निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं०
प्रकार वैश्वानर के द्वादश कपाल पुरोडाश की विधि का
अनुकरण भी प्रमाण है । क्योंकि देवताओं के गुणों की समा-
नता को लेकर ही यज्ञ में गुणों की विधि कल्पित होती हैं
इष्ट देवता में जैसे गुण होते हैं, उसके यज्ञ में वैसे ही गुणों
की विधिएं की जाती हैं । जिससे कि वैश्वानर आदित्य है
और आदित्य चैत्र आदि बारह मासों का विभाग करता है
अथवा चैत्र आदि बारह मासों में भिन्न २ स्वरूपों से बारह
प्रकार का होता है, इसी से उसका पुरोडाश बारह कपालों
पर संस्कार किया जाता है = पकाया जाता है । सुतराम्
वैश्वानर के लिये द्वादशकपाल की विधि का अनुकरण उसके
आदित्य होने को सिद्ध करता है । ब्राह्मण निविद् और सूक्त
अपने शब्दों में ही "वैश्वानर" को आदित्य कह रहे हैं॥६॥
( खं० ६ )
[निरु०-] अयमेव अग्निर्वैश्वानरः-इति शाक-
पूणिः । विश्वानरौ एते उत्तरे ज्योतिषी, वैश्वानरो
ऽयम् । यत् ताभ्यां जायते ।
कथं नु अयम्-एताभ्यां जायते, इति ? यत्र
वैद्युतः शरणम् अभिहन्ति, यावद् अनुपात्तो
भवति मध्यमधर्मैस्तावद् भवति- उदकेन्धनः
शरीरोपशमनः, उपादीयमान एव अयं सम्पद्यते
उदकोपशमनः शरीरदीप्तिः ॥६॥
अर्थ.- "अयमेव०" यही (पार्थिव) अग्नि वैश्वानर
हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं०
है,—यह शाकपूणि आचार्य मानता है । 'विश्वानर' ये दूसरे
(मध्यम उत्तम) ज्योति हैं, और 'वैश्वानर' यह पार्थिव
अग्नि है । क्योंकि उन (ज्योतियों) से उत्पन्न होता है !
कैसे यह (पार्थिव अग्नि) उन (विद्युत् और आदित्य)
से उत्पन्न होता है ? जहां वैद्युत (बिजली की) अग्नि
किसी आश्रय (काष्ठ या जल) में आती है, जब तक मनुष्यों
से ग्रहण नहीं की जाती है, मध्यमधर्मा ही रहती है-उस में
विद्युत् का स्वभाव ही रहता है । [स्वभाव कौनसा ?] जल
से जलना और पार्थिव वस्तु तृण काष्ठ आदि से बुझना ।
जैसे ही मनुष्य उसे लेलेते हैं, उदक (जल) से बुझने और
कठोर (काष्ठ आदि) से जलने लगती है ॥ ६ ॥
व्याख्या
अब भाष्यकार कुछ नैरूक्तों और पूर्व याज्ञिकों के उन
मतों को खण्डन करते हैं, जिनमें "वैश्वानर" विद्युत् अथवा
आदित्य ठहरता है । इसके लिये आप अपने सहमत शाक-
पूणि आचार्य के मतको उद्धृत करते हैं, जिस में कि-पहिले
"वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में छः प्रमाण दिये हुये
हैं और फिर उक्त दोनों विपक्षों के सब हेतुओं का खण्डन
भले प्रकार से किया है । तथा और २ भी आवश्यक प्रमाण
दिये हैं । भाष्यकार शाकपूणि के मत को इस विषय में बड़ा
युक्तिसम्पन्न और पर्याप्त समझते हैं, इस लिये उसके मतके
दिखा देने के साथ ही इस विषय और अध्याय को समाप्त
कर देंगे ।
शाकपूणि का मत और स्वपक्ष मण्डन ।
हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं०
शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि- "वैश्वानर" शब्द ही
इस बात में साक्ष्य देता है कि-यह पार्थिव अग्नि ही वैश्वा-
नर है । क्योंकि-'विश्वानर' नाम और 'अण्' तद्धित (प्रत्यय)
के योग से 'वैश्वानर' शब्द बनता है । 'विश्वानर' नाम
विद्युत् तथा आदित्य का है उनका पुत्र होने से पार्थिव अग्नि
'वैश्वानर' कहलाता है । व्याकरण की रीति से यह अर्थ
युक्तिसंगत है ।
विद्युत् का अपत्य पार्थिव अग्नि ।
विद्युत् (बिजली) अन्तरिक्ष लोक का तेज है । जब
वह ओषधि वनस्पतियों पर गिर जाता है, तो उसी का
