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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वप्रकरणम् २७३

७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वप्रकरणम् २७३ चेदं यत्नमन्तरेण चेतनानां सुखदुःखव्यवस्थानम्, तेनापि चेतनगुणान्तरव्यव- स्थाकृतेन भवितव्यमित्यनुमानम् । तदेतदकर्मनिमित्ते सुखदुःखयोगे विरुध्यते इति । तच्च गुणान्तरमसंवेद्यत्वाददृष्टं विपाककालनियमाच्चाव्यवस्थितम् । बुद्ध्यादयस्तु संवेद्याश्चापवर्गिणश्चेति । अथागमविरोधः—बहु खल्विदमार्षमृषीणामुपदेशजातमनुष्ठानपरिवर्जना- श्रयमुपदेशफलं च । शरीरिणां वर्णाश्रमविभागेनानुष्ठानलक्षणा प्रवृत्तिः, परि- वर्जनलक्षणा निवृत्तिः । तच्चोभयमेतस्यां दृष्टौ, नास्ति कर्म सुचरितं दुश्चरितं वा, कर्मनिमित्तः पुरुषाणां सुखदुःखयोग इति विरुध्यते । सेयं पापिष्ठानां मिथ्यादृष्टिः—'अकर्मनिमित्ता शरीरसृष्टिः, अकर्मनिमित्तः सुखदुःखयोगः' इति ॥ ७२ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ❀ समाप्तश्चायं तृतीयोऽध्यायः ❀ छुटकारा पा जाता है, दूसरा नहीं पाता । हाँ, कभी-कभी प्रत्यक्षतः पुरुषप्रयत्न के बिना हो अतर्कित सुख-दुःख उपस्थित हो जाते हैं, इस प्रसङ्ग में यही अनुमान करना पड़ता है कि यह अतर्कित सुख-दुःख भी इस चेतन के किसी अन्य गुणविशेष के कारण उपपन्न हुआ है । यह अनुमान अकर्मनिमित्तक सृष्टि मानने पर नहीं बन सकता । यह अतर्कित सुखदुःखोत्पादक पुरुषगुणान्तर न प्रत्यक्ष है, न क्षणिक, अपितु बुद्ध्यादि पुरुषगुणों की तरह विलक्षण है; क्योंकि यह अदृष्ट गुणविशेष असंवेद्य है, परन्तु विपाककालनियम से बँधा हुआ नहीं है । जैसे बुद्ध्यादि मात्र संवेद्य भी हैं, तथा विनाशी भी ।- ३. आगमप्रमाण-विरोध, जैसे—यह हमारा साङ्गोपाङ्ग ऋषिप्रणीत धर्मशास्त्र, जिसमें ऋषियों के विधिनिषेधपरक उपदेश भरे पड़े हैं, तथा उन उपदेशों पर आचरण करने वालों के दृष्टान्त भी वर्णित हैं ! इन शास्त्रों में प्राणियों के लिये वर्णाश्रमभेद से विधिपरक प्रवृत्ति तथा निषेधपरक निवृत्ति दिखायी गयी हैं । यह प्रवृत्ति-निवृत्ति अकर्म- निमित्तक सृष्टि माननेवालों के मत में कैसे बनेगी; क्योंकि इनके मत में शुभाचरण या दुराचरण रूप कोई कर्म नहीं कि जिसका फल मिले, जब कि सुकर्म तथा निमित्त से ही सुख-दुःखोत्पत्ति होती हुई देखी जाती है । अतः 'शरीरोत्पत्ति अकर्मनिमित्तक है, सुख-दुःखसम्बन्ध भी अकर्मनिमित्तक है'— यह मिथ्यादृष्टि अतिशयेन पापपङ्कनिमग्न पुरुषों को ही हो सकती है, शास्त्रप्रमाणसम्पन्न आस्तिकजन तो समग्र सृष्टि को कर्मनिमित्तक ही मानते हैं, अतः उनके मत में कर्मों के क्षीण होने से अत्यन्तापवर्ग सम्पन्न होना उचित ही है ॥ ७२ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में तृतीय अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ तृतीय अध्याय भी समाप्त ❀ न्या० द० : १८

प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ १-२ ]

अथ चतुर्थोऽध्यायः [ प्रथममाह्निकम् ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ १-२ ] मनसोऽनन्तरा प्रवृत्तिः परीक्षितव्या । तत्र खलु यावद्धर्माधर्माश्रयशरीरादि परीक्षितम्, सर्वा सा प्रवृत्तेः परीक्षैत्याह— प्रवृत्तिर्यथोक्ता¹ ॥ १ ॥ तथा परीक्षितेति ॥ १ ॥ प्रवृत्त्यनन्तरास्तर्हि दोषाः परीक्ष्यन्ताम् ? इत्यत आह— तथा दोषाः ॥ २ ॥ परीक्षिता इति । बुद्धिसमानाश्रयत्वादात्मगुणाः प्रवृत्तिहेतुत्वात् पुनर्भव- प्रतिसन्धानसामर्थ्याच्च संसारहेतवः, संसारस्यानादित्वादनादिना प्रबन्धेन उद्देशसूत्र (१.१.९) में मन के बाद प्रवृत्ति का नाम गिनाया गया है, अतः मन की परीक्षा के बाद 'प्रवृत्ति' की परीक्षा किया जाना आवश्यक है । परन्तु पीछे जो धर्म, तथा अधर्म के आश्रयभूत शरीरादि की परीक्षा की गयीं, वे सब एक तरह से 'प्रवृत्ति' की ही परीक्षा हैं; क्योंकि प्रवृत्ति धर्माधर्मान्तःपाती है। अतः धर्माधर्म की परीक्षा से उसकी भी परीक्षा हो ही गयी—इसी आशय को लेकर (सूत्रकार) कहते हैं प्रवृत्ति (शरीरादि की परीक्षा) जैसे पीछे वर्णित की जा चुकी है ॥ १ ॥ उस वर्णन से ही उसका परीक्षा हो चुकी । ( पीछे हम जैसा उसका लक्षण कर आये हैं, उस लक्षण के सहारे जो कुछ भी हम प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर उसके वारे में कह चुके हैं, उसीसे इस ( प्रवृत्ति ) पर अच्छी तरह विचार किया जा चुका ) ॥ १ ॥ तो फिर प्रवृत्ति के बाद परिगणित दोषों की ही परीक्षा कर लें ? इस पर कहते हैं— उसी तरह दोष भी ॥ २ ॥ परीक्षित हो चुके । दोषों के प्रवृत्तितुल्य होने से पूर्वपरीक्षा से दोषों की भी परीक्षा हो चुकी । कहने का तात्पर्य यह है कि दोष बुद्धि के समानाश्रय हैं, यों वे भी आत्मगुण होते हुए प्रवृत्ति के हेतु हैं, और पुनर्जन्म की प्रतिसन्धि कराने में सामर्थ्य रखते हैं, अतः वे भी संसार के हेतु हैं, तथा संसार के अनादि होने से दोष भी अनादि सन्तानरूप १. वार्त्तिककारास्तु सूत्रोक्तं यथाशब्दं द्वितीयसूत्रस्थेन 'तथा' शब्देन योजयन्ति । 'प्रवृत्तिर्यथोक्ता' तथा दोषा अपि इति तस्य हृदयम् ।

