नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
नीतिशतकम् १२३
अनुवाद- सज्जनता ऐश्वर्य का, वाणी पर नियन्त्रण वीरता का, शान्ति ज्ञान का, विनम्रता शास्त्र (ज्ञान) का, सत्पात्र में खर्च धन का, क्रोध न करना तप का, क्षमा प्रभावशाली का, निश्छलता धर्म का आभूषण (हैं), (किन्तु) सभी का कारण यह सत्स्वभाव (शील) सर्वश्रेष्ठ आभूषण (है)।
व्याख्या- व्यक्ति के अन्यान्य गुणों की चर्चा करते हुए कवि श्रेष्ठ स्वभाव की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करते हुए कहता है कि, यदि व्यक्ति ऐश्वर्य सम्पन्न है और साथ ही सज्जन भी है तो यह गुण आभूषण के समान है।
इसी प्रकार यदि व्यक्ति शूरवीर है साथ ही अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखने वाला भी है तो यह गुण उसके लिए आभूषण के समान है। व्यक्ति ज्ञानवान् भी है साथ ही शान्त प्रकृति भी है तो यह उसके लिए अलंकरण ही है।
ठीक इसी प्रकार व्यक्ति अपने धन का खर्च सत्पात्र पर करता है, व्यर्थ ही लुटाता नहीं है तो यह बात उसकी शोभा को बढ़ाने वाली है। तपस्वी होते हुए भी व्यक्ति यदि क्रोधी नहीं है तो यह उसके लिए आभूषण ही है।
प्रभावशाली होते हुए भी यदि व्यक्ति क्षमा धारण करता है तो यह उसकी शोभा में वृद्धि करने वाला है। धार्मिक प्रवृत्ति वाला होते हुए भी व्यक्ति का निष्कपट होना, उसके लिए आभूषण है।
किन्तु इन सभी बातों से अलग और सभी का कारण रूप एवं सर्वोत्कृष्ट गुण, शील अर्थात् श्रेष्ठ स्वभाव व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण है। कहने का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति का श्रेष्ठ स्वभाव है तो समझना चाहिए कि उसके पास सबसे बड़ा आभूषण है।
विशेष- १. शील की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित की है। २. व्यक्ति को अच्छे गुणों के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इसका अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादन किया गया है। ३. स्वर्णादि से निर्मित आभूषणों की निस्सारता का प्रतिपादन किया गया है। ४. मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ आभूषण तो उसके गुण हैं। ५. अन्यत्र कवि ने एकमात्र मधुर वाणी को ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण प्रतिपादित किया है— ‘‘वाग्भूषणं भूषणम्’’। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सुजन + तल् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सुजनता २. ईश्वरस्य भावः ऐश्वर्यः, तस्य ऐश्वर्यस्य ३. ईश + वरच् = ईश्वर + ष्यञ् = ऐश्वर्यः, तस्य ईश्वरस्य ४. वि + √भूष् + ल्युट् = विभूषणम्
१२४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
५. वाचाम् संयमः, वाक् संयमः (षष्ठी तत्पुरुष) सम् + √यम् + अप् = संयमः ६. शूरस्यभावः, शौर्यः, तस्य, शूर + ष्यञ् (नपुं., षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ७. उप + √शम् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उपशमः ८. वि + √नी + अच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विनयः ९. √श्रु + क्त = श्रुतः, तस्य श्रुतस्य १०. प्र + √भू + तृच् = प्रभवितृ - तस्य, प्रभवितुः (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ११. निर् + व्याज + तल् + टाप् = निर्व्याजता १२. सर्वेषाम् कारणम्, सर्वकारणम् (षष्ठी तत्पुरुष) १३. ज्ञानस्य + उपशमः (गुण् - आद् गुणः) (अ + उ = ओ) १४. विनयः + वित्तस्य (विसर्ग - हशि च) (:— उ— ओ)
रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयतां, अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा, यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥९५॥
अन्वय- रे रे मित्र चातक! सावधान मनसा क्षणम् श्रूयताम्। गगने बहवः अम्भोदाः सन्ति, हि सर्वे अपि एतादृशाः न। केचित् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति (इत्यर्थम् त्वम्) यम् यम् पश्यसि, तस्य तस्य पुरतः दीनम् वचः मा ब्रूहि।
अनुवाद- हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण भर के लिए सुनो। आकाश में बहुत से बादल हैं, किन्तु सभी एक जैसे नहीं (हैं)। कुछ वर्षा के द्वारा पृथिवी को गीला करते हैं, (परन्तु) कुछ व्यर्थ (ही) गरजते हैं। (इसलिए तुम) जिस-जिसको देखते हो, उस-उस के सामने दीन वचन मत कहो।
व्याख्या- चातक को सम्बोधित करके कवि कहता है कि हे चातक, तुम मेरी बात जरा ध्यान लगाकर क्षणभर के लिए सुनो, आकाश में तुम्हें अनेक बादल दिखाई दे रहे हैं, किन्तु वे सभी एक जैसे नहीं हैं। उनमें कुछ तो जल-वर्षा करके पृथिवी की प्यास बुझाते हैं, किन्तु कुछ तो व्यर्थ ही गर्जन करते हैं अर्थात् बरसते नहीं हैं।
इसलिए तुम जिसे भी देखते हो अपनी दीनवाणी को उस-उसके सामने मत कहो। प्रत्येक के सामने अपनी दीनता प्रकट करना उचित नहीं है।
यहाँ चातक, याचक का प्रतीक है तथा बादल धनवानों का। सभी धनवान् दानदाता नहीं होते, उदार हृदय नहीं होते। अतः याचकों को प्रत्येक के सामने स्वयं की दीनता प्रकट नहीं करनी चाहिए। जो धनवान् वस्तुतः दान देने वाले, दयालु हृदय हैं, उन्हीं के सामने याचना करना उचित है।
नीतिशतकम् १२५
विशेष- १. चातक के विषय में प्रसिद्ध है कि वह केवल वर्षा के जल को ही पीता है।
२. प्रत्येक धनवान् के सामने दीनतापूर्ण व्यवहार याचक के लिए उचित नहीं है।
३. प्रसिद्धि है, 'जो गरजते हैं, बरसते नहीं हैं'।
४. प्रस्तुत श्लोक में अन्योक्ति के माध्यम से धनवानों की मानसिकता का प्रतिपादन किया गया है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग है लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अवधानेन सहितम् सावधानम्, सावधानम् मनः सावधानमनः, तेन - सावधानमनसा
