निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ५ अ० ३पा० १ खं०
'अप्सः' यह रूप का नाम है । 'अ-प्सा' ( निषेधार्थक 'अ'कार
पूर्वक 'प्सा' भक्षणार्थक ( अदा० प० ) धातु ) का है क्योंकि-
वह अप्सानीय या अभक्षणीय ( नहीं खाने योग्य ) है । क्यों ?
आदर्शनोय है, अर्थात्-साम्हने से खड़ा होकर नेत्र से देखने
योग्य ही है, किन्तु मुख से खाने योग्य नहीं । अथवा वह
स्वयम् प्रकाश-स्वभाव होने से किरणों से व्यापने योग्य नहीं
है । “देखने के लिये स्पष्ट (प्रकट) ही होता है”-यह शाकपूर्णि
आचार्य मानते हैं ।
जिससे कि-मन्त्रों में 'अप्सः' यह शब्द अभक्ष्य का
वाचक देखा गया है, इससे ठीक कहा है कि-“अपिवा अ-
प्स इति रूपनाम” क्योंकि-“अप्सोनाम” इस मन्त्र में
यह व्यापी या व्यापक का नाम है ॥ ( न्याय शास्त्र में भो
रूप को व्याप्यवृत्ति या अपने आधार में व्यापकर रहने वाला
गुण माना है । ) ॥
इस प्रकार 'अप्सरा' शब्द के 'अप्स' भाग की व्याख्या
हुई अब 'रा' भाग की व्याख्या करते हैं-
“तद्रा भवति रूपवती ” 'र' का यहां मतुप्प्रत्यय
के समान अर्थ है, अर्थात् 'वाला' । इससे 'तद्रा' उस ( रूप )
वाली या 'अप्स' वाली होनेसे 'अप्सरा' है । अर्थात् रूपवाली
अथवा 'रा (अदा०प०) धातु है, उसके योगसे 'अप्सरा' शब्द
होता है-अर्थात् 'अप्स' ( रूप ) को 'रा' ग्रहण करने वाली
होने से 'अप्सरा' है । अथवा विधाताने इसे 'अप्स' ( रूप )
'रा' दिया है. इससे यह 'अप्सरा' है ।
उस के दर्शन से मित्रावरुण देवताओं का वीर्य झरगया
था, उसको कहने वाली यह ऋचा है- ॥ १ ( १३ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६५ ) ५ अ० ३ पा० २ खं०
( खं० २ )
(निघ०-) वयुनम् ॥ ४८ ॥
[निरु०] “उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या
ब्रह्मन्मनसोऽधिजातः। द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन
विश्वेदेवाः पुष्करेत्वाऽददन्त ॥” [ ]
अप्यसि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्! मनसो
ऽधिजातः, द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन ।
द्रप्सः संभृतः । प्सानीयोभवति । सर्वे देवाः
पुष्करे त्वा अधारयन्त ॥
‘पुष्करम्’ अन्तरिक्षम् । पोषति भूतानि ।
उदकं पुष्करम् । पूजाकरम् पूजयितव्यम् । इद
मपि पुष्करम्-एतस्मादेव । ‘पुष्करं’ वपुष्करंवा ।
पुष्पं पुष्पतेः ॥
‘वयुनं’ (४८) वेतेः । कान्तिर्वा । प्रज्ञा
वा ॥ २ (१४) ॥
“उतासि” यह ऋचा पुत्रसहित वसिष्ठ की आर्ष है, और उसी की अथवा
इन्द्र की स्तुति है ।
अर्थः-हे ‘वसिष्ठ!’ ‘उत’ (अपिच) और भी (त्वम्)
तू ‘मैत्रावरुण’ मित्रावरुण देवताओं का पुत्र है । किससे ?
‘उर्वश्याः’ उर्वशी अप्सरासे । क्या संघर्ष या मैथुन से ? हे
‘ब्रह्मन्’ ‘मनसः ‘अधिजातः’ मनसे हुआ है । क्या निर्बीज ?
‘द्रप्सं-स्कन्नम्’ वीर्य (मित्रावरुणों का) गिरा, (उर्वशीके दर्शन
से ।) 'दैव्येन' देवताओं की निजकी वस्तु 'ब्रह्मणा' ऋग्यजुः,
साम-रूप वेदसे स्तुति करते हुए 'विश्वे-देवाः' सब देवताओं
ने (यह वीर्य पृथ्वी में न गिरे इस लिये) 'त्वा' तुझे (उस
वीर्य के साथ) 'पुष्करे' (घड़े के ऊपर) जल या अन्तरिक्ष
में 'अददन्त' धारणकिया ।
'द्रप्स' वीर्य क्यों ? 'द्रप्स' कहलाता है । 'द्रप्स' क्या !