३. सू० ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् २७५

३. सू० ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् २७५ प्रवर्त्तन्ते; मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तत्त्वज्ञानात्, तन्निवृत्तौ रागद्वेषप्रबन्धोच्छेदेऽपवर्ग इति प्रादुर्भावतिरोधानधर्माणः—इत्येवमाद्युक्तं दोषाणामिति ॥ २ ॥ दोषत्रैराश्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ३-८ ] ‘प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः’ ( १. १. १८ ) इत्युक्तम्, तथा चेमे मानेर्ष्यासूया- विचिकित्सामत्सरादयः, ते कस्मान्नोपसङ्ख्यायन्ते ? इत्यत आह— तत्त्रैराश्यं रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् ॥ ३ ॥ तेषां दोषाणां त्रयो राशयः, त्रयः पक्षाः । रागपक्षः—कामो मत्सरः स्पृहा तृष्णा लोभ इति; द्वेषपक्षः—क्रोध ईर्ष्या असूया द्रोहोऽमर्ष इति; मोहपक्षः— मिथ्याज्ञानं विचिकित्सा मानः प्रमाद इति; त्रैराश्यान्नोपसंख्यायन्ते इति । लक्षणस्य तर्ह्यर्थभेदात्त्रित्वमनुपपन्नम् ? रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् नानुप- पन्नम् । आसक्तिलक्षणो रागः, अमर्षलक्षणो द्वेषः, मिथ्याप्रतिपत्तिलक्षणो मोह इति । एतत्प्रत्यात्मवेदनीयं सर्वशरीरिणाम् । विजानात्ययं शरीरी रागमुत्पन्नम्— से प्रवृत्त होते रहते हैं । (यों दोष प्रादुर्भाव-धर्म वाले हैं । उधर) तत्त्वज्ञान से मिथ्या- ज्ञान की निवृत्ति होती है, मिथ्याज्ञान-निवृत्ति से रागद्वेषसन्तति की उच्छेद हो जाता है, इस उच्छेद हेतु से अपवर्ग हो जाता है ! इस तरह दोष प्रादुर्भाव-विनाशवाले हैं । प्रसङ्ग-प्रसङ्ग (१. १. २, १. १. १८, ३. १. २५) पर जो कुछ दोषों के बारे में कहा जा चुका है वह सब इनकी परीक्षा ही समझी जानी चाहिये ॥ २ ॥ पीछे आप कह आये हैं कि 'दोष प्रवृत्ति के हेतु हैं' (१. १. १८) तो जब मान, ईर्ष्या, असूया, विचिकित्सा, मत्सर-आदि भी प्रवृत्ति के हेतु हैं; फिर इनकी गणना क्यों नहीं की गयी ? इस पर कहते हैं— राग, द्वेष तथा मोह—इस भेद से उस दोष के तीन समूह हैं ॥ ३ ॥ उन दोषों तीन राशियां, तीन वर्ग हैं । १. रागपक्ष में, जैसे—काम, मत्सर, स्पृहा, तृष्णा तथा लोभ—इनका परिगणन होता है । २. द्वेषपक्ष में, जैसे—क्रोध, ईर्ष्या, असूया, द्रोह तथा अमर्ष (—इनका परिगणन होता है) । ३. मोहपक्ष में, जैसे—मिथ्या- ज्ञान, विचिकित्सा, मान तथा प्रमाद ( —इनका परिगणन होता है ) । इस त्रिराशि के कारण ही उक्त सब का परिगणन नहीं किया गया । इस तरह तो लक्षण का भेद न होने से उक्त बहुविधत्व की तरह त्रित्व भी नहीं बनेगा ? क्यों नहीं बनेगा, जब कि राग द्वेष तथा मोह में अर्थभेद है । राग कहते हैं वस्तु में आसक्ति को । द्वेष कहते हैं किसी वस्तु में असहिष्णुतारूप अमर्ष को । तथा मोह मिथ्याज्ञान कहलाता है । यह प्राणी, जब इसे राग उत्पन्न होता है तो जानता है कि CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ १. आ० अस्ति मेऽध्यात्मं रागधर्म इति, विरागं च विजानाति-नास्ति मेऽध्यात्मं रागधर्म इति । एवमितरयोरपीति । मानेर्ष्यासूयाप्रभृतयस्तु त्रैराश्यमनुपतिता इति नोप- संख्यायन्ते ॥ ३ ॥ न; एकप्रत्यनीकभावात् ? ॥ ४॥ नार्थान्तरं रागादयः, कस्मात् ? एकप्रत्यनीकभावात् । तत्त्वज्ञानम् = सम्य- ङ्ग्मतिः, आर्यप्रज्ञा, सम्बोधः-इत्येकमिदं प्रत्यनीकं त्रयाणामिति ? ॥ ४ ॥ व्यभिचारादहेतुः ॥ ५ ॥ एकप्रत्यनीकाः पृथिव्यां श्यामादयोऽग्निसंयोगेनैकेन, एकयोनयश्च पाकजा इति ॥ ५ ॥ सति चार्थान्तरभावे— तेषां मोहः पापीयान्, नामूढस्येतरोत्पत्तेः ॥ ६ ॥ मोहः पापः, पापत्तरो वा द्वावभिप्रेत्योक्तम्, कस्मात् ? नामूढस्येतरोत्पत्तेः । अमूढस्य रागद्वेषौ नोत्पद्येते, मूढस्य तु यथासङ्कल्पमुत्पत्तिः । विषयेषु रञ्ज- उसके मन में रागधर्म उत्पन्न हो गया है। जब इसे वैराग्य होता है तब भी जानता है कि उसके मन में अब रागधर्म नहीं है। इसी तरह द्वेष तथा मोह के वारे में भी सम- झना चाहिये। मान, ईर्ष्या, तथा असूया-आदि इसी समूह में अन्तर्भूत हो जाते हैं— अतः उनकी पृथक् गणना नहीं की गयी ॥ ३ ॥ उनका एक ही विरोधी होने से अर्थभेद नहीं है ? ॥ ४ ॥ रागादि अर्थान्तर नहीं हैं; क्योंकि उनका एक ही विरोधी है। तत्त्वज्ञान अर्थात् यथार्थमति, आर्यप्रज्ञा या सम्यग्बोध—यह एक इन तीनों का ही विरोधी है ॥ ४ ॥ व्यभिचारी होने से उक्त हेतु नहीं बनता ॥ ५ ॥ एकप्रत्यनीकत्व हेतु व्यभिचारी है; क्योंकि एकप्रत्यनीकत्व से किसी का नानात्व नष्ट नहीं हुआ करता; जैसे—पृथिवी में श्यामादि गुण एक ही अग्निसंयोग से नष्ट हो जाते हैं, तो क्या उनमें नानात्व न माना जाये ! इसी तरह रूपादि गुण पाकरूपैककारणजन्य हैं, तो क्या उन सब में एकत्व मान लिया जाये ! ॥ ५ ॥ यों अर्थान्तर सिद्ध करने के बाद कहते हैं— उन तीनों में मोह अधिक अनर्थ की जड़ है; क्योंकि अमूढ को रागद्वेष नहीं हुआ करते ॥ ६ ॥ रागद्वेष की अपेक्षा से अतिशयबोधन के लिये मोह को पापतर कहा गया है; क्योंकि मोहरहित को रागद्वेष नहीं हुआ करते। मोहसम्पन्न को संकल्पानुसार रागद्वेष

१. सू० ] दोषत्रैराश्यप्रकरणम् २७७

१. सू० ] दोषत्रैराश्यप्रकरणम् २७७ नीयाः सङ्कल्पा रागहेतवः, कोपनीयाः सङ्कल्पा द्वेषहेतवः, उभये च सङ्कल्पा न मिथ्याप्रतिपत्तिलक्षणत्वान्मोहादन्ये, ताविमौ मोहयोनी रागद्वेषाविति । तत्त्वज्ञानाच्च मोहनि वृत्तौ रागद्वेषानुत्पत्तिरित्येकप्रत्यनीकाभावोपपत्तिः । एवं च कृत्वा तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्गः' ( १. १.. २ ) इति व्याख्यातमिति ॥ ६ ॥ प्राप्तस्तर्हि— निमित्तनैमित्तिकभावादर्थान्तरभावो दोषेभ्यः ? ॥ ७ ॥ अन्यद्धि निमित्तम्, अन्यच्च नैमित्तिकमिति दोषनिमित्तत्वाददोषो मोह इति ? ॥ ७ ॥ न; दोषलक्षणावरोधान्मोहस्य ॥ ८ ॥ 'प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः' ( १. १. १८ ) इत्यनेन दोषलक्षणेणावरुध्यते दोषेषु मोह इति ॥ ८ ॥ निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च तुल्यजातीयानामप्रतिषेधः ॥ ९ ॥ की उत्पत्ति हो जाती है । विषयों में रागविषयक सङ्कल्प रागहेतु हैं, कोपविषयक संकल्प द्वेष हेतु हैं । ये दोनों ही प्रकार के संकल्प मिथ्याज्ञानरूप होने से वस्तुतः मोह से अतिरिक्त नहीं हैं, अतः मोह के कारण ही ये रागद्वेष होते हैं । तत्त्वज्ञान से मोह निवृत्त होने पर रागद्वेष भी नहीं होते —यों एकविरोधिभाव भी बन जाता है । इसी अर्थ का समर्थक पूर्वसूत्र—तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों में से उत्तरोत्तर के नष्ट हो जाने पर उससे पीछे वाले के न होने से अपवर्ग हो जाता है' ( १. १. २) है, जिसकी विस्तृत व्याख्या पीछे यथास्थान की जा चुकी है ॥६॥ तब तो मोह का— निमित्त-नैमित्तिकभाव होने के कारण दोषों से अर्थान्तरत्व ॥ ७ ॥ प्राप्त हुआ ? 'कारण कार्य से भिन्न होता है' यह सभी मानते हैं । इस तरह मोह यदि दोषों का निमित्त कारण है तो वह उनसे भिन्न होगा, तब मोह में दोषत्व कैसे रहेगा ? ॥ ७ ॥ मोह के दोषलक्षणों में जकड़ा रहने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ८ ॥ 'दोष प्रवृत्ति के हेतु हैं' ( १. १. १८ ) इस दोषलक्षण के मोह में भी घट जाने से यह भी दोषों में ही परिगणित हैं ॥ ८ ॥ निमित्त-नैमित्तिकोपपादन से तुल्यजातियों का प्रतिषेध नहीं होता ॥ ९ ॥

प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् [ १०-१३ ]

