्) प्रत्यक्ष हैं और
देवता परोक्ष, ऐसी ऋचाओं की सम्भावना-
(निरु०) अथापि प्रत्यक्षकृताः स्तोतारो भवन्ति
परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि ।
और भी स्तोता (स्तुति करने वाले) 'त्वम्' आदि पद से
कहे जाने के कारण प्रत्यक्ष होते हैं और स्तोतव्य देवता
परोक्ष ।
उदाहरण-
[निरु०] “माचिदन्यद्विशंसत” [ऋ० सं० ५,
७, १०, १)
इस ऋचा का प्रगाथ ऋषि, बृहती छन्द और तृच अशी-
तिओं में विनियोग है।
हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! (यूयम्) तुम 'अन्यद्
दूसरे किसी देवता को 'मा' मत 'विशंसत' विविध स्तुतियों
से स्तुति करो। यहां स्तोता “यूयम्” और “विशंसत”
इस क्रिया पद से उक्त हैं, इस से प्रत्यक्ष हैं, और देवता
परोक्ष पद का वाच्य है।
दूसरा उदाहरण-
[निरु०] “कण्वा अभिप्रगायत” [ऋ०सं०१,३,
१२, १]
इस ऋचा का कण्व ऋषि है। त्रैलीन हविष की याज्या

हिन्दी निरुक्त ( ११ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
है। हे 'कारवः !' मेधावी ऋत्विजो ' (यूयम्) तुम सब (देवम्)
देवको 'अभिप्रगायत' (अभिष्टुत) स्तुति करो। यह भी पहिली
के समान परोक्ष है ।
तीसरा उदाहरण-
(निरु०-) “उपप्रेत कुशिकाश्चेतयध्वम्” इति ।
( ऋ०सं०३, ३, २१, २ )
इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है ।
'कुशिकाः !' हे स्तुतिमंत्रों के पुकारने वाले ऋत्विजो !
'उप-प्र-इत' (गच्छत) जानो 'चेतयध्वम्' और चेतो । यह
भी उसी प्रकार परोक्ष है ।
आध्यात्मिकी का लक्षण-
-(निरु०-) अथाध्यात्मिक्य उत्तमपुरुषयोगा
'अहम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना ।
जिन ऋचाओं में देवता के लिये उत्तम पुरुष की क्रिया
और 'अहम्' (आवाम्, वयम्) यह सर्वनाम पद हो, वे
आध्यात्मिकी ऋचाएं होती हैं। ऐसी ऋचाओं में 'अहम्'
पदसे उत्तम पुरुष का और उत्तम पुरुषसे 'अहम्' पदका अध्या-
हार करना, यदि न हो ।
( खं० ३ )
उदाहरणार्थ कहता है-
( निरु०- ) यथा-एतत् । अर्थात्-जैसे यह- ।
आध्यात्मिकी का उदाहरण-
( निरु० ) (क) इन्द्रो वैकुण्ठः ॥

हिन्दी निरुक्त ( १२ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
“इन्द्रो वैकुण्ठः” इस वाक्य से इन्द्र वैकुण्ठ देवता की
ऋचा “अहंभुवम्” से प्रयोजन है।
“अहंभुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि संजयामि
शाश्वतः” इत्यादि। ( ऋ०सं० ८, १, ५, १ )
इस ऋचा का इन्द्र ऋषि, इन्द्र ही देवता, जगती छन्द
और अतिरात्र में द्वितीय पर्याय में होता के शस्त्रमें विनियोग
है। (सायणभा०)
विकुण्ठा नाम एक आसुरी (राक्षसी) थी उसके तप के
प्रभाव से इन्द्र पुत्र हुआ, और वह वैकुण्ठ नाम से प्रसिद्ध हुआ
उसकी आत्मस्तुति (अपनी प्रशंसा) से युक्त (ब्रह्म) मन्त्र
प्रकट हुआ, वह यह है–
“अहंभुवम्०” । ‘अहम्’ मैं ही ‘वसुनः’ (धनस्य) धन
का ‘पूर्व्यः’ पहिला ‘पतिः’ पति ‘भुवम्’ (अभवम्) हुआ हूं ।
(निरु०-) (ख) लबसूक्तम् । लबका सूक्त ।
“इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयाम्–इति”
ऋ० सं० ८,६,२६,१)
“इति वा इति०” यह तेरह (१३) ऋचाओं का
सातवाँ सूक्त है। गायत्री छन्द, लबरूपको प्राप्त इन्द्र ऋषि
और वही देवता है।
लब कहता है–‘इति वा इति’ ऐसा ऐसा ‘मे’ मेरा ‘मनः’
मन होता है। कैसे ? “ गाम् अश्वम् सनुयाम् ” इन
यजमानों को गो और घोड़े दूं या उपभोग कराऊं ।

