नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
१२८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
उसका अंग-अंग ढीला हो गया था अर्थात् उसमें तनिक भी शक्ति नहीं रही थी, अपने जीवन से भी वह पूरी तरह निराश हो चुका था अर्थात् उसे अपने जीवन की तनिक भी आशा नहीं रही थी।
किन्तु भाग्य की प्रबलता देखिए रात्रि में कोई चूहा उसकी पिटारी में छेद बनाकर स्वयं ही उसके ऊपर गिर पड़ा। तुरन्त सर्प ने उस चूहे को धर दबोचा और खा गया। उसके मांस को खाने से उसकी भूख शान्त हुई और उसके शरीर में बल का सञ्चार हुआ, जिससे वह उसी छेद से, जिससे चूहा अंदर आया था, निकलकर बाहर चला गया अर्थात् उसके प्राण जाते-जाते बच गए तथा वह स्वतन्त्र भी हो गया।
इस समस्त घटना का वर्णन करने का बाद कवि जनसामान्य को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे मनुष्यो ! इस सबको देखकर इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस संसार के सभी प्राणियों के जीवन-मरण, हानि-लाभ अदि सभी क्रियाओं के पीछे भाग्य की प्रबलता को ही स्वीकार करना पड़ता है।
विशेष— १. भाग्यवान् यहाँ असम्भव सम्भव सब कुछ प्राप्त करता है। भाग्यहीन को कुछ प्राप्त नहीं होता।
२. भाग्य का निर्माण पूर्वजन्म के कर्मों से होता है।
३. भाग्य की प्रबलता अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादित की गई है। मनुष्य की उन्नति और अवनति का कारण एकमात्र भाग्य ही है।
४. अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषार्थ की निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्य्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. भग्ना आशा यस्य तस्य (बहुव्रीहि) भग्नाशस्य
२. √भञ्ज् + क्त = भग्नः
३. करण्डेन पीडितः करण्डपीडितः, करण्डे पीडिता तनुः यस्य, तस्य
४. म्लानानि इन्द्रियाणि यस्य सः, तस्य (बहुव्रीहि) म्लानेन्द्रियस्य
५. √म्लै + क्त = म्लान। √भुज् +घञ् = भोग + इनि = भोगिन्
६. भोगः अस्ति अस्य इति, तस्य - भोगिनः (षष्ठी विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग)
७. नि + √पत् + क्त = निपतितः
८. √दृश् + थ (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन) पश्यत
९. √वृध् + क्तिन् = वृद्धिः (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) वृद्धौ
१०. √क्षि + अच् (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) क्षये
नीतिशतकम् १२९
११. कृत्वा + आखुः (अकः सवर्णे दीर्घः - आ + आ = आ)
१२. तेन + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
यथा कन्दुक पातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।
तथा त्वनार्यः पतति मृत्पिण्डपतनं यथा॥९८॥
अन्वय- यथा कन्दुक पातेन उत्पतति तथा आर्यः पतन् अपि (उत्पतति) तु यथा मृत्पिण्डपतनं (तथा) अनार्यः पतति।
अनुवाद- जिस प्रकार गेंद गिराने से ऊपर उठती है वैसे ही सज्जन (व्यक्ति) गिरते हुए भी ऊपर उठता है, किन्तु मिट्टी के ढेले पर गिरने के समान दुष्ट का पतन होता है।
व्याख्या- सज्जन व्यक्ति का पतन गेंद के गिराने के समान होता है, जिस प्रकार गेंद गिरकर भी पुनः उठती है वैसे ही सज्जन व्यक्ति की अवनति के बाद उन्नति सुनिश्चित है। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति का पतन मिट्टी के ढेले के समान शाश्वत होता है। वह एक बार पतित होने के बाद पुनः उन्नति को प्राप्त नहीं होता।
विशेष-
१. सज्जन व्यक्ति के पतन की तुलना गेंद के पतन से तथा दुष्ट व्यक्ति के पतन की मिट्टी के लोंधे के गिरने से की गई है।
२. दुष्ट व्यक्ति का पतन शाश्वत होता है, जबकि सज्जन व्यक्ति अवनति को प्राप्त करके भी उठता अवश्य है।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
४. दृष्टान्त अलंकार, लक्षण—
दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
५. नीतिशतकम् की सभी पाण्डुलिपियों में यह श्लोक नहीं है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. उत् + √पत् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उत्पतति
२. √पत् + शतृ = पतन्
३. न आर्यः इति (नञ् समास) = अनार्यः
४. मृतस्य पिण्डं मृतपिण्डं (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य पतनं = मृत्पिण्डपतनं
५. कन्दुकमिव पातः, कन्दुकपातः (कर्मधारय) तेन कन्दुकपातेन
६. पातेन + उत्पतति + आर्यः (आद् गुणः, इकोयणचि)
७. पतन् + अपि = पतन्नपि (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्)
१३० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापितो १ मस्तके,
वाञ्छन् २ देशमनातपं विधिवशात्ता ३ लस्य मूलं गतः।
तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः,
प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहित ४ स्तत्रैव यान्त्यापदः ॥९९॥
अन्वय- दिवसेश्वरस्य किरणैः मस्तके सन्तापितः खल्वाटः अनातपम् देशम् वाञ्छन् विधिवशात् तालस्य मूलम् गतः। तत्र अपि पतता महाफलेन अस्य शिरः सशब्दम् भग्नम् (जातम्) भाग्यरहितः यत्र गच्छति, तत्रैव प्रायः आपदः यान्ति।
अनुवाद- सूर्य की किरणों से मस्तक पर अत्यन्त तपा हुआ गंजा धूपरहित प्रदेश को चाहता हुआ, भाग्यवश ताड़ (वृक्ष) के नीचे गया। वहाँ भी गिरते हुए बहुत बड़े (ताड़ के) फल से इसका सिर आवाज के साथ विदीर्ण (हो गया)। भाग्यहीन जहाँ जाता है, वहीं प्रायः आपत्तियाँ जाती हैं।
व्याख्या- दुर्भाग्य, व्यक्ति का पीछा कहीं भी नहीं छोड़ता है इसी का प्रतिपादन कवि ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से उदाहरण देते हुए किया है। कोई गंजा व्यक्ति सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से अत्यन्त पीड़ित होकर छाया की तलाश में जब एक ताड़ के पेड़ के नीचे पहुँचा ही था कि पेड़ से एक बड़ा सा ताड़ का फल उसके गंजे सिर पर धड़ाम से गिरा और उसका सिर एक दर्दनाक आवाज के साथ फट गया तथा वह व्यक्ति वहीं ढेर हो गया।