२७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० द्रव्याणां गुणानां वाऽनेकविधविकल्पो निमित्तनैमित्तिकभावे तुल्यजातीयानां दृष्ट इति ॥ ९ ॥ प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् [ १०-१३ ] दोषानन्तरं प्रेत्यभावः। तस्यासिद्धिः, आत्मनो नित्यत्वात्। न खलु नित्यं किञ्चिज्जायते म्रियते वा इति जन्ममरणयोर्नित्यत्वादात्मनोऽनुपपत्तिः, उभयं च प्रेत्यभाव इति ? तत्रायं सिद्धानुवादः— आत्मनित्यत्वे प्रेत्यभावसिद्धिः ॥ १० ॥ नित्योऽयमात्मा प्रैति—पूर्वशरीरं जहाति, म्रियते इति; प्रेत्य च पूर्वशरीरं हित्वा भवति = जायते, शरीरान्तमुपादत्त इति। तच्चैतदुभयम् 'पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः' ( १. १. १९ ) इत्यत्रोक्तम्—'पूर्वशरीरं हित्वा शरीरान्तरोपादानं प्रेत्यभावः' इति। तच्चैतन्नित्यत्वे सम्भवतीति। यस्य तु सत्त्वोत्पादः सत्त्वनिरोधः प्रेत्यभावः, तस्य कृतहानमकृताभ्यागम श्च दोषः। उच्छेदहेतुवादे ऋष्युपदेशाश्चानर्थका इति ॥ १० ॥ तुल्यजातीय द्रव्यों तथा गुणों के पारस्परिक निमित्त-नैमित्तिक भाव में अनेक तरह का विकल्प देखा जाता है। अतः निमित्तनैमित्तिकभाव से मोह को दोष न मानना युक्त नहीं ॥ ९ ॥ दोष के बाद क्रमोपात्त प्रेत्यभाव की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है— शङ्का—आत्मा के नित्य होने से प्रेत्यभाव नहीं बनता; क्योंकि जो नित्य है उसका न जन्म होता है न मरण। आत्मा के नित्य होने से उसमें जन्म-मरणरूप प्रेत्यभाव की उत्पत्ति नहीं बनती ? इसका सिद्धान्तवर्णन यह है— आत्मा के नित्य होने पर भी प्रेत्यभाव सिद्ध है ॥ १० ॥ यह नित्य आत्मा प्रयाण करता है अर्थात् पूर्व शरीर को छोड़ देता है ( मर जाता है )। प्रयाण करके पूर्व शरीर को छोड़कर पुनः होता है, उत्पन्न होता है, शरीरान्तर को ग्रहण करता है। ये दोनों बातें—'पुनरुत्पत्ति प्रेत्यभाव कहलाती हैं' ( १.१.१९ ) इस सूत्र में कह आये हैं कि पूर्व शरीर को छोड़ कर शरीरान्तर का ग्रहण करना 'प्रेत्य- भाव' कहलाता है। यह बात आत्मा को नित्य मानने पर ही बन पाती है। जो यह मानता है कि सत्त्व ( शरीर ) का नितान्त उत्पाद तथा नितान्त नाश प्रेत्यभाव' है, उसके मत में कृतहान तथा अकृताभ्यागम दोष होने लगेंगे। इस उच्छेद- वाद में धर्मशास्त्रोक्त विधि-निषेधवाक्यों की क्या आवश्यकता रह जायगी ! जब उस सत्त्व का नितान्त नाश ही होना है और वह होना निश्चित है, तो वह सुकर्म तथा धर्माचरण के लिए क्यों प्रयास करेगा ! ॥ १० ॥

१२. सू० ] प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २७९

१२. सू० ] प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २७९ कथमुत्पत्तिरिति चेत् ? व्यक्ताद् व्यक्तानाम्; प्रत्यक्षप्रामाण्यात् ॥ ११ ॥ केन प्रकारेण किन्धर्मकात् कारणाद्व्यक्तं शरीराद्युत्पद्यत इति ? व्यक्ताद् भूतसमाख्यातात् पृथिव्यादितः परमसूक्ष्मान्नित्याद्व्यक्तं शरीरेन्द्रियविषयोपकर- णाधारं प्रज्ञातं द्रव्यमुत्पद्यते । व्यक्तं च खल्विन्द्रियग्राह्यं तत्सामान्यात् कारण- मपि व्यक्तम् । किं सामान्यम् ? रूपादिगुणयोगः । रूपादिगुणयुक्तेभ्यः पृथिव्या- दिभ्यो नित्येभ्यो रूपादिगुणयुक्तं शरीराद्युत्पद्यते । प्रत्यक्षप्रामाण्यात् । दृष्टो हि रूपादिगुणयुक्तेभ्योमृत्प्रभृतिभ्यस्तथाभूतस्य द्रव्यस्योत्पादः, तेन चादृष्टस्या- नुमानमिति । रूपादीनान्वयदर्शनात् प्रकृतिविकारयोः, पृथिव्यादीनां नित्या- नामतीन्द्रियाणां कारणभावोऽनुमीयत इति ॥ ११ ॥ न; घटाद् घटानिष्पत्तेः ? ॥ १२ ॥ इदमपि प्रत्यक्षम्-न खलु व्यक्ताद् घटाद्व्यक्तो घट उत्पद्यमानो दृश्यते इति, व्यक्ताद् व्यक्तस्यानुत्पत्तिदर्शनान्न व्यक्तं कारणमिति ? ॥ १२ ॥ तो वह उत्पत्ति कैसे होती है ? व्यक्त से व्यक्त की ( उत्पत्ति होती है );प्रत्यक्षप्रामाण्य होने से ॥ ११ ॥ किस प्रकार से किस धर्म वाले कारण से व्यक्त शरीरादि उत्पन्न होते हैं ? 'भूत' इस संज्ञा से प्रसिद्ध व्यक्त पृथिव्यादि नित्य सूक्ष्म परमाणु द्रव्यों से शरीर, इन्द्रिय तथा अन्य अवयवों को धारण करने वाला व्यक्त ( स्थूल ) द्रव्य उत्पन्न होता है। यह व्यक्त इन्द्रियग्राह्य है। यहाँ कारण तथा कार्य में साधारणता होने से पृथिव्यादि परमाणु कारण भी व्यक्त ही कहलाता है। यह साधारणता क्या है ? रूपादिगुण-संयुक्त नित्य पृथिव्यादि परमाणुओं से रूपादिगुणयुक्त शरीरादि उत्पन्न होते हैं। हमारी इस युक्ति में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। रूपादिगुणयुक्त मृत्तिका आदि से रूपादिगुणयुक्त घटादि द्रव्य की उत्पत्ति देखी जाती है। वहाँ जो अवयव प्रत्यक्ष नहीं हैं, उसका अनुमान कर लेते हैं। प्रकृति-विकार में रूपादि का सम्बन्ध देखा जाने से नित्य पृथिव्यादि अतीन्द्रिय परमाणुरूप कारण का अनुमान कर लिया जाता है ॥ ११ आपका मत ठीक नहीं; क्योंकि लोक में घट से घट की निष्पत्ति नहीं देखी जाती ? ॥ १२ ॥ यह बात तो प्रत्यक्षसिद्ध है कि व्यक्त घट से व्यक्त घट की उत्पत्ति नहीं हुआ करती, यों व्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति न देखे जाने से व्यक्त इस सृष्टि का कारण नहीं हो सकता ? ॥ १२ ॥

२८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० व्यक्ताद् घटनिष्पत्तेरप्रतिषेधः ॥ १३ ॥ न ब्रूमः—'सर्वं सर्वस्य कारणम्' इति, किन्तु 'यदुत्पद्यते व्यक्तं द्रव्यम्, तत्त- थाभूतादेवोत्पद्यते' इति । व्यक्तं च तन्मृद् द्रव्यं कपालसंज्ञकं यतो घट उत्पद्यते । न चैतन्निह्नुवानः क्वचिदभ्यनुज्ञां लब्धुमर्हतीति । तदेतत् तत्त्वम् ॥ १३ ॥ अतः परं प्रावादुकानां दृष्टयः प्रदर्श्यन्ते— शून्यतोपादाननिराकरणप्रकरणम् [ १४–१८ ] अभावाद्भावोत्पत्तिः, नानुपमृद्य प्रादुर्भावात् ? ॥ १४ ॥ असतः सदुत्पद्यते इत्ययं पक्षः, कस्मात् ? उपमृद्य प्रादुर्भावात् । उपमृद्य बीजमङ्कुर उत्पद्यते नानुपमृद्य, न चेद्बीजोपमर्दोऽङ्कुरकारणम्, अनुपमर्देऽपि बीजस्याङ्कुरोत्पत्तिः स्यादिति ? ॥ १४ ॥ अत्राभिधीयते— व्याघातादप्रयोगः ॥ १५ ॥ उपमृद्य प्रादुर्भावादित्ययुक्तः प्रयोगः, व्याघातात् । यदुपमृद्नाति न तदुपमृद्य व्यक्त से घटनिष्पति न देखे जाने से हमारा मत खण्डित नहीं होता ॥ १३ ॥ हम नहीं कहते कि 'सव सबके कारण हैं', किन्तु 'जो व्यक्त द्रव्य उत्पन्न होता है, वह वैसे ही व्यक्त कारण से उत्पन्न होता है । जैसे कपालसंज्ञक मृत्पदार्थ व्यक्त ही है, जिससे घटनिष्पत्ति हुई है । इस बात को छिपाकर आप हमसे अपनी बात नहीं मनवा सकते ॥ १३ ॥ आगे कुछ भिन्नमतावलम्बी दार्शनिकों के मत-मतान्तरों पर विचार किया जा रहा है [ सर्वप्रथम शून्यवादी बौद्धों के मत पर विचार किया जा रहा है ]— अभाव से भाव ( कार्य ) की उत्पत्ति होती है; क्योंकि विना विनाश हुए उत्पत्ति नहीं होती ॥ १४ ॥ 'असत् से सत् उत्पन्न होता है' यह भी एक दार्शनिक दृष्टि है । इसमें वे हेतु देते हैं कि विना विनाश हुए उत्पत्ति नहीं हो पाती । इसमें दृष्टान्त है—बीज के विनष्ट होने से ही उसमें से अंकुर उत्पन्न होता है न कि बिना विनष्ट हुए । यदि बीजविनाश अङ्कुर का कारण न होता तो भाण्डागार (गोदामों) में पड़े बीजों से भी उत्पत्ति हो जानी चाहिये ? ॥ १४ ॥ इसका उत्तर यह है— वचनविरोध होने से यह 'अभाव से भावोत्पत्ति' प्रयोग उचित नहीं ॥ १५ ॥ 'विनष्ट होकर प्रादुर्भूत होता है'—यह बात परस्पर विरुद्ध होने से अयुक्त है । जो

