निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ११२ ) ७ अ० ७ पा० ७ खं०
लोकों में भी पूर्ण किया, सुतराम् यह अग्नि , विद्युत् और
आदित्य सब अग्नि ही है, यह अग्नि की ही महिमा कही
गई है । [पूर्व प्रकरण से इसकी यह संगति है कि- जब अन्य
दोनों ज्योतिएं भी अग्नि ही हैं, तो वे "वैश्वानर" हैं,
ऐसा जानना भ्रम है, और अग्नि का ही "वैश्वानर"
मुख्य नाम है, यह सिद्ध हुआ ।]
“अथएनम्” अब इस [अग्नि] को आदित्य करके स्तुति
करता है-॥३[२८]॥
( खं० ७ )
(निरु०) “ यदेदेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः
सूर्यमादितेयम् । यदा चरिष्णू मिथुनावभूता-
मादित्प्रापश्यन् भुवनानि विश्वा ॥” ऋ० सं० ८,
४, १२, १] ॥
यदा एनम् अदधुः यज्ञियाः सर्वे दिवि देवाः सूर्यम्
‘आदितेयम्’ अदितेः पुत्रम् यदा चरिष्णू मि-
थुनौ प्रादुरभूता सर्वदा सहचारिणौ उषाश्च आदि-
त्यश्च । ‘मिथुनौ’ कस्मात् ? मिनोतिः श्रयतिकर्मा
‘थु’ इति नामकरणः, थकारो वा, नयतिः परः,
वनिर्वा । समाश्रितौ अन्योन्यं नयतो, वनुतो वा
मनुष्यमिथुनौ- अपि एतस्मादेव, मेथन्तौ अन्यो-
न्यम् वनुतः इति वा ।
हिन्दी निरुक्त ( ११३ ) ७ अ० ७ पा० ७ खं०
अथ एनम् एतया अग्नीकृत्य स्तौति-॥७(२९)॥
अर्थः- 'यदेदेनम्०' । 'यदा' जब 'एनम्' इस 'आदिते-
यम्' (अदितेः पुत्रम्) आदितिके पुत्र 'सूर्यम्' सूर्यको 'यज्ञियासः'
(यज्ञिणः) यज्ञ के करने वाले 'सर्वे सब 'देवाः' देवताओं ने
'दिवि' द्युलोक में 'अदधुः' स्थापन किया, 'यदा' और जब
'चरिष्णू' [सर्वदा सहचारिणौ सब काल में एक साथ विचरने
वाले 'मिथुनौ' दोनों मिथुन 'अभूताम्' हुये (उषाश्च आदि-
त्यश्च)- उषा और आदित्य दोनों स्त्री पुरुष जुड़े हुये हुये
'आत्- इत्' [अथ तदा] उसी समय 'भुवनानि' लोकों ने
'पापश्यन्' (इन्हें) देखा ॥ इस मन्त्र में देवताओं ने द्युलोक
में सूर्य को स्थापन कियो है ॥
'मिथुन' कैसे ! सेवा अर्थ में 'मि' [स्वा० उ०] धातु 'थु'
यह प्रत्यय अथवा 'थ' प्रत्यय और 'नी' (भ्वा० उ०) धातु
पर है, अथवा 'वन' (त० आ०) धातु है । [ क्या अर्थ ? ]
“समाश्रितौ अन्योन्यं नयतः” भली भांति आश्रित
हुये हुये परस्पर को लेचलते हैं; अथवा 'वनुतः' चाहते हैं ।
मनुष्यों का मिथुन (स्त्री पुरुष का जोड़ा) भी इसी
व्याख्यान से है । “मेथन्तौ अन्योन्यं वनुतः इति वा”
आपस में लगे हुये परस्पर को लेचलते हैं या चाहते हैं ।
पूर्व पक्ष में 'मि- थु- नी' का अथवा 'मि- नी- थु' का
'मिथुन' शब्द बना, और दूसरे पक्षमें 'मि- थ- वन' का
'मिथुन' । यहां 'वन' (धा०) का 'व' 'उ' से बदल जाता है ॥
“अथ एनम्०” अब इसको इस (अगली ऋचा) से अग्नि
करके स्तुति करता है (ऋषि)--॥ ७ (२६) ॥
हिन्दी निरुक्त (११४) ७ अ० ७ पा० ८ खं०
(खं० ८)
(निरु०) “यत्रा वदेते अवरः परश्च यज्ञन्योः
कतरो नौ विवेद। आशेकुरित्सधमादं सखायो
नक्षन्त यज्ञं क इदं विवोचत् ॥” [ ऋ० सं०
८, ४, १३, २, ] ॥
यत्र विवदेते दैव्यौ होतारौ—अयं च अग्निः,
असौ च मध्यमः,—कतरो नौ यज्ञे भूयो वेद-इति ।
आशक्नुवन्ति सत्सहमादनं समानख्याना ऋत्विजः
तेषां यज्ञं समश्नुनानानां, को न इदं विवक्ष्यति
इति।
तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥८ ३०)॥
