पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ही है तो उसका उत्तर यह है कि-हां, अज्ञानी को भी 'सर्व- कामावाप्ति' तो होती है परन्तु ज्ञान न होने के कारण उससे उस [विचारे] की तृप्ति नहीं होती [ मैं सब बुद्धियों का साक्षी हूँ ऐसा ज्ञान अज्ञानी को नहीं होता और वह उस तृप्ति से वंचित रह जाता है ] यही बात तैत्तिरीय श्रुति में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कही है कि— जो इस तत्व को पहचान जानता है उसी की सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। न जानने वाले तो केवल न जानने से ही इस महालाभ से वञ्चित ही रह जाते हैं। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् (तै० ब्र० १) । यद्वा सर्वात्मतां स्वस्य साम्ना गायति सर्वदा। अहमन्नं तथान्नादश्चेति साम ह्यधीयते ॥३७॥ ज्ञानी की 'सर्वकामावाप्ति' का तीसरा भी एक प्रकार है कि—वह ज्ञानी अपनी सर्वात्मकता [ सर्वरूपता ] को साम के द्वारा यों गाया करता है। वह प्रत्येक वस्तु को अपना आत्मा समझता है—वह जान जाता है कि मैं ही अन्न हूँ और मैं ही अन्न को खाने वाला भी हूँ । सामवेद में भी कहा है कि— अहमन्नमहमन्नमहमन्नमहमन्नादोहमन्नादोहमन्नादः। (तै० ३-१०) ऊपर के श्लोक में साक्षिभाव से सर्वकामप्राप्ति का वर्णन है इस श्लोक में सर्वात्मभाव से सर्वकामप्राप्ति का प्रतिपादन किया है। दुःखाभावश्च कामाप्तिरुभे ह्येवं निरूपिते। कृतकृत्यत्वमन्यच्च प्राप्तप्राप्यत्वमीक्षताम् ॥३८॥ यहां तक 'दुःखाभाव' और 'कामाप्ति' दोनों का निरूपण किया जा चुका। अब आगे 'कृतकृत्यता' तथा 'प्राप्तप्राप्यता' को भी समझ लो।
तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार कर दिया है, तौभी
५५० पंचदशी उभयं तृप्तिदीपे हि सम्यगस्माभिरीरितम् । त एवात्रानुसन्धेयाः श्लोका बुद्धिविशुद्धये ॥३९॥ कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता दोनों का ही निरूपण हम ने तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार कर दिया है, तौभी बुद्धि की शुद्धि के लिये उन्हीं श्लोकों को यहां भी समझ लेना चाहिये । ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं परास्याभूत् तत् सर्वमधुना कृतम् ॥४०॥ जब तक यह अज्ञानी था तब तक [इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के लिये] इस लोक और परलोक के कामों को सिद्ध करने के लिये तथा मुक्ति को पाने के लिये इसको बहुत कुछ करना शेष था, परन्तु अब आत्मज्ञान हो जाने पर [सांसारिक फल की इच्छा न रहने से] इसने वह सब कुछ कर ही सा डाला है । तदेतत् कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । अनुसन्दधदेवायंमेवं तृप्यति नित्यशः ॥४१॥ जो चीजें आत्मा की कृतकृत्यता का विरोध किया करती हैं उनके साथ ['कि मैं भी कभी ऐसा ही था'] जब अपनी कृत- कृत्यता को याद करता है तब नीचे लिखे प्रकार से तृप्ति उमड़ पड़ती है । दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया । परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया ॥४२॥ अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः । सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् ॥४३॥
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५१
