निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २०० ) ५ अ० ४ पा० ७ खं० “इन्द्रवैकुण्ठ ऋषि, इन्द्रदेवता के सूक्त में निविद्धानीय महाव्रत महदुक्थ शस्त्र में शस्त्र है। ‘सहसः’ ( बलस्य ) ‘सूनो’ हे बलकेपुत्र ! तू ‘यानि’ जिन को ‘दधिषे’ ( धत्स्व = धत्से ) धारण करता है, ‘एता’ ( एतानि ) इन ‘विश्वा’ (विश्वानि.) सब ‘सवना’ ( सव- नानि = स्थानानि ) स्थानों को ‘स्वयम्’ आप ‘तूतुम्’ (तूर्णम्) शीघ्र ‘आकृषे’ (उपाकुरुषे) उस २ रूप से वहां प्राप्त होकर बना लेताहै। इससे ‘ते’तुझ ‘वराय’ श्रेष्ठ‘धर्मणे’ धारण करनेवालेकेलिये ‘पात्रम्’ यह सोमरसका भराहुआ पात्र है। ‘तना (धनम्) धन सब तेरा ही है। ‘यज्ञः सब यज्ञ तेरा ही है। ‘मन्त्रः’ कर्म का साधन मन्त्र तेरा ही है। ‘ब्रह्म’ अन्न सब तेरा ही है। ‘उद्यतम्’ जो कुछ इस समय प्रस्तुत ( तैयार ) है, सब तेरा ही है। ‘वचः’ स्तुति रूप वाणी तेरी ही है। ( इसका स्पष्ट रस “ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितम् ” इस पुराण वाक्य में बहुत सरलता से अनुभूत हो जाता है ।) यहा पर “तुतुम्” शब्द समान रूपताके कारण ‘तूर्णम्’ का ही सिद्ध होता है। और करनेके सम्बन्ध से भी । क्योंकि जो कर्त्तव्य होता है, उसका शीघ्र ही करना इष्ट होता है। “आकृषे” पद में भी जो किया जाता है, वह पास जाकर ही किया जाता है, इस लिये भाष्यकार ने ‘उप’शब्द ( समी- पवाचक ) अध्याहार किया है। कोई आचार्य इस मन्त्र को अग्नि देवता का मानकर व्याख्यान करते हैं किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि-यह मन्त्र .“प्रवोमहे” सूक्त का है, और वह सूक्त इन्द्र का ही है, इस लिये अग्नि का मानने से प्रकरण विरोध होगा।
हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) ५ अ० ४ पा० ८ खं० 'अंसत्रम्' (७५) यह अनवगत है । विकल्प से अनेकार्थ है । "अंहसः त्राणम्” ( पाप से रक्षा करने वाला ) यह शब्द समाधि है । “धनुर्वा कवचं वा” (धनुष अथवा कवच) यह अर्थ-कथन है । क्यों कि-उन दोनों से योद्धा साम्ग्रामिक (सग्राम के) अंहस् (कष्ट) मे अपनी रक्षा करते हैं । अंसत्र ( ७५ ) क्या ? अंहस् ( कष्ट) से त्राण ( रक्षा ) करने का साधन । वह क्या ? अथवा धनुष् अथवा कवच । 'कवच' क्यों ? वह 'कु' (कुटिल) 'अञ्चित' (खिँचा हुआ) रहता है, अथवा कुछ कुटिल खिंचा हुआ रहता है । अथवा शरीर में अञ्चित पूजित या गया हुआ होता है ॥ ७ (२५) ॥ ( खं० ८ ) (निघ०-) काकुदम् ॥ ७६ ॥ (निरु०-) “प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम् । द्रोणाहावमवत मश्मचक्र मंसत्र कोशंसिञ्चता नृपाणम् ॥” ( ऋ० सं० ८, ५, १९, १ ] प्रीणीत अश्वान् सुहितं जयथ, जयनं वो हितमस्तु, स्वस्तिवाहनं रथं कुरुध्वं, द्रोणाहावम् । 'द्रोणं' द्रुममयं भवति । 'आहावः' आहानात् । 'आवहः' आवहनात् 'अवतः' अवातितो महान् भवति । 'अश्मचक्रम्' अशनचक्रम् । असनचक्रमितिवा । 'अंसत्रकोशम्' "अंसत्राणि" वः कोशस्थानीयानि सन्तु । 'कोशः' कुष्णातेः । विकुषितो भवति ॥