१८. सू० ] प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २८१

१८. सू० ] प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २८१ प्रादुर्भवितुमर्हति; विद्यमानत्वात् । यच्च प्रादुर्भवति न तेनाप्रादुर्भूतेनाविद्य- मानेनोपमर्द इति ॥ १५ ॥ न; अतीतानागतयोः कारकशब्दप्रयोगात् ? ॥ १६ ॥ अतीते चानागते चाविद्यमाने कारक शब्दाः प्रयुज्यन्ते । पुत्रो जनिष्यते, जनिष्यमाणं पुत्रमभिनन्दति, पुत्रस्य जनिष्यमाणस्य नाम करोति; अभूत्कुम्भः, भिन्नं कुम्भमनुशोचति, भिन्नस्य कुम्भस्य कपालानि, अजाताः पुत्राः पितरं ताप- यन्ति—इति बहुलं भाक्ताः प्रयोगा दृश्यन्ते । का पुनरियं भक्तिः ? आनन्तर्यं भक्तिः, आनन्तर्यसामर्थ्यादुपमृद्य प्रादुर्भा- वार्थः—प्रादुर्भविष्यन्नङ्कुर उपमृद्नातीति भाक्तं कर्तृत्वमिति ॥ १६ ॥ न; विनष्टेभ्योऽनिष्पत्तेः ॥ १७ ॥ न विनष्टाद् बीजादङ्कुर उत्पद्यते इति तस्मान्नाभावाद्भावोत्पत्तिरिति ॥१७॥ क्रमनिर्देशादप्रतिषेधः ॥ १८ ॥ उपमर्दप्रादुर्भावयोः पौर्वापर्यनियमः क्रमः । स खल्वभावाद्भावोत्पत्तेर्हेतुर्नि- र्दिश्यते, स च न प्रतिषिध्यते इति । व्याहतव्यूहानामवयवानां पूर्वव्यूहनिवृत्तौ बीज का नाश करता है वह नष्ट होकर पुनः प्रादुर्भूत नहीं हो सकता; क्योंकि वह तो विद्यमान है । तथा जो प्रादुर्भूत होता है वह अप्रादुर्भूत द्रव्य अविद्यमान होने से बीज को विनष्ट कैसे करेगा ! ॥ १५ ॥ नहीं; अतीतानागतकाल में भी कारक शब्द का प्रयोग देखा जाता है ? ॥ १६ ॥ भूत तथा भविष्यत् में, जो कि वर्तमान नहीं है, उनके बारे में भी कारकशब्दों का प्रयोग दिखायी देता है ! जैसे—'उसको पुत्र होगा', 'होने वाले पुत्र के लिए वह खुशियाँ मना रहा हैं' 'पैदा होने वाले पुत्र का नाम रख रहा हैं'; या 'घट विनष्ट हो गया' 'विनष्ट घट के विषय में सोच रहा हैं' 'ये उस विनष्ट घट के खण्ड हैं' 'पैदा न हुए पुत्र पितृगण को कष्ट देते हैं'—आदि बहुत से भाक्त प्रयोग लोक में देखे जाते हैं । यह भक्ति क्या है ? आनन्तर्य (अव्यवधान) को भक्ति कहते हैं । इस आनन्तर्य के सामर्थ्य से ही 'विनष्ट होकर प्रादुर्भूत'—यह बोला जाता है । 'प्रादुर्भूत होनेवाला अङ्कुर ( बीज को ) विनष्ट कर रहा है, ऐसा यह आरोपित कर्तृ प्रयोग है ? ॥ १६ ॥ नहीं; क्योंकि विनष्ट से उत्पत्ति नहीं होती ॥ १७ ॥ विनष्ट बीज से अङ्कुर उत्पन्न नहीं हुआ करता, अतः अभाव से भाव की उत्पत्ति- वाला सिद्धान्त उचित नहीं ॥ १७ ॥ ( उक्त सिद्धान्त में ) क्रमनिर्देशक का प्रतिषेध नहीं ॥ १८ ॥ विनाश-प्रादुर्भाव में जो पौर्वापर्यनियम है वही 'क्रम' कहलाता है । यह क्रम उक्त वादी ने 'अभाव से भाव की उत्पत्ति' सिद्धान्त में हेतु बताया, उस क्रम को हम स्वीकार करते हैं । परन्तु उस क्रम के सहारे अभाव से भावोत्पत्ति हम नहीं मानते । किन्तु उस हेतु के CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०- व्यूहान्तराद् द्रव्यनिष्पत्तिः, नाभावात् । बीजावयवाः कुतश्चिन्निमित्तात् प्रादुर्भूत- क्रियाः पूर्वव्यूहं जहति व्यूहान्तरं चापद्यन्ते, व्यूहान्तरादङ्कुर उत्पद्यते । दृश्यन्ते खलु अवयवास्तत्संयोगाश्चाङ्कुरोत्पत्तिहेतवः । न चानिवृत्ते पूर्वव्यूहे बीजाव- यवानां शक्यं व्यूहान्तरेण भवितुमित्युपमर्दप्रादुर्भावयोः पौर्वापर्यनियमः क्रमः, तस्मान्नाभावाद्भावोत्पत्तिरिति । न चान्यद् बीजावयवेभ्योऽङ्कुरोत्पत्तिकारण- मित्यपपद्यते बीजोपादाननियम इति ॥ १८ ॥ ईश्वरोपादानताप्रकरणम् [ १९-२१ ] अथापर आह¹— ईश्वरः कारणम्; पुरुषकर्माफल्यदर्शनात् ॥ १९ ॥ पुरुषोऽयं समीहमानो नावश्यं समीहाफलं प्राप्नोति, तेनानुमीयते—'पराधीन पुरुषस्य कर्मफलाराधनम्' इति, यदधीनं स ईश्वरः । तस्मादीश्वरः कारण- मिति ॥ १९ ॥ सहारे हमारे मत में वही बात यों है—विकीर्णाकृतिवाले (व्याहृत रचनावाले) अवयवों की पूर्व आकृति ( रचना ) के निवृत्त होने पर दूसरी आकृति बन जाने पर द्रव्य का प्रादु- र्भाव होता है, न कि अभाव ( उन अवयवों के विनाश ) से । बीज के अवयव किसी विशेषनिमित्त से क्रियाशील होते हुए अपने पूर्व आकार को छोड़ देते हैं तथा दूसरे आका को प्राप्त कर लेते हैं । तब उस दूसरे आकार से अङ्कुर पैदा होता है । लोक में भी अव यव निमित्तविशेष के सम्पर्क से अङ्कुरोत्पत्ति के कारण होते हैं; जब तक अवयवों का पूर्वाकार निवृत्त नहीं होगा तब तक दूसरा आकार बनेगा नहीं, और वे अङ्कुरोत्पत्ति में समर्थ होंगे नहीं—अतः यह पौर्वापर्य क्रम मानना उचित ही है । इस रीति से, अभाव से भावोत्पत्तिवाला बौद्धराद्धान्त उचित नहीं; क्योंकि अङ्कुरोत्पत्ति में बीजावयवों से अतिरिक्त कोई उपादान कारण है नहीं, अतः बीजोपादाननियम उपपन्न हो जाता है ॥ १८ ॥ कुछ दार्शनिक ( वेदान्ती ) कहते हैं— पुरुष-कर्मों का बहुधा नैष्फल्य देखा जाने से ईश्वर ही इस सृष्टि का कारण है ॥१९॥ पुरुष जो कुछ समीहापूर्वक प्रयत्न करता है, हमेशा उस का किया हुआ प्रयत्न पूर्ण नहीं हुआ करता, इससे ज्ञात होता है कि पुरुष का कर्मफल पराधीन है । यह कर्म- फल जिसके अधीन है, वह ईश्वर है । अतः ईश्वर ही इस सृष्टि का कारण है ॥ १९ ॥ १. अस्मिन् प्रकरणव्याख्याने वार्त्तिकतात्पर्यकारयोर्मतवैचित्र्यमस्ति, तच्च तत्रैव टीकयोर्द्रष्टव्यम् । अस्माभिस्तु भाष्यसरणिरेव स्वीकृता ।

