निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ६ अ० ६ पा० ८ खं०
धेनुं नः ( आधवः ) (२६) [वष्पा ] अरायि काणे (३०) वामं
घामं (३१) किं ते (३२) तुविद्यन्ते (३३) निराविध्यत् (३४)
अयं होता (३५) हिमेनाग्निं (३६) षट्त्रिंशत् (३६) ॥ *
इति निरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इति नैरुक्तः पूर्वार्द्धः समाप्तः ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः
पूर्वार्द्धश्च समाप्तः ॥ ६, ६ ॥
❖ श्रीः ❖ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ ❧ ❖ उत्तरषट्कम् ❖ ❧ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ दैवतं काण्डम् अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ ( उपोद्घातः ) प्रथमः पादः ( खं० १ ) नैगम काण्ड की व्याख्या के अनन्तर दैवतकाण्ड की व्याख्या के आरम्भ की प्रतिज्ञा-- (निरु०) अथातो दैवतम् । 'अथ' नैगम की व्याख्या के अनन्तर 'अतः' यहां से दैवत प्रकरण की व्याख्या होगी अथवा 'अतः' जिस से कि-अखिल पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का हेतु देवता है इस से “दैवत” प्रकरण की व्याख्या होगी ॥ “दैवत” पद की व्याख्या— (निरु०-) तद् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद् “दैवतम्” इति आचक्षते । 'तत्' सो । क्या ? 'प्राधान्यस्तुतीनाम्' प्राधान्य या मुख्यता से स्तुति वाले 'देवतानाम्' देवताओं के 'यानि ना- मानि' जो नाम हैं, 'तद्' “दैवतम्” वह “दैवत” प्रकरण
. हिन्दी निरुक्त ( २ ) ७ अ० १ पा० १ खं० है । यह आचार्य कहते हैं-इस प्रकरण की (दैवत) संज्ञा है। अब पहिले ( १, ६, ६ ) प्रतिज्ञा की हुई "दैवत" की व्याख्या को स्मरण कराता है— [निरु०-] सा एषा देवतोपपरीक्षा । जो पहिले ( प्रथमाध्याय के छठे पाद् छठे खण्ड में ) प्रतिज्ञा की थी कि—"तद् उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः” (उसको आगे व्याख्यान) करेंगे वही यह देवता पदार्थ की विचार पूर्वक परीक्षा होगी । प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य देवता ( मन्त्रदेवता ) का लक्षण- [निरु०-] यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायाम् आर्थ- पत्यम् इच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति ॥ जिस किसी अर्थ की कामना से ऋषि जिस देवता में आर्थपत्य या अर्थ के स्वामित्व की इच्छा करता हुआ-यह देवता इस वस्तु का स्वामी है, इसी से मुझे यह वस्तु प्राप्त होगी, ऐसा जानता हुआ, स्तुति करता है, वह मन्त्र उस देवता का होता है-उस मन्त्र में वह देवता होता है (जिस किसी मन्त्र में देवता जानना हो उस मन्त्र में इस लक्षण से देवता जानना होगा) । देवता की स्तुति के स्थानभूत ऋचा के भेद- [निरु०-] तास्त्रिविधा ऋचः । जिन में कहा हुआ देवता का लक्षण भले प्रकार घट जाता है, वे ऋचाएं तीन प्रकार की होती हैं ।