'रेतस्' संज्ञक रस पुरुष के सब अङ्गोंसे संभृत या इकट्ठा
किया हुआ होता है। अथवा 'क्षानीय' या स्त्रीयोनिका भक्ष-
णीय है। इस प्रकार 'द्रप्स' शब्द भरणार्थक भृञ् (स्वा०उ०)
धातु से या भक्षणार्थक 'प्सा' (अदा० प०) धातु से है।
'पुष्कर' अन्तरिक्ष होता है। क्यों कि-वह भूतों (प्राणि-
ओं) को अवकाश दान से पोषण करता है। अथवा उदकं
(जल) पुष्कर होता है। क्योंकि-उससे पूजा की जाती है, इस
से 'पूजाकर' होने से 'पुष्कर' है। अथवा स्वयम् (आप ही)
पूजनीय होने से पुष्कर है। यह पुष्कर (कमल) भी इसी से
है। क्यों ? पुष्कर कहलाता है, वह भी पूजाकर (पूजा का
साधन) या स्वयम् सुन्दर होने से पूजनीय है। अथवा 'वपु-
ष्कर' होने से पुष्कर है। क्यों कि-व्यवहार में लाने पर भी
वपुष् (शरीर) वान् हो रहता है।
'पुष्प' शब्द 'पुष्प' फूलने अर्थ में (दि० प०) धातु से है।
क्योंकि-वह फूलता है।
'वयुन' (४८) शब्द अनैकार्थ और अनवगत है। 'वी'
(अदा० प०) धातु से है। 'वेन' यह न्याय्य है। कान्ति
अथवा प्रज्ञा (बुद्धि) अर्थ है ॥ २ (१४) ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ५ अ० ३ पा० २ खं०
व्याख्या ।
“उतासि” ऋचा में वसिष्ठ के जन्म के साथ ‘उत’ (भी) पद
लगाया है, जिससे वसिष्ठ के नीचे वाली ऋचा में वर्णन किये
हुए और दो जन्मों की सूचना होती है ।
“विद्युतो॒ ज्योतिः॒ परिसं॒जिहा॑नं मित्रा॑वरुणा॒
यदप॑श्यतां त्वा । तत्ते॒ जन्मोंतै॒कं व॑सिष्ठाग॒स्त्यो॒ यत्
त्वा॒ विश॑ आजभा॒र (ऋ० सं० ५, ३, २३, ५ )
अर्थात् हे ‘वसिष्ठ!’ ‘यत्’ जो ‘मित्रावरुणा’ (मित्रावरुणौ)
मित्रावरुण देवताओं ने ‘विद्युतः’ विशेष रूप से देदीप्यमान
( चमकीली ) उर्वशी से ‘परि-संजिहानम्’ चारों ओर फैलती
या उत्पन्न होती हुई ‘ज्योतिः’ ज्योति को (ज्योति के रूप से)
‘त्वा’ तुझे ‘अपश्यताम्’ देखा, ‘तत्’ वह ‘ते’ तेरा ‘एकम्’ एक
‘जन्म’ जन्म है । ‘उत’ और ‘अगस्त्यः’ अगस्त्य ‘यत्’ जो
‘त्वा’ तुझे ‘विशः’ ( मनुष्यान् ) मनुष्यों के प्रति ‘आजभार’
( आहृतवान् ) लाया, यह तेरा दूसरा जन्म है ॥
इस प्रकार “उतासि” और “विद्युतः” इन दोनों
मन्त्रों में वसिष्ठ जी के तीन जन्म बताए गए हैं । पहिला
जन्म–उर्वशी से निकली हुई ज्योति मित्रावरुण देवताओं को
दिखाई दी । दूसरा जन्म–अगस्त्य के द्वारा मनुष्य जाति में
है, इसमें यह नहीं प्रतीत होता कि–यह मैथुनजन्म है या
अमेथुन ? और तीसरा जन्म–उर्वशी के दर्शन से मित्रावरुण
देवताओं का वीर्य गिरता हुआ सब देवताओं ने देखा और
उसे मन्त्रों के द्वारा स्तुति करके जल या अन्तरिक्ष में रखा ।
यहां जो तीसरा जन्म है, उस से मन्त्र के आधिभौतिक
अर्थ के पक्ष में एक ऐसे विज्ञान की सूचना भी मिलती है,
जिसमें गर्भाशय से अन्यत्र भी वीर्य रक्षित हो कर शरीर को
उत्पन्न कर सकता है, अस्तु, अमेथुन सृष्टि पर अविश्वास करने
वाले वैदिक इस पर ध्यान देवें । पुराणों में भी वसिष्ठ जी की
उत्पत्ति उर्वशी से कही गई है, वह भी प्रपृच्छ है ।
मन्त्रों का विषय अनेक प्रकार का होता है-यहाँ पर
“उतासि” मन्त्र का वसिष्ठ ही ऋषि (वक्ता) है, और उसी
के लिये 'असि' यह मध्यम पुरुष या 'युष्मद्' (तू) शब्द है,
यह परस्पर विरुद्ध है, कि-वही वक्ता और वही श्रोता ?