१९. सू० ] ईश्वरौपादानताप्रकरणम् २८३

१९. सू० ] ईश्वरौपादानताप्रकरणम् २८३ न; पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्तेः ? ॥ २० ॥ ईश्वराधीना चेत् फलनिष्पत्तिः स्यादपि तर्हि पुरुषस्य समीहामन्तरेण फलं निष्पद्येतेति ? ॥ २० ॥ तत्कारितत्वादहेतुः ॥ २१ ॥ पुरुषकारमीश्वरोऽनुगृह्णाति, फलाय पुरुषस्य यतमानस्येश्वरः फलं सम्पादय- तोति । यदा न सम्पादयति तदा पुरुषकर्माफलं भवतीति । तस्मादीश्वरकारित- त्वादहेतुः—'पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्तेः' इति । गुणविशिष्टमात्मान्तरम् ईश्वरः, तस्यात्मकल्पात्कल्पान्तरानुपपत्तिः। अधर्म- मिथ्याज्ञानप्रमादहान्या धर्मज्ञानसमाधिसम्पदा च विशिष्टमात्मान्तरमीश्वरः, तस्य च धर्मसमाधिफलमणिमाद्यष्टविधमैश्वर्यम् । सङ्कल्पानुविधायी चास्य धर्मः । प्रत्यात्मवृत्तीन् धर्माधर्मसञ्चयान् पृथिव्यादीनि च भूतानि प्रवर्तयति । एवं च स्वकृताभ्यागमस्य लोपेन निर्माणप्राकाम्यमीश्वरस्य स्वकृतकर्मफलं वेदितव्यम् । शङ्का— पुरुषप्रयत्न के विना फलनिष्पत्ति न होने से उक्त कथन युक्त नहीं ? ॥ २० ॥ यदि ईश्वर ही सब कर्मफल देनेवाला हो तो पुरुषप्रयत्न के विना ही फल निष्पन्न हो जाने चाहिये, जबकि लोक में ऐसा देखा नहीं जाता ? ॥ २० ॥ उत्तर— पुरुषकर्म में ईश्वर के सहायक होने से आपका उक्त हेतु नहीं बनता ॥ २१ ॥ पुरुष-प्रयत्न के लिये ईश्वर अनुग्रह ( विनियोग ) करता है। अर्थात् फल के लिये प्रयत्न करते हुए पुरुष के फलप्राप्ति में ईश्वर अनुग्रह करता है, जब प्रयत्न करने पर भी अनुकूल फल नहीं मिलता तो समझना चाहिये ईश्वर का अनुग्रह नहीं है। अतः फल- प्राप्ति में ईश्वर के निमित्त होने से आपका यह हेतु युक्त नहीं कि 'पुरुष प्रयत्न के अभाव में फलनिष्पत्ति नहीं होती'; क्योंकि वहाँ भी ईश्वर कारण है। ईश्वर कौन है ? परमात्मा जीवात्मा से अन्य तथा ( सङ्ख्या-परिमाणादि ) गुणों से युक्त 'ईश्वर' है। यह आत्मजातीय होने से आत्मा की ही कोटि में आता है, अन्य कोटि में नहीं। इस में अधर्म, मिथ्याज्ञान, तथा प्रमाद नहीं होते तथा यह धर्म-ज्ञान-समाधि सम्पत्ति से युक्त होता है, अतः जीवात्मा से भिन्न है। ईश्वर में धर्मसमाधि के फलभूत अणिमादि आठों ऐश्वर्य रहते हैं। सङ्कल्प के अनुसार यह करने, न करने में समर्थ है। यह प्रत्येक आत्मा में रहने वाले धर्म अधर्म को, तथा पृथिव्यादि भूतों को प्रवर्त्तित करता रहता है। इस तरह पुरुष के स्वकृत सिद्धान्त का लोप करता हुआ यह ईश्वर जगन्निर्माण करना चाहता है। यह जगन्निर्माण भी पुरुष के स्वकृत कर्म-फल के लिये ही समझना चाहिये ।

२८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० आप्तकल्पश्चायम् । यथा पिताऽप त्यानाम्, तथा पितृभूत ईश्वरो भूतानाम् । न चात्मकल्पादन्यः कल्पः सम्भवति । न तावदस्य बुद्धिं विना कश्चिद्धर्मो लिङ्ग- भूत: शक्य उपपादयितुम् । आगमाच्च द्रष्टा, बोद्धा, सर्वज्ञाता, ईश्वर इति । बुद्ध्यादिभिश्चात्मलिङ्गैर्निरुपाख्यमीश्वरं प्रत्यक्षानुमानागमविषयातीतं कः शक्त उपपादयितुम् । स्वकृताभ्यागमलोपेन च प्रवर्तमानस्यास्य, यदुक्तम् प्रति- बेधजातमकर्मनिमित्ते शरीरसर्गे, तत्सर्वं प्रसज्यते इति ! ॥ २१ ॥ आकस्मिकत्वनिराकरणप्रकरणम् [ २२-२४ ] अपर इदानीमाह— अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः, कण्टकतैक्ष्ण्यादिदर्शनात् ? ॥ २२ ॥ अनिमित्ता शरीराद्युत्पत्तिः, कस्मात् ? कण्टकतैक्ष्ण्यादिदर्शनात् । कण्टकस्य तैक्ष्ण्यम्, पर्वतधातूनां चित्रता, ग्राव्णां श्लक्ष्णता, निर्निमित्तं चोपादानं दृष्टम्, तथा शरीरादिसर्गोऽपीति ? ॥ २२ ॥ यह ईश्वर आप्त पुरुष की तरह है। जैसे पिता अपने पुत्र के लिये ( पुत्र चाहे या न चाहे ) निःस्वार्थ अनुग्रह करता रहता है, उसी तरह ईश्वर भी इस जगत् के प्राणियों पर अनुग्रह करता रहता है ! इस ईश्वर को आत्म-सजातीय मानने के अतिरिक्त दूसरी कोई कोटि सम्भव नहीं है। इसके अनुमान में बुद्धिगुण के बिना कोई अन्य धर्म लिङ्गभूत उपपन्न नहीं किया जा सकता। शास्त्र भी इसे प्रसंग-प्रसंग पर द्रष्टा, बोद्धा, सर्वज्ञ, ईश्वर—इन विशेषणों से अभिहित करता है। बुद्धिगुण के बिना ये सब विशेषण सम्भव नहीं है। बुद्धि आदि आत्म-गुणों के बिना कौन नीरूप ईश्वर का, जो कि प्रत्यक्ष-अनुमान तथा आगम प्रमाणों से अतीत है, उपपादन कर सकता है ! करुणावशात् स्वकृत सिद्धान्त का विलोप कर प्रवृत्त होने वाले पुरुष के सम्बन्ध में फल की अपेक्षा न करता हुआ यदि यह ईश्वर जगत्सृष्टि में प्रवृत्त होगा तो अकर्मनिमित्तक सृष्टिपक्ष में जो दोष हम पीछे ( ३. २. ७२ में ) कह आये हैं वे सब इसमें भी आ जायेंगे ! अतः यही मानना चाहिये कि परम- कारुणिक होता हुआ भी यह ईश्वर वस्तुस्वभाव के अनुसार विधान करता हुआ धर्मा- धर्म के सहारे से जगद्वैचित्र्य में निमित्तकारण है ॥ २१ ॥ अब दूसरा दार्शनिक ( चार्वाक ) कहता है— कण्टक की तीक्ष्णता आदि देखने से सभी भावों की उत्पत्ति अनैमित्तिक ही है ॥ २२ ॥ शरीरादि की भी उत्पत्ति अनैमित्तिक ही है; क्योंकि लोक में कण्टकादि के तैक्ष्ण्य में कोई निमित्त नहीं दिखायी देता जो उसे किसी साधन से इतना तीक्ष्ण बना दे। जैसे कण्टकादि की तीक्ष्णता, पर्वतों में निकलने वाली धातुओं के नाना प्रकार, स्फटिक आदि शिलाओं की श्लक्ष्णता बिना किसी निमित्त या उपादान कारण के सहारे देखी जाती है, उसी तरह शरीर की उत्पत्ति भी निर्निमित्तक मान लें ? ॥ २२ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२५ सू० ] आकस्मिकत्वनिराकरणप्रकरणम् २८५

