भारतकोश
संग्रह पर लौटें

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० कर्मवशान्निष्पन्ने शरीरे चेष्टेन्द्रियार्थाश्रये निमित्तभावादवश्यम्भावी बुद्धीना- मुत्पादः, न च प्रबलोऽपि सन् बाह्योऽर्थ आत्मनो बुद्धयुत्पादे समर्थो भवति, तस्येन्द्रियेण संयोगाद् बुद्धयुत्पादे सामर्थ्यं दृष्टमिति ॥ ४४ ॥ तदभावश्चापवर्गे ॥ ४५ ॥ तस्य बुद्धिनिमित्ताश्रयस्य शरीरेन्द्रियस्य धर्माधर्मभावादभावोऽपवर्गे । तत्र यदुक्तम्-‘अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः’ इति तदयुक्तम् । तस्मात्सर्वदुःखविमोक्षोऽपवर्गः । यस्मात् सर्वदुःखबीजं सर्वदुःखायतनं चापवर्गे विच्छिद्यते, तस्मात् सर्वेण दुःखेन विमुक्तिरपवर्गः; न निर्बीजं निरायतनं च दुःखमुत्पद्यत इति ॥ ४५ ॥ तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः ॥ ४६ ॥ तस्यापवर्गस्याधिगमाय यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारः । यमः१ समानमाश्र- मिणां धर्मसाधनम्, २नियमस्तु विशिष्टम् । आत्मसंस्कारः पुनरधर्महानं धर्मो- आत्मा के प्राक्तन कर्मवश जब यह शरीर निष्पन्न होता है, तब वह चेष्टा, इन्द्रिय, तथा विषयों का आश्रय होता है । इस प्रकार उस बुद्धि का निमित्त होने से इस शरीर में भी वैषयिक बुद्धि का उत्पाद अवश्यम्भावी है, परन्तु मोक्षावस्था में ( इन्द्रिय से दूर होने के कारण ) प्रबल बाह्य विषय भी आत्मा में बुद्धयुत्पाद नहीं कर सकता; क्योंकि इन्द्रियों के संयोग से ही उस वैषयिकबुद्धि की उत्पत्तिशक्ति देखी जाती है ॥ ४४ ॥ तथा उस बुद्धिकारण शरीर का अपवर्गदशा में अभाव है ॥ ४५ ॥ बुद्धिनिमित्त के आश्रय शरीरेन्द्रियोत्पत्ति के कारण धर्माधर्म हैं, पर अपवर्ग में धर्माधर्म क्षीण हो जाते हैं । अतः वहाँ कारण ( धर्माधर्मादि ) के अभाव में तत्कार्य ( शरीरेन्द्रियादि ) का अभाव ही रहेगा । इसलिए आपका यह कहना कि 'अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रवृत्त होगी'—अयुक्त ही है । यहाँ सब दुःखों से छुट- कारा पा जाना ही मोक्ष है, यही 'अपवर्ग' है । तात्पर्य यह है कि सब दुःखों के कारण तथा आश्रय का अपवर्ग में विच्छेद हो जाता है, अतः सब दुःखों से विमुक्ति ही 'अपवर्ग' है । इस दशा में निष्कारण तथा निराश्रय दुःख उत्पन्न ही कैसे होंगे ! ॥ ४५ ॥ उसके लिये यम-नियम, योग तथा अध्यात्मशास्त्रोक्त उपायों से आत्मा का संस्कार करना चाहिये ॥ ४६ ॥ उस अपवर्ग की प्राप्ति के लिये यम-नियम से आत्म-संस्कार करना चाहिये । यम कहते हैं—आश्रमियों का समान धर्मसाधन, जैसे—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह आदि धर्म का पालन । नियम—जिज्ञासु पुरुषों के विशिष्ट धर्मसाधन को १. 'अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३०. ) २. 'शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३२. )

४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१

४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१ पचयश्च, योगशास्त्राच्चाध्यात्मविधिः प्रतिपत्तव्यः । स पुनस्तपः, प्राणायामः, प्रत्याहारः, ध्यानम्, धारणेति । इन्द्रियविषयेषु प्रसंख्यानाभ्यासो रागद्वेषप्रहा- णार्थः । उपायस्तु योगाचारविधानमिति ॥ ४६ ॥ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च सह संवादः ॥ ४७ ॥ तदर्थमिति प्रकृतम् । ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानम् = आत्मविद्याशास्त्रम्, तस्य ग्रहण- मध्ययनधारणे । अभ्यासः = सततक्रियाध्ययनश्रवणचिन्तनानि । तद्विद्यैश्च सह संवाद इति प्रज्ञापरिपाकार्थम् । परिपाकस्तु संशयच्छेदनम्, अविज्ञातार्थबोधः, अध्यवसिताभ्यनुज्ञानमिति । समाय वादः = संवादः ॥ ४७ ॥ 'तद्विद्यैश्च सह संवादः' इत्यविभक्तार्थं वचनं विभज्यते-- तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारिविशिष्टश्रेयोऽर्थिभिरनसूयिभिरभ्युपेयात् ॥ ४८ ॥ कहते हैं, जैसे—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान । उक्त उपायों द्वारा अधर्मनाश तथा धर्मोपचय से आत्मसंस्कार समझना चाहिये । अध्यात्मविधि योगशास्त्र से ग्रहण करनी चाहिये । वह विधि योगशास्त्र में—तप, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान तथा धारणा आदि उपायों से बतायी गयी है । इन्द्रियार्थों के वारे में निवृत्ति ( त्याग ) का अभ्यास रागद्वेष के क्षय के लिये किया जाता है । योग तथा आचारशास्त्र में मुमुक्षु के लिये बतायी गयी विधियाँ ही 'उपाय' है। जैसे—एकाकिता, आहार में संयम तथा एक स्थान पर अधिक काल न रहना आदि ॥ ४६ ॥ [ यदि अपवर्ग उक्त समाधि से ही निष्पन्न होता है तो इस न्यायशास्त्र के अध्ययन का क्या लाभ ?—] इस पर सूत्रकार कहते हैं— विद्याओं का अध्ययन तथा उसका अभ्यास और उसके मर्मज्ञों के साथ संवाद ॥४७॥ उस अपवर्ग के लिए करना चाहिये । 'जिससे जाना जाये'—इस करणव्युत्पत्ति से आत्मविद्याशास्त्र को 'ज्ञान' कहते है, उसे प्राप्त करना ही अध्ययन एवं धारणा है । निरन्तर शास्त्रोक्त क्रिया, शास्त्रों का अध्ययन एवं चिन्तन करना अभ्यास कहलाता है । तथा प्रज्ञावै शद्य के लिए उस विद्या के विद्वानों के सामने जिज्ञासुभाव से श्रद्धा के साथ परिप्रश्न कर संवाद करते रहने से प्रज्ञापरिपाक होता है । यह प्रज्ञावैशद्य तब समझना चाहिये जब जिज्ञासु को संशयनिवृत्ति, अविज्ञात ( विशेषेण अज्ञात ) अर्थ का बोध, तथा प्रमाण से सामान्यतः ज्ञात का तर्कयुक्त अभ्युपगम हो जाये । समस्थिति के लिये किये गये वाद को 'संवाद' कहते हैं । अर्थात् तत्त्ववुभुत्सा के लिये विहित कथाप्रवर्तन संवाद कहलाता है ॥ ४७ ॥ पूर्वसूत्रोक्त 'उन उन विद्वानों के साथ होनेवाला संवाद'—इस वाक्यावयव को और स्पष्ट करते हैं— संवाद को शिष्य, गुरु, सहाध्यायी तथा किसी तत्त्वज्ञानी के साथ जो कि उस जिज्ञासु का कल्याण चाहते हों तथा उससे ईर्ष्या न करते हों, प्राप्त करे ॥ ४८ ॥

सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो,

३४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० एतन्निगदेनैव नीतार्थमिति ॥ ४८ ॥ यदिदं मन्येत—पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः प्रतिकूलः परस्येति ? प्रतिपक्षहीनमपि वा प्रयोजनार्थमर्थित्वे ॥ ४९ ॥ तमभ्युपेयादिति वर्तते । परतः प्रज्ञामुपादित्समानस्तत्त्वबुभुत्साप्रकाशनेन स्वपक्षमनावस्थापयन् स्वदर्शनं परिशोधयेदिति ॥ ४९ ॥ तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् [ ५०-५१ ] अन्योन्यप्रत्यनीकानि च प्रावादुकानां दर्शनानि, स्वपक्षरागेण चैके न्याय- मतिवर्तन्ते, तत्र— तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, बोजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत् ॥ ५० ॥ अनुत्पन्नतत्त्वज्ञानानामप्रहीणदोषाणां तदर्थं घटमानानामेतदिति ॥ ५० ॥ यह सूत्र अपने सरल पदों से स्वयं स्पष्ट है, अतः इसका अधिक व्याख्यान अपे- क्षित नहीं ॥ ४८ ॥ यदि संवाद में पक्ष तथा प्रतिपक्ष होने से वह दूसरों ( उक्त शिष्य, गुरु, सब्रह्म- चारी ) के लिये प्रतिकूल ही होगा—ऐसा समझा जाय तो ? तत्त्वज्ञान की इच्छा होने पर तत्त्वनिर्णय के लिये प्रतिकूलपक्षहीन ॥ ४९ ॥ वह संवाद करे । दूसरे से ज्ञान प्राप्त करने के लिये तथा तत्त्वज्ञान की इच्छा प्रकट कर, अपना कोई पक्ष न रखता हुआ अपने ज्ञान का परिष्कार करे ॥ ४९ ॥ [ यदि तत्त्वज्ञान के लिये ऐसा सात्त्विक संवाद ही अपेक्षित है तो जल्प-वितण्डा को हाथ जोड़ लें, संवाद में उनकी क्या जरूरत पड़ेगी ? इस पर कहते हैं—] एक बात और, विभिन्न दार्शनिकों के आत्मविद्या के बारे में अपने-अपने मत हैं जो कि परस्पर विरुद्ध हैं, उनमें अपने को न उलझाते हुए तथा उनमें से अयुक्त को छोड़- कर युक्त के परिग्रह से अपने ज्ञान का परिष्कार करे। हाँ, उक्त प्रकार के वादियों को छोड़ कर अन्य प्रकार के वादी भी हैं जो अपने पक्ष में दुराग्रह रखते हुए न्याय का अतिक्रमण करते रहते हैं, उन पर— जिज्ञासु को तत्त्वज्ञान के संरक्षण के लिये जल्प-वितण्डा का भी प्रयोग करना चाहिये, जैसे अन्यत्र अनपेक्षित कण्टकशाखा का आवरण (कांटों का घेरा) भी क्षेत्ररक्षण के लिये कभी-कभी अत्यावश्यक होता है ॥ ५० ॥ सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो, • जिनके दोष प्रहीण न हुए हों, परन्तु जो उनके प्रहाण के लिये प्रयास कर रहे हों ॥५०॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३

५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३ विद्यानिर्वेदादिभिश्च परेणावज्ञायमानस्य— ताभ्यां विगृह्य कथनम् ॥ ५१ ॥ विगृह्य इति विजिगीषया, न तत्त्वबुभुत्सयेति । तदेतद् विद्यापालनार्थम्, न लाभपूजाख्यात्यर्थमिति ॥ ५१ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकं समाप्तम् ❀ समाप्तश्च चतुर्थोऽध्यायः ❀ या जो प्रतिवादी मिथ्याज्ञानावलेपदुर्विदग्धता से जिज्ञासु की अवज्ञा करने को तत्पर हो, उस समय जिज्ञासु जल्प-वितण्डा से संवाद करता हुआ विजिगीषा से तत्त्वकथन करे ॥ ५१ ॥ ‘विगृह्य’ पद का तात्पर्य है विजिगीषा से, न कि तत्त्वबुभुत्सा से । जल्प-वितण्डा का प्रयोग इसलिये किया जाता है कि वे उक्त दुर्विदग्ध वादी अपना दृढ प्रतिपक्षी न न पाकर साधारण जनता के हृदय से धार्मिक भावनाओं का विलोप ही न कर दें । वहाँ जिज्ञासु को यह कभी न सोचना चाहिये कि इस जल्प-वितण्डा के प्रयोग से सत्कार, या धन का लाभ होगा, अपितु वह विद्या की रक्षा के लिये जल्प-वितण्डा का आश्रयण लेता रहे ॥ ५१ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में चतुर्थ अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ चतुर्थ अध्याय भी समाप्त ❀

सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ]

Here is the accurate transcription of the image into pure Markdown with Devanagari text and line markers:

अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रथममाह्निकम् [ १-३ ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ] 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्' ( १.२.१८ ), इति संक्षेपेणोक्तम्, तद्विस्तरेण विभज्यते । ताः खल्विमा जातयः, स्थापना- हेतौ प्रयुक्ते, चतुर्विंशतिः प्रतिषेधहेतवः- साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रति- दृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुप- लब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः ॥ १ ॥ साधर्म्येण प्रत्यवस्थानमविशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः । अविशेषं तत्र तत्रोदाहरिष्यामः । एवं वैधर्म्यसमप्रभृतयोऽपि निर्वक्तव्याः ॥ १ ॥ [ इस न्यायशास्त्र के प्रथमाध्यायस्थ प्रथम सूत्र में शास्त्रान्तःपाति विषयों का परि- गणन कर, तदनन्तर गत चारों अध्यायों में क्रमशः उन सबके उद्देश, लक्षण तथा परीक्षा की जा चुकी, अब क्या बाकी रह गया कि जिसके लिए यह पञ्चम अध्याय प्रारम्भ किया जा रहा है ? —इस पर भाष्यकार प्रसंग उठाते हैं—] "साधर्म्य तथा विरुद्ध धर्म से किये जाने वाले खण्डन को 'जाति' ( असत् उत्तर ) कहते हैं, तथा उसके भेद से जाति के बहुत भेद हैं"—ऐसा हम संक्षेप से पीछे ( १.२.१८ ) कह चुके हैं। अब उसी का विस्तरशः निरूपण किया जा रहा है । ये जातियाँ, जो कि वादी द्वारा स्थापनाहेतु उपस्थित किये जाने पर प्रतिवादी द्वारा उसके खण्डन के लिए काम में लायी जाती हैं, चौबीस प्रकार की होती हैं, जैसे— १. साधर्म्यसम, २. वैधर्म्यसम, ३. उत्कर्षसम, ४. अपकर्षसम, ५. वर्ण्यसम, ६. अवर्ण्यसम, ७. विकल्पसम, ८. साध्यसम, ९. प्राप्तिसम, १०. अप्राप्तिसम, ११. प्रसङ्गसम, १२. प्रतिदृष्टान्तसम, १३, अनुत्पत्तिसम, १४. संशयसम, १५. प्रकरणसम, १६. हेतुसम, १७. अर्थापत्तिसम, १८. अविशेषसम, १९. उपपत्तिसम, २०. उपलब्धि- सम, २१. अनुपलब्धिसम, २२. नित्यसम, २३. अनित्यसम, तथा २४. कार्यसम ॥ १ ॥ साधर्म्य ही से जिसका निषेध किया जा सकता हो, अर्थात् दोनों पक्ष के लिए समान हो, किसी एक पक्ष में प्रबल युक्ति न मिलती हो उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं । यह 'अविशेष' ( समानता ) आगे के उस उस जाति के उदाहरण में ही बताया जायेगा कि कहाँ क्या समानता है ! इसी तरह 'वैधर्म्यसम' आदि अवशिष्ट शब्दों का भी निर्वचन कर लेना चाहिये ॥१॥

२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५

२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५ लक्षणं तु— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ ॥ २ ॥ साधर्म्येणोपसंहारे—साध्यधर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्येणैव प्रत्यवस्थानम- विशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः प्रतिषेधः । निदर्शनम्—‘क्रियावानात्मा, द्रव्यस्य क्रियाहेतुगुणयोगात्; द्रव्यं लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तः क्रियावान्, तथा चात्मा, तस्मात् क्रियावान्’ इति । एवमुपसंहृते, परः साधर्म्येणैव प्रत्यवतिष्ठते— ‘निष्क्रिय आत्मा; विभुनो द्रव्यस्य निष्क्रियत्वाद्, विभु चाकाशं निष्क्रयं च, तथा चात्मा, तस्मान्निष्क्रिय.’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनरक्रियसाधर्म्याद् निष्क्रियेणेति । विशेषहेत्व- भावात् साधर्म्यसमः प्रतिषेधो भवति । अथ वैधर्म्यसमः—‘क्रियाहेतुगुणयुक्तो लोष्टः परिच्छिन्नो दृष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्न लोष्टवत् क्रियावान्’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रिया- 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' का लक्षण हैं— साधर्म्य तथा वैधर्म्य से वादी द्वारा साध्य का उपसंहार करने पर, प्रतिवादी द्वारा उस साध्यधर्म के व्यतिरेक का ( व्याप्त्यनपेक्ष ) केवल साधर्म्य वैधर्म्य से उपपादन करना 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' जाति कहलाती हैं ॥ २ ॥ साधर्म्य द्वारा उपसंहार किये जाने पर, साध्यधर्म के अभाव का उपपादन न कर प्रतिवादी व्याप्त्यनपेक्ष केवल साधर्म्य से स्थापनाहेतु के समान ही प्रतिषेध उपस्थित कर दे उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं। उदाहरण के लिए 'आत्मा क्रियावान् है, द्रव्य के क्रिया- हेतुगुणयुक्त होने से; लोष्टद्रव्य जैसे क्रियाहेतुगुणयुक्त है अतः क्रियावान् है, वैसे ही आत्मा भी द्रव्य है, अतः वह भी क्रियावान् हैं'—ऐसा वादी द्वारा साध्य का उपसंहार किये जानेपर, प्रतिवादी उदाहरणान्तर के साधर्म्य ( व्याप्त्यनपेक्ष ) से ही प्रतिषेधात्मक प्रयोग करता है—'आत्मा निष्क्रिय है, विभु द्रव्य के निष्क्रिय होने से जैसे आकाश विभु तथा निष्क्रिय है, वैसे ही आत्मा भी विभु हैं, अतः वह निष्क्रिय है ।' यहाँ वादी के उपसंहार तथा प्रतिवादी के प्रत्यवस्थान में कोई विशेष अर्थात् हेतु व्याप्तिविशिष्ट नहीं हैं कि जिससे किसी को प्रमाण माना जा सके । अतः यह कैसे निश्चय किया जाये कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो; अक्रिय साधर्म्य से निष्क्रिय सिद्ध न हो । यों विशेष हेतु न होने से यह 'साधर्म्य' प्रतिषेध है । इसी में 'वैधर्म्यसम' का उदाहरण सुनिये—'क्रियाहेतुगुणयुक्त लोष्ट परिच्छिन्न देखा जाता है ऐसा आत्मा नहीं देखा जाता, अतः वह लोष्ट की तरह क्रियावान् नहीं हैं'—इस प्रयोग में भी ऐसा कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि जिससे यह सिद्ध हो सके कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो, तथा क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय न