२. अम्भस् + √दा + क, अम्भांसि ददति इति अम्भोदाः
३. वसु + √धा + क + टाप्, वसुधा, ताम् वसुधाम्
४. √आर्द्र + णिच् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) आर्द्रयन्ति
५. पुर + तस् = पुरतः
६. न + एतादृशाः (वृद्धि, वृद्धिरेचि) नैतादृशाः
७. पुरतः + मा (विसर्ग, हशि च) पुरतो मा
८. केचित् + वृष्टिभिः + आर्द्रयन्ति (झलां जशोऽन्ते, ससजुषो रुः)
९. केचित् + वृथा (व्यञ्जन - झलां जशोऽन्ते)
१०. √दृश् + सिप् (लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पश्यसि
११. √अस् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) सन्ति
दैव-पद्धतिः
नेता यस्य बृहस्पतिः प्रहरणं वज्रं सुराः सैनिकाः,
स्वर्गो दुर्गमनुग्रहः किल हरेरैरावतो वारणः।
इत्यैश्वर्यबलान्वितोऽपि बलभिद् भग्नः परैः सङ्गरे,
तद् व्यक्तं वरमेव दैवशरणं धिग् धिग् वृथा पौरुषम्॥९६॥
अन्वय- बृहस्पति यस्य नेता, वज्रम् प्रहरणम्, सुराः सैनिकाः, स्वर्गः दुर्गम्, हरेः अनुग्रहः, ऐरावतः वारणः इति, ऐश्वर्यबलान्वितः अपि बलभित् संगरे परैः भग्नः। तत् व्यक्तम्, दैवशरणम् एव वरम्, धिक् धिक् वृथा पौरुषम्।
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अनुवाद- बृहस्पति जिसका नेता (था), वज्र शस्त्र (था), देवता सैनिक (थे), स्वर्ग दुर्ग (था), विष्णु की कृपा भी (थी), ऐरावत (हाथी) वाहन था, इस प्रकार ऐश्वर्य और बल से युक्त (होता हुआ) भी इन्द्र युद्ध में शत्रुओं द्वारा हरा दिया गया। तो स्पष्ट है कि भाग्य की शरण ही उचित है, व्यर्थ के पुरुषार्थ को धिक्कार है।
व्याख्या- इस संसार में भाग्य ही प्रबल है, पुरुषार्थ, परिश्रम आदि सब व्यर्थ हैं, इसकी पुष्टि के लिए इन्द्र का उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि बृहस्पति जैसा नीतिनिपुण एवं विद्वान् देवता जिसका मार्गदर्शक रहा, वज्र के समान अत्यन्त प्रभावशाली हथियार जिसका शस्त्र था, अत्यन्त सामर्थ्यवान् देवता जिसके सैनिक के रूप में थे, स्वर्ग जैसा सुरक्षित एवं दुर्गम स्थान जिसका दुर्ग था, सम्पूर्ण संसार का पालन करने वाले परमपिता परमेश्वर की जिस पर कृपा थी, ऐरावत जैसा शक्तिशाली हाथी जिसका वाहन था, ऐसे बल नामक राक्षस का विनाश करने वाले इन्द्र को, इतने सहयोग और सामर्थ्य के उपरान्त भी उसके शत्रु राक्षसों ने युद्ध भूमि में हरा दिया।
तो इस सब घटनाक्रम को देखकर निश्चयपूर्वक यही कहा जा सकता है कि पुरुषार्थ पूर्णतया व्यर्थ एवं निरर्थक है, उसे बार-बार धिक्कार है। वस्तुतः एकमात्र भाग्य ही प्रबल होता है। अतः व्यक्ति को पुरुषार्थ करके अपने मन, मस्तिष्क एवं शरीर को व्यर्थ ही कष्ट नहीं देना चाहिए।
विशेष-
१. भाग्य की प्रमुखता सोदाहरण अत्यन्त सुन्दर शैली में सप्रमाण प्रस्तुत की है।
२. बलभित् का प्रयोग स्वयं इन्द्र को भी शक्तिशाली बताने के लिए किया गया है।
३. युद्ध विजय के लिए जितने भी साधनों की आवश्यकता होती है, वे सब इन्द्र के पास होते हुए भी उसकी पराजय में एकमात्र भाग्य की प्रबलता ही कारण थी।
४. जब देवताओं के राजा की भी भाग्य के समक्ष एक भी नहीं चली, तब मनुष्य की तो बात ही क्या है।
५. प्रस्तुत श्लोक में प्रयुक्त सभी विशेषण अभिप्राययुक्त प्रयुक्त हुए हैं' अतः परिकर अलंकार का प्रयोग हुआ है-
विशेषणैर्यत् साकूतैरुक्तिः परिकरस्तु सः
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
७. ‘धिक्’ के योग में ‘पौरुषम्’ में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √नी + तृच् = नेतृ (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नेता
२. बृहतां पतिः, बृहस्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
नीतिशतकम् १२७
३. प्र + √हृ + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रहरणम्
४. √वृ + णिच् + ल्युट् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वारणः
५. ऐश्वर्यञ्च बलञ्च तेन अन्वितः ऐश्वर्यबलान्वितः (द्वन्द्व समास)
६. बलं भिन्ति इति बलभिद्
७. बल + √भिद् + क्विप् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) बलभित्
८. √भञ्ज् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) भग्नः
९. इरा + मतुप् + अण् = ऐरावत
१०. दैवम् एव शरणम् देवस्यशरणम् वा (षष्ठी तत्पुरुष)
११. √श्रृ + ल्युट् = शरणम्
१२. अनु + √ग्रह् + अप् = अनुग्रहः
१३. इति + ऐश्वर्यबलान्वितः + अपि (इकोयणचि, अतोरोरप्लुतादप्लुते, एड्ः पदान्तादति)
१४. तत् + व्यक्तम् (झलांजशोऽन्ते) (त्— द्)
भग्नाशस्य करण्डपीडित¹ तनोर्म्लानेन्द्रियस्य क्षुधा,
कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा,
लोकाः पश्यत² दैवमेव हि नृणां³ वृद्धौ क्षये कारणम्॥९७॥
अन्वय- करण्डपीडिततनोः, क्षुधा म्लानेन्द्रियस्य, भग्नाशस्य भोगिनः मुखे नक्तम् आखुः विवरम् कृत्वा स्वयम् निपतितः। तत् पिशितेन तृप्तः असौ (सर्पः) सत्वरम् तेन एव पथा यातः। लोकाः पश्यत, नृणाम् वृद्धौ, क्षये हि दैवम् एव कारणम् (अस्ति)।
अनुवाद- पिटारी में दबे हुए शरीर वाले, भूख से शिथिल इन्द्रियों वाले, नष्ट हुई (जीवन की) आशा वाले साँप के मुँह में, रात्रि में (एक) चूहा छेद करके स्वयं गिर पड़ा। उस मांस से संतुष्ट हुआ वह (साँप) शीघ्र ही उसी मार्ग से (बाहर) चला गया, लोगों देखो, मनुष्यों की समृद्धि और हानि में भाग्य ही (एकमात्र) कारण (है)।
व्याख्या- इस संसार में किसी भी प्राणी की लाभ-हानि, जीवन-मरण, सुख-दुःख सभी भाग्य से नियन्त्रित हैं, इसी बात को एक सर्प के उदाहरण द्वारा प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है कि—
एक साँप को सपेरे ने पिटारी में बन्द कर दिया वहाँ भूख और प्यास के कारण