(निरु०-) (ग) वागाम्भृणीयम् इति ॥
“वागाम्भृणीय” नाम का सूक्त है, उसमें वाणी ही
कहती है--
“अहंरुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि” (ऋ०सं०८,७,११,१) ।
“अहम्०” यह आठ (८) ऋचाओं का तेरहवां सूक्त है ।
अम्भृण महर्षि की पुत्री 'वाक्' नाम वाली ब्रह्म को जानने
वाली विदुषी ने अपने आपे की स्तुति की है, इससे वही
ऋषि है । सत् चित् सुखरूप सर्वान्तर्यामी परमात्मा देवता है
इसी से यह वाक् उसके अभेद को अनुभव करती हुई सब
जगत् के रूप से सब के अधिष्ठान के रूपसे “मैं ही सब
कुछ हूं” इस प्रकार अपनी स्तुति करती है । त्रिष्टुप् छन्द
है । विनियोग पहिले के समान है । (सा० भा०) ।
'अहम्' मैं ही 'रुद्रेभिः' (रुद्रैः) रुद्रों के साथ 'वसुभिः'
(आदित्यैः विश्वदेवैः) आदित्यों या सब देवताओं के साथ
'चरामि' विचरती हूं । यहां 'अहम्' और उत्तम पुरुष
'चरामि' दोनों वाग् रूप प्रधान देवता के लिये हैं, इससे यह
आध्यात्मिकी है ।
तीनों प्रकार के मन्त्रों में कोई बहुत हैं और कोई कम
हैं, यह कहते हैं-
(निरु०-) परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा
भूयिष्ठा अल्पश आध्यात्मिकाः॥
परोक्षकृत और प्रत्यक्षकृत मन्त्र बहुत ही हैं, और
आध्यात्मिक थोड़े । तीन लक्षण मन्त्रों के भेद-

हिन्दी निरुक्त ( १४ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
(निरु०-) अथापि स्तुतिरेव भवति न
आशीर्वादः ।
और कोई मन्त्रों में स्तुति ही है, किन्तु आशीर्वाद या
किसी अर्थ की कामना नहीं ।
उदाहरण-
[ निरु०- ] “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ”
इति यथा एतस्मिन् सूक्ते ( ऋ०सं० १,७,२,१) ॥
“इन्द्रस्य नु वीर्याणि०” यह पन्दरह ( १५ ) ऋचाओं
का दूसरा सूक्त है । आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि त्रिष्टुप् छन्द,
इन्द्र देवता और अग्निष्टोम में माध्यन्दिन सवनमें निष्केवल्य
शस्त्र में विनियोग है ।
( अहम् ) मैं ‘इन्द्रस्य’ इन्द्रके ‘ वीर्याणि ’ पराक्रम-युक्त
कर्मों को ‘नु’ शीघ्र ‘प्रवोचम्’ ( ब्रवीमि ) कहता हूं ।
दूसरा विशेष—
[निरु०-] अथापि आशीरेव न स्तुतिः ।
कुछ मन्त्रों में कामना ही है किन्तु स्तुति नहीं ।
उदाहरण-
(निरु०-) “सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासम्, सु-
वर्चा मुखेन सुश्रुत्कर्णाभ्यां भूयासम्” इति ।
प्रजापति ऋषि, यजुः, सविता देवता, और नेत्र के अभि-
मन्त्रण में विनियोग है । (पा०गृ०जयरा०भा०)
हे सवितृदेव ! ‘अहम्’ मैं ‘अक्षीभ्याम्’ (नेत्राभ्याम्) नेत्रों
से ‘सुचक्षाः’ सुन्दर दर्शन शक्ति वाला ‘भूयासम्’ हो जाऊं ।