किन्तु मन्त्र नित्य हैं, इन में यह दोष नहीं है, वास्तव में
कोई श्रोता और वक्ता हो तो यह दोष आसकता है । किसी
बात को किसी तरह भी कहने में वेद स्वतन्त्र है अथवा स्वयम्
पुरुष भी अपने आपे को कभी कुछ कहने लगता है, उसी
प्रकार यह मन्त्र भी है ॥ २ (१४) ॥
(खं० ३)
(निघ०-) वाजपस्त्यम्॥४६॥ वाजगन्ध्यम्
॥५०॥ गध्यम् ॥ ५१ ॥ गधिता ॥ ५२ ॥
कौरयाणाः ॥ ५३ ॥ तौरयाणाः ॥ ५४ ॥
अह्रयाणाः ॥ ५५ ॥ हरयाणाः ॥ ५६ ॥
आरितः ॥ ५७ ॥ ब्रन्दी ॥ ५८ ॥
(निरु०-) “स इत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुन-
वच्चकार । (ऋ० सं० ४, ६, ११, ३)
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
सतमः अञ्जानं ततन्वत् सतं सूर्येण प्रज्ञानवत्
चकार ॥
'वाजपस्त्यं' वाजपतनम् ।
“सनेम वाजपस्त्यम् ” (ऋ०सं० ७, ४, २४, ६)
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘वाजगन्ध्यम्’ गध्यत्युत्तरपदम् ।
“अश्याम वाजगन्ध्यम्” (ऋ०सं० ७,४,२४,६)
इत्यपि निगमो भवति ॥
'गध्यं' गृह्णातेः ।
“ऋज्रावाजं न गध्यंयुयूपन् ” (ऋ०सं० ३, ५,
१९, १) इत्यपि निगमो भवति ॥
गध्यति र्मिश्रीभावकर्मा ।
“आगधिता परिगधिता” (ऋ० सं० २, १,
११, ६) इत्यपि निगमो भवति ॥
'कौरयाणः' क्रुतयानः ।
“पाकस्थामा कौरयाणः” (ऋ०सं० ५,७,२९,१)
इत्यपि निगमो भवति ॥
'तौरयाणः' तूर्णयानः ।
“सतौरयाण उपयाहि यज्ञं मरुद्भि रिन्द्र
सखिभिः सजोषा ” [ ऋ० सं० ]
२२
हिन्दी निरुक्त ( १७० ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
इत्यपि निगमो भवति ॥
'अह्रयाणः' अह्हीतयानः ।
“अनुष्ठयाकृण्वद्यह्रयाण” (ऋ०सं०३,४,२५,४)
इत्यपि निगमो भवति ॥
'हरयाणः' हरमाणयानः ।
“रजतं हरयाणे” ( ऋ० सं० ६, २, २५,, २ )
इत्यपि निगमो भवति ॥
“य आरितः कर्मणि कर्मणि स्थिरः” (ऋ०सं०
१, ७, १२, ४ ) । प्रत्युतः स्तोमान् ॥
'बन्दी' बन्दते मृदुभावकर्मणः- ॥ ३ [१५] ॥
अर्थः—हे भगवन् ! इन्द्र! जैसा कि-हम तुझे वर्णन कर
चुके हैं 'सः' सो तूने इत् ( एतत् ) इस ' अवयुनम् ' अज्ञान
रूप 'तमः' अँधेरे को 'ततन्वत्' फैलाया । 'सः' सो तूने ही
'तम्' उस (इस) लोक को 'सूर्येण' सूर्यरूप अपने प्रकाश से ' व-
युनवत्' ( प्रज्ञानवत् ) ज्ञानयुक्त 'चकार' किया। इस प्रकार
इस मन्त्र में ' तम फैला कर सूर्य से वयुनवत् करता है, इस
सम्बन्ध के द्वारा 'वयुन' शब्द प्रज्ञान ( प्रकाश ) का वाचक
होता है ॥
' वाजपस्त्य ' ( ४६ ) क्या ? वाजपतन । वह क्या ?
जिस पर वाज ( अन्न ) समझ कर देवता पतन करें ( गिरें) ।
' हम ' वाजपस्त्यम् सोम को ' सनेम ' भजें '—यह भी
निगम है ।
'वाजपस्त्य'-देवता लोग सोम को अपना वाज ( अन्न)
हिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
समझ कर उस पर पतन ( गमन ) करते हैं, इसी से सोम
वाजपस्त्यं है। इस प्रकार शब्दकी समानता और अर्थ की
उपपत्ति होने से यहां 'वाजपस्त्य' नाम सोम का है।
'वाजगन्ध्य' (४८) इसमें 'गध्' (दि०प०) धातु उत्तरपद है-
'वाज' शब्द और 'गध्' धातु के मेल से है।
यह शब्द भी पूर्वोक्त "सनेम वाजपस्त्यम्” निगम का ही है, केवल
भेद यह है कि-मन्त्र मे समाम्नाय के क्रमकी अपेक्षा विपरीत क्रम से आता
है । "वाजपस्त्यम्" (४६) "वाजगन्ध्यम्" (५०) यह समाम्नाय ( निघण्टु )
का क्रम है, और निगम में-"अश्याम वाजगन्ध्य, सनेम वाजपस्त्यम्" (ऋ०सं०
७, ४, २४, ६) अर्थात्-"हम 'वाजगन्ध्यम्' वाज ( अन्न ) की गन्ध वाले
(सोम) को पावें, हम वाजपस्त्य ( जिसे देवता अपना अन्न समझ कर पाते