पार्थिव अग्नि बन जाता है। जब तक वह आकाश में रहता
है, पानी से जलता है और काष्ठ आदि पार्थिव कठोर वस्तु-
से बुझता है, और जब पृथिवी में आकर पार्थिव अग्नि बन
जाता है, तब पानी से बुझने लगता है और काष्ठ से जलने
लगता है । इससे ये दोनों आपस में भिन्न २ हैं और पिता
पुत्र हैं ॥६॥
( खं० ७ )
(निरु०-) अथ आदित्यात्। उदीचि मथसमा-
वृत्ते आदित्ये कंसं वा मणिं वा परिमृज्य प्रति-
स्वरे यत्र शुष्कगोमयम् असंस्पर्शयन् धारयति
तत् प्रदीध्यते, सोऽयमेव सम्पद्यते ।
अथाऽपि आह-"वैश्वानरो यतते सूर्येण-"
इति । नच पुनः आत्मना आत्मा संयतते, अन्ये-
नैव अन्यः संयतते ।
हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं०
इतः इमम् आदधाति ।
अमुतः अमुष्य रश्मयः प्रादुर्भवन्ति, इतः अस्य
अर्चिषः, तयोर्भासोः संसङ्गं दृष्ट्वा एवम्-अव-
क्ष्यत् ॥ ७ ॥
अर्थ :- “अथ आदित्यात्” अब आदित्य से (पार्थिव
अग्नि का जन्म कहते हैं-) । उत्तर दिशा में 'पहिले पहिल
आए हुये आदित्य में (आदित्य के साम्हने) कंस (कांसी)
को और मणि (तैजस = आतिशी कांच आदि) को साफ
करके धूप में जहां सूखा गोबर हो उससे न बुझाता हुआ (जैसे
कि-उस पर उसकी छाया पड़े) आदमी धारण करता है, तो
वह जलने लगता है-उस कांसी या कांच के द्वारा सूर्य से उस
गोबर में तेज उतर आता है, यह यही (पार्थिव अग्नि)
बन जाता है।
और भी मन्त्रद्रष्टा = ऋषि कहता है- “वैश्वानरो०”
वैश्वानर सूर्य के साथ मिलता है। और फिर अपने से आप
(कोई) मिलता नहीं, (किन्तु) दूसरे से ही दूसरा मिलता है।
“इतः इमम्०” इस सूखे गोबर से उत्पन्न अग्नि को
(काष्ठ आदि से) रख लेते हैं। (यह प्रकार आदित्य से
पार्थिव अग्नि की उत्पत्ति का है।)
“अमुतः” उस (आदित्य मण्डल) से उस (आदित्य)
की रश्मियें (किरणें) प्रकट होती हैं, इस (पार्थिव अग्नि)
से इसकी अर्चिषं (ज्वालाएं) निकलती हैं; उन दोनों
प्रकाशों का संयोग देख कर (ऋषि ने) ऐसा कहा होगा-
हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ६ पा० ९ खं०
[ “वैश्वानरो यतते सूर्येण०” इससे “वैश्वानर” का
सूर्य से पृथक् होना सिद्ध होता है। जैसी पृथक्ता दिखाई
गई है, उससे वह पार्थिव अग्नि ही होता है, किन्तु मध्यम
नहीं। ] ॥ ७ ॥
( खं० ८ )
(निरु०-) अथ यानि एतानि औत्तमिकानि
सूक्तानि भागानि वा, सावित्राणि वा सौर्याणि
वा, पौष्णानि वा, वैष्णवानि वा, वैश्वदेवानि वा,
तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा अभविष्यन्, आदित्य-
कर्मणा च एनम्- अस्तोष्यन्- इति-“उदेषि”
इति, “अस्तमेषि” इति, विपर्य्येपि” इति ।
आग्नेयेष्वेव हि सूक्तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा
भवन्ति, अग्निकर्मणा स्तौति-इति,-“दहसि”-
इति, “वहसि” इति, “पचासि” इति ।
यथो एतद्-वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति-इति,
अस्मिन्नपि एतदुपपद्यते ॥८॥
अर्थः- “अथ०” दूसरी बात- [यदि सूर्य्य वैश्वानर
होता, तो जो ये उत्तम लोक के देवता विशेषों की स्तुति के
अर्थ सूक्त हैं, जैसे अथवा भग के, अथवा सविता के,
अथवा सूर्य के, अथवा पूषा के, अथवा विष्णु के,
अथवा विश्व देवों के, उन में वैश्वानर के प्रवाद
हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ६पा० ८खं
होते- भग आदिकों का विशेषण “वैश्वानर” शब्द होता-
हे भग!, वैश्वानर ! हे सवितः ! वैश्वानर ! इत्यादि, और आ-
