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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ८ अ० १ पा० २ वं मैं 'एनम्' इस इन्द्रदेवको 'ओजसः' किसी अतिमहान् बल से 'जातम्' उत्पन्न हुआ 'मन्ये' मानता हूं । [ क्योंकि-यह अतिबलवान् देखा जाता है । ] जो बलवान् होता है, वही बलका दाता हो सकता है, इस लिये इन्द्र ही द्रविणोदाः है । और भी यह दूसरा हेतु इन्द्रके द्रविणोदस् होने में है- मन्त्र का द्रष्टा = देखने वाला ऋषि अग्नि को द्राविणोदस कहता है। [ "द्रविणोदाः पिवतु द्राविणोदसः" जिसका पुत्र द्राविणोदस अग्नि है, वही द्रविणोदस् है ॥ ] और यह अग्नि इसी इन्द्र से उत्पन्न होता है, प्रयोजन यह कि- इन्द्रका ही पुत्र है। क्योंकि- “यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान" अर्थात् जिस इन्द्र ने दो पत्थरों के भीतर अग्नि को उत्पन्न किया था। यह भी निगम है। "अथापि०" और भी यह दूसरा हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? ऋतुयाज मन्त्रों में- जिस से ऋतुओं का यजन होता है, उन मन्त्रों में द्राविणोदस = द्रविणोदस् शब्द वाले वचन हैं। उससे क्या ? उन मन्त्रों का जो पात्र होता है,-जिससे उनका सम्बन्धी होम होता है, उस पात्र की "इन्द्रपान" यह समाख्या = संज्ञा स्वयम् मन्त्र में आई हुई है। जैसे- "होता यक्षद्देवं द्रविणोदसम्-अपाद्धोत्रादपा- त्पोत्रादपान्नेष्ट्रात्तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यमिन्द्रपानं देवो द्रविणोदा द्रविणसः स्वयमायुष्यात् स्वयमभि-

हिन्दी निरुक्त ( १३२ ) ८ अ० १पा० २खं

गूर्यात् स्वयमभिगूर्त्तया होत्रयर्तुभिः सोमस्य पि- बत्वच्छावाक यज" । “होता यक्षद्देवम्” यह मन्त्र अच्छावाक ऋत्विज् के प्रति प्रैष = प्रेरणा है । मैत्रावरुण बोलता है । अर्थः-‘होता' नाम ऋत्विज् ऋतुदेवताओं के मन्त्रों से प्रैष्यकर्म में अध्वर्यु ( ऋत्विज् ) के द्वारा अतिप्रेषित = प्रेरित हुआ 'द्रविणोदसं देवम्' द्रविणोदस् देवको 'यक्षत्' यजन करे । वह द्रविणोदस् देव 'होत्रात् श्रपात्' होता ( ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से = विधि से किये हुए दान से सोम को पी चुका है । 'अपात् पोत्रात्' पोता (ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से सोम को पी चुका है । 'अपात् नेष्ट्रात्' नेष्टा (ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से सोमको पी चुका है । अब फिर यह 'तुरीयम्' चौथा 'पात्रम्' सम्प्रदान पात्र है, जो 'असक्तम्' अशुद्ध या अपूर्ण है, 'अमर्त्यम्' जिसे पीकर नहीं मरता अथवा जो मनुष्य योग्य है- जिसे मनुष्य से अन्य ( देव ) पान कर सकते हैं, उस 'इन्द्रपानम्' इन्द्र के पीने योग्य 'द्रविणसः' सोम के पात्र को 'द्रविणोदाः स्वयम् आयूयात्' आप द्रविणोदस् देव भले प्रकार मिलावे 'स्वयम् अभिगूर्यात्' आप उठावे फिर 'अभिगूर्त्तया होत्रया' अपनी चाही हुई स्तुति से दिया हुआ जो 'सोमस्य' सोम का अंश, उसे 'स्वयम् ऋतुभि' पिबतु' आप द्रविणोदस् देव ऋतु देवताओं के साथ पीवे 'अच्छावाक! यज' हे अच्छावाक ! ( ऋत्विज् ! ) तू यजन कर, तू भी ऐसा जान कर यजन कर । इस प्रकार इस इन्द्र के द्रविणोदस् नाम युक्त प्रैष मन्त्र

हिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ८ अ० १ पा० २ खं० में 'इन्द्रपान' यह पात्रकी समाख्या या नाम है, इससे जाना जाता है कि- उस से इन्द्र ही पीता है । यदि ऐसा है, तो इन्द्र द्रविणोदस् है, यह प्राप्त होता है । “अथापि०” और भी यह अन्य हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? उन्हीं ऋतुयाज मन्त्रों में इसे सोमपान से ऋषि स्तुति करता है। “होत्रात् सोमं द्रविणोदः०—०पिब ऋतुभिः” [ ऋ० सं० २, ७, २६, १ ] अर्थात्- हे द्रविणोदः ! तू होत्र से ऋतुओं के साथ सोम पी । प्रयोजन यह कि- जहां जहां सोमपान की स्तुति है, वहां वहां इन्द्र देवता है, और जो हविः जिस देवता के लिये संस्कार किया जाता है, वह उसी को दिया जाता है, इस कारण सोमपान से इन्द्र के अतिरिक्त अन्य देवता की स्तुति नहीं है, सोम का संस्कार उसी के लिये किया जाता है, अतः वहां आया हुआ 'द्रविणोदस्' नाम इन्द्र देवता के लिये ही हो सकता है। “अथापि०” और भी यह अन्य हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” अर्थात्- 'द्राविणोदसः' जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है, वह 'द्रविणोदाः' द्रविणोदस् इन्द्रदेव 'पिबतु' पीवे । “अपाद्धोत्रात्”। [ उसी अच्छावाक के प्रैष की यह याज्या है। ] [ क्रौष्टुकि आचार्य के अभिमत पूर्व पक्ष [ प्रश्न ] के

हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) ८ अ० १ पा० ३ खं० हेतु समाप्त हो गए हैं। अब शाकपूणि आचार्य के अभिमत उत्तर पक्ष [ द्रविणोदा इन्द्र नहीं, अग्नि है ] के हेतु कहे जाते हैं-। ] ॥ २ ॥ (खं० ३) (निरु०) अयमेव अग्निः द्रविणोदाः इतिशाक- पूणिः । आग्नेयेष्वेवहि सूक्तेषु द्राविणोदसाः प्रवादा भवन्ति ‘,देवा अग्निं धारयन्द्राविणोदाम्” [ऋ० सं० १, ७,३, १] । इत्यपि निगमो भवति ॥ यथो एतत्- स बलधनयोर्दातृतमः- इति । सर्वासु देवतासु ऐश्वर्यं विद्यते ॥ यथो एतत्- “ओजसो जातमुत मन्य एनम्” [ऋ०सं०८,३, ४, ५] । इति चाह” इति । अयमपि अग्निः ओजसा बलेन मध्यमानो जायते, तस्मात् एनम्- आह-- सहसस्पुत्रं, सहसः सूनुं, सहसो यहुम् यथो एतत्- अग्निं द्राविणोदस म्- आह इति। ऋत्विजोऽत्र द्रविणोदसः उच्यन्ते। हविषो दाता- रस्तच्च एनं जनयन्ति ।

हिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ८ अ० १ पा० ३ खं० “ऋषीणां पुत्रो अधिराजएषः” (य०वा०सं०५,४)। इत्यपि निगमो भवति ॥ यथो एतत् - तेषां पुनः पात्रस्य ‘इन्द्रपानम्’ इति भवति इति । भक्तिमात्रं तद् भवति । यथा ‘वायव्यानि’ इति सर्वेषां सोमपात्राणाम् ॥ यथो एतत्- सोमपानेनएनं स्तौति इति । अस्मिन्नपि एतद्- उपपद्यते- “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रीभिः (ऋ०सं०४,३, २५, ८) । इत्यपि निगमो भवति ॥ यथो एतत्- “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” (ऋ०सं०२, ८,१,४) । इति । अस्यैव तद् भवति ॥३ (२) ॥ अर्थः- “अयमेव” यही अग्नि द्रविणोदाः है, यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं। क्यों कि- अग्नि के ही सूक्तों में ‘द्रविणोदस्’ शब्द युक्त प्रवाद = स्तुतिएं होती हैं। “देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्” अर्थात् देवता- ओं ने पहिले द्रविणोदा = देवताओं के अर्थ हवीरूप द्रव्यों के देने वाले अग्नि को धारण किया है। यह भी निगम है।

हिन्दी निरुक्त (१३६) ८ अ० १ पा० ३ खं० ' इस प्रकार यहां यही अग्नि 'द्रविणोदा' है, यह पक्ष स्थित है। सो यह पर पक्ष = क्रौष्टुकि- पक्ष के हेतुओं को बिना हटाए नहीं टिका हुआ जैसा ही है, इस कारण उनके निराक- रण = हटाने के अर्थ “यथो एतत्” इत्यादि रूप से कहा जाता है। “यथो एतत्” जो कि- फिर यह कहा गया है, 'वह बल और धन का बड़ा दाता है,' यह इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में : कारण नहीं है। क्यों कि- सभी देवताओं में ऐश्वर्य है। [इससे सभी देवता बल और धन के देनेवाले हैं। अतः यह हेतु इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में विशेष कारण नहीं होसकता।] “यथोएतत्” और भी जो यह कहा है कि- “ओजसो जातमुत मन्यएनम्” अर्थात्- मैं इसे ओजसे = बल से उत्पन्न हुआ मानता हूं। यह निगम भी इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में विशेष कारण नहीं है। क्यों कि- यह अग्नि भी ओज से = बल से मथा जाता हुआ उत्पन्न होता है, इस कारण से ऋषि इसको (अग्नि को) सहस् का पुत्र = सहस् का सूनु = सह का यहु कहता है ॥ (क) “सहस्पुत्रो अद्भुत:” (ऋ० सं० २, ५, २८, ६) । अग्नि सहस् का पुत्र अद्भुत है। (ख) “सहसः सूनवाहुतः” । (ऋ० सं० ६,५,२४,३)। हे सहस् के सूनु ! बुलाया हुआ है। (ग) “अग्ने वाजस्य गोमतःईशानः सहसो यहो”