इस प्रकार भाग्यहीन व्यक्ति जहाँ भी जाता है, आपत्तियाँ उसके पीछे वहाँ-वहाँ जाती हैं अर्थात् कहीं भी उसका पीछा नहीं छोड़ती हैं।
विशेष-
१. भाग्य की प्रबलता का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है।
२. अच्छा या बुरा जैसा भी व्यक्ति का भाग्य होता है, वह कहीं भी क्यों न चला जाए, उसे भोगना ही पड़ेगा।
३. भाग्य पर विश्वास न करने वाले इसे मात्र संयोग की ही संज्ञा देते हैं।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिवसस्य ईश्वरः दिवसेश्वरः (षष्ठी तत्पुरुष) तस्य दिवसेश्वरस्य
१. संतापिते
२. गच्छन्
३. द्रुतगतिः
४. दैवहतकस्तत्रैव
नीतिशतकम् १३१
२. सम् + √तप् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सन्तापितः ३. न अस्ति आतपं यस्मिन्, तम्, अनातपम् ४. √वाञ्छ् + शतृ = वाञ्छन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √पत् + शतृ (नपुं. तृतीया विभक्ति, एकवचन) पतता ६. शब्देन सहितम्, सशब्दम् (अव्ययीभाव) ७. आ + √पद् + क्विप् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) आपदः ८. √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) यान्ति ९. √भञ्ज् + क्त = भग्नम् १०. भाग्येन रहितः, भाग्यरहितः (तृतीया तत्पुरुष) ११. खल्वाटः + दिवस + ईश्वरस्य (हशि च, आद् गुणः) १२. तत्र + अपि + अस्य (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि) १३. तत्र + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ) १४. यान्ति + आपदः (इकोयणचि)
सृजति तावदशेषगुणाकरं,
पुरुषरत्नमलङ्करणं भुवः।
तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेद्,
अहह! कष्टमपण्डितता विधेः॥१००॥
अन्वय- चेत् अशेषगुणाकरम् भुवः अलङ्करणम् पुरुषरत्नम् (विधिः) सृजति तावत्, तदपि तत्क्षणभङ्गिकरोति, अहह, विधेः अपण्डितता कष्टम् (अस्ति)
अनुवाद- यद्यपि सभी गुणों की खान, पृथ्वी के आभूषण (स्वरूप) पुरुष रूपी रत्न को (विधाता) रचता तो है, (किन्तु) उसे भी तो क्षणभंगुर कर देता है, अहो, विधाता की मूर्खता (अत्यन्त) कष्टकर (है)।
व्याख्या- कवि को इस बात का अत्यन्त कष्ट है कि ब्रह्मा अनेक गुणों का निधान, पृथ्वी के आभूषण रूप पुरुष का पहले तो प्रयत्नपूर्वक निर्माण करता है, किन्तु निर्माण करने के बाद स्वयं ही उसे विनाशवान् भी बना देता है।
सामान्यतः होता यह है कि कोई भी व्यक्ति अपनी निर्मिति को तोड़ता नहीं है, क्योंकि उसका परिश्रम, उसकी भावना उस निर्मिति में निहित रहती है, किन्तु कवि की दृष्टि में यह ब्रह्मा की मूर्खता ही कही जायेगी कि वह स्वयं ही मानव रूप कृति का निर्माण अत्यन्त परिश्रम के साथ करता है और यह मानव भी कोई साधारण वस्तु नहीं है, अपितु इस सम्पूर्ण पृथ्वी का आभूषण स्वरूप, अनेक गुणों की खान, मानो रत्न स्वरूप ही है। फिर इतने उत्तम निर्माण को स्वयं ही वह विनाशवान् बना देता है; अतः
१३२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
उसकी इस प्रकार की प्रवृत्ति की किस प्रकार प्रशंसा की जा सकती है, इसे तो उसकी मूर्खता ही कहेंगे।
विशेष- १. "अहह" पद का प्रयोग यहाँ अत्यन्त दुःख की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। २. विधाता के अविवेकपूर्ण कार्य की आलोचना अत्यन्त कटु शब्दों में की गयी है। ३. 'पुरुषरत्नम्' में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है, पुरुष रूपी उपमेय में रत्न रूपी उपमान के अभेद का आरोप किया गया है। लक्षण— तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। ४. द्रुतविलम्बित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण— "द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।"
व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. न शेषः इति अशेषः (नञ् समास) १. √सृज् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) सृजति २. अशेषगुणानाम् आकरःतम् (षष्ठी तत्पुरुष) अशेषगुणानामाकरम् ३. पुरुषः रत्नम् इव (कर्मधारय) पुरुषरत्नम् ४. क्षणे भङ्गि (सप्तमी तत्पुरुष) क्षणभङ्गि ५. न पण्डितता इति (नञ् समास) अपण्डितता ६. पण्डा + इतच् = पण्डित + तल् + टाप् = पण्डितता ७. अलम् + √कृ + ल्युट् = अलंकरणम् ८. पुरुषेषु रत्नम् इति (सप्तमी तत्पुरुष) पुरुषरत्नम् ९. तत् + अपि (झलां जशोऽन्ते) तदपि। चेत् + अहह (झलां जशोऽन्ते) चेदहह
येनैवाम्बरखण्डेन संवीतो निशि चन्द्रमाः।
तेनैव च दिवा भानुरहो दौर्गत्यमेतयोः ॥१०१॥
अन्वय- येन अम्बरखण्डेन एव चन्द्रमाः निशि संवीतः, तेन एव च (अम्बरखण्डेन) भानुः दिवा (संवीतः), अहो! एतयोः दौर्गत्यम्।
अनुवाद- जिस वस्त्र के टुकड़े के द्वारा ही चन्द्रमा रात्रि में ढक दिया जाता है और उतने (वस्त्र के टुकड़े) से ही सूर्य दिन में (आवृत कर दिया जाता है) इन दोनों की दुर्गति आश्चर्यजनक है।
व्याख्या- सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाले तेजस्वी देवता सूर्य और चन्द्रमा भी क्रमशः दिन और रात में मात्र एक वस्त्र के टुकड़े के द्वारा ढक दिये जाते हैं। यह इन दोनों तेजस्वी एवं विशाल आकार वाले देवताओं की दुर्गति ही है, क्योंकि विशाल
नीतिशतकम् १३३
सामर्थ्य सम्पन्न होते हुए भी छोटे से वस्त्र के टुकड़े से ढका जाना अत्यन्त संकुचित दशा को प्राप्त होना है, जो स्वयं में आश्चर्यजनक एवं हीनता का द्योतक है।
विशेष- १. यहाँ अम्बर का अर्थ आकाश भी किया जा सकता है। तब अर्थ होगा 'छोटे से आकाश के टुकड़े से'।
२. वस्तुतः यहाँ अम्बोदखण्ड पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही को बादल का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है, यह दोनों तेजस्वी ग्रहों के लिए तिरस्कार का विषय है।
३. विधाता की सामर्थ्य सर्वोपरि है जिससे सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी बचने में समर्थ नहीं है।
