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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

अ० १ पा० ६ ख० १ । व्याख्या । शास्त्रके आरम्भके प्रयोजनका अधिकार या प्रकरण चला आता है, उसीमें दूसरा प्रयोजन यह कहा गया था कि—“इस निरुक्त शास्त्रके बिना मन्त्रोंमें अर्थका निश्चय नहीं हो सकता”। इसके विरुद्ध कौत्सने बहुत हेतुओंसे मन्त्रोंकी अनर्थकताका उपादन किया और आचार्यने उनके हेतुओंका खण्डन करके मन्त्रोंकी अर्थवत्ताका स्थापन किया। इस रीतिसे शास्त्रारम्भके प्रयोजन दिखानेका यह अभिप्राय है कि—शिष्यको बुद्धि किसो शब्दार्थके निर्णायक न्यायोंके परस्पर विरोधस्थलमें संकटमें न गिरकर सुखसे निर्णय कर ले। उसके अतिरिक्त इस शास्त्रके आरम्भका और प्रयोजन यह भी है कि—“इस शास्त्रके बिना मन्त्रोंमें पदविभागका परि ज्ञान भी नहीं हो सकता है” कि—‘इस प्रकारसे पद कहने चाहिये’ क्योंकि—अर्थके अधीन ही पद अवस्थित होते हैं। और अर्थका ज्ञान इस शास्त्रके बिना नहीं हो सकता। इससे सिद्ध हुआ कि—‘मन्त्रोंमें पदोंके विभागकी प्रसिद्धि भी इसी शास्त्रसे है’। “पदविभाग सब शाखाओंमें प्रसिद्ध है, इसलिये इसकी सत्ताको कोई किसी अवस्था में अस्वीकार नहीं कर सकता, और इसका (पदविभागका) मन्त्रोंकी अर्थवत्ताके बिना कोई प्रयोजन नहीं, तथा उस मन्त्रार्थका परिज्ञान निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये पदविभागकी सार्थकताके लिये मन्त्र अर्थवान् हैं”—और उसके कारण निरुक्त शास्त्र अर्थवान् या सप्रयोजन है—ऐसा कोई आचार्य कहते हैं। ऐसी प्रतिज्ञा करके दिखाते हैं कि—जिन मन्त्रोंमें पदविभाग अनेक प्रकारसे हो सकता है वहां अर्थके परिज्ञान द्वारा ही पदोंके विभाग विशेषका निश्चय होता है। अर्थात् जैसा मन्त्रका उच्चारण है, वह कई प्रकारकी संधियोंसे संभव है। इसलिये वहां अर्थके

हिन्दी निरुक्तः । १४३ अतिरिक्त कोई अवलम्ब नहीं है कि—जिससे पदविभाग एक प्रकारसे स्थिर किया जाय । मयो भूर्वातो अभिवातूखा ऊर्जस्वतीरोषधी रारि शन्ताम् । पीवस्वतीर्जीवधन्यः पिबन्त्व वसाय पद्धते रुद्रमृल ॥ ( ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ) सुचरो नाम गौतमः समयोभूरित्यृचा त्रिष्टुभः पूर्वै स्त्रिभिः पादैः गवामाशिष माशास्योत्तमे न ता सामेवच रुद्रात्सुखमयाचत । गवामुपस्थाने विनियुक्ता । ( भ० दु० ) मयोभूरिति चतुर्ऋ चमष्टादशं सूक्तं कक्षीवद् गोत्रस्य शबरस्यार्षं त्रैष्टुभं गोदेवत्यम् ।” घासाय वनंप्रतिष्ठमानागाः आदितोद्वाभ्यामभिमन्त्रणीयाः । ( सा० भा० ) आरोग्यका उत्पन्न करनेवाला पश्चिम दिशाका वायु इन गौओंके सामने चले और ये गौवें उस सुखकारी एवम् अनुद्वेग या अभय प्रद वायुके स्पर्शसे घने रसवालो ओषधियोंको चरें तथा सुख- कारी ओषधियोंका स्वाद ले लेकर अपने वाञ्छित समयमें जीवोंको प्राण देनेवाले जलको पीवें, और ओषधि सहित पान किया हुआ वह जल इन गौओंके उदरकोष्ठमें रस-शोणित-मांस-मेदा-मज्जा तथा अस्थिके रूपसे पके, एवम् ये मोटी बलवती बहुत दूधवाली हो जायें, हे रुद्र ! तुम भी इस पाद् (पैर) वाले गोरूप अवस नाम अन्नके लिये सुखरूप हो, अर्थात् इनकी हिंसा न कर ।

१४४ अ० १ पा० ६ ख० १ । दूसरा उदाहरण— "अव॑सायाश्वा॒न्" (ऋ० सं० १, ७, १८, १) एतया॑ नि॒ष्टुभा कुत्स आङ्गिरस इन्द्रं॑ तुष्टाव । कुत्स आङ्गिरस इन्द्रकी स्तुति करता है कि—हे इन्द्र ! तुम्हारे बैठनेके लिये मैंने जो यह स्थान किया है, तू उस पर आकर निश्चय ही बैठ, अर्थात् जिस प्रकार रस्सियोंसे बंधा तथा शब्द करता हुआ घोड़ा अपने स्थानमें स्थित होता है, उसी प्रकार मेरी स्तुतियोंसे हर्ष शब्दोंको करते हुए मेरे बिछाये हुए कुशरूप आसन पर तू दिन और रात्रिमें चलनेवालोंसे अधिक चलनेवाले अपने घोड़ोंको रथसे अलग कर रस्सियोंसे मुक्त कर, तथा उन्हें चारा देकर, अनन्तर स्वस्थ वा निश्चिन्त होकर बैठ। किन्तु तुम्हारे इस यजनकालमें हमारे लिये विघ्न उपस्थित न कर । उक्त दोनों ही ऋचाओंमें “अवसाय" पद आता है, किन्तु पदकार पहिली ऋचामें इसको अन्नके पर्याय अदन्त अवस नामका चतुर्थ्यन्त पद समझ कर बिना अवग्रह किये पढ़ते हैं। तथा दूसरी ऋचामें 'अव' उपसर्ग 'षो' अन्तकर्मणि धातु और 'क्त्वा' प्रत्ययका समस्त पद समझकर 'अव ३ साय' ऐसा अवग्रह पूर्वक पढ़ते हैं। भाव यह है कि-वेदके संहिता पाठके समान मन्त्रोंका एक पद पाठ भी है, जिसमें ऋषियोंने मन्त्रोंके अर्थको सुखपूर्वक जानने एवम् उसके अन्यथा न होनेके लिये आनुपूर्वीसे मन्त्रगत सब पद १—"योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारितमा निषीद् स्वानोनावौ । विमुच्यावयोऽवसायाश्वान् दोषा वस्तोर्वहीयसः प्रपित्वे ॥" (ऋ० सं० १, ७, १८, १)