१. पिण्डित (कुण्डली बनाकर)
२. स्वस्थस्तिष्ठति
३. परंवृद्धौ
१२८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
उसका अंग-अंग ढीला हो गया था अर्थात् उसमें तनिक भी शक्ति नहीं रही थी, अपने जीवन से भी वह पूरी तरह निराश हो चुका था अर्थात् उसे अपने जीवन की तनिक भी आशा नहीं रही थी।
किन्तु भाग्य की प्रबलता देखिए रात्रि में कोई चूहा उसकी पिटारी में छेद बनाकर स्वयं ही उसके ऊपर गिर पड़ा। तुरन्त सर्प ने उस चूहे को धर दबोचा और खा गया। उसके मांस को खाने से उसकी भूख शान्त हुई और उसके शरीर में बल का सञ्चार हुआ, जिससे वह उसी छेद से, जिससे चूहा अंदर आया था, निकलकर बाहर चला गया अर्थात् उसके प्राण जाते-जाते बच गए तथा वह स्वतन्त्र भी हो गया।
इस समस्त घटना का वर्णन करने का बाद कवि जनसामान्य को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे मनुष्यो ! इस सबको देखकर इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस संसार के सभी प्राणियों के जीवन-मरण, हानि-लाभ अदि सभी क्रियाओं के पीछे भाग्य की प्रबलता को ही स्वीकार करना पड़ता है।
विशेष— १. भाग्यवान् यहाँ असम्भव सम्भव सब कुछ प्राप्त करता है। भाग्यहीन को कुछ प्राप्त नहीं होता।
२. भाग्य का निर्माण पूर्वजन्म के कर्मों से होता है।
३. भाग्य की प्रबलता अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादित की गई है। मनुष्य की उन्नति और अवनति का कारण एकमात्र भाग्य ही है।
४. अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषार्थ की निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्य्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. भग्ना आशा यस्य तस्य (बहुव्रीहि) भग्नाशस्य
२. √भञ्ज् + क्त = भग्नः
३. करण्डेन पीडितः करण्डपीडितः, करण्डे पीडिता तनुः यस्य, तस्य
४. म्लानानि इन्द्रियाणि यस्य सः, तस्य (बहुव्रीहि) म्लानेन्द्रियस्य
५. √म्लै + क्त = म्लान। √भुज् +घञ् = भोग + इनि = भोगिन्
६. भोगः अस्ति अस्य इति, तस्य - भोगिनः (षष्ठी विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग)
७. नि + √पत् + क्त = निपतितः
८. √दृश् + थ (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन) पश्यत
९. √वृध् + क्तिन् = वृद्धिः (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) वृद्धौ
१०. √क्षि + अच् (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) क्षये
नीतिशतकम् १२९
११. कृत्वा + आखुः (अकः सवर्णे दीर्घः - आ + आ = आ)
१२. तेन + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
यथा कन्दुक पातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।
तथा त्वनार्यः पतति मृत्पिण्डपतनं यथा॥९८॥
अन्वय- यथा कन्दुक पातेन उत्पतति तथा आर्यः पतन् अपि (उत्पतति) तु यथा मृत्पिण्डपतनं (तथा) अनार्यः पतति।
अनुवाद- जिस प्रकार गेंद गिराने से ऊपर उठती है वैसे ही सज्जन (व्यक्ति) गिरते हुए भी ऊपर उठता है, किन्तु मिट्टी के ढेले पर गिरने के समान दुष्ट का पतन होता है।
व्याख्या- सज्जन व्यक्ति का पतन गेंद के गिराने के समान होता है, जिस प्रकार गेंद गिरकर भी पुनः उठती है वैसे ही सज्जन व्यक्ति की अवनति के बाद उन्नति सुनिश्चित है। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति का पतन मिट्टी के ढेले के समान शाश्वत होता है। वह एक बार पतित होने के बाद पुनः उन्नति को प्राप्त नहीं होता।
विशेष-
१. सज्जन व्यक्ति के पतन की तुलना गेंद के पतन से तथा दुष्ट व्यक्ति के पतन की मिट्टी के लोंधे के गिरने से की गई है।
२. दुष्ट व्यक्ति का पतन शाश्वत होता है, जबकि सज्जन व्यक्ति अवनति को प्राप्त करके भी उठता अवश्य है।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
४. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
५. नीतिशतकम् की सभी पाण्डुलिपियों में यह श्लोक नहीं है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. उत् + √पत् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उत्पतति
२. √पत् + शतृ = पतन्
३. न आर्यः इति (नञ् समास) = अनार्यः
४. मृतस्य पिण्डं मृतपिण्डं (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य पतनं = मृत्पिण्डपतनं
५. कन्दुकमिव पातः, कन्दुकपातः (कर्मधारय) तेन कन्दुकपातेन
६. पातेन + उत्पतति + आर्यः (आद् गुणः, इकोयणचि)
७. पतन् + अपि = पतन्नपि (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्)
१३० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापितो १ मस्तके,
वाञ्छन् २ देशमनातपं विधिवशात्ता ३ लस्य मूलं गतः।
तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः,
प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहित ४ स्तत्रैव यान्त्यापदः ॥९९॥
अन्वय- दिवसेश्वरस्य किरणैः मस्तके सन्तापितः खल्वाटः अनातपम् देशम् वाञ्छन् विधिवशात् तालस्य मूलम् गतः। तत्र अपि पतता महाफलेन अस्य शिरः सशब्दम् भग्नम् (जातम्) भाग्यरहितः यत्र गच्छति, तत्रैव प्रायः आपदः यान्ति।
अनुवाद- सूर्य की किरणों से मस्तक पर अत्यन्त तपा हुआ गंजा धूपरहित प्रदेश को चाहता हुआ, भाग्यवश ताड़ (वृक्ष) के नीचे गया। वहाँ भी गिरते हुए बहुत बड़े (ताड़ के) फल से इसका सिर आवाज के साथ विदीर्ण (हो गया)। भाग्यहीन जहाँ जाता है, वहीं प्रायः आपत्तियाँ जाती हैं।
व्याख्या- दुर्भाग्य, व्यक्ति का पीछा कहीं भी नहीं छोड़ता है इसी का प्रतिपादन कवि ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से उदाहरण देते हुए किया है। कोई गंजा व्यक्ति सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से अत्यन्त पीड़ित होकर छाया की तलाश में जब एक ताड़ के पेड़ के नीचे पहुँचा ही था कि पेड़ से एक बड़ा सा ताड़ का फल उसके गंजे सिर पर धड़ाम से गिरा और उसका सिर एक दर्दनाक आवाज के साथ फट गया तथा वह व्यक्ति वहीं ढेर हो गया।