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सम् + वि + √इण् (गतौ) + क्त = संवीतः २. अम्बरस्य खण्डेन, अम्बरखण्डेन (षष्ठी तत्पुरुष) ३. दुर् + गम् + क्त = दुर्गत + ष्यङ् = दौर्गत्यम् ४. येन + एव + अम्बरखण्डेन (वृद्धिरेचि, अकः सवर्णे दीर्घः) ६. तेन + एव = तेनैव (वृद्धिरेचि)
अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनां,
शतभिषगनुयातः शम्भुमूर्द्धोऽवतंसः।
विरहयति न चैनं राजयक्ष्मा शशांकं,
हतविधिपरिपाकः केन वा लंघनीयः॥१०२॥
अन्वय- अयम् अमृतनिधानम्, ओषधीनाम् नायकः, शतभिषक् अनुयातः, शम्भुमूर्ध्नो अवतंसः अपि (भवति), (तथापि) एनम् च शशाङ्कम् राजयक्ष्मा न विहरयति वा हतविधिपरिपाकः केन लग्नीयः।
अनुवाद- यह अमृत का भण्डार, औषधियों का नायक, सैकड़ों चिकित्सकों द्वारा अनुगमन किया गया, महादेव के सिर का आभूषण भी (बनता है), (फिर भी) इस चन्द्रमा को राजयक्ष्मा (रोग) नहीं छोड़ता है अथवा दुर्भाग्य का परिणाम किसके द्वारा उल्लंघन करने योग्य है।
व्याख्या- जब व्यक्ति का दुर्भाग्य उसका अनुकरण करता है, तब वह कितने भी अधिक साधनों से युक्त क्यों न हो, उसको कष्ट उठाना ही पड़ता है। अब चन्द्रमा का ही उदाहरण क्यों न ले लें। कहते हैं यह अमृत का भण्डार है, औषधियों को गुण प्रदान करने के कारण उन सबमें अग्रणी है तथा अनेकों चिकित्सक इसके महत्त्व को स्वीकार
१३४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
करते हैं अथवा आकाश मण्डल में शतभिषा (तारामंडल) से घिरा हुआ है। इतना ही नहीं देवों के देव, महादेव के सिर का आभूषण है।
फिर भी दुर्भाग्यवश इसे जो राजयक्ष्मा रोग लगा हुआ है, जिसके कारण इसका प्रतिदिन क्षरण होता है, वह दूर नहीं हो रहा है। इसलिए इस सब को देखकर तो यही कहा जाना उचित प्रतीत होता है कि व्यक्ति के हिस्से का जो दुर्भाग्य है वह तो किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को भोगना ही होगा, उससे बचना उसके लिए पूर्णतया असम्भव है।
विशेष- १. दुर्भाग्य के परिणाम से कोई भी व्यक्ति बचने में समर्थ नहीं होता भले ही वह साधन सम्पन्न ही क्यों न हो। २. शतभिषक पद में श्लेष अलंकार है, क्योंकि इसके दो अर्थ हैं- सैकड़ों चिकित्सक और शतभिषा नामक तारामण्डल। ३. कवि की कल्पना है कि चन्द्रमा के प्रतिदिन क्षरण का कारण उसका राजयक्ष्मा नामक रोग है, जिससे वह दुर्भाग्य के परिणाम के कारण ग्रसित है। ४. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है- ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः। ५. राजयक्ष्मा एक रोग जिसमें अंग गलने लगते हैं। इसे गलित कोढ़ भी कहते हैं।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √नी + ण्वुल् = नायकः २. अमृत + नि + √धा + ल्युट् = अमृतनिधानम् ३. न मृतः इति, अमृतः (नञ् समास) √मृ + क्त = मृतः ४. अनु + √इण् (गतौ) + क्त = अनुयातः ५. शशः अङ्के यस्य सः (बहुव्रीहि) शशाङ्कः, तम् शशाङ्कम् ६. वि + √रह् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विरहयति ७. √लङ्घ् + अनीयर् = लङ्घनीयः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ८. अव + √तंस् + घञ् = अवतंसः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. अमृतस्य निधानम् (षष्ठी तत्पुरुष) अमृतनिधानम्
प्रियसखे विपद्दण्डाघातप्रपातपरम्परा, परिचयबले१ चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः। मृदमिव बलात् पिण्डीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्, भ्रमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति॥१०३॥
१. परिचयचले
नीतिशतकम् १३५
अन्वय- प्रिय सखे! खलः विधिः प्रगल्भकुलालवत् (मम) मनः मृदम् इव बलात् पिण्डीकृत्य विपद्दण्डाघातप्रपातपरम्परापरिचय बले चिन्ता चक्रे निधाय भ्रमयति, अत्र किम् विधास्यति इति नो जानीमः।
अनुवाद- प्रिय मित्र! दुष्ट विधाता निपुण कुम्हार के समान हमारे मन को मिट्टी के समान, बलपूर्वक पिण्ड बनाकर विपत्ति रूपी डण्डे के प्रहारों से, अत्यन्त गिराने की परम्परा के परिचय रूपी बल वाले चिन्ता रूपी चक्र पर रखकर घूमा रहा है, यहाँ (वह) क्या बनायेगा, यह (हम) नहीं जानते हैं।
व्याख्या- हे मित्र! यह दुष्ट विधाता मेरे मन के साथ ठीक वैसा ही निर्दयतापूर्वक आचरण कर रहा है जैसा एक घड़ा बनाने में निपुण कुम्हार मिट्टी के साथ करता है, क्योंकि कुम्हार पहले मिट्टी को कठोरता के साथ उसका पिण्ड बना लेता है। उसके बाद वह उसे डण्डों के प्रहारों से अत्यन्त निर्दयतापूर्वक कूटता है और पुनः उस मिट्टी के लोंधे को बार-बार ऊपर उठा कर जमीन पर पटकता है। इस प्रकार उसे अनेकशः प्रपीडित करने के बाद ही चक्र पर चढ़ा कर घड़े आदि का निर्माण करता है।
इसी प्रकार यह विधाता भी मेरे मिट्टी के समान मन को बलपूर्वक दबाते हुए पिण्ड के रूप में बनाकर, विपत्ति रूपी डण्डों के प्रहारों से तथा अनेक असफलताओं रूपी गिराने की परम्परा के बल से, चिन्ता रूपी चक्र पर रखकर निरन्तर घूमा रहा है। यह मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि विधाता इस सब प्रक्रिया को पूर्ण करने के पश्चात् मेरे मन रूपी मिट्टी के द्वारा क्या बनाएगा। अर्थात् विधाता की मनः स्थिति को मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।
विशेष- १. विधाता की प्रत्येक क्रिया का फल परिणाम के द्वारा ही जाना जा सकता है, पहले नहीं।
२. विधाता की तुलना निपुण कुम्हार के साथ की गई है।
३. विधाता के लिए खल शब्द का प्रयोग उसे गाली देने के समान है।
४. यहाँ द्वितीय चरण के प्रारम्भ में परिचय बल के स्थान पर 'परिचय चले' भी पाठ उपलब्ध होता है। जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
५. जब मनुष्य पर विपरीत विधाता का कठोरतापूर्वक शक्तिपरीक्षण होता है, तो उसके मन की दशा कुम्हार की मिट्टी से भी बदतर होती है।