हिन्दी निरुक्त ( २०२ ) ५ अ० ४ पा० ६ खंड अयमपि इतरः कोशः एतस्मादेव । संचयः । आचितमात्रो महान् भवति । सिञ्चत नृपाणम् । नरपाणं कूपकर्मणा संग्राममुपमिमीते ॥ 'काकुदं' तालु इत्याचक्षते । जिह्वा 'कोकुवा' सा अस्मिन् धीयते । 'जिह्वा' कोकुवा । कोकूय- माना वर्णान्नुदति-इति वा। कौकूयते वा स्यात् शब्दकर्मणः । 'जिह्वा' जोहुवा । 'तालु' तरतेः । तीर्णतमम् अङ्गम्। लनते र्वा स्यात् लम्बकर्मणो विपरीतात्, यथा 'तलं'। 'लता'-इति-अविपर्ययः ॥ ६ (२६) ॥ “प्रीणीताश्वान्” ऋचा का सोम का पुत्र बुध ऋषि है। विश्वेदेव देवता है।- अर्थः- (हे विश्वेदेवाः !) सब देवताओं ! 'अश्वान्' इन अपने घोड़ों को 'प्रीणीत' घास दाणा आदि से तृप्त करो प्रयोजन यह कि-'यह संग्राम उपस्थित है। इन अश्वों को पुष्ट तथा बलयुक्त करके इनसे 'हितम्' (सुहितम्) सुन्दर हित रूप 'जयथ' (जयथ) जय प्राप्त करो । 'हित' विशेषण से प्रयोजन यह है कि-कोई अहित जय भी होता है,जिसमें कि- सुहृदों (मित्रों) भाइयों और पुत्र आदिकों का वध हो जैसा कि-कौरव पाण्डवों का महाभारत में हुआ । अर्थात्-(जयनं वः हितम् अस्तु) तुम्हारा जय हित हो । 'स्वस्तिवाहम्' (स्वस्ति- वाहनम्) बड़े उत्तम घोड़ों वाला 'रथम्' रथको 'कृणुध्वम्'
हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) पृ० ४ पा० ८ खं० ( कुरुध्वम् ) करो । 'द्रोणावहम्' ( द्रोणं द्रुमयं भवति ) द्रोण यं काठके बने हुए इस रथको 'आवह' युद्ध के योग्य बनाकर 'अवतम्' इस संग्राम रूप कूप को 'अंसत्र कोशम्' अंसत्र नाम धनुषों का अथवा कवचों का कोश ( खजाना ) हो, ऐसे 'सिञ्चत' सींचो । जो संग्राम कूप 'नरपाणम्' नर-पाण है, या जिस में नर ( मनुष्य ) ही जलके समान भरे आते हैं, जो 'अश्म चक्रम्' अश्मचक्र है, या जिसमें चक्र व्याप्त रहते हैं, अथवा फेंके जाते हैं ॥ 'आवह' (युद्ध) आवाहनसे है । क्योंकि-उसमें एक योद्धा प्रतियोद्धा को आवाहन करता है । 'आवह' ( वाहन ) आव- हन ( ले चलने ) से है, क्योंकि-वह अपने स्वामी को अपने ऊपर चढाकर स्थानान्तर में ले जाता है । 'अवत' ( कूप ) क्यों ? वह 'अवातित' या खोदा जाता हुआ (अव) नीचे को ही ( अतित ) गया हुआ महान् होता है । 'अश्मचक्र (युद्ध) क्यों ? वह अशनचक्र होता है, या उस में फेंके हुए अस्त्र व्याप्त रहते हैं । अथवा वह असन चक्र होता है, या उसमें चक्र फेंके जाते हैं । प्रायः 'अश्मचक्र' यह अवत (कूप) का विशेषण भी हो सकता है । क्योंकि-वह अश्म ( पत्थर ) का चक्र (गोल) जैसा बना हुआ होता है । 'अंसत्र- कोशम्' अंसत्र (धनुष् या कवच) तुम्हारे कोश के स्थान में हों । 'कोश' (म्यान) कोषणा ( गोदने ) अर्थ में 'कुष' ( क्रया० प० ) धातुसे है । क्योंकि-वह अनेक प्रकार से गुदाहुआ होता है । चर्म का सिला हुआ होता है ॥ यह भी दूसरा कोश ( द्रव्य का घर ) इसी 'कुष्' धातु से है । वह 'संचय'-या महान् ( बड़ा ) 'आचित मात्र' ( जिसमें
हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं० मात्राएँ आश्रित ( भरी हुईं ) हों ) होता है । ऋचाके उत्तरार्द्ध में कूप ( कूएं ) के कर्म से संग्राम को उपमा देता है ॥ 'काकुद्' (७६) यह अनवगत है । 'काकुद्' को तालु (तालुवा) ऐसा कहते हैं। वह 'काकुद्' क्यों है ? कोकुवा जिह्वा होती है, वह इसमें धारण की जाती है । जिह्वा 'कोकुवा' क्यों कहलाती है ? वह कोकूयमान ( कू- कती हुई ) वर्णों (अक्षरों) को प्रेरित करती है । अथवा शब्द अर्थ में 'कु' ( यङन्त ) धातु से है । 