दित्य कर्म से इस ( वैश्वानर ) की स्तुति करते- “उदेषि”
तू उदय होता है, “अस्तमेषि” तू अस्त होता है,
“विपर्य्येषि” तू उलटा फिरता है इत्यादि । [किन्तु ये दोनो
बातें नहीं हैं, क्या कि न उत्तम लोक के देवताओं के सूक्तों में
वैश्वानर के प्रवाद हैं, और न आदित्य कर्म से वैश्वानर की
स्तुति ही है। इससे सूर्य वैश्वानर नहीं है । ]
[ और पार्थिव अग्नि ही वैश्वानर शब्द का वाच्य है,
इस में यह विशेष हेतु भी है कि-] अग्नि के सूक्तों में ही
वैश्वानर के प्रवाद आते हैं- अग्नि का विशेषण 'वैश्वानर'-
शब्द आता है- [ “वैश्वानर मृत आजातमग्निम्”
[ ऋ० सं० ४, ५, ६, १] इत्यादि ] । और अग्नि के कर्म
से (ऋषि, ) ( वैश्वानर को ) स्तुति करता है- “वहसि”-
हे वैश्वानर! तू हविओं को पहुंचाता है, “पचसि”-पकाने
योग्य द्रव्यों को तू पकाता है, “दहसि”- जलाने योग्य
तृण काष्ठ आदि को तू जलाता है ॥ इससे अग्नि ही वैश्वा-
नर है, यह स्थिर हो गया ॥
[केचित्मतका खण्डन]
“यथो एतद्०” जो कि यह (आक्षेप किया-) क्यों कि
वर्ष कर्म से इसकी स्तुति करता है, (इससे मध्यम है) ।
इस ( पार्थिव अग्नि ) में भी यह उपपन्न होता है-
घंटता है- ॥ ८ ॥
हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ७ अ० ६ पा० ६ सं०
( खं० ६ )
( निरु० ) “समानमेतदुदकमुञ्चैत्यवञ्चाहभिः ।
भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ॥”
[ ऋ० सं० २, ३, २३, ५ ] इति सा निगद-
व्याख्याता ॥९ ( २३ )
इति सप्तमाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ७,६ ॥
अर्थ:- “समानमेतत्०” । ‘समानम्’ (एकमेव)
एक ही ‘एतत्’ यह ‘उदकम्’ जल ‘अहभिः’ (अहोभिः निमित्त-
भूतैः) विशेष दिनों से “उद्- एति च” ऊपर को जाता है
अव एति च” और फिर विशेष दिनों से ही नीचे को
आता है - दक्षिणायन और उत्तरायण के भेद से यहां दिन
समझे गये हैं, सो ही यहां एक ही जल क्रम से उत्तरायण और
दक्षिणायन में जगत् के निर्वाह के अर्थ वृष्टि के रूप से ऊपर
को जाता है और नीचे को आता है, नीचे को किस प्रकार
आता है, यह पहिले कहते हैं- “भूमिं पर्जन्याः” पर्जन्याः,
(प्रार्जयितारो रसानाम् ) रसों के बढाने वाले मध्यम लोक के
देवगण ( उस लोक से वर्षा को छोड़ते हुए ) ‘भूमिम्’ पृथिवी
को ‘जिन्वन्ति’ तृप्त करते हैं (ओषधियों की उत्पत्तिके लिये)।
अब ऊपर को कैसे जाता है, यह कहते हैं- “दिवं जिन्व-
न्त्यग्नयः” [जिस प्रकार उस लोक से वर्षा के द्वारा पर्जन्य
इस पृथिवी की तृप्ति करते हैं, वैसे ही- ] ‘अग्नयः’ अग्निाएं
(आहुतियों से उत्पन्न हुई वृष्टि के द्वारा ‘दिवम्’ द्युलोक को
हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ६ पा० ६ सं०
'पिन्वन्ति' तृप्त करती हैं- अग्नि में आहुतियां छोड़ी जाती
हैं, वे अग्नि से दग्ध होकर अग्नि की ज्वालाओं से जल के
स्वरूप को प्राप्त करके बहुत सूक्ष्म देवत्आों के उपभोग के
योग्य बनाकर द्युलोक में पहुंचाई जाती हैं- वहां के निवासि-
यों की तृप्ति के अर्थ वृष्टिके रूप में पहुंचाई जाती हैं, फिर वे
द्युलोकनिवासी यहां के अर्थ वृष्टि करते हैं। सो कहा भी
है कि-
“अमुष्य लोकस्य का गतिः इति, अयं लोक
इति होवाच” इति। अर्थात्-‘उस (द्यु) लोक की क्या गति
है उसका निर्वाह कहां से होता है, (उत्तर-) यह लोक-इस
लोक की आहुतियों से, यह कहा’। इस प्रकार सर्वथा यह
पार्थिव अग्नि भी वर्ष कर्म वाला है। क्यों कि सब वृष्टि का