६. कठिन एवं विपरीत परिस्थिति में पड़े व्यक्ति की मनःस्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है।
७. हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसयुगहयैन्स्रौम्रौ स्लौ गो यदा हरिणी तदा।
८. रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है— ‘तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।’
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व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. पिण्ड + च्वि + √कृ + ल्यप् = पिण्डीकृत्य
२. प्रगल्भः कुलालः, प्रगल्भकुलालः (कर्मधारय) तेन तुल्यः
३. √भ्रम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भ्रमयति
४. वि + √धा + तिप् (लुट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विधास्यति
५. नि + √धा + ल्यप् = निधाय
६. चिन्ता एव चक्रम्, चिन्ता चक्रम् (कर्मधारय) तस्मिन् चिन्ताचके
७. प्र + √गल्भ् + अच् = प्रगल्भः
८. वि + √धा + कि = विधिः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
९. मनः + नो = मनो नो (हशि च से :- उ— ओ)
१०. नो यहाँ अव्यय पद निषेध अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यह न + उ दो अव्यय पदों से मिलकर बनता है। न + उ = नो (आद् गुणः सूत्र से गुण)
विरम विरमायासादस्माद् दुरध्यवसायतो,
विपदि महतां धैर्यध्वंसं यदिेक्षितुमीहसे।
अयि जड़विधे! कल्पापायेऽप्यपेतनिजक्रमाः,
कुलशिखरिणः क्षुद्रा नैते न वा जलराशयः॥१०४॥
अन्वय- अयि जड़विधे! यत् (त्वम्) विपदि महताम् धैर्यध्वंसम् ईक्षितुम् ईहसे, अस्मात् दुरध्यवसायतः आयासात्, विरम विरम। एते कल्पापाये अपि अपेतनिजक्रमाः क्षुद्राः कुलशिखरिणः न, न वा जलराशयः (सन्ति)।
अनुवाद- हे जड़बुद्धि विधाता ! जो (तुम) विपत्ति में महान् पुरुषों के धैर्य के विनाश को देखना चाहते हो, इस दुराग्रह रूप परिश्रम से रुक जाओ, रुक जाओ। ये (महापुरुष) कल्प के अन्त होने पर भी, नष्ट कर दिया है, अपनी मर्यादा को जिन्होंने ऐसे कुल पर्वत नहीं (हैं) और न ही क्षुद्र समुद्र (हैं)।
व्याख्या- विधाता अपनी अज्ञानतावश महापुरुषों के धैर्य की, कठोरतम आपत्तियों का आघात करता हुआ मानो परीक्षा लेता रहता है, जो किसी भी दृष्टि से उसका विवेकपूर्ण कार्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह सोचता है कि महान् पुरुषों का धैर्य विपत्तियों के सामने नष्ट हो जायेगा।
कवि विधाता को इस अविवेकपूर्ण कार्य से रोकते हुए कहता है कि ये महापुरुष कुल पर्वतों अथवा समुद्र के समान क्षुद्र प्रवृत्ति वाले नहीं हैं, क्योंकि उनका प्रलयकाल में धैर्य नष्ट हो जाता है, वे अपनी मर्यादाओं का परित्याग कर देते हैं, किन्तु इन महापुरुषों का धैर्य तो कल्प के अन्त में भी नष्ट नहीं होता है, अपितु पूर्ववत् बना रहता है।
नीतिशतकम् १३७
अतः हे दुर्बुद्धि विधाता! तुम महापुरुषों के धैर्य को नष्ट करने रूप अपने निरर्थक प्रयास से बस करो, अपने दुराग्रह का तुम परित्याग कर दो, क्योंकि इस कार्य में तुम्हें लेशमात्र भी सफलता प्राप्त होने की सम्भावना नहीं है। यह अविवेकपूर्ण कार्य तुम्हारी बुद्धि की अपंगता का ही परिचायक है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में विधाता के विवेकरहित कार्य के लिए उसे जड़बुद्धि कहा गया है।
२. महापुरुष विकट से विकट परिस्थिति में भी अपने धैर्य को नहीं खोते हैं।
३. उपमेय महापुरुषों को उपमान समुद्र और कुल पर्वतों से भी बढ़कर बताया गया है। अतः व्यतिरेक अलंकार, लक्षण—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
४. यहाँ भी हरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण पूर्ववत् है।
५. प्रलयकाल में समुद्र अपनी मर्यादाओं को छोड़ देता है। कुल पर्वत भी टूट फूट कर अपने आकार और मर्यादा का त्याग कर देते हैं। अतः उनके लिए क्षुद्र पद का प्रयोग किया गया है।
६. नीतिशतकम् की कुछ प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है।
७. ‘आर्य’ सम्बोधन वाचक अव्यय पद।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √रम् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) विरम
२. दुष्टः अध्यवसायः यस्मिन् सः, तस्मात् = दुरध्यवसायातः
३. √ईक्ष् + तुमुन् = ईक्षितुम्
४. आ + √यस् + घञ् = आयासः, तस्मात् आयासात्
५. धैर्यस्य ध्वंसम् (षष्ठी तत्पुरुष) धैर्यध्वंसम्
६. कल्पस्य अपाये (षष्ठी तत्पुरुष) कल्पापाये
७. वा पद का प्रयोग ‘समुच्चय’ अर्थ में भी स्वीकार किया जा सकता है।
८. न + एते = नैते (वृद्धिरेचि) (अ + ए = ऐ)
दैवेन प्रभुणा स्वयं जगति यद्यस्य प्रमाणीकृतं,
तत्तस्योपनमेन्मनागपि महान्नैवाश्रयः कारणम्।
सर्वाशापरिपूरके जलधरे वर्षत्यपि प्रत्यहं,
सूक्ष्मा एव पतन्ति चातकमुखे द्वित्रा पयोबिन्दवः॥१०५॥
अन्वय- प्रभुणा दैवेन जगति स्वयम् यस्य यत् प्रमाणीकृतम्, तत् तस्य उपनमेत्, महान् आश्रयः मनाक् अपि कारणम् न एव (भवति)। सर्वाशापरिपूरके जलधरे प्रत्यहम् वर्षति अपि चातकमुखे सूक्ष्माः एव द्वित्राः पयोबिन्दवः पतन्ति।
१३८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- सामर्थ्यशाली विधाता के द्वारा संसार में स्वयं जिसका जो निश्चित कर दिया, वह (स्वयं ही) उसके पास आ जायेगा। महान् आश्रय (इसमें) थोड़ा भी कारण नहीं (होता है)। सभी दिशाओं में भरपूर बरसने वाले मेघ के प्रतिदिन बरसने पर भी चातक के मुँह में मुश्किल से दो तीन जल की बूँदे (ही) गिरती हैं।
व्याख्या- पूर्णतया समर्थ भाग्य के द्वारा ही संसार के प्रत्येक प्राणी के हिस्से का स्वयं निर्धारण कर दिया जाता है। भाग्य की प्रबलता के कारण यह हिस्सा उसके पास स्वतः ही आ जाता है अर्थात् उसके लिए उसे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है और इस विषय में ऐसा भी नहीं है कि प्रभावशाली व्यक्ति को यह अधिक प्राप्त हो जाएगा।