अर्थ:-“यत्रा वदेते०” 'यत्र' जहां 'अवरः' (अयं च
अग्निः) इधर वाला यह अग्नि 'परः च' (असौ च मध्यमः)
और वोह मध्यम (दैव्यौ होतारौ) देवताओं के होता दोनों
'आ-वदेते' (विवदेते) विवाद करते हैं—'यज्ञन्यो' (यज्ञ-
नेत्रोः) यज्ञ के नेताओं 'नौ' (आवयोः) हम दोनों में (यज्ञे)
यज्ञ के विषय में 'कतरः' कौनसा 'विवेद' (भूयोवेद) अधिक
जानता है। 'सखायः' (समानख्यानाः ऋत्विजः) समान
ज्ञान वाले ऋत्विज् 'यज्ञम्' यज्ञ को 'नक्षन्त' (समश्नुवते)
व्यापन कर रहे हैं-उस में बैठे हैं (ते) वे 'सधमादम्' (सत्
सहमदनम्) हर्ष सहित 'आशेकुः' (प्राशक्नुवन्ति) कह सकते
हैं-“को नः इदं विवक्ष्यति” हम में से कौन यह कह
हिन्दी निरुक्त ( ११५ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
सकता है- ( कि-कौन इनमें अधिक विद्वान् है; अर्थात्-दोनों
ही बहुविज्ञानवान् हैं। यहाँ होतृकर्म के वर्णन से यह अग्नि-
प्रधानमन्त्र है, किन्तु सूर्यप्रधान नहीं ।
“तस्य उत्तरा०” उस अर्थ के अधिक निर्वचन के लिये
अगली ऋचा है-॥८(३०)॥
( खं० ६ )
(निरु०-) “यावन्मात्रमुषसो न प्रतीकं सुपर्णो३
वसते मातरिश्वः । तावद्दधात्युपयज्जमायन् ब्रा-
ह्मणो होतुरवरो निषीदन् ॥” (ऋ०सं०८,४,१२,३)
यावन्मात्रम् उषसः प्रत्यक्तं भवति, प्रतिदर्शनम्-
इति वा । अस्ति उपमानस्य सम्प्रत्यर्थे प्रयोगः-
'इहेव निधेहि'-इति यथा सुपर्ण्यः सुपतना एता
रात्रयः वसते मातरिश्वन् ? ज्योति र्वर्णस्य, ता-
वदुपदधाति यज्ञम् आगच्छन् ब्राह्मणो होता
अस्य अग्नेर्होतुः अवरो निषीदन् ।
होतृजपस्तु अनग्निर्वैश्वानरीयो भवति-“देव-
सवितरेतं त्वा वृणतेऽग्निं होत्राय सह पित्रा वै-
श्वानरेण” इति इममेव अग्निं सवितारमाह सर्व-
स्य प्रसवितारं, मध्यमं वा उत्तमं वा पितरम् ।
यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव
सोऽग्निर्वैश्वानरः, निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी
हिन्दी निरुक्तं ( ११६ ) ७ अ० ७ पां० ६ खंड
एतेन नामधेयेन भजेते भजेते ॥९(३१)॥
इति सप्तमाध्यायस्य सप्तमः पादः ॥७,७,।
अर्थः- "यावन्मात्रम्०” । इस मन्त्र में न' कार
'सम्प्रति' ( अव्यय ) के अर्थ ( इस समय ) में है। क्योंकि-
उपमान अर्थ का यहां असंभव है। (लोक में भी ) उपमान
वाचक का सम्प्रति के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे- "इहेव
निधेहि” 'अब यहां रक्खे' ।
[ मातरिश्वा ने किसी से पूछा कि- दिव्य होता अग्निका
जो विज्ञान है, उसको क्या यह ब्राह्मण मनुष्य होता यज्ञ
में आया हुआ धारण करता है? वह उसके प्रति कहता है । ]
'मातरिश्वः' ( हे मातरिश्वन् ) हे मातरिश्व देव !
'सुपर्ण्यः' ( सुपतना. एताः रात्रयः ) सुन्दर पतन ( गमन )
करने वाली ये रात्रिएं 'उषसः' ( ज्योतिर्येष्ण्य ) उषा :
प्रकाश के 'यावन्मात्रम्' जितने अंग 'प्रतीकम्' ( प्रत्यक्तं =
प्रविष्टम् ) प्रविष्ट हुएको 'न' ( सम्प्रति ) इस समय या सच-
मुच 'वसते' ( छादयन्ति ) ओढती है या धारण करती है,
'तावत्' उतना विज्ञान 'यज्ञम्' यज्ञ में 'आयन्' आया हुआ
ब्राह्मण (अस्य) इस (अग्ने.) अग्नि 'होतु.' होता का 'अवर.'
