निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १८५ ) ५ अ० ४ पा० २ खं०
द्युलोकपृथ्वीलोको ! तुम दोनों ‘अस्य’ इस कूप में पड़े हुये
‘मे’ मुझ त्रित के ‘वित्तम्’ (जानीतम्) आर्त-विलाप के अभि-
प्राय को जानों और जानकर मुझे इस कूप से निकालो। इस
प्रकार यहां पर ‘अरुण’ शब्द से और ‘मासकृत्’ शब्द से ‘वृक’
चन्द्रमा है। यहां पर ‘चन्द्रमा’ के योग से ‘नक्षत्र गण’ ऊपर से
ले लिया जाता है, जिसके द्वारा ‘पथा-यन्तम्’ की आकाङ्क्षा
पूरी होती है।
आदित्य भी वृक कहलाता है। क्योंकि-वह अँधेरे को
वर्जन करता है ॥२॥
व्याख्या ।
आप्त्यत्रित ऋषि की ऐसी ही प्रार्थना पहिले भी
(अ०४पा०१खं०६) “संमातपन्ति” मन्त्र में आई है।
“अरुणो मासकृत्” मन्त्र में “सर्वः स्वार्थवशो
लोकः” ‘सब संसार स्वार्थ के वश चलता है’ इस नीतिका
स्वरूप दिखाया। तथा जैसे कालिदास के “मेघदूत”
काव्य में मेघ को उद्देश्य करके यक्षने दूत योग्य बातों को कहा
है, उसी प्रकार त्रित भी चन्द्रमा की ओर लक्ष्य करके द्यावा-
पृथिवी से उसका उपालम्भ करता है ॥
इस मन्त्र में कोई शाखा वाले “मासकृत्” के ‘मा’
‘सकृत्’ ऐसे दो पद करते हैं। उससे त्रित यह कहता है कि-
चन्द्रमा ने मुझे एक बार ही देखा। यदि बार २ देखता तो
अवश्य मुझे इस विपद् से छुड़ाता ॥२॥
२४
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ५ अ० ४ पा० ३ खं०
( खं० ३ )
(निघ०-) जोषवाकम् ॥६६॥
[निरु०-] “अजोहवीदश्विना वर्त्तिका वामास्यो
यत्सीममुञ्चतं वृकस्य ॥” [ऋ०सं०१,८,१६,१ ] ॥
आह्वयत्-उषा अश्विनौ आदित्येन अभिग्रस्ता,
ताम्-अश्विनौ प्रमुमुचतुः-इत्याख्यानम् ॥
श्वा अपि वृक उच्यते । विकर्त्तनात् ।
: ‘वृकश्चिदस्य वारण उरामथिः ।” उरणमथिः॥
‘उरणः' ऊर्णावान् भवति । ‘ऊर्णा' पुनः
वृणोतेः । ऊर्णोतेर्वा ॥
‘वृद्धवाशिनी' अपि 'वृकी '-उच्यते ।
“शतं मेषान्वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्र्धं
चकार” [ ऋ० सं०८,१८,११, १ ] इत्यपि निगमो
भवति ।
‘जोषवाकम् '-इति-अविज्ञातनामधेयम् ।
जोषयितव्यं भवति ॥ ३ [ २१ ] ॥
अर्थः- 'वर्त्तिका' वर्त्तने वाली (आदित्येन अभिग्रस्ता)
आदित्य (सूर्य) से ग्रसी हुई हुई (उषाः) उषा ने 'यत्' जब
‘अश्विना’ (अश्विनौ) हे अश्विन देवो ! ‘वाम्' तुम दोनों
को 'अजोहवीत्' (आह्वयत् ) बुलाया । तब (‘सीम्' निपात
पद पूरण) तुम ने 'वृकस्य' आदित्य के ‘आस्यः' (मुखात् )
मुख से (ताम्) उसे 'अमुञ्चतम्' (प्रमुञ्चथुः) छुड़ाया ।
हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ५ प्र० ४ पा० ३ खं०
आदित्य से ग्रसी हुई उषा ने अश्विनों को आवाहन
किया और अश्विनों ने उसे छुड़ाया यह आख्यान है । क्यों-
कि उषा का लोप आदित्य के ही उदय से होता है, इसी से
'वृक' नाम यहां आदित्य का ही हो सकता है ।
कुत्ता भी 'वृक' कहलाता है । विकर्तन ( काटने ) से ।
कुत्ते के साम्हने जो नया आदमी वा कोई प्राणी आता है,
उसे वह विकर्तन करता (काटता) है, इससे वह 'वृक' है ॥
" 'अस्य' ( इन्द्रस्य ) इस इन्द्र के यहां 'वारणः' शत्रुओं
को हटाने वाला, 'उरामथिः' (उरणमथिः) मीढों (भेड़ों) को
मन्थन करने (मारने) वाला 'वृकः श्वित्' कुत्ता भी है ॥”
'उरण' क्या ? ऊर्णावान् (ऊन वाला) होता है । 'ऊर्णा'
शब्द ढांपने अर्थ वाले 'वृञ्' (स्वा० उ०) धातु से है । क्योंकि-