हिन्दी निरुक्त ( १५ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
'मुखेन' मुख से 'सुवर्चाः' सुन्दर तेज वाला, 'कर्णाभ्याम्' और
कानों से 'सुश्रुत्' सुन्दर श्रवण शक्ति वाला 'भूयासम्' हो
जाऊं । मन्त्रों में स्तुति के अभाव में स्तुति और कामना के
अभाव में कामनो जोड़ लेना चाहिये, ऐसा करने से मन्त्र पूर्ण
होजाता है।
इस प्रकार स्तुति आदि से रहित मन्त्र आधिक्य से
कहां है ?
[निरु०-] तदेतद् बहुलम्-आध्वर्यवे याज्ञेषु च
मन्त्रेषु ।
सो यह बहुत करके आध्वर्यव ( यजुर्वेद ) में और यज्ञ
सम्बन्धी मन्त्रों में है।
तीसरा और चौथा विशेष-
[निरु०-] अथापि शपथाभिशापौ ।
और भी शपथ (सौ या क़सम) और शाप ( कोसना )।
कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिन में न स्तुति है, और न कामना ही,
किन्तु क्या तो किसी के मिथ्या आक्षेप को झूठा ठहराने के
लिये ईश्वर से दण्ड स्वरूप अपने ऊपर अनिष्ट की झोंकी
को मांगना, या किसी से पीडित होकर उसके लिये बुराई
को चाहना ही कहा गया है।
शपथ का उदाहरण-
[निरु०-] “अद्यामुरीय यदि यातुधानो अस्मि”
ऋ०सं०५,७,७,५,]
वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, रक्षोहन् (राक्षसों को मारने
वाले) इन्द्रा सोम देवते, राक्षसोंकी निवृत्ति के अर्थ “इन्द्रा

' हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
सोम" यह पचीस (२५) ऋचाओं का सूक्त जपा जाता है,
उसकी पन्दरहवीं ऋचा है (सा०भा०)
"यदि यातुधानः अस्मि" यदि मैं वशिष्ठ राक्षस
हूं "अद्यामुरीय" तो आज ही मरजाऊं ।
शाप को उदाहरण-
[ निरु०- ] “अधा स वीरैर्दशभि र्वियूयाः"
इति ॥ ( ऋ० सं० ५, ७, ७, ५) ॥
'अध' यदि ऐसा होकि-' मैं वसिष्ठ और तू राक्षस' तो
सो तू आज ही दश पुत्रों से वियुक्त होजा ।
पांचवां विशेष-
[ निरु०- ] कथापि कस्याचिद् भावस्य आचि-
ख्यासा ॥
और भी मन्त्रोंमें किसी भावके कहने की इच्छा होती है ।
उदाहरण-
[ निरु०- ] [क] “न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि"
( ऋ० सं० ८, ७, १७, १ )
त्रिष्टुप् छन्द, परमेष्ठी नाम प्रजापति ऋषि, आकाश
आदि पदार्थों की सृष्टि स्थिति और प्रलय आदि यहां प्रति-
पादन किये जाते हैं, इससे उनका कर्त्ता परमात्मा देवता
और विनियोग पूर्वके तुल्य । (सा० भा० )
'तर्हि' इस जगत् की जब उत्पत्ति न हुई थी, तब मृत्यु
नहीं था, क्योंकि- उस समय मरने वाला मनुष्य आदि कोई
नहीं था । और 'अमृत' अमरपणा भी नहीं था, क्योंकि-
मृत्यु नहीं था ।

हिन्दी निरुक्त ( १७ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
(निरु०-) (ख) “ तम आसीत्तमसागूल्हमग्रे ”
( ऋ०सं० ८, ७, १७, ३ )
‘ तमः ’ अंधेरा ही था, अति अंधेरे से ( सब ) ढंका
हुआ था ।
छठा विशेष-
(निरु०-) अथापि परिदेवना कस्माच्चिद्भावात् ॥
और भी किसी कारण से विलाप भी मन्त्रोंमें होता है ।
उदाहरण-
( निरु०- ) “ सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत् ” ॥
( ऋ० सं० ८, ५, ३, ५ )
पुरूरवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, परिदेवना ।
‘सुदेवः’ वह शोभन ( अच्छा ) देव है, जो इस प्रिया
उर्वशी से वियुक्त होकर ‘अद्य’ आज ही ‘प्रपतेत्’ गिरे,-ऐसा
गिरे कि ‘अनावृत्’ फिर संसारमें न लौटे। यहां ऋषि विषय
लम्पटता के दुःखरूप परिणाम की स्थिति को दिखाता है,
कि लोक इसे भले प्रकार जानकर इस में न फंसे ।
और विलाप का उदाहरण-
(निरु०-) “न विजानामि यदि वेदमस्मि” इति ॥
दीर्घतमा ऋषि और अस्यवामीय सूक्त ।
“न विजानामि” मैं यह अच्छी तरह नहीं जानता,
“यदि वा इदम् अस्मि” मैं यह कारण ब्रह्म हूं, या
उसका कार्य रूप द्वैत जगत् । यहां पर संशय ही विलाप है ।
सातवां और आठवां विशेष-