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अलग अलग पढ़े हैं । मन्त्रके स्वरूपमें जैसा संहिता पाठ प्रामाणिक है, वैसा ही पद-ज्ञानके लिये पद पाठ भी मान्य हैं । ऋषियोंने उसमें अभ्रान्तिके लिये यहां तक विशेष कर दिया है कि—जहाँ दो या बहुत पदोंका समास या अविलम्बसे उच्चारण है, उनको आधी मात्राके कालसे विलम्बित कर जिसे अवग्रह कहते हैं पढ़ा है । अर्थात् यद्यपि व्याकरणमें जहाँ 'राजपुरुषः' इत्यादि पदोंमें समास हो जाता है, वहाँ उन समस्त पदोंके उच्चारणमें परस्पर एकपदके अक्षरोंका नियम माना जाता है, जिससे कि-वह अलग अलग प्रतीत न होकर अनेक होते हुए भी एक पद प्रतीत हों, तथापि वेदार्थमें ऐसा मानने पर अनेक स्थानोंमें भ्रान्तिका अधिक संभव है, इसलिये वहां उस धर्मके असाधारण या अद्वितीय आधार स्तम्भकी रक्षाके लिये उस नियमको भङ्गकर अवग्रह अर्थात् विच्छेदपाठ स्वीकार किया है, जितनेसे कि-उन पदोंकी पृथक्ता प्रतीत हो सके, प्रयोजन यह है कि—उस पाठमें स्वतन्त्र स्वतन्त्र पद . जिस विलम्बसे पढ़े जाते हैं, उनकी अपेक्षा उनमें अल्पविलंब ही किया जाता है, उससे समासका धर्म और पदोंकी पृथक्ता दोनों ही कार्य हो जाते हैं । उसी चालके अनुसार उक्त दोनों ऋचा- ओंमें अर्थभेदके जनानेके लिये पहिले मन्त्रमें अवग्रहका अभाव और दूसरेमें अवग्रह रखा गया है, किन्तु यह अवग्रह अर्थज्ञान पूर्वक किया जा सकता है, और वह अर्थज्ञान एकमात्र निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये निरुक्त शास्त्रके बिना पदपाठ भी सिद्ध नहीं होता, अतः निरुक्त शास्त्रका यह तृतीय प्रयोजन है, जो कि इससे वेदका पदपाठ सिद्ध होता है । पहिले मन्त्रमें 'अवसाय' पदका 'अन्नके लिये'—यह अर्थ होता है, और दूसरेमें 'छुड़ा करके' या 'अलग करके' अर्थ होता है ।

१४६ अ० १ पा० ६ ख० १. यद्यपि उक्त उदाहरणमें अवग्रहको लेकर जो फल दिखाया है, वह निरुक्तका ही है, तथापि वह पदके अभ्यन्तरके सम्बन्धको लेकर ही है, पदविभागमें कोई विशेष नहीं आया, जिससे कि— प्रतिज्ञाके अनुसार निरुक्तका प्रयोजन पदविभाग समझा जाता, इसलिये अब ऐसा उदाहरण देते हैं जिनमें दो पदोंके मध्यमें सन्धिमात्रसे विशेष होता है और वह निरुक्त शास्त्रका व्युत्पत्तिसे ही प्रतीत होता है। जैसे कि = “दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” (ऋ० सं० ८, ८, २३, १) “परो निर्ऋत्या आचक्ष्व” (ऋ० सं० ८, ८, २२, १) प्रथम उदाहरणमें ‘निर्ऋत्याः+इदम्’ तथा ‘निर्ऋत्यै+इदम्’ इस प्रकारसे दो तरह पदविभाग हो सकता है, क्योंकि—प्रथम स्थानमें रुत्व-यत्व और यलोप होनेसे, और दूसरे स्थानमें ‘आय् आदेश और यलोप होनेसे “निर्ऋत्या इदमाजगाम” ऐसा यथोक्त वाक्य बन जाता है किन्तु एक पक्षका स्थिर करना अर्थापेक्ष होनेसे निरुक्तके अधीन है, जिससे प्रतीत होगा कि यह पञ्चमी या षष्ठी विभक्ति है चतुर्थी नहीं। इस मन्त्रका कपोतशान्तिके लिये कपोत पद हरणमें विनियोग है। इसमें देवताओंसे प्रार्थना की गई है कि—हे देवगण ! निर्ऋति (मृत्यु) के निजका दूत यह कबूतर हमारे घरमें आकर बैठा है, जो कि-हमारे पूर्वजन्मके किये हुए पाप कर्मके विपाकको अपने घुंसले या दीवारों पर पदचिन्होंसे सूचित करता है, आप उसके दूर करनेमें समर्थ हैं, इसीसे हम तुम्हारी पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त इस अपशकुनकी शान्तिके लिये हम निष्कृति या शान्ति भी करेंगे। इसलिये हम कहते हैं कि - तुम्हारे प्रसाद और हमारे तपसे हमारे मनुष्यों और पशुओंम कल्याण रहे।