जिसके वह होती है, उसे वह ढाप लेती है । अथवा आच्छा-
दन अर्थ में 'ऊर्णुञ्' (अदा० उ०) धातु से उसी कारण से ॥
वृद्धवाशिनी (जोर से शब्द करने वाली) गीदड़ी भी
'वृकी' कहलाती है । क्यों कि—वह भी विकर्तन (दंशन)
करती है ।
“शतं मेषान्वृक्ये चक्षदान मृज्राश्वं तं पितान्धं
चकार । तस्मा अक्षीनासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा
भिषजावनर्वन् ॥ ( ऋ० सं० १, ८, ११, १ )
यह ऋचा कक्षीवान ऋषि की है । अश्विनौ देवता और त्रिष्टुप्
छन्द है । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है ।
कक्षीवान् कहते हैं, कि-ऋज्राश्व नाम राज पुत्र ने प्रसन्न
होकर 'वृक्ये' गीदड़ी को उसके शब्द करने पर 'शतं' सौ
( १०० ) 'मेषान्' भेड़ें 'दानम्' दान की 'चक्षत्' आज्ञा दी
हिन्दी निरुक्त (१८६) ५ अ० ४ पा० ४ खं०
कि-इसने हमारी यात्रा में शुभ शब्द किया है। 'तम्' ऐसी
आवाज़ देनेवाले उस 'ऋज्राश्वम्' ऋज्राश्व को 'पिता' पिता
ने शापसे 'अन्धम्' अन्ध 'चकार' कर दिया कि-यह बड़ा
साहसी है। 'तस्मै' उस 'विचक्षे' चक्षुरहित (अन्धे) को 'ना-
सत्या' (नासत्यौ) अश्विनं 'भिषजौ' देवताओं के वैद्यों 'ने वे
'अक्षी' नेत्र 'आधत्तम्' दिये जो 'अनर्वन्' (अन्यत्र अनाश्रिते)
दूसरी जगह नहीं थे। इस प्रकार यहो मेष (मीढे) के सम्बन्ध
से और व्याख्यान में अर्थ के घट जाने से 'वृकी' से गीदड़ी
कही गई निश्चित होती है।
इस मन्त्र में यात्रा के समय गीदड़ी के शब्द को शुभ
शकुन बताकर शकुन शास्त्र को प्रमाणित कर दिया है। और
अनुचित उदारता की निन्दा की गई है। एवम् पुत्र पर पिता
के शासन के अधिकार की सूचना भी मिलती है॥
'जोषवाकम्' (६६) यह अनवगत है। 'अविज्ञातनामधेय' (नहीं जाने
हुए का नाम) यह अर्थ-कथन है।—
'जोषवाक' (६६) यह अविज्ञात का नाम है। क्योंकि
वह सेवन योग्य या प्रकाशनयोग्य होता है। जो किसी से
न जाने जावें, ऐसे विषय-सेवन में प्रिय होते हैं। अथवा जो
अज्ञात (नहीं जाना हुआ) है, उसी का प्रकाश भी किया
जाता है॥ ३ (२६) ॥
(खं० ४)
[निघ०] कृत्तिः ॥६७॥ श्वघ्नी ॥६८॥
समस्य ॥६६॥
(निरु०) "य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृधता वृधा ।
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ५ अ० ४ पा० ४ खं०
जोषवाकं वदतः पञ्चहोषिणा न देवा भसथश्चन ॥”
[ऋ० सं० ४, ८, २५, ४ ]
य इन्द्राग्नी सुतेषु वां सोमेषु स्तौति तस्य
अश्नीथः । अथ यः अयं जोषवाकं वदति विजल्पः
प्रार्जितहोषिणौ न देवौ तस्य अश्नीथः ॥
‘कृत्तिः’ कृन्ततेः । यशोवा । अन्नंवा ॥
“महीव कृत्तिः शरणात इन्द्र” (ऋ० सं० ६,६,
१३, ६ ) ।
सुमहत्त इन्द्र शरणम् अन्तरिक्षे कृत्तिरिव-इति ॥
इयमपि इतरा कृत्तिः, एतस्मादेव सूत्रमयी ।
उपमार्थे वा ।
❊ “कृत्तिवासाः पिनाकहस्तोऽवततधन्वा”
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘श्वघ्नी’ कितवोभवति । स्वं हन्ति, स्वं पुनः
आश्रितं भवति ॥
“कृतं न श्वघ्नी विचिनोति देवने ॥” ( ऋ०
सं० ७, ८, २४, ५ )
कृतमिव श्वघ्नी विचिनोति देवने ॥
❊ “अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः” इति पा-
ठान्तरं तच्च संहितापाठसंमतम् ।
हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ५ अ० ४ पा० ४खंड
'कितवः' किंत्तव अस्ति-इति शब्दानुकृतिः।
कृतवान् वा आशीर्नामकः ॥