हिन्दी निरुक्त ( १८ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
( निरु०- ) अथापि निन्दाप्रशंसे ॥
और भी मन्त्रोंमें कहीं निन्दा ही है,और कहीं प्रशंसा ही।
निन्दा में उदाहरण-
( निरु०- ) "( मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताःसत्यं
ब्रवीमि वधइत् स तस्य । नार्थमणं पुष्यति नो
सखायम्- ) केवलाघो भवति केवलादी ॥"
( ऋ० सं० ८, ६, २३, १ )
भिक्षु नाम आङ्गिरस ( अङ्गिरस् का पुत्र ) इसका ऋषि।
त्रिष्टुप् छन्द। दान न करने वाले की निन्दा।
वृथा ही अन्न को प्राप्त होता है, वह उत्तम बुद्धि वाला
नहीं है, मैं सच कहता हूं, उसका वह वध (मरना) ही है,
जो आदित्य का, ( तथा ) सखा ( मनुष्य ) का पोषण नहीं
करता है, केवल पाप का भागी होता है,-जो अकेला ही
खाता है ॥
गीता में भी कहा है-
“भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्”
अर्थात्- वे पाप को ही भोगते हैं, जो अपने लिये
पकाते हैं।
प्रशंसा में उदाहरण--
( निरु०- ) “भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म”
( ऋ० सं० ८, ६, ४, ५ )
दक्षिणा नाम प्रजापति की पुत्री ने अपनी स्तुति से

हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ४ खं०
संयुक्त इस सूक्त को देखा था, वही इसकी ऋषिका है। उस
सूक्त में यह त्रिष्टुप् छन्द है। दाता की प्रशंसा है।
भोज या दानशील राजा का यह घर पुष्करिणी (कम-
लों से सजी हुई तलाई या विमान) के समान (सुन्दर) है।
ऐसे ही और २ मन्त्रों में भी निन्दा और प्रशंसा:-
(निरु०) एवम् अक्षसूक्ते द्यूतनिन्दा च कृषि-
प्रशंसा च ॥
इसी प्रकार अक्षसूक्त में द्यूत (जूवा) की निन्दा और
कृषि की प्रशंसा है। जैसे- "अक्षैर्मादीव्यः" पाशों से मत
खेल। "कृषिमित्कृषस्व" कृषिका ही कर्षणा कर (खेती
ही कर) (ऋ० सं० ७, ८, ५, ३) ॥
ऋषि किसी कारण से मन्त्रों के देखने वाले ही होते हैं
किन्तु कर्त्ता नहीं होते-
(निरु०- एवम्--उच्चावचैः अभिप्रायैः ऋषीणां
मन्त्रदृष्टयो भवन्ति ॥
इस (पूर्वोक्त) प्रकार से ऊँचे नीचे अभिप्रायों से
ऋषियों को मन्त्रों के दर्शन होते हैं ॥
(खं० ४)
जिन मन्त्रों में "यत्काम ऋषिः०" (७,१,१) इत्यादि
पूर्वोक्त मन्त्रदेवतात्मा लक्षण नहीं घटता, उनमें देवता निर्णय
करने की प्रतिज्ञा-