'जिह्वा' क्यों ? वह जोहुवा है, या उससे प्राणी आत्मा में अन्न का होम करते हैं । अथवा उससे दूसरे को आवाहन करते हैं । इस से वह जिह्वा है । 'तालु' कैसे ? 'तृ' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्यों कि- वह अन्य अङ्गोंसे विस्तृत होता है । अथवा लम्बन (लटकने) अर्थ में 'लत' (भ्वा० प०) धातुके विपरीत (उलटे) रूप से है । जैसे 'तल' शब्द । 'लता' शब्द उसी 'लत' धातु के सीधे रूप से होता है ॥ ८ ( २६ ) ॥ ( खं० ६ ) [निघ०-] वीरिंटं ॥ ७७ ॥ (निरु०) " सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः । अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥" ( ऋ० सं० ६, ५, ७, २) सुदेवः त्वं कल्याणदानः, यस्य तव देव सप्त सि-
हिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं० न्धवः प्राणाय अनुक्षरन्ति काकुदं सूर्म्यं सुषिरा- मिव इत्यपि निगमो भवति । सुदेवस्त्वं कल्याणदेवः, कमनीयदेवो वा भवसि। वरुण, यस्य ते सप्त सिन्धवः । ‘सिन्धुः’ स्रवणात् । यस्य ते सप्त स्रोतांसि, तानि ते काकुदम्-अनुक्षरन्ति । ‘सूर्मि’ कल्याणीर्मि स्रोतः, सुषिरमनु यथा । ‘बीरिटं’ “तैटीकिः” अन्तरिक्षमेवमाह-पूर्वं वयतेः, उत्तरम्-इरतेः । वयांसि इरन्ति-अस्मिन्, भांसि वा । तदेतस्याम् - ऋचि - उदाहरन्ति अपि निगमो भवति ॥ ९ ( २७ ) ॥ “सुदेवोअसि”यह ऋचा प्रियमेधा ऋषि की है । अनुष्टुप छन्द और मन्त्रोक्त (वरुण) देवता है । हे 'वरुण' देव ! 'त्वं' तू सुदेवः (कल्याणदानः) शुभ दान वाला अथवा 'सुदेवः' (कल्याणदेवः, कमनीयदेवो वा) शोभन देव या कल्याण करनेवाला देव या वाञ्छनीय देव'असि'(भवसि) है । क्योंकि-'यस्य' जिसके 'ते' तेरे 'काकुदम्'तालु को'प्राणाय' प्राण (जीवन) के 'सप्त' सात अर्थ 'सिन्धवः' (स्रोतांसि) आकाश की नदियें (बहुला (१) अश्वा (२) तितुत्रा (३) अभ्रपत्नी (४) मेघपत्नी (५) वर्षयन्ती (६) और अरुन्धा (७) अथवा सातों समुद्र 'अनुक्षरन्ति' सब ओर से गीला करते हैं
हिन्दी निरुक्त (२०६) ५ अ० ४ पा० ६ खं० (भरते हैं), 'इव' (यथा) जैसे 'सूर्म्यम्' (सूर्म्मि = कल्याणीर्म्मि स्रोतः) अच्छी लहरों वाला ग्राम का जल सुषिरराम्' (सुषि- रम्-अनुक्षरति) उसके बाहरके प्रदेश (गोरखा) में सब ओर व्यापन करता है ॥ यह भी निगम होता है। इस प्रकार यहां पर सिन्धुओं के अनुक्षरण (बहने) के सम्बन्ध से 'काकुद्' तालु है, यह सिद्ध होता है। इस मन्त्र के पूरे पढ़ने का प्रयोजन मन्त्र के अर्थ की गम्भीरता है। क्योंकि-और ऋचाएं जो इस प्रकरण में पूरी पढ़ी गई हैं, उन में समाम्नाय के शब्दों के अतिरिक्त भी अनवगत संस्कार पद हैं, उनकी व्याख्या दिखाने के लिये पूरी पढ़ी गई हैं, किन्तु इस ऋचा में कोई अनवगत पद भी नहीं है, इस लिये अर्थगम्भीरता ही इस के पूरे पढ़ने का कारण है। अथवा 'काकुद्' शब्द का ही अर्थ प्रयत्न से ढूंढा जा सकता है, इस लिये यह पूरी पढ़ी गई है ॥ 'सिन्धु' क्यों ? स्रवण या बहने से या झरने से ॥ 'बीरिट' (७७) यह अनवगत और पद्म से अनेकार्थ है। 'बीरिट' क्यों ? यह 'भीततन' या इसमें भी (भय) तनन (फैला हुआ) है। क्यों कि-यह (आकाश) बिना किसी आधार के ऊपर टिका हुआ है, इसी से इससे सब डरत है। बीरिट को तैटीकि आचार्य अन्तरिक्ष इस रीति से कहता है पहिला भाग (बी) 'वी' (भ्वा० प०) धातु का और दूसरा भाग (ईरिट) 'ईर्' (भ्वा०प०) धातु का है, अर्थात् 'वयांसि पक्षी इसमें 'ईरन्ति' उड़ते हैं। 'वि'- ईर्' को मिलकर बीरिट हुआ। अथवा 'भांसि' नक्षत्र इसमें 'ईरन्ति' फिरते हैं, इससे