( होता ) छोटा होता 'निषीदन्' ( होतृषदने ) होता के स्थान
में बैठा हुआ 'उप-दधाति' धारण करता है- दिव्य अग्नि
होता की अपेक्षा रात्रि में जितना प्रकाश का अंग होता है,
वैसा ही बिलकुल थोड़ासा मनुष्य होता यज्ञ संबन्धि वि-
ज्ञान को धारण करता है, अतः ऐसी अवस्था में जो कुछ
यह करता है दिव्य होता अग्नि के अनुग्रह से ही करता है,
हिन्दी निरुक्त ( ११७ ) ७ अ० ७पा० ६खं
स्वयम् अपने बल से नहीं। इस प्रकार होतृकर्म के प्रति-
पादन से यहां विशेष रूप से अग्नि की ही स्तुति है ॥ [ इस
प्रकार यह सूक्त अग्नि के कर्म की प्रधानता के कारण वैश्वा-
नर का है। जो इस सूक्त में "वैश्वानर" शब्द हैं, वे सब
पार्थिव अग्नि के ही विशेषण हैं।]
"होतृजपस्तु०" किन्तु होता का जप (मन्त्र) अग्नि से
भिन्न वैश्वानर का है- 'देव सवितरेतं०' अर्थात्- हे 'देव'
'सवितः' सब के जानने वाले? 'एतं त्वा अग्निम्" इस
तुझ अग्नि को 'वैश्वानरेण पित्रा सह" वैश्वानर पिता
के साथ 'होत्राय' होम के अर्थ 'वृणते' [ यजन करने वाले ]
ग्रहण करते हैं ।
"इममेव अग्निं सवितारम् आह" (इस मन्त्र में)
इस (पार्थिव) अग्नि को ही (ऋषि) सविता (सब लोक का
जनने वाला) कहता है। "मध्यमं वा उत्तमं वा पितरम्"
मध्यम ज्योति को अथवा उत्तम ज्योति को (इस अग्नि का)
पिता कहता है- बताया जाता है ।
"यस्तु सूक्तं०" किन्तु जो सूक्त को भजता है और
जिसके लिये हविः का निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव)
अग्नि वैश्वानर है। और दूसरे ज्योति (मध्यम उत्तम इस
नाम (वैश्वानर) से निपात को ही भजते हैं- इस नाम को
विशेषण रूप से भजते हैं ॥ ६ (३१) ॥
व्याख्या ।
स्मरण रहे कि- यह दैवत काण्ड है, इस सप्तम अध्या-
हिन्दी निरुक्त (११६) ७ अ० ७ पा० ६ खं
(ख) “विश्वे एनं नरा नयन्ति” इति वा
सब मनुष्य इसे ले जाते हैं।
(ग) “विश्वानर एव स्यात् ०-० तस्य
वैश्वानरः ! विश्वानर कोई है, उसका
अपत्य वैश्वानर है।
(४) प्राधान्यस्तुति-- “वैश्वानरस्य सुमतौस्याम०”
(ऋ० सं० १, ७, ६, १)
(५) उसकी व्याख्या-“इतो जातः सर्वम् इदम् अभि-
विपश्यति०” इस पृथिवी या ओषधि
वनस्पतियों से उत्पन्न होकर इस सब
जगत् को देखता है।
(६) विचार- “तत् को वैश्वानरः” इत्यादि । सो कौन
वैश्वानर है इत्यादि।
(७) उपपत्ति- “यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निर्-
प्यते” जो प्राधान्य से सूक्त को भजता है, जिस
के लिये हवि का निर्वाप होता है।
(८) अवधारण- “अयमेव सोऽग्निर्वैश्वानरः” “निपात-
मेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नाम-
धेयेन भजेते भजेते” यही वह अग्नि
वैश्वानर है, और दूसरे ज्योति इस नामधेय
से निपात को ही भजते हैं।
विचार (६) का स्पष्टीकरण।
हिन्दी निरुक्त ( १२० ) ७ अ० ७ पा० ६ सं०
प्रश्नः—"तत्को वैश्वानरः?" प्राधान्य से "वैश्वा-
नर" यह किसका नाम है ।
कुछ नैरुक्तों का मत- "मध्यम इति आचार्याः ।"
मध्यम ज्योति 'वैश्वानर" है । यह कुछ आचार्य मानते
हैं। क्यों कि— 'प्रनूमहित्वम्" [ऋ० सं० १,४,२५] इस
ऋचामें वैश्वानर की वर्ष कर्म से स्तुति है ।
पूर्व याज्ञिकों कामत— 'अथ असौ आदित्यः इति
पूर्व याज्ञिकाः"वोह आदित्य वैश्वानर है, यह पूर्व
याज्ञिक मानते हैं । क्यों कि- (१) एषां लोकानाम् ०-०
रतांत्र्यंशमति" विधि के अनुकरण में तृतीय सवन में
द्युलोक में आरूढ हुआ प्रत्यवरोहण काल में आग्निमारुत
शस्त्र को वैश्वानर के सूक्त से प्रारम्भ करता है । (२)
“अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति”
वैश्वानर का १२ कपालों का पुरोडाश होता है। (३)
"अथापि ब्राह्मणं० असौ वा आदित्योऽग्निर्वैश्वा-
नरः” आदित्य वैश्वानर है । (४) "अथापि निवित्
सौर्यवैश्वानरी भवति-आयोद्यांभाति आपृथिवीम्”
और भी सूर्य वैश्वानर की निविद् है-जो द्युलोक तक पृथिवी
तक प्रकाश करता है । (५) "अथापि छान्दो मिकं सूक्तं
सौर्यवैश्वानरं भवति” और भी सूर्य वैश्वानर का छान्दो