(ऋ० सं० १, ५, २७, ४) । हे अग्नि देव ! हे सहस् (बल) के यहु (पुत्र) ! 'गोमनः' 'वाजस्य' 'ईशानः' गो आदि पशुओं से युक्त अन्न का स्वामी है । "यथो एतत्" और जो फिर यह कहा गया है, कि- "अग्निं द्राविणोदसमाह" ऋषि अग्नि को द्रविणोदस् का पुत्र कहता है । [इसका यह अभिप्राय नहीं कि- द्रविणो दस् = इन्द्र से यह अग्नि उत्पन्न होता है किन्तु-) यहां ऋत्विज् 'द्रविणोदस्' = अग्नि के हविर्दाता कहे जाते हैं- ऋत्विज् अग्नि के द्रविणोदस् हैं- ऋत्विज् हवियों के दाता हैं, और वे ऋत्विज् इस अग्नि को उत्पन्न करते हैं, यह ऋषि के द्वारा कहा जाता है । "ऋषीणां पुत्रो अधिराज एषः" यह अग्नि देव अधिक चमकने वाला ऋषियों का पुत्र है । यह भी निगम है । "यथो एतत्" और जो फिर यह कहा है कि- 'उन ऋतुयाजों के पात्र का नाम 'इन्द्रपान' है, यह भी इन्द्र के द्रविणोदस् होने में कारण नहीं । क्योंकि-यह भक्तिमात्र है- गुण के वश 'इन्द्रपान' यह पात्र का नाम है । जैसे-सोम के पात्र भिन्न २ देवताओं के होते हैं, तो भी उन सब का 'वा- यव्य' नाम है, किन्तु वे इस कारण वायु देवता के ही नहीं होजाते, यह किसी गुण के कारण उनका नाम है = समाख्या है । इस कारण 'द्रविणोदस्' नाम-युक्त मन्त्र में 'इन्द्रपान' यह पात्र का नाम होने से इन्द्र द्रविणोदस् नहीं हो सकता । "यथो एतत्" और भी फिर यह कहा गया है, कि-इस इन्द्र को सोम पान से स्तुति करता है, इससे द्रविणोदस् इन्द्र

हिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ८ अ० १ पा० ३ खं यह भी कारण नही हो सकता । क्योंकि-इस अग्नि में भी यह उपपन्न होता है—घटता है । “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः” अर्थात्- हे भगवन् ! अग्निदेव ! इकट्ठे इकट्ठे तुम्हें आश्रयण करने वाले मरुतों के साथ ( त्वम् ) तू मोद करता हुआ सोम को पी । यह भी निगम है । इस प्रकार इस मन्त्र में सोमपान से इस अग्नि की भी स्तुति है, इस कारण सोमपान इन्द्र का ही लिङ्ग नहीं है । “यथो एतत्” और भी यह कहा है कि- “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है वह द्रविणोदस् सोम को पान करे । यह भी इन्द्रके द्रविणोदस् होने में कारण नहीं । क्योंकि-इस अग्नि का ही यह निगम है । ऋतुयाजों में अग्नि भी सोम का भागी है । क्योंकि- उन में “वनस्पते० ०द्रविणोदः” पिब ऋतुभिः” ( ऋ०सं०२,८,१,३ ) हे ‘वनस्पते!’ अग्नि देव ! हे ‘द्रविणोदः !’ ( त्वम् ) तू ‘ऋतुभि’ ऋतुओं के साथ सोम को पान कर । यहां ‘वनस्पते’ संबोधन पद के साथ समानाधिकरण ‘द्रविणोदस्’ विशेषण सम्बोधन है, इस कारण वनस्पति के अतिरिक्त और कोई द्रविणोदा नहीं हो सकता, और वनस्पति फिर निःसन्देह अग्नि है, “वह देवत्रा दिधिषो हवींषि” हे ‘ दिधिषो !, धारण करने वाले ( त्वम् ) तू ‘देवत्रा’ देवताओं के लिये ‘हवींषि’ हविष्यों को ‘वह’ लेजा । इस मन्त्र में हविः के लेजाने के संयोग से और