'समम्' इति परिग्रहार्थीयं सर्वनाम अनुदात्तम्-
॥ ४ ( २२ ) ॥
अर्थः- "यद्वेन्द्राग्नी" यह ऋचा भरद्वाज ऋषि की है। बृहती छन्द है।
हे 'इन्द्राग्नी !' 'यः' जो यजमान 'सुतेषु' ( सोमेषु )
सोमों के निचोड़ जाने पर 'तेषु' ( कर्मसु ) उन कर्मों में 'वाम्'
( युवाम् ) तुम दोनों को 'स्ततत्' ( स्तौति ) स्तुति करता
है। हे 'ऋतावृधा !' सत्य के या जल के या यज्ञ के बढ़ाने
वाले देवो ! (तस्य ) उस के यहां 'अश्नीथः' खाते हो।
( अथ ) और ( योऽयं ) औ यह 'जोषवाकम्' गुपचुप (वदति)
बोलता है, अर्थात् ( विजञ्जपः ) केवल जल के किनारे या
अन्य किसी गुप्त स्थान में बैठा हुआ जप ही करता है, किन्तु
कर्म नहीं करता, 'तस्य जोषवाकं वदतः' उस थोथे बोलने
वाले के यहां 'पज्रहोषिणा !' ( प्रार्जितहोषिणौ ) बहुत
यज्ञों वाले 'देवा' ( देवौ ! ) हे देवताओ ! 'न' नहीं 'भस-
थश्चन' ( अश्नीथः ) खाते हो ॥ इस प्रकार इस मन्त्र में 'जिस
के यहां सोम निचोड़े जाते हैं, उसी के यहां तुम खाते हो,
किन्तु जो जोषवाक बोलता है, उस के यहां नहीं' इस सम्बन्ध
से 'जोषवाक' अविज्ञात या गुप चुप का नाम ही हो सकता
है ॥
व्याख्या ।
"यद्वेन्द्राग्नी" इस मन्त्र में यह बताया गया है कि-
जप यज्ञ से अन्न यज्ञ उत्तम है, तथा अपनी शक्ति के अनु-
हिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ५ अ० ४ पा० ४ खं०
सार अन्न से इन्द्र की पूजा करने में कोई शठता नहीं करना
चाहिए ॥
'कृत्ति' (६७) यह अनवगत और अनेकार्थ है । "कृन्तते." यह धातु का
निर्देश है । "यशः अन्नवा" यह अर्थ का कथन है । 'कर्त्तत'-इह उचित है ।
अर्थः- 'कृत्ति' (६७) छेदन (काटना) अर्थ में 'कृत' (तु०
प०) धातु से है । 'कृत्ति' नाम अथवा यश का अथवा अन्न
का है। क्योंकि यश शत्रुओं के मर्मों को काटता है। और अन्न
भी अधिक खाया हुआ आयु को नष्ट करता है ॥
हे 'इन्द्र !' मैंने 'महि' (सुमहत्) बड़े 'कृत्तिः-इव'
यश या अन्न के समान 'ते' तेरा 'शरणा' (शरणम्) घर
(अन्तरिक्षे) आकाश में (अश्रवम्) सुना है। यहां इन्द्र के
घर को कृत्ति (यश या अन्न) से उपमा दी है। क्योंकि यश
भी विस्तीर्ण (फैला हुआ) होता है और अन्न खाए हुये
को भूख नहीं सताती, उसी प्रकार इन्द्रका घर बड़ा और उस
में घुसने के पश्चात् भूख प्यास नहीं सताती इस प्रकार उपमा
की उपपत्ति होने से कृत्ति के यश और अन्न दोनों अर्थ
ठीक हैं।
यह दूसरी सूत्र (सूत) की बनी हुई 'कृत्ति' (कन्था)
भी इसी कारण से है। क्योंकि-वह सूत के टुकड़ों से गूंथी
(सीं ई) जाती है अथवा उपमा अर्थ में चर्म (चमड़ा) भी
'कृत्ति' है ।
"कृत्तिं वसान आचर पिनाकं बिभ्रदागहि"
[ य० सं० १६, ५१ ]
हे रुद्र ! 'कृत्तिम्' कन्था को 'वसानः' ओढ़ेहुए 'आचर'
आ । 'पिनाकं' अपने पिनाक नाम धनुष को 'बिभ्रत्' धारण
किये हुये 'आगहि' आ ।
हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ४पा० ४ खं०
"अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः"
( ऋ० सं० ६, ३, ४५, ५ य० वा० सं० ३, ६१ )
"धनुष् को फैलाए हुए या उसकी कमान को झुकाए
हुये पिनाक धनुष् को हाथमें लिये हुये चर्म का वस्त्र पहिने
हुये" ये दो निगम हैं ।
व्याख्या ।
इन मन्त्रोंमें देवता अपने भक्तोंके यहां वस्त्र और शस्त्र
धारण करके उनकी रक्षाके निमित्त आते हुए दिखाई देते -
हैं । नये वैदिकों को भी सगुण देवताओंकी उपासना से लाभ