हिन्दी निरुक्त (१०७) ५ अ० ४ पा० १० खं० 'बीरिट' है। उसे इस ऋचा में उदाहरण करते हैं, निगम भी है-॥ ६ (२७) ॥ (खं० १०) [निघ०-] अच्छ ॥७८॥ परि ॥ ७६ ॥ ईम् ॥८०॥ सीम् ॥८१॥ एनम् ॥ ८२ ॥ एनाम् ॥८३॥ मृशः ॥८४॥ इति चतुर- शीतिः पदानि ॥ (निरु०-) " प्रवावृजे सुप्रया बर्हिरेशा मा विश- तीव बीरिटइयातं । विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥” (ऋ० सं० ५, ४, ६, २, ) प्रवृज्यते सुप्रायणं बर्हिः-एषाम्, एयाते सर्वस्य पातारौ वा पालयितारौ वा । 'बीरिटम्' अन्तरि- क्षम् । भियो वा भासो वा ततिः । अपि वा उपमार्थे स्यात्- सर्वपती इव राजानौ बीरिटे गणे मनुष्या- णां । रात्र्या विवासे पूर्वस्यामभिहूतौ वायुश्च नियु- त्त्वान्, पूषा च स्वस्त्ययनाय ॥ 'नियुत्वान्' नियुत' अस्य अश्वाः । 'नियुतः' नियमनाद्वा । नियोजनाद् वा ॥ 'अच्छ' अभेः । आप्तुम्-इति शाकपूणिः ॥
हिन्दी निरुक्त (२०८) ५ अ० ४ पा० १० खं० 'परि' 'ईम्' 'सीम्'-इति व्याख्याताः ॥ 'एनम्' 'एनाम्' "अस्याः-अस्य"-इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ 'सृणिः' अङ्कुशो भवति । सरणात् ॥ 'अङ्कुशः' अञ्चतेः । आकुञ्चितो भवति- इति वा ॥ "नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्" (य० वा० सं० १२, ६८,) । इत्यपि निगमो भवति ॥ 'अन्तिकतमम्-अङ्कुशादायात् पक्वम्-औषधम् आगच्छतु'-इति आगच्छतु-इति ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ५, ४ ॥ "प्रवावृजे" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । - 'सुप्रयाः' (सुप्रयाणम्) जिसपर अच्छे प्रकार देवता आसकते हों, ऐसे भले प्रकार 'बर्हिः' कुशा (डाभ) 'प्रवावृजे' (प्रवृज्यते) बिछाई जाती है । 'विशपती' सर्वस्य जगतःपती) सब जगत् के स्वामी 'आ-इयाते' (आगच्छतः) आते हैं । कहां फिर अवस्थित होकर आते हैं ? 'बीरिंटे' (अन्तरिक्षे) आकाश में । 'इव' (पाद पूरण है ।) । अथवा 'बीरिंटे' (गणे मनुष्याणाम् ) मनुष्योंके समूह में अवस्थित हुए हुए 'विशपति' सब के पति राजाओं के 'इव' समान 'आ-इयाते' आते हैं । किसके यहां आते हैं ? किस काल में आते हैं ? कौन आते हैं किस प्रयोजन से आते हैं ? 'एषाम्' इन 'विशाम्' (मनुष्या-
हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ५ अ० ४ पा० १० खं० षाम् ) मनुष्यों के हर एक क्रियामें बुलाये हुये 'अक्तोः' (रात्र्याः) ( विवासे अपगमे ) रात्रिके बीत जाने पर 'उषसः' 'च' ( आ- गमनकाले ) और उषा के आगमन काल में 'पूर्वहूत्तौ' ( पूर्व- स्यामेव अभिहूतौ ) पहिले ही बुलावे में 'नियुत्वान्' नियुत् घोड़ों वाला 'वायुः' वायु 'पूषा' (च) और पूषा दोनों 'स्वस्तये' यजमान के कल्याण के लिये 'एयाते' आते हैं ॥ क्योंकि-देवता अन्तरिक्ष से ही आते हैं इस कारण 'बीरिट' नाम आकाश का ही हो सकता है । और जिस पक्ष में 'बीरिट' नाम गण ( समूह ) का है, उस पक्ष में भी राजा लोग गण के मध्य में हो कर ही चलते हैं, यह उपपन्न होता है । निरुक्तार्थः-इन देवताओं के अच्छे आगमन योग्य कुशा बिछाई जाती है आते हैं, सबके पाता या पालयिता (पालन करने वाले ) । ( धातु दो हैं, और अर्थ एक है ) । 