मिक सूक्त है । 'दिविपृष्टो अरोचत” द्युलोक में सूर्य
हिन्दी निरुक्त ( १२१ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
हुआ प्रकाश करता है। (६) “अथापि हविष्पान्तीयं सूक्तं
सौर्यवैश्वानरं भवति” और भी सूर्य वैश्वानर का हवि-
ष्पान्तीय सूक्त है।
शाकपूणि आचार्य के मत से पार्थिव अग्नि ही वैश्वानर
है, इस अर्थ की स्थापना—
“अयमेव अग्नि वैश्वानरः इति शाकपूणिः”
यही अग्नि वैश्वानर है, यह शाकपूणि मानते हैं। क्यों कि-
[१] “विश्वानरौ एते०-० वैश्वानरोऽयम्” विश्वानर
मध्यम उत्तम ज्योति हैं, यह अग्नि “वैश्वानर” है। क्यों
कि यह उनसे उत्पन्न होता है।
[२] “वैश्वानरो यतते सूर्येण” वैश्वानर सूर्य से
मिलता है।
(३) “अथ यानि एतानि औत्तमिकानि०-०तेषु
वैश्वानरीयाः प्रवादा अभविष्यन्” और जो ये उत्तम
लोक के देवता भग आदि हैं, उनके सूक्तों में “वैश्वानर” शब्द
विशेषण आता, किन्तु आया नहीं।
(४) “आदित्य कर्मणा च०” और आदित्य के कर्म
[उदय आदि] से इस “वैश्वानर” की स्तुति करता, किन्तु
नहीं की है।
[५] “आग्नयेष्वेवहि सूक्तेषु” अग्नि के ही सूक्तों में
“वैश्वानर” विशेषण आता है।
हिन्दी निरुक्त (१२२) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
(६) “अग्निकर्मणा च” और अग्नि के दाह आदि
कर्म से इस “वैश्वानर” को स्तुति करता है।
कोई निरुक्तकारों के मतका खण्डन ।
कोई निरुक्तकार “वैश्वानर” को “प्रनूमहित्वं०”
ऋचा में उसकी वर्षकर्म से स्तुति देख कर मध्यम समझते हैं,
किन्तु उनका यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि—
(१) “अस्मिन्नपि एतदुपपद्यते” इस पार्थिव अग्नि
में भी यह वर्षकर्म उपपन्न होता है। जैसे कि- “समानमे
तत्० [ऋ०सं० २,३,२६,१] यह ऋचा कहती है।
(२) “कृष्णं नियानम्” [ऋ० सं० २,३,२३,१] इस
मन्त्र में मन्त्र के स्वरूप से आदित्य और प्रकरण से अग्नि की
वर्षकर्म से स्तुति है । सर्वथा वर्षकर्म का कर्त्ता इस में मध्यम
से भिन्न है।
याज्ञिकों के मतका खण्डन ।
(१) “रोहात्प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः” का उत्तर
“आम्नायवचनात्” (२) “वैश्वानरीयो द्वादश
कपालो भवति” का उत्तर “अस्तिहि सौर्य एकक-
पालः पञ्चकपालश्च” (३) “एतद् ब्राह्मणम्०”
का उत्तर “बहुभक्तिवादीनि०” (४) सौर्यवैश्वानरी
निविद्०” का उत्तर “अस्यैव सा भवति” (५)
“छान्दोमिकं सूक्तम्०” का उत्तर “अस्यैव तद्०”
हिन्दी निरुक्त ( १२३ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
(६) “हविष्पान्तीयं सूक्तम्०” का उत्तर “अस्यैव
तद्०” है ॥
इसके अनन्तर “अपामु॒पस्थे०” [ऋ० सं० ४, ५, १०, ४]
इस ऋचा में मन्त्र के अक्षरार्थ से मध्यम ज्योति और उत्तम
ज्योति से वैश्वानर का भेद दिखाया गया है ।
फिर इस पाद व अध्याय की समाप्ति तक हविष्पान्तीय
सूक्त की ही ६ ठी १० वीं ११ वीं तथा १६ वीं ऋचाओं से
अग्नि की ही महिमा दिखाई है, जिसके जानने से अग्नि के
‘वैश्वानर’ होने में सब सन्देह निवृत्त होजाते हैं ।
अन्तिम प्रश्न और उत्तर ।
प्रश्नः- “होतृजपस्त्वनग्निवैश्वानरीयो भवति”-
“देव सवितरेतन्त्वा वृणतेऽग्निं होत्राय सह पित्रा
वैश्वानरेण” ।
हे सवितृ देव ! ऋत्विज् लोग वैश्वानर पिता के सहित
तुझ अग्नि का होत्र के लिये स्वीकार करते हैं ।
इस मन्त्र में सविता और अग्नि एक ही को कहा गया
है, इससे यहां सविता नाम भी अग्नि का ही रहेगा, और
“वैश्वानर” पिता तथा उसका पुत्र अग्नि है, यह भी इसी
मन्त्र से उक्त होता है । इन दोनों बातो की पर्यालोचना से
यह निश्चय सहज में होजाता है कि-“वैश्वानर” देवता
अग्नि से पृथक् है, क्योंकि-पिता पुत्रभाव दोनों में परस्पर
भेद के बिना नहीं आता । जब कि- “वैश्वानर” अग्नि
हिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ७ अ० ७ पा० ६ मं
नहीं, तो उससे भिन्न मध्यम ज्योति या उत्तम ज्योति ही
"वैश्वानर" है, यह सिद्ध होता है ?