इस विषय में चातक और मेघ का उदाहरण द्रष्टव्य है। मेघ अपना जल सभी दिशाओं में पूरी सामर्थ्य के साथ रोजाना बरसाता है, किन्तु फिर भी चातक के मुँह में बड़ी मुश्किल से दो तीन बूँदें ही गिर पाती हैं। इसका प्रमुख कारण भाग्य ही है, जिसके कारण उसके हिस्से में बादल के रोजाना मूसलाधार बरसने पर भी दो तीन बूँदें ही निर्धारित होने के कारण, उससे अधिक प्राप्त नहीं हो पाती हैं।
विशेष- १. भाग्य की प्रबलता एवं सामर्थ्य का अत्यन्त सुन्दरतापूर्वक निदर्शन सहित प्रतिपादन किया गया है। २. इसी प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति 'यद् धात्रा निजभालपट्ट्¹......इत्यादि श्लोक में भी की गई है। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरबः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. सर्वाशा का अर्थ विद्वानों ने 'सभी लोगों की आशाओं को पूरा करने वाले', भी किया है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्रमाण + च्वि + √कृ + क्त = प्रमाणीकृतम्
२. उप + √नम् + तिप् (विधिलिंग लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपनमेत्
३. परि + √पूर् + ण्वुल् = परिपूरके (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
४. जल + √धृ + अच् = जलधरः, तस्मिन् जलधरे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
५. अहनि अहनि इति प्रत्यहम् (अव्ययीभाव)
६. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
७. पयसां बिन्दुः पयोबिन्दुः (षष्ठी तत्पुरुष) ते पयोबिन्दवः
८. √वृष् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वर्षति
९. वर्षति + अपि = वर्षत्यपि (इकोयणचि) (इ— य्)
१. द्रष्टव्य श्लोक संख्या- ४९
नीतिशतकम् १३९
पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः।
प्रायेण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः॥१०६॥
अन्वय- कन्दुकः कराघातैः पातितः अपि उत्पतति एव। साधुवृत्तानाम् विपत्तयः प्रायेण अस्थायिन्यः (भवन्ति)।
अनुवाद- गेंद हाथ के प्रहारों से गिराई गई भी ऊपर उठती ही है। अच्छे चरित्र वाले लोगों की आपत्तियाँ (भी) प्रायः अस्थायी (होती हैं)।
व्याख्या- जिस प्रकार गेंद पर हाथ से चोट करने पर पहले तो वह नीचे चली जाती है, किन्तु अगले ही क्षण वह उछलकर ऊपर उठ जाती है, ठीक उसी प्रकार श्रेष्ठ चरित्र वाले लोगों की आपत्तियाँ भी स्थायी नहीं होती अर्थात् सच्चरित्र वाले पर आपत्तियाँ दैववश आती तो हैं, किन्तु वे स्थायी नहीं होती हैं, सदा नहीं रहती, कुछ दिन बाद स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं।
विशेष-
१. सज्जनों की आपत्तियों को अस्थायी बताया है।
२. सज्जनों पर विपत्ति की तुलना, गेंद पर हाथ के प्रहार से नीचे जाने से की गई है।
३. प्रथम चरण तथा द्वितीय चरण का अर्थ व्यवस्थित करने के लिए उपमा की परिकल्पना करने के कारण निदर्शना अलंकार लक्षण— ‘अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमा परिकल्पकः। निदर्शना।।'
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयो ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
५. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √पत् + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) पातितः
२. आ + √हन् + घञ् = आघातः
३. साधूनि वृत्तानि येषां तेषाम्, साधुवृत्तानाम्
४. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्ति (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विपत्तयः
५. न स्थायिन्यः, अस्थायिन्यः (नञ् समास)
६. √स्था + णिनि = स्थायिन् + ङीप् = स्थायिनी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) स्थायिन्यः
७. पतति + एव (यण् – इकोयणचि, इ— य्)
८. पातितः + अपि (अतो रोरप्लुतादप्लुते) (:— उ— ओ)
१४० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं,
गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम्।
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां,
विधिरहो बलवान् इति मे मतिः॥१०७॥
अन्वय- शशि-दिवाकरयोः ग्रहपीडनम्, गज-भुजङ्गमयोः बन्धनम् अपि, मतिमताम् च दरिद्रताम् विलोक्य, मे मतिः इति (अस्ति), अहो विधिः बलवान्।
अनुवाद- सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहों (राहू, केतु) द्वारा पीडित किए जाने को, हाथी और सांप के बन्धन को भी (देखकर) और बुद्धिमानों की दरिद्रता को देखकर मेरी बुद्धि तो यही है कि अहो ! भाग्य (ही) बलवान् (है)।
व्याख्या- जब हम सूर्य और चन्द्रमा जैसे विशाल आकार वाले तेजस्वी ग्रहों को राहू और केतु जैसे ग्रहों के द्वारा पीड़ित किया जाता हुआ देखते हैं। इसके अलावा जब हम हाथी जैसे शक्तिशाली एवं भयंकर सर्प जैसे विषैले और खतरनाक जीवों का बांधा जाना भी देखते हैं।
इसी प्रकार जब हम इस संसार में देखते हैं कि अत्यन्त बुद्धिमान् व्यक्ति भी दरिद्रता में अत्यन्त दयनीय जीवन जीने के लिए बाध्य है, तो उस स्थिति में हमारी बुद्धि केवल एक ही निश्चय पर पहुँचती है कि भाग्य वस्तुतः बलवान् होता है। कोई कितना भी प्रभावशाली, भयंकर, समर्थ अथवा योग्य क्यों न हो, दुर्भाग्य के वशीभूत होकर उनको भी कष्ट और आपत्तियों का सामना करना पड़ता है।
विशेष-
१. कवि ने सूर्य, चन्द्रमा, हाथी और सांप तथा विद्वान् का उदाहरण देते हुए भाग्य की प्रबलता का प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से किया है।
२. पुराणों के अनुसार सूर्य और चन्द्र का ग्रसन (ग्रहण) राहू और केतु नामक राक्षस ग्रहों के द्वारा किया जाता है, किन्तु वर्तमान वैज्ञानिक युग में यह बात निराधार सिद्ध हो गयी है।
३. अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के तेज, बल, पौरुष आदि सबकी निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