मूल आहुतियां हैं। जैसे कि स्मृति है-
“अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्या ज्जायते वृष्टि र्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥”
(मनुः अ० ३ श्लो० ७६) अर्थात्-‘अग्नि में विधि से छोड़ी
हुई आहुति आदित्य को प्राप्त होती है, और आदित्य से वृष्टि
वृष्टि से अन्न और अन्न से प्रजा होती हैं।' इस लिये जो
कि, यह कहा है कि- वृष्टि कर्म के योग से “वैश्वानर” मध्यम
ज्योति है, यह लक्षण अग्नि और आदित्य में भी साधारण है,
अतः वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह मध्यम नहीं हो सकता।]
‘इति सा०’ यह (समानमेतत्०) ऋचा अपने पाठ से
ही व्याख्या की हुई है ॥ ९ (२३) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ७,६ ॥
हिन्दी निरुक्त ( १०० ) ७ अ० ६ पा० १ खंड
सप्तमः पादः
( खं० १ )
(निरु०-) कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपोव-
साना दिवमुत्पतन्ति । त आववृत्रन् सदनाहत-
स्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते ॥” ( ऋ० सं०
१, ३, २३, १ )
कृष्णं निरयणं रात्रिः आदित्यस्य हरयः सुपर्णा हर-
णा आदित्यस्य रश्मयः ते यदा अमुतः अर्वाञ्चः पर्य्या-
वर्त्तन्ते महस्थानाद् उदकस्य आदित्याद् अथ
घृतेन उदकेन पृथिवी व्युद्यते । 'घृतम्' इति उ-
दकनाम । जिघर्त्तेः सिञ्चतिकर्मणः ।
अथापि ब्राह्मणं भवति- “अग्निर्वा इतो वृष्टिं
समीरयति धामच्छद् दिवि भूत्वा वर्षति मरुतः
सृष्टां वृष्टिं नयन्ति”
“यदा सावादित्योऽग्नि रश्मिभिः पर्य्यावर्त्तते
अथ वर्षति” इति ।
यथो एतद् “रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः” इति,
आम्नायवचनाद् एतद् भवति ।
यथो एतद्—॥ १ ॥
अर्थः- “कृष्णं नियानम् ” इस ऋचा का दीर्घतमा
हिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ७ अ० ६ पा० १ सं०
ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, वृष्टिकाम की कारीरी ( इष्टि ) में अग्नि
धामच्छद् के लिये अष्टाकपाल (पुरोडाश) होता है, उसकी
पुरोनुवाक्या है, तहां मैत्रायणीयक में यह (पार्थिव) अग्नि
आदित्य करके स्तुति किया जाता है ।
‘कृष्णम्’ काले ‘नियानं’ (निरयणम्) मार्ग से ‘सुपर्णाः’
सुन्दर दौड़ने वाले ‘हरयः’ (हरणाः आदित्यस्य = आदित्य-
रश्मयः) हरणशील आदित्य के हरि (रश्मिएं) “अपो-
वसानाः” जलको धारण करते हुए ‘दिवम्’ द्युलोक को
‘उत्पतन्ति’ उड़ जाते हैं = चले जाते हैं– सूर्य भगवान् जब
जगत् के अनुग्रह के लिये जल का गर्भ अपने में धारण करने
की इच्छा से उत्तरायण में आते हैं, तब ये रश्मि इस सब
लोक से जलको अपने में धारण करते हुए आदित्य मण्डल के
प्रति उड़ते हैं, और उस जलको आदित्य मण्डल में धर देते
हैं, फिर सूर्यदेव उत्तरायण के छः मास तक जलके गर्भ को
धारण किये हुये रहते हैं, और दक्षिणायन में आकर आषाढ
मास से प्रसव करते हैं–जलको बरसते हैं,–सो यह कहा जाता
है–“ते आ ववृत्रन्॰” ‘ते’ (रश्मयः) वे रश्मिएं (यदा)
जब (अमुतः) उस ‘ऋतस्यसदनात्’ (उदकस्य सहस्थानाद्
आदित्यात्) जल के स्थान आदित्य मण्डल से ‘आववृत्रन्’
(अर्वाञ्चः पर्यावर्त्तन्ते) नीचे की ओर लौटते हैं, ‘ओत्’
(अथ) उस समय ‘घृतेन’ (उदकेन) जलसे ‘पृथिवी’ पृथिवी
‘व्युद्यते’ भीग जाती है ॥
‘घृत’ यह जलका नाम है । ‘सिच’ (तु० प०) धातु के
सेचन अर्थ में ‘घृ’ (जु० प०) धातु से है ।
हिन्दी निरुक्त ( १०२ ) ७ अ० ६ पा० १ ख०