२५ सू० ] आकस्मिकत्वनिराकरणप्रकरणम् २८५ अनिमित्तनिमित्तत्वान्नानिमित्तः १ ॥ २३ ॥ अनिमित्ततो भावोत्पत्तिरित्युच्यते, यतश्चोत्पद्यते तन्निमित्तम् । अनिमित्तस्य निमित्तत्वान्नानिमित्ता भावोत्पत्तिरिति ॥ २३ ॥ निमित्तानिमित्तयोरर्थान्तरभावादप्रतिषेधः १ ॥ २४ ॥ अन्यद्धि निमित्तम्, अन्यच्च निमित्तप्रत्याख्यानम्, न च प्रत्याख्यानमेव प्रत्या- ख्येयम्, यथा—अनुदकः कमण्डुलुरिति नोदकप्रतिषेध उदकं भवतीति । स खल्वयं वादः 'अकर्मनिमित्तः शरीरादिसर्गः' (३. २. ७२) इत्येतस्मान्न भिद्यते, अभेदात् तत्प्रतिषेधेनैव प्रतिषिद्धो वेदितव्य इति ॥ २४ ॥ · सर्वानित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् [ २५-२८ ] अन्ये तु मन्यन्ते— सर्वमनित्यम्; उत्पत्तिविनाशधर्मकत्वात् ? ॥ २५ ॥ किमनित्यं नाम ? यस्य कदाचिद् भावस्तदनित्यम् । उत्पत्तिधर्मकमनुत्पन्नं नास्ति, विनाशधर्मकं चाविनष्टं नास्ति । किं पुनः सर्वम् ? भौतिकं च शरीरादि, एकदेशी का उत्तर— अनिमित्त से निमित्त उत्पन्न होने से वह अनिमित्त नहीं रहा करता ॥ २३ ॥ अनिमित्त से भावों की उत्पत्ति आप बतलाते हैं, परन्तु जिससे उत्पत्ति हो वह तो निमित्त हो गया, यों उस अनिमित्त के निमित्त बन जाने से अब वह अनिमित्त कहाँ रहा ! ॥ २३ ॥ सिद्धान्तपक्ष— निमित्त तथा अनिमित्त में अर्थभेद होने से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ २४ ॥ निमित्त दूसरा है, तथा निमित्त का प्रत्याख्यान आप दूसरा कर रहे हैं। निषेध ही निषेध्य नहीं होता। जैसे 'अनुदक कमण्डलु' में उदक का प्रतिषेध है तो क्या यह प्रति- षेध उदक हो जायेगा ! चार्वाक का यह आकस्मिकवाद भी पूर्व ( ३.२.७२ में ) वर्णित अकर्मनिमित्तक भूतसृष्टिवाद जैसा ही है, अतः समान होने से उस वाद की प्रतिषेधक युक्तियाँ इस वाद के प्रतिषेध में भी समझ लेनी चाहियें ॥ २४ ॥ दूसरे दार्शनिक यह मानते हैं— सभी प्रमेय उत्पत्तिविनाशधर्मा होने से अनित्य हैं ॥ २५ ॥ 'अनित्य' किसे कहते हैं ? जिस की सत्ता कभी हो कभी न हो, वह 'अनित्य' होता है। जो वस्तु उत्पत्तिशील है, तो वह अनुत्पन्न नहीं है तथा जो वस्तु विनाश- शील है वह अविनष्ट नहीं, अतः सब कुछ अनित्य है। यह 'सब' क्या है ? भौतिक १. सूत्रद्वयमिदं वार्त्तिककृताऽन्यथापि व्याख्यातमिति ध्येयम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० अभौतिकं च बुद्ध्यादि; तदुभयमुत्पत्तिविनाशधर्मकं विज्ञायते । तस्मात् तत्सर्वम- नित्यमिति ? ॥ २५ ॥ न; अनित्यतानित्यत्वात् ॥ २६ ॥ यदि तावत् सर्वस्यानित्यता नित्या ? तन्नित्यत्वान्न सर्वमनित्यम् । अथा- नित्या ? तस्यामविद्यमानायां सर्वं नित्यमिति ॥ २६ ॥ तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्यं विनाश्यानुविनाशवत् ॥ २७ ॥ तस्या अनित्यताया अप्यनित्यत्वम् । कथम् ? यथा-अग्निर्दाह्यं विनाश्यानु- विनश्यति, एवं सर्वस्यानित्यता सर्वं विनाश्यानुविनश्यतीति ॥ २७ ॥ नित्यस्याप्रत्याख्यानम्; यथोपलब्धि व्यवस्थानात् ॥ २८ ॥ अयं खलु वादो नित्यं प्रत्याचष्टे, नित्यस्य च प्रत्याख्यानमनुपपन्नम् । कस्मात् ? यथोपलब्धि व्यवस्थानात् । यस्योत्पत्तिविनाशधर्मकत्वमुपलभ्यते प्रमाणतस्तदनित्यम्, यस्य नोपलभ्यते तद्विपरीतम् । न च परमसूक्ष्माणां भूता- शरीरादि तथा अभौतिक बुद्ध्यादि । ये दोनों ही वर्ग उत्पत्तिविनाशधर्मक हैं अतः सब कुछ अनित्य हैं ? ॥ २५ ॥ एकदेशिमत से परिहार— अनित्यता में नित्यता होने से आपका मत उचित नहीं ॥ २६ ॥ यदि यह सब की अनित्यता नित्य है तो इस नित्यता से सब कुछ अनित्य नहीं रहा, अपितु नित्य हो जायगा । क्योंकि यदि वह अनित्य है तो उसके न होने पर सब नित्य हो जायेगा ॥ २६ ॥ सिद्धान्तिमत से उत्तर— जैसे अग्नि दाह्य काष्ठादि को जलाकर स्वयं विनष्ट हो जाती है उसी तरह हव अनित्यता भी अनित्य है ॥ २७ ॥ उस अनित्यता में भी अनित्यत्व उपपन्न है । कैसे ? जैसे अग्नि जलाने योग्य काष्ठादि को जला कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है, इसी तरह यह सब प्रमेयों की अनित्यता सबको विनष्ट ( अनित्य बता ) कर स्वयं भी विनष्ट ( अनित्य ) हो जायेगी ॥ २७ ॥ उपलब्धि के अनुसार व्यवस्था से नित्य का प्रत्याख्यान नहीं होता ॥ २८ ॥ यह वाद ( प्रकरण ) नित्य का प्रत्याख्यान करने के लिए उठाया है, परन्तु नित्य का प्रत्याख्यान नहीं बन पा रहा है; क्योंकि व्यवस्था उपलब्धि के अनुसार देखी जाती है । प्रमाण से जिसकी उत्पत्ति विनाशशील देखी जाती है, वह अनित्य होता है, तथा जो प्रमाण से उत्पत्ति एवं विनाशशील नहीं ज्ञात होता वह नित्य है। परमसूक्ष्म भूत, आकाश, काल, दिग्, आत्मा, मन तथा आकाश और सूक्ष्मभूत के कतिपय गुणों की;

३१. सू० ] सर्वानित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८७

३१. सू० ] सर्वानित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८७ नामाकाशकालदिगात्ममनसां तद्गुणानां च केषाञ्चित्सामान्यविशेषसमवायानां चोत्पत्तिविनाशधर्मकत्वं प्रमाणत उलभ्यते; तस्मान्नित्यान्येतानीति ॥ २८ ॥ सर्वंनित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् [ २९-३३ ] अयमन्य एकान्तः— सर्वं नित्यम्; पञ्चभूतनित्यत्वात् ? ॥ २९ ॥ भूतमात्रमिदं सर्वम्, तानि च नित्यानि भूतोच्छेदानुपपत्तेरिति ? ॥ २९ ॥ न; उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः ॥ ३० ॥ उत्पत्तिकारणं चोपलभ्यते विनाशकारणं च, तत् सर्वंनित्यत्वे व्याहन्यते इति ॥ ३० ॥ तल्लक्षणावरोधादप्रतिषेधः ? ॥ ३१ ॥ यस्योत्पत्तिविनाशकारणमुपलभ्यते इति मन्यसे, न तद् भूतलक्षणहीनमर्था- न्तरं गृह्यते, भूतलक्षणावरोधाद् भूतमात्रमिदमित्ययुक्तोऽयं प्रतिषेध इति ? ॥३१॥ न; उत्पत्तितत्कारणोपलब्धेः ॥ ३२ ॥ कारणसमानगुणस्योत्पत्तिः कारणं चोपलभ्यते । न चैतदुभयं नित्यविषयम्, इसी तरह सामान्य, विशेष तथा समवाय की विनाशशीलता नहीं देखी जाती—इसलिये ये सब नित्य हैं ॥ २८ ॥ कुछ दार्शनिकों का यह एक दूसरा पक्ष है— पञ्चभूतों के नित्य होने से सब पदार्थ नित्य हैं ? ॥ २९ ॥ यह सब कुछ दृश्यमान जगत् पञ्चभूतात्मक है, वे सभी भूत नित्य हैं, भूतों का उच्छेद आप ( नैयायिक ) मानते नहीं, अतः भूतात्मक गोघटादि सभी द्रव्य नित्य हैं ? ॥ २९ ॥ इनके उत्पत्तिविनाशकारण उपलब्ध होने से सब भूत नित्य नहीं हैं ॥ ३० ॥ इन द्रव्यों की उत्पत्ति तथा विनाश के कारण प्रमाण से उपलब्ध हैं, यह बात सब भूतों के नित्य मानने पर, उपपन्न नहीं होगी ॥ ३० ॥ वे भूतलक्षणाक्रान्त हैं, अतः भूतों की नित्यता का प्रतिषेध नहीं बनेगा ? ॥ ३१ ॥ जब आप यह मानते हैं कि भूतों के उत्पत्ति-विनाशकारण उपलब्ध होते हैं तो वे पदार्थ भूतलक्षणों से हीन कोई अन्य चीज थोड़े होंगे ! अतः भूतलक्षणाक्रान्त होने से यह समग्र जगत् भूतोत्पन्न है, तथा भूत नित्य हैं, अतः इन द्रव्यों का नित्यत्वप्रतिषेध अयुक्त है ? ॥ ३१ ॥ उन गोघटादि द्रव्यों की उत्पत्ति या उत्पत्तिकारण उपलब्ध होने से वे नित्य नहीं हैं ॥ ३२ ॥ जो जो गोघटादि द्रव्य उत्पन्न होते हैं, वे सब अपने अपने कारण गुण वाले उपलब्ध