उठाना चाहिए ॥
'श्वघ्नी' (६८) यह अनवगत है । "कितवाभवति"यह अर्थका कथन
है । "श्व हन्ति" यह शब्द की व्युत्पत्ति है, किन्तु स्वहा (धन या अपने
का नाश करने वाला) यह युक्त है ।-
'श्वघ्नी' (६८) कितव (ज्वारिया) होता है । क्योंकि-
यह स्व (अपने का या धन) को हनन करता है । 'स्व' फिर
क्या ? 'आश्रित' क्यों ? स्वामी को अभिमुखता से श्रयण
(धारण) किये हुये होता है ।
"श्वघ्नी" (कितवः) ज्वारिया 'न' (इव) जैसे 'देवने' जूवे
के अड्डे में 'कृतम्' कृत को 'विचिनोति' ढूंढता है कि कैसे
किया हुआ हो, जिससे मैं जीतूँ ।
'कितव' क्यों ? 'किंतवास्ति' (क्या तेरा है ?) इस शब्द
का अनुकरण है । क्योंकि-वह नित्यकाल ही खेलने की इच्छा
करता हुआ अपने सामने खेलने वाले ज्वारियों से पूछता है
कि "किंतवास्ति" इस शब्द के आधार पर यह 'कितव'
शब्द होगया। अथवा ज्वारिए के मित्रगण यह आशिष् मांगते
रहते हैं कि- “किसी प्रकार यह “कृतवान्” (कृतकार्य) सफल
हो” इस आशिष् के निमित्त ( कारण ) से 'कृतवान्' शब्द से
'कितव' नाम होगया ॥
'समम्' ( ६६ ) यह परिग्रह ( सम्पूर्ण ) अर्थ में सर्वनाम
और अनुदात्त है।
( खं० ५ )
(निरु०) “मानः समस्य दूर्ह्यः१ परिद्वेषसो अंहतिः।
ऊर्मिर्न नावमावधीत् ॥” (ऋ० सं० ६, ५, २५, ४ )
मानः सर्वस्य दुर्धियः पापधियः सर्वतोद्वेषसः
अंहतिः ऊर्मिः इव नावम्-आवधीत ।
'ऊर्मिः' ऊर्णोतेः । 'नौः' प्रणोत्तव्या भवति ।
नमतेर्वा ।
तत् कथम्-अनुदात्तप्रकृति नाम स्यात् ? दृष्ट-
व्ययंतु भवति ।
“उतोसमस्मिन्नाशिशीहि नो वसो” ( ऋ० सं०
६, २, २, ३) इति सप्तम्याम् । शिशीतिर्दानकर्मा ।
“उरुष्याणो अघायतः समस्मात्” ( य० वा० सं०
३, २६) । इति पञ्चम्याम् । उरुष्यतिः-अकर्मकः ।
अथापि प्रथमा बहुवचने- “नभन्तामन्यके समे”
( ऋ० सं० ६, ३, २६, १ ) ॥ ५ ( २३ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६४) ५ अ० ४ पा० ५ खं०
अर्थ:-“मानःसमस्य” यह ऋचा विरूप आङ्गिरस ऋषि
की है। गायत्री छन्द और अग्नि देवता है । दशरात्र के तीसरे
अहन् (दिन) में प्रातःसवन में आज्य सूक्त में विनियुक्त है ॥
हे भगवन् ! अग्ने ! ‘नः’ हमको 'समस्य' ( सर्वस्य ) सब
‘दुर्घ्यः’ (दुर्धियः) दुष्ट बुद्धिवाले या ( पापधियः) पाप बुद्धि-
वाले ‘परि-द्वेषसः’ ( सर्वतो द्वेषसः = सर्वात्मना द्वेष्टुः ) सब
प्रकार द्वेष करने वाले शत्रु का 'अंहतिः' पाप ‘ऊर्मिः’ भाल
(लहर) नावम्’ नाव को ‘न’ ( इव ) जैसे 'मा’ मत ‘अवधीत्’
मारे ॥ इस प्रकार सभी दृष्टान्तों से वध अनिष्ट होनेके कारण
‘सम’ यह सर्व-नाम है।
‘ऊर्मि’ शब्द आच्छादन (ढांपने) अर्थमें ‘उर्णुञ्’ (अदा०
उ० ) धातु से है। क्योंकि वह तीर को अथवा जो और कुछ
जलके भीतर रहता है, उसे ढँकलेती है ।
‘नौ’ ( नाव ) क्यों ? वह पार जानेके अर्थ ‘प्रणोतव्या’ प्रेरणा
करने योग्य होती है । अथवा झुकने अर्थमें ‘नम्’ (भ्वा०प०)
धातु से है। क्योंकि वह पार जाने के लिये नत ( झुकी हुई
या नम्र ) जैसी रहती है ।
वह ( 'सम' शब्द, जिसका उल्लेख पूर्व खण्ड के अन्त में
हो चुका है ) कैसे अनुदात्त प्रकृति या अनुदात्त स्वभाव या
अनुदात्तस्वरवाला ( होकर ) नाम हो या होसकता है ?
क्योंकि-दृष्टव्यय है = इस में विकार देखागया है ( इससे
यह नाम ही है, किन्तु निपात नहीं ) ।
“उतो समस्मिन्” अर्थात्-‘उतो’ और हे ‘वसो !’