हिन्दी निरुक्त ( १३६ ) ८ अ० १ पा० ४ खं० स्विष्टकृत् के विकार के श्रवण से अग्नि द्रविणोदस् है, किन्तु इन्द्र नहीं ॥ ३ (२) ॥ ( खं० ४ ) (निरु०-) “मेद्यन्तु ते वह्नयो येभिरीयसेऽरिष- ण्यन्वीलयस्वा वनस्पते । आयूया धृष्णा अभि- गूर्या त्वं नेष्ट्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः ॥” ( ऋ०सं० २,८,१,३ ) ॥ मेद्यन्तु ते वह्नयो वोढारः, यैः यासि अरिष्यन् दृढीभव, आयूय धृष्णो अभिगूर्य त्वं नेष्ट्रीयात् धिष्ण्यात् । ‘धिष्ण्यो’ धिषण्यः । धिषणाभावः । ‘धिषणा’ वाक् । धिषेर्दधात्यर्थे । धीसादिनी इति वा । धीसानिनी इति वा । ‘वनस्पते’ इति एनम्-आह । एष हि वनानां पाता वा । पालयिता वा । ‘वनं’ वनोते । “पिब ऋतुभिः” कालैः ॥४(३)॥ इति अष्टमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥८,१॥ अर्थः-जैसे यहां ऋतुयागों में-“मेद्यन्तु ते वह्नयः” [ ऋ०सं ०२,८,१,३ ] यह ऋचा है । यह गृत्समद ऋषि की है। इसका जगती छन्द और ऋतु देवता है ।

हिन्दी निरुक्त ( १४० ) ८ अ० १पा० ४खं 'वनस्पते ' हे भगवन् ! वनस्पति देव ! हे 'द्रविणोदः!' 'ते' तेरे 'वह्नयः' ( वोढारः ) वाहन = घोड़े 'मेद्यन्तु' ( स्नि- ह्यन्तु ) स्नेह करें, 'येभिः' ( यैः ) जिनसे ( त्वम् ) तू 'ईयसे' ( यासि ) गमन करता है । 'अरिष्यन्' किसी से भी न मारा जाता हुआं । 'वीलयस्व' अपने आपे को दृढ करले, [ -सोम पान के अर्थ ] । 'धृष्णो' हे शत्रुओं को धमकाने वाले ! 'आयूय' अंगुली से मिला कर 'अभिगूर्ये' उठा कर 'नेष्ट्रात्' ( नेष्ट्रीयात् धिष्ण्यांत ) नेष्टा के आसन से या नेष्टा के 'वषट्' मन्त्रके उच्चारण से दिये हुए सोम से 'त्वम्' तू 'ऋतुभिः' काल देवताओं के साथ 'सोमम्' अपने अंश (भाग) सोम को 'पिब' पान कर ! [ यह हम कहते हैं । ] 'धिष्ण्य' क्या ? धिषण्य । धिषण्य ही क्या ? धिषणा वाक् ( वाणी ) होती है, उसके अर्थ यह रखा जाता है, उस के पीछे बैठा हुआं होता शस्त्र = बिना गाए हुए मन्त्रों से स्तुति करता है । 'धिषणा' क्या ? वाक् वाणी । कैसे ? धारणार्थक 'धिष्' धातु से है । क्योंकि- वह अर्थ को धारण करती है । अथवा यह 'धीसादिनी' होने से धिषणा है । 'धीसादिनी' 'धी' बुद्धि अथवा कर्म उस पे बैठने वाली । अथवा 'धीसानिनी' होने से यह धिषणा है । क्योंकि- वह बुद्धि को सानती है- भजती है । “वनस्पते !” यह सम्बोधन पद इस 'द्रविणोदम्' को कहता है, इससे 'द्रविणोदस्' अग्नि है । अग्नि 'वनस्पति' कैसे है ? “एषहि०” क्योंकि- यह वनों का पाता है, अथवा पालक

हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ८ अ० २ पा० १ खं० करने वाला है। [ क्योंकि-यह वनों के = वृक्षादिकों के भीतर रहता हुआ भी जलाने को समर्थ होता हुआ भी उन्हें जलाता नहीं, इसी से उनका पालक है। ‘पाता’ और ‘पालयिता’ दोनों पदों में धातुओं का भेद है; और अर्थ एक ही है।] ‘वन’ कैसे संभजनार्थक ‘वन’ (त०उ०) धातु से है। क्यों कि- उसे काठ, फल, फूल आदि के लिये सेवन किया जाता है। “पिब” ऋतुओं के सहित = कालों के सहित पी। [ यह देवता पद के विचार का न्याय, जैसा कि ‘द्रविणोदस्’ पद पर दिखाया है, सर्वत्र देवता पद के विचारार्थ ग्राह्य है, ऐसे विचारों से शिष्य की बुद्धि बढती है।] ॥ ४ (३) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमोऽध्यायस्य प्रथमः पादः ॥८,१॥ द्वितीयः पादः । ( खं० १ ) निघ०-इध्मः ॥२॥ तनूनपात् ॥ ३ ॥ नराशंसः ॥४॥ ईलः ॥५॥ बर्हिः ॥ ६ ॥ द्वारः ॥७॥ उषासानक्ता ॥८॥ दैव्याहो- तारा ॥६॥ तिस्रोदेवीः ॥ १० ॥ त्वष्टा ॥११॥ वनस्पतिः ॥१२॥ स्वाहाकृतयः ॥ १३ ॥ इति त्रयोदश (१३) पदानि । (निरु०) अथात आप्रियः । आप्रियः कस्मात् ? आप्नोतेः । प्रीणातेर्वा ।

हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ८ अ० २ पा० १ खं० “आप्रीभिराप्रीणाति” इति च ब्राह्मणम् । तासाम्-‘इध्मः’ प्रथमागामी भवति । ‘इध्मः’ समिन्धनात् । तस्य–एषा भवति॥१(४)॥ अर्थः-“अथातः” यहां से ‘आप्री’ देवताओं का अधि- कार है- ‘इध्म’ (२) पद से ‘स्वाहाकृतयः’ (१३) पद तक कुल बारह (१२) आप्री कहे जाते हैं । ‘आप्री’ कैसे ? व्याप्ति अर्थ में ‘आप्’ (स्वा०उ०) धातु से है । क्योंकि- वे लोक को व्यापन करते हैं । अथवा तर्पण या तृप्ति अर्थ में ‘प्री’ (क्र्या०उ० धातु से है । क्योंकि- वे हवि- ष्यों से या स्तुतियों से तृप्त किये जाते हैं । और “आप्रीभिः-आप्रीणाति” अर्थात्- ‘आप्री’ नाम वाली ऋचाओं से ( होता ऋत्विज् उन्हें ) आप्रीणन = भले प्रकार तृप्त करता है । यह ब्राह्मण है । “तासाम्०” उन आप्री देवताओं में पहिले आने वाला ‘इध्म’ ( इन्धन देवता ) है । ‘इध्म’ (इन्धन) क्यों ? समिन्धन से । क्योंकि-उस से अग्नि समिन्धन किया जाता है-जलाया जाता है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥१(४)॥ व्याख्या । यहां अब देवताओं के नामों की व्याख्या चल रही है। उनमें अग्नि (निघ० अ० ५ खं० १पद १) जातवेदाः (निघ०

हिन्दी निरुक्त ( १४३ ) द० अ० २ पा० १ खं० अ० ५ ख० ? पद ०२) वैश्वानर (निघ० अ० ५ खं० १ पद ०३) द्रविणोदाः (निघ० अ० ५ खं०२ पद० १) ये चार शब्द व्याख्यान किये जाचुके हैं। दूसरे खण्ड के कुल १३ शब्दों में से 'इध्म' आदि बारह (१२) शब्द अवशिष्ट हैं, इनका 'आप्री' नाम प्रसिद्ध है, इसीसे आचार्य ने निघण्टु अ० ५ खण्ड २ में इध्म शब्द पर ही "अथात आप्रियः" यह अधिकार की सूचना दी है, ये बारह शब्द यहाँ निघण्टु ग्रन्थ में जिस क्रम से पढे हैं, उसी क्रमसे ⁜प्रैष ग्रन्थ = मन्त्रभाग के स्थल विशेष में भी पढ़े हुए हैं, अथवा वहाँ जिस क्रमसे ये शब्द पढ़े हैं, उसी क्रम से वहां से इस समाम्नाय में उठा लिये हैं, इस कारण इनके क्रम (सिलसिले) का प्रयोजन यहाँ वही है, जो वहाँ है, किन्तु इन 'इध्म' आदि शब्दों के क्रम पूर्वक उठाए हुओं का क्रम देखकर यह प्रश्न उठ आता है कि- क्या 'अग्नि' आदि जो और २ शब्द इस काण्ड में पढे हुए हैं, उनका वह क्रम निघण्टु में किसी प्रयोजन के साथ में होसकता है, या उनकी गणना ही जैसे तैसे अपेक्षित है ? यद्यपि 'इध्म' आदि आप्री देवताओं के नामों का