इस प्रकार भाग्यहीन व्यक्ति जहाँ भी जाता है, आपत्तियाँ उसके पीछे वहाँ-वहाँ जाती हैं अर्थात् कहीं भी उसका पीछा नहीं छोड़ती हैं।
विशेष-
१. भाग्य की प्रबलता का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है।
२. अच्छा या बुरा जैसा भी व्यक्ति का भाग्य होता है, वह कहीं भी क्यों न चला जाए, उसे भोगना ही पड़ेगा।
३. भाग्य पर विश्वास न करने वाले इसे मात्र संयोग की ही संज्ञा देते हैं।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिवसस्य ईश्वरः दिवसेश्वरः (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य दिवसेश्वरस्य
१. संतापिते
२. गच्छन्
३. द्रुतगतिः
४. दैवहतकस्तत्रैव
नीतिशतकम् १३१
२. सम् + √तप् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सन्तापितः ३. न अस्ति आतपं यस्मिन्, तम्, अनातपम् ४. √वाञ्छ् + शतृ = वाञ्छन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √पत् + शतृ (नपुं. तृतीया विभक्ति, एकवचन) पतता ६. शब्देन सहितम्, सशब्दम् (अव्ययीभाव) ७. आ + √पद् + क्विप् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) आपदः ८. √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) यान्ति ९. √भञ्ज् + क्त = भग्नम् १०. भाग्येन रहितः, भाग्यरहितः (तृतीया तत्पुरुष) ११. खल्वाटः + दिवस + ईश्वरस्य (हशि च, आद् गुणः) १२. तत्र + अपि + अस्य (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि) १३. तत्र + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ) १४. यान्ति + आपदः (इकोयणचि)
सृजति तावदशेषगुणाकरं,
पुरुषरत्नमलङ्करणं भुवः।
तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेद्,
अहह! कष्टमपण्डितता विधेः॥१००॥
अन्वय- चेत् अशेषगुणाकरम् भुवः अलङ्करणम् पुरुषरत्नम् (विधिः) सृजति तावत्, तदपि तत्क्षणभङ्गिकरोति, अहह, विधेः अपण्डितता कष्टम् (अस्ति)
अनुवाद- यद्यपि सभी गुणों की खान, पृथ्वी के आभूषण (स्वरूप) पुरुष रूपी रत्न को (विधाता) रचता तो है, (किन्तु) उसे भी तो क्षणभंगुर कर देता है, अहो, विधाता की मूर्खता (अत्यन्त) कष्टकर (है)।
व्याख्या- कवि को इस बात का अत्यन्त कष्ट है कि ब्रह्मा अनेक गुणों का निधान, पृथ्वी के आभूषण रूप पुरुष का पहले तो प्रयत्नपूर्वक निर्माण करता है, किन्तु निर्माण करने के बाद स्वयं ही उसे विनाशवान् भी बना देता है।
सामान्यतः होता यह है कि कोई भी व्यक्ति अपनी निर्मिति को तोड़ता नहीं है, क्योंकि उसका परिश्रम, उसकी भावना उस निर्मिति में निहित रहती है, किन्तु कवि की दृष्टि में यह ब्रह्मा की मूर्खता ही कही जायेगी कि वह स्वयं ही मानव रूप कृति का निर्माण अत्यन्त परिश्रम के साथ करता है और यह मानव भी कोई साधारण वस्तु नहीं है, अपितु इस सम्पूर्ण पृथ्वी का आभूषण स्वरूप, अनेक गुणों की खान, मानो रत्न स्वरूप ही है। फिर इतने उत्तम निर्माण को स्वयं ही वह विनाशवान् बना देता है; अतः
१३२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
उसकी इस प्रकार की प्रवृत्ति की किस प्रकार प्रशंसा की जा सकती है, इसे तो उसकी मूर्खता ही कहेंगे।
विशेष- १. "अहह" पद का प्रयोग यहाँ अत्यन्त दुःख की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। २. विधाता के अविवेकपूर्ण कार्य की आलोचना अत्यन्त कटु शब्दों में की गयी है। ३. 'पुरुषरत्नम्' में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है, पुरुष रूपी उपमेय में रत्न रूपी उपमान के अभेद का आरोप किया गया है। लक्षण— तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। ४. द्रुतविलम्बित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण— "द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।"
व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. न शेषः इति अशेषः (नञ् समास) १. √सृज् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) सृजति २. अशेषगुणानाम् आकरःतम् (षष्ठी तत्पुरुष) अशेषगुणानामाकरम् ३. पुरुषः रत्नम् इव (कर्मधारय) पुरुषरत्नम् ४. क्षणे भङ्गि (सप्तमी तत्पुरुष) क्षणभङ्गि ५. न पण्डितता इति (नञ् समास) अपण्डितता ६. पण्डा + इतच् = पण्डित + तल् + टाप् = पण्डितता ७. अलम् + √कृ + ल्युट् = अलंकरणम् ८. पुरुषेषु रत्नम् इति (सप्तमी तत्पुरुष) पुरुषरत्नम् ९. तत् + अपि (झलां जशोऽन्ते) तदपि। चेत् + अहह (झलां जशोऽन्ते) चेदहह
येनैवाम्बरखण्डेन संवीतो निशि चन्द्रमाः।
तेनैव च दिवा भानुरहो दौर्गत्यमेतयोः ॥१०१॥
अन्वय- येन अम्बरखण्डेन एव चन्द्रमाः निशि संवीतः, तेन एव च (अम्बरखण्डेन) भानुः दिवा (संवीतः), अहो! एतयोः दौर्गत्यम्।
अनुवाद- जिस वस्त्र के टुकड़े के द्वारा ही चन्द्रमा रात्रि में ढक दिया जाता है और उतने (वस्त्र के टुकड़े) से ही सूर्य दिन में (आवृत कर दिया जाता है) इन दोनों की दुर्गति आश्चर्यजनक है।
व्याख्या- सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाले तेजस्वी देवता सूर्य और चन्द्रमा भी क्रमशः दिन और रात में मात्र एक वस्त्र के टुकड़े के द्वारा ढक दिये जाते हैं। यह इन दोनों तेजस्वी एवं विशाल आकार वाले देवताओं की दुर्गति ही है, क्योंकि विशाल
नीतिशतकम् १३३
सामर्थ्य सम्पन्न होते हुए भी छोटे से वस्त्र के टुकड़े से ढका जाना अत्यन्त संकुचित दशा को प्राप्त होना है, जो स्वयं में आश्चर्यजनक एवं हीनता का द्योतक है।
विशेष- १. यहाँ अम्बर का अर्थ आकाश भी किया जा सकता है। तब अर्थ होगा 'छोटे से आकाश के टुकड़े से'।