(उ०) भाष्यकार कहते हैं कि- यह आपत्ति ठीक है,
किन्तु हमने भी "आदूतो अभिमभरत्" (७,७,५) इस
मन्त्र से यह स्पष्ट रीति से सिद्ध कर दिया है कि- मध्यम व
उत्तम ज्योति से भिन्न देवता अर्थात् अग्नि का ही नाम
"वैश्वानर" है ।
इस रीति से हम और तुम दोनों समान बल हैं, किन्तु
"वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में हमारे पूर्वोक्त
[७,६,६-७- ८-६] छः हेतु अधिक हैं, इससे हमारा ही
जय होता है ॥
भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि- हमारी समझ में इस
"वैश्वानर" पद के विचार प्रसंग में हविष्पान्तीय सूक्त को
बीच में [७,७,३-४-५-६-७ ८-९] डाल कर "सूर्य वैश्वानर
है" "अग्नि वैश्वानर है" इत्यादि रीति से एक ही
ज्योति तीन रूपों से स्थित है, यह बात मन्त्रों के भाव जान-
ने के लिए दिखाई है, कि- ऐसे २ शब्दों के अर्थ व उनके
न्याय तथा युक्तियों में जब संकट उपस्थित हो, तब यहां बुद्धि-
मानों की बुद्धि खिन्न या व्याकुल नहो। प्रयोजन यह है कि-
मन्त्रों में ऐसे शब्दों के अर्थ निर्णय स्थल में 'वैश्वानर'
शब्द पर दिखाई हुई युक्तियों से लाभ उठाना चाहिये ।
यह इस विषय का एक उदाहरणमात्र दिया गया है ॥७(९)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तम पादः ॥७,७॥
हिन्दी निरुक्त ( १२५ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
निरुक्त के सप्तम अध्याय का खण्ड सूत्र.—
[१ म पा०-] अथातः (१) इन्द्रोदिवः (२) (यथैतदिन्द्रः)
परोक्षकृताः (३) तद्यैन (अथाप्यष्टौ) (४) [२ य पा०-] तिस्र
एव देवताः (५) अथाकारचिन्तनम् (६) अपुरुषविधाः (७)
[३ य पा०-] तिस्रएव (८) पूषात्वेतः (९) अथैतानि (१०)
अथैतानि (एतेष्वेव) (११) सन्त्राः (उष्णिक्) (वृहती) (१२)
जगती (इतीमा) (१३) [४र्थ पा०- अथातः (१४) अग्निमीले
(१५) अग्निः पूर्वेभिः (१६) अभिप्रवन्त (१७) इन्द्रंमित्रम् (१८)
[५म पो०-] जातवेदाः (१६) (जातवेदसे) प्रनूनम् (२०)
[६ष्ठ पा०-] वैश्वानरः (२१) वैश्वानरस्य (२२) प्रनूमहित्वम्
(एषांलोकानाम्) (अथापि) (अयमेवाग्निः) (अथादित्यात्)
(अथयोनि) (समानमेतत्) (२३) [७म पा०-] कृष्णं नियानम्
(वैश्वानरोथः) (२४) हविष्पान्तम् (२५) अपामुपस्थे (२६) मूर्द्धा
भुवः (२७) स्तोमेन (२८) यदेदेनम् [२९] यत्रावदेते (३०)
यावन्मात्रम् (३१) एकत्रिंशत् ॥
इति निरुक्ते (उत्तरषट्के) सप्तमोऽध्यायः ॥७,७॥
इति हिन्दी निरुक्ते (उत्तरषट्के) सप्तमोऽध्यायः
समाप्तः ॥७,७॥
अथ अष्टमोऽध्यायः ॥८॥
प्रथमः पादः ।
( खं० १ )
( अथ त्रयोदश पदानि )
(निघ०-) द्रविणोदाः ॥१॥
(निरु०-) द्रविणोदाः कस्मात् ? धनं ‘द्रविणम्’-
उच्यते,-यद्-एनद्-अभिद्रवन्ति। बलं वा ‘द्रवि-
णम्’-यद्-एनेन अभिद्रवन्ति । तस्य दाता द्रवि-
णोदाः । तस्य एषा भवति--॥१॥
अर्थः-द्रविणोदाः (१) यह देवता-पद कैसे ? धन 'द्रविण'
कहलाता है । क्योंकि-उसे उसके अर्थी-चाहने वाले अभिद्र-