२८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १ आ० न चोत्पत्तित्कारणोपलब्धिः शक्या प्रत्याख्यातुम्, न चाविषया काचिदुपलब्धिः । उपलब्धिसामर्थ्यात् कारणेन समानगुणं कार्यमुत्पद्यते-इत्यनुमीयते । स खलूपलब्धे- र्विषय इति । एवं च तल्लक्षणावरोधोपपत्तिरिति । उत्पत्तिविनाशकारणप्रयुक्तस्य ज्ञातुः प्रयत्नो दृष्ट इति । प्रसिद्धश्चावयवी तद्धर्मा । उत्पत्तिविनाशधर्मा चावयवी सिद्ध इति । शब्दकर्मबुद्ध्यादीनां चाव्याप्तिः । पञ्चभूतनित्यत्वात् तल्लक्षणावरोधाच्चे- त्यनेन शब्दकर्मबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च न व्याप्ताः । तस्मादनेकान्तः । स्वप्नविषयाभिमानवत् मिथ्योपलब्धिरिति चेत् ? भूतोपलब्धौ तुल्यम् । यथा स्वप्ने विषयाभिमानः, एवमुत्पत्तिकारणाभिमान इति । एवं चैतद् भूतोपलब्धौ तुल्यम्-पृथिव्याद्युपलब्धिरपि स्वप्नविषयाभिमानवत् प्रसज्यते । पृथिव्याद्यभावे सर्वव्यवहारविलोप इति चेत् ? तदितरत्र समानम् । होते हैं और यह उत्पत्तिकारण तथा कार्यों की उपलब्धि नित्य की नहीं होती । उधर उन गोघटादि की उत्पत्ति तथा उस उत्पत्ति का कारण किसी भी प्रमाण से प्रत्याख्यात नहीं हो सकता; न तो किसी की उपलब्धि निर्विषयक हुआ करती है, अतः उपलब्धि- सामर्थ्य से 'कारण से समानगुण कार्य उत्पन्न होता है'—ऐसा अनुमान होता है । वही (गोघटादि) उत्पन्न कार्य उपलब्धि का विषय है । इस प्रकार भूतों के कार्य (गोघटादि) में भूतों का नित्यत्वलक्षण अवरुद्ध हो जाता है । उत्पत्ति तथा विनाश के कारणों को लेकर ही लोक में पुरुषों के प्रयत्न देखे जाते हैं, यदि सभी द्रव्य नित्य हों तो इन प्रेक्षावान् पुरुषों के प्रयत्न निष्फल ही होंगे । अव- यवी अवयवधर्म ( उत्पत्तिविनाश ) वाला होता है । अवयवी उत्पत्ति-विनाशशील है— यह सभी जानते हैं । अथ च, 'पञ्चभूतों के नित्य होने के कारण भूतोत्पन्न द्रव्यों के भूतलक्षणाक्रान्त होने से सब कुछ नित्य हैं'—ऐसा लक्षण मानोगे तो शब्द, कर्म, बुद्धि आदि में अव्याप्ति होने लगेगी, क्योंकि ये पञ्चभूतात्मक नहीं हैं वे पञ्चभूतोत्पन्न हैं परन्तु वे तल्लक्षणा- क्रान्त भी नहीं हैं । इस रीति से इन दार्शनिकों का सर्वनित्यत्ववाद भी अनेकान्त ( अव्यापक ) है । यदि यह कहें कि उक्त उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धि स्वप्नविषय की तरह मिथ्या है ? तो यह मिथ्यात्व भूतोपलब्धि में भी समान है। जैसे स्वप्न में विषय मिथ्या उपलब्ध होता है, उसी तरह उत्पत्तिकारण भी मिथ्या है—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि यह बात भूतोपलब्धि में भी तुल्य ही है, अर्थात् तब पृथिव्यादि-भूताद्युपलब्धि भी स्वप्नविषय- वत् मिथ्या ही होगी । पृथिव्यादि भूतों की उपलब्धि को मिथ्या मानोगे तो समग्र जगद्व्यवहार भी विलुप्त

३३. सू० ] सर्वनित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८९

३३. सू० ] सर्वनित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८९ उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धिविषयस्याप्यभावे सर्वव्यवहारविलोप इति,. सोऽयं नित्यानामतीन्द्रियत्वादविषयत्वाच्चोत्पत्तिविनाशयोः 'स्वप्नविषयाभिमानवत्'— इत्यहेतुरिति ॥ ३२ ॥ अवस्थितस्योपादानस्य धर्ममात्रं निवर्तते धर्ममात्रमुपजायते, स खलूत्पत्ति- विनाशयोर्विषयः । यच्चोपजायते तत्रागप्युपजननादस्ति, यच्च निवर्तते तन्नि- वृत्तमप्यस्तीति, एवं च सर्वस्य नित्यत्वमिति ? न; व्यवस्थानुपपत्तेः ॥ ३३ ॥ अयमुपजनः, इयं निवृत्तिः—इति व्यवस्था नोपपद्यते; उपजातनिवृत्तयोर्विद्य- मानत्वात् । अयं धर्म उपजातः, अयं निवृत्तः—इति सद्भावाविशेषादव्यवस्था । इदानीमुपजननिवृत्ती, नेदानीम्—इति कालव्यवस्था नोपपद्यते; सर्वदा विद्यमा- नत्वात् । अस्य धर्मस्योपजननिवृत्ती, नास्य—इति व्यवस्थानुपपत्ति; उभयोरविशे- षात् । अनागतोऽतीतः—इति च कालव्यवस्थानुपपत्तिः; वर्तमानस्य सद्भावलक्षण- त्वात् । अविद्यमानस्यात्मलाभ उपजनः, विद्यमानस्यात्महानं निवृत्तिः—इत्येतस्मिन् होने लगेगा ? यह बात उत्पत्तिविनाशकारणों की उपलब्धि के विषय में भी तुल्य ही है । अर्थात् उत्पत्तिविनाशकारण तथा उसकी उपलब्धि को मिथ्या मानोगे तब भी तो समग्र व्यवहार ( पुरुषप्रयत्नादि ) विलुप्त होने लगेगा । अतः यह स्वप्नविषयक अभिमान अहेतुक ही है अर्थात् वह इन्द्रियगोचर नहीं होता; क्योंकि नित्य भूत अतीन्द्रिय तथा उत्पत्तिविनाशविषयक होते हैं ॥ ३२ ॥ कुछ दूसरे दार्शनिक ( स्वायम्भुव ) कहते हैं कि उपादान ( सुवर्णादि ) धर्मी का केवल ( एक ) धर्म निवृत्त होता है, तथा एक धर्म उत्पन्न होता है, अर्थात् यह धर्म ही उत्पत्ति तथा विनाश का विषय है ! अतः जो उत्पन्न होता है वह उत्पन्न होने से पूर्व भी ( धर्म्यभिन्न रूप में ) रहता है तथा जो विनष्ट होता है वह विनाश के बाद भी (धर्म्यभिन्न रूप में) रहता है। इस नय से सब कुछ का नित्यत्व उत्पन्न हो जायेगा ? व्यवस्था के अनुपपन्न होने से वैसा नित्यत्व नहीं बन पाता ॥ ३३ ॥ इस मत के अनुसार यदि उपजात तथा विनष्ट भी विद्यमान ही रहेंगे तो 'यह जन्म है, यह नाश है'—ऐसी लोकानुभवसिद्ध व्यवस्था नहीं बन पायेगी । 'यह धर्म उत्पन्न हुआ तथा यह धर्म विनष्ट हुआ' यह स्वरूपव्यवस्था भी सदसद्भाव में कोई भेद न होने से नहीं बन पायेगी । और 'इस समय उत्पत्ति-विनाश हो रहे हैं, इस समय नहीं'—यह कालव्यवस्था भी सदसद्भाव में कोई अन्तर न होने से नहीं हो पायेगी । तथा 'इसके धर्म उत्पन्न-विनष्ट हुए, इस के नहीं' यों सदसद्भाव में कोई वैशिष्ट्य न होने से सम्बन्ध- व्यवस्था भी नहीं बन पायेगी । उत्पत्ति-विनाश की भूतभविष्यत् व्यवस्था भी सद्भाव के ही वर्तमान रहने से न बन पायेगी । हमारे मत में तो अविद्यमान का आत्मलाभ 'उत्पत्ति' तथा विद्यमान का नाश 'निवृत्ति' न्या० द० ३७

सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् [ ३४-३६ ]

२९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० सति नैते दोषाः । तस्माद्यदुक्तम्-'प्रागप्युपजनादस्ति निवृतं चास्ति', तद- युक्तमिति ॥ ३३ ॥ सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् [ ३४-३६ ] अयमन्य एकान्तः— सर्वं पृथग्; भावलक्षणपृथक्त्वात् ? ॥ ३४ ॥ सर्वं नाना, न कश्चिदेको भावो विद्यते । कस्मात् ? भावलक्षणपृथक्त्वात् । भावस्य लक्षणम् = अभिधानम्, येन लक्ष्यते भावः स समाख्याशब्दः; तस्य पृथग्विषयत्वात् । सर्वो भावसमाख्याशब्दः समूहवाची, 'कुम्भः' इति संज्ञाशब्दो गन्धरसरूपस्पर्शसमूहे बुध्नपार्श्वग्रीवादिसमूहे च वर्त्तते, निर्देशमात्रं चेदमिति ? ॥ ३४ ॥ न; अनेकलक्षणैरेकभावनिष्पत्तेः ॥ ३५ ॥ अनेकविधलक्षणैरिति मध्यमपदलोपी समासः । गन्धादिभिश्च गुणैर्बुध्ना- दिभिश्चावयवैः सम्बद्ध एको भावो निष्पद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यम्, अवयवा- तिरिक्तश्चावयवीति । विभक्तन्यायं चैतदुभयमिति ॥ ३५ ॥ अथापि— कहलाता है; ऐसा मानने पर उपर्युक्त सभी व्यवस्थायें बन सकती हैं। अतः यह 'उत्पत्ति से पूर्व तथा विनाश के बाद भी धर्मी वही है'—कहना अयुक्त ही है ॥ ३३ ॥ कुछ दार्शनिक (बौद्ध) यह कहते हैं— प्रत्येक पदार्थ पृथक् हैं; क्योंकि भाव के लक्षण (गन्ध-रस-रूपादि) पृथक् पृथक् हैं ? ॥ ३४ ॥ सब पदार्थ नाना हैं, कोई भी भाव नाम की एक वस्तु नहीं है, क्यों ? भावलक्षणों के पार्थक्य से । भाव का अर्थ है संज्ञा । यह भाव जिससे बोधित किया जाये वह संज्ञा समूह (अवयवी) को ही बतलाती है। जैसे 'कुम्भ' यह संज्ञाशब्द गन्ध-रस-रूप-स्पर्श के समूह को तथा अधस्तल-पार्श्वभाग-ग्रीवादि अवयवसमूह को लक्षित करता है। यह एक उदाहरण दे दिया गया। (तात्पर्य यह है कि अनेकवाची कोई पद नहीं है, अपि तु सब तत्तद्व्यक्तिवाचक है ? ) ॥ ३४ ॥ अनेक प्रकार के लक्षणों के रहते एक भाव निष्पन्न नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥ 'अनेकलक्षणैः' पद का मध्यमपदलोपी समास से 'अनेकविध लक्षणों से'—यह अर्थ है । गन्धादि गुण तथा अधस्तलादि अवयवों से एक घट-रूप अवयवी पृथक् निष्पन्न होता है ! अतः द्रव्य गुणों से भिन्न, तथा अवयवी अवयवों से भिन्न होता है—ये दोनों बातें हम पीछे (२. १. ३३ में) अनेक हेतुओं द्वारा स्पष्टतः सिद्ध कर चुके हैं ॥ ३५ ॥ अपि च— CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३६. सू० ] सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् २९१