३४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनः क्रियावद्वैधर्म्यादक्रियेणेति । विशेष- हेत्वभावाद् वैधर्म्यसमः । वैधर्म्येण चोपसंहारे—'निष्क्रिय आत्मा, विभुत्वात्; क्रियावद् द्रव्यमविभु दृष्टम्—यथा, लोष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्निष्क्रियः' इति । वैधर्म्येण प्रत्यव- स्थानम्–'निष्क्रियं द्रव्यमाकाशं क्रियाहेतुगुणरहितं दृष्टम्, न तथाऽऽत्मा, तस्मान्न निष्क्रियः' इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियेण भवितव्यम्, न पुनरक्रियवैधर्म्यात् क्रियावतेति विशेषहेत्वभावाद्वैधर्म्यसमः । अथ साधर्म्यसमः–'क्रियावान् लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तो दृष्टः, तथा चाऽऽत्मा, तस्मात् क्रियावान्' इति । न चास्ति विशेषहेतुः–क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियः, न पुनः क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावानिति । विशेषहेत्वभावात् साधर्म्यसमः ॥ २ ॥ अनयोत्तरम्— गोत्वाद गोसिद्धिवत् तत्सिद्धिः ॥ ३ ॥ साधर्म्यमात्रेण वैधर्म्यमात्रेण च साध्यसाधने प्रतिज्ञायमाने स्यादव्यवस्था, हो । विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' प्रतिषेध है । (साधर्म्यसम के प्रतिषेध में आकाश के साथ निष्क्रियत्वरूप साधर्म्य से आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया था, यहाँ इस प्रतिषेध में परिच्छिन्न लोष्ट के साथ अपरिच्छिन्नत्वरूप वैधर्म्य से ही आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया जा रहा है, अतः यह वैधर्म्यसमप्रतिषेध का उदाहरण उचित ही है । ) वैधर्म्य से उपसंहार में दूसरा उदाहरण देते हैं—हेतु का उदाहरण में वैधर्म्य से यों उपसंहार करने पर कि 'आत्मा निष्क्रिय है, विभु होने से, जब कि क्रियावान् द्रव्य अविभु देखा गया है, जैसे लोष्ट; वैसा आत्मा नहीं है, अतः वह निष्क्रिय हैं' ! इस प्रयोग का वैधर्म्य से ही प्रतिषेध करते हैं—'निष्क्रिय द्रव्य आकाश क्रियाहेतुगुणरहित देखा गया है, आत्मा वैसा नहीं है, ( अर्थात् क्रियाहेतुगुणसहित है ) अतः वह निष्क्रिय नहीं है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया, जिससे हम माने कि क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय ही होना चाहिये, न कि अक्रिय वैधर्म्य से क्रियावान् ! विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' है । इसी में साधर्म्यसम का का उदाहरण देते हैं—'क्रियावान् लोष्ट क्रियाहेतुगुणयुक्त देखा गया है, आत्मा भी वैसा ही है, अतः वह भी क्रियावान् है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि हम समझें—क्रियावद्वैधर्म्य से ही निष्क्रिय सिद्ध हो तथा क्रियावत्सा- धर्म्य से क्रियावान् सिद्ध न हो । विशेष हेतु न होने से यह प्रयोग 'साध्यसम' है ॥ २॥ इन साधर्म्यसम तथा वैधर्म्यसम के असदुत्तरत्व में हेतु ( = खण्डन ) बतलाते हैं— गोत्व से गोसिद्धि की तरह उसकी सिद्धि है ॥ ३ ॥ केवल साधर्म्य या वैधर्म्य से साध्यसिद्धि की प्रतिज्ञा में तो अव्यवस्था हो जायगी ।

'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७

'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७ सा तु धर्मविशेषे नोपपद्यते, गोसाधर्म्याद् गोत्वाज्जातिविशेषाद् गौः सिद्ध्यति, न तु सास्नादिसम्बन्धात्¹। अश्वादिवैधर्म्याद् गोत्वादेव च गौः सिद्ध्यति, न गुणादिभेदात्। तच्चैतत् कृतव्याख्यानमवयवप्रकरणे—'प्रमाणानामभिसम्ब- न्धाच्चैकार्थकारित्वं समानं वाक्ये' इति ( १.१.३९ ) । हेत्वाभासाश्रया खल्विय- मव्यवस्थेति ॥ ३ ॥ उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् [ ४-६ ] साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यवर्ण्य- विकल्पसाध्यसमाः ॥ ४ ॥ दृष्टान्तधर्मं साध्ये समासजतः उत्कर्षसमः। यदि क्रियाहेतुगुणयोगाल्लोष्टवत् क्रियावानात्मा, लोष्टवदेव स्पर्शवानपि प्राप्नोति। अथ न स्पर्शवान्, लोष्टवत् क्रियावानपि न प्राप्नोति। विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति। साध्ये धर्माभावं दृष्टान्तात् प्रसजतोऽपकर्षसमः। लोष्टः खलु क्रियावान् विभुर्दृष्टः, काममात्माऽपि क्रियावान् विभुरस्तु, विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति। ख्यापनीयो वर्ण्यः, विपर्ययादवर्ण्यः। तावेतौ साध्यदृष्टान्तधर्मौ विपर्यस्यतो किन्तु यह अव्यवस्था धर्मविशेष ( स्वाभाविक व्याप्तिसम्बन्ध ) में नहीं बनेगी। गौ की सिद्धि गोसाधर्म्य द्वारा गोत्वजातिविशेष से होती है, न कि केवल सास्नादि सम्बन्ध से। इसी तरह अश्वादि वैधर्म्य द्वारा गोत्व से ही गौ सिद्ध होती है न कि गुणादिभेद से। इन सब बातों का हम पीछे 'अवयवप्रकरण' ( १. १. ३९ ) में विस्तृत व्याख्यान कर चुके हैं कि 'प्रमाणों के अभिसम्बन्ध से वाक्य में एकार्थकारित्व समान ही हैं'। इस जात्युद्भा- वन से की जानेवाली अव्यवस्था का प्रयोग असत् साधनों ( हेत्वाभासों ) में करना चाहिये, न कि सत्साधनों (हेतुओं) में ॥ ३ ॥ साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से दोनों के ही सिद्ध होने से उत्कर्षसम, अप- कर्षसम, वर्ण्यसम, अवर्ण्यसम, विकल्पसम तथा साध्यसम—ये ६ प्रतिषेध बनते हैं ॥४॥ 'दृष्टान्त में अन्य दृष्ट धर्म का साध्य में वर्तमान धर्म के साथ आपादन 'उत्कर्षसम' प्रतिषेध कहलाता है। जैसे—यदि क्रियाहेतुगुणयोग से लोष्ट की तरह आत्मा क्रियावान् है तो वह लोष्ट की तरह स्पर्शवान् भी होना चाहिये, यदि स्पर्शवान् नहीं है तो लोष्ट की तरह क्रियावान् भी नहीं हो सकता। विपर्यय में विशेष हेतु बतलाना होगा। दृष्टान्त में दृष्ट धर्माभाव को साध्य में आपादन करना 'अपकर्षसम' कहलाता है; जैसे—'लोष्ट क्रियावान् तथा अविभु देखा गया है, क्यों न आत्मा को भी ऐसा ही मान लें, विपरीत में विशेष हेतु देना होगा। पक्ष एवं दृष्टान्त में साधर्म्यमात्र से पक्षधर्मत्व का निर्णय करना 'वर्ण्यसम' कहलाता है ! १. 'सास्नादीत्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः, तेन व्यभिचारिणः शृङ्गादयो गृह्यन्ते' इति तात्पर्याचार्याः ।