हिन्दी निरुक्त । १४७ इसी प्रकार दूसरे उदाहरणमें भी “निर्ऋत्यै+आवक्ष्व” तथा निर्ऋत्याः+आवक्ष्व” इन दोनों विभागोंसे ही सन्धिके नियमोंसे “निर्ऋत्या आवक्ष्व” यह यथोक्त वाक्य सिद्ध हो जाता है, किन्तु निरुक्त शास्त्रकी रीतिसे निर्णय हो जाता है कि—प्रथम पदविभाग ही ठीक है दूसरा नहीं। यह दूसरा मन्त्र दुःस्वप्नकी शान्तिके लिये पढ़ा जाता है। इसमें कहा गया है कि— हे मनसस्पते ! मृत्यो ! या व्याधे ! तू हमसे अलग हो जा । और अलग होकर भी, हमारे पास ही मत ठहर, किन्तु दूर जाकर रह । तथा दूर जाकर भी ऐसा दूर रह कि—फिर हमारी ओर तेरा आना न हो । और यह कि—यहांसे दूर होकर जिसका तू दूत है, उस निर्ऋतिसे बहुत प्रकारसे कह दे कि—“वह मुमूर्षु या मरनेवाला नहीं है ।” क्योंकि—मेरा मन जीते हुएके समान स्वच्छ है। मेरी सब इन्द्रियां सूर्यनारायणके प्रकाशमें यथार्थ ज्ञानको उत्पन्न करती हैं, जिस पुरुषका मृत्यु निकट आ जाता है, उसका अनुभव प्रकाशमें भी ठीक नहीं होता, जो कुछ देखता है, अन्यथा अन्यथा ही देखता है। संहिता और पद । स्वर तथा उनके सहारे पर लगे हुए व्यञ्जनोंका १ जो परस्पर अत्यन्त सामीप्य उसको संहिता १ कहते हैं। इस संहिता और नाम-आख्यात आदि रूप पदोंके सम्बन्धमें दो मत हैं, कोई कहते हैं कि—संहितासे पद होते हैं, और कोई कहते हैं कि—पदोंसे संहिता बनती है। पहिले मतमें संहिता प्रकृति (कारण) और पद विकृति (विकार या कार्य) हैं। एवम् दूसरे मतमें पद प्रकृति और संहिता विकृति है। १—परः संनिकर्षः संहिता। (पा० १. ४. १०९)

हिन्दी निरुक्त । १४६ प्रधानताका निर्णय करके,उसी उसी देवताके कर्ममें उस उस मन्त्रके विनियोगका निर्धार करना । यद्यपि पूर्वमीमांसा दर्शनके ३ य अध्यायके द्वितीय पादमें मन्त्रोंके विनियोगोंका निर्णय किया है, जैसे कि—७वें अधि- करणमे' "इन्द्राग्नी रोचन" इत्यादि याज्या-अनुवाक्या नामक मन्त्र काम्य ऐन्द्राग्न इष्टिमें ही विनियुक्त होते हैं, किन्तु—नित्यमे नहीं । तथा ८ वें अधिकरणमें "आग्नेय्याऽग्नीध्रमुपतिष्ठते" "ऐन्द्र्या सदः" "वैष्णव्या हविर्धानम्" इन विधियोंमें बताया है, कि--'ज्योतिष्टोम यज्ञमे आग्नेयी ( अग्नि देवताकी ) ऋचासे आग्नीध्र नामक मण्डपका उपस्थान करना। एवम् ऐन्द्री ( इन्द्र देवताकी ) ऋचासे सदस् नाम मण्डपका तथा वैष्णवी (विष्णु, देवताको ) ऋचासे हविर्धान नाम मण्डपका उपस्थान करना।' यहां ज्योतिष्टोमके मन्त्रकाण्डोय तथा कर्मकाण्डोय प्रकरणमें जो जो अग्न्यादि देवताओंकी ऋचा पढ़ी हुई हैं, वे ही ऋचा उस उस मण्डपके उपस्थानमे' विनियुक्त होती हैं, किन्तु समस्त ऋग्वेदमें जितनी इन देवताओंकी ऋचा हैं, वे नहीं। इत्यादि रूपसे मन्त्रोंके अर्थाभिधान सामर्थ्य रूप लिङ्ग, समाख्या तथा प्रकरण आदि प्रमाणों के द्वारा मन्त्रोंके विनियोगोंका निर्णय किया है, तथापि "इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायु' पृणन्ति" (ऋ० सं० ४, ५, ६, २,) इस आग्नेय ( अग्नि देवताके ) मन्त्रमें मीमांसक निर्णय नहीं कर सकते कि—'अग्नि देवताका है, तो इन्द्र और वायुका क्यों नहीं ? क्योंकि—इन्द्र और वायु देवताके भी नाम इस मन्त्रमें हैं। उनके दर्शनमे बहु देवताओंके संकरस्थलमें निर्णयका उपाय नहीं है और निरुक्त शास्त्रमे' यह निर्णय किया है कि—'यहां कौनसा देवताका नाम प्रधान है और कौनसा गौण ।' यदि याज्ञिक या मीमांसक लोग निरुक्त शास्त्रकी उपेक्षा करके

