पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् २२१
चित्रदीपप्रकरणम् २२१
बर्ताव करते हैं तो करते रहें। उन सब को जो अपने ब्रह्मत्व का
ज्ञान हुआ है वह तो सब का एक समान ही होता है और मुक्ति
भी उनकी एक समान ही होती है। [सब ही शुद्ध ब्रह्मरूप से स्थित
हो जाते हैं] यही शास्त्र की मर्यादा है।
जगच्चित्रं स्वचैतन्ये पटे चित्रमिवार्पितम् ।
मायया, तदुपेक्ष्यैव चैतन्यं परिशेष्यताम् ॥२८९॥
कपड़े पर खिंचे हुए चित्र की तरह, अपने आत्मचैतन्य में
जो जगत् रूपी चित्र, माया के प्रताप से खिंच गया है, उस
[जगतरूपी चित्र] की उपेक्षा करके [उस की ओर से अपनी
बुद्धि की आँख मींचकर] अपने आत्मचैतन्य को परिशेष
कर डालो।
चित्रदीपमिमं नित्यं येऽनुसन्दधते बुधाः ।
पश्यन्तोऽपि जगच्चित्रं ते मुह्यन्ति न पूर्ववत् ॥२९०॥
जो बुद्धिमान् लोग इस चित्रदीप नाम के प्रकरण का विचार
नित्य ही किया करेंगे, वे इस जगच्चित्र को देखकर भी, पहले की
तरह मोह को कभी प्राप्त नहीं होंगे।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं चित्रदीपप्रकरणं समाप्तम् ।
7. Triptidipa
ओम्
तृप्तिदीपप्रकरणम्
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीर मनुसंज्वरेत् ॥१॥
अस्याः श्रुतेरभिप्रायः सम्यगत्र विचार्यते ।
जीवन्मुक्तस्य या तृप्तिः सा तेन विशदायते ॥२॥
आत्मानं चेद्विजानीयात् वृ० ४-४-१२ इस श्रुति का अभि-
प्राय इस तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार विचारा
जायगा । उससे जीवन्मुक्त महाशयों को जो अलौकिक तृप्ति रहा
करती है वह स्पष्ट विदित हो जायगी ।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
कल्पितावेव जीवेशौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥३॥
माया आभास के द्वारा जीव और ईश्वर का निर्माण किया
करती है, ऐसा श्रुतियों में कहा गया है [इसका विस्तारपूर्वक
प्रतिपादन तत्वविवेक नामक प्रकरण के १५-१६-१७ श्लोकों में है]
सो ये जीव और ईश्वर दोनों ही कल्पित हैं । इन दोनों ने शेष
सब संसार की कल्पना कर डाली है ।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टि रीशेन कल्पिता ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥४॥
ईक्षण से लेकर
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२३
[Header]
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२३
संकल्प किया] प्रवेश तक [कि इस जीव रूप से इसी सृष्टि में
प्रवेश कर जाऊँ] की सब सृष्टि तो ईश्वर की बनायी हुई है ।
जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त सब संसार जीव का बनाया हुआ
है । [क्योंकि वही अपने आप को जागता हुआ या मुक्त होता
हुआ माना करता है । वह इसमें अभिमान रखता है । यदि
यह जीव साधना करके इन सब अवस्थाओं में से अपना अभि-
मान हटा ले तो जाग्रदादि संसार का एकपदे ध्वंस हो जाय ।