३४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वर्ण्यावर्ण्यसमौ भवतः । साधनधर्मयुक्ते दृष्टान्ते धर्मान्तरविकल्पात् साध्यधर्मविकल्पं प्रसजतो विकल्पसमः । क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चिद् गुरु यथा लोष्टः, किञ्चिल्लघु यथा वायुः । एवं क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चित्क्रियावत् स्यात् यथा लोष्टः, किञ्चिद- क्रियं यथा आत्मा । विशेषो वा वाच्य इति । हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्मः साध्यः, तं दृष्टान्ते प्रसजतः साध्यसमः । 'यदि यथा लोष्टस्तथाऽऽत्मा'; प्राप्तस्तर्हि 'यथाऽऽत्मा तथा लोष्टः' इति । साध्य- श्चायमात्मा क्रियावानिति कामं लोष्टोऽपि साध्यः । अथ नैवम्, न तर्हि 'यथा लोष्टः तथाऽऽत्मा' ॥ ४ ॥ एतेषामुत्तरम्— किञ्चित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः ॥ ५ ॥ अलभ्यः सिद्धस्य निह्नवः, सिद्धं च किञ्चित्साधर्म्यादुपमानम्—'यथा गौस्तथा गवयः' इति । तत्र न लभ्यो गोगवययोर्धर्मविकल्पश्चोदयितुम् । एवं साधके धर्मे दृष्टान्तादिसामर्थ्ययुक्ते न लभ्यः साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पाद् वैधर्म्यात् प्रतिषेधो वक्तुमिति ॥ ५ ॥ दृष्टान्त के सादृश्यमात्र से पक्ष में साध्याभाव का आपादन 'अवर्ण्यसम' कहलाता है । साधनधर्मयुक्त दृष्टान्त में धर्मान्तरविकल्प से साध्यधर्मविकल्प का आपादन करना 'विकल्पसम' कहलाता है। जैसे—'क्रियाहेतुगुणयुक्त कोई गुरु होता है, जैसे लोष्ट, कोई लघु होता है जैसे वायु; इसी तरह क्रियाहेतुगुण-युक्त कोई क्रियावान् होगा, जैसे— लोष्ट, कोई अक्रिय भी होगा जैसे—आत्मा'। अन्यथा विशेष में कोई हेतु बतावें । हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्म साध्य होता है, उसका दृष्टान्त में आपादन करना 'साध्यसम' कहलाता है। जैसे—'यदि जैसा लोष्ट है वैसा ही आत्मा है तो जैसा आत्मा है वैसा ही लोष्ट भी होना चाहिये, अभी तो आत्मा साध्य है, तो लोष्ट भी वैसा ही होना चाहिये, यदि ऐसा नहीं है तो जैसा लोष्ट है वैसा आत्मा नहीं है' ॥ ४ ॥ इन छहों जातिप्रतिषेधों का उत्तर है— किञ्चित्साधर्म्य से उपसंहारसिद्धि द्वारा वैधर्म्य से प्रतिषेध नहीं होता ॥ ५ ॥ सिद्ध को छिपाया नहीं जा सकता, उसे जैसा है वैसा स्वीकार करना पड़ेगा । वे ही सिद्ध कुछ सादृश्य लेकर ही उपमान बनते हैं, जैसे—'जैसी गौ वैसा गवय होता है'—यहाँ गौ तथा गवय के पूर्णसादृश्य ( सास्नादिमत्त्वेन ) के लिये आप आग्रह नहीं कर सकते । कुछ न कुछ असमानता तो होगी ही । इस प्रकार साधक धर्म में दृष्टान्त के सभी धर्म न मिलें तो साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से प्रश्न तथा प्रतिषेध—दोनों ही अनुचित हैं ॥ ५ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

८. सू० ] प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् ३४९

८. सू० ] प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् ३४९ साध्यातिदेशाच्च दृष्टान्तोपपत्तेः ॥ ६ ॥ यत्र लौकिकपरीक्षकाणां बुद्धिसाम्यं तेनाविपरीतोऽर्थोऽतिदिश्यते प्रज्ञाप- नार्थम् । एवं साध्यातिदेशाद् दृष्टान्ते उपपद्यमाने साध्यत्वमनुपपन्नमिति ॥ ६ ॥ प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् [ ७-८ ] प्राप्य साध्यमप्राप्य वा हेतोः प्राप्त्याऽविशिष्टत्वादप्राप्त्याऽसाधकत्वाच्च प्राप्त्यप्राप्तिसमौ ॥ ७ ॥ हेतुः प्राप्य वा साधयेत्, अप्राप्य वा ? न तावत् प्राप्य; प्राप्त्यामविशिष्टत्वा- दसाधकः । द्वयोर्विद्यमानयोः प्राप्तौ सत्यां किं कस्य साधकं साध्यं वा ! अप्राप्य साधकं न भवति, नाप्राप्तः प्रदीपः प्रकाशयतीति । प्राप्त्या प्रत्यवस्थानं प्राप्तिसमः, अप्राप्त्या प्रत्यवस्थानमप्राप्तिसमः ॥ ७ ॥ अनयोत्तरम्— घटादिनिष्पत्तिदर्शनात् पीडने चाभिचारादप्रतिषेधः ॥ ८ ॥ साध्य के अतिदेश ( सादृश्य ) से दृष्टान्त की उपपत्ति हो जाती है ॥ ६ ॥ जहाँ साधारण तथा परीक्षक जनों का बुद्धिसाम्य हो उससे अनुकूल अर्थ अति- दिष्ट होता है । क्योंकि लोगों को समझना है । परन्तु साध्यसादृश्य से दृष्टान्त के उपपन्न किये जाने पर 'साध्यत्व' ही उसका क्या रहेगा ! ॥ ६ ॥ [ अब 'प्राप्तिसम' तथा 'अप्राप्तिसम' का लक्षण करते हैं—] प्राप्ति में विशेषता न होने से, हेतु से साध्य को प्राप्त कर या न प्राप्त कर प्राप्ति या अप्राप्ति द्वारा असाधक होने से 'प्राप्ति सम' तथा 'अप्राप्तिसम' दोष कहलाते हैं ॥ ७ ॥ हेतु साध्य से मिलकर ( संयुक्त होकर ) उसको सिद्ध करता है ? अथवा बिना मिले ? यदि मिल कर सिद्ध करता है तो दोनों में किसी एक की विशेषता न होने से कौन सिद्ध करता है, तथा कौन सिद्ध होता है—इसकी कुछ व्यवस्था न रहेगी ! अर्थात् प्राप्ति से उनमें साध्यसाधकभाव नहीं रह सकता । यदि बिना संयुक्त हुए सिद्ध करता है—यह मानोगे, तो भी साध्यसिद्धि न हो सकेगी । दीपक उसी वस्तु को प्रकाशित करता है, जिससे वह संयुक्त हो । जिस वस्तु का उसके प्रकाश से संयोग न हो उसे सिद्ध नहीं कर पाता । यों प्राप्ति से प्रतिषेध को 'प्राप्तिसम' तथा अप्राप्ति से प्रति- षेध को 'अप्राप्तिसम' कहते हैं ॥ ७ ॥ इन दोनों का समाधान यह है— घटादि की निष्पत्ति तथा पीड़न में अभिचार देखे जाने से उक्त प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ ८ ॥

प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् [ ९-११ ]