२. वस्तुतः यहाँ अम्बोदखण्ड पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही को बादल का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है, यह दोनों तेजस्वी ग्रहों के लिए तिरस्कार का विषय है।
३. विधाता की सामर्थ्य सर्वोपरि है जिससे सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी बचने में समर्थ नहीं है।
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सम् + वि + √इण् (गतौ) + क्त = संवीतः २. अम्बरस्य खण्डेन, अम्बरखण्डेन (षष्ठी तत्पुरुष) ३. दुर् + गम् + क्त = दुर्गत + ष्यङ् = दौर्गत्यम् ४. येन + एव + अम्बरखण्डेन (वृद्धिरेचि, अकः सवर्णे दीर्घः) ६. तेन + एव = तेनैव (वृद्धिरेचि)
अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनां,
शतभिषगनुयातः शम्भुमूर्द्धोऽवतंसः।
विरहयति न चैनं राजयक्ष्मा शशांकं,
हतविधिपरिपाकः केन वा लंघनीयः॥१०२॥
अन्वय- अयम् अमृतनिधानम्, ओषधीनाम् नायकः, शतभिषक् अनुयातः, शम्भुमूर्ध्नो अवतंसः अपि (भवति), (तथापि) एनम् च शशाङ्कम् राजयक्ष्मा न विहरयति वा हतविधिपरिपाकः केन लग्नीयः।
अनुवाद- यह अमृत का भण्डार, औषधियों का नायक, सैकड़ों चिकित्सकों द्वारा अनुगमन किया गया, महादेव के सिर का आभूषण भी (बनता है), (फिर भी) इस चन्द्रमा को राजयक्ष्मा (रोग) नहीं छोड़ता है अथवा दुर्भाग्य का परिणाम किसके द्वारा उल्लंघन करने योग्य है।
व्याख्या- जब व्यक्ति का दुर्भाग्य उसका अनुकरण करता है, तब वह कितने भी अधिक साधनों से युक्त क्यों न हो, उसको कष्ट उठाना ही पड़ता है। अब चन्द्रमा का ही उदाहरण क्यों न ले लें। कहते हैं यह अमृत का भण्डार है, औषधियों को गुण प्रदान करने के कारण उन सबमें अग्रणी है तथा अनेकों चिकित्सक इसके महत्त्व को स्वीकार
१३४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
करते हैं अथवा आकाश मण्डल में शतभिषा (तारामंडल) से घिरा हुआ है। इतना ही नहीं देवों के देव, महादेव के सिर का आभूषण है।
फिर भी दुर्भाग्यवश इसे जो राजयक्ष्मा रोग लगा हुआ है, जिसके कारण इसका प्रतिदिन क्षरण होता है, वह दूर नहीं हो रहा है। इसलिए इस सब को देखकर तो यही कहा जाना उचित प्रतीत होता है कि व्यक्ति के हिस्से का जो दुर्भाग्य है वह तो किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को भोगना ही होगा, उससे बचना उसके लिए पूर्णतया असम्भव है।
विशेष- १. दुर्भाग्य के परिणाम से कोई भी व्यक्ति बचने में समर्थ नहीं होता भले ही वह साधन सम्पन्न ही क्यों न हो। २. शतभिषक पद में श्लेष अलंकार है, क्योंकि इसके दो अर्थ हैं- सैकड़ों चिकित्सक और शतभिषा नामक तारामण्डल। ३. कवि की कल्पना है कि चन्द्रमा के प्रतिदिन क्षरण का कारण उसका राजयक्ष्मा नामक रोग है, जिससे वह दुर्भाग्य के परिणाम के कारण ग्रसित है। ४. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है- ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः। ५. राजयक्ष्मा एक रोग जिसमें अंग गलने लगते हैं। इसे गलित कोढ़ भी कहते हैं।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √नी + ण्वुल् = नायकः २. अमृत + नि + √धा + ल्युट् = अमृतनिधानम् ३. न मृतः इति, अमृतः (नञ् समास) √मृ + क्त = मृतः ४. अनु + √इण् (गतौ) + क्त = अनुयातः ५. शशः अङ्के यस्य सः (बहुव्रीहि) शशाङ्कः, तम् शशाङ्कम् ६. वि + √रह् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विरहयति ७. √लङ्घ् + अनीयर् = लङ्घनीयः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ८. अव + √तंस् + घञ् = अवतंसः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. अमृतस्य निधानम् (षष्ठी तत्पुरुष) अमृतनिधानम्
प्रियसखे विपद्दण्डाघातप्रपातपरम्परा, परिचयबले१ चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः। मृदमिव बलात् पिण्डीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्, भ्रमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति॥१०३॥
१. परिचयचले
नीतिशतकम् १३५
अन्वय- प्रिय सखे! खलः विधिः प्रगल्भकुलालवत् (मम) मनः मृदम् इव बलात् पिण्डीकृत्य विपद्दण्डाघातप्रपातपरम्परापरिचय बले चिन्ता चक्रे निधाय भ्रमयति, अत्र किम् विधास्यति इति नो जानीमः।
अनुवाद- प्रिय मित्र! दुष्ट विधाता निपुण कुम्हार के समान हमारे मन को मिट्टी के समान, बलपूर्वक पिण्ड बनाकर विपत्ति रूपी डण्डे के प्रहारों से, अत्यन्त गिराने की परम्परा के परिचय रूपी बल वाले चिन्ता रूपी चक्र पर रखकर घूमा रहा है, यहाँ (वह) क्या बनायेगा, यह (हम) नहीं जानते हैं।
व्याख्या- हे मित्र! यह दुष्ट विधाता मेरे मन के साथ ठीक वैसा ही निर्दयतापूर्वक आचरण कर रहा है जैसा एक घड़ा बनाने में निपुण कुम्हार मिट्टी के साथ करता है, क्योंकि कुम्हार पहले मिट्टी को कठोरता के साथ उसका पिण्ड बना लेता है। उसके बाद वह उसे डण्डों के प्रहारों से अत्यन्त निर्दयतापूर्वक कूटता है और पुनः उस मिट्टी के लोंधे को बार-बार ऊपर उठा कर जमीन पर पटकता है। इस प्रकार उसे अनेकशः प्रपीडित करने के बाद ही चक्र पर चढ़ा कर घड़े आदि का निर्माण करता है।
इसी प्रकार यह विधाता भी मेरे मिट्टी के समान मन को बलपूर्वक दबाते हुए पिण्ड के रूप में बनाकर, विपत्ति रूपी डण्डों के प्रहारों से तथा अनेक असफलताओं रूपी गिराने की परम्परा के बल से, चिन्ता रूपी चक्र पर रखकर निरन्तर घूमा रहा है। यह मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि विधाता इस सब प्रक्रिया को पूर्ण करने के पश्चात् मेरे मन रूपी मिट्टी के द्वारा क्या बनाएगा। अर्थात् विधाता की मनः स्थिति को मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।
विशेष- १. विधाता की प्रत्येक क्रिया का फल परिणाम के द्वारा ही जाना जा सकता है, पहले नहीं।
२. विधाता की तुलना निपुण कुम्हार के साथ की गई है।