[ इस प्रकार इस मन्त्र में वर्षकर्म का करने वाला मन्त्र
के अक्षरार्थ से आदित्य और प्रकरण से अग्नि है, दोनों ही
प्रकार से वृष्टि का करने वाला मध्यम से अन्य है, अतः वर्ष-
कर्म के योग से "वैश्वानर" मध्यम है, यह कहना अयुक्त है।]
"अथापि ब्राह्मणम्०" और भी ( इस मन्त्र के अर्थ
को पुष्ट करने वाला ) ब्राह्मण है-"अग्निर्वा०" 'अग्नि
इस लोक से वृष्टि को प्रेरणा करता है- अग्नि की ऊष्मा के
साथ ओषधि वनस्पतियों से धूम के रूप में जल आकाश की
ओर उड़ते हैं फिर द्युलोक में मेघरूप होकर ( आदित्य )
बरसता है- (आकाश में) उसी आदित्य की रची हुई वृष्टि
को मरुत् ( मध्यम लोक के देवगण ) यहां पहुंचाते हैं'।
[ और भी ब्राह्मण- ] "यदासौ" जब वह आदित्य
रश्मियों से अग्नि के प्रति लौटता है, तब बरसता है।
[ इस प्रकार वृष्टिकर्म सब देवताओं का समान है, अतः
यह "वैश्वानर" के मध्यम होने में हेतु नहीं होसकता ] ।
( पूर्व याज्ञिक मत का खण्डन )
"यथो एतत्०" और जोकि-यह कहा "रोहात्
प्रत्यवरोहः" 'रोहण के अनुसार प्रत्यवरोहण करना इष्ट
है,- इत्यादि। यह आम्नाय (वेद) के वचन के प्रामाण्य से
होता है। अर्थात्-तृतीय सवन में जो 'वैश्वानर के सूक्त' से
शस्त्र का आरम्भ होता है, वह विधिवाक्य के अधीन किया
जाता है। लोकों को आरोहण तथा प्रत्यवरोहण अर्थवाद
मात्र = फलस्तुति मात्र है, उसका कोई विरोध नहीं है।
हिन्दी निरुक्त ( १०३ ) ७ अ० ६ पा० २ खंड
अतः "वैश्वानर" उतने से आदित्य नहीं हो सकता।
"यथो एतत्०" और भी जो कहा है- ॥१॥
( खंड २ )
(निरु०-) "वैश्वानरीयो द्वादशकपालोभवति"
इति । अनिर्वचनं कपालानि भवन्ति । अस्ति
हि सौर्य एककपालः पञ्चकपालश्च ।
यथो एतद् "ब्राह्मणं भवति०" इति । बहुभक्ति-
वादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति- पृथिवी वैश्वानरः,
संवत्सरो वैश्वानरः, ब्राह्मणो वैश्वानरः इति ।
यथो एतद् "निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति-"
इतिअस्यैव सा भवति 'यो विड्भ्यो मानुषीभ्यो
दीदेद्-" इति, एष हि विड्भ्यो मानुषीभ्यो दीप्यते ।
यथो एतत् "छान्दोमिकं सूक्त सौर्यवैश्वानरं
भवति" इति, अस्यैव तद् भवति- जमदग्निभिरा-
हुतः" इति । जमदग्नयः प्रजमिताग्नयो वा प्रज्व-
लिताग्नयो वा । तैः अभिहुतो भवति ।
यथो एतद् "हविष्पान्तीर्य सूक्तं सौर्यवैश्वानरं
भवति "इति, अस्यैव तद् भवति ॥ २ ( २४ )॥
अर्थः- "वैश्वानरीयो०" 'वैश्वानर का बारह कपालों
का (पुरोडाश) होता है, यह भी सूर्य के वैश्वानर होने में
हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ७ अ० ६पा० २खं
कारण नही )। क्यों कि- कपाल निर्वचन के साधक नही
होते, व्यभिचारी है- यदि इनकी संख्या बारह ( १२ ) ही
नियत होती, तो ऐसी कल्पना होती किन्तु स्वयम् सूर्य के
एककपाल और पञ्चकपाल भी पुरोडाश होते है,
"यथो एतद्०", और यह कहा कि- ब्राह्मण (आदित्य
को वैश्वानर कहने वाला) है, (वह भी ठीक नहीं )। क्यों
कि- ब्राह्मण बहुभक्ति के कहने वाले हैं- और भी बहुत अर्थों
को वैश्वानर कहते है । (जैसे-) 'पृथिवी वैश्वानर है' सवत्सर
वैश्वानर है, ब्राह्मण वैश्वानर है, ।
"यथा एतत्०" और जोयह कहा कि-सूर्य वैश्वानर की
निविद् है (यह भी ठीक नहीं। क्यों कि-) इसी (पार्थिव
अग्नि) की वह (निविद्) है [ऐसा उसके आद्यन्त पर्यालोचन से
प्रतीत होता है] । [जैसे-]
“यो विड्भ्यो मानुषीभ्यो दीदेत” जो मनुष्यों की