३५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० उभयथा खल्व्युक्तः प्रतिषेधः। कर्तृकरणाधिकरणानि प्राप्य मृदं घटादि- कार्यं निष्पादयन्ति, अभिचाराच्च पीडने सति दृष्टमप्राप्य साधकत्वमिति ॥ ८ ॥ प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् [ ९-११ ] दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात् प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ ॥ ९ ॥ साधनस्यापि साधनं वक्तव्यमिति प्रसङ्गेन प्रत्यवस्थानं प्रसङ्गसमः प्रतिषेधः। 'क्रियाहेतुगुणयोगो क्रियावान् लोष्टः' इति हेतुर्नापदिश्यते, न च हेतुमन्तरेण सिद्धिरस्तीति। प्रतिदृष्टान्तेन प्रत्यवस्थानं प्रतिदृष्टान्तसमः। 'क्रियावानात्मा; क्रियाहेतुगुण- योगाद्, लोष्टवत्' इत्युक्ते प्रतिदृष्टान्त उपादीयते—'क्रियाहेतुगुणयुक्तमाकाशं निष्क्रियं दृष्टम्' इति। कः पुनराकाशस्य क्रियाहेतुगुणः ? वायुना संयोगः संस्कारापेक्षः, वायुवनस्पतिसंयोगवदिति ॥ ९ ॥ उक्त दोनों ही प्रकार का प्रतिषेध युक्त नहीं; क्योंकि घटादि का निष्पादन कर्ता ( कुम्भकार ) करण ( दण्ड-चक्र आदि ) तथा अधिकरण ( भूतलादि ) इन सबके साथ मृत्पिण्ड मिलने पर ही होता है। तो क्या साधकत्व उनका अनुपपन्न है ? और उधर शत्रु के पीड़न के लिये जो अभिचार (मारण) क्रियाएँ की जाती हैं उनमें क्रियाकारक के साथ शत्रु का सम्मेलन आवश्यक नहीं, फिर भी उन क्रियाओं से शत्रुपीड़न देखा जाता है। यों प्राप्ति या अप्राप्ति से साध्यसाधनभाव का प्रतिषेध नहीं हो पाता ॥ ८ ॥ [ अब 'प्रसङ्गसम' तथा 'प्रतिदृष्टान्तसम' का लक्षण करते हैं—] दृष्टान्त के कारणानभिधान से तथा प्रतिदृष्टान्त के प्रतिषेध से क्रमशः 'प्रसङ्गसम' तथा 'प्रतिदृष्टान्तसम' प्रतिषेध कहलाते हैं ॥ ९ ॥ यद्यपि दृष्टान्त का दृष्टान्त नहीं हुआ करता, परन्तु वाद में जब दृष्टान्त का दृष्टान्त पूछा जाये तो उनके भी हेतु तथा दृष्टान्त का प्रसंग आ पड़ेगा, इसे 'प्रसंगसम' प्रतिषेध कहते हैं। जैसे 'क्रियाहेतुगुणयोगी क्रियावान् होता है, जैसे लोष्ट', यहाँ हेतु नहीं कहा गया, हेतु के बिना सिद्धि होती नहीं। अतः इस दृष्टान्त में प्रतिवादी पूछता है कि 'यह क्रियावान् क्यों हैं'। यही 'प्रसङ्गसम' है। विरोधी प्रतिदृष्टान्त से प्रतिषेध 'प्रतिदृष्टान्तसम' कहलाता है। उसमें भी साधन करना जैसे—'आत्मा क्रियावान् है, क्रियाहेतुगुणयोग से, लोष्ट की तरह'—ऐसा कहने पर प्रतिवादी प्रतिदृष्टान्त दे सकता है—'क्रियाहेतुगुणयुक्त आकाश निष्क्रिय देखा गया है, अतः आत्मा निष्क्रिय है', यों प्रतिदृष्टान्त से वह वादी की बात का खण्डन करता है। फिर वादी पूछता है—'आकाश में क्रियाहेतुगुण क्या हैं' ? प्रतिवादी उत्तर देता है—'उसका वायु के साथ संस्कारापेक्ष संयोग, वायु-वनस्पतिसंयोग की तरह' ॥ ९ ॥

११. सू०] प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् ३५१

११. सू०] प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् ३५१ अनयोरुत्तरम्— प्रदीपोपादानप्रसङ्गनिवृत्तिवत् तन्निवृत्तिः ॥ १० ॥ इदं तावदयं पृष्टो वक्तुमर्हति–अथ के प्रदीपमुपाददते ? किमर्थं वेति ? दिदृक्षमाणा दृश्यदर्शनार्थमिति। अथ प्रदीपं दिदृक्षमाणाः प्रदीपान्तरं कस्मान्नोपाददते ? अन्तरेणापि प्रदीपान्तरं दृश्यते प्रदीपः, तत्र प्रदीपदर्शनार्थं प्रदीपोपादानं निरर्थकम्। अथ दृष्टान्तः किमर्थमुच्यत इति ? अप्रज्ञातस्य ज्ञापनार्थमिति। अथ दृष्टान्ते कारणापदेशः किमर्थं मृग्यते ? यदि प्रज्ञापनार्थम्, प्रज्ञातो दृष्टान्तः। स खलु 'लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः' इति। तत्प्रज्ञापनार्थः कारणापदेशो निरर्थक इति प्रसङ्गसमस्योत्तरम् ॥ १० ॥ अथ प्रतिदृष्टान्तसमस्योत्तरम्— प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः ॥ ११ ॥ प्रतिदृष्टान्तं ब्रुवता न विशेषहेतुरुपदिश्यते–'अनेन प्रकारेण प्रतिदृष्टान्तः साधकः, न दृष्टान्तः' इति। एवम् 'प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे नाहेतुर्दृष्टान्तः' इत्युप- पद्यते। स च कथं हेतुर्न स्याद् ? यद्यप्रतिषिद्धः साधकः स्यादिति ॥ ११ ॥ इन दोनों में से 'प्रसङ्गसम' का समाधान यह है— दीपक के ग्रहण में प्रसङ्गनिवृत्ति की तरह इस प्रसङ्गसम की निवृत्ति है ॥ १० ॥ वादी, प्रतिवादी द्वारा उक्त प्रतिषेध करने पर, उससे यह पूछे–'प्रदीप को कौन तथा क्यों चाहते हैं'? वह कहेगा—'देखना चाहने वाले, दृश्य विषय को देखने के लिये'। तब उससे पूछिये—'वे देखना चाहनेवाले उस प्रदीप को देखने के लिये दूसरा प्रदीप क्यों नहीं चाहते ?' वह कहेगा 'दूसरे प्रदीप के बिना भी यह प्रदीप दीखता है, अतः वहाँ प्रदीप को देखने के लिये दूसरे प्रदीप का ग्रहण निरर्थक है। तब फिर उससे पूछें कि 'दृष्टान्त किस लिये दिया जाता हैं' ? वह कहेगा 'अप्रज्ञात के ज्ञापन के लिये'। 'फिर दृष्टान्त में कारणाभिधान क्यों चाहते हो ? यदि प्रज्ञापन के लिये, तो दृष्टान्त तो जाना हुआ है। दृष्टान्त इसे ही न कहते हो कि जहाँ लौकिक तथा परीक्षक–दोनों का बुद्धिसाम्य हो जाये (१.१.२५)। अब उस दृष्टान्त को बतलाने कें लिये कारणाभिधान निरर्थक ही हैं'। यह उक्त 'प्रसङ्गसम' का समाधान है ॥ १० ॥ अब 'प्रतिदृष्टान्तसम' का समाधान सुनिये— प्रतिदृष्टान्त के समाधानसामर्थ्य में दृष्टान्त असाधन नहीं है ॥ ११ ॥ प्रतिदृष्टान्त उपस्थित करने वाले प्रतिवादी द्वारा किसी विशेष हेतु का अभिधान नहीं किया जाता कि इस प्रकार प्रतिदृष्टान्त साध्य का साधक है, अपितु दृष्टान्त नहीं। यों, प्रतिदृष्टान्त का साधकत्व मानने वाले को दृष्टान्त का भी साधकत्व मानना ही पड़ेगा। वह प्रतिदृष्टान्त दृष्टान्तहेतु क्यों नहीं होगा ? जब कि दृष्टान्त किसी बलवत्तर प्रमाण से बाधित न हो। अतः प्रतिदृष्टान्त के रहते हुए भी दृष्टान्त का साधकत्व अवश्य स्वीकार करना ही पड़ेगा ॥ ११ ॥

अनुत्पत्तिसमप्रकरणम् [ १२-१३ ]

३५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १ आ० अनुत्पत्तिसमप्रकरणम् [ १२-१३ ] प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः ॥ १२ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्ननान्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्युक्ते, अपर आह— प्रागुत्पत्तेरनुत्पन्ने शब्दे प्रयत्ननान्तरीयकत्वमनित्यत्वकारणं नास्ति, तदभावाद् नित्यत्वं प्राप्तम्, नित्यस्य चोत्पत्तिर्नास्ति । अनुत्पत्त्या प्रत्यवस्थानम् अनु- त्पत्तिसमः ॥ १२ ॥ अस्योत्तरम्— तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः ॥ १३ ॥ तथाभावादुत्पन्नस्येति—उत्पन्नः खल्वयम् 'शब्दः' इति भवति, प्रागुत्पत्तेः शब्द एव नास्ति । उत्पन्नस्य शब्दभावाच्छब्दस्य सतः प्रयत्ननान्तरीयकत्वम- नित्यत्वकारणमुपपद्यते, कारणोपपत्तेरयुक्तोऽयं दोषः—'प्रागुत्पत्तेः कारणा- भावात्' इति ॥ १३ ॥ संशयसमप्रकरणम् [ १४-१५ ] सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः ॥ १४ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्ननान्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्युक्ते, हेतौ संशयेन अब 'अनुत्पत्तिसम' का लक्षण करते हैं— उत्पत्ति से पूर्व कारण के अभाव से 'अनुत्पत्तिसम' प्रतिषेध होता है ॥ १२ ॥ जैसे—'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् होने से, घट की तरह'—यह कहने पर प्रतिवादी कहता है—'उत्पत्ति से पूर्व उसमें शब्द अनुत्पन्न है, प्रयत्न के पश्चात् होना अनित्यता का कारण नहीं है, उक्त कारण के अभाव से शब्द में नित्यत्व आ जायेगा, नित्य की उत्पत्ति हुआ नहीं करती'। यों अनुत्पत्ति से प्रतिषेध 'अनुत्पत्तिसम' कह- लाता है ॥ १२ ॥ इसका समाधान है— उत्पन्न के पश्चात् 'शब्द' कहलाने से तथा तभी कारणोपपत्ति से यह कारणाभाव प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ १३ ॥ उत्पन्न होने पर ही यह 'शब्द' कहलाता है; क्योंकि उत्पत्ति से पूर्व वह 'शब्द' था ही नहीं ! उत्पन्न होने से शब्द का प्रयत्न के पश्चात् होना अनित्यत्वकारण बनता है । इस कारणोपपादन से आपका उत्पत्ति से पूर्व कारणाभाव वाला प्रतिषेध अयुक्त है ॥ १३ ॥ 'संशयसम' का लक्षण— सामान्य और दृष्टान्त में ऐन्द्रियकत्व समान होने से नित्यानित्य सादृश्य से 'संशयसम' प्रतिषेध होता है ॥ १४ ॥ 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण, घट की तरह' ऐसा प्रयोग