३६. सू० ] सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् २९१ लक्षणव्यवस्थानादेवाप्रतिषेधः ॥ ३६ ॥ न कश्चिदेको भाव इत्युक्तः प्रतिषेधः । कस्मात् ? लक्षणव्यवस्थानादेव । यदिह लक्षणं भावस्य संज्ञाशब्दभृतं तदेकस्मिन् व्यवस्थितम्—'यं कुम्भमद्राक्षं तं स्पृशामि, यमेवास्प्राक्षं तं पश्यामि' इति। नाणुसमूहो गृह्यते इति, अणुसमूहे चागृह्यमाणे यद् गृह्यते तदेकमेवेति । अथाप्येतदनूक्तम्-नास्त्येको भावो यस्मात् समुदायः ? एकानुपपत्तेर्नास्त्येव समूहः । नास्त्येको भावो यस्मात् समूहे भावशब्दप्रयोगः ? एकस्य चानुपपत्तेः समूहो नोपपद्यते-एकसमुच्चयो हि समूह इति । व्याहृतत्त्वादनुपपन्नम्—'नास्त्येको भावः' इति । यस्य प्रतिषेधः प्रतिज्ञायते 'समूहे भावशब्दप्रयोगात्' इति हेतुं ब्रुवता, स एवाभ्यनुज्ञायते—'एकसमुच्चयो हि समूहः' इति । 'समूहे भावशब्द- प्रयोगात्' इति च समूहमाश्रित्य प्रत्येकं समूहिप्रतिषेधः—'नास्त्येको भावः' इति । सोऽयमुभयतो व्याघाताद् यत्किञ्चन वाद इति ॥ ३६ ॥ एक अवयवी का प्रतिषेध लक्षणव्यवस्था से भी नहीं बनता ॥ ३६ ॥ पृथक् रूप में स्थित पदार्थ का 'कोई एक अवयवी नहीं है'—यह प्रतिषेध अयुक्त है; क्योंकि लक्षण (संज्ञा) की व्यवस्था देखी जाती है। यहाँ जो भाव का संज्ञाशब्दभूत लक्षण है, वह एक-एक में व्यवस्थित है, जैसे—'जिस घट को मैंने देखा था उसे मैं अब छू पा रहा हूँ; या 'जिस घट का मैंने स्पर्श किया था उसे ही अब देख पा रहा हूँ'—इन वाक्यों में अवयवों (अणुसमूह) की अपेक्षा से बहुवचन का प्रयोग न कर एक अवयवी का प्रयोग सर्वजनानुभवसिद्ध है; क्योंकि अणुसमूह गृहीत होता ही नहीं। तथा जो गृहीत होता है, वह एक ही अवयवी है। यदि पूर्वपक्षी अपनी बात को इस तरह रखे कि—कोई एक अवयवी नहीं है, अपितु वह अवयवी वस्तुतः अवयवों का समुदायमात्र है ? उनका यह कथन भी अयुक्त है; क्योंकि समुदाय भी अनेकसमुदायी, जो कि अपने आप में प्रत्येक भिन्न-भिन्न हैं, से ही बनेगा; अन्यथा यदि एक न मानोगे तो उन एक-एक भिन्नों से बनने वाला समुदाय कैसे बनेगा ! यदि पूर्वपक्षी यह कहे—कोई एक अवयवी नहीं है; क्योंकि वह अवयविसंज्ञा समूह को ही बतला रही है ? यह बात भी पहले वाली जैसी है; क्योंकि यदि एक की उपपत्ति न होगी तो उससे बनने वाले समूह की उपपत्ति कैसे होगी ! दूसरे, 'एक अव- यवी नहीं है'—इसमें वदतोव्याघात दोष भी है। समूह में संज्ञाशब्द के प्रयोग का हेतु देकर जिसका प्रतिषेध किया जा रहा है उसी को 'भिन्न प्रत्येक अवयवों का ही वह समूह है'—ऐसा कहकर स्वीकार भी कर रहे हैं। उधर, 'समूह में संज्ञाशब्द का प्रयोग होने से' हेतु देकर समूह के सहारे समूहगत प्रत्येक समूही का प्रतिषेध कर-के इस प्रतिज्ञा का भी भङ्ग कर रहे हैं कि 'एक भाव नहीं होता'। यों, उक्त व्याघातद्वय से यह वाद निःसार ही है ॥ ३६ ॥

सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् [ ३७-४० ]

२९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् [ ३७-४० ] अयमपर एकान्तः— सर्वमभावो भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः ? ॥ ३७ ॥ यावद्भावजातं तत् सर्वमभावः । कस्मात् ? भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः । असन् गौरश्वात्मनाऽनश्वो गौः, असन्नश्वो गवात्मनाऽगौरश्व इत्यसत्प्रत्ययस्य प्रतिषेधस्य च भावशब्देन सामानाधिकरण्यात् सर्वमभाव इति ? ॥ ३७ ॥ प्रतिज्ञावाक्ये पदयोः प्रतिज्ञाहैत्वोश्च व्याघातादयुक्तम् । अनेकस्याशेषता सर्वशब्दस्यार्थः, भावप्रतिषेधश्चाभावशब्दस्यार्थः । पूर्वं सोपाख्यम्, उत्तरं निरुपाख्यम् । तत्र समुपाख्यायमानं कथं निरुपाख्यमभावः स्यादिति । न जात्वभावो निरुपाख्योऽनेकत्याऽशेषतया शक्यः प्रतिज्ञातुमिति ! सर्वमेतदभाव इति चेत् ? यदिदं सर्वमिति मन्यसे तदभाव इति ? एवं चेत् अनिवृत्तो व्याघातः, अनेकमशेषं चेति नाभावप्रत्ययेन शक्यं भवितुम् । अस्ति चायं प्रत्ययः सर्वमिति तस्मान्नाभाव इति । प्रतिज्ञाहैत्वोश्च व्याघातः । सर्वम- [ अब बौद्धाभिमत सर्वशून्यतावाद का शङ्कासमाधानपूर्वक निराकरण कर रहे हैं—] कुछ अन्य दार्शनिकों का यह मत है— यह सब कुछ सत्पदार्थ अभावरूप है; क्योंकि भावों में इतरेतरापेक्षया अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३७ ॥ जो कुछ भी दृश्यमान सत्पदार्थ है वह सब अभाव है; क्योंकि उन भावों में दूसरे की अभावसिद्धि देखी जाती है । जैसे—गौ अश्वरूप से नहीं है, अतः उसे 'अनश्व' कह सकते हैं; उसी तरह गोरूप से अश्व नहीं है तो उसे 'अगौ' कह सकते हैं—इस तरह असद् ज्ञान तथा प्रतिषेध का भावशब्द से सामानाधिकरण्य होने के कारण हम यह क्यों न मान लें—'ये सब संज्ञाशब्द असद्विषय हैं, 'अंसत्प्रत्यय तथा प्रतिषेध का सामानाधि- करण्य होने के कारण; अनुत्पन्न प्रध्वस्त घट की तरह' ? ॥ ३७ ॥ प्रतिज्ञावाक्य में 'सर्व'-'अभाव' इन पदों और प्रतिज्ञा तथा हेतु दोनों के विरुद्ध होने से उक्त मत असमीचीन ही है । यहाँ 'सर्व' शब्द का अर्थ है अनेक की अशेषता, तथा 'अभाव' का अर्थ है भाव- प्रतिषेध । इनमें पहला ( सर्वशब्द ) सोपाख्य ( कुछ न कुछ स्वभाव वाला ) है, तथा दूसरा (अभाव शब्द) निरुपाख्य (निःस्वभाव) है। तो कुछ न कुछ स्वभाव वाला निःस्वभाव कैसे होगा ? आप निःस्वभाव को अनेकत्व तथा अशेषत्व से किसी भी तरह प्रतिज्ञात नहीं कर सकते ! यदि यह कहें कि यह 'सव कुछ' अभाव ही है ? तो जिसको आप 'सव' मानते हैं वही अभाव है ? तब भी उपर्युक्त विरोध पूर्ववत् बना रह गया; क्योंकि 'अनेक' तथा 'अशेष' अभावप्रत्यय से कैसे प्रतिज्ञात हो सकते हैं ! प्रतिज्ञा तथा हेतुओं