४. द्रुतविलम्बित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।
५. समुच्चय तथा अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. शशी च दिवाकरश्च शशिदिवाकरौ, तयोः शशिदिवाकरयोः (द्वन्द्व समास)
२. √पीड् + ल्युट् = पीडनम्। ग्रहाभ्याम् पीडनम् (तृतीया तत्पुरुष) ग्रहपीडनम्
३. गजश्च भुजङ्गश्च गजभुजङ्गौ, तयोः गजभुजङ्गमयोः (द्वन्द्व समास)
नीतिशतकम् १४१
४. √बन्ध् + ल्युट् = बन्धनम् ५. मति + मतुप् = मतिमत् (षष्ठी तत्पुरुष) मतिमताम् ६. दरिद्र + तल् = दरिद्रता, ताम् दरिद्रताम् ७. वि + √लोक् + ल्यप् = विलोक्य ८. √मन् + क्तिन् = मतिः ९. शशिदिवाकरयोः + ग्रहपीडनम् (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) १०. गजभुजङ्गमयोः + अपि (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) ११. विधिः + अहो (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः)
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं, नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं, यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥१०८॥
अन्वय- यदा करीरविटपे पत्रम् न एव (भवति), वसन्तस्य किम् दोषः ? उलूकः दिवा अपि यदि न अवलोकते, सूर्यस्य किम् दूषणम् ? (यदि) चातकमुखे धाराः न एव (पतन्ति), मेघस्य किम् दूषणम् ? विधिना यत् पूर्वम् ललाटलिखितम् तत् मार्जितुम् कः क्षमः ?
अनुवाद- यदि करील के वृक्ष पर पत्ता नहीं (होता है, तो) वसन्त का क्या दोष ? उल्लू दिन में भी यदि नहीं देखता (तो) सूर्य का क्या दोष ? (यदि) चातक के मुख में (जल की) धारा नहीं (गिरती है, तो) मेघ का क्या दोष ? विधाता के द्वारा जो पहले मस्तक पर लिख दिया (तो) उसे मिटाने में कौन समर्थ है ?
व्याख्या- भाग्य में लिखा हुआ कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है, इसी बात का प्रतिपादन कवि ने कुछ उदाहरण देकर किया है— सामान्य रूप में वसन्त ऋतु में सभी वनस्पतियों पर फूल और सुन्दर पत्ते आ जाते हैं, जिनसे उनकी शोभा में वृद्धि होती है, किन्तु इसके विपरीत करीर का वृक्ष इस सुन्दर ऋतु में भी पत्तों से रहित रहता है। इसमें वसन्त ऋतु का तो कोई दोष नहीं माना जायेगा। यह उसका दुर्भाग्य ही है, जिसे कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है।
इसी प्रकार सूर्य दिन भर संसार को आलोकित करता है, जिसमें सभी प्राणी इस सुन्दर संसार का अवलोकन करते हैं, किन्तु यदि उल्लू अपने भाग्य-दोष के कारण दिन में भी नहीं देख पाता है, तो इसमें सूर्य का तो कोई दोष मानना उचित नहीं है।
बादल धरती पर चारों ओर समान रूप से वर्षा करता है, किन्तु यदि उसके जल की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरती हैं तब यह तो चातक का ही दुर्भाग्य है, बादल को इस विषय में दोषी कहना लेशमात्र भी उचित नहीं है। विधाता ने ही इस प्रकार
१४२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
चातक का प्यासा रहना, उसके भाग्य में लिख दिया, अतः उसे मिटाना तो किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।
विशेष– १. विधि के विधान को बदलने में कोई भी समर्थ नहीं है। यदि भाग्य में नहीं है तो व्यक्ति को संसार में समृद्धि होने पर भी लेशमात्र भी मिलना सम्भव नहीं है।
२. करील वृक्ष की विशेषता है कि उस पर वसन्त ऋतु में भी पत्ते नहीं आते हैं।
३. चातक के विषय में प्रसिद्ध है कि वह वर्षा के जल की बूँद से ही अपनी प्यास शान्त करता है।
४. भाग्य की प्रबलता का सुन्दरता से प्रतिपादन किया है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
सूर्याश्वैर्म्सजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. करीरस्य विटपे (षष्ठी तत्पुरुष) करीरविटपे
२. अव + √लोक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवलोकते
३. √दूष् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दूषणम्
४. ललाटे लिखितम् (सप्तमी तत्पुरुष) ललाटलिखितम्
५. √मृज् + तुमुन् = मार्जितुम्
६. √क्षम् + अच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षमः
७. न + एव = नैव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
८. न + उलूकः + अपि + अवलोकते (आद् गुणः, अतो रोरप्लुतादप्लुते, इकोयणचि, अ + उ = ओ, :— उ— ओ, इ— य्)
९. √लिख्+ क्त = लिखितम्
१०. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
सूनुः सच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः,
स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निष्क्लेशलेशं मनः।
आकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं,
तुष्टे विष्टपहारिणीष्टदहरौ संप्राप्यते देहिना।।१०९।।
अन्वय– विष्टपहारिणी इष्टद हरौ तुष्टे, देहिना सच्चरितः सूनुः, सती प्रियतमा, प्रसादोन्मुखः स्वामी, स्निग्धम् मित्रम्, अवञ्चकः परिजनः, निष्क्लेशलेशम् मनः, रुचिरः आकारः, स्थिरः विभवः, विद्यावदातम् च मुखम् सम्प्राप्यते।
अनुवाद– संसार (के कष्टों) का हरण करने वाले, मनोवाञ्छित (वस्तु) प्रदान करने वाले भगवान् विष्णु के प्रसन्न होने पर देहधारी (मनुष्य) के द्वारा श्रेष्ठ आचरण
नीतिशतकम् १४३
वाला पुत्र, सती साध्वी पत्नी, कृपालु स्वामी, स्नेही मित्र, कपटरहित सेवक, क्लेश के अंश मात्र से शून्य मन, सुन्दर आकार, स्थिर ऐश्वर्य और विद्या से पवित्र मुख प्राप्त किया जाता है।