जातियों के अर्थ प्रकाशित होता है । यही पार्थिव अग्नि
मानुषी विटों (जातियों) के अर्थ जलता है ।
"यथो एतत्०" और यह कहा कि- सूर्यवैश्वानर का
छन्दोमिक (छन्दोम यज्ञ = दाशरात्रिकों में) सूक्त है । वह
इसी पार्थिव अग्नि) का है । [ जैसे- ) “जमदग्निभिरा-
हुतः' अर्थात् - बहुत अग्नि वालों से या प्रज्वलित अग्नि
वालों से होम किया गया है ([क्यों कि जमदग्नि इसी अग्नि
में आहुतियों को देते हैं, किन्तु आदित्य में नही। यह विधि
से और संभवसे सिद्ध है । अतः यह सूक्त भी इसी अग्नि का
है । ]
हिन्दी निरुक्त ( १०५ ) ७ अ० ६ पा० ३ खं
'जमदग्नि' क्या ? प्रज्वलिताग्नि ( बहुत अग्नि वाले )
अथवा प्रज्वलिताग्नि ( जिनका अग्नि प्रज्वलित रहता है) ॥
“यथो एतद् हविष्पान्तीयम्” और जैसा कि यह
कहा- सूर्य वैश्वानर का हविष्पान्तीय सूक्त है, वह भी इसी
( पार्थिव अग्नि ) का है । [ जैसा कि- ] ॥२(२४)॥
( खं० ३ )
(निरु०-) “हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृ-
श्याहुतं जुष्टमग्नौ । तस्य भर्मणे भुवनाय देवा
धर्मणे कं स्वधयापप्रथन्त ॥” (ऋ०सं० ८,४,१०,१-
१०,७,४,१)
हविः यत् पानीयम् अजरम् सूर्यविदि दिविस्पृ-
शि अभिहुतं जुष्टम् अग्नौ, तस्य भरणाय च
भावनाय च धारणाय च एतेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्यः
इमम् अग्निम् अन्नेन अपप्रथन्त- इति ।
अथापि आह ॥३(२५)॥
अर्थ :- “हविष्पान्तम्” इस सूक्त का मूर्द्धन्वान् आ-
ङ्गिरस ( अङ्गिरा का पुत्र ) अथवा वामदेव ऋषि व्यूढ दश-
रात्र के पञ्चम अहन् में आग्निमारुत ( शस्त्र ) की प्रतिपद्
( पहिली ऋचा ) है ।
( यत् ) जो 'हविः' हवि 'पान्तम्' (पानीयम्) देवताओं
के पान योग्य है, 'अजरम्' जिस से अधिक जरा या पाक न
हो, अर्थात्-पूर्णरूप से पका हुआ है, 'स्वर्विदि' (सूर्यविदि)
हिन्दी निरुक्त ( १०६ ) ७ अ० ७ पा० ४ खं०
सूर्य के जानने वाले 'दिविस्पृशि' द्यु या आदित्य को छूने
वाले नित्य २ हविः को पहुंचाने के अर्थ आदित्य को स्पर्श
करने वाले 'अग्नौ' अग्नि में 'आहुतम्' ( अभिहुतम् ) भले
प्रकार होम किया हुआ या होम करने योग्य है, 'जुष्टम्'
देवताओं का प्रिय है, 'तस्य' उस (हविः) के 'भर्मणे' (भरणाय)
सम्भरणाय बढ़ाने के अर्थ, 'भुवनाय' ( भावनाय च ) पर्याप्ति
या देवताओं की तृप्ति के उपयुक्त बनाने के लिये 'धर्मणे'
( धारणाय च ) और धारण के लिये सदा देवताओं के अर्थ
प्रस्तुत रखने के लिये ( एतेभ्य सर्वेभ्यः कर्मभ्यः ) इन सब
कर्मों के लिये ( इमम् अग्निम् ) इस पृथिवी स्थान अग्नि को
'देवाः' देवताओं ने 'स्वधया' ( अन्नेन ) अन्न से ( घृत, पुरो-
डाश आदि से ) 'अपप्रथन्त' ( अवर्धयन्त ) बढ़ाया ॥
“अथापि आह” और भी कहता है-किसी दूसरे सूक्त
से और ऐसा मन्त्र पढता है, जिस में मध्यम और उत्तम दोनों
ज्योतियों से अन्य ज्योति को वैश्वानर कहा गया है ॥३(२५)॥
( खं० ४ )
(निरु०-) “अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत विशो
राजानमुपतस्थुर्ऋग्मियम् । आदूतो अग्निमभर-
द्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वा परावतः ॥”
( ऋ०सं० ४,५,१०,४ ) ॥
अपाम् उपस्थे उपस्थाने महति अन्तरिक्षलोके
आसीना महान्तः इति वा, अगृह्णत माध्यमिका
देवगणाः विश इव राजानम् उपतस्थुः ऋग्मियम्
कुर्मवन्तम्-इति वा, अर्चनीयम्-इति वा, पूजनीयम्
इति वा अहरत्, यं दूतो देवानां विवस्वतः 'आदि-
त्यात्। 'विवस्वान् विवासनवान्। प्रेरितवतः पराग-