१५. सू० ] संशयसमप्रकरणम् ३५३

१५. सू० ] संशयसमप्रकरणम् ३५३ प्रत्यवतिष्ठते—सति प्रयत्नानन्तरीयकत्वे अस्त्येवास्य नित्येन सामान्येन साधर्म्य- मैन्द्रियकत्वम्, अस्ति च घटेनानित्येन । अतो नित्यानित्यसाधर्म्यादनिवृत्तः संशय इति ॥ १४ ॥ अस्योत्तरम्— साधर्म्यात् संशये न संशयो वैधर्म्यादुभयथा वा संशयेऽत्यन्तसंशयप्रसङ्गो नित्यत्वानभ्युपगमाच्च सामान्यस्याप्रतिषेधः ॥ १५ ॥ विशेषाद् वैधर्म्यादवधार्यमाणेऽर्थे ‘पुरुष:’ इति, न स्थाणुपुरुषसाधर्म्यात् संशयोऽवकाशं लभते । एवं वैधर्म्याद्विशेषात् प्रयत्नानन्तरीयकत्वादवधार्यमाणे शब्दस्यानित्यत्वे नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयोऽवकाशं न लभते । यदि वै लभेत, ततः स्थाणुपुरुषसाधर्म्यानुच्छेदादत्यन्तं संशयः स्यात् । गृह्यमाणे च विशेषे नित्यं साधर्म्यं संशयहेतुरिति नाभ्युपगम्यते । न हि गृह्यमाणे पुरुषस्य विशेषे स्थाणुपुरुसाधर्म्यं संशयहेतुर्भवति ॥ १५ ॥ देने पर उसमें संशय करके उसका प्रतिषेध किया जा सकता है कि इसके प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने पर भी, जैसे गोत्वादि जाति इन्द्रियगोचर होने पर भी नित्य है, तथा घटादि इन्द्रियगोचर होने पर भी अनित्य है, अतः नित्य सामान्य तथा अनित्य घट में ऐन्द्रियकत्व साधर्म्य है। यों नित्यानित्यसाधर्म्य से इसमें संशय बना ही रह गया ? ॥ १४ ॥ इसका समाधान यह है— साधर्म्य से संशय होने पर उसे वैधर्म्य से मिटाया जा सकता हैं, दोनों ही तरह से संशय मानने पर कभी संशय मिटेगा ही नहीं; अपि च, नित्यत्व के अनभ्युपगम के पश्चात् साधर्म्य से उक्त प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ १५ ॥ विभेदक वैधर्म्य ( असमानता ) से निश्चित किये अर्थ में पुनः ‘पुरुष’ इस ज्ञान में स्थाणु-पुरुष के सादृश्यमात्र से संशय का अवसर नहीं होता। इसी तरह वैधर्म्य से जैसे प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण शब्द में अनित्यत्व निश्चित हो जाने पर नित्यानित्य- सादृश्यमात्र से संशय को अवसर नहीं मिल पाता । यदि तब भी संशय होता रहेगा तो स्थाणुपुरुष का साधारण सादृश्य कभी नष्ट होगा ही नहीं, यों संशय भी सदा बना रहेगा—यह एक अनिष्ट अनवस्था पैदा हो जायेगी । भेद के गृहीत हो जाने पर भी नित्यसादृश्य संशयहेतु बना रहे—यह नहीं माना जा सकता; क्योंकि लोक में यह नहीं देखा जाता कि पुरुष का विशेष ( भेदक ) से विशेष धर्म का ज्ञान हो जाने पर भी स्थाणु-पुरुषसाधर्म्य संशयहेतु रूप में उपस्थित रहे ॥ १५ ॥ अब ‘प्रकरणसम’ का लक्षण करते हैं— न्या० द० ४५

प्रकरणसमप्रकरणम् [ १६-१७ ]

३५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० प्रकरणसमप्रकरणम् [ १६-१७ ] उभयसाधर्म्यात्१ प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः ॥ १६ ॥ 'उभयेन नित्येन चानित्येन च साधर्म्यात् पक्षप्रतिपक्षयोः प्रवृत्तिः = प्रक्रिया । 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्येकः पक्षं प्रवर्त्तयति, द्वितीयश्च नित्यसाधर्म्यात् । एवं च सति 'प्रयत्नानन्तरोयकत्वात्' इति हेतुरनित्यसाधर्म्ये- णोच्यमानो न प्रकरणमतिवर्त्तते । प्रकरणानतिवृत्तेर्निर्णयानतिवर्तनम् । समानं चैतन्नित्यसाधर्म्येणोच्यमाने हेतौ। तदिदं प्रकरणानतिवृत्त्या प्रत्यवस्थानं प्रकरण- समः। समानं चैतद्वैधर्म्येऽपि, उभयवैधर्म्यात् प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसम इति ॥१६॥ अस्योत्तरम्— प्रतिपक्षात् प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः ॥ १७ ॥ उभयसाधर्म्यात् प्रक्रियासिद्धिं ब्रुवता प्रतिपक्षात् प्रक्रियासिद्धिरुक्ता भवति, यद्युभयसाधर्म्यम्, तत्र एकतरः प्रतिपक्ष इत्येवं सत्युपपन्नः प्रतिपक्षो भवति । प्रतिपक्षोपपत्तेरनुपपन्नः प्रतिषेधः । यदि प्रतिपक्षोपपत्तिः, प्रतिषेधो नोपपद्यते । अथ प्रतिषेधोपपत्तिः, प्रतिपक्षो नोपपद्यते; यतः प्रतिपक्षोपपत्तिः, प्रतिषे- दोनों के साधर्म्य से प्रक्रियासिद्धि होने पर 'प्रकरणसम' प्रतिषेध होता है ॥१६॥ उभय—नित्य तथा अनित्य के साथ सादृश्य होने से पक्ष तथा प्रतिपक्ष की प्रवृत्ति 'प्रक्रिया' कहलाती है। जैसे—'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से, घट की तरह' यह एक पक्ष कहता है। तथा दूसरा ( प्रतिपक्षी ) पूर्वोक्त नित्यसाधर्म्य से उसे 'नित्य' कहता है । इस प्रकार 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से' यह हेतु अनित्य- साधर्म्य से कहा जाता हुआ प्रकरण प्रक्रिया को अतिक्रान्त नहीं करता । अतिक्रम न होने से निर्णय अतिक्रमण नहीं कर सकता; क्योंकि यह बात नित्यसाधर्म्य से कहे गये हेतु में भी तुल्य ही पड़ेगी । यों, प्रकरणानतिक्रम से प्रतिषेध करना 'प्रकरणसम' कहलाता है । यह सब प्रक्रिया वैधर्म्य में भी समझ लेनी चाहिये । नित्य तथा अनित्य के वैधर्म्य से प्रक्रियासिद्धि होने पर भी 'प्रकरणसम' प्रतिषेध होता है ॥ १६ ॥ इसका उत्तर है— प्रतिपक्ष से प्रकरणसिद्धि होने पर प्रतिपक्ष की उपपत्ति होने से प्रतिषेध का उपपादन नहीं होता ॥ १७ ॥ उभयसादृश्य से प्रक्रियासिद्धि कहने वाले के द्वारा प्रतिपक्ष ( स्थापनावादी ) से ही प्रक्रियासिद्धि कही जाती है । जब उभयसादृश्य है तो उनमें से किसी में बाध अवश्य होगा, तब एक प्रतिपक्ष होगा ( एक की पराजय होगी ) ही, वही वास्तविक प्रतिपक्ष है । जब प्रतिपक्ष बन गया तो 'प्रकरणसम' दोष कहाँ रहा ! यदि 'प्रकरणसम' है तो १. 'साधर्म्यादित्युपलक्षणम्, उभयवैधर्म्यादित्यपि द्रष्टव्यम्' इति तात्पर्यकृतः ।