'बीरिट' नाम अन्तरिक्ष का है । क्यों कि-उस में भय का विस्तार है, या ज्योति ( ताराग्रह आदि ) का विस्तार है । अथवा 'इव' उपमा अर्थ में है । सब के पतियों जैसे राजा, बीरिट नाम मनुष्यों के समूह में ( अवस्थित ) । रात्रि के चले जाने पर पहिली अभिहूति ( बुलावे ) में नियुत्वान् वायु और पूषा स्व- स्त्ययन ( कल्याण ) के लिये ॥ 'नियुत्वान्' क्यों ? नियुत् इसके घोड़े हैं । 'नियुत्' क्यों? नियमन (शासन किये जाने) से । अथवा नियोजन (जोड़ने) से । 'अच्छ' (९८) शब्द 'अभि' (अव्यय) शब्द से है, या उस के अर्थमें है । शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि-'आप्तुम्' (प्राप्त होने को ) पद के अर्थ में है । २७
हिन्दी निरुक्त ( २१० ) ५ अ० ४ पा० १० खं० 'परि' (७६) 'ईम्' (८०) 'सीम्' (८१) ये प्रथम अध्याय में निपात और उपसर्गों के प्रकरण में व्याख्यान किये जा चुके हैं। ('परि' १, १, ५, 'ईम्' १, ३, ५, 'सीम्' १, ३, २) 'एनम्' ( ८२ ) 'एनाम्' ( ८३ ) ये दोनों पद 'अस्याः' 'अस्य' इन दोनों पदों से चतुर्थ अध्याय में (४, ४, ४) व्या- ख्यान किये जा चुके हैं । 'सृणिः' (८४) यह अङ्कुश का नाम है । क्योंकि-वह हाथी के शिर पर सरण (गमन) करता है । 'अङ्कुश' शब्द कैसे ? 'अञ्च' ( भ्वा०प० ) धातु से हैं। अथवा आकुंचित या मुड़ा हुआ होता है । अतः आकुंचित होता हुआ 'अङ्कुश' होता है । “नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्” (य०वा०सं०१२,६८) हे कर्षको ! 'सृण्यः' सृणि (अङ्कुश) जितनी दूरी पर टिक कर सस्य को खींच सकता है, उससे 'इत्' भी 'नेदीयः' (अन्तिक- तमम्) बहुत निकट पक्व (पकी हुई) औषधि 'एयात्' हमारे प्रति आवे । ऐसा गहरा बोओ ॥ कोई कहते हैं, हे कर्षको ! ऐसे बीज बोओ, जैसे-दात्र (दरांत) के द्वारा खींचने से पहिले हमारी मुट्ठी सस्य (धान्य) से भरजावे इस पक्ष में अङ्कुश नाम दात्र का ही है । उस से खींचे हुए सस्य के 'अङ्कुशादायात्' दात्र से खींचने से पहिले 'नेदीयः' (अन्तिकतमम्) बहुत निकट हुआ हुआ 'पक्वम्' पका हुआ 'औषधम्' औषध 'आगच्छतु' आवे 'आगच्छतु' आवे । अध्याय की समाप्ति दिखाने के अर्थ 'आगच्छतु' पद को दो बार पढ़ा है ॥ इस प्रकार यहां 'नेदीयः' शब्द के सम्बन्ध से 'सृणि' अङ्कुश अथवा दात्र ( दरांत ) है ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः
हिन्दी निरुक्त ( २११ ) ५ अ० ४ पा० २० खं० निरुक्त के पञ्चमाध्याय का खण्डसूत्र— [प्र०पा०-] सस्मिन् (१) असश्चन्ती (२) न यस्य (३) वरा- हो (स्वसराणि) (४) गायन्ति त्वा (५) [द्वि०पा०-] पवित्र ६) पुरुत्वा (७) किमित्ते (८) प्रतक्षे (९) अग्निनरः (१०) एकया (अभिगुः) (११) अपान्तमन्युः १२) [तृ०पा०-] उर्वेश्यप्सुराः (१३) उतासि (१४) अहम् (१५) नियत् (१६) कदामर्श (१७) पत्नीवन्तः (१८) सुषुरदत् (१६) [च०पा०-] वृकश्चन्द्रमाः (२०) अरुषो मा (आजडयीत्) (२१) य इन्द्राग्नी (२२) मानः समस्य (२३) हविषाजारः (२४) पृथक्प्रायन् (२५) प्रीयीता (२६ सुदेवः (२७) प्रवावृजे (२८) अष्टाविंशतिः (२६) ॥ इति निरुक्ते पूर्व षट्के पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इति हिन्दीनिरुक्त के पूर्व षट्के पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥५॥