वण करते हैं-सामने दौड़ते हैं, इससे वह 'द्रविण' ( कर्म-
वाच्य ) है । अथवा बल 'द्रविण' (करणवाच्य ) है ! क्यों
कि-इससे संयुक्त होकर शत्रुओं के अभिमुख द्रवण करते हैं-
दौड़ते हैं। उस (द्रविण) का दाता-बल का दाता-अथवा
धनका दाता “द्रविणोदस्” (द्रविणोदाः) होता है। उस
(द्रविणोदस्) नाम की प्रधानता से स्तुति वाली यह ऋचा
है-जहां 'द्रविणोदस्' नाम प्रधान = विशेष्य है, और अन्य
पद उसके विशेषण रहते हैं ऐसी यह ऋचा है [ जिसे देख
कर ऋषि ने इस पद को देवतो पदों के समाम्नाय में समा-
म्नाम किया = पढ़ा है ]-॥१॥
हिन्दी निरुक्त (१२७) ८ अ० १ पा० २ खं
(खं० २)
[निरु०-] "द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो
अध्वरे । यज्ञेषु देवमीलते ॥” [ऋ०सं०१,१,२९,१]
द्रविणोदा यः, तम् ।
'द्रविणसः' इति-द्रविणसादिनः इति वा। द्रवि-
णसानिनः इति वा ।
'द्रविणसः' तस्मात् पिबतु-इति वा ।
“यज्ञेषु देवमीलते” ।
याचन्ति । स्तुवन्ति । वर्द्धयन्ति । पूजयन्ति-
इति वा ॥
तत्तं को द्रविणोदाः ? इन्द्रः-इति क्रौष्टुकिः । स
बलधनयोर्दातृतमः, तस्य च सर्वा बलकृतिः ।
“ओजसो जातमुतमन्य एनम् ।” (ऋ०सं० ८ ३,
४,५) । इति च आह ॥
अथापि अग्निं 'द्राविणोदसम्' आह । एष पुनः
एतस्माज्जायते ।
“यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान” । (ऋ०सं०२,६,
७,३) । इत्यपि निगमो भवति ॥
अथापि ऋतुयाजेषु द्राविणोदसाः प्रवादा भवन्ति।
तेषां पुनः पात्रस्य 'इन्द्रपानम्'-इति भवति ।
हिन्दी निरुक्त ( १२८ ) ८ अ० १ पा० २ खंड
अथापि एतं सोमपानेन स्तौति ॥
अथापि आह- “द्रविणोदाः पिबतु द्रविणोदसः”
[ऋ०सं० २,८,१,४] इति ॥२॥
अर्थ:- “द्रविणोदाः” यह ऋचा मेधातिथि ऋषिकी है।
(क) ‘द्रविणसः’ [द्रविणसानिनः] द्रव्य के लोभ से कर्म
में बैठने वाले अथवा (द्रविणसानिनः) गो आदि रूप धन के
भजने वाले या देवता के हविः के भजने वाले ‘ग्रावहस्तासः’
सोमके कूटने के अर्थ पत्थरों को हाथ में लिए हुए ऋत्विज्
‘अध्वरे’ अग्निष्टोम आदि यज्ञ में ‘यज्ञेषु’ हविः के दानों में
अथवा यज्ञ के स्थानों में [यः] जो ‘द्रविणोदाः’ धन या बल
का देने वाला है, (सम् उस ‘देवम्’ देवको ‘ईळते’ (याचन्ति)
जांचते हैं (स्तुवन्ति) स्तुति करते हैं (वर्द्धयन्ति) बढ़ाते हैं
अथवा (पूजयन्ति) पूजते हैं [वह द्रविणोदस् (धन बल का देने
वाला) देव हमें धन बल देवे, यह हम चाहते हैं।] (ऐसी
आशिषा जोड़ कर मन्त्र का अर्थ पूरा किया जाता है।)॥
(ख) (यं) ‘देवं’ (द्रविणोदसम्) ‘अध्वरे’ ‘यज्ञेषु’ ‘ग्राव-
हस्तासः’ (ऋत्विजः) ‘ईळते’ (सः देवः) ‘द्रविणोदाः’ ‘द्रविणसः’
(अस्मात् सोमात् द्रविणसंभक्तुः आदाय स्वमंशं पिबतु
एतद् आशास्महे)
जिस द्रविणोदस् देवको अध्वर = यज्ञ में यज्ञ के
स्थानों में पत्थरों को हाथ में लिये हुए ऋत्विज् स्तुति करते
हैं; वह द्रविणोदस् = धन और बल का दाता देव ‘द्रविणसः’