१५० अ० १ पा० ६ ख० १ । बलपूर्वक लिङ्गके सहारे पर मंत्रों का विनियोग करें, तो एक मन्त्रमे' आनेवाले अनेक देवताओं के नामो'के गुण-प्रधान भावको न जाननेसे, वे अन्य देवताके 'मन्त्रको अन्य देवताके कर्ममें लगा दे'गे, जिससे कि विधि विरुद्ध करनेसे कर्मकी समृद्धि न होगी, इतना ही नहीं बल्कि—दुष्ट यज्ञसे यजमानकी हानि भी होगी। इसलिये निरुक्त शास्त्र सर्वथा जानने योग्य है। इस प्रकार देवताके परिज्ञान द्वारा पुरुषके प्रति निरुक्त शास्त्र विशिष्ट उपकारका करनेवाला है, इसीसे यह आरम्भ करने योग्य है। “त्वां हि मन्द्रतम मर्कशोकैर्ववृमहे महिनः श्रोष्यग्ने । इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायुं पृक्षन्ति राधसानृतमाः ॥” ऋ० सं० ४, ५, ६. २) भारद्वाजस्यार्षम् । आग्नेयी। प्रातरनुवाकाश्वि- नयोर्विनियोगः । हे अग्ने ! सब देवताओंमें अधिक कोमल हृदयवाले तुम्हीं हो, इस कारण हम ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अध्ययन किए हुए वीर्ययुक्त मंत्रों के द्वारा तुम्हारा ही सेवन करते हैं। तुम हमारे मन्त्रों से किये हुए स्तोत्रको सुनो। तुम केवल हमारे ही पूज्य नहीं हो, अपितु देवता और लोकमें जो धन-बलसे सम्पन्न प्रतिष्ठित मनुष्य हैं, वे सभी इन्द्र तथा वायुके समान तुम्हारी ही पूजा करते हैं। इस प्रकार यह मन्त्र आग्नेय है, लिङ्गमात्रके दर्शनसे प्रधान देवताके जाने बिना इन्द्र या वायु देवताके कर्ममें विनियुक्त होकर यह मन्त्र कर्त्ताके वांछितको पूर्ण करनेके लिये समर्थ न होगा और कर्मके विगुण होनेके कारण प्रत्युत कर्त्ताका अपध्वंस करेगा। इसलिये मन्त्र देवताके निश्चय ज्ञानके लिये निरुक्त ज्ञातव्य है।

हिन्दी निरुक्त । १५१ दूसरा उदाहरण— “अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व” इति । ( ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ) जिस प्रकार पूर्वोक्त आग्नेय मन्त्रमें वायु और इन्द्र देवताका लिङ्ग है, वैसे ही इस मन्य देवताके मंत्रमें भी अग्निका भी नैघण्टुक वा गौण लिङ्ग है । ऐसे ऐसे अनेक देवताओंके लिङ्ग संकटस्थलोंमें निरुक्त न पढ़नेवालोंको जिनको कि-मंत्रोंके व्याख्यानके नियम विदित नहीं हैं, देवता तत्वका निर्धारण करना कठिन है । इससे मीमांसकोंका ऐसा कहना कि—“हम लिङ्गके ज्ञाता हैं, हमें निरुक्तसे कुछ प्रयोजन नहीं है” यह अयुक्त है । त्विषि नाम दीप्तिका है । यद्यपि यह दीप्तिके नामोंमें पठित नहीं है, किन्तु यह नियम नहीं है कि—“जो वहां जिस अर्थमें पड़े हैं, वे ही उस अर्थ के वाचक हैं” अपितु और और शब्द भी उन उन अर्थोंमें आसकते हैं । ५वां प्रयोजन । शास्त्रमें ज्ञानकी प्रशंसा और अज्ञानकी निन्दा है । ऐसी अवस्थामें “हम अनिन्द्य और प्रशंसनीय हों” इसलिये निरुक्त शास्त्र ज्ञातव्य है । क्योंकि—निरुक्तशास्त्रसे मन्त्रोंके अध्यात्म, अधिदैवत, तथा अधियज्ञ सब अर्थ जाने जाते हैं, और वे अर्थ, परिज्ञात होकर मनुष्यके उत्तम कल्याणके लिये होते हैं । इस रीतिसे यह शास्त्र अखिल पुरुषार्थोंके उपकारमें समर्थ है, इस प्रयोजनसे इसका आरम्भ न्यायसे संगत है । ( प्रमाण )—कहां ज्ञानकी प्रशंसा तथा अज्ञानकी निन्दा है— ( खं० २ ) स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ॒इत्सकलं भद्रमश्नुते

१५२ अ० १ पा० ६ ख० २ । नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा । यद्गृहीतमवि- ज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविवशुष्कैधो न तज्ज्वलतिकर्हिचित् । (शिष्टाचारस्मृतिः) लोक और वेदमें। लोकमें जो कोई विद्वान् होता है, वह पुण्यफलार्थी जनोंसे पूजित होता है। यह तो प्रत्यक्षमें देखा ही जाता है। किन्तु शास्त्रमें भी ऊपरिलिखित वाक्य है। जैसे—वृक्ष अपने पत्र-पुष्प-फलोंके धारण करनेका ही भागी है, किंतु उनके, गन्ध-रस-रूप तथा स्पर्शके उपभोग सुखोंसे संयुक्त नहीं होता। ऐसे ही वह पुरुष है, जिसने वेद पढ़कर उसका अर्थ नहीं जाना। जो पुरुष अर्थ को भी जानता है, किन्तु केवल पाठ- मात्रका पढ़नेवाला नहीं है, वह पुरुष ही सकल (अखण्डित) कल्याणको भोगता है। और क्या ? इस लोकमें शिष्ट पुरुषोंका पूज्य होकर अन्तमें स्वर्गमें जाता है, जहां दुःखका नाममात्र भी नहीं है। वह पुरुष ऐसे स्थानमें क्यों जाता है ? स्वर्गमें जानेके विरोधी जितने पाप हैं वे सब उसके ज्ञानसे नष्ट हो जाते हैं। इससे वह स्वर्गमें जाता है। जैसा कि कहा है-- “नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।” अर्थ--'ज्ञानके समान इस संसारमें और कुछ भी पवित्र नहीं है। अथवा स्थाणु नाम गधेका है, वह जिस प्रकार चन्दनभारको ढोता है, किन्तु उसके गन्धका उपभोग नहीं करता ऐसे ही वह पुरुष है जो अर्थ को नहीं जानता। अज्ञानकी निन्दा-- जो गुरुमुखसे अर्थ के बिना शब्दमात्रसे पढ़ता है, तथा नित्य काल ही उच्चारणमात्र करता रहता है, किन्तु कभी उसके अर्थ का