है, ) को भजें" यह क्रम है । अतः समाम्नाय ओर निरुक्त के आचार्य का भेद
अभेद का यह भी विचार स्थल है । देखो चतुर्थाध्याय की भूमिका ॥
“अश्याम वाजगन्ध्यम्” (हम) 'वाजगन्ध्यम्' सोम
को 'अश्याम' भजें । यह भी निगम है ॥
'गध्य' (५१) यह शब्द अनवगत है । ग्रहणार्थक 'ग्रह'
(क्र्या० उ०) धातु का है । (ग्रहणीय ( ग्रहण करने योग्य )
यह अर्थ की प्रतीति है ।)
“हे इन्द्र ! युद्ध में शत्रुओंके समान अपनेको “युयूषन्”
भिड़न्त करने की इच्छा करता हुआ “ऋज्रा” सीधे राह से
“वाजे-न” अन्न के समान 'गध्यम्' ग्रहण-योग्य वस्तु को
सम्मुख भाव से भज" यह भी निगम है ॥
'गधिता' (५२) शब्द में 'गध्' (दि०प०) धातु अप्रतीतार्थ है । इस
का अर्थ जान नहीं पड़ता । सो मिश्रीभाव अर्थ में है । मिश्रीभाव मिलाने
का नाम है ।
हिन्दी निरुक्त ( १७२ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं०
'गध्यति' ( 'गध्' दि० प० ) धातु मिश्रीभाव (मिलाने)
अर्थ में है ।
"आगधिता" सम्मुखता से पकड़ी हुई "परि-
गधिता" (परिष्वक्ता) दोनों भुजाओं से सुख से लिपटाई
हुई । यह भी निगम है ॥
यहां मैथुन के संबन्ध से और शब्द की समानतासे 'गध्'
धातु का मिश्रीभाव या मिलाना अर्थ है ।
'कौरयाण' (५३) क्या ? कृतयान वह क्या किया
हुआ यान ।
“यं मेदुरिन्द्रो मरुतः पाकस्थामा कौरयाणः ।
विश्वेषां त्मना शोभिष्ठमुपेव दिवि धावमानम् ॥
( ऋ० सं० ५, ७, २९, १ )
मेधातिथि कण्व ऋषि की यह ऋचा है । इससे आकाशयान की
प्रशंसा की है ।
'यम्' जो यान 'मे' मुझे 'इन्द्रः' इन्द्र ने और 'मरुतः'
मरुतों ने 'दुः' दिया है, वह 'पाकस्थामा' बड़ा पक्का (दृढ)
है, 'कौरयाणः' अनेक सुधारों से सत्कार किया हुआ है,
अतएव 'विश्वेषाम्' सब यानों के मध्य में 'त्मना' अपने स्व-
रूप से 'शोभिष्ठम्' बहुत सुन्दर (अनेक रत्नों से चित्र विचित्र)
और 'दिवि' आकाश में 'उपधावमानम्' दौड़ने वाला है ॥
यह भी निगम है ।
'तौर्याण (५४) क्या ? तूर्णयाम वह क्या ? शीघ्र चलने
वाले यान वाला
“ हे इन्द्र ! 'सः' सो तू 'मरुद्भिः' 'सखिभिः' मरुत् सखा-
हिन्दी निरुक्त ( १७३ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० '
ओं सहित 'सजोषः' प्रसन्न होता हुआ 'तौर्याणः' अपने यान
(विमान) को दौड़ाता हुआ 'यज्ञम्' हमारे यज्ञ को 'उप-
याहि' आ ॥ यह भी निगम है ॥
'अह्रयाण' ( ५५ ) क्या ? अह्रीतयान वह क्या ? अल-
ज्जितयान=दूसरे यान से न लज्जित होने वाला यान ।
“ हे अग्ने ! 'अनुष्ठुया' (अनुष्ठानेन) कर्मसे वह ‘कृणुहि'
कर, जो हम चाहते हैं। हे 'अह्रयाण' ! अलज्जित-यान (नहीं
लज्जित होने वाले यान वाले ! ) ” यह भी निगम है ॥
'हरयाण' (५६) क्या ? हरमाण-यान वह क्या ? जिस
का यान सदा चलता ही रहे ।
“ ऋज्र मुक्षण्यायने रजतं हरूयाणे ।
रथं युक्त मसनाम सुषामणि” (ऋ०सं० ६,२,२५,२)
विश्वमना वैयश्वः ऋषि की यह ऋचा है। उष्णिक् छन्द है। इससे
यान की स्तुति की जाती है। वह कहता है—
“ हमने 'हरयाणे' नित्य चलू यान वाले 'सुषामणि'
सुन्दर सामवेद वाले 'उक्षण्यायने' 'उक्षणयायन' नाम वाले
यजमान में (से) 'ऋज्रम्' सीधा चलने वाला 'रजतम्' चांदी
का 'रथम्' रथ 'युक्तम्' घोड़ोंसे जुड़ाहुआ (असनाम) पाया । ”
यह भी निगम है।
यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से
"हरयाण" शब्द "हरमाणयान" से प्रतीत होता है।
भगवद् दुर्गाचार्य ने 'उक्षणयायन' नाम किसी यजमान
विशेष का बताया है। किन्तु 'उक्षन्' नाम बैल का है, और
यान नाम सवारी का है, इन दोनों के योग से 'उक्षणयान