⁜ यह प्रैषाध्याय के नाम से ऋग्वेद मन्त्रसंहिताके परिशिष्ट भाग के अन्त में एक प्रकरण ग्रन्थ है। उसमें १३ प्रयाजप्रैष ८ पाशुक प्रैष ११ अनुयाज प्रैष एक सूक्त वाक प्रैष और ३६ सुत्या में सवनीय प्रैष हैं। इस प्रकार कुल वहां पर ६९ प्रैष मन्त्र हैं। इसी का नाम प्रैषग्रन्थ या प्रैषाध्याय है।

क्रम वेदाध्ययन तथा कर्म में जैसा यथास्थित उपयुक्त होता है वैसा इनका नहीं। क्योंकि-इनका पाठ या यजन इसी क्रम से मन्त्रों में या कर्म में नहीं है (तथापि प्राकृतिक निय- म के अनुसार उनके पाठ का क्रम प्रयोजन सहित है । जैसे कि - सब संसार तीन भागों में बटा हुआ है - पृथिवी लोक अन्तरिक्ष लोक और द्युलोक। देवता भी तीनों लोकों में रहते हैं और उन सभी के नामों की व्याख्या भी कर्त्तव्य है । ऐसी अवस्था में हमारे निकट पहिले पृथिवी लोक के ही देवता हैं और उन्हीं के नामों की व्याख्या हमें करनी चाहिए जब हम ऊपर के लोकों में चलेगे, तो पृथिवी लोक से आगे अन्तरिक्ष लोक आयेगा, इससे पृथिवी के देवताओं के नामों की व्याख्या के पश्चात् अन्तरिक्ष के देवताओं के नामों की ही व्याख्या प्राप्त होती है, और अन्तरिक्ष के ऊपर फिर द्युलोक में जांयगे, इससे उनके अनन्तर द्युलोक के देवताओं के नामों की व्याख्या प्राप्त होती है । यही देवता नामों के पाठ का क्रम निघण्टु शास्त्र में रखागया है । पृथिवी का देवता अग्नि, अन्तरिक्ष का वायु या इन्द्र और द्युलोक का सूर्य देवता है। इस कारण पहिले अग्नि देवता के नामों का पाठ है, और इसी प्रकार अग्नि के अनेक नामों में तथा अग्नि के संबन्धी अन्य देवता आदि के नामों में जो पूर्वापरभाव है, वह भी प्राकृतिक स्वभाव के अनुसार है, । ऐसे ही अन्तरिक्ष और द्युलोक के देवताओं तथा उनके सम्बन्धी अन्य नामों की भी व्यवस्था ध्यान में लाने योग्य है। इसी से आचार्य ने स्थान २ में इस अभिप्राय की अपनी प्रतिज्ञा से सूचना भी दी है। जैसे-

हिन्दी निरुक्त ( १४५ ) ८ अ० २ पा० १ खं० “अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः” (अ० ७ पा० ४ खं० १) अर्थात्- अग्नि पृथिवी स्थान का देवता है, इससे हम उसकी व्याख्या पहिले करेंगे। “तासामिध्मः प्रथमागामी भवति” [अ० ८ पा०२ खं०१] अर्थात् इनमें 'इध्म' स्वभाव से पहिले आनेवाला है। “तेषामश्वःप्रथमागामी भवति” [अ०६पा०१खं०१] अर्थात् उन में 'अश्व' स्वभाव से पहिले आने वाला है। “तेषां रथः प्रथमागामी भवति” [अ० ६ पा० २ खं० १] अर्थात् उनमें 'रथ' स्वभाव से पहिले आने वाला है। इत्यादि । पृथिवी स्थान के देवता- नामों के क्रम का विशेष रूप से प्रयोजन इस प्रकार है कि- पार्थिव ज्योति = पृथिवी लोक के तेज का संबन्ध जैसा 'अग्नि' शब्द के साथ अधिक प्रसिद्ध है, वैसा 'जातवेदस्' शब्द के साथ नहीं, जैसा 'जात- वेदस्' शब्द के साथ है, वैसा 'वैश्वानर' शब्द के साथ नहीं जैसा 'वैश्वानर' शब्द के साथ है वैसा द्रविणोदस् के साथ नहीं। इस प्रकार इन सब शब्दों के क्रम का कारण गुण के न्यूनाधिक्य से या प्रसिद्धि के न्यूनाधिक्य से लेना चाहिये। यद्यपि 'अग्नि' आदि शब्दों के समान 'इध्म' आदि शब्द भी अग्नि के या पार्थिव ज्योति के नाम हैं इससे ये उन के समान पूर्व स्थान के भागी होते हैं, तथापि 'अग्नि' आ- दि शब्द प्रत्यक्ष अग्नि के नाम हैं, और इध्म = इन्धन = काष्ठ आदि अप्रत्यक्ष अग्नि के नाम हैं। क्योंकि- काष्ठ को रगड़- ने से उसमें अग्नि प्रत्यक्ष होता है, स्वतः नहीं। इससे