हिन्दी निरुक्त । १५३ विचार नहीं करता, जिस प्रकार सूखा काष्ठ अग्निसे अन्यत्र कभी नहीं जलता, ऐसे ही वह पुरुष वेदाध्ययनके भारमात्रसे सम्बन्ध रखता है किन्तु उसके फलसे नहीं । इससे फलित यह हुआ कि--परिज्ञान, पुरुषको श्रेय तथा अभ्युदयसे संयुक्त करता है, इसलिये निरुक्त शास्त्र आरम्भ करने योग्य है । “स्थाणु” और “अर्थ” शब्दका निर्वचन । ( नि० ) स्थाणुः तिष्ठतेः । अर्थः ऋत्तेः । अरणा- स्थोवा ॥ २ ॥ स्थाणुः-क्योंकि यह सदा ही स्थित या खड़ा रहता है, किन्तु कभी बैठता नहीं। इसलिये यह 'स्थाणु' है। ष्ठा (स्था ) गति निवृत्तौ धातुसे बनता है । अर्थः-( १ ) क्योंकि-अर्थी लोग इसे सदा ही प्राप्त करते रहते हैं, इससे यह अर्थ कहाता है। ऋ गतौ धातुसे बनता है। - ( २ ) जब इस (अर्थ) का स्वामी इस लोकसे परलोकको जाता है, तब यह उसके साथ न जाकर इसी लोकमें रह जाता है, इससे यह रुपये अशरफी अर्थ कहाते हैं। इसके सादृश्यसे शब्दका अर्थ भी अर्थ कहलाता है। ( सं० ३ ) “उतत्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुतत्वः शृण्वन्न शृणो- त्येनाम् । उतोत्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्यउ- शती सुवासाः । अप्येकः पश्य न्, न पश्यति वाचम्, अपिच शृ- ण्वन् न शृणोति एनाम् ।—इति अविद्वांसमाह २०

१५४ अ० १ पा० ६ ख० ३ । अ॒र्द्धम् । अपि॒ कस्मै॑ त॒न्वं॑ विस॒स्रे, इति । स्वम् आत्मानं विवृणुते उज्ञानं प्रकाशनम्-अर्थस्य आह अनया वाचा । उपमोत्तमया वाचा-जायेव पत्ये कामयमाना सुवासाः ऋतुकालेषु । सुवासाः कल्याण- वासाः कामयमाना ऋतुकालेषु । यथा व एनां पश्यति, स शृणोति, -इति-अर्थज्ञप्रशंसा । अनुवाद । एक पुरुष देखता हुआ भी वाणीको नहीं देखता, और सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता । यह ऋचाका आधा भाग अविद्वान्‌को कह रहा है। [३ य पाद-] [वाणी-] एक [विद्वान्] के लिये तन् (शरीर) को दिखाती है। अपने आत्माको फैलाती है। इस तीसरे पादसे ऋचा अर्थ के उज्ञान या प्रकाशनको कहती है। उपमोत्तमा वाक् वा चौथे पादसे [कहती है-] जैसे-ऋतुकालमे सुवस्त्रवाली कामयुक्त जाया (पत्नी या भार्या) पतिके लिये [अपने शरीरको ] [एक पद निरुक्त] 'सुवासाः' नाम कल्याण वस्त्रवाली कामना करती हुई ऋतुकालमें। [जैसे] वह [विद्वान्] इस (वाणी!) को देखता है, यह सुनता है। यह अर्थज्ञकी प्रशंसा है। व्याख्या । “उतत्वः” ० ० [ ऋ० स० ८, २, २३, ४ ] विद्यासूक्ते द्वे अपि एते ऋचौ बृहस्पतेरार्षम् । बहुतसे मनुष्योंमें सबके एकसे पीठ, पेट, हाथ तथा पैर होने परभी और एक गुरुसे एक साथ एक ही रीतिसे पढ़ने पर भी,

हिन्दी निरुक्त । १४५ कोई पढ़नेवाला देखता हुआ भी अर्थके अज्ञानसे नहीं देखता है। क्योंकि—वही पुरुष उस वाणीको देखता है, जो उसके अर्थको जानता है। क्योंकि—वाणीमें अर्थ ही कला, या सार है। इसी प्रकार एक सुनता हुआ भी नहीं सुनता है। क्योंकि—जो अर्थको जानता है, उसको वह ठीक सुनाई देती है, किन्तु, दूसरेको नहीं। वह केवल वाणीको उच्चारणमात्र करता है। अब उत्तर-आधी ऋचासे अर्थके जाननेवालेकी प्रशंसा करता है। एक, किसी अर्थज्ञके लिये वाणी अपने शरीरको खोलकर दिखाती है, अर्थात् अर्थ, वाणीका शरीर होता है, उसको उद्‌घाटन कर अपने आत्माको दिखा देती है। जिस प्रकार ऋतुकालमें रजसे शुद्ध होकर, कामयुक्त स्त्री सुन्दर वस्त्र धारण करके वाञ्छित पतिको अपने आपेको दिखाती है, क्योंकि—उस समय उसको बहुत ही पुरुषकी इच्छा होती है। और जिस प्रकार पुरुष उसको यथावत् देखता है, जैसा कि—और स्त्रीको नहीं देखता, जिसने अपने शरीरको बहुत ही गुप्त कर रखा है, अथवा जो अपने आत्माको उसे दिखाना नहीं चाहती। ऐसे वही पुरुष इस वाणीको ठीक ठीक सुनता है, जो इसको पदोंसे खोल कर इसके समस्त अर्थको देखता है। तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ३ ॥ उसकी अधिक व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ ३॥ ( खं० ४ ) उतत्वं॒ सख्ये॑ स्थिरपीतमाहुर्नैनं॑ हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु । अधेन्वा चरति माययैष वाचं शुश्रुवाँ॑ अफलामपुष्पाम् ॥ अपि एकं वाक्-सख्ये स्थिर पीतमाहुः । रसमार्थं निपीतार्थम्।