हिन्दी निरुक्त ( २० ) ७ अ० १ पा० ४ खं०
( निरु०- ) तद् ये अनादिष्टदेवता मन्त्राः तेषु
देवतोपपरीक्षा ॥
सो, जो मन्त्र अनादिष्ट देवत हैं-जिनमें देवता का आदेश
( कथन या लिङ्ग ) नहीं उनमें देवता की उपपरीक्षा (प्रान
पूर्वक विचार ) होगी, अथवा उपपत्ति (युक्ति) पूर्वक परीक्षा
होगी-यहां से आगे परीक्षा की जावेगी ।
यज्ञ में और यज्ञाङ्ग (यज्ञके भाग) में जो अनादिष्ट देवता
मन्त्र हैं, उनमें देवता का निर्णय-
(निरु०-) यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता
भवन्ति ॥
अथवा जिस देवता का वह यज्ञ हो, अथवा जिस देवता
का वह यज्ञाङ्ग हो, उस देवता के वे मन्त्र होते हैं । अर्थात्-
मन्त्र में जब कोई देवता विशेष का बोधक लिङ्ग न हो, तो,
उसके विनियोग को देखना,-वह किस देवता के यज्ञ में या
यज्ञाङ्ग में विनियुक्त है, जिस देवता का वह यज्ञ हो या
यज्ञाङ्ग, उसी देवता का वह मन्त्र भी जानना । प्रयोजन यह
कि मन्त्रों का कर्म से नित्य संबन्ध है, कोई मन्त्र भी कर्म
सम्बन्ध से रहित नहीं है, और जिस प्रकार मन्त्र देवता के
बिना नहीं होता, उसी प्रकार कर्म भी देवता के बिना नहीं
होता । क्योंकि-मन्त्र जिस प्रकार देवता की स्तुति के लिये
होता है, उसी प्रकार कर्म भी देवतो के ही आराधन के लिये
होता है, सुतराम् मन्त्र और कर्म दोनों एक देवता में समा-
नाधिकरण होते हैं, इसीसे जब मन्त्र में देवता का पता न
चले, तो उसके सम्बन्धी कर्म में देखना चाहिये, कर्म में देवता
का अधिकार अवश्य बताया हुआ होता है। जैसे-जिसका

हिन्दी निरुक्त ( २१ ) ७ अ० १ पा० ४ खं०
बांयां हाथ उसीका दांहिना, जिसका कर्म उसी का मन्त्र ।
जो अनादिष्ट दैवत मन्त्रयज्ञ के सम्बन्धसे रहित हैं,
उनमें देवता का निर्णय--
(निरु०-) अथान्यत्र यज्ञात् प्राजापत्या इति
याज्ञिकाः ॥
यज्ञसे अन्यत्र वैसे मन्त्र प्रजापति देवता के होते हैं,
यह याज्ञिक लोग मानते हैं ।
उन्हीं के लिये नैरुक्त आचार्यों का मत--
(निरु०-) नाराशंसा इति नैरुक्ताः ॥
वैसे मन्त्रों का 'नराशंस' देवता होता है, यह नैरुक्त
मानते हैं ।
[ कात्थक्य आचार्य के मत में 'नराशंस' नाम यज्ञ का
है, और शाकपूणि आचार्य के मतमें अग्नि का । ]
उसी में दूसरो मत-
(निरु०-) अपि वासा कामदेवता स्यात् ॥
अथवा वह इच्छित देवता हो-- अनादिष्ट दैवत मन्त्रोंमें
पुरुष का जो कोई भी इष्ट देवता हो, वही देवता मानना ।
क्योंकि-विशेष्य (मुख्य) पद से रहित, केवल विशेषण पदों
वाले मन्त्रों का सर्वत्र अधिकार है। जैसे 'नील' 'पीत' आदि
शब्द घट पट आदि द्रव्यों के सामान्य से विशेषण हो जाते
हैं, ऐसे ही बिना देवताके मन्त्र प्रत्येक देवतामें चले जाते हैं ।
और मत-
(निरु०- ) प्रायोदेवता वा ॥
(क) 'प्रायः' यह शब्द अधिकार का बोधक है। जिस

देवता के अधिकार में अध्ययन पाठ (संहिता पाठ) में
देवता के लिङ्ग से रहित मन्त्र पढा गया हो, उसी देवता का
वह मन्त्र होता है।
(ख) अथवा 'प्रायः' यह बाहुल्य का नाम है। इस से
अनादिष्ट दैवत मन्त्र बहुत देवताओं का होता है- जितने
देवता हैं, सभी उसके देवता हैं और वे 'विश्व देवता' इस
नामसे कहे जाते हैं।
लोकाचार का दृष्टान्त-
(निरु०- ) अस्ति हि आचारो बहुलं लोके
देवदैवत्यम्, अतिथिदैवत्यम्, पितृदैवत्यम् ॥
क्योंकि-लोकमें बहुत आचार (रीति) है,- देवदैवत्य,
अतिथिदैवत्य, पितृदैवत्य- विशेष विशेष नामों से बढे हुये
द्रव्य से जो बच जाता है, वह साधारण (सब का यों साझैँ
का) हो जाता है। जैसे कोई यजमान कहता है- 'यह मेरा
द्रव्य देवदेवताओं के लिये है' 'यह मेरा अतिथिदेवताओं
के लिये है, 'यह मेरा पितृदेवताओं के लिये है' ऐसा विभाग
करदेने पर जो द्रव्य उस दानार्थ नियत की हुई राशि से बच
जाता है, वह देव पितर और मनुष्य सब के साझ का हो
जाता है, वैसे ही जिन मन्त्रों के देवताओं का निर्देश (लिङ्ग
आदि से सूचना) किया हुआ है, उनसे अलग रहे हुये जो
मन्त्र हैं, वे सब देवताओं के होते हैं।
इस विचार में यास्क आचार्य का क्या निश्चय है ?
(निरु० ) याज्ञदैवतो मन्त्रः-इति ॥
जो अप्रकट देवतालिङ्ग वाला मन्त्र है, वह यज्ञ देवता
का है, अथवा दैवत = अग्नि देवता का है।