३. विधाता के लिए खल शब्द का प्रयोग उसे गाली देने के समान है।
४. यहाँ द्वितीय चरण के प्रारम्भ में परिचय बल के स्थान पर 'परिचय चले' भी पाठ उपलब्ध होता है। जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
५. जब मनुष्य पर विपरीत विधाता का कठोरतापूर्वक शक्तिपरीक्षण होता है, तो उसके मन की दशा कुम्हार की मिट्टी से भी बदतर होती है।
६. कठिन एवं विपरीत परिस्थिति में पड़े व्यक्ति की मनःस्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है।
७. हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसयुगहयैन्स्रौम्रौ स्लौ गो यदा हरिणी तदा।
८. रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है— ‘तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।’
| १३६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. पिण्ड + च्वि + √कृ + ल्यप् = पिण्डीकृत्य
२. प्रगल्भः कुलालः, प्रगल्भकुलालः (कर्मधारय) तेन तुल्यः
३. √भ्रम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भ्रमयति
४. वि + √धा + तिप् (लुट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विधास्यति
५. नि + √धा + ल्यप् = निधाय
६. चिन्ता एव चक्रम्, चिन्ता चक्रम् (कर्मधारय) तस्मिन् चिन्ताचके
७. प्र + √गल्भ् + अच् = प्रगल्भः
८. वि + √धा + कि = विधिः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
९. मनः + नो = मनो नो (हशि च से :- उ— ओ)
१०. नो यहाँ अव्यय पद निषेध अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यह न + उ दो अव्यय पदों से मिलकर बनता है। न + उ = नो (आद् गुणः सूत्र से गुण)
विरम विरमायासादस्माद् दुरध्यवसायतो,
विपदि महतां धैर्यध्वंसं यदिेक्षितुमीहसे।
अयि जड़विधे! कल्पापायेऽप्यपेतनिजक्रमाः,
कुलशिखरिणः क्षुद्रा नैते न वा जलराशयः॥१०४॥
अन्वय- अयि जड़विधे! यत् (त्वम्) विपदि महताम् धैर्यध्वंसम् ईक्षितुम् ईहसे, अस्मात् दुरध्यवसायतः आयासात्, विरम विरम। एते कल्पापाये अपि अपेतनिजक्रमाः क्षुद्राः कुलशिखरिणः न, न वा जलराशयः (सन्ति)।
अनुवाद- हे जड़बुद्धि विधाता ! जो (तुम) विपत्ति में महान् पुरुषों के धैर्य के विनाश को देखना चाहते हो, इस दुराग्रह रूप परिश्रम से रुक जाओ, रुक जाओ। ये (महापुरुष) कल्प के अन्त होने पर भी, नष्ट कर दिया है, अपनी मर्यादा को जिन्होंने ऐसे कुल पर्वत नहीं (हैं) और न ही क्षुद्र समुद्र (हैं)।
व्याख्या- विधाता अपनी अज्ञानतावश महापुरुषों के धैर्य की, कठोरतम आपत्तियों का आघात करता हुआ मानो परीक्षा लेता रहता है, जो किसी भी दृष्टि से उसका विवेकपूर्ण कार्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह सोचता है कि महान् पुरुषों का धैर्य विपत्तियों के सामने नष्ट हो जायेगा।
कवि विधाता को इस अविवेकपूर्ण कार्य से रोकते हुए कहता है कि ये महापुरुष कुल पर्वतों अथवा समुद्र के समान क्षुद्र प्रवृत्ति वाले नहीं हैं, क्योंकि उनका प्रलयकाल में धैर्य नष्ट हो जाता है, वे अपनी मर्यादाओं का परित्याग कर देते हैं, किन्तु इन महापुरुषों का धैर्य तो कल्प के अन्त में भी नष्ट नहीं होता है, अपितु पूर्ववत् बना रहता है।
नीतिशतकम् १३७
अतः हे दुर्बुद्धि विधाता! तुम महापुरुषों के धैर्य को नष्ट करने रूप अपने निरर्थक प्रयास से बस करो, अपने दुराग्रह का तुम परित्याग कर दो, क्योंकि इस कार्य में तुम्हें लेशमात्र भी सफलता प्राप्त होने की सम्भावना नहीं है। यह अविवेकपूर्ण कार्य तुम्हारी बुद्धि की अपंगता का ही परिचायक है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में विधाता के विवेकरहित कार्य के लिए उसे जड़बुद्धि कहा गया है।
२. महापुरुष विकट से विकट परिस्थिति में भी अपने धैर्य को नहीं खोते हैं।
३. उपमेय महापुरुषों को उपमान समुद्र और कुल पर्वतों से भी बढ़कर बताया गया है। अतः व्यतिरेक अलंकार, लक्षण—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
४. यहाँ भी हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।
५. प्रलयकाल में समुद्र अपनी मर्यादाओं को छोड़ देता है। कुल पर्वत भी टूट फूट कर अपने आकार और मर्यादा का त्याग कर देते हैं। अतः उनके लिए क्षुद्र पद का प्रयोग किया गया है।
६. नीतिशतकम् की कुछ प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है।
७. ‘आर्य’ सम्बोधन वाचक अव्यय पद।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √रम् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) विरम
२. दुष्टः अध्यवसायः यस्मिन् सः, तस्मात् = दुरध्यवसायातः
३. √ईक्ष् + तुमुन् = ईक्षितुम्
४. आ + √यस् + घञ् = आयासः, तस्मात् आयासात्
५. धैर्यस्य ध्वंसम् (षष्ठी तत्पुरुष) धैर्यध्वंसम्
६. कल्पस्य अपाये (षष्ठी तत्पुरुष) कल्पापाये
७. वा पद का प्रयोग ‘समुच्चय’ अर्थ में भी स्वीकार किया जा सकता है।
८. न + एते = नैते (वृद्धिरेचि) (अ + ए = ऐ)
दैवेन प्रभुणा स्वयं जगति यद्यस्य प्रमाणीकृतं,
तत्तस्योपनमेन्मनागपि महान्नैवाश्रयः कारणम्।
सर्वाशापरिपूरके जलधरे वर्षत्यपि प्रत्यहं,
सूक्ष्मा एव पतन्ति चातकमुखे द्वित्रा पयोबिन्दवः॥१०५॥
अन्वय- प्रभुणा दैवेन जगति स्वयम् यस्य यत् प्रमाणीकृतम्, तत् तस्य उपनमेत्, महान् आश्रयः मनाक् अपि कारणम् न एव (भवति)। सर्वाशापरिपूरके जलधरे प्रत्यहम् वर्षति अपि चातकमुखे सूक्ष्माः एव द्वित्राः पयोबिन्दवः पतन्ति।
१३८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- सामर्थ्यशाली विधाता के द्वारा संसार में स्वयं जिसका जो निश्चित कर दिया, वह (स्वयं ही) उसके पास आ जायेगा। महान् आश्रय (इसमें) थोड़ा भी कारण नहीं (होता है)। सभी दिशाओं में भरपूर बरसने वाले मेघ के प्रतिदिन बरसने पर भी चातक के मुँह में मुश्किल से दो तीन जल की बूँदे (ही) गिरती हैं।