व्याख्या- परम कृपालु भगवान् विष्णु, जो संसार के सभी प्रकार के कष्टों का हरण करने में सक्षम हैं तथा मनोवाञ्छित वस्तु को प्रदान करने वाले हैं, के पूर्ण प्रसन्न होने पर इस संसार में व्यक्ति को उत्तम आचरण वाला पुत्र, एकमात्र पति के प्रति ही अनुरक्त रहने वाली, प्रिय लगने वाली पत्नी, ऐसा स्वामी जो कठोरतापूर्वक आचरण नहीं करता हो, अपितु दयाभाव से युक्त हो, अत्यन्त प्रेम करने वाले मित्र तथा निश्छल एवं समर्पित भाव से सेवा करने वाले सेवक तथा कपटरहित बन्धु लोग, पूर्णतया प्रसन्न रहने वाला मन, अत्यन्त मनोहर आकृति और कभी भी समाप्त न होने वाला ऐश्वर्य, धन-धान्य एवं विद्या से पवित्र मुख प्राप्त किया जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस संसार में ऊपर गिनाई गई वस्तुओं एवं विशेषताओं की प्राप्ति मनुष्य को सहज ही नहीं होती है और जिन्हें होती है, वे या तो अत्यन्त पुण्यवान् होते हैं या फिर अत्यन्त कृपालु भगवान् विष्णु ही यदि उनपर प्रसन्न हो जाएँ। दोनों ही स्थितियों में उपरोक्त का प्राप्त होना सौभाग्य का सूचक है।
विशेष- १. उपर्युक्त सभी बातें व्यक्ति को यदि प्राप्त हो सकें तो निश्चय ही वह सर्वाधिक भाग्यशाली होगा और वह सौभाग्य भगवान् विष्णु की कृपा से ही सम्भव है।
२. प्रस्तुत श्लोक से ऐसा प्रतीत होता है कि महाकवि भर्तृहरि वैष्णव मतावलम्बी थे।
३. श्लोक में प्रयुक्त परिजन का अर्थ सम्बन्धी भी किया जा सकता है।
४. कुछ विद्वानों के मत में यह श्लोक प्रक्षिप्त है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥
६. श्लोक में प्रयुक्त 'हारिणी' पद का अर्थ 'रञ्जयति' भी किया जा सकता है, तब अर्थ होगा संसार को प्रसन्न करने वाले, किन्तु यह अर्थ उतना प्रभावशाली प्रतीत नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √तुष् + क्त = तुष्टे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
२. देह + इनि = देहिन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन) देहिना
३. प्रिय + तमप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रियतमा
४. प्रसाद + उन्मुखः = प्रसादोन्मुखः (गुण, आद् गुणः) प्रसादाय उन्मुखः (चतुर्थी तत्पुरुष)
१४४ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
५. √स्निह् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) स्निग्धम्
६. न वञ्चकः, अवञ्चकः (नञ् तत्पुरुष) √वञ्च् + ण्वुल् = वञ्चक
७. क्लेशस्य लेशः, क्लेशलेशः, निर्गतः क्लेशः यस्मात् तत् निष्क्लेशलेशम् (अव्ययीभाव समास)
८. विद्यया अवदातम् (तृतीया तत्पुरुष) विद्यावदातम्
९. अव + √दै + क्त = अवदातम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०. विष्टपं हर्तुम् शीलम् यस्य सः, विष्टपहारी (बहुव्रीहि) विष्टप् + √हृ + णिनि = विष्टपहारिन्
११. इष्ट + √दा + क = इष्टद
१२. आ + √कृ + घञ् = आकारः
कर्म-पद्धतिः
नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगाः,
विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः।
फलं कर्मायत्तं किममरगणैः किञ्च विधिना,
नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न तेभ्यः प्रभवति॥९०॥
अन्वय- (वयम्) देवान् नमस्यामः, ननु ते अपि हतविधेः वशगाः, विधिः वन्द्यः, सः अपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः, फलम् कर्मायत्तम्, अमरगणैः किम्? किम् च विधिना? तत् कर्मभ्यः नमः येभ्यः विधिः अपि न प्रभवति।
अनुवाद- (हम) देवताओं को नमस्कार करते हैं, किन्तु वे भी दुष्ट विधाता के वश में हैं। (तो फिर) विधाता ही वन्दना के योग्य है, वह भी केवल निश्चित कर्म के अनुसार (ही) फल देने वाला है (इस प्रकार यदि) फल (मात्र) कर्म के अधीन हैं (तो) देवताओं से क्या ? और विधाता से क्या ? उन कर्मों को (ही) नमस्कार है, जिन पर विधाता का भी प्रभाव नहीं होता है।
व्याख्या- कवि सर्वप्रथम देवताओं को शक्तिशाली एवं सर्वोपरि मानते हुए उनके प्रति नमन करता है, किन्तु तभी उसे विचार आता है कि देवता भी सर्वोपरि नहीं हैं, वे भी भाग्य के अधीन हैं, क्योंकि उनके आदेश की पालना में ही वे अनेक कार्य करने को बाध्य हैं। तब कवि विधाता को सर्वोपरि समझते हुए उसे नमन करने का विचार बनाता है, तभी उसे ध्यान आता है कि यह विधाता भी पूर्णतया स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, अपितु यह जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्रदान, करता है, कर्म फल में उसकी इच्छा लेशमात्र भी प्रभावी नहीं होती।
पुनः कवि विचार करता है— जब फल प्राप्ति पूर्णतया कर्म के अनुसार ही होती है अर्थात् व्यक्ति यदि अच्छे कर्म करेगा तो अच्छा फल मिलेगा और यदि पाप कर्म करेगा
नीतिशतकम् १४५
तो निश्चय ही उसे बुरे फल की प्राप्ति होगी। तो फिर कवि कहता है कि तब हमें देवताओं की वन्दना से क्या लाभ ? अर्थात् हम उनकी वन्दना नहीं करेंगे। इसी प्रकार उस विधाता के प्रति भी नमन से कोई लाभ नहीं है।
हम तो एक मात्र कर्म की ही पूजा करते हैं, जिनको करने पर विधाता भी फल देने के लिए बाध्य होगा।
विशेष- १. कर्म की ही सर्वोपरि महत्ता का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन किया गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'हत' पद विधाता के प्रति उपेक्षा प्रकट करते हुए गाली के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
३. प्रकृति में पूर्णतया कर्मफल का सिद्धान्त ही लागू होता है।
४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसैःरुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी॥
५. 'नमस्यामः' पद यहाँ वर्तमानकालिक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए नाम धातु पद से बनकर प्रयुक्त हुआ है।
६. 'ननु' अव्यय का प्रयोग 'किन्तु' अर्थ की अभिव्यक्ति में हुआ है।
७. नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च सूत्र से नमः के योग में 'तेभ्यः कर्मभ्यः' में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. नमस् (नाम धातु) + क्यच् (लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) नमस्यामः
२. हतः विधिः हतविधिः तस्य (कर्मधारय) हतविधेः
३. वशम् गच्छन्ति इति वशगाः