हिन्दी निरुक्त (४) ७ अ० १ पा० १ खं० देवता मन्त्रों में स्तुति किये गये हैं, उन्हीं के नाम ये 'अग्नि' आदि 'देवपत्नी' पर्यन्त हैं। अन्य शब्द जो मन्त्रों में आते हैं, वे सब इनके विशेषण हैं, उनके आधिक्य के कारण वे सब पहिले ही 'निघण्टु' शास्त्र में चार अध्यायों में पढ़े गए और तद्नुसार ही निरुक्त में भी षष्ठ अध्याय तक उन्हीं की व्याख्या की गई है। यदि विशेष्य पद जो देवताओं के नाम हैं, उनकी व्याख्या न की जावे, तो विशेषण शब्दों के अर्थ- ज्ञान होने पर भी नहीं जाना जा सकता,-ये किसके विशे- षण हैं, या किसकी प्रशंसा है, सुतराम् विना विशेष्य पदार्थ के जाने और सब शब्दों के अर्थ का जानना तथा न जानना बराबर है, अर्थात्-व्यर्थ है, इस लिये मन्त्रार्थपरिज्ञान के लिये देवता पदों की व्याख्या परमावश्यक है। जैसा कि- कहा है- “यो हवा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गत्तेँवा पतति प्रवामीयते पापीयान् भवति, यात- यामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति” (सा०वे०आ०ब्रा० १ अ० १ खं०) जो ब्राह्मण मन्त्र के ऋषि छन्द देवता तथा ब्राह्मण के जाने विना उससे यज्ञ कराता है, या अध्यापन करता है, वह जड़ता को प्राप्त होता है, गड्ढे (नरक) में गिरता है, मर जाता है, या अति पापी हो जाता है, और उस के मन्त्र बासी हो जाते हैं।
हिन्दी निरुक्त ( ५ ) ७ अ० १ पा० १ खं० दैवतकाण्ड की भूमिका का उद्देश्य । भाष्यकार यास्क मुनि दैवत काण्ड जो अग्नि आदि देवपत्नी पर्यन्त (१५१) शब्दों के रूप में है, उसकी व्याख्या करने की चिन्ता में हैं, किन्तु वह देखते हैं कि-देवता तत्व मन्त्रों का एक ऐसा मुख्य पदार्थ है, जिसके सम्बन्ध में अनेक ऐसी २ बातें जानना आवश्यक हैं, जिनके जाने बिना यदि देवता वाचक शब्दोंके अर्थों का ज्ञान हो भी जावे, तो भी मनुष्य के लिये अनेक स्थल ऐसे उपस्थित हो सकते हैं, जहां वह जाकर मोह को प्राप्त हो सकता है । जैसे-देवता क्या वस्तु है ? । देवता कितने हैं ? देवताओं के कैसे आकार हैं ? देवताओं का परिवार कैसा है ? उनके कौन २ स्थान हैं ? कौन २ सी वस्तुएँ उनकी निजकी हैं, एवम् जहां उनकी स्तुति होती है, उन मन्त्रों के कितने भेद हैं और जहां मन्त्रों में देवता का निश्चय नहीं होता, वहां उसका कैसे निर्णय किया जावेगा इत्यादि ९ बातों के निर्णय के अर्थ पहिले तीन पादों में एक विस्तृत भूमिका लिखते हैं, जिसके पढ़ने से उक्त प्रकार के सब सन्देह निवृत्त हो जाते हैं। दैवत काण्ड की भूमिका के लिखने में यही उद्देश्य है । मन्त्र का स्वभाव । प्रत्येक मन्त्र में दो बातें अवश्य होती हैं । एक यह कि-ऋषि के द्वारा देवता की स्तुति हो, और दूसरी यह है कि-ऋषि उस स्तवनीय देवता से किसी को मांगे । ऋषि । मन्त्र में किसी देवताको सम्बोधन करके स्तुति करने वाला ऋषि होता है, या जिसको उस मन्त्र का दर्शन हुआ हों, वह ऋषि होता है । ऋषि स्त्रीप्रकृति या पुरुष-
हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० प्रकृति दोनों ही प्रकार का होता है, किन्तु अधिकांश पुरुष- प्रकृति । एवम् देवता भी ऋषि होता है, तथा अन्य दिव्य पुरुष भी । ऋषि मन्त्र का कर्त्ता या आद्य वक्ता नहीं होता किन्तु उनका उस मन्त्र में ऋषित्व यही होता है, कि उसे उस मन्त्र का तपोबल से दर्शन हुआ है । मन्त्र स्वतः अनादि तथा नित्य है । " द्रष्टार ऋषयः " (का०सर्वा०कं० १) अर्थात्-मन्त्रके द्रष्टा या साक्षात्कार करने वाले ऋषि होते हैं। देवता । प्रत्येक मन्त्र या सूक्त आदिमें वही देवता होता है, जिसकी वहां स्तुति हो, तथा प्रार्थित अर्थ का प्रभु कहा गया हो । फलका सम्बन्ध । मन्त्र में जिस फल की प्रार्थना की गई होती है, वह प्रार्थना यद्यपि ऋषि की ओर से होती है, तथापि ऋषि का सम्बन्ध नित्य मन्त्र में दर्शन मात्र से होता है, इस से उसका फल प्रयोग करने वाले अधिकारी को होता है ! क्योंकि-नित्य मन्त्रका दर्शन तपोबल से कल्पान्तर में दूसरे ऋषि को भी हो सकता है, इसी से उसका फल ऋषि में आबद्ध नहीं ॥१॥ ( खं० २ ) प्रथमा विभक्ति में परोक्षकृता ऋचाका उदाहरण- [निरु०- ] " इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्याः" [ ऋ० सं० ८, ४, १५, ५ ] ॥ इस ऋचा का वैश्वामित्र (विश्वामित्र का पुत्र ) रेभ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य्यस्तुत्येकाह निष्केवल्यमें विनि- योग है।
हिन्दी निरुक्त (७) ७ अ० १ पा० ३ सू० 'इन्द्रः' माध्यमिक देव (पर्जन्य) 'दिवः ' द्युलोक को 'ईशे' (ईष्टे) ईशन करता है शासन करता है, 'इन्द्रः (एव) इन्द्र ही 'पृथिव्याः' पृथिवी को 'ईशे' ईशन करता है या शासन करता है ॥ द्वितीया में उदाहरण- [ निरु०- ] " इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत् " [ ऋ० सं० १, १, १३, १ ]॥ इस ऋचाका मधुच्छन्दस् ऋषि और महाव्रत में महदुक्थ शिरस् पे शस्त्र (शस्त्रावयव) है । 'गाथिन. !' (सामगाः) हे सामके गान करने वालो ' 'इन्द्रम् इत्' (इन्द्रम्-एव) इन्द्र को ही 'बृहत्' (बृहतां साम्ना) बृहत् साम से (अभिष्टुत) आभिमुख्यसे स्तुति करो । तृतीया में उदाहरण-- (निरु०) "इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषणाः" (ऋ० सं० ५, २, २७, ५)। इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि, इन्द्र देवता महाव्रत मे निष्केवल्य दक्षिण पक्ष में शस्त्र है । 'एते' (मेघाः) ये मेघ 'इन्द्रेण' इन्द्रसे 'तृत्सवः' (दारयितव्याः) विदारण करने योग्य 'वेविषाणाः' और व्याप्यमान होते हुए (आप इव) जलों के समान (केनचित् सृष्टाः) किसी से प्रेरित हुये (नीचीः) नीचे २ (अगच्छन्) चले गए । चतुर्थी में उदाहरण- [ निरु०- ] "इन्द्राय साम गायत" (ऋ०मं० ६, ७, १, १) ।
हिन्दी निरुक्त ( ८ ) ७ अ० १ पा० २ खं० इस ऋचाका नृमेधस् ऋषि सात्त्रिकअहनों में स्तोत्रियानु- रूपवर्ग में तृतीय सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनि- योग है। हे ( उद्गातारः ? ) साम के गाने वालो ! ' इन्द्राय ' इन्द्रके लिये 'साम' साम को ' गायत ' गाओ ॥ पञ्चमी में उदाहरण— ( निरु०- ) “ नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन ” [ऋ० सं० ७, २, २२, १] । “सूर्यस्येव ०—० किञ्चन ” वैश्वामित्र रेणु ऋषि, जगती छन्द और पवमान सोम देवता है। ( सोमः ) सोम इन्द्रात्-ऋते इन्द्रंवर्जयित्वा ) इन्द्रको छोड़ कर “ न किञ्चन धाम ( देवतान्तरम् ) पवते ( गच्छति)” किसी दूसरे देवता को नहीं जाता है । षष्ठी में उदाहरण— ( निरु०—) “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” [ऋ०सं० १, २, २६, १] । “इन्द्रस्य नु०—०पर्वतानाम्” इस ऋचाका हिरण्य- स्तूप ऋषि है, और यह निष्केवल्य में शस्त्र है । ( अहम् ) मैं 'इन्द्रस्य' इन्द्र के 'वीर्याणि' (वीरकर्माणि) बीर कर्मों को 'प्रवोचम्' ( ब्रवीमि ) कहता हूं । सप्तमी में उदाहरण- (निरु०-)“इन्द्रे कामा अयंसत” इति ( ) हे (स्तोतारः ! ) स्तुति करने वालो ! ऋत्विजो ! 'कामाः'
हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० (दिव्याः पार्थिवाश्च) द्युलोक में होने वाले और पृथिवी में होने वाले सब काम “इन्द्रे अयंसत ” इन्द्र में उपनिबद्ध या आश्रित हैं—वही सब कामों का देने वाला है। प्रत्यक्षकृत ऋचा का लक्षण— (निरु०–) अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः, 'त्वम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना ॥८॥ 'अथ अनन्तर जो मन्त्र (ऋचाएं) मध्यम पुरुष की (जा- यसे, जहि, आगच्छ आदि) क्रिया से युक्त हों और 'त्वम्' (युवाम् यूयम्) इस सर्वनाम से देवता कहा गया हो, वे प्रत्यक्ष- कृत हैं। प्रत्यक्षकृत ऋचा का उदाहरण— (निरु०–) “त्वमिन्द्रबलादधि (सहसोजात ओ- जसः। त्वं वृषं वृषेदासि)” (ऋ० सं० ८,८,११,२)। इस सूक्त के देवजामि ऋषि हैं और महारात्रिक पर्याय में प्रशास्ता के स्तोत्र में विनियोग है । 'इन्द्र!' हे इन्द्र 'त्वम्' तू 'बलात्' बल से 'अधिजायसे' अधिक होता है। इस मन्त्र में 'त्वम्' यह पद और 'अधि- जायसे' यह मध्यम पुरुष की क्रिया दोनों देवता के लिये हैं, इस से यह प्रत्यक्षकृत है। दूसरी प्रत्यक्षकृत ऋचा— [निरु०] “विनइन्द्र मृधो जहि” (ऋ०सं० ८, ८,१०,४) इति
हिन्दी निरुक्त (१०) ७ अ० १ पा० २ खं० इन्द्र !' हे इन्द्र 'नः' हमारे (एतान्) इन 'मृधः' युद्ध करने वाले शत्रुओं को 'विजहि' नाश कर । जहां स्तुति करने वाले (ऋत्विज्) प्रत्यक्ष हैं और देवता परोक्ष, ऐसी ऋचाओं की सम्भावना- (निरु०) अथापि प्रत्यक्षकृताः स्तोतारो भवन्ति परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि । और भी स्तोता (स्तुति करने वाले) 'त्वम्' आदि पद से कहे जाने के कारण प्रत्यक्ष होते हैं और स्तोतव्य देवता परोक्ष । उदाहरण- [निरु०] “माचिदन्यद्विशंसत” [ऋ० सं० ५, ७, १०, १) इस ऋचा का प्रगाथ ऋषि, बृहती छन्द और तृच अशी- तिओं में विनियोग है। हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! (यूयम्) तुम 'अन्यद् दूसरे किसी देवता को 'मा' मत 'विशंसत' विविध स्तुतियों से स्तुति करो। यहां स्तोता “यूयम्” और “विशंसत” इस क्रिया पद से उक्त हैं, इस से प्रत्यक्ष हैं, और देवता परोक्ष पद का वाच्य है। दूसरा उदाहरण- [निरु०] “कण्वा अभिप्रगायत” [ऋ०सं०१,३, १२, १] इस ऋचा का कण्व ऋषि है। त्रैलीन हविष की याज्या