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५१ जो अज्ञानी होने के कारण ही दुःखी हैं, वे पुत्र स्त्री आदि की चाह में फंस कर, संसाररूपी झाड़ में उलझे पड़े रहें। मैं भी कभी ऐसा उलझा पड़ा था परन्तु यह तो बताओ कि परमा- नन्द से परिपूर्ण मैं भला अब कौनसी इच्छा से संसाररूपी चक्कर पर चढ़कर घूमता रहूँ ? ॥४२॥ जिन अज्ञानियों को पर- लोक यात्रा में मज़ा आता हो वे [अपने वहम को पूरा करने के लिये] भले ही कर्म किया करें। परन्तु यह तो बताओ कि जो मैं सर्वलोकस्वरूप हो चुका हूँ वह मैं अब इन कर्मों को किस लिये करूँ और कैसे करूँ ? ॥४३॥ व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा । येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः ॥४४॥ जो अधिकारी हैं वे लोग चाहे शास्त्रों पर टीकायें लिखें या वेदों को पढ़ायें परन्तु मुझ अक्रिय का तो कोई अधिकार ही नहीं रह गया है । निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च । द्रष्टारश्चेत् कल्पयन्ति किं मे स्यादन्यकल्पनात् ॥४५॥ सोना और भिक्षा स्नान तथा शौच की न मुझ आत्मा को कुछ आवश्यकता है और न मैं यह सब कुछ करता ही हूँ [यह तो सब यह शरीर ही किया करता है] फिर भी यदि देखने वाले संसारी लोग इन सब को मुझ में ही मानते हैं तो वे माना करें । दूसरों के मान लेने से मुझ में क्या हो जायगा ? तृप्तिदीप के २५८ वें श्लोक में इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है । गुंजापुंजादि दह्येत नान्यारोपितवन्हिना । नान्यारोपितसंसारधर्मानैवमहं भजे ॥४६॥
५५२ पञ्चदशी दूसरों ने जिन गुंजाओं को अग्नि मान लिया है, वे गुंजा जैसे सचमुच ही जलाने नहीं लगतीं, इसी प्रकार दूसरों के माने हुए संसार के धर्मों को मैं आत्मा भी प्राप्त नहीं होता हूँ। शृण्वन्त्वज्ञाततत्वास्ते जानन् कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥४७॥ जिनको तत्व का परिज्ञान आज तक नहीं हो पाया है, वे लोग इस तत्व का श्रवण करें। परन्तु इस तत्व को अच्छी तरह जानता हुआ मैं अब इसे क्यों सुनूँ ? जिनको अभी तक इस तत्व में कोई संशय हो रहा हो वे लोग इस तत्व का मनन भी करें। परन्तु संशय रहित हो चुकने वाला मैं तो अब इस का मनन नहीं करूंगा । विपर्यस्तो निदिध्यासेत् किं ध्यानमविपर्यये ॥ देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥४८॥ अहं मनुष्य इत्यादि व्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥४९॥ जिसे अभी तक विपरीत ज्ञान हो रहा है उस का निदिध्यासन करना तो ठीक है, परन्तु जब किसी को विपर्यय ही न हो तब ध्यान कैसे होगा ? मुझे तो अब कभी इस देह के आत्मा का विपरीत ज्ञान होता ही नहीं ।४९। मैं जो अब भी कभी कभी यह कह देता हूँ कि मैं मनुष्य हूँ ? सो यह व्यवहार तो अनादि काल से बसी हुई वासनाओं के प्रताप से हो जाता.है। आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्माक्षये त्वसौ नैव शाम्येद्ध्यानसहस्रतः ॥५०॥ प्रारब्ध कर्मों का क्षय जब होगा तब यह व्यवहार स्वयं