व्याख्या- पूर्णतया समर्थ भाग्य के द्वारा ही संसार के प्रत्येक प्राणी के हिस्से का स्वयं निर्धारण कर दिया जाता है। भाग्य की प्रबलता के कारण यह हिस्सा उसके पास स्वतः ही आ जाता है अर्थात् उसके लिए उसे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है और इस विषय में ऐसा भी नहीं है कि प्रभावशाली व्यक्ति को यह अधिक प्राप्त हो जाएगा।
इस विषय में चातक और मेघ का उदाहरण द्रष्टव्य है। मेघ अपना जल सभी दिशाओं में पूरी सामर्थ्य के साथ रोजाना बरसाता है, किन्तु फिर भी चातक के मुँह में बड़ी मुश्किल से दो तीन बूँदें ही गिर पाती हैं। इसका प्रमुख कारण भाग्य ही है, जिसके कारण उसके हिस्से में बादल के रोजाना मूसलाधार बरसने पर भी दो तीन बूँदें ही निर्धारित होने के कारण, उससे अधिक प्राप्त नहीं हो पाती हैं।
विशेष- १. भाग्य की प्रबलता एवं सामर्थ्य का अत्यन्त सुन्दरतापूर्वक निदर्शन सहित प्रतिपादन किया गया है। २. इसी प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति 'यद् धात्रा निजभालपट्ट्¹......इत्यादि श्लोक में भी की गई है। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरबः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. सर्वाशा का अर्थ विद्वानों ने 'सभी लोगों की आशाओं को पूरा करने वाले', भी किया है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्रमाण + च्वि + √कृ + क्त = प्रमाणीकृतम्
२. उप + √नम् + तिप् (विधिलिंग लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपनमेत्
३. परि + √पूर् + ण्वुल् = परिपूरके (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
४. जल + √धृ + अच् = जलधरः, तस्मिन् जलधरे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
५. अहनि अहनि इति प्रत्यहम् (अव्ययीभाव)
६. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
७. पयसां बिन्दुः पयोबिन्दुः (षष्ठी तत्पुरुष) ते पयोबिन्दवः
८. √वृष् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वर्षति
९. वर्षति + अपि = वर्षत्यपि (इकोयणचि) (इ— य्)
१. द्रष्टव्य श्लोक संख्या- ४९
नीतिशतकम् १३९
पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः।
प्रायेण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः॥१०६॥
अन्वय- कन्दुकः कराघातैः पातितः अपि उत्पतति एव। साधुवृत्तानाम् विपत्तयः प्रायेण अस्थायिन्यः (भवन्ति)।
अनुवाद- गेंद हाथ के प्रहारों से गिराई गई भी ऊपर उठती ही है। अच्छे चरित्र वाले लोगों की आपत्तियाँ (भी) प्रायः अस्थायी (होती हैं)।
व्याख्या- जिस प्रकार गेंद पर हाथ से चोट करने पर पहले तो वह नीचे चली जाती है, किन्तु अगले ही क्षण वह उछलकर ऊपर उठ जाती है, ठीक उसी प्रकार श्रेष्ठ चरित्र वाले लोगों की आपत्तियाँ भी स्थायी नहीं होती अर्थात् सच्चरित्र वाले पर आपत्तियाँ दैववश आती तो हैं, किन्तु वे स्थायी नहीं होती हैं, सदा नहीं रहती, कुछ दिन बाद स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं।
विशेष-
१. सज्जनों की आपत्तियों को अस्थायी बताया है।
२. सज्जनों पर विपत्ति की तुलना, गेंद पर हाथ के प्रहार से नीचे जाने से की गई है।
३. प्रथम चरण तथा द्वितीय चरण का अर्थ व्यवस्थित करने के लिए उपमा की परिकल्पना करने के कारण निदर्शना अलंकार लक्षण— ‘अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमा परिकल्पकः। निदर्शना।।'
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयो ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
५. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √पत् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) पातितः
२. आ + √हन् + घञ् = आघातः
३. साधूनि वृत्तानि येषां तेषाम्, साधुवृत्तानाम्
४. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्ति (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विपत्तयः
५. न स्थायिन्यः, अस्थायिन्यः (नञ् समास)
६. √स्था + णिनि = स्थायिन् + ङीप् = स्थायिनी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) स्थायिन्यः
७. पतति + एव (यण् – इकोयणचि, इ— य्)
८. पातितः + अपि (अतो रोरप्लुतादप्लुते) (:— उ— ओ)
१४० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं,
गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम्।
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां,
विधिरहो बलवान् इति मे मतिः॥१०७॥
अन्वय- शशि-दिवाकरयोः ग्रहपीडनम्, गज-भुजङ्गमयोः बन्धनम् अपि, मतिमताम् च दरिद्रताम् विलोक्य, मे मतिः इति (अस्ति), अहो विधिः बलवान्।
अनुवाद- सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहों (राहू, केतु) द्वारा पीडित किए जाने को, हाथी और सांप के बन्धन को भी (देखकर) और बुद्धिमानों की दरिद्रता को देखकर मेरी बुद्धि तो यही है कि अहो ! भाग्य (ही) बलवान् (है)।
व्याख्या- जब हम सूर्य और चन्द्रमा जैसे विशाल आकार वाले तेजस्वी ग्रहों को राहू और केतु जैसे ग्रहों के द्वारा पीड़ित किया जाता हुआ देखते हैं। इसके अलावा जब हम हाथी जैसे शक्तिशाली एवं भयंकर सर्प जैसे विषैले और खतरनाक जीवों का बांधा जाना भी देखते हैं।
इसी प्रकार जब हम इस संसार में देखते हैं कि अत्यन्त बुद्धिमान् व्यक्ति भी दरिद्रता में अत्यन्त दयनीय जीवन जीने के लिए बाध्य है, तो उस स्थिति में हमारी बुद्धि केवल एक ही निश्चय पर पहुँचती है कि भाग्य वस्तुतः बलवान् होता है। कोई कितना भी प्रभावशाली, भयंकर, समर्थ अथवा योग्य क्यों न हो, दुर्भाग्य के वशीभूत होकर उनको भी कष्ट और आपत्तियों का सामना करना पड़ता है।