प्रकरणावसानात् । तत्त्वावधारणे ह्यवसितं प्रकरणं भवतीति ॥ १७ ॥

१९. सू० ] अहेतुसमप्रकरणम् ३५५ धोपपत्तिश्चेति विप्रतिषिद्धमिति । तत्त्वानवधारणाच्च प्रक्रियासिद्धिः, विपर्यये प्रकरणावसानात् । तत्त्वावधारणे ह्यवसितं प्रकरणं भवतीति ॥ १७ ॥ अहेतुसमप्रकरणम् [ १८-२० ] त्रैकाल्यासिद्धेर्हेतोरहेतुसमः ॥ १८ ॥ हेतुः = साधनम्, तत् साध्यात् पूर्वं पश्चात् सह वा भवेत् ? यदि पूर्वं साधनम्, असति साध्ये कस्य साधनम् ? अथ पश्चात्, असति साधने कस्येदं साध्यम् ? अथ युगपत् साध्यसाधने, द्वयोर्विद्यमानयोः किं कस्य साधनं किं कस्य साध्यमिति हेतुरहेतुना न विशिष्यते ! अहेतुना साधर्म्यात् प्रत्यवस्थानम् — अहेतुसमः ॥ १८ ॥ अस्योत्तरम्— न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः ॥ १९ ॥ न त्रैकाल्यासिद्धिः, कस्मात् ? हेतुतः साध्यसिद्धेः । निर्वर्तनोयस्य निर्वृत्तिः, विज्ञेयस्य विज्ञानम्—उभयं कारणतो दृश्यते, सोऽयं महान् प्रत्यक्षविषय उदाहरण- मिति । यत्तु खलूक्तम्—असति साध्ये कस्य साधनमिति ? यत्तु निर्वर्त्यते यच्च विज्ञाप्यते तस्येति ॥ १९ ॥ प्रतिपक्ष कहाँ बना ! वाध होने के कारण प्रतिपक्ष भी वने और प्रकरणसमप्रयुक्त प्रति- षेध भी रह जाये—ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं। प्रमाता जब तक अनुसन्धान से तत्त्व का अवधारण नहीं कर सकता, तभी तक प्रक्रिया रहती है। इस प्रकरणसम में प्रतिषेध नहीं बनता। तत्त्व का निश्चय हो जाने पर प्रक्रिया (प्रकरण) कैसी ! ॥ १७ ॥ 'अहेतुसम' का लक्षण करते हैं— हेतु साध्य के तीनों कालों में सिद्ध न होने के कारण 'अहेतुसम' दोष कहलाता है ॥ १८ ॥ हेतु अर्थात् साधन । वह साध्य से पहले, वाद में, या साथ में—कहाँ रहे ? यदि पहले साधन (ज्ञापक) तथा साध्य (ज्ञाप्य) बाद में. तो साध्य के बिना साधन किसका ! यदि वाद में है तो साधन के न रहते यह साध्य किसका ! यदि साध्य साधन एक साथ हैं तो दोनों के विद्यमान रहते कौन किसका साधन तथा कौन किसका साध्य है—इसका निर्णय कौन करेगा; क्योंकि हेतु अहेतु से विभेद्य नहीं होता। यों, अहेतु के साथ साधर्म्य से प्रतिषेध 'अहेतुसम' है ॥ १८ ॥ इसका समाधान है— हेतु से साध्यसिद्धि हो जाने से त्रैकाल्यसिद्धि नहीं है ॥ १९ ॥ त्रैकाल्यासिद्धि नहीं है; क्योंकि हेतु से साध्य की सिद्धि हो जाती है। कार्य का कारण तथा ज्ञाप्य का ज्ञापन दोनों ही अपने-अपने कारणों से देखे जाते हैं—यह लोकप्रत्यक्ष- सिद्ध बात है । यह जो कहा कि—'साध्य के न होने पर साधन किसका ?' तो हम कहते हैं जो उत्पन्न किया जाता है तथा जो विज्ञापित किया जाता है उसका ! ॥ १९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

अर्थापत्तिसमप्रकरणम् [ २१-२२ ]

३५६ : वात्स्यायनभाष्यसंहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः ॥ २० ॥ पूर्वं पश्चाद्युगपद्वा प्रतिषेध इति नोपपद्यते । प्रतिषेधानुपपत्तेः स्थापनाहेतुः सिद्ध इति ॥ २० ॥ अर्थापत्तिसमप्रकरणम् [ २१-२२ ] अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः ॥ २१ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वाद् घटवत्' इति स्थापिते पक्षे अर्थापत्त्या प्रतिपक्षं साधयतोऽर्थापत्तिसमः । यदि प्रयत्नानन्तरीयकत्वादनित्य- साधर्म्यात् 'अनित्यः शब्दः' इत्यर्थादापद्यते—नित्यसाधर्म्यात् 'नित्यः' इति, अस्ति त्वस्य नित्येन साधर्म्यम्—अस्पर्शत्वमिति ॥ २१ ॥ अस्योत्तरम्— अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः ॥ २२ ॥ अनुपपाद्य सामर्थ्यमनुक्तमर्थादापद्यते इति ब्रुवतः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वात्, अनित्यपक्षसिद्धावर्थापन्नं नित्यपक्षस्य हानिरिति । अनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः । और प्रतिषेध की अनुपपत्ति से प्रतिषेद्धव्य का प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २० ॥ जैसे आपके कथनानुसार साध्य तथा साधन का साध्यत्व और साधनत्व पूर्व-पश्चात्- सहभाव में नहीं बनता तो 'पहले, बाद में या साथ में प्रतिषेध' वाली बात उपपन्न कैसे करोगे ? प्रतिषेध उपपन्न न होने से स्थापनाहेतु सिद्ध हो गया ॥ २० ॥ 'अर्थापत्तिसम' का लक्षण करते हैं— अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष की सिद्धि 'अर्थापत्तिसम' प्रतिषेध कहलाता है ॥ २१ ॥ 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से, घट की तरह'—यों पक्ष स्थापित करने पर अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष स्थापित करने वाले का 'अर्थापत्तिसम' प्रतिषेध कहलाता है । यदि प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने में अनित्यसादृश्य से शब्द अनित्य है तो यह भी अर्थादापन्न होता है कि नित्यसादृश्य से वह नित्य भी हो सकता है; क्योंकि इसका नित्य के साथ भी अस्पर्शत्वरूप सादृश्य तो है ही ॥ २१ ॥ इसका समाधान यह है— अनुक्त को अर्थादापन्न कहा जाने से तथा अनैकान्तिक होने से अर्थापत्ति से पक्षहानि ही बनती है ॥ २२ ॥ अर्थापत्ति द्वारा सामर्थ्य का उपपादन करते हुए अनुक्त का भी अर्थादापादन मानने वाले को अपने पक्ष की हानि ही उठानी पड़ेगी; क्योंकि उसके पक्ष में भी अनुक्त का आपादन किया जा सकता है । अतः 'उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है' इसका अर्थापत्ति से 'अस्पृष्ट होने से वह नित्य है'—ऐसे पक्ष की हानि अर्थादेव सिद्ध हो जाती है ।

२४. सू० ] अविशेषसमप्रकरणम् ३५७

२४. सू० ] अविशेषसमप्रकरणम् ३५७ उभयपक्षसमा चेयमर्थापत्तिः—यदि नित्यसाधर्म्यादस्पर्शंत्वादाकाशवच्च नित्यः शब्दः, अर्थादापन्नम्—'नित्यसाधर्म्यात् प्रयत्नानन्तरीकत्पादनित्यः' इति । न चेयं विपर्ययमात्रादेकान्तेनार्थापत्तिः, न खलु वै 'घनस्य ग्राव्णः पतनम्' इति अर्थादा- पद्यते—'द्रवाणामपां पतनाभावः' इति ॥ २२ ॥ अविशेषसमप्रकरणम् [ २३-२४ ] एकधर्मोपपत्तेरविशेषे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्सद्भावोपपत्तेरविशेषसमः ॥ २३ ॥ एको धर्मः प्रयत्नानन्तरीयकत्वं शब्दघटयोरुपपद्यत इत्यविशेषे उभयोर- नित्यत्वे सर्वस्याविशेषः प्रसज्यते । कथम् ? सद्भावोपपत्तेः । एको धर्मः सद्भावः सर्वस्योपपद्यते, सद्भावोपपत्तेः सर्वाविशेषप्रसङ्गात् प्रत्यवस्थानम्—अविशेष- समः ॥ २३ ॥ अस्योत्तरम्— क्वचिद्धर्मानुपपत्तेः क्वचिच्चोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः ॥ २४ ॥ यथा साध्यदृष्टान्तयोरेकधर्मस्य प्रयत्नानन्तरीयकत्वस्योपपत्तेरनित्यत्वं अर्थापत्ति के अनैकान्तिक होने से भी उसे स्वपक्षहानि उठानी पड़ सकती है। ऐसी अर्थापत्ति दोनों पक्षों में समान रूप से उठायी जा सकती है। यदि नित्यसाधर्म्य तथा अस्पर्शत्व से आकाशवत् शब्द का नित्यत्व अर्थादापन्न किया जा सकता है तो प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से वहाँ अनित्यत्व भी अर्थादापन्न किया जा सकता है। यह अर्थापत्ति विपर्ययमात्र का सहारा लेकर सर्वत्र नहीं उठायी जा सकती। उदाहरण के लिये—ठोस शिला का पतन देख कर अर्थापत्ति से हम यह विपरीत कैसे सिद्ध कर सकते हैं कि द्रव- द्रव्य ( जल ) का पतन नहीं होता ! ॥ २२ ॥ अब 'अविशेषसम' का लक्षण करते हैं— सामान्य में एक धर्म की उपपत्ति से अविशेषतया सम्पूर्ण में प्रसङ्ग से सद्भाव की उपपत्ति होना 'अविशेषसम' प्रतिषेध कहलाता है ॥ २३ ॥ 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होना'—यह एक धर्म शब्द तथा घट में सामान्य है, इस अनुगत सामान्य धर्म से दोनों के अनित्यत्व होने पर सबका सामान्य धर्म अनित्यत्व उपपन्न होता है; क्योंकि वह सामान्य सर्वत्र 'सत्' जातिसदृश है। अतः एक धर्म 'सत्' होता हुआ इस सद्भावोपपत्ति में सबका सद्भाव उपपन्न करने लगेगा। यों सर्वसामान्य प्रसङ्ग में प्रतिषेध करना 'अविशेषसम' कहलाता है ॥ २३ ॥ इसका समाधान है— उस एक धर्म की कहीं उपपत्ति, कहीं अनुपपत्ति होने से प्रतिषेध नहीं बनता ॥२४॥ जैसे साध्य तथा दृष्टान्त में 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होना' इस धर्म की उपपत्ति