हिन्दी निरुक्त ( ११ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० है। हे 'कारवः !' मेधावी ऋत्विजो ' (यूयम्) तुम सब (देवम्) देवको 'अभिप्रगायत' (अभिष्टुत) स्तुति करो। यह भी पहिली के समान परोक्ष है । तीसरा उदाहरण- (निरु०-) “उपप्रेत कुशिकाश्चेतयध्वम्” इति । ( ऋ०सं०३, ३, २१, २ ) इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है । 'कुशिकाः !' हे स्तुतिमंत्रों के पुकारने वाले ऋत्विजो ! 'उप-प्र-इत' (गच्छत) जानो 'चेतयध्वम्' और चेतो । यह भी उसी प्रकार परोक्ष है । आध्यात्मिकी का लक्षण- -(निरु०-) अथाध्यात्मिक्य उत्तमपुरुषयोगा 'अहम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना । जिन ऋचाओं में देवता के लिये उत्तम पुरुष की क्रिया और 'अहम्' (आवाम्, वयम्) यह सर्वनाम पद हो, वे आध्यात्मिकी ऋचाएं होती हैं। ऐसी ऋचाओं में 'अहम्' पदसे उत्तम पुरुष का और उत्तम पुरुषसे 'अहम्' पदका अध्या- हार करना, यदि न हो । ( खं० ३ ) उदाहरणार्थ कहता है- ( निरु०- ) यथा-एतत् । अर्थात्-जैसे यह- । आध्यात्मिकी का उदाहरण- ( निरु० ) (क) इन्द्रो वैकुण्ठः ॥
हिन्दी निरुक्त ( १२ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० “इन्द्रो वैकुण्ठः” इस वाक्य से इन्द्र वैकुण्ठ देवता की ऋचा “अहंभुवम्” से प्रयोजन है। “अहंभुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि संजयामि शाश्वतः” इत्यादि। ( ऋ०सं० ८, १, ५, १ ) इस ऋचा का इन्द्र ऋषि, इन्द्र ही देवता, जगती छन्द और अतिरात्र में द्वितीय पर्याय में होता के शस्त्रमें विनियोग है। (सायणभा०) विकुण्ठा नाम एक आसुरी (राक्षसी) थी उसके तप के प्रभाव से इन्द्र पुत्र हुआ, और वह वैकुण्ठ नाम से प्रसिद्ध हुआ उसकी आत्मस्तुति (अपनी प्रशंसा) से युक्त (ब्रह्म) मन्त्र प्रकट हुआ, वह यह है– “अहंभुवम्०” । ‘अहम्’ मैं ही ‘वसुनः’ (धनस्य) धन का ‘पूर्व्यः’ पहिला ‘पतिः’ पति ‘भुवम्’ (अभवम्) हुआ हूं । (निरु०-) (ख) लबसूक्तम् । लबका सूक्त । “इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयाम्–इति” ऋ० सं० ८,६,२६,१) “इति वा इति०” यह तेरह (१३) ऋचाओं का सातवाँ सूक्त है। गायत्री छन्द, लबरूपको प्राप्त इन्द्र ऋषि और वही देवता है। लब कहता है–‘इति वा इति’ ऐसा ऐसा ‘मे’ मेरा ‘मनः’ मन होता है। कैसे ? “ गाम् अश्वम् सनुयाम् ” इन यजमानों को गो और घोड़े दूं या उपभोग कराऊं ।
(निरु०-) (ग) वागाम्भृणीयम् इति ॥ “वागाम्भृणीय” नाम का सूक्त है, उसमें वाणी ही कहती है-- “अहंरुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि” (ऋ०सं०८,७,११,१) । “अहम्०” यह आठ (८) ऋचाओं का तेरहवां सूक्त है । अम्भृण महर्षि की पुत्री 'वाक्' नाम वाली ब्रह्म को जानने वाली विदुषी ने अपने आपे की स्तुति की है, इससे वही ऋषि है । सत् चित् सुखरूप सर्वान्तर्यामी परमात्मा देवता है इसी से यह वाक् उसके अभेद को अनुभव करती हुई सब जगत् के रूप से सब के अधिष्ठान के रूपसे “मैं ही सब कुछ हूं” इस प्रकार अपनी स्तुति करती है । त्रिष्टुप् छन्द है । विनियोग पहिले के समान है । (सा० भा०) । 'अहम्' मैं ही 'रुद्रेभिः' (रुद्रैः) रुद्रों के साथ 'वसुभिः' (आदित्यैः विश्वदेवैः) आदित्यों या सब देवताओं के साथ 'चरामि' विचरती हूं । यहां 'अहम्' और उत्तम पुरुष 'चरामि' दोनों वाग् रूप प्रधान देवता के लिये हैं, इससे यह आध्यात्मिकी है । तीनों प्रकार के मन्त्रों में कोई बहुत हैं और कोई कम हैं, यह कहते हैं- (निरु०-) परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा भूयिष्ठा अल्पश आध्यात्मिकाः॥ परोक्षकृत और प्रत्यक्षकृत मन्त्र बहुत ही हैं, और आध्यात्मिक थोड़े । तीन लक्षण मन्त्रों के भेद-