धनवान् इन्द्र ! ‘समस्मिन्’ ( सर्वस्मिन् ) सब (काल) में ‘नः’
हिन्दी निरुक्त ( १६५ ) ५ अ० ४पा० ६ खं०
इमें 'आशिशीहि' वाञ्छित दे । यहां 'समस्मिन्' सप्तमी में है ।
'शिशीति' धातु दानार्थक है ।
“ उरुष्याणो ” अर्थात्—'नः' हमें'उरुष्य' पास आकर
'समस्मात्' सब 'अघायतः' पाप चाहने वाले से रक्षा कर ।
यहां ' समस्मात् ' यह पञ्चमी में है । ' उरुष्यति ' धातु
अकर्मक है ।
और प्रथमो विभक्ति के बहुवचन में भी है—
“ नभन्तामन्यके समे ” अर्थात्-और सब नहीं
यहां 'समे' यह प्रथमा के बहुवचन का रूप है । ( निरु० अ०
१० पा० १ खंड ५ ) ५ ( २३ ) ॥
( खं० ६ )
[निघ०-] कुटस्य ॥७०॥ चर्षणिः॥७१॥
शंबः ॥ ७२ ॥ केपयः ॥ ७३ ॥
(निरु०-) “हविषा जारो अपां पिपर्त्ति पपुरिर्नरा ॥
पिता कुटस्य चर्षणिः ॥ ” ( ऋ० सं०१,३,३३,४ )
हविषा अपां जरयिता ॥
'पिपर्त्ति' 'पपुरिः'-इति पृणातिनिगमो वा
प्रीणातिनिगमो वा । पिताकृतस्य कर्मणः चायिता
आदित्यः ॥
‘ शम्ब ’ इति वज्रनाम । शमयते र्वा । शात-
यते र्वा ॥
“ उग्रोयः शम्बः पुरुहूततेन ” ( ऋ०सं०७,८,
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
२३, २) इत्यपि निगमो भवति ॥
'केपयः' कपूया भवन्ति । 'कपूयम्'-इति
पुनातिकर्म कुत्सितम् । दुष्पूयं भवति ॥६ (२४) ॥
'कुटस्य' (७०) 'चर्षणिः' (७१) ये दो पद अनवगत हैं। 'कृतम्य'
(किये हुएका) (७० 'चायिता' (द्रष्ट=देखने वाला) (७१) ये उनकी शब्द-
समाधियें हैं। दोनों का एक ही निगम है।—
“हविषा जारो” यह ऋचा प्रस्कण्व ऋषि की है। अश्विनन् देवता
है। प्रातग्नुवाक और आश्विन में शस्त्र है।
अर्थः—'नरा' (नरौ') हे नरों ! अश्विनों ! यह
आदित्य 'पिता' सब जगत् की रक्षा करने वाला है। 'कुटस्य'
(कृतस्य) सब संसार के किये हुये अच्छे बुरे कर्मों का
'चर्षणिः' (चायिता) देखने वाला है। 'अपाम्' सब भूतों के
भीतर विद्यमान जलों का प्राण रूप से अवस्थित हो कर
'जारः' (जरयिता) सुखाने वाला है। 'पपुरिः' समय आने
पर पूरने वाला 'हविषा' (उदकेन) जल से 'पिपर्त्ति' पूरता
है या तृप्त करता है। अर्थात् 'जो तुम दोनों ऐसे गुण वाले
आदित्य देव से पूरे जाते हो या तृप्त किये जाते हो, सो तुम
दोनों हमारी आशिषा (प्रार्थना) को बढ़ाओ या पूरी करो'
ऐसे यहां आशिषा जोड़ लेना होता है। इस प्रकार 'कुट'
शब्द का कृत और 'चर्षणि' का चायिता (द्रष्टा) अर्थ
उपपन्न होता है॥
'पिपर्त्ति' और 'पपुरिः' ये निगम के दोनों शब्द 'पूरयति'
(पूरण करता है) अर्थ में हैं अथवा 'प्रीणायति' (तृप्त या
प्रसन्न करता है) अर्थ में हैं।
हिन्दी निरुक्त ( १९७ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
'शम्ब' (७२) यह वज्र का नाम है । शमयति धातु का
अथवा शातयति धातु का है । (क्यों कि वह जिस पर छोड़ा
जाता है, उसका शमन कर देता है, या शातन (छेदन) कर
देता है) ।
'हे 'पुरुहूत' बहुतों से आवाहन किये जाने वाले! 'उग्रः'
कठोर 'यः' जो 'शम्बः' वज्र है, 'तेन' उस से (शत्रुओं को
मार ) यह भी निगम है ।
यहां मारने के सम्बन्ध से 'शम्ब' नाम वज्र का सिद्ध
होता है । यह वज्र के नामों में पढ़ा हुआ नहीं है, इस से
यह अप्रसिद्ध अर्थ वाला है, उस की इस प्रकार प्रकरण से
अर्थ सिद्धि होती है ।
'केपयः' (७३) यह अनवगत है । 'कपूय' (बुरे कर्म) होते हुए 'केपि'
कहे जाते हैं । -
'केपि' कपूय होते हैं । 'कपूय' क्या ? इस में 'पुनाति'
( क्रया० उ० ) धातु की क्रिया (पवित्र करना ) है । वह
क्या ? कुत्सित । क्यों ? वह दुष्पूय (धोना कठिन ) होता है