१५६ अ० १ पा० ६ ख० ४ । देवसख्ये, रमणीये स्थाने इति वा । विज्ञातार्थं य न आप्नु- वन्ति, वागेऽज्ञेयेषु बलवत्सु अपि । अधेन्वा हि एष चरति मायया वाक् अतिरूपया, नास्मै कामान् दुग्धे वाग्-दोहान्, देव मनुष्य- स्थानेषु । यो वाचं श्रुतवान् भवति, अफलाम् अपुष्पाम्, इति । अफला अस्मै अपुष्पा वाग् भवति,-इतिवा । किंचित्पुष्पफला,- इति वा । अर्थं वाचः पुष्पफलमाह, याज्ञ दैवते पुष्पफले, देवता- ध्यात्मे वा ॥ ४ ॥ अनुवाद । “उतत्वम्” [ ऋ० स० ८, २. २४, ४ ] [ १म पदार्थ-] किसी एकको विद्वद्गोष्ठी = पण्डितोंकी सभामें स्थिर-पीत कहते है । स्थिर नाम रममाण या निर्भयतासे डटा हुआ, पीत नाम जिसने अर्थको पान या धारण किया । [ मन्त्रमें ] अथवा सख्य नाम जिसमें देवताओंको प्रीति हो, उस रमणीय स्थानका है । [ २य पा- दार्थ-] उस [ जिस ] अर्थके जाननेवालेको वाणीसे जाने जानेवाले गम्भीर अर्थोमे अन्य पुरुष बिलकुल नहीं पहूंचते । [ ३य पाद- ] [ अविद्वान्‌को निन्दा- ] वह नहीं दुहनेवाली वाणीरूप मायाके साथ फिरता है । [ एकपद निरुक्त ] [ अधेनु ] इसके लिये वाणीसे दोहेजानेवाले कामोंको नहीं देती । [ कहां ] देवस्थान = परलोकमे, और मनुष्यस्थान = इस लोकमे । [ चतुर्थ पदार्थ ] जो निष्फल और पुष्परहित वाणीको सुननेवाला है । [ अर्थान्तर ] अथवा इस ( अविद्वान् ) के लिये वाणी फलरहित और पुष्परहित हो जाती है [ अर्थान्तर ] अथवा कुछ पुष्प और फल देती है । [ ऋषि ] अर्थको वाणीका पुष्प और फल कहता है । यज्ञका विज्ञान पुष्प और देवता-विज्ञान फल है । अथवा देवता विज्ञान पुष्प और आत्मविषयक ज्ञान फल है ॥ ४ ॥

हिन्दी निरुक्त । १५७ व्याख्या । "उतत्व" [ ऋ० सं० ८, २, २१, ५ ] । 'जिस पुरुषने वेदार्थको जानकर अपने आत्मामे स्थिर कर लिया है, उसका वेदवाणा विद्वद्-गोष्ठोमें, जहा बहुत विद्वान् किसो अर्थ- को विचार रहे हैं, एकहीको अनेक विद्वान् कहती है, अर्थात् उस एक पुरुषका कहा हुआ अनेक विद्वानोंके कहे हुएके समान है । परिशिष्ट (१३, १३) मे कहा है कि-विद्वान् पुरुष जिस जिस देवता- का निर्वचन करता है, उस उस देवताके भावको प्राप्त होता है। इसीसे विद्वान् अनेक देवताओके निर्वचन करनेसे अनेक देवतारूप होता है । अथवा सख्य नाम देवताओके प्यारे देवलोकका है, वेदवाणी कहती है कि-"अर्थज्ञ पुरुषका देवलोकमे अक्षय निवास होता है। किञ्च मन्दबुद्धि पुरुष, वेदके उन दुर्ज्ञेय वा दुरवघटनीय देवता परिज्ञानादि अर्थोंमें जो समुद्रमें छिपे हुए रत्नोंके समान हैं, इस अर्थज्ञ विद्वान्‌के पीछे नही जा सकते । भाव यह है कि- जिस अर्थको वह अकेला खोल सकता है, उस अर्थको बहुतसे भी मन्दबुद्धि आकर नहीं कह सकते । यह उसका स्वतन्त्र संस्कार है, वह देखादेखी उसके समान अध्ययनादि लभ्य नहीं है। उत्तरार्द्धसे अविद्वान्‌की निन्दा- वाणो उस पुरुषके सङ्ग, इस लोक तथा परलोकमे नहीं जाती, जो इसके अर्थको नही जानता । किञ्च-जिस प्रकार कोई पुरुष मायासे सुवर्णको धारण करे, वैसे ही अनर्थ ज्ञ पुरुष इस वाणी- को धारण करता है। वह वाणी उस पुरुषके लिये उन कामोको नहीं दुहातो, जो उससे देवलोक या मनुष्यलोकमें दोहे जा सकते हैं। जिसने पुष्प और फल रहित इस वाणीका श्रवण किया है अर्थात् दृढ आग्रहके साथ मान लिया है, कि-' पाठमात्रके अति-