जाग्रदादि संसार का वर्णन तो यों है कि—यह प्राणी माया से
मोहित होकर इस मांस के झोंपड़े में अहम्भाव से निवास कर
लेता है तो फिर भले बुरे सभी काम करने लगता है । यह
जाग्रत् काल में अन्न पान आदि नाना भोगों से अपनी तृप्ति
होना मानता है। स्वप्न में यह अपनी माया से ही सम्पूर्ण लोक
को बनाता है और अपने बनाये हुए उसी से सुख दुःख भोगा
करता है । सुषुप्तिकाल में जब सब कुछ विलीन हो जाता है,
जब अज्ञान से अभिभूत हो जाता है, तब सुखरूप हुआ रहता
है । यह तो एक शरीर की जाग्रत् आदि अवस्थायें हुईं । जब
एक शरीर में निवास के कर्म समाप्त हो जाते हैं और जन्मान्तर
देनेवाले कर्मों की बारी आ जाती है तब वही जीव फिर जन्म
लेता है और फिर यों ही जागता है, सपने देखता है और सोया
करता है । यों यह जीव इन जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं और
स्थूल, सूक्ष्म आदि तीनों शरीरों में खेल से करता फिरा करता
है । उसी जीव के कर्मों के प्रताप से यह सब विचित्र जगत्
उत्पन्न हो गया है । जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति आदि के इस प्रपंच को
जो तत्व प्रकाशित कर रहा है, वही ब्रह्म नाम का तत्व मैं हूँ,
२२४ पञ्चदशी
ऐसा यदि किसी को मालूम हो जाय, तो उसका बन्धनों से
छुटकारा हो जाय, उसका कल्पित संसार विलीन हो जाय ।]
भ्रमाधिष्ठानभूतात्मा कूटस्थासंगचिद्वपुः ।
अन्योन्याध्यासतोऽसङ्गधीस्थजीवोऽत्र पूरुषः ॥५॥
यद्यपि यह कूटस्थ [अविकारी] असङ्ग और चित्स्वरूप
ही है। तथापि देहेन्द्रिय आदि के अध्यास रूपी भ्रम का आधार
भी बना हुआ है। वह असङ्ग आत्मतत्व ही अन्योन्याध्यास
की पकड़ में आकर जब परमार्थदृष्टि से [ उससे ] सदा
असम्बद्ध रहने वाली बुद्धि में ठहर कर 'जीव' बन जाता
है, तब ऐसे उस जीव को ही इस श्रुति में 'पूरुष' अथवा
'पुरुष' कहा गया है ।
साधिष्ठानो विमोक्षादौ जीवोऽधिक्रियते, न तु ।
केवलो, निरधिष्ठानविभ्रान्तेः क्वाप्यसिद्धितः ॥६॥
[ जीव शब्द के अर्थ में से हम अधिष्ठानभूत कूटस्थ
चैतन्य को नहीं छोड़ सकते हैं । बुद्धि आदि की कल्पना का
अधिष्ठान कूटस्थ चैतन्य ही, जब बुद्धि में प्रतिबिम्बित हो
जाता है, तब उसे हम 'जीव' कहते हैं। केवल चिदाभास को
हम जीव नहीं कहते। क्योंकि] अधिष्ठान अर्थात् कूटस्थ
चैतन्य के सहित ही यह जीव मोक्ष या स्वर्गादि के साधनों
का अनुष्ठान करने का अधिकारी होता है। केवल चिदाभास
को मोक्षादि का अधिकार ही नहीं है। क्योंकि बिना अधि-
ष्ठान की भ्रान्ति [ आरोप्य पदार्थ ] लोक में कहीं भी देखी
नहीं जाती [ इस कारण जीव शब्द के अर्थ में हमें कूटस्थ
चैतन्य को रखना ही पड़ता है। यदि हम कूटस्थ तत्व को नहीं
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२५
रक्खेंगे तो मोक्ष आदि में अन्वयी कौन होगा ? अर्थात् इन
मोक्षादि को भोगने वाला कौन होगा ? क्योंकि आभास तो
यहीं नष्ट हो जाता है ।]
अधिष्ठानांशसंयुक्तं भ्रमांशमवलम्बते ।