ताद् वा। अस्य अग्नेर्वैश्वानरस्य मातरिश्वानम्
आहर्त्तारम्-आह।
'मातरिश्वा' वायुः मातरि अन्तरिक्षे श्वसिति
मातरि आश्वनिति इति वा ।
अथ एनम् एताभ्याम् सर्वाणि स्थानानि अभ्या-
पादं स्तौति ॥ ४ (२६) ॥
अर्थः-"अपामुपस्थे" इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि
और प्रातरनुवाक तथा आश्विन शस्त्र में शस्त्र है।
"अपाम्-उपस्थे" (उपस्थाने = महति अन्तरिक्षलोके)
जलों के रहने के स्थान बड़े आकाश देश में 'महिषाः' (आ-
सीनाः) बैठे हुए (महान्तः इति वा) अथवा बड़े (माध्य-
मिकाः देवगणाः) मध्यम लोक के देवगणों ने (तम्) उस
को 'अगृभ्णत' (अगृह्णत) ग्रहण किया, 'ऋग्मियम्' (ऋग्म-
न्तम् इतिवा) ऋचाओं से स्तुति वाले (अर्चनीयम्-इति वा-
पूजनीयम्-इति वा) अथवा अर्चनीय अथवा पूज्य (उस) को
"विशः राजानम्"- (इव) जैसे मनुष्य राजाको (उपस्थान
करें) 'उपतस्थुः' उपस्थान किया (सत्कृत किया) [किस
को ?] (यम्) जिस 'वैश्वानरम्' वैश्वानर 'अग्निम्' अग्नि
को 'दूतः' (देवानाम्) देवताओं का दूत 'मातरिश्वा' वायु
'परावतः' (प्रेरितवतः = प्रेरितवरात्) बहुत प्रेरित हुये
हिन्दी निरुक्तं ( १०८ ) ७ अ० ७ पा० ५ खं
'
( परांगतोद्वे वा ) अथवा दूर गएं हुये 'विवस्वतः' ( आदि
त्यात् ) विवस्वान् = आदित्य से 'आ अभरत्' ( आहरत् )
लाया था ।
“अस्य अग्नेः०” इस ( पार्थिव ) अग्नि वैश्वानर को
लाने वाले मातरिश्वा ( वायु ) को कहता है—इस प्रकार इस
मन्त्र में, जहां से लाया गया, जो लाया गया, और जो लाया
तीनों अलग २ दिखाये हैं, अर्थात्—विवस्वान् से मातरिश्वा
वैश्वानर को लाया । इस से इन दोनों विवस्वान् और मात-
रिश्व के समीप में तीसरा 'वैश्वानर' शब्द से साक्षात् ही
पार्थिव अग्नि कहा गया, इस लिये पार्थिव अग्नि वैश्वानर
है, यह व्यवस्थित होता है ।
'विवस्वान्' क्या ? विवासनवान् ( अन्धकार को हटाने
वाला ) ।
'मातरिश्वा' क्या ? वायु । क्यों ? माता = अन्तरिक्ष में
श्वसन करता है = चलता है । [ इस व्याख्या में 'मातृ' शब्द
और 'श्वस' ( अदा०प० ) धातु से 'मातरिश्वा' शब्द है । ]
अथवा मातों अन्तरिक्ष में शीघ्र चलता है । [ इस व्याख्या में
'मातृ' शब्द 'आशु' (अव्यय) 'अन' (अदा०प०) धातु से है । ]
अब इस ( अग्नि ) को इन दो ऋचाओं से सब स्थानों
को लेलेकर स्तुति करता है ( ऋषि )—॥ ४ (२६) ॥
( सं० ५ )
(निरु०–) “मूर्द्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः
सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् । मायामूतू यज्जियाना-
हिन्दी निरुक्त ( १०६ ) ७ अ० ७ पा० ५ खं०
मेतामपोयत्तूर्णिश्चरति प्रजानन् ॥” [ ऋ० सं०
८, ४, ११, १ ]
'मूर्द्धा' मूर्त्तम् अस्मिन् धीयते । मूर्द्धा यः सर्वेषां
भूतानाम् भवति नक्तम् अग्निः, ततः सूर्य्यो जायते
प्रातरुद्यन्, स एव, प्रज्ञां तु एतां मन्यन्ते य-
ज्ञियानां देवानां यज्ञसम्पादिनाम्, अपो यत्
कर्म चरति प्रजानन्- सर्वाणि स्थानानि अनुसं-
चरते त्वरमाणः ।
तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥५[२७]॥
अर्थ :- “मूर्द्धा भुवः” । 'अग्निः' अग्निदेव 'भुवः'
पृथिवी का ( सर्वेषां भूतानाम् ) सब प्राणियों का 'मूर्द्धा'
शिर 'भवति' है, 'नक्तम्' ( विशेष कर ) रात्रि में, जिस
प्रकार शिर के बिना प्राणी का जीवन नहीं हो सकता उसी
प्रकार अग्नि के बिना भी कोई प्राणी जी नहीं सकता, क्यों
कि- उसी के अधीन अन्न का पकाना ( रांधना ) आदि है,