विशेष-
१. कवि ने सूर्य, चन्द्रमा, हाथी और सांप तथा विद्वान् का उदाहरण देते हुए भाग्य की प्रबलता का प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से किया है।
२. पुराणों के अनुसार सूर्य और चन्द्र का ग्रसन (ग्रहण) राहू और केतु नामक राक्षस ग्रहों के द्वारा किया जाता है, किन्तु वर्तमान वैज्ञानिक युग में यह बात निराधार सिद्ध हो गयी है।
३. अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के तेज, बल, पौरुष आदि सबकी निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
४. द्रुतविलम्बित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।
५. समुच्चय तथा अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. शशी च दिवाकरश्च शशिदिवाकरौ, तयोः शशिदिवाकरयोः (द्वन्द्व समास)
२. √पीड् + ल्युट् = पीडनम्। ग्रहाभ्याम् पीडनम् (तृतीया तत्पुरुष) ग्रहपीडनम्
३. गजश्च भुजङ्गश्च गजभुजङ्गौ, तयोः गजभुजङ्गमयोः (द्वन्द्व समास)
नीतिशतकम् १४१
४. √बन्ध् + ल्युट् = बन्धनम् ५. मति + मतुप् = मतिमत् (षष्ठी तत्पुरुष) मतिमताम् ६. दरिद्र + तल् = दरिद्रता, ताम् दरिद्रताम् ७. वि + √लोक् + ल्यप् = विलोक्य ८. √मन् + क्तिन् = मतिः ९. शशिदिवाकरयोः + ग्रहपीडनम् (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) १०. गजभुजङ्गमयोः + अपि (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) ११. विधिः + अहो (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः)
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं, नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं, यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥१०८॥
अन्वय- यदा करीरविटपे पत्रम् न एव (भवति), वसन्तस्य किम् दोषः ? उलूकः दिवा अपि यदि न अवलोकते, सूर्यस्य किम् दूषणम् ? (यदि) चातकमुखे धाराः न एव (पतन्ति), मेघस्य किम् दूषणम् ? विधिना यत् पूर्वम् ललाटलिखितम् तत् मार्जितुम् कः क्षमः ?
अनुवाद- यदि करील के वृक्ष पर पत्ता नहीं (होता है, तो) वसन्त का क्या दोष ? उल्लू दिन में भी यदि नहीं देखता (तो) सूर्य का क्या दोष ? (यदि) चातक के मुख में (जल की) धारा नहीं (गिरती है, तो) मेघ का क्या दोष ? विधाता के द्वारा जो पहले मस्तक पर लिख दिया (तो) उसे मिटाने में कौन समर्थ है ?
व्याख्या- भाग्य में लिखा हुआ कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है, इसी बात का प्रतिपादन कवि ने कुछ उदाहरण देकर किया है— सामान्य रूप में वसन्त ऋतु में सभी वनस्पतियों पर फूल और सुन्दर पत्ते आ जाते हैं, जिनसे उनकी शोभा में वृद्धि होती है, किन्तु इसके विपरीत करीर का वृक्ष इस सुन्दर ऋतु में भी पत्तों से रहित रहता है। इसमें वसन्त ऋतु का तो कोई दोष नहीं माना जायेगा। यह उसका दुर्भाग्य ही है, जिसे कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है।
इसी प्रकार सूर्य दिन भर संसार को आलोकित करता है, जिसमें सभी प्राणी इस सुन्दर संसार का अवलोकन करते हैं, किन्तु यदि उल्लू अपने भाग्य-दोष के कारण दिन में भी नहीं देख पाता है, तो इसमें सूर्य का तो कोई दोष मानना उचित नहीं है।
बादल धरती पर चारों ओर समान रूप से वर्षा करता है, किन्तु यदि उसके जल की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरती हैं तब यह तो चातक का ही दुर्भाग्य है, बादल को इस विषय में दोषी कहना लेशमात्र भी उचित नहीं है। विधाता ने ही इस प्रकार
१४२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
चातक का प्यासा रहना, उसके भाग्य में लिख दिया, अतः उसे मिटाना तो किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।
विशेष– १. विधि के विधान को बदलने में कोई भी समर्थ नहीं है। यदि भाग्य में नहीं है तो व्यक्ति को संसार में समृद्धि होने पर भी लेशमात्र भी मिलना सम्भव नहीं है।
२. करील वृक्ष की विशेषता है कि उस पर वसन्त ऋतु में भी पत्ते नहीं आते हैं।
३. चातक के विषय में प्रसिद्ध है कि वह वर्षा के जल की बूँद से ही अपनी प्यास शान्त करता है।
४. भाग्य की प्रबलता का सुन्दरता से प्रतिपादन किया है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
सूर्याश्वैर्म्सजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. करीरस्य विटपे (षष्ठी तत्पुरुष) करीरविटपे
२. अव + √लोक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवलोकते
३. √दूष् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दूषणम्
४. ललाटे लिखितम् (सप्तमी तत्पुरुष) ललाटलिखितम्
५. √मृज् + तुमुन् = मार्जितुम्
६. √क्षम् + अच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षमः
७. न + एव = नैव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
८. न + उलूकः + अपि + अवलोकते (आद् गुणः, अतो रोरप्लुतादप्लुते, इकोयणचि, अ + उ = ओ, :— उ— ओ, इ— य्)
९. √लिख्+ क्त = लिखितम्
१०. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
सूनुः सच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः,
स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निष्क्लेशलेशं मनः।
आकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं,
तुष्टे विष्टपहारिणीष्टदहरौ संप्राप्यते देहिना।।१०९।।
अन्वय– विष्टपहारिणी इष्टद हरौ तुष्टे, देहिना सच्चरितः सूनुः, सती प्रियतमा, प्रसादोन्मुखः स्वामी, स्निग्धम् मित्रम्, अवञ्चकः परिजनः, निष्क्लेशलेशम् मनः, रुचिरः आकारः, स्थिरः विभवः, विद्यावदातम् च मुखम् सम्प्राप्यते।
अनुवाद– संसार (के कष्टों) का हरण करने वाले, मनोवाञ्छित (वस्तु) प्रदान करने वाले भगवान् विष्णु के प्रसन्न होने पर देहधारी (मनुष्य) के द्वारा श्रेष्ठ आचरण