हिन्दी निरुक्त ( २१३ ) ६ अध्याय ७ कल्पयम् । कुलपयसम् । सुलभल्पयः । “त्वंचिद्व्याकल्पयं यथामम् ” ८ विलुङ्गः । आपोमभवन्ति । बिल वखात् । वयाइवहुरुहःसप्त विलङ्गः । ९ वीरुधः । वीरुध ओषधयो भवन्ति । विरोहणात् “वीरुधः पारयिष्णवः” । १० ससद्दामम् । अननुवानदामम् । अभ्यश्नेन दृब्नोतीति “नसद्दामं लतुरिं पर्वतेष्ठाम्” ११ आस्कृधोयुः । अकृष्वायः । ( दीर्घायुः ) “यो अस्कृधोयु रजरः स्वर्वान् ” १२ निष्पृम्भः । निश्चयहानिकः । (निखणयादिदृषा गत्याहरन्तः) । “आजातः पूषंकरणं निष्टम्भास्तेनन-प्रियम्” १३ बबुदुक्यम् । महदुक्यम् । वक्तव्यमस्मै उक्थम् इति बूबुदुक्योवा । “बूबुदुक्यं हवामहे” १४ क्रदूदरः । सोमः । मदूरः मदूकदरेधितिवा । “क्रदूदरथ सख्या सचेय” १५ ऋदूपे । इत्युपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः । ( बृन्द १२८ व्याख्याने ) “ऋदूपेचिद्दूधवो०” ( पा० ६ सं० ५ ) १६ पलकामः । बहुकामः । “पलकामो हि मर्त्यः ” १७ असिन्वती असंखादन्त्यौ । “असिन्वती बप्सती६” १८ कपनाः कम्पनाः । किमयो भवन्ति “मोषथा वधं कपनेव” १ भाऋजीकः प्रतिष्ठभाः । “घर्मकेतःसमिधा भाऋ जीकः” २ सजाताः । मद्योभवन्ति । कुर्वन्ति कलानि । “संसजाताः पिपिशुर्द्रुम्यः” ३ अक्तिः । (अक्तिः) अक्तेर्वा द्रक्तेर्वा दूनेतेर्वा । “चित्राअजिनेनवश्चिति”
हिन्दी निरुक्त ( २१४ ) ६ अध्याय संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम । २२ | ओम्मना । | ( अवनस्य ) | "परिप्रं समोमना वांवयोगत्" २३ | उपप्रक्षिणी । | सक्तु कारिका । उपलेषु प्रक्षिपति । उपलप्रक्षेपिणीवा | "कारुरहं ततोभिषगुपलप्रक्षिणीनना" २४ | उपमि । | उपस्थे । | "आसीनऊर्द्वामुपसिक्षिशाति" २५ | प्रकल्पविन् । | वणिग्भवति । कलाशचवेद्प्रकलाशच । | "दुर्मित्रासःप्रकल्पविन् निम्मानाः" २६ | अभ्यर्द्ध यश्वा । | अन्योधन्यञ्चास्ति । | "सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्ध यश्वा" २७ | ईक्षे । | ईशिषे । | "ईक्षेहि वस्व उभयस्य राजन्" २८ | क्षोषस्य । | अपत्यस्य । | "महःक्षोषस्याशिषनाकरावथ" २९ | अस्मे : | वयम् । अस्मान् । अस्माभिः । अस्मभ्यम् | (१) "अस्मेतेबन्ध्वा" (२) "अस्मेसयांताना- | | अस्मत् । अस्माकम् । अस्मासु । | सत्यासजोषाः" (३) "अस्मेसमानैर्नभिर्- | | | घमपौरस्येभिः" (४) अस्मेप्रयंन्थि मघव- | | | न्नृजोषिन्" (५) अस्मेभ्रारारिचिदुद्दु वः | | | सन्तुयुं यौतु" (६) ऊर्वइवप्रथेकंसो- | | | अस्मे" (७) अस्मेधत्तसवसोवसूसि" ।
हिन्दी निरुक्त ( २१५ ) ६ अध्याय ३० पाथः । अन्तरिक्षम् । पथोव्याख्यातुम् । "श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः" उदकमपि पाथ उच्यते पानात् । "आचष्ट त्रांसांपाथो नदीनाम्" अन्नमपि पाथ उच्यते पानाद्वा । "देवानांपाथ उपवक्षिविद्वान्" ३१ सर्वसीनि । प्रसवे । "देवस्यवयंसवितुः सर्वसीनि" ३२ समया । सर्वतः पृथुः । "त्वमग्ने समयाश्चित्" ३३ विदथानि । वेदनानि । "विदथानि प्रचोदयन्" ३४ आयन्तः समाश्रिताः । "आयन्त इव सूर्य्यंविश्वेदिन्द्रस्य भक्षत" ३५ आशीः । आशिरम् । ( दधि ) "इन्द्राय गाव आशीरम्" अथैषमितराआशीः आशास्ते 'सामै सत्याशीर्देवेषु' ३६ अजोगः । अगारतः । जिगीर्तिर्गरितिकर्मो वा । यदातेमर्त्तो अनुभोगमानलादिदग्नि ष्ठ गृणातिकर्मावा । गृह्णातिकर्मावा । ओषधीरोजोगः । ३७ अमूरः । अमूढः । "मराअमूर न वयं चिकित्वः" ३८ शशमानः । शंसमानः । योवांयज्ञैः शशमानो ह दाशति । ३९ देवो देवाच्या कृपा देवाच्या देवान्प्रति प्रञ्चितया । कृपा "देवोदेवाच्याकृपा" कल्पतया । ४० विजामातुः । विजामातेति शश्वद्दाक्षिणाजाः क्रीता 'अश्रवं हि भूरिदावत्तरा वांविजामा- पतिमाचक्षते । असमस्तइव वरोभि- तुरत वा घास्यालात्" प्रेतः ।