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३ बन्द होजायगा। जब तक किसी के कर्म क्षीण नहीं हो जायँगे तब तक तो हज़ार ध्यान करने पर भी यह व्यवहार शान्त नहीं हो सकेगा। तृप्तिदीप के २६३ वें श्लोक में विस्तारपूर्वक व्याख्या की गयी है । विरलत्वं व्यवहृते रिष्टं चेद् ध्यानमस्तु ते । अवाधिकां व्यवहृतिं पश्यन् ध्यायाम्यहं कुतः ॥५१॥ यदि तुम व्यवहार को विरल [कम] करना चाहते हो तो तुम्हारे लिये ध्यान करना ठीक है । परन्तु व्यवहार को अबाधक देखता हुआ मैं भला ध्यान क्यों करूँ ? [ मुझे उसकी आवश्य- कता ही क्या है ? ] विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम । विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद् विकारिणः ॥५२॥ क्योंकि मुझे कोई विक्षेप नहीं होता इसी से मुझे समाधि भी नहीं होती है । देखो कि—विक्षेप और समाधि ये दोनों तो विकारी मन को ही होते हैं । नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव निश्चयः ॥५३॥ जो मैं नित्यानुभव रूप ही हूँ, उस मेरा पृथक् अनुभव क्या होगा ? मुझे तो अब यह निश्चय हो गया है कि जो करना था सो कर डाला और जो पाना था सो पा चुका हूँ । व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वान्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥५४॥ लौकिक या शास्त्रीय या और किसी तरह का व्यवहार प्रारब्ध के अनुकूल चलता रहे, मैं तो अकर्ता और अलेप ही रहता हूँ ।
५५४ पञ्चदशी अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेहं का मम क्षतिः ॥५५॥ या फिर मैं तो कृतकृत्य ही हूँ, परन्तु तो भी लोक पर अनु- ग्रह करने की इच्छा से [ उनको उनका मार्ग दिखाने के लिये ] शास्त्रीय मार्ग से ही आचरण करता हूँ। इससे मेरी हानि ही क्या है ? देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक् तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥५६॥ विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥५७॥ देवार्चन, स्नान, शौच तथा भिक्षा आदि कार्यों को यह शरीर किया करे। यह वाणी जोर से जपतो रहे या वेदान्तों का पाठ करती रहे। यह बुद्धि चाहे तो विष्णु का ध्यान करे, या ब्रह्मा- नन्द में विलीन हो जाय । परन्तु मैं तो इन में से कुछ भी करता या करवाता नहीं हूँ मैं तो केवल साक्षी हूँ । कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥५८॥ कृतकृत्य होने के कारण जो पहले ही तृप्त हो चुका है, जब वह प्राप्तप्राप्यता से फिर और अधिक तृप्त होता है तब मन ही मन ऐसा विचार किया करता है — धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमंजसा वेद्मि । धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥५९॥ मैं धन्य हूँ। क्योंकि अपने नित्य आत्मा को ठीक ठीक
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५५
ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५५ समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि अब मुझे ब्रह्मानन्द स्पष्ट दीखने लगा है । धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य । धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥६०॥ मैं धन्य हूँ । क्योंकि आज मैं किसी भी सांसारिक दुःख को नहीं देख रहा हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि मेरा अज्ञान न मालूम कहां भाग गया है । धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित् । धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य संपन्नम् ॥६१॥ मैं धन्य हूँ मुझे कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहा है । मैं धन्य हूँ क्योंकि जो कुछ मुझे पाना था वहं सभी कुछ आज मेरा सिद्ध हो गया है । धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तिर्मे कोपमा भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥६२॥ मैं धन्य हूँ बताओ कि संसार में आज मेरे समान तृप्त कौन हैं ? मैं और अधिक कहां तक कहता जाऊँ, बस मैं तो यही कहता हूँ कि मैं धन्य हूँ और अनन्त बार धन्य हूँ । अहो पुण्य महो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् । अस्य पुण्यस्य संपत्ते रहो वयमहो वयम् ॥६३॥ ओहो ! आज मेरे कोटि जन्मों के पुण्यों के ढेर ने फलरूप धारण किया है । इस पुण्य संपत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता की झूल में पड़ा झोटे ले रहा हूँ । अहो शास्त्र महो शास्त्र महो गुरु रहो गुरुः । अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम् ॥६४॥
५५६ पञ्चदशी जिन शास्त्रों, जिन अध्यात्मदर्शी गुरुओं, जिन ज्ञानों और जिन आनन्दों के कारण से, आज मुझे यह धन्य अवस्था हाथ लगी है, उन सब को अनेक अनेक बार धन्यवाद है [ वे सब के सब आज मुझे मेरा परम पद देकर समुत्तीर्ण हो गये हैं । उनकी महिमा को गाने के लिये मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ?] ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे चतुर्थोऽध्याय ईरितः । विद्यानन्द स्तदुत्पत्तिपर्यन्तोऽभ्यास इष्यताम् ॥६५॥ ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में 'विद्यानन्द' नाम का चतुर्थ अध्याय समाप्त हुआ । इस विद्यानन्द की उत्पत्ति जब तक न हो जाय तभी तक ब्रह्माभ्यास करना आवश्यक होता है । [ इसके उत्पन्न हो जाने पर फिर ब्रह्माभ्यास करना शेष नहीं रह जाता ] इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम्
15. Vishayananda
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् अथात्र विषयानन्दो ब्रह्मानन्दांशरूपभाक् । निरूप्यते द्वारभूतस्तदंशत्वं श्रुतिर्जगौ ॥१॥ अब इस ग्रन्थ में ब्रह्मानन्द के ही एक भाग 'विषयानन्द' का निरूपण कर रहे हैं । क्योंकि वह भी ब्रह्मज्ञान का उपयोगी है । श्रुति ने भी अपने मुख से इस विषयानन्द को ब्रह्मानन्द का ही एक भाग कहा है । एषोऽस्य परमानन्दो योऽखण्डैकरसात्मकः । अन्यानि भूतान्येतस्य मात्रामेवोपभुञ्जते ॥२॥ श्रुति ने कहा है कि—जो कि अखण्ड और एकरस आनन्द है वही तो उस ब्रह्म का परमानन्द कहाता है । ये सम्पूर्ण भूत इसी परमानन्द की एक बूंद की किसी छोटी सी मात्रा को ही तो भोग रहे हैं । शान्ता घोरास्तथा मूढा मनसो वृत्तयस्त्रिधा । वैराग्यं क्षान्तिरौदार्य मित्याद्याः शान्तवृत्तयः ॥३॥ तृष्णा स्नेहो रागलोभावित्याद्या घोरवृत्तयः । संमोहो भयमित्याद्याः कथिता मूढवृत्तयः ॥४॥ मन की शान्त घोर तथा मूढ ये तीन तरह की वृत्तियां होती हैं । वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त' वृत्तियां कहाती हैं । तृष्णा, स्नेह, राग, तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां हैं । संमोह तथा भय आदि 'मूढ' वृत्तियां कही गयी हैं । [ शान्त वृत्तियां सात्विक हैं, घोर वृत्तियां राजस होती हैं, मूढ वृत्तियां तामसी वृत्तियां मानी गयी हैं ] ।
५५८ पञ्चदशी