हिन्दी निरुक्त ( २३ ) ७ अ० १ पा० ५ खं०
यज्ञ क्या ? विष्णु । 'विष्णु' क्या ? आदित्य (निरुक्तमतमें)
'देवता' अग्नि कैसे ? “ अग्निर्वै सर्वा देवताः ”
अग्नि ही सब देवता हैं। यह श्रुति है।
प्रथम पक्ष में-'यज्ञश्चासौ देवता यज्ञदेवता, तस्या-
ऽयं याज्ञदैवतः' ऐसी व्युत्पत्ति होती है। इस व्युत्पत्ति में
'देवदत्त ब्राह्मण' इस वाक्यके समान पहिला यज्ञ पद विशेष
(विष्णु) को बोधक है और दूसरा देवता पद देवता सामान्य
का। और दूसरे पक्षमे-'यज्ञे भवं याज्ञम्' याज्ञं दैवतं यस्य
स याज्ञदैवतो मन्त्रः ऐसी व्युत्पत्ति होती है। इस व्युत्पत्ति
में यज्ञ शब्द कर्म का बोधक है, और देवता शब्द श्रुति बल
से अग्नि देवता का बोधक हो जाता है। यही बात यहां
ध्यान में देने योग्य है।
कहीं मन्त्रों में अदेवता वस्तुएं भी देवता के समान स्तुति
की जाती है, वहां देवता बुद्धि कैसे होगी ? यह प्रश्न-
(निरु०-) अपि हि अदेवता देवतावत् स्तूयन्ते,
यथा अश्वप्रभृतीनि ओषधिपर्यन्तानि ।
अदेवता = जो देवता नहीं, वे भी देवताओं के समान
स्तुति किये जाते हैं, जैसे घोड़े आदि ओषधियों तक ॥४॥
( खं० ५ )
अश्व आदि के समान और भी अदेवता वस्तुएं देवता के
समान स्तुति की जाती हैं-
(निरु०-) अथापि अष्टौ द्वन्द्वानि ।
और भी आठ ( ८ ) द्वन्द्व (जोड़े) हैं-अश्व आदि चेतन
तो हैं और ये आठ द्वन्द्व तो सब के सब जड हैं, इनकी
स्तुति किसी प्रकार संगत नही हो सकती ।

हिन्दी निरुक्त ( २४ ) ७ अ० १ पा० ५ खं०
[ आठ द्वन्द्व-(१) उलूखलमुसले ( २ ) हविर्धाने ( ३ )
द्यावापृथिवी (४) विपाट् छुतुद्री (५) आर्ती ( ६ ) शुनाशिरौ
(७) देवी जोष्ट्री (८) देवी ऊर्जाहुती । ]
पूर्वोक्त दो वाक्यों में ऐसी वस्तुओं के समूह दिखाये हैं,
जिन में कुछ प्राणी या चेतन हैं, और कुछ अप्राणी या अचे-
तन हैं। १ से अश्व आदि चेतन प्राणी, और अक्ष (पासे) आदि
अचेतन (जड़ = अप्राणी) । उनमें जो जड़ हैं, वे सर्वथा स्तुति
के अयोग्य हैं ही, किन्तु जो अश्व आदि चेतन हैं, वे भी
वर्त्तमान समीप वस्तु को ही कुछ समझ सकते हैं, परन्तु भूत
(बीती हुई) भविष्यत् ( आगे आने वाली ) बातको बिलकुल
नहीं समझते और न उन्हें हित अहित का ही बोध है, इस
से उनकी स्तुति की भी जावे, तो वे स्तुति के अभिप्राय को
नहीं समझ सकते तथा उन में कोई वर देने का सामर्थ्य
नहीं है, अतः वे स्तुति के योग्य नहीं हैं, ऐसी शिष्य की
संभावना को दिखाते हैं—
( निरु०- ) सन मन्येत आगन्तून्-इव अर्थान्
देवतानाम् ।
वह (शिष्य) न मानेगा, आगन्तु = अनित्य मनुष्यों के
अश्व आदिकों के समान देवताओं के अर्थों को = घोड़े आदि
साधनों को, कि-इन में पूर्वोक्त देवता का लक्षण अविरुद्ध
है, या घटेगा । अर्थात्-शिष्य यह नहीं मान सकता, कि ये
देवताओं के अश्व आदि देवता के रूप में स्तुति किये जाने
योग्य हैं, या इनमें देवताओं का लक्षण घटता है।
क्योंकि ?-