हिन्दी निरुक्त ( १७५ ) ५ अ० ३ पा० ४ खं०
“मानो मघेव निष्पणी परादाः ।” ( ऋ० सं०
१, ७, १८, ५)
स यथा धनानि विनाशयति मानस्त्वं तथा
परादाः ॥
‘तूर्णाशम्’ उदकं भवति । तूर्णमश्नुते ।
“तूर्णाशं न गिरेरधि” [ ऋ० सं० ६,३,१,४ ]
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘क्षुम्पम्’ अहिच्छत्रकं भवति । यत् क्षुभ्यते—
४ [ १६ ] ॥
‘नियद्वृषासि’ यह सव्य आंगिरस ऋषि की ऋचा है। जगती छन्द और
इन्द्र देवता है। वह इन्द्र ही अंगिरस् का पुत्र होगया है।
अर्थ—हे भगवन् ! इन्द्र ! ‘यत्’ जो (तू) ‘श्वसनस्य’
(शब्दकारिणः) शब्द करने वाले वायु के ‘च और ‘व्रन्दिनः’
अपने तेज से फल आदि को कोमल बनाने वाले ‘शुष्णस्य’
(शोषयितुः) (आदित्यस्य) सूर्य के ‘मूर्द्धनि’ ऊपर ‘रोरुवत्’
(रोरूयमाणः) गर्जता हुआ ‘वना’ (वनानि) जलों को
‘निवृक्षासि’ (विक्षसि) फेंकता है। अर्थात् ऊपर और नीचे
जलों को फेंकते हुए तेरी शक्ति कभी घटती नहीं। यहां जिस
पक्ष में “वना” पद का ‘मेघवधेन’ (मेघ के वध से) ऐसा
निर्वचन करते हैं, उस पक्ष में ‘निवृक्षासि’ क्रिया में जोड़ने के
लिये ‘उदकानि’ (जलों को) यह पद ऊपर से ले लिया
जाता है। इस प्रकार ‘व्रन्दी’ शब्द आदित्य का विशेषण हो
कर मृदु (कोमल) भाव अर्थ के वाचक ‘व्रन्द’ (भ्वा० प०)
धातु का ही ठीक होना है।
हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ४खंड
“अवन्दन्त वीलिता” अर्थात्-'वीलिता' (वीलितानि
गर्वितानि) गर्ववाले असुर-कुल 'अवन्दन्त' मृदु या ढीले हो
गए । यह भी निगम है।
यहां 'वीलयति' धातु और 'व्रीलयति' धातु संस्तम्भ
या गर्व (कठोर-भाव) के वाचक होते हुए पूर्व पठित 'व्रन्द'
धातु से सम्बन्ध युक्त पढे गए हैं, इस से 'व्रन्द' धातु कोमल
भाव अर्थ का वाचक ठहरता है। क्योंकि-कठोर असुर-कुलों
का कोमल होने के अतिरिक्त क्या होता ? ।
'निष्षपी' (५६) यह अनवगत है । 'विनिर्गतसप.' यह शब्दसमाधि है ।
स्त्री-काम (पुश्चल) या जार इसका अर्थ है ।
'निष्षपी' (५६) स्त्री की कामना रखने वाला होता है।
क्योंकि-वह विनिर्गत-सप (जिस का सप (पुरुष चिन्ह)
निकला हुआ हो) ही रहता है।
'सप' शब्द स्पर्श अर्थके वाचक 'सप' (भ्वा०प०) धातु
से है। क्योंकि-उससे स्त्री योनि सपी (छूही) जाती है।
“ 'यः' जो 'निष्षपी' जार है, 'सः' वह 'मघा-इव'
(यथा धनानि) जैसे धनों को (विनाशयति) नष्ट करदेता है,
(तथा) उस प्रकार 'मा' मत् 'नः' हमें 'परादाः'बरबाद कर ॥”
'तूर्णाश' (६०) यह अनवगत है । “उदक भवति” यह अर्थ-कथन है ।
'तूर्णाश' (६०) उदक (जल) होता है। क्योंकि-वह
तूर्ण (शीघ्र) ही अशन (व्यापन) करता है।
“मेघार्थी जन 'गिरेः-अधि' मेघके ऊपर वर्त्तमान 'तूर्णा-
शम्' जलको 'इव' जैसे (आह्वयन्ति) बुलाते हैं।” यह भी
निगम है। यहां गिरि (मेघ) के सम्बन्ध से 'तूर्णाश' नाम
जलका ही हो सकता है ।
हिन्दी निरुक्त ( १७७ ) ५ अ० ३ पा० ५ खं०
'क्षुम्पम्' (६१) यह अनवगत है । 'अहिच्छत्र' यह अर्थ है ।
'क्षुम्प' ( ६१ ) अहिच्छत्र ( छत्राक ) या सांपका छाता
होता है । चौमासे में पृथिवी में गली हुई लकड़ी फूलकर छाते
के आकार से बाहर निकल आती है, उसे लोक में सांप का
छाता कहते हैं । ' क्षुम्प ' क्यों ? वह छूने से क्षोभ को प्राप्त
होता है, या बिगड़ जाता है ॥ - ॥ ४ ( १६ ) ॥
( खं० ५ )
(निघ०-) निचुम्पुणः ॥६२॥
[निरु०] "कदा मर्त्तमराधसम्पदाक्षुम्पमिव स्फुरत् ।
कदा नः शुश्रवद्गिरइन्द्रो अङ्ग ।" [ऋ०सं०१,६,६,३]