१५८ अ० १ पा० ६ ख० ४ । रिक्त और कुछ इसमें नहीं है” उसके लिये यह वेदवाणी वैसी अफला तथा अपुष्पा हो जाती है, जैसा उसने देखा है या उसका भाव है। अथवा “अफला” “अपुष्पा” का यह अर्थ है, कि—किञ्चित्- फला तथा किञ्चित्पुष्पा हो जाती है। सर्वथा यह परिश्रम व्यर्थ ही नहीं है। यह भाष्यकारका अभिप्राय है। पुष्प-फल । वाणीका अर्थ ही उसका पुष्प तथा फल होता है। याज्ञ, दैवत और अध्यात्म यह वाणीका समुदित अर्थ है। उसीको रूपकल्पनासे मन्त्रद्रष्टा ऋषि, पुष्प और फल रूप दो विभागोंमें कहता है।—“याज्ञ दैवते पुष्पफले” “दैवताध्यात्मे वा” याज्ञके परिज्ञानको याज्ञ कहते है। देवताके परिज्ञानको दैवत, तथा आत्मविषयक ज्ञानको अध्यात्म कहते है। मन्त्र-ब्राह्मणरूप सम्पूर्ण वेदराशि इन तीन अर्थोंमें बटा हुआ है। जब अभ्युदयरूप धर्मके अभिप्रायको लिया जाता है, तो याज्ञ पुष्प, और दैवत फल है। क्योंकि—पहिले पुष्प ही फलके लिये होता है और फिर वही पुष्प फल रूपसे परिणत होता है। इसी प्रकार यज्ञ भी देवताके लिये पहिले किया जाता है, इस सादृश्यसे याज्ञ पुष्प और दैवत फल है। और जब निःश्रेयस (मोक्ष) रूप धर्मके अभिप्रायको लिया जाता है, तब यज्ञ-दैवत दोनों अर्थ, पुष्प स्थानमें गिने जाते हैं, क्योंकि—दैवतके भीतर ही याज्ञ भी आ जाता है, जिसमें कि— वह उसीके लिये है इसलिये अलग नहीं कहा जाता। और अध्यात्म फल है। क्योंकि—उपासक या मुमुक्षु पुरुष अपने संस्कार युक्त-ज्ञानसे सम्पूर्ण दैवत ज्ञानको आत्माके ही प्रति सम्पादन करता है, जिस प्रकारसे कि—“अधियज्ञ और अधिदैवत सब

हिन्दी निरुक्त । १५६ उच्छिन्न (लीन) होकर कार्य-कारणके अधिदेवताओंके द्वारा अध्यात्म ही बन जाता है। जिस प्रकार घटाकाश मठाकाशमें लय हो जाता है, और मठाकाश महाकाशमें, तथा जिस प्रकार पुष्प भावको त्याग करके पुष्प, फल भावके लिये हो जाता है, उसी प्रकार अधियज्ञ और अधिदैवत सब अध्यात्मभावको धारण कर लेते हैं। इससे याज्ञ और दैवत पुष्पस्थानमें हैं और अध्यात्म फलस्थानमें ॥ ४ ॥ ( खं० ५) साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः । ते अवरेभ्यः असाक्षात्कृत- धर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तः अवरे बिल्म, ग्रहणाय इमं ग्रन्थं समाम्नासिषुः, वेदं च वेदाङ्गानि च । बिल्मं, भिल्मं, भासनम्, इति वा । एतावन्तः समानकर्माणो धातवः । धातु- र्दधातेः । एतावन्ति अस्य सत्वस्य नामधेयानि । एतावताम् अर्थानामिदम् अभिधानम् । नैघण्टुकमिदम् । देवतानामप्राधान्येन इदम्,-इति । तद्यत् अन्यदैवते मन्त्रे निपतति, नैघण्टुकं तत् ॥ ५ ॥ अनुवाद । धर्मके प्रत्यक्ष देखनेवाले ऋषि हुए । उन्होंने पीछे होनेवाले तथा धर्मको साक्षात्कार न करनेवाले ऋषियोंके लिये उपदेश धर्मसे मन्त्रोंको दिया । पीछे होनेवाले ऋषियोंने उपदेशके लिये ग्लानि करते हुए बिल्मसे ग्रहणके लिये इस ( निघण्टु ) ग्रन्थको और वेद तथा वेदाङ्गोंको समाम्नान किया । बिल्म नाम छान बीन या प्रकाश का है। [ निघण्टुका लक्षण ] (जहां ) इतने धातु समान अर्थवाले हैं । 'धातु' शब्द 'डुधाञ् ' धारणपोषणयोः, धातुसे बनता है। इस द्रव्यके इतने नाम हैं, ऐसा ऐसा बताया जावे । यह [ ऐकपदिक या नैगमकाण्डका लक्षण ] जहां इतने अर्थोंका यह नाम है, और इसके अतिरिक्त यह नैघण्टुक (नाम) है, या देवता-

१६० अ० १ पा० ६ ख० ५ ।

ओंके अप्राधान्यसे, यह है, यह भी दिखाया जावे । [ यह नैगम- काण्ड ] अन्य देवताके मन्त्रमें उसीकी प्रशंसाके लिये दूसरे देवता का नाम आजावे उस नामको 'नैघण्टुक' कहते हैं । [ यह 'नैघण्टुक' शब्द आद्य प्रकरणके लिये नहीं बल्कि-शब्द विशेषोंके लिये है, जो नैगम काण्डमें बताये जावेंगे ।] ॥ ५ ॥ व्याख्या । निरुक्तकी प्रधानता । उत्पत्ति और उसका प्रयोजन । पूर्व ऋषि और अवर ऋषि । जिन्होंने अपने तपोबलसे धर्मका साक्षात्कार किया है, ऐसे साक्षात्कृतधर्मा पूर्व ऋषि हुए हैं। अर्थात् पूर्व ऋषि जो सब ऋषि- योंसे पहिले हुए थे, उन्होंने किसी पुरुषान्तरसे मन्त्रोंका श्रवण, नहीं किया था, अपितु विनाही श्रवणके तपोमात्रसे मन्त्रोंका दर्शन किया था। धर्मके साक्षात्कारसे, धर्मसे उत्पन्न होनेवाले सुखोंके साक्षात्कारसे है, कि-उन्होंने धर्मसे उत्पन्न होनेवाले फलोंका प्रत्यक्ष दर्शन किया था, इसीसे वे वेदार्थ व धर्मके सम्बन्धमें सर्व प्रकारसे सन्देहरहित थे। उन्हीं साक्षात्कृतधर्मा पूर्व ऋषियोंने अवर या उनसे पीछे होने- वाले ऋषियोंको ग्रन्थ तथा अर्थ दोनो ही रूपसे मन्त्र दिये । इन ऋषियोंको पूर्व ऋषियोंके समान बिना ही श्रवणके मन्त्रोंका दर्शन नहीं हुआ था, अपितु पूर्व ऋषियोंसे श्रवणके द्वारा ही मन्त्र प्राप्त हुए थे, इससे पूर्व ऋषियोंकी अपेक्षा इनका “श्रुतर्षि” यह विशेष नाम होता है । किन्तु उनमे भी उनसे पीछे होनेवाले पुरुषोंकी अपेक्षा इतना महत्व हुआ कि-उन्होने उपदेशमात्रसे ही अर्थ सहित मन्त्रोंका ग्रहण कर लिया, उनके लिये पूर्व ऋषियोंको उनके सम- झानेके लिये कुछ विशेष उपायोका अवलम्बन नहीं करना पड़ा और