हिन्दी निरुक्त ( २५ ) ७ अ० १ पा० ५ खं०
(निरु०-) प्रत्यक्षदृश्यम् एतद् भवति ।
यह प्रत्यक्ष से देखने योग्य है-प्रत्यक्ष ही देखा जाता है-
जैसे कि- मनुष्यों के घोड़े आदि साधन अनित्य (असमर्थ) हैं
वैसे ही देवताओं के भी होंगे ।
“यत्काम ऋषिः” इस देवता के लक्षण की अश्व
आदि प्राणियों में तथा अक्ष आदि द्रव्यमात्रों में जो अव्याप्ति
( अगति ) दिखाई है, उसका परिहार-
(निरु०-) माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा
बहुधा स्तूयते ।
देवता के माहाभाग्य- अलौकिक सामर्थ्य से एक आत्मा
बहुत प्रकार से स्तुति किया जाता है- देवता में बड़ा ऐश्वर्य
रहता है, वह अपने ऐश्वर्य ( चमत्कारशक्ति ) से अपने
संकल्प के अनुसार जड रूप से तथा चेतन रूप से अनेक प्रकार
से हो जाता है, कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे देवता न कर
सके, सुतराम् देवता अश्वरूप हो या अक्षरूप हो, जड रूप
हों, या चेतन रूप हो, सब रूपों में उसकी शक्ति वैसी ही
बनी रहती है, उसके सब वे इच्छामय रूप है, वास्तव में वह
पशु या जड़ नहीं है, इस से सब अवस्थाओं में वह स्तोता
की स्तुति को सुन सकता है, समझता है और उसके वाञ्छित
को पूरा कर सकता है, किसी प्रकार भी देवतालक्षण की उस
में असंमति नहीं है ।
पूर्व वाक्य में देवता लक्षण में व्याप्ति दोष का परिहार
किया है, किन्तु वेदान्तों के मत में एक आत्मा (देवता) और
नैरुक्तों के मत में तीन आत्मा या अग्नि, इन्द्र और सूर्य तीन

देवता हैं। इन दोनों मतों में आत्म संख्या के विरोध का
परिहार-
(निरु०-) एकस्य आत्मनः अन्ये देवाः प्रत्य-
ङ्गानि भवन्ति ।
एक आत्मा के और देव (आत्मा) प्रत्यङ्ग (भाग) होते
हैं। अर्थात्-जो जिसका अङ्ग होता है, वह उससे भिन्न नहीं
होता है। क्यों कि- अङ्ग अङ्गी को छोड़ नहीं सकते और न
उससे वे अलग देखे ही जाते हैं, ऐसे ही अङ्गों से प्रत्यङ्ग
(उनके भाग) अलग नहीं होते इससे-
नैरुक्त मत में अग्नि के जातवेदस् आदि, इन्द्र के वायु
आदि और सूर्य के भग आदि अङ्ग तथा शकुनि और अश्व
आदि प्रत्यङ्ग हैं। इनमें अङ्गी से अङ्गों और अङ्गों से प्रत्यङ्गों
का अभेद है। अतः उस मत में तीन से अधिक संख्या नहीं
बढ़ती। और-
वेदान्ती (आत्मवित्) के मत में वही एक महान् आत्मा
अग्नि इन्द्र और सूर्य आदि अङ्गों और अश्व शकुनि आदि
प्रत्यङ्गों के रूपों को धारण या अनुभव करता है, तथा वैसी
अवस्था में वह अनेक रूप से स्तुति किया जाता है, इस रीति
पर दोनों मतों की आत्म संख्याओं में किसी प्रकार का वि-
रोध नहीं है।
आत्मवित् के मत में एक आत्मा, नैरुक्तों के मत में तीन
और याज्ञिकों के मत में असंख्य हैं। इन में याज्ञक लोगों
के मत में एक आत्मा का अनेक होना संभव नहीं और न
आवश्यक ही है, इससे उन के मत में पूर्व समाधान नहीं