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ८ अ० २ पा० १ खं० अग्नि आदि नामों की अपेक्षा इन 'इध्म' आदि नामों की गौणता है । ऐसे ही 'इध्म' आदि परोक्ष अग्नि के ही नाम हैं और 'अश्व' आदि अग्नि के स्थान मात्र में रहने वाली वस्तुओं के किन्तु किसी प्रकार की अग्नि के नहीं, इससे ये 'इध्म' आदि की अपेक्षा भी गौण हैं, इस कारण उनके अनन्तर पढे जाते हैं । इसी प्रकार 'अश्व' आदि प्राणी हैं, और 'अक्ष' (पासे) आदि अप्राणी (जड) हैं, इस कारण अश्व आदि के पश्चात् 'अक्ष' आदि नामों की स्थापना ( संग्रह ) है। ऐसे ही सब स्थानों में क्रम का प्रयोजन द्रष्टव्य है । शाकपूणि आचार्य ने स्वयम् निघण्टु शास्त्र के आरम्भ से ही सब 'गौ' आदि शब्दों का प्रयोजन कहा है । जैसा कि- वार्त्तिककार ने कहा है - “क्रमप्रयोजनं नाम्नां शाकपूण्युपलक्षितम् । प्रकल्पयेदन्यदपि न प्रज्ञामवसादयेत् ॥” नामों के क्रम का प्रयोजन शाकपूणि आचार्य ने दिखाया है, उससे अन्य प्रयोजन की भी कल्पना करे किन्तु अपनी बुद्धि को खिन्न न करे [ यदि वह ध्यान में न आवे ] । प्रयोजन यह है कि-व्युत्पत्तियों की कोई सीमा नही है, जैसे २ न्यायसंगत अर्थ प्रतीत हो, वैसे २ ही व्युत्पत्ति करे, किसी व्युत्पत्ति के ठहराने के लिये ही खिन्न न होना चाहिए । ( खं० २ ) (निरु०-) "समिद्धो अद्य मनुष्यो दुरोणे देवो

हिन्दी निरुक्त ( १४७ ) ८ अ० २ पा० २ खं० देवान्यजसि जातवेदः । आ च वह मित्र मह- श्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः॥” [ऋ०सं० ८,६८,१ ] ॥ “समिद्धो अद्य” मनुष्यस्य मनुष्यस्य गृहे “देवो देवान्-यजसि जातवेदः, आ च वह मित्र मह- श्चिकित्वान्”-चेतनावान् , “त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः”-प्रवृद्धचेताः ॥ यज्ञेध्मः-इति कात्थक्यः । अग्निः-इति शाकपूणिः ॥ ‘तनूनपात्’ आज्यम्-इति कात्थक्यः । ‘नपात्’ इति अनन्तरायाः प्रजाया नामधेयम् । निर्णततमा भवति । गौः अत्र ‘तनूः’ उच्यते । तता अस्यां भोगाः । तस्याः पयो जायते । पयसः आज्यं जायते । अग्निः- इति शाकपूणिः । आपः अत्र ‘तन्वः’ उच्यन्ते । तता अन्तरिक्षे । ताभ्यः ओषधि-वनस्पतयो जायन्ते । ओषधि वनस्पतिभ्यः एष जायते ॥ तस्य-एषा भवति ॥ २ (५) ॥ अर्थः-“समिद्धो अद्य” इस ऋचा का भार्गव जम-

हिन्दी निरुक्त ( १४८ ) ८ अ० २ पा० २ खं० दृग्नि ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, और यास्क के मत में इस सूक्त । का ही अग्नि देवता है । हे वृष्म ! देव ! 'समिद्धः' भले प्रकार प्रज्वलित हुआ = जलता हुआ 'अद्य' आज इस यजन के विशेष दिन में 'मनुषः' ( मनुष्यस्य मनुष्यस्य ) जन जन के 'दुरोणे' ( गृहे ) घर में 'देवः' दाता (त्वं) तू हे 'जातवेदः ' जातवेदस् = अग्नि के आधार ! 'देवान्' देवताओं को 'यजसि' यजन करता है । हें 'मित्रमहः' मित्रों के महनीय ' = पूजनीय ! 'आ च वह' ( आह्वय च ) और तू देवताओं को बुला और बुलाकर यजन कर । क्योंकि 'त्वम्' तू 'चिकित्वान्' ( चेतनावान् ) जानकर 'असि' है । 'दूत-' सब यजमानों का दूत है । 'कविः' (क्रान्त- दर्शनः ) फैले हुए प्रकाश वाला या सुन्दर प्रकाश वाला है । 'प्रचेता' (प्रवृद्धचेताः ) बड़े विज्ञान वाला है । व्याख्या इस मन्त्र में कौन देवता है ? "यज्जध्मः" कात्थक्य आचार्य मानते हैं कि-यहाँ यज्ञ का 'इध्म' समिध् = काष्ठ देवता है । प्रश्न-इस मन्त्र में उसके देवता होने का कोई लिङ्ग या सूचक नहीं है ? उत्तर-यद्यपि नहीं है, तथापि यह ऋचा "समिद्भ्यः प्रेष्या" इस श्रुति से समिधों के लिये प्रेष्य कही गई है, और जो ऋचा जिस वस्तु के लिये प्रेष्य होती है, उसमें वही वस्तु देवता होती है, उसी का यजन होता है । इस कारण जिस समय समिध् इन्धन होकर अग्नि से ज्वलित हो जाती