अथवा जो कोई पाप करने वाला प्रायश्चित्त करके कुत्सित
(बुरे) कर्म को धोता है, वह कपूय होता है । वही केपि है ।
॥ ६ ( २४ ) ॥
( खं० ७ )
(निघ०) तृतुमाकृषे॥७४॥ असतम्॥७५॥
(निरु०) “पृथक्प्रायन्प्रथमा देवहूतयोऽकृण्वत श्रव-
स्यानिनुष्टरा । नये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहर्ममैव
न्तेप्रविशन्तकेपयः ॥” [ऋ० सं० ७,८,२७,१] ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं० ५
पृथक् प्रायन् । ‘पृथक्’ प्रथतेः । प्रथमा देव-
हूतयः ये देवान् आह्वयन्त, अकुर्वत श्रवणीयानि
यशांसि दुरुनुकराणि अन्यैः, येऽशक्नुवन् यज्ञियां
नावम्-आरोढुम् । अथ ये न अशक्नुवन् यज्ञियां
नावम्-आरोढुम्, “ईमैवैत न्यविशन्त” इहैव ते
न्यविशन्त । ऋणेहैवते न्यविशन्त । अस्मिन्नेव
लोके इतिवा ॥
‘ईर्म’ इति बाहुनाम । समीरिततरो भवति ॥
“एता विश्वा सवना तूतुमाकृषे स्वयं सूनो
सहसो यानि दधिषे ॥” [ऋ० सं० ८, १, ९, ६]
एतानि सर्वाणि स्थानानि तूर्णमुपाकुरुषे, स्वयं
बलस्य पुत्र यानि धत्स्व ॥
‘अंसत्रम्’ अहमस्त्राणम् । धनुर्वा । कवचंवा ।
‘कवचं’ कुआञ्चितं भवति । काञ्चितं भवति । काये
अञ्चितं भवति, इतिवा ॥ ७ [२५] ॥
“पृथक्प्रायन्” इस ऋचा का कृष्ण आंगिरस ऋषि, जगती छन्द और मा-
ध्यन्दिन सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनियोग है ।
अर्थः- हे इन्द्र ! तेरे प्रसाद से ‘प्रथमाः’ पहिले वाले या
मुख्य ‘देवहूतयः’ देवताओं को कर्मों में बुलाने वाले (यजमान)
‘पृथक्’ अलग ( औरों से ) देवयान या पितृयान ( मार्ग ) से
‘प्रायन्’ गए हैं । और वे ‘अवस्यानि’ ( श्रवणीयानि ) सुनने
योग्य (यशांसि) यशों को जो ‘दुष्टरा’ ( अन्यैः दुरुनुकराणि )
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
औरों को कठिनता से अनुकरण करने योग्य हैं, 'अकुर्वत'
( अकुर्वत ) कर गये हैं । कौन ? 'ये' जो 'यज्ञियाम्' यज्ञकी
'नावम्' नावको 'आरुहम्' (आरोढुम्) चढ़ने में शेकुः' (अश-
क्नुवन्) समर्थ हुये । ( अथ ) और 'ये' जो 'यज्ञियां नावम्-
आरोढुम् न शेकुः (अशक्नुवन्)' यज्ञ की नाव पर (तेरे
प्रसाद के बिना या विषयों में आसक्त होने के कारण) चढ
न सके, “ईर्म-एव ते (केपयः) न्यविशन्त” ( इह एव
ते (कपूयाः) न्यविशन्त ) उन दुराचारियों ने इसी में वास
(प्रवेश) किया है, अर्थात् 'ते' वे (ऋणो हैव न्यविशन्त) तेरे
ऋण में (ऋणी) ही रहे। या (इहैवान्तीके) इसी लोक में रहे,
किन्तु तेरे दिव्यलोक में न जा सके।
'ईर्म' यह बाहु का नाम है । क्यों कि-वह समीरितातर
या अन्य अङ्गों की अपेक्षा कर्मों में बहुत अधिक प्रेरित
होता है ॥
यह शब्द की समानरूपता के कारण दूसरा अर्थ कहा
गया है ॥
ऊपरके मन्त्रमें दिखाया कि-दिव्य लोकोंकी प्राप्ति यज्ञ
से होती है और यज्ञ न करने वाले इस लोक में कूकूर शूकर
होकर पड़े रहते हैं। इसी में लोकान्तर और उनकी उत्तम
कर्म से प्राप्ति भी कही गई होती है ।
'तूतुम्'-'आकृषे' (७४) ये दो अनवगत पद है। 'तूतुम्' की 'तूर्णम्' और
'आकृषे' की 'उपाकुरुषे' शब्द-समधि है।
“एताविश्वा सवना तूतुमाकृषे स्वयं सूनो ! सहसो
यानि दधिषे । वराय ते पात्रं धर्मणे तना यज्जो
मन्त्रो ब्रह्मोद्यतं वचः । [ऋ० सं० ८, १, ९, ६]
हिन्दी निरुक्त ( २०० ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
“इन्द्रवैकुण्ठ ऋषि, इन्द्रदेवता के सूक्त में निविद्धानीय महाव्रत
महदुक्थ शस्त्र में शस्त्र है।
‘सहसः’ ( बलस्य ) ‘सूनो’ हे बलकेपुत्र ! तू ‘यानि’