इस सोमसे उसके भजने वाले ऋत्विज् से लेकर अपने अंश को
प्राप्त करे। यह हम चाहते हैं।
हिन्दी निरुक्त ( १२६ ) ८ अ० १ पा० २ खं०
भाष्यकार ने "द्रविणोदाः" इस मन्त्र की उक्त रीति
से दो व्याख्याएं की हैं। पहिली में 'द्रविणोदाः' इस प्रथमा-
न्त को द्वितीयान्त और 'द्रविणसः' यह प्रथमाबहुवचनान्त
'ग्रावहस्तासः' इसको समानाधिकरण ऋत्विजों का विशेषण
किया है। पहिला पद 'ईळते' इस क्रिया पद में कर्म कारक
और दूसरा कर्त्तृ कारक होता है 'ऋत्विज्' द्रविणोदा को
स्तुति करते हैं । एवम् दूसरी व्याख्या में 'द्रविणोदाः' यह
पहिला पद यथास्थित प्रथमान्त ही रहता है, और दूसरा
'द्रविणसः' पद पञ्चमी का एक वचन है। पहिला पद अध्या-
हार की हुई 'पिवतु' क्रिया में कर्त्तृ कारक और दूसरा अपा-
दान कारक होता है- "द्रविणोदाः देवता द्रविणस्
सोमसे अपना अंश पीवे"
ऐसा करने में भाष्यकार को ये दो बातें बाध्य करती हैं,
कि मन्त्र में दो प्रथमान्त पद कर्त्ता होने के योग्य प्रतीत होते
हैं- 'द्रविणोदाः' और 'ग्रावहस्तासः, । पहिला पद प्रथमा
का एक वचन है, और दूसरा प्रथमा का बहुवचन है, इसी
से ये आपस में विशेषण तथा विशेष्य नहीं होसकते । पहिला
पद देवता का नाम है, और दूसरा ऋत्विजों का, इस कारण
भी ये आपस में विशेष्य विशेषण नहीं होसकते । दूसरे मन्त्र
में 'ईळते' (स्तुति करते हैं) यह एक ही क्रिया पद है, तथा
बहुवचनान्त है, इसका कर्त्ता भी बहुवचन होता है, इस कारण
'द्रविणोदाः' यह एक वचन इसका कर्त्ता नहीं होसकता
और देवता स्तुति किया जाता है, किन्तु करता नहीं इस
लिये भी वह 'ईळते' का कर्त्ता नहीं होसकता । सुतराम् विना
हिन्दी निरुक्त ( १३० ) ८ अ० १ पा० २ खं०
किसी उपाय के 'द्रविणोदाः' यह प्रथमा का एकवचन मन्त्र
में उपयुक्त नहीं हो सकता इस कारण भाष्यकार ने ये दो
प्रकार की व्याख्यायें की हैं, दोनों ही प्रकार से मन्त्र का अर्थ
ठीक हो जाता है, और यह देवता का नाम 'द्रविणाः' पद
भी उपयुक्त हो जाता है ।
पहिली व्याख्या में प्रथमान्त से द्वितीयान्त का काम
लेने में 'यद्' शब्द और 'तद्' शब्द का अध्याहार उपाय
किया है, इस उपाय से किसी पद को किसी विभक्ति में भी
लिया जा सकता है । इसे व्याख्या में 'यद्वृत्त' कहते हैं ।
जैसे- 'यः द्रविणोदाः तम् ईलते' अर्थात्- जो द्रविणोदस् है,
उसको स्तुति करते हैं । यहां 'यद्' 'तद्' शब्दों के सहारे से
प्रथमान्त पदने ही द्वितीयान्त का कार्य दे दिया । ऐसे ही
प्रयोजन के अनुसार अन्यत्र भी किया जा सकता है ।
दूसरी व्याख्या में 'पिबतु' क्रिया के अध्याहार करने से
और 'द्रविणसः' को पञ्चमी मानने से ( जैसा कि- व्याकरण में
हो सकता है ) 'द्रविणोदाः' यह प्रथमान्त ही रह जाता है ।
क्योंकि- अब यह 'पिबतु' क्रिया का कर्त्ता हो जाता है, किन्तु
'ईलते' का कर्म नहीं । उक्त कर्त्ता में प्रथमा विभक्ति ही
होती है ।
सो कौन द्रविणोदस् ( द्रविणोदा ) है ?