हिन्दी निरुक्त ( १४ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० (निरु०-) अथापि स्तुतिरेव भवति न आशीर्वादः । और कोई मन्त्रों में स्तुति ही है, किन्तु आशीर्वाद या किसी अर्थ की कामना नहीं । उदाहरण- [ निरु०- ] “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” इति यथा एतस्मिन् सूक्ते ( ऋ०सं० १,७,२,१) ॥ “इन्द्रस्य नु वीर्याणि०” यह पन्दरह ( १५ ) ऋचाओं का दूसरा सूक्त है । आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र देवता और अग्निष्टोम में माध्यन्दिन सवनमें निष्केवल्य शस्त्र में विनियोग है । ( अहम् ) मैं ‘इन्द्रस्य’ इन्द्रके ‘ वीर्याणि ’ पराक्रम-युक्त कर्मों को ‘नु’ शीघ्र ‘प्रवोचम्’ ( ब्रवीमि ) कहता हूं । दूसरा विशेष— [निरु०-] अथापि आशीरेव न स्तुतिः । कुछ मन्त्रों में कामना ही है किन्तु स्तुति नहीं । उदाहरण- (निरु०-) “सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासम्, सु- वर्चा मुखेन सुश्रुत्कर्णाभ्यां भूयासम्” इति । प्रजापति ऋषि, यजुः, सविता देवता, और नेत्र के अभि- मन्त्रण में विनियोग है । (पा०गृ०जयरा०भा०) हे सवितृदेव ! ‘अहम्’ मैं ‘अक्षीभ्याम्’ (नेत्राभ्याम्) नेत्रों से ‘सुचक्षाः’ सुन्दर दर्शन शक्ति वाला ‘भूयासम्’ हो जाऊं ।
हिन्दी निरुक्त ( १५ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० 'मुखेन' मुख से 'सुवर्चाः' सुन्दर तेज वाला, 'कर्णाभ्याम्' और कानों से 'सुश्रुत्' सुन्दर श्रवण शक्ति वाला 'भूयासम्' हो जाऊं । मन्त्रों में स्तुति के अभाव में स्तुति और कामना के अभाव में कामनो जोड़ लेना चाहिये, ऐसा करने से मन्त्र पूर्ण होजाता है। इस प्रकार स्तुति आदि से रहित मन्त्र आधिक्य से कहां है ? [निरु०-] तदेतद् बहुलम्-आध्वर्यवे याज्ञेषु च मन्त्रेषु । सो यह बहुत करके आध्वर्यव ( यजुर्वेद ) में और यज्ञ सम्बन्धी मन्त्रों में है। तीसरा और चौथा विशेष- [निरु०-] अथापि शपथाभिशापौ । और भी शपथ (सौ या क़सम) और शाप ( कोसना )। कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिन में न स्तुति है, और न कामना ही, किन्तु क्या तो किसी के मिथ्या आक्षेप को झूठा ठहराने के लिये ईश्वर से दण्ड स्वरूप अपने ऊपर अनिष्ट की झोंकी को मांगना, या किसी से पीडित होकर उसके लिये बुराई को चाहना ही कहा गया है। शपथ का उदाहरण- [निरु०-] “अद्यामुरीय यदि यातुधानो अस्मि” ऋ०सं०५,७,७,५,] वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, रक्षोहन् (राक्षसों को मारने वाले) इन्द्रा सोम देवते, राक्षसोंकी निवृत्ति के अर्थ “इन्द्रा
' हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० सोम" यह पचीस (२५) ऋचाओं का सूक्त जपा जाता है, उसकी पन्दरहवीं ऋचा है (सा०भा०) "यदि यातुधानः अस्मि" यदि मैं वशिष्ठ राक्षस हूं "अद्यामुरीय" तो आज ही मरजाऊं । शाप को उदाहरण- [ निरु०- ] “अधा स वीरैर्दशभि र्वियूयाः" इति ॥ ( ऋ० सं० ५, ७, ७, ५) ॥ 'अध' यदि ऐसा होकि-' मैं वसिष्ठ और तू राक्षस' तो सो तू आज ही दश पुत्रों से वियुक्त होजा । पांचवां विशेष- [ निरु०- ] कथापि कस्याचिद् भावस्य आचि- ख्यासा ॥ और भी मन्त्रोंमें किसी भावके कहने की इच्छा होती है । उदाहरण- [ निरु०- ] [क] “न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि" ( ऋ० सं० ८, ७, १७, १ ) त्रिष्टुप् छन्द, परमेष्ठी नाम प्रजापति ऋषि, आकाश आदि पदार्थों की सृष्टि स्थिति और प्रलय आदि यहां प्रति- पादन किये जाते हैं, इससे उनका कर्त्ता परमात्मा देवता और विनियोग पूर्वके तुल्य । (सा० भा० ) 'तर्हि' इस जगत् की जब उत्पत्ति न हुई थी, तब मृत्यु नहीं था, क्योंकि- उस समय मरने वाला मनुष्य आदि कोई नहीं था । और 'अमृत' अमरपणा भी नहीं था, क्योंकि- मृत्यु नहीं था ।
हिन्दी निरुक्त ( १७ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० (निरु०-) (ख) “ तम आसीत्तमसागूल्हमग्रे ” ( ऋ०सं० ८, ७, १७, ३ ) ‘ तमः ’ अंधेरा ही था, अति अंधेरे से ( सब ) ढंका हुआ था । छठा विशेष- (निरु०-) अथापि परिदेवना कस्माच्चिद्भावात् ॥ और भी किसी कारण से विलाप भी मन्त्रोंमें होता है । उदाहरण- ( निरु०- ) “ सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत् ” ॥ ( ऋ० सं० ८, ५, ३, ५ ) पुरूरवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, परिदेवना । ‘सुदेवः’ वह शोभन ( अच्छा ) देव है, जो इस प्रिया उर्वशी से वियुक्त होकर ‘अद्य’ आज ही ‘प्रपतेत्’ गिरे,-ऐसा गिरे कि ‘अनावृत्’ फिर संसारमें न लौटे। यहां ऋषि विषय लम्पटता के दुःखरूप परिणाम की स्थिति को दिखाता है, कि लोक इसे भले प्रकार जानकर इस में न फंसे । और विलाप का उदाहरण- (निरु०-) “न विजानामि यदि वेदमस्मि” इति ॥ दीर्घतमा ऋषि और अस्यवामीय सूक्त । “न विजानामि” मैं यह अच्छी तरह नहीं जानता, “यदि वा इदम् अस्मि” मैं यह कारण ब्रह्म हूं, या उसका कार्य रूप द्वैत जगत् । यहां पर संशय ही विलाप है । सातवां और आठवां विशेष-
हिन्दी निरुक्त ( १८ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० ( निरु०- ) अथापि निन्दाप्रशंसे ॥ और भी मन्त्रोंमें कहीं निन्दा ही है,और कहीं प्रशंसा ही। निन्दा में उदाहरण- ( निरु०- ) "( मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताःसत्यं ब्रवीमि वधइत् स तस्य । नार्थमणं पुष्यति नो सखायम्- ) केवलाघो भवति केवलादी ॥" ( ऋ० सं० ८, ६, २३, १ ) भिक्षु नाम आङ्गिरस ( अङ्गिरस् का पुत्र ) इसका ऋषि। त्रिष्टुप् छन्द। दान न करने वाले की निन्दा। वृथा ही अन्न को प्राप्त होता है, वह उत्तम बुद्धि वाला नहीं है, मैं सच कहता हूं, उसका वह वध (मरना) ही है, जो आदित्य का, ( तथा ) सखा ( मनुष्य ) का पोषण नहीं करता है, केवल पाप का भागी होता है,-जो अकेला ही खाता है ॥ गीता में भी कहा है- “भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्” अर्थात्- वे पाप को ही भोगते हैं, जो अपने लिये पकाते हैं। प्रशंसा में उदाहरण-- ( निरु०- ) “भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म” ( ऋ० सं० ८, ६, ४, ५ ) दक्षिणा नाम प्रजापति की पुत्री ने अपनी स्तुति से
हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ४ खं० संयुक्त इस सूक्त को देखा था, वही इसकी ऋषिका है। उस सूक्त में यह त्रिष्टुप् छन्द है। दाता की प्रशंसा है। भोज या दानशील राजा का यह घर पुष्करिणी (कम- लों से सजी हुई तलाई या विमान) के समान (सुन्दर) है। ऐसे ही और २ मन्त्रों में भी निन्दा और प्रशंसा:- (निरु०) एवम् अक्षसूक्ते द्यूतनिन्दा च कृषि- प्रशंसा च ॥ इसी प्रकार अक्षसूक्त में द्यूत (जूवा) की निन्दा और कृषि की प्रशंसा है। जैसे- "अक्षैर्मादीव्यः" पाशों से मत खेल। "कृषिमित्कृषस्व" कृषिका ही कर्षणा कर (खेती ही कर) (ऋ० सं० ७, ८, ५, ३) ॥ ऋषि किसी कारण से मन्त्रों के देखने वाले ही होते हैं किन्तु कर्त्ता नहीं होते- (निरु०- एवम्--उच्चावचैः अभिप्रायैः ऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ति ॥ इस (पूर्वोक्त) प्रकार से ऊँचे नीचे अभिप्रायों से ऋषियों को मन्त्रों के दर्शन होते हैं ॥ (खं० ४) जिन मन्त्रों में "यत्काम ऋषिः०" (७,१,१) इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रदेवतात्मा लक्षण नहीं घटता, उनमें देवता निर्णय करने की प्रतिज्ञा-
हिन्दी निरुक्त ( २० ) ७ अ० १ पा० ४ खं० ( निरु०- ) तद् ये अनादिष्टदेवता मन्त्राः तेषु देवतोपपरीक्षा ॥ सो, जो मन्त्र अनादिष्ट देवत हैं-जिनमें देवता का आदेश ( कथन या लिङ्ग ) नहीं उनमें देवता की उपपरीक्षा (प्रान पूर्वक विचार ) होगी, अथवा उपपत्ति (युक्ति) पूर्वक परीक्षा होगी-यहां से आगे परीक्षा की जावेगी । यज्ञ में और यज्ञाङ्ग (यज्ञके भाग) में जो अनादिष्ट देवता मन्त्र हैं, उनमें देवता का निर्णय- (निरु०-) यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता भवन्ति ॥ अथवा जिस देवता का वह यज्ञ हो, अथवा जिस देवता का वह यज्ञाङ्ग हो, उस देवता के वे मन्त्र होते हैं । अर्थात्- मन्त्र में जब कोई देवता विशेष का बोधक लिङ्ग न हो, तो, उसके विनियोग को देखना,-वह किस देवता के यज्ञ में या यज्ञाङ्ग में विनियुक्त है, जिस देवता का वह यज्ञ हो या यज्ञाङ्ग, उसी देवता का वह मन्त्र भी जानना । प्रयोजन यह कि मन्त्रों का कर्म से नित्य संबन्ध है, कोई मन्त्र भी कर्म सम्बन्ध से रहित नहीं है, और जिस प्रकार मन्त्र देवता के बिना नहीं होता, उसी प्रकार कर्म भी देवता के बिना नहीं होता । क्योंकि-मन्त्र जिस प्रकार देवता की स्तुति के लिये होता है, उसी प्रकार कर्म भी देवतो के ही आराधन के लिये होता है, सुतराम् मन्त्र और कर्म दोनों एक देवता में समा- नाधिकरण होते हैं, इसीसे जब मन्त्र में देवता का पता न चले, तो उसके सम्बन्धी कर्म में देखना चाहिये, कर्म में देवता का अधिकार अवश्य बताया हुआ होता है। जैसे-जिसका