जिन को ‘दधिषे’ ( धत्स्व = धत्से ) धारण करता है, ‘एता’
( एतानि ) इन ‘विश्वा’ (विश्वानि.) सब ‘सवना’ ( सव-
नानि = स्थानानि ) स्थानों को ‘स्वयम्’ आप ‘तूतुम्’ (तूर्णम्)
शीघ्र ‘आकृषे’ (उपाकुरुषे) उस २ रूप से वहां प्राप्त होकर बना
लेताहै। इससे ‘ते’तुझ ‘वराय’ श्रेष्ठ‘धर्मणे’ धारण करनेवालेकेलिये
‘पात्रम्’ यह सोमरसका भराहुआ पात्र है। ‘तना (धनम्) धन
सब तेरा ही है। ‘यज्ञः सब यज्ञ तेरा ही है। ‘मन्त्रः’ कर्म
का साधन मन्त्र तेरा ही है। ‘ब्रह्म’ अन्न सब तेरा ही है।
‘उद्यतम्’ जो कुछ इस समय प्रस्तुत ( तैयार ) है, सब तेरा ही
है। ‘वचः’ स्तुति रूप वाणी तेरी ही है। ( इसका स्पष्ट रस
“ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितम् ”
इस पुराण वाक्य में बहुत सरलता से अनुभूत हो जाता है ।)
यहा पर “तुतुम्” शब्द समान रूपताके कारण ‘तूर्णम्’
का ही सिद्ध होता है। और करनेके सम्बन्ध से भी । क्योंकि
जो कर्त्तव्य होता है, उसका शीघ्र ही करना इष्ट होता है।
“आकृषे” पद में भी जो किया जाता है, वह पास जाकर
ही किया जाता है, इस लिये भाष्यकार ने ‘उप’शब्द ( समी-
पवाचक ) अध्याहार किया है।
कोई आचार्य इस मन्त्र को अग्नि देवता का मानकर
व्याख्यान करते हैं किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि-यह मन्त्र
.“प्रवोमहे” सूक्त का है, और वह सूक्त इन्द्र का ही है, इस
लिये अग्नि का मानने से प्रकरण विरोध होगा।
हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) ५ अ० ४ पा० ८ खं०
'अंसत्रम्' (७५) यह अनवगत है । विकल्प से अनेकार्थ है । "अंहसः
त्राणम्” ( पाप से रक्षा करने वाला ) यह शब्द समाधि है । “धनुर्वा कवचं
वा” (धनुष अथवा कवच) यह अर्थ-कथन है । क्यों कि-उन दोनों से योद्धा
साम्ग्रामिक (सग्राम के) अंहस् (कष्ट) मे अपनी रक्षा करते हैं ।
अंसत्र ( ७५ ) क्या ? अंहस् ( कष्ट) से त्राण ( रक्षा )
करने का साधन । वह क्या ? अथवा धनुष् अथवा कवच ।
'कवच' क्यों ? वह 'कु' (कुटिल) 'अञ्चित' (खिँचा हुआ)
रहता है, अथवा कुछ कुटिल खिंचा हुआ रहता है । अथवा
शरीर में अञ्चित पूजित या गया हुआ होता है ॥ ७ (२५) ॥
( खं० ८ )
(निघ०-) काकुदम् ॥ ७६ ॥
(निरु०-) “प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं
रथमित्कृणुध्वम् । द्रोणाहावमवत मश्मचक्र मंसत्र
कोशंसिञ्चता नृपाणम् ॥” ( ऋ० सं० ८, ५, १९, १ ]
प्रीणीत अश्वान् सुहितं जयथ, जयनं वो
हितमस्तु, स्वस्तिवाहनं रथं कुरुध्वं, द्रोणाहावम् ।
'द्रोणं' द्रुममयं भवति ।
'आहावः' आहानात् । 'आवहः' आवहनात्
'अवतः' अवातितो महान् भवति । 'अश्मचक्रम्'
अशनचक्रम् । असनचक्रमितिवा । 'अंसत्रकोशम्'
"अंसत्राणि" वः कोशस्थानीयानि सन्तु । 'कोशः'
कुष्णातेः । विकुषितो भवति ॥
हिन्दी निरुक्त ( २०२ ) ५ अ० ४ पा० ६ खंड
अयमपि इतरः कोशः एतस्मादेव । संचयः ।
आचितमात्रो महान् भवति । सिञ्चत नृपाणम् ।
नरपाणं कूपकर्मणा संग्राममुपमिमीते ॥
'काकुदं' तालु इत्याचक्षते । जिह्वा 'कोकुवा'
सा अस्मिन् धीयते । 'जिह्वा' कोकुवा । कोकूय-
माना वर्णान्नुदति-इति वा। कौकूयते वा स्यात्
शब्दकर्मणः ।
'जिह्वा' जोहुवा । 'तालु' तरतेः । तीर्णतमम्
अङ्गम्। लनते र्वा स्यात् लम्बकर्मणो विपरीतात्,
यथा 'तलं'। 'लता'-इति-अविपर्ययः ॥ ६ (२६) ॥
“प्रीणीताश्वान्” ऋचा का सोम का पुत्र बुध ऋषि है।
विश्वेदेव देवता है।-
अर्थः- (हे विश्वेदेवाः !) सब देवताओं ! 'अश्वान्'
इन अपने घोड़ों को 'प्रीणीत' घास दाणा आदि से तृप्त करो