३५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० धर्मान्तरमविशेषेण, नैवं सर्वभावानां सद्भावोपपत्तिनिमित्तं धर्मान्तरमस्ति येनाविशेषः स्यात् । अथ मतम् 'अनित्यत्वमेव धर्मान्तरं सद्भावोपपत्तिनिमित्तं भावानां सर्वत्र स्यात्'—इति ? एवं खलु वै कल्प्यमाने अनित्याः सर्वे भावाः सद्भावोपपत्तेरिति पक्षः प्राप्नोति, तत्र प्रतिज्ञार्थव्यतिरिक्तमन्यदुदाहरणं नास्ति, अनुदाहरणश्च हेतुर्नास्तीति । प्रतिज्ञैकदेशस्य चोदाहरणत्वमनुपपन्नम्—न हि साध्यमुदाहरणं भवति । सतश्च नित्यानित्यभावादनित्यत्वानुपपत्तिः । तस्मात् 'सद्भावोपपत्तेः सर्वाविशेषप्रसङ्गः' इति निरभिधेयमेतद्वाक्यमिति । सर्वभावानां सद्भावोपपत्तेर- नित्यत्वमिति ब्रुवताऽनुज्ञातं शब्दस्यानित्यत्वम्, तत्रानुपपन्नः प्रतिषेध इति ॥२४॥ उपपत्तिसमप्रकरणम् [ २५-२६ ] उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः ॥ २५ ॥ यद्यनित्यत्वकारणमुपपद्यते शब्दस्येत्यनित्यः शब्दः, नित्यत्वकारण- मप्युपपद्यतेऽस्यास्पर्शत्वमिति नित्यत्वमप्युपपद्यते । उभयस्यानित्यत्वस्य नित्य- त्वस्य च कारणोपपत्त्या प्रत्यवस्थानम् उपपत्तिसमः ॥ २५ ॥ अस्योत्तरम्— से अनित्यत्व धर्मान्तर अविशेषतया माना गया है, इस प्रकार सभी भावों का सद्भावो- पत्तिमात्र से धर्मान्तर कल्पित नहीं होता, जो कि 'अविशेष' हो सके । यदि यह मान लें कि सभं भावों का सद्भावोपपत्तिनिमित्तक धर्मान्तर अनित्यत्व ही है ? इस मत के मानने पर 'सभी भाव सद्भावोपपत्ति से अनित्य हैं' यह पक्ष बनेगा, यहाँ प्रतिज्ञावाक्यार्थ के अतिरिक्त और कोई उदाहरण नहीं है, उदाहरण के बिना हेतु नहीं बनता । दूसरे, प्रतिज्ञा का एकदेशवाक्य उदाहरण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता; क्योंकि साध्य उदाहरण नहीं हुआ करता । यहाँ साध्य सत् कहीं नित्य है, कहीं अनित्य, अतः वह एकान्ततः अनित्य नहीं बन सकता । अतः 'सद्भाव से सभी अनित्य होने लगेंगे'—यह मत अर्थशून्य ही है । सभी भावों में सद्भावोपपत्ति द्वारा अनित्यत्व मानने से शब्द का अनित्यत्व भी सिद्ध होता है, अतः उसके लिये उक्त प्रतिषेध करना कठिन होगा ॥ २४ ॥ अब 'उपपत्तिसम' का लक्षण करते हैं— दोनों कारणों की उपपत्ति से 'उपपत्तिसम' दोष कहलाता है ॥ २५ ॥ यदि शब्द का अनित्यत्व कारण उपपन्न होने से वह अनित्य है तो उसका अस्पर्श होने से नित्यत्व कारण भी उपपन्न हो सकता है, यों दोनों कारणों—नित्यत्व, अनित्यत्व— की उपपत्ति से एकतर पक्ष सिद्ध नहीं होता, यह प्रतिषेध 'उपपत्तिसम' कह- लाता है ॥ २५ ॥ इसका समाधान—

२८. सू० ] उपलब्धिसमप्रकरणम् ३५९

२८. सू० ] उपलब्धिसमप्रकरणम् ३५९ उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः ॥ २६ ॥ 'उभयकारणोपपत्तेः' इति ब्रुवता नानित्यत्वकारणोपपत्तेरनित्यत्वं प्रति- षिध्यते, यदि प्रतिषिध्यते, नोभयकारणोपपत्तिः स्यात्। उभयकारणोपपत्ति- वचनादनित्यकारणोपपत्तिरभ्यनुज्ञायते, अभ्यनुज्ञानादनुपपन्नः प्रतिषेधः। व्याघातात् प्रतिषेध इति चेत् ? समानो व्याघातः। एकस्य नित्यत्वानित्यत्व- प्रसङ्गं व्याहतं ब्रुवतोक्तः प्रतिषेध इति चेत् ? स्वपक्षपरपक्षयोः समानो व्याघातः। स च नैकतरस्य साधक इति ॥ २६ ॥ उपलब्धिसमप्रकरणम् [ २७-२८ ] निर्दिष्टकारणाभावेऽप्युपलम्भादुपलब्धिसमः ॥ २७ ॥ निर्दिष्टस्य प्रयत्नानन्तरीयकत्वस्यानित्यत्वकारणस्याभावेऽपि वायुनोदनाद् वृक्षशाखाभङ्गस्य शब्दस्यानित्यत्वमुपलभ्यते। निर्दिष्टस्य साधनस्याभावेऽपि साध्यधर्मोपलब्ध्या प्रत्यवस्थानम्—अनुपलब्धिसमः ॥ २७ ॥ अस्योत्तरम्— कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २८ ॥ 'प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्'—इति ब्रुवता कारणत उत्पत्तिरभिधीयते, न कार्यस्य उपपत्तिकारण की स्वीकृति से उक्त प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २६ ॥ 'दोनों कारणों की उपपत्ति से' ऐसा कहनेवाले का अनित्यत्वकारणोपपत्ति की मान्यता से अनित्यत्व प्रतिषिद्ध नहीं होता। यदि प्रतिषिद्ध होता है तो 'उभयकारणो- पपत्ति' नहीं बनेगी; क्योंकि उभयकारणोपपत्ति से आप अनित्यत्वकारणोपपत्ति स्वीकार करते ही हैं, इस स्वीकृति से प्रतिषेध नहीं बनता। एक ही में नित्यत्व तथा अनित्यत्व बताकर वचनविरोध द्वारा उक्त प्रतिषेध किया जा रहा है—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि उक्त वचनविरोध स्वपक्ष-परपक्ष में समान ही है, वह किसी एक पक्ष का साधक नहीं हो सकता ॥ २६ ॥ अब 'उपलब्धिसम' का लक्षण करते हैं— निर्दिष्ट कारण का अभाव होने पर भी उपलब्धि से 'उपलब्धिसम' प्रतिषेध कहलाता है ॥ २७ ॥ शब्द में प्रयत्नानन्तरीयकत्वरूप निर्दिष्ट अनित्यत्वकारण का अभाव होने पर भी वायुप्रेरित वृक्ष की शाखा के टूटने से जो शब्द होता है उसकी तरह उसका अनित्यत्व उपलब्ध होता है, अतः निर्दिष्ट साधन के अभाव में भी साध्यधर्मोपलब्धि से प्रतिषेध 'उपलब्धिसम' कहलाता है ॥ २७ ॥ इसका उत्तर है— कारणान्तर द्वारा उस धर्म की उपपत्ति होने से ( उसी की सिद्धि होती है, अतः उक्त) प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २८ ॥ शब्दानित्यत्वप्रसंग में 'प्रयत्नानन्तरीयकत्व' हेतु से जो सिद्ध किया है उसमें कारण