वृत्तिष्वेतासु सर्वासु ब्रह्मणश्चित्स्वभावता । प्रतिबिम्बति, शान्तासु सुखं च प्रतिबिम्बति ॥५॥ ऊपर कही हुई इन सभी वृत्तियों में ब्रह्म की चित्स्वभावता प्रतिबिम्बित हो रही है। शान्त वृत्तियों में इतनी विशेषता होती है कि उनमें चेतनता के साथ ही सुख भी प्रतिबिम्बित होता है। रूपं रूपं बभूवासौ प्रतिरूप इति श्रुतिः । उपमा सूर्यकेत्यादि सूत्रयामास सूत्रकृत् ॥६॥ श्रुति में कहा है कि यह आत्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो गया है। अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् (ब्रह्मसू. ३-२-१८) इस में व्यास ने भी यही बात कही है। [जैसे यह ज्योतिर्मय सूर्य स्वयं एक है परन्तु जलपात्रों के भेद से भेदयुक्त जलों के अनु- सार अनेक हो जाता है इसी प्रकार अजन्मा यह आत्मदेव स्वयं- प्रकाश और एक ही है परन्तु माया रूपी उपाधि से शरीरों के अनुसार होकर भिन्न (अनेक) सा हो जाता है ] एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥७॥ श्रुति कहती है कि सब भूतों में एक ही तो भूतात्मा व्यवस्थित हो रहा है। वह [ ज्ञानी को ] एक रूप में और [ अज्ञानी को ] जल के चांद की तरह अनेक रूप में दीख पड़ता है। जले प्रविष्टश्चन्द्रोऽयमस्पष्टः कलुषे जले । विस्पष्टो निर्मले, तद्वद् द्वेधा ब्रह्मापि वृत्तिषु ॥८॥ [ निरवयव ब्रह्म कहीं तो चिन्मात्ररूप से प्रतीत हो और कहीं चैतन्य और आनन्द दोनों का भान हो, यह विभाग कैसे ·
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५५९
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५५९ ठीक होगा ? इस बात का उत्तर यह है कि ]—यह चांद जब मैले जल में प्रविष्ट होता है तब यह भी अस्पष्ट दीखने लगता है, परन्तु निर्मल जल में स्पष्ट दीख पड़ता है । ठीक इसी प्रकार ब्रह्म तत्व भी शुद्ध और अशुद्ध वृत्तियों में दो तरह का हो जाता है । घोरमूढासु मालिन्यात् सुखांशश्च तिरोहितः । ईषन्नैर्मल्यतस्तत्र चिदंशप्रतिविम्बनम् ॥९॥ [ ऊपर की बात को विस्तार से यों समझो कि ]—घोर और मूढ वृत्तियों में मलिनता के कारण सुख भाग ढका हुआ रहता है । उन वृत्तियों में थोड़ी सी निर्मलता होती है इस कारण केवल चिदंश का ही प्रतिबिम्ब हुआ रहता है । यद्वापि निर्मले नीरे वह्ने रौष्ण्यस्य संक्रमः । न प्रकाशस्य, तद्वत् स्याच्चिन्मात्रोद्भूतिरेव च ॥१०॥ अथवा दूसरे दृष्टान्त से इस बात को यों समझो कि निर्मल जल में अग्नि की उष्णता तो पहुंच जाती है परन्तु अग्नि का प्रकाश उसमें नहीं पहुंच पाता । ठीक इसी तरह घोर और मूढ वृत्तियों में चिदंश ही पहुंच पाता है [ परन्तु 'सुखांश' का संक्रमण उनमें नहीं होता ] काष्ठे त्वौष्ण्यप्रकाशौ द्वावुद्भवं गच्छतो यथा । शान्तासु सुखचैतन्ये तथैवोद्भूतिमाप्नुतः ॥११॥ काष्ठ में तो जैसे उष्णता और प्रकाश दोनों ही उद्भूत हो जाते हैं, इसी प्रकार शान्त वृत्तियों में भी 'सुख' और 'चैतन्य' दोनों ही उद्भूत हो जाते हैं ।