हिन्दी निरुक्त (१४६) ८ अ० २ पा० २ खं० हैं, उनके समूह को ध्यान करके यह वचन है। यह व्यवहित अभिधान कहलाता है- साक्षात् = असली नाम न होकर परदे से नाम लिया हुआ होता है। जैसे हिन्दू स्त्रियें अपने पति का साक्षात् नाम न लेकर उस के नाम को किसी उपाय के द्वारा बताती हैं, वैसे ही ऋचाओं में कहीं २ देवताओं के लिये भी परदे से कहा जाता है। “परोक्षप्रिया इव हि देवाः” देवता परोक्षता से-परदे से कही हुई स्तुति से प्यार करने वाले होते हैं। ऐसा ही यह श्रुति भी कहती है। इसी न्याय के अनुसार यहां “समिद्धो अद्य” इस ऋचा में 'इध्म' यह आप्रीगत गुप्त नाम है। यह बात दर्श पूर्णमास के होता के कर्म में प्रसिद्ध है-“समिधो यज” 'समिधों का यजन कर' इस मन्त्र से अध्वर्यु के द्वारा प्रेषित = प्रेरित हुआ होता “ये३यजामहे समिधः समिधो अग्नआ- ज्यस्य व्यन्तु३वौ३षट्” इस मन्त्र से “वषट्” करता है, उस “वषट्”कार के साथ या अनन्तर ही अध्वर्यु आज्य का होम करता है। इस कारण यहां 'इध्म' देवता है, यह कात्थक्य आचार्य का मानना ठीक है। “अग्निः-इति शाकपूणिः” शाकपूणि आचार्य मानते हैं कि-इस मन्त्र में अग्नि देवता है ॥ व्याख्या । शाकपूणि आचार्य यहां किस युक्ति से अग्नि देवता को मानते हैं ? (क) इध्म की अपेक्षा अग्नि होम कर्म में समीप होकर

हिन्दी निरुक्त ( १५० ) ८ अ० २ पा० २ खं उपकार करता है- पहिले इन्धन रखाजाता है, फिर अग्नि जलता है, फिर उसमें होम होता है, जो देवताओं का यजन या पूजा है, उसमें अग्नि निकट और इध्म दूसरा होता है । (ख) इध्म प्रैष कर्म में मिलकर उपकार करता है किन्तु स्वतन्त्रता से नहीं पहिले होता प्रैषमन्त्र “समिधःस- मिधो०” इत्यादि पढता है, फिर अध्वर्यु आज्य का होम करता है, अतः उसका क्रिया से स्वतन्त्र सम्बन्ध नहीं होता अर्थात्- जिस देवता के यजन का प्रैष होता है उसी का फिर यजन होता है । और यहां कात्थक्य के मत में प्रैष इध्म(समि ध् ) के यजन का हुआ, और यजन या होम अग्निमें । इसी से इध्मका क्रिया से साक्षात् सम्बन्ध न होकर अग्नि के द्वारा सम्बन्ध होता है, स्वतन्त्रता से नहीं । तथा स्वतन्त्रता के बिना उसकी ज्ञापकता ग्राह्य नहीं । अतः इध्म नाम अग्नि का ही होता है । (ग) यजति या इष्टि = दर्श पूर्णमास आदि में आप्री ऋचाओं का जो आप्री रूप है-- वे ऋचाएं जिस रूप में स्थित है- अपने स्वभाव से जिस प्रकार अर्थ को प्रकाश कर रही हैं- उनपर ध्यान देनेसे जो बुद्धि पर आपसे आप ज्ञान फैलता है, वह उनका रूप बलवत् है और वह अग्नि पक्ष को ही पुष्ट करता है, उसका उल्लङ्घन करके दूसरा अर्थ किया नहीं जासकता । आप्री का क्या रूप है ! और कैसे वह अग्नि के अर्थ हो जाती है- उसका देवता इध्म न होकर अग्नि कैसे होजाता है ? सुनो--