इसी से यह अग्नि सब भूतों का मूर्द्धा (प्रधानसम) है । 'ततः'
फिर ( रात्रि के बीत जाने पर ) “प्रातः उद्यन्” प्रातःकाल
उदय होता हुआ ( सः एव ) वही अग्नि 'सूर्य्यः' सूर्य 'जायते'
हो जाता है । अर्थात्- जो अग्नि रात्रि के समय अग्नि के
रूप से जगत् का उपकार करता है, वही अग्नि सवेरे ही दिन
के उपकारों के करने के अर्थ सूर्य हो जाता है, [ यह उसकी
माया है । ] ( तत्वविदः ) देवता तत्व के जानने वाले पुरुष
'एताम्' इसे 'यज्ञियानाम्' ( यज्ञसम्पादिनां देवानाम् )
हिन्दी निरुक्त ( ११० ) ७ अ० ७पा० ६खं
यज्ञ के सम्पादन (सिद्ध) करने वाले देवताओं की 'मायाम्'
(प्रज्ञाम्) माया या प्रज्ञान (विद्या) मानते हैं। 'यत्'
जोकि-'अपः' (कर्म) अपने अधिकार के कर्म को 'जानन्'
जानता हुआ 'तूर्णिः' (त्वरमाणः) वेग से युक्त 'चरति'
(सर्वाणि स्थानानि अनुसंचरते) सब स्थानों (तीनों लोकों)
को अनुसञ्चरण करता है-पर्यटन करता है-देवताओं में किसी
कार्य की असंभावना नही करना। वे अपनी माया से अनेक२
वैसे २ ही रूप कर सकते हैं, जैसे २ की आवश्यकता हो ।
[मन्त्र में यहां “माया” शब्द साक्षात् है, जो पुराणों में
बाहुल्य से आया है। यह शब्द देवकार्यों में असंभावना से
दबे हुए मनुष्यों को ध्यान से देखना चाहिये । ]
“तस्य उत्तरा०” उसी अर्थ को [ जो पूर्व ऋचा का
है ] बाहुल्य से कहने वाली अगली ऋचा है-पहिली ऋचा से
दो स्थानों के सम्बन्ध से अग्नि की स्तुति की गई है, कि-
रात्रि के समय भूलोक का मस्तक होता है, और प्रातःकाल
सूर्य के रूप से उदय होता है, और इस अगली ऋचा से
तीनों लोकों के सम्बन्ध से स्पष्टतया स्तुति किया जाता है-
यही अगली ऋचा का पूर्व ऋचा से आधिक्य है-॥५(२७)॥
( खं० ६ )
[निरु०] “स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निम्-
जीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम् । तमू अकृण्वन्
त्रेधाभुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः ॥”
[ऋ०म० ८.४.११.५]
स्तोमेन हि यं दिवि देवा अग्निम् अजनयन्
हिन्दी निरुक्त (१११) ७ अ० ७ पा० ६ सं०
शक्तिभिः कर्मभिः द्यावापृथिव्योः पूरणं तम् अ-
कुर्वन्, त्रेधा भावाय । 'पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे,
दिवि',—इति शाकपूणिः ।
“यदस्य दिवि तृतीयं तदसावादित्यः” इति हि
ब्राह्मणम् ।
तद् अग्नीकृत्य स्तौति ।
अथ एनम् एतया आदित्यीकृत्य स्तौति-॥६।२८॥
अर्थः- “स्तोमेन हि०” । 'देवामः' (देवाः देवताओँ
ने 'स्तोमेन' स्तुतिभिः) स्तुतियों से 'दिवि' द्युलोक में 'अग्नि
म्, अग्नि को 'अजीजनन्' (अजनयन्) उत्पन्न किया । 'शक्ति-
भिः' (कर्मभिः) और कर्मों से 'रोदसिप्राम्' (द्यावापृथिव्योः
पूरणम् ) द्युलोक और पृथिवी लोक में पूर्ण (कर दिया) । 'तम्'
(एव) उसी (अग्नि) को “त्रेधा भुवे” (भावाय) तीन भागों में
बांटने के अर्थ 'अकृण्वन्' (अकुर्वन् ) किया । ( पृथिव्याम्,
अन्तरिक्षे, दिवि, इति शाकपूणिः ) पृथिवी में (अग्नि के रूप में)
अन्तरिक्ष में (विद्युत् के रूप में) द्युलोक में (आदित्य के रूप में)
[कर दिया] - यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं ।
“यदस्य०” 'जो इसका तीसरा (भाग) है, सो वोह आदि-
त्य है'- यह ब्राह्मण है ।
“तद् अग्नी०” सो यह [उक्त ब्राह्मण] अग्नि मान कर
स्तुति करता है- इस ऋचा में देवताओं ने इस पार्थिव
अग्नि को ही द्युलोक में स्थापन किया और उसी को अन्य दो