कदा मर्त्तम्-अनाराधयन्तं पादेन क्षुम्पमिव
अवस्फुरिष्यति कदा नः शृणोति च गिरः इन्द्रो
अङ्ग ।
'अङ्ग' इति क्षिप्रनाम। अञ्चितमेव अङ्कितं भवति
'निचुम्पुणः' सोमः । निचान्तपृणः । निचमनेन
प्रीणाति ॥ ५ [१७] ॥
“कदा मर्त्तम्” यह गोतम ऋषिकी ऋचा है । इन्द्र देवता है। उष्णिक् छन्द
और तृतीयसवन के उक्थपर्यायों में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनियुक्त है ।
'कदा' कब 'इन्द्रः' इन्द्र 'अनाराधसम्' (अनाराधयन्तम्)
न आराधन करते हुये 'मर्त्तम्' मनुष्य को 'पदा' (पादेन) पैर
से 'क्षुम्पम्' ( अहिच्छत्रकम् ) सांप के छाते के 'इव' समान
'स्फुरत्' ( अवस्फुरिष्यति ) कुचलेगा । 'कदा' कब 'नः' हमारी
'गिरः' वाणियों ( स्तुतियों ) को 'इन्द्रः' इन्द्र 'अङ्ग' झट पट
'शुश्रवत्' ( शृणोति = श्रोष्यति ) सुनेगा ।
२३
'अङ्ग' यह क्षिप्र या शीघ्र का नाम है। क्योंकि वह
'अञ्चित' ही अङ्कित होता है। अर्थात् अञ्चित से अङ्कित और
उस से अङ्ग बन जाता है। जो शीघ्र होता है, वह अञ्चित
या गया हुआ ही होता है इसी से 'अङ्ग' है।
निचुम्पुण (६२) यह अनवगत और अनेकार्थ है।
'निचुम्पुण' सोम होता है। क्योंकि वह 'निचान्तपृण'
होता है, अर्थात्-भक्षित (खाया हुआ) ही प्रीति करता
है ॥ ५ (१७) ॥
व्याख्या ।
भगवद्दुर्गाचार्य अपने समय में “कदा मर्त्तम्” इस
मन्त्र के भाष्य को “पादेन क्षुम्पमिव अवस्फुरसि” और
“कदा नः शृणोति गिरः” ऐसा पाते हैं, किन्तु इस
पाठ को 'स्फुरसि' 'शृणोति' इन क्रियाओं के विरुद्ध पुरुषों
के कारण छोड़ देते हैं, और अर्थ के अनुसार भाष्य का पाठ
'स्फुरसि' के स्थान में 'स्फुरिष्यति' ऐसी प्रथम पुरुष की
क्रिया से बदल कर उस की व्याख्या करते हैं। क्योंकि
“तू मारेगा” “वह सुनेगा” ऐसे प्रत्यक्ष और परोक्ष दो
वाक्य एक ही देवता के लिये संभव नहीं होते। वे कहते हैं
कि-भाष्यका यह पाठ ठीक है ? या बेठीक ? मुझे इससे कुछ
नही, किन्तु भाष्यका ठीक पाठ ढूंढना चाहिये, और मुझे ऐसा
ही प्रतीत होता है, जैसा कि मैंने व्याख्यान किया ॥ ५ (१७) ॥
( खं० ६ )
(निघ०) पदिम् ॥६३॥
(निरु०) “पत्नीवन्तः सुता इम उशन्तो यन्ति वीतये।
हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ६ खं०
अपां जग्मिं निचम्पुणः" [ ]
प॒त्नीव॑न्तः सु॒तां इ॒मे अ॒द्भिः॒ सोमा॑ः काम॑यमा-
ना य॑न्ति वी॒तये॑ पानाय अपां गन्ता निचम्पुणः ॥
समुद्रोऽपि निचम्पुण उच्यते । निचमनेन पूर्यते ॥
अवभृथोऽपि निचम्पुण उच्यते । नीचैरस्मिन्
क्णन्ति । नीचैर्दधति-इतिवा ॥
“अवभृथ निचम्पुण”—(य० वा० सं० ३, ४८)
इत्यपि निगमो भवति ॥
निचुम्पुण निचेङ्कण इति चे ।
पदि गन्तु र्भवति । यत् पद्यते-॥ ६ [१८] ॥
'पत्नीवन्तः' इसका कक्षी नाम आंगरस ऋषि ह । गायत्री छन्द, इन्द्र
देवता, और रात्रि पर्यायों में मध्यम पर्यायमें होताके शस्त्रमें विनियुक्त है ।
अर्थ:-(अद्भिः) 'पत्नीवन्तः' जलों से पत्नियों वाले
'सुताः' निचोड़े हुए 'इमे' ये (सोमाः) सोम 'उशन्तः'
(कामयमानाः) 'इव' चाहते हुये जैसे, 'वीतये' पान के अर्थ
'यन्ति' देवताओं के प्रति जाते हैं, कि-कैसे हमें ये पान करें ।
क्या यहीं ? न, 'अपांम्' जलों के वीर्य से युक्त फिर फिर
'निचुम्पुणः' सोम 'जग्मिः' (गन्ता) जाने वाला होता है ।
समुद्र भी 'निचुम्पुण' कहलाता है । क्योंकि वह निचमन
(जल) से भरा हुआ रहता है । निचमन (भक्षण) किया
जाता है, इसी से 'निचमन' जल है ।
अवभृथ (यज्ञ के अन्त में स्नान विशेष) भी 'निचुम्पुण'