हिन्दी निरुक्त ( २७ ) ७ अ० १ पा० ५ खं०
बल्कि-अन्य दो मतों में ही है। अब उन्हीं दो मतों में उसी
बातको फिर दूसरे प्रकार से कहते हैं-
(निरु०-) अपि च सत्वानां प्रकृतिभूमभिर्ऋषयः
स्तुवन्ति-इत्याहुः ॥
और भी, सत्त्वों (नाना द्रव्यों) की जो प्रकृति है, उस
के बहुत्वों से ऋषि स्तुति करते हैं ऐसा आचार्य कहते हैं।
अर्थात्-आत्मवित् के मत से सब पदार्थों के मूल कारण पर-
ब्रह्म महान् आत्मा के बहुत्व को लेकर ऋषि स्तुति करते हैं,
जिस किसी वस्तु की भी स्तुति करते हैं, उसे ब्रह्म समझ कर
या उसका कार्य समझ कर या उससे अभिन्न समझ कर करते
हैं, उन्हें नाना नामों तथा नाना रूपों में वही एक आत्मा
प्रतीत होता है। एवम् नैरुक्तमत में तीन आत्मा या तीन
प्रकृतिएं हैं, उन के ही अन्य सब पदार्थ विकार हैं, वे एक १
लोक में एक २ देवता में ही वहां के सब पदार्थों को अन्तर्गत
समझते हैं, नाना नामों से उन्हीं तीन देवों की स्तुति होती
है। इस मत में "प्रकृतीनां भूमभिः प्रकृतिभूमभिः"
ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं।
(निरु०-) प्रकृतिसार्वनाम्याच्च ।
और प्रकृति या प्रकृतियों की सर्वनाम्यता से ।
आत्मवित् के मत में प्रकृति = महान् आत्मा के ही सब
नाम हैं, क्योंकि उसी से सब जगद् उत्पन्न हुआ है। अतः
सब नामों से उसी की स्तुतिएं हैं। नैरुक्तों के मत में अग्नि
इन्द्र और आदित्य इन तीन ही प्रकृतियों के सब नाम हैं,
क्योंकि-उन्हीं से सब जगत् उत्पन्न होता है। इस से सब

नामों से इन्हीं तीन देवों की स्तुति है । पहिले मत में
“प्रकृतेः सार्वनाम्न्यं प्रकृतिसार्वनाम्न्यम्” प्रकृति
का सार्वनाम्न्य = प्रकृतिसार्वनाम्न्य, और दूसरे मत में
“प्रकृतीनां सार्वनाम्न्यम्, प्रकृतिसार्वनाम्न्यम्”
प्रकृतियों का सार्वनाम्न्य = प्रकृतिसर्वनाम्न्य होता है ।
मनुष्यों से देवताओं की विलक्षणता—
(निरु०-) इतरेतरजन्मानो भवन्ति, इतरेतर-
प्रकृतयः ।
देवता इतरेतरजन्मा होते हैं,-परस्पर से उन का जन्म
होता है और इतरेतरप्रकृति होते हैं-आपस में एक का एक
कारण हो जाता है ।
जैसे-अग्नि का कारण सूर्य और सूर्य का कारण अग्नि ।
इससे देवता मनुष्यों से विपरीत धर्म वाले हैं, उनके अश्व
आदि मनुष्यों के अश्व आदि के समान असमर्थ नहीं हैं ।
देवता ईश्वर होकर भी क्यों जन्म लेते हैं—
(निरु०-) कर्मजन्मानः ।
देवता कर्मजन्मा हैं-कर्म के लिये उनका जन्म है-लोकों
के कर्मफल की सिद्धि के लिये इनका जन्म है । क्योंकि-इनके
विना लोक का कोई कर्म सफल नहीं हो सकता ।
किस वस्तु से देवता जन्मते हैं ?
(निरु०-) आत्मजन्मानः ।
देवता आत्मजन्मा हैं-अपने से ही आप उत्पन्न होते
हैं,-इन्हें दूसरे पदार्थ की अपने जन्म में अपेक्षा नहीं है ।