हिन्दी निरुक्तः । १६१ न उन्होंको कुछ मन्त्रों या अर्थोंका श्रोषण करना पड़ा।। तात्पर्य यह कि-वे अन्तःकरणकी अति पवित्रताके एक बारही कथनमात्रसे ज्ञातव्य अर्थका ग्रहण तथा धारण करनेमें समर्थ हुए थे । उन श्रुतर्षि महापुरुषोंने अपनेसे पीछे होनेवाले पुरुषोंको देखा कि-ये अल्पायु और मन्दबुद्धि हैं, इससे ये हमारे समान वेद व वेदार्थको संकेतसे बताने मात्रसे नहीं समझेंगे, इसके कारण ग्लानि तथा खेदको प्राप्त होते हुए, ऋषियोंने अवरजनों पर परम अनुकम्पा करके गो आदि देवपत्नी पर्यन्त ( १७७० ) शब्दोंके संग्रह स्वरूप ग्रन्थका निर्माण किया । यही नहीं किन्तु इसके अतिरिक्त वेद और वेदाङ्गोका भी समाम्नान किया । प्रयोजन यह कि-पहिले एक ही वेद था, इसलिये वह अतिमहान् और पढ़नेमें कठिन था । इसलिये उसकी अनेक शाखाभेदसे समाम्नान किया । भगवान् व्यासदेवने अवर पुरुषोके सुखपूर्वक ग्रहणके लिये यह महाप्रयत्न किया था। जैसे कि-ऋग्वेदकी इक्कीस ( २१ ) शाखा, यजुर्वेदकी एक सौ ( १०० ) सामवेदकी सहस्र ( १००० ) तथा अथर्ववेदकी नो ( ६ ) शाखाएं कर दीं। इसी प्रकार ऋषियोने वेदाङ्गोका भी विभाग कर दिया।। जैसे कि- व्याकरण आठ ( ८) प्रकार और निरुक्त चोदह प्रकारका करदिया । ऐसा करदेनेसे सबके छोटे छोटे रूप होगये । "शक्तिहीन तथा अल्पायु पुरुष यथाप्रयोजन सुखपूर्वक पढ़ सकेंगे", यही प्रयोजन इस प्रयत्नका था। “बिल्म” शब्द भाष्यका है, उसका निर्वचन स्वयम् करते हैं— (क) बिल्म नाम भिल्म. वेदोका भेदम या व्यासका है। (ख) भाषण २१

१६२ अ० १ पा० ५ ख० ५ । (ग) भाषण (प्रकाशन) क्योंकि-वेदाङ्गोंके ज्ञानसे वेदका अर्थ प्रकाशित होता है । उक्त व्युत्पत्तियोंके अनुसार "बिल्म" शब्द "भिद्" या "भास्" धातुसे बनता है । निघण्टुशास्त्रकी विरचना । "निघण्टु" शास्त्रकी रचना तीन भागोंमें कीगई है । १-पहिला भाग "नैघण्टुक" है। जिसमें "इस द्रव्यके इतने नाम हैं" "इतने समान अर्थ वाले धातु हैं" ऐसी ऐसी पदोंकी राशि दिखाई गई हैं । इस प्रकरणमें 'इतने इस द्रव्यके नाम हैं'इस प्रकार जो नामों- की संख्या बताई गई है, वह उसी प्रकार स्वीकार करने योग्य है। जैसे कि-"पृथिवीके इक्कीस (२१) नाम हैं" यहां इक्कीस (२१) संख्या ग्राह्य है । इसी प्रकार धातुओंमें जो संख्या बताई है वह भी उसी प्रकार ग्राह्य है। जैसे- "गति- कर्म्माण उत्तरे धातवो द्वाविंशतशतम्" 'आगेके एकसौ बाईस (१२२) गति अर्थ वाले धातु हैं' तथा "कान्तिकर्म्माण उत्तरे धातवोऽष्टादश" 'आगे अठारह, (१८) कान्ति अर्थ वाले धातु हैं' यह १८ संख्या है। इत्यादि । अर्थात् जहां उपर्युक्त दोनों बाते या और कुछ प्रसङ्ग प्राप्त विचारा जावे, वह नैघण्टुक काण्ड है । "गौः" पदसे "जहा" शब्दसे पूर्व जितने शब्द हैं, वे उक्त सज्जानसे बोले जाते हैं । २-दूसरा भाग "नैगम" या "ऐकपदिक" काण्डके नामसे बोला जाता है। इस काण्डमे "इतने अर्थोंका यह नाम है" यह अर्थ विचारा जाता है। जैसे- "आदित्य भी 'अकूपार' है" और "समुद्र भी 'अकूपार'है" ऐसे ऐसे अनवगत संस्कार "जहा" आदि निगम शब्द विचारे जाते हैं । जिनका अर्थ