५६० पञ्चदशी वस्तुस्वभावमाश्रित्य व्यवस्था तूभयोः समा । अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम् ॥१२॥ वस्तु का जैसा स्वभाव हो उसके अनुसार व्यवस्था मानना तो दोनों ही पक्षों में समान है। क्योंकि नियामक की जब कल्पना की जाती है तब वह अनुभव के अनुसार ही तो की जाती है। न घोरासु न मूढासु सुखानुभव ईक्ष्यते । शान्तास्वपि क्वचित् कश्चित् सुखानुभव ईक्ष्यताम् ॥१३॥ लोक में देखते हैं कि—घोर या मूढ अवस्थाओं में सुखानुभव होता दीखता ही नहीं। इसी तरह अनुभव के अनु- सार यह भी देख लो कि—शान्त वृत्तियों में भी सुखानुभव होता है या नहीं ? गृहक्षेत्रादिविषये यदा कामो भवेत् तदा । राजसस्यास्य कामस्य घोरत्वात् तत्र नो सुखम् ॥१४॥ घर या खेत आदि की कामना जब किसी पर सवार हो जाती है तब फिर कामावस्था में उसे सुख हो ही नहीं सकता । क्योंकि वह राजस काम घोर होता है। [ वह सुख को उद्भूत होने ही नहीं देता । ] सिद्ध्येन्नवेत्यस्ति दुःखमसिद्धौ तद् विवर्धते । प्रतिबन्धे भवेत् क्रोधो द्वेषो वा प्रतिकूलतः ॥१५॥ यह मेरा काम सिद्ध होगा या नहीं ? यह विचार जब आता है तब दुःख होने लगता है। जब काम सिद्ध नहीं होता तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस काम में प्रतिबन्ध
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६१
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६१ डालता है तब क्रोध आने लगता है। जब कामना के प्रतिकूल बात देखनी पड़ जाती है तब उससे द्वेष होने लगता है। अशक्यश्चेत् प्रतीकारो विषादः स्यात् स तामसः। क्रोधादिषु महद् दुःखं सुखशङ्कापि दूरतः ॥१६॥ जब उसका कुछ इलाज नहीं हो सकता तब उस समय जो विषाद होता है वह तामस कहाता है [उसमें भी सुख नहीं होता]। क्रोधादियों में तो स्पष्ट ही बड़ा दुःख देखा जाता है वहाँ तो सुख की थोड़ी सी भी संभावना नहीं होती। काम्यलाभे हर्षवृत्तिः शान्ता तत्र महत् सुखम् । भोगे महत्तरं, लाभप्रसक्तावीषदेव हि ॥१७॥ महत्तमं विरक्तौ तु विद्यानन्दे तदीरितम् । एवं क्षान्तौ तथौदार्ये क्रोधलोभनिवारणात् ॥१८॥ काम्यपदार्थ का लाभ जब किसी को हो जाता है उस समय जो शान्त हर्ष वृत्ति उत्पन्न होती है उसमें बड़ा सुख होता है। जब तो हम उस काम्यपदार्थ को भोगते हैं तब और भी बड़ा सुख होता है। लाभ की आशा होने पर तो थोड़ा ही सुख होता है। वैराग्य में तो बड़े से भी बड़ा सुख होता है यह बात विद्यानन्द नाम के प्रकरण में कही गई है। इसी प्रकार क्षमा और उदारता के समय भी बड़ा सुख होता है। क्योंकि क्षमा और उदारता क्रम से क्रोध और लोभ का निवारण कर देती हैं। यद्यत् सुखं भवेत् तत्तद् ब्रह्मैव प्रतिबिम्बनात् । वृत्तिष्वन्तर्मुखास्वस्य निर्विघ्नं प्रतिबिम्बनम् ॥१९॥ यों जहाँ कहीं जो भी कुछ सुख होता है, वह सब ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होने के कारण ब्रह्मतत्व ही है।
५६२ पञ्चदशी प्राप्त हो जाने पर जब इस प्राणी की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब ] वह ब्रह्म उस अन्तर्मुख वृत्ति में निर्विघ्नता के साथ [बेरोक टोक] प्रतिबिम्बित हो जाता है [ तभी उस प्राणी को सुख होता है । ] सत्ता चितिः सुखं चेति स्वभावा ब्रह्मणस्त्रयः । मृच्छिलादिषु सत्तैव व्यज्यते नेतरद् द्वयम् ॥२०॥ 'सत्ता' 'चैतन्य' तथा 'आनन्द' ये तीन ही तो ब्रह्म के स्वभाव हैं। मिट्टी और पत्थर आदि में ब्रह्म की सत्ता ही सत्ता व्यक्त होती है। चैतन्य और सुख दोनों ही उनमें व्यक्त नहीं होते । सत्ता चितिर्द्वयं व्यक्तं धीवृत्त्योर्घोरमूढयोः । शान्तवृत्तौ त्रयं व्यक्तं, मिश्रं ब्रह्मेत्थमीरितम् ॥२१॥ घोर और मूढ वृत्तियों में [ब्रह्म के] 'सत्ता' और 'चैतन्य' नाम के दो स्वभाव व्यक्त हुए रहते हैं। शान्तवृत्तियों में तो [ब्रह्म के] सत्ता चैतन्य तथा आनन्द ये तीनों ही स्वभाव व्यक्त होते हैं। इस प्रकार मिश्र [अर्थात् प्रपंच-सहित ] ब्रह्म का निरूपण किया गया । अमिश्रं ज्ञानयोगाभ्यां, तौ च पूर्वमुदीरितौ । आद्येऽध्याये योगचिन्ता ज्ञानमध्याययोर्द्वयोः ॥२२॥ यदि कोई चाहे तो ज्ञान और योग की चलनी में छानकर उस ब्रह्म को अमिश्र अर्थात् प्रपंच से रहित कर सकता है। उन ज्ञानयोगों का वर्णन पहले ही कर दिया गया है। पहले अध्याय में योग का चिन्तन किया गया है। पिछले दो अध्यायों में ज्ञान का वर्णन है।
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६३
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६३ असत्ता जाड्यदुःखे द्वे मायारूपं त्रयं त्विदम् । असत्ता नरशृङ्गादौ जाड्यं काष्ठशिलादिषु ॥२३॥ घोरमूढधियोर्दुःखमेवं माया विजृम्भिता । शान्तादिबुद्धिवृत्त्यैक्यान्मिश्रं ब्रह्मेति कीर्तितम् ॥२४॥ 'असत्ता' 'जडता' तथा 'दुःख' ये तीनों ही माया के स्वरूप हैं। जिनमें से 'असत्ता' मनुष्य के सींगों में होती है, 'जडता,' काष्ट और शिला आदि में पाई जाती है । घोर और मूढ वृत्तियों में दुःख रहता है। इस प्रकार संसार में सब ही जगह माया का प्रतिभास हो रहा है। बुद्धि की जो शान्त आदि वृत्तियाँ हैं उनके साथ एकता हो जाने के कारण वह ब्रह्म शान्त आदि वृत्तियों में मिश्रित हो जाता है। एवं स्थितेऽत्र यो ब्रह्म ध्यातुमिच्छेत् पुमानसौ । नृशृङ्गादिमुपेक्षेत शिष्टं ध्यायेद् यथायथम् ॥२५॥ यह सब कुछ हमने इसलिए कहा है कि जो पुरुष ब्रह्मतत्व का ध्यान करना चाहे, नृशृंगादि के समान मिथ्या पदार्थों की उपेक्षा करके [ जो तत्व शेष रह जाता है, उस ] शेष रहे हुए तत्व का ध्यान यथा योग्य रीति से करता रहे । शिलादौ नामरूपे द्वे त्यक्त्वा सन्मात्रचिन्तनम् । त्यक्त्वा दुःखं घोरमूढधियोः सच्चिद्विचिन्तनम् ॥२६॥ शान्तासु सच्चिदानन्दांस्त्रीनप्येवं विचिन्तयेत् । कनिष्ठमध्यमोत्कृष्टास्तिस्रश्चिन्ताः क्रमादिमाः ॥२७॥ शिलादि के नाम रूपों को छोड़ कर सन्मात्र का चिन्तन करना चाहिए। घोर और मूढ बुद्धियों में से तो दुःख को छोड़ कर ब्रह्म के सच्चिद्रूप का चिन्तन करना चाहिए। सात्विक
५६४ पञ्चदशी शान्त वृत्तियों में तो सत्-चित् तथा आनन्द इन तीनों को भी इसी तरह ध्यान करना चाहिए । ये ऊपर कही तीनों चिन्तायें क्रमानुसार कनिष्ठ मध्यम और उत्कृष्ट कहाती हैं। ये तीनों चिन्तायें एक समान नहीं हैं । मन्दस्य व्यवहारेऽपि मिश्रब्रह्मणि चिन्तनम् । उत्कृष्टं वक्तुमेवात्र विषयानन्द ईरितः ॥२८॥ [ जिन मन्द लोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार नहीं है, वे ] मन्द लोग मिश्र [ सोपाधिक ] ब्रह्म का चिन्तन व्यवहार काल में भी करते रहें तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है । इसी बात को बताने के लिये विषयानन्द का वर्णन हमने किया है । औदासीन्ये तु धीवृत्तेः शैथिल्यादुत्तमोत्तमम् । चिन्तनं, वासनानन्दे ध्यानमुक्तं चतुर्विधम् ॥२९॥ उदासीनावस्था में धीवृत्ति के शिथिल हो जाने पर [ बिना वृत्ति का] सर्वोत्तम चिन्तन [ध्यान] हो जाता है । यों वासना- नन्द में ध्यान चार प्रकार का हो गया । उदासीनता के आ जाने पर बुद्धिवृत्ति के शिथिल हो जाने के कारण [ जब कि किसी प्रकार की भी वृत्ति शेष नहीं रह जाती ] यह बिना वृत्ति का ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे दर्जे का माना गया है । इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान ऊपर के श्लोकों में बताया गया है । इस श्लोक में चौथे अवृत्तिक ध्यान का वर्णन किया गया है । जड में सत्ता का ध्यान