प्रयोजन यह कि-'यह संग्राम उपस्थित है। इन अश्वों को
पुष्ट तथा बलयुक्त करके इनसे 'हितम्' (सुहितम्) सुन्दर हित
रूप 'जयथ' (जयथ) जय प्राप्त करो । 'हित' विशेषण से
प्रयोजन यह है कि-कोई अहित जय भी होता है,जिसमें कि-
सुहृदों (मित्रों) भाइयों और पुत्र आदिकों का वध हो जैसा
कि-कौरव पाण्डवों का महाभारत में हुआ । अर्थात्-(जयनं वः
हितम् अस्तु) तुम्हारा जय हित हो । 'स्वस्तिवाहम्' (स्वस्ति-
वाहनम्) बड़े उत्तम घोड़ों वाला 'रथम्' रथको 'कृणुध्वम्'
हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) पृ० ४ पा० ८ खं०
( कुरुध्वम् ) करो । 'द्रोणावहम्' ( द्रोणं द्रुमयं भवति ) द्रोण
यं काठके बने हुए इस रथको 'आवह' युद्ध के योग्य बनाकर
'अवतम्' इस संग्राम रूप कूप को 'अंसत्र कोशम्' अंसत्र
नाम धनुषों का अथवा कवचों का कोश ( खजाना ) हो, ऐसे
'सिञ्चत' सींचो । जो संग्राम कूप 'नरपाणम्' नर-पाण है, या
जिस में नर ( मनुष्य ) ही जलके समान भरे आते हैं, जो
'अश्म चक्रम्' अश्मचक्र है, या जिसमें चक्र व्याप्त रहते हैं,
अथवा फेंके जाते हैं ॥
'आवह' (युद्ध) आवाहनसे है । क्योंकि-उसमें एक योद्धा
प्रतियोद्धा को आवाहन करता है । 'आवह' ( वाहन ) आव-
हन ( ले चलने ) से है, क्योंकि-वह अपने स्वामी को अपने
ऊपर चढाकर स्थानान्तर में ले जाता है ।
'अवत' ( कूप ) क्यों ? वह 'अवातित' या खोदा जाता
हुआ (अव) नीचे को ही ( अतित ) गया हुआ महान् होता
है । 'अश्मचक्र (युद्ध) क्यों ? वह अशनचक्र होता है, या उस
में फेंके हुए अस्त्र व्याप्त रहते हैं । अथवा वह असन चक्र होता
है, या उसमें चक्र फेंके जाते हैं । प्रायः 'अश्मचक्र' यह अवत
(कूप) का विशेषण भी हो सकता है । क्योंकि-वह अश्म
( पत्थर ) का चक्र (गोल) जैसा बना हुआ होता है । 'अंसत्र-
कोशम्' अंसत्र (धनुष् या कवच) तुम्हारे कोश के स्थान में
हों । 'कोश' (म्यान) कोषणा ( गोदने ) अर्थ में 'कुष' ( क्रया०
प० ) धातुसे है । क्योंकि-वह अनेक प्रकार से गुदाहुआ होता
है । चर्म का सिला हुआ होता है ॥
यह भी दूसरा कोश ( द्रव्य का घर ) इसी 'कुष्' धातु से
है । वह 'संचय'-या महान् ( बड़ा ) 'आचित मात्र' ( जिसमें
हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
मात्राएँ आश्रित ( भरी हुईं ) हों ) होता है ।
ऋचाके उत्तरार्द्ध में कूप ( कूएं ) के कर्म से संग्राम को
उपमा देता है ॥
'काकुद्' (७६) यह अनवगत है ।
'काकुद्' को तालु (तालुवा) ऐसा कहते हैं। वह 'काकुद्'
क्यों है ? कोकुवा जिह्वा होती है, वह इसमें धारण की जाती
है । जिह्वा 'कोकुवा' क्यों कहलाती है ? वह कोकूयमान ( कू-
कती हुई ) वर्णों (अक्षरों) को प्रेरित करती है । अथवा शब्द
अर्थ में 'कु' ( यङन्त ) धातु से है ।
'जिह्वा' क्यों ? वह जोहुवा है, या उससे प्राणी आत्मा
में अन्न का होम करते हैं । अथवा उससे दूसरे को आवाहन
करते हैं । इस से वह जिह्वा है ।
'तालु' कैसे ? 'तृ' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्यों कि-
वह अन्य अङ्गोंसे विस्तृत होता है । अथवा लम्बन (लटकने)
अर्थ में 'लत' (भ्वा० प०) धातुके विपरीत (उलटे) रूप से है ।
जैसे 'तल' शब्द । 'लता' शब्द उसी 'लत' धातु के सीधे रूप
से होता है ॥ ८ ( २६ ) ॥
( खं० ६ )
[निघ०-] वीरिंटं ॥ ७७ ॥
(निरु०) " सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः ।
अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥" ( ऋ०
सं० ६, ५, ७, २)
सुदेवः त्वं कल्याणदानः, यस्य तव देव सप्त सि-