४. √वन्द् + ण्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वन्द्यः
५. नियतम् नियतम् प्रति प्रतिनियतम् (अव्ययीभाव)
६. फल + √दा + क = फलदः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
७. आ + √यत् + क्त = आयत्तम्
८. अमराणाम् गणः, अमरगणः तैः अमरगणैः (षष्ठी तत्पुरुष)
९. प्र + √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रभवति
१०. कर्मणाम् आयत्तम् = कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
११. नमस्यामः + देवान् (हशि च - :- उ— ओ— आद् गुणः से)
१२. हतविधेः + ते + अपि (विसर्जनीयस्य सः, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
१३. विधिः + वन्द्यः (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) (:- र्)
१४. कर्म + एक = कर्मैकं (वृद्धिरेचि, अ + ए = ऐ)
१५. कर्म + आयत्तम् (अकः सवर्णे दीर्घः— अ + आ = आ)
१४६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे,
विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटको भिक्षाटनं कारितः^१,
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥१११॥
अन्वय- येन (कर्मणा) ब्रह्मा (अपि) कुलालवत् ब्रह्माण्ड भाण्डोदरे नियमितः, येन विष्णुः (अपि) दशावतार- गहने महासंकटे क्षिप्तः, येन कपालपाणिपुटकः रुद्रः (अपि) भिक्षाटनम् कारितः, (येन) सूर्यः गगने नित्यम् एव भ्राम्यति, तस्मै कर्मणे नमः।
अनुवाद- जिस (कर्म) के द्वारा ब्रह्मा (भी) कुम्हार के समान, ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के अन्दर नियन्त्रित कर दिया गया, जिसके द्वारा विष्णु (भी) दस अवतार रूपी गम्भीर (और) महान् संकट में डाल दिया गया। जिसके द्वारा कपाल रूपी दोने को हाथ में लिए हुए शिव से (भी) भिक्षावृत्ति करा दी गई। (जिसके द्वारा) सूर्य (भी) आकाश में नित्य ही घूमाया जा रहा है, उस कर्म को नमस्कार है।
व्याख्या- कर्म के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं, इसका प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में करते हुए कवि कहता है कि— कर्म की सामर्थ्य के कारण ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण करने वाला ब्रह्मा भी ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के भीतर बन्द होकर, कुम्हार जिस प्रकार बर्तन बनाने में लगा रहता है, ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि का निर्माण करने में दिन-रात बिना विश्राम किए लगा हुआ है।
इसी प्रकार यह कर्म का ही प्रभाव है कि उसने सामर्थ्यशाली संसार का पालन करने वाले भगवान् विष्णु को भी एक दो नहीं, अपितु पूरे दस-दस अवतार लेने के लिए बाध्य कर दिया तथा उनमें उन्हें अनेकों कष्टों का भी सामना करना पड़ा।
इतना ही नहीं उसी शक्तिशाली एवं प्रभावशाली कर्म ने सम्पूर्ण संसार का विनाश करने वाले, भयंकर प्रलयकारी देवता भगवान् रुद्र को भी मृत मनुष्य की खोपड़ी का भिक्षा पात्र हाथ में लेकर भिक्षावृत्ति के लिए बाध्य कर दिया।
इतना ही नहीं सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाला, तेजस्वी सूर्य भी जिसके आदेश एवं प्रभाव के कारण आकाश में एक दो दिन से नहीं, अपितु अनन्त काल से चक्कर लगाने के लिए बाध्य है। ऐसे प्रभावशाली उस कर्म को प्रणाम हैं अर्थात् अन्त में कवि कर्म की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार कर नमन करता है।
विशेष- १. ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता भी कर्म के द्वारा नियन्त्रित हैं। अतः कर्म की सर्वोच्चसत्ता स्वतः सिद्ध है।
१. कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं सेवते।
नीतिशतकम् १४७
२. ब्रह्मा को निर्माण का, विष्णु को पालन का तथा शिव को विनाश का देवता माना जाता है।
३. पुराणों के अनुसार, भगवान् विष्णु ही संसार को कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए अनेक अवतार ग्रहण करते हैं।
४. 'नमः' पद को योग में 'कर्मणे' में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है— सूत्र नमः स्वस्तिस्वाहा स्वधाऽलं वषट्योगाच्च।
५. शिव की विशेषता है कि वे मनुष्य की खोपड़ी रूपी पात्र को ही सदा अपने पास रखते हैं तथा सर्वसामर्थ्यशाली होते हुए भी भिक्षाटन करके अपनी जीविका चलाते हैं।
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
७. ब्रह्मा की उपमा कुम्हार से दी गई है, अतः उपमालंकार, लक्षण—
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
८. ब्रह्माण्ड रूपी पात्र में रूपक अलंकार, लक्षण—
तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कुलाल + मतुप् = कुलालवत्, कुलालेन तुल्यः, इति
२. √क्षिप् + क्त = क्षिप्तः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. महति सङ्कटे, महासंकटे (सप्तमी तत्पुरुष)। √कृ + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कारितः √भ्रम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भ्राम्यति। कपालं पाणिपुटके यस्य सः, कपालपाणिपुटकः (बहुव्रीहिं) दश अवताराः दशावताराः, तैः गहनम्, दशावतारगहनं, तस्मिन् दशावतारगहने अव + √तृ + घञ् = अवतारः पाणि एव पुटकम्, तस्मिन् (कर्मधारय) √भिक्ष् + अट् + ल्युट् = भिक्षाटनम् नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितः।
या साधूंश्च खलान् करोति, विदुषो मूर्खान् हितान् द्वेषिनः,
प्रत्यक्षं कुरुते परोक्षममृतं हलाहलं तत्क्षणात्।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं,
हे साधो! व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः॥११२॥
अन्वय- हे साधो! या खलान् साधून् करोति, मूर्खान् च विदुषः, द्वेषिणः हितान्, परोक्षम् प्रत्यक्षम् कुरुते, हलाहलम् तत् क्षणात् अमृतम् कुरुते, वाञ्छितम् फलम् भोक्तुम् ताम् भगवतीम् सत्क्रियाम् आराधय। व्यसनैः विपुलेषु गुणेषु वृथा आस्थाम् मा कृथाः।