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६५
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६५ मूढ में सत्ता और चैतन्य का ध्यान, सात्विक में सत्ता चित् तथा आनन्द का ध्यान यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान है। न ध्यानं ज्ञानयोगाभ्यां ब्रह्मविद्यैव सा खलु। ध्यानेनैकाग्र्यमापन्ने चित्ते विद्या स्थिरीभवेत् ॥३०॥ इस ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में ज्ञान और योग के द्वारा जिस ध्यान को बताया है वह कोई ध्यान नहीं है। वह तो ब्रह्मविद्या ही है। ध्यान करते करते जब चित्त एकाग्र हो जाता है तब यह ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है। [इसका स्थिर हो जाना ही इसका उत्पन्न होना कहाता है ] विद्यायां सच्चिदानन्दा अखण्डैकरसात्मताम् । प्राप्य भान्ति न भेदेन भेदकोपाधिवर्जनात् ॥३१॥ विद्या [ज्ञान-साक्षात्कार] हो जाने पर तो सत् चित् आनन्द ये तीनों ही अखण्ड एकरस होकर दीखने लगते हैं। फिर ये तीनों पृथक् पृथक् नहीं रहते। क्योंकि उस समय भेदक उपाधियां ही शेष नहीं रहतीं । शान्ता घोराः शिलाद्याश्च भेदकोपाधयो मताः । योगाद् विवेवतो वैषामुपाधीनामपाकृतिः ॥३२॥ शान्त या घोर वृत्तियां तथा शिला आदि पदार्थ ही भेदक उपाधियें मानी गयी हैं। इन उपाधियों का परिहार या तो 'योग' से हो सकता है या फिर 'विवेक' [ज्ञान] से ही इनका परिहार किया जा सकता । निरुपाधिब्रह्मतत्वे भासमाने स्वयंप्रभे । अद्वैते त्रिपुटी नास्ति भूमानन्दोऽत उच्यते ॥३३॥ इस सब का निचोड़ यही है कि—जब उपाधि रहित स्वयं-
५६६ पञ्चदशी प्रकाश भासने लग पड़ता है तब फिर यह दीखने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि उस को 'भूमानन्द' कहा जाता है। ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे पंचमोध्याय ईरितः । विषयानन्द एतेन द्वारेणान्तः प्रविश्यताम् ॥३४॥ ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में विषयानन्द नाम का पांचवां अध्याय समाप्त हुआ। मन्दाधिकारी लोग इसी को द्वार बना कर आत्ममन्दिर में घुस बैठें । प्रीयाद्धरिर्हरोऽनेन · ब्रह्मानन्देन सर्वदा । पायाच्च प्राणिनः सर्वान् स्वाश्रिताञ्छुुद्धमानसान्॥३५॥ इस ब्रह्मानन्द नाम की पुस्तक से हरि और हर प्रसन्न हो जांय । [ अपना प्रसन्न रूप साधकों को दिखाने पर उतारू हो जांय ]। शुद्ध मन वाले जितने भी प्राणी उनके आश्रय में पड़े हैं वे उन सब का पालन करें [ उन्हें इस संसार सागर से पार कर दें । ] इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे विषयानन्दः समाप्तः [ पंचदशी समाप्ता ]
Summary of 15 Chapters
ओम् पंचदशी के प्रत्येक प्रकरण के भावपूर्ण संक्षेप श्लोकों को पढ़ने से पूर्व यदि इन संक्षेपों को पढ़ लिया जायगा तो प्रकरण का भाव समझने में बहुत सहायता मिलेगी ।
The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.