कहलाता है । क्योंकि इस में धीरे धीरे बीजा जाता है। अथवा
हिन्दी निरुक्त ( १८० ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
इस में यज्ञ-पात्रों को धीरे २ धरते हैं ॥
“अवभृथ निचुम्पुणः” अर्थात्-हे 'अवभृथ' देव ! हे
'निचुम्पुण' धीरे २ शब्द करने वाले ! या नीचे नीचे देश में
चलने वाले ! वरुण ! ।
यहां 'अवभृथ' शब्द के समानाधिकरण में पढ़ा हुआ
'निचुम्पुण' शब्द अवभृथ का ही नाम होता है ।
'निचुङ्कुण शब्द भी 'निचुम्पुण' के समान ही समझना
चाहिए ।
'पदि' (६३) यह अनवगत है । 'गन्तु' यह अर्थ है ।
'पदि' ( ६३ ) गन्तु या चलने वाला होता है । क्योंकि
वह पदन ( गमन ) करता है ॥ ६-( १८ ) ॥
( खं० ७ )
[ निघ०] पादुः ॥ ६४ ॥
( निरु० ) “सुगुरसत् सुहिरण्यः स्वश्वो बृहदस्मै
वयइन्द्रो दधाति । यस्त्वा यन्तं वसुना प्रातरित्वो
मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति” ( ऋ०सं० २,१,१०,२ )
सुगुर्भवति सुहिरण्यः स्वश्वो महच्चास्मै वयइन्द्रो
दधाति । यस्त्वा यन्त मन्नेन प्रातरागामिन्नातिथे ॥
' मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति ।' कुमारः ।
मुक्षीजा मोचनाच्च सयनाच्च तननाच्च ॥
'पादुः' पद्यतेः ।
“ आविः स्वःकृणुते गृहते बुसं स पादुरस्य
हिन्दी निरुक्त ( १८१ ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
निर्णिजो न मुच्यते ” ( ऋ०सं० ७, ७, १९,४ )
आविष्कुरुते भासमादित्यो गूहते बुसम् ।
‘बुसम्’-इति उदक-नाम। ब्रवीतेः शब्दकर्मणः
भ्रंशतेर्वा । यद्वर्षन् पातयति उदकम् रश्मिभिः तत्
प्रत्यादत्ते ॥ ७ ( १९ ) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥५,३॥
“ सुगुरसत् ” इसका कक्षीवान् ऋषि है।
अर्थः-जो ही ‘ सुगुः ’ ( शोभनगुः ) सुन्दर वाणी वाला
होता है, वह ‘सुहिरण्यः’ सुन्दर सुवर्णवाला होता है, ‘स्वश्व’
सुन्दर अश्व ( घोड़े ) वाला होता है, ‘च’ और ‘इन्द्रः’ इन्द्र
‘अस्मै’ इसके लिये ‘महत्’ बड़ा ‘वयः’ आयु ‘दधाति’ देता है।
‘यः-तु’ किन्तु जो ‘प्रातरित्वः’ हे (प्रातरागामिन् अतिथे ! )
प्रात काल आने वाले ! अतिथि देव ! ‘आयन्तम् ’ आये हुये
( भूख से विचलित हुए प्राण अभ्यागत) को ‘वसुना’ (अन्नेन)
अन्नसे ‘उत्सिनाति’ बांधता है। कैसे ? ( कुमारः ) बालक या
मूढ ‘मुक्षीज्या’ ( पाश्यया ) जाल से ‘पदिम्’-इव. पक्षी को
जैसे ‘ उत्सिनाति ’ बांधता है। अर्थात्- कोई बालक या मूढ
जिस प्रकार उड़ते हुये पक्षी को जालसे बांध लेता है, उसी
प्रकार जो गृहस्थ पुरुष आये हुये भूखे अभ्यागत के उड़ते हुए
प्राणों को अन्न से बांध लेता है ( उनके प्राणों को धारण
करदेता है ) उस सुन्दर वचन वाले को सुवर्ण, हाथी, घोड़े,
और लम्बी आयु इन्द्र देखता देता है, किन्तु सूखी या सार-
रहित सुन्दर वाणी वाले को नही ॥ इस प्रकार यहां ‘पदि’
हिन्दी निरुक्त ( १८२ ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
शब्द से पक्षी लिया जातां हैं, क्योंकि-वही उड़तां हुआ जाल
से पकड़ा जाता है ॥
‘मुक्षीजा’ क्यों ? मोचन से है। बाँधने से है। यां
फैलाने से है ॥
'पादु' [६४] यहँ अनवगत है । 'पद्यते.' यह अर्थ की प्रतीति है ।
'पादु' (६४) यह गत्यर्थक 'पद' (दि०आ०) धातु से है।
“ 'स्वः' (आदित्यः) सूर्य (भांसम्) ज्योति को 'आविः
कृणुते' (आविष्कुरुते) प्रकट करता (फैलाता) है । 'बुसम्'
जलको 'गूहते' खींचता है । 'अस्य' इस 'निर्णिजः' अन्धकार
रूप कीचड़ से सने हुये सब जगत्के स्वरूप को अपने प्रकाश