कौष्टुकि आचार्य मानते हैं कि-इन्द्र है क्योंकि- वह
बल और धनका अति दान करने वाला है, और सब बल
का कार्य उसी इन्द्र का है, इससे इन्द्र ही 'द्रविणोदाः' है ।
और कहता है ।
“ओजसो जातमुत मन्य एनम्” अर्थात्-(अहम्)
हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ८ अ० १ पा० २ वं
मैं 'एनम्' इस इन्द्रदेवको 'ओजसः' किसी अतिमहान् बल
से 'जातम्' उत्पन्न हुआ 'मन्ये' मानता हूं । [ क्योंकि-यह
अतिबलवान् देखा जाता है । ] जो बलवान् होता है, वही
बलका दाता हो सकता है, इस लिये इन्द्र ही द्रविणोदाः है ।
और भी यह दूसरा हेतु इन्द्रके द्रविणोदस् होने में है-
मन्त्र का द्रष्टा = देखने वाला ऋषि अग्नि को द्राविणोदस
कहता है। [ "द्रविणोदाः पिवतु द्राविणोदसः"
जिसका पुत्र द्राविणोदस अग्नि है, वही द्रविणोदस् है ॥ ]
और यह अग्नि इसी इन्द्र से उत्पन्न होता है, प्रयोजन यह
कि- इन्द्रका ही पुत्र है। क्योंकि-
“यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान" अर्थात् जिस
इन्द्र ने दो पत्थरों के भीतर अग्नि को उत्पन्न किया था।
यह भी निगम है।
"अथापि०" और भी यह दूसरा हेतु इन्द्र के द्रविणोदस्
होने में है। क्या ? ऋतुयाज मन्त्रों में- जिस से ऋतुओं का
यजन होता है, उन मन्त्रों में द्राविणोदस = द्रविणोदस् शब्द
वाले वचन हैं। उससे क्या ? उन मन्त्रों का जो पात्र होता
है,-जिससे उनका सम्बन्धी होम होता है, उस पात्र की
"इन्द्रपान" यह समाख्या = संज्ञा स्वयम् मन्त्र में आई
हुई है। जैसे-
"होता यक्षद्देवं द्रविणोदसम्-अपाद्धोत्रादपा-
त्पोत्रादपान्नेष्ट्रात्तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यमिन्द्रपानं
देवो द्रविणोदा द्रविणसः स्वयमायुष्यात् स्वयमभि-
हिन्दी निरुक्त ( १३२ ) ८ अ० १पा० २खं
गूर्यात् स्वयमभिगूर्त्तया होत्रयर्तुभिः सोमस्य पि-
बत्वच्छावाक यज" ।
“होता यक्षद्देवम्” यह मन्त्र अच्छावाक ऋत्विज् के
प्रति प्रैष = प्रेरणा है । मैत्रावरुण बोलता है ।
अर्थः-‘होता' नाम ऋत्विज् ऋतुदेवताओं के मन्त्रों से
प्रैष्यकर्म में अध्वर्यु ( ऋत्विज् ) के द्वारा अतिप्रेषित = प्रेरित
हुआ 'द्रविणोदसं देवम्' द्रविणोदस् देवको 'यक्षत्' यजन
करे । वह द्रविणोदस् देव 'होत्रात् श्रपात्' होता ( ऋत्विज् )
के सम्प्रदान से = विधि से किये हुए दान से सोम को पी
चुका है । 'अपात् पोत्रात्' पोता (ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से
सोम को पी चुका है । 'अपात् नेष्ट्रात्' नेष्टा (ऋत्विज् ) के
सम्प्रदान से सोमको पी चुका है । अब फिर यह 'तुरीयम्'
चौथा 'पात्रम्' सम्प्रदान पात्र है, जो 'असक्तम्' अशुद्ध या
अपूर्ण है, 'अमर्त्यम्' जिसे पीकर नहीं मरता अथवा जो
मनुष्य योग्य है- जिसे मनुष्य से अन्य ( देव ) पान कर सकते
हैं, उस 'इन्द्रपानम्' इन्द्र के पीने योग्य 'द्रविणसः' सोम के
पात्र को 'द्रविणोदाः स्वयम् आयूयात्' आप द्रविणोदस् देव
भले प्रकार मिलावे 'स्वयम् अभिगूर्यात्' आप उठावे फिर
'अभिगूर्त्तया होत्रया' अपनी चाही हुई स्तुति से दिया हुआ
जो 'सोमस्य' सोम का अंश, उसे 'स्वयम् ऋतुभि' पिबतु'
आप द्रविणोदस् देव ऋतु देवताओं के साथ पीवे 'अच्छावाक!
यज' हे अच्छावाक ! ( ऋत्विज् ! ) तू यजन कर, तू भी ऐसा
जान कर यजन कर ।
इस प्रकार इस इन्द्र के द्रविणोदस् नाम युक्त प्रैष मन्त्र