हिन्दी निरुक्त ( २१६ ) ६ अध्याय संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम । ४१ ओमासः । ओमासइत्युपरिष्टाद्व्याख्यास्यामः । “ओमासश्चर्षणीधृतोविश्वेदेवास उपस्ते” ४२ सोमानम् । सोतारम् । “इन्द्रासोमा० • ह्वं षोधत्तमसनद्वायं ४३ अनवद्यम् । अनवद्यम् किमीदिने’ । ४४ किमीदिने । किमिदंकिमिदमित्येवंचकारिपिशुनः । ४५ अमवान् । अमात्यवान् । अभ्यमनवान् । स्ववान्वा “कृणुष्वपाजःप्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवांइभेन’ । ४६ अमीवा । अम्यमनेन व्याख्याता “यस्तेगर्भममीवा दुर्णामायोनिमाशये” ४७ दुरितम् । दुर्गतिगमनम् । “अतित्रिमन्तो दुरितानिविश्वा” । ४८ ऋत्वे । ऋत्वा — यतेनया विद्धीडपचीयते । ‘ऋत्वे परेहि’ । व्याधिवों भयंवा । ४९ अमतिः । अमाययी । मतिः । आत्ममयी । “ऊर्ध्वायस्या मतिर्भा अदिद्युतत्सवी मति” ५० ऋष्टी । क्षिप्रमान आश्रुश्रूहीति । “ तां ऋष्वर उशतो यद्यन्ते ऋष्टिमयं ५१ पुरन्धिः । पुरन्धिर्बहुधीः ततः— नासत्या पुरन्धिम् । १— पुरन्धिर्भगः, पुरस्तादस्याम्बा-
हिन्दी निरुक्त ( २१७ ) ६ अध्याय देवाः-इत्येकम् । २-इन्द्र इत्यपरम् । सख्युक्रमेतसः पुरां च दारयितुत्तमः । ३-वरुणा इत्यपरम् । तं प्रजभया- स्तोति । “इमाम् नू कवितमस्य मायाम्” ५२ रुधत् । द्युतिवर्णनाम रोचतेर्ज्वलतिकर्मणः । “समिद्धस्य रुशददर्शिपाजः” । ५३ रिशादसः । रेशयदारिणः ( देवाः ) । 'अस्ति हि वः सजात्यं रिशादसो देवा- सो अस्त्याप्यम् । ५४ सुदत्रः । कल्याणदानः । “त्वंह्यासुदत्रो विद्वाधातुरपाम्”। ५५ सुविदत्रः । कल्याणविद्यः । “आग्नेयाहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्” । ५६ आनुषक् । आनुषगितिनाम-अनुपूर्वस्य । अनु- “स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्” । षक्तं भवति । ५७ तूर्वनिः । तूर्णवनिः । “सतूर्वणिर्महां अरेणु पौंस्ये” । ५८ गिर्वाणाः । देवी भवति । गीर्भिरेनंनयन्तीति । 'जुष्टं गिर्वणसे बृहत्” ५६ असूतँ सूर्यँ अनुसमीरिता, सुसमीरिते । (अन्तरिक्षे) “असूतेँ सूर्यँरजसि निषत्तै ये भूतानि समकृण्वन्विमानि ।” ६० अम्यक् । अमाक्तैति वाऽभ्यक्तेतिवा । “अम्यक्सवात इन्द्रतेसखिभ्यः” । ६१ याह्यिभ्रन् । याहीति । “याह्यिभ्रन्वधि तमः स्ययाविदूत्” ।
हिन्दी निरुक्त (२१८) ३ अध्याय
संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम
६२ | जारयायि । | उत्प्लवगोपिता जारियायिर्जज्ञे । | “ सस्तः पितेव जारयायि यज्ञैः ” । ६३ | ऋधियम् । | अग्रमगनेनेति वा ऽग्रगरणेनेतिवाऽग्रस- | “ प्रवोऽच्छार्का जुजुषाणासो अस्थुरभूत् | | म्पादिम् इतिवा । | विश्वे अग्रियोत वाजाः ” । ६४ | चनः । | इत्यन्ननाम । | ⎧ “ ऋतौदिन्द्र प्रस्थिते मादृग्वीर्विच्वना ६५ | पक्वता ॥ | पक्वानि । पक्वतिर्नामौषतः । ( प्रा- | ⎨ दधिश्चवपक्वतातसोमम् ” | | ख्यातास्वरूपं चेतन्नाम ) । | ⎩ ६६ | पुरुह्वः ॥ | पुरुषा आपो भवन्ति शुचं संहन्वन्ति । | “ ऋतस्यहि पुरुह्वः सन्ति पूर्वीः ” । ६७ | अमिनः । | अमितमात्रो महान् भवति । अम्य- | “ अमिनः सहोभिः ” | | मितो वा । | ६८ | जक्षतीः । | आपो भवन्ति । शब्दकारिक्यः | “ मरुतो जक्षतीरिव ” ६९ | अप्रतित्कुतः । | अप्रतित्कुतः । अप्रतित्वलितो वा । | “ अस्मभ्यमप्रतित्कुतः ' ७० | शासदाना । | शाशद्यमानः । | “ प्रतिस्वां मति मतिरच्छाशदानाः ” ७१ | सम्नः । | सर्पर्कात् । इदमपि इतरत्सम्पूर्धत्स्मा- | “ सुमकरत्नमत्तये ” | | देव । सत्रिचो । नैतंग्रा । |
हिन्दी निरुक्त ( २१६ ) ६ अध्याय ७२ सुशिप्रः सुशिप्रश्चेतेन व्याख्यातम् । शिग्रे हनू । नासिके वा । "वाजे सुशिप्रगोमति" ७३ रंशु । रंशु रमणीयेषु रमणात् । "सचित्रैश्चिकितिले रंशुभासा" ७४ द्विबर्हाः। द्वयोः स्थानयोः परिवृढो मध्यमे च स्थाने उत्तमे च । "उतद्विबर्हा अस्मिनः सहोभिः" ७५ अक्रः । आक्रमणात् । "अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनाम्" ७६ उराशः । उरु कुर्वाणः । "दूत ईयसे प्रदिव उराशः" ७७ स्तियांनाम् स्तिया आपो भवन्ति । स्त्यायनात् । "वृषा सिन्धूनां वृषभः स्त्यानाम्" ७८ स्तिपाः । (अपः) स्तिपापालनः । उपस्थित्यान् पालयति इति वा । "स न स्तिपा उतभवातन्पाः" ७६ जबारु । जवमानरोहि । जरमाणारोहि । गरमा- णरोहि इति वा । "ऋगू रूप अरूपितं जबाहु" ८० जरूथम् । गरुधं । युशतेः । "जरूथं हन्याविरथै पुरन्धिम्" ८१ कुलिशः । इति वज्रनाम । कूलशातनो भवति । "स्कन्धां सीवकुलिशेना विवृक्णाहिः शयत उपपृक् पृथिव्याः" ८२ तुञ्जे । तुञ्जते दानकर्मणः । "तुञ्जे तुञ्जे य उत्तरे" ८३ वर्हुगा । परिवर्हणा । "वह्च्छुष्का प्रसुतौ वर्हणाकृतः" ८४ ततनुष्टिः । (तितनिषुः ) "यो अस्मैमत्रं सध- ० व्यापापञ्चक्तस्ततनुष्टि-
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का लिप्यन्तरण (transcription) दिया जा रहा है:
हिन्दी निरुक्त ( २३० ) ६ अध्याय
| संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम । |
|---|---|---|---|
| ८५ | कुलीकिशः | कुलाविशलयः ( मेघः ) | महति तनूशूने मघवा कवा सखः ।" "न्याविध्यत्कुलीकिशस्य दृहा" |
| ८६ | कियेधाः | कियद्धा धृतित्वा । क्रममाणावा धृतित्वा । ( मेघः ) | "अस्माद्दु ०० वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः" |
| ८७ | भृमिः | भ्राम्यतेः । ( अग्निः ) | "भृमिरस्युच्छिन्नप्रत्येनाम्" |
| ८८ | विषिपतः | विप्ताप्तः । ( सर्वतो यः प्राप्तः ) | "पारं नो अस्य विषिपतस्य पर्षण्" |
| ८९ | तुरीपम् | तूर्णपि । ( उदकम् ) | "तन्नस्तुरोपमद्भुतम्" |
| ९० | रास्पिनः | रास्पी रपतेर्वा । रसतेर्वा । | "रास्पिनस्यायोः" |
| ९१ | ऋञ्जतिः | प्रसाधनकर्मा । | "ऋञ्जतेऋज्रां व्युष्टिषु" |
| ९२ | ऋञ्जनीती | (ऋजुनयनोवा । ऋजुप्रसजो वा) (वरुणाः) | "ऋञ्जनीती नो वरुणः |
| 'ऋजुः' इत्यपि अस्य (ऋञ्जतेः) भवति | |||
| ९३ | प्रतङ्कम् | प्राप्तवत् । | "हरी इन्द्र प्रतङ्कम् अभिश्वर" |
| ९४ | हिनोत | प्रहिणुत | "हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत ब्रह्मणस्पतये धमानाम्" |
| ९५ | चोष्कूयमाणः | दद्दत्-इत्यर्थः । | "चोष्कूयमाण इन्द्र भूरिवामम्" |