रूप जलसे धोने वाले सूर्य का 'सः' वह 'पादु'पदन (गमन तथा
ताप, प्रकाश, वर्षा, उदय, अस्त, और रसका खींचना आदि )
कर्म 'न' नहीं 'मुच्यते' छूटता है।”
'बुसं' यहं जल का नाम है । शब्दार्थक 'ब्रू' (अदा०उ०)
धातु से है । क्योंकि वह शब्द वाला होता है । अथवा 'भ्रंश्'
पतनार्थक (दि०प०) धातु से है । क्योंकि वह मेघ से गिरता
है ।
'बरसतां हुआ आदित्य जिस जल को गिरांता है, उसे
फिर अपनी किरणों से ले लेता है' । यह भाष्यकार ने
“गूहते बुसम्” इस वाक्य का फिर स्पष्टीकरण किया है ।
इस प्रकार उक्त मन्त्र में 'पादु' नाम पदन यां गमन का
है ॥ ७ ( १६ ) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य
तृतीयः पादः समाप्तः ॥ ५, ३॥
हिन्दी निरुक्त ( १८३ ) ५ अ० ४पा० २ खं०
चतुर्थः पादः ।
( खं० १ )
[निघ०] वृकः ॥६५॥
(निरु०) 'वृकः' चन्द्रमा भवति । विवृतज्योतिष्को
वा । विकृतज्योतिष्कोवा । विक्रान्तज्योतिष्को-
वा ॥ १ (२०) ॥
'वृक' (६५) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
'वृक' (६५) चन्द्रमा होता है । क्योंकि इस की ज्योति
विवृत या फैली हुई होती है । अथवा वह विकृत या ठंडी
ज्योति वाला होता है, और सब ज्योति उष्ण ( गरम )
होती हैं । अथवा वह विक्रान्त ज्योति वाला होता है,
क्योंकि उसकी ज्योति अन्य ग्रह नक्षत्र और ताराओं से
अधिक चमकीली होती है। (ये सब शब्द-समाधियें हैं) ॥१(२०)॥
( खं० २ )
(निरु०) “अरुणो मासकृद्वृकः पथा यन्तं ददर्श हि।
उज्जिहीते निचाय्या तष्टेव पृष्ट्यामयी वित्तं मे अस्य
रोदसी ॥” ( ऋ० सं० १,७,२३,३ ) ॥
'अरुणः' आरोचनः । 'मासकृत्' मासानां च
अर्द्धमासानांच कर्त्ता भवति । “चन्द्रमाः” 'वृकः'
पथा यन्तं ददर्श नक्षत्रगणम् । अभिजिहीते
निचाय्य, येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः,
तक्षणवद् इव पृष्टरोगी । जानीतं मे अस्य द्यावा-
पृथिव्यौ-इति ॥
आदित्योऽपि 'वृक' उच्यते । यत्-आवृङ्क्ते ॥२॥
अर्थः- “अरुणोमासकृत्” यह कूप में पड़े हुए आप्तचात्रित ऋषि की ऋचा
है । अथवा कुत्स की है । पङ्क्ति छन्द और विश्वेदेव देवता है ॥
'अरुणः' ( आरोचनः ) अपनी चांदनी से सब जगत् को
प्रकाशित करने वाला, 'मासकृत्' ( मासानांच अर्द्धमासानांच
कर्त्ता भवति ) जो मासों और आधे मासों ( पखवारों ) का
करने वाला है, वह 'वृकः' ( चन्द्रमाः ) चन्द्रमा (नक्षत्र-मण्डल
से नीचे स्थित हुआ हुआ ) पथा' अपने मार्ग या परिधि से
'यन्तम्' ( नक्षत्रगणम् ) जाते हुये नक्षत्र समूह को 'ददर्श'
( पश्यति ) देखता है । ( 'हि' पद पूरण है । ) किन्तु मुझे
अन्ध कूप में पड़े हुये को नहीं देखता । यदि कुछ भी देखता
तो अवश्य इस विपद् से मुझे छुड़ाता, यह अभिप्राय है ।
और 'इव' जैसे कोई 'पृष्ट्यामयी' ( पृष्ठ रोगी ) पीठ में राग
वाला बडही ( खाती ) 'तष्टा' ( तक्षण्वन् ) किसी वृक्ष को
काटता हुआ ऊँचा होकर देखता है कि मैं वाञ्छित शाखा
के पास पहुंच सकता हूं या नहीं ? उसी प्रकार चन्द्रमा भी
'निचाय्य' देख कर के 'उज्जहीते' ( अभिजिहीते ) ऊँचा
होता है ( येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः ) अर्थात्
जिस जिस नक्षत्र के साथ उसे योग करना होता है कि-आज
मुझे इस से योग करना है, उस उस नक्षत्र के साथ उदय
होता है । इस प्रकार इसको जिस से प्रयोजन होता है, उसी
को आदर से ऊँचा खड़ा होकर देखता है, किन्तु मुझ से इस
का प्रयोजन नहीं है, इसी से मुझे नीचे पड़े हुये को नहीं
देखता । इस कारण कहता हूं-हे 'रोदसी' (द्यावापृथिव्यौ ! )