यदा तदाहं संसारीत्येवं जीवोऽभिमन्यते ॥७॥
वह जीव जब तो अधिष्ठानांशसंयुक्त [ अर्थात् कूटस्थ
सहित ] भ्रम भाग [ किंवा चिदाभासयुक्त दोनों शरीरों ] का
अवलम्ब ले लेता है—अथवा यों कहो कि उन दोनों शरीरों
को ही अपना स्वरूप मान लेता है—तब वह समझने लग
पड़ता है कि मैं तो संसारी [क्षुद्र प्राणी] हूँ ।
भ्रमांशस्य तिरस्कारा दधिष्ठानप्रधानता ।
यदा तदा चिदात्माहमसङ्गोऽस्मीति बुध्यते ॥८॥
जब तो वही जीव भ्रमांश [ दोनों देहों सहित चिदाभास ]
का तिरस्कार कर देता है—उनको मिथ्या समझ कर उनकी
परवाह नहीं करता है और ऐसा करने से जब अधिष्ठान की
प्रधानता हो जाती है [ जब वह जीव अधिष्ठानभूत कूटस्थ
स्वरूप ही हो जाता है, जब वह शुद्ध आत्मस्थिति में आ जाता
है ] तब वह जाना करता है कि ओ हो ! 'मैं तो चिदात्मा
हूँ 'मैं तो असङ्ग हूँ ।'
नासङ्गेऽहंकृतियुक्ता कथमस्मीति चेच्छृणु ।
एको मुख्यो द्वावमुख्यौ वित्यर्थस्त्रिविधोऽहमः ॥९॥
जब कि असङ्ग चिदात्मा में [ जो कि अविषय है ] अह-
ङ्कार अथवा मैं भाव का होना ठीक ही नहीं है,तो फिर वह यह
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२२६ पञ्चदशी
[Main Text]
क्यों कर जान सकता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' ? इसका समाधान
भी सुनो कि—अहं के तीन अर्थ हैं—एक मुख्य अर्थ है, तथा
दो उसके अमुख्य अर्थ होते हैं। [भाव यह है कि मुख्यरूप
से तो अहं प्रतीति का विषय आत्मा हो ही नहीं सकता, परन्तु
लक्षणा से उसको 'अहं' कहा ही जा सकता है।]
अन्योन्याध्यासरूपेण कूटस्थाभासयोर्वपुः ।
एकीभूय भवेन्मुख्यस्तत्र मूढैः प्रयुज्यते ॥१०॥
कूटस्थ और आभास इन दोनों का स्वरूप अन्योन्याध्यास
की आँच में पिघल कर जब एकता को प्राप्त कर लेता है तब
बस यही अहं शब्द का 'मुख्य अर्थ' कहाता है। [इसको इस
अहं का मुख्य अर्थ इसी लिये कहते हैं कि कूटस्थ और चिदा-
भास के इसी हिले मिले स्वरूप का जिनको विवेक नहीं है
वे सभी ] मूढ लोग अहं शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया
करते हैं। [अधिक संख्या इसी अर्थ में अहं शब्द का प्रयोग
करने वालों की है। इसलिये इसे ही मुख्य मान लिया है]
पृथगाभासकूटस्था वमुख्यौ तत्र तत्ववित् ।
पर्यायेण प्रयुङ्क्तेऽहंशब्दं लोके च वैदिके ॥११॥
जब तो यह समझ लिया जाय कि आभास अलग है और
कूटस्थ तत्व अलग है, तब [ अलगाये हुए ] वे दोनों अहं के
अमुख्य अर्थ हो जाते हैं। क्योंकि तत्वज्ञानी लोग लौकिक
और वैदिक व्यवहारों में कभी तो कूटस्थ को अहं कहते हैं
और कभी अकेले चिदाभास को अहं कह देते हैं। [भाव यह
है कि—क्योंकि कूटस्थ और चिदाभास का जो मिश्रित रूप है
वही सार्वजनीन व्यवहार का विषय हो रहा है। इससे उसे तो
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अहं का मुख्य अर्थ मान लिया है। इन दोनों के विविक्त रूपों
का व्यवहार तो बहुत थोड़े से मनुष्य (सो भी कभी ही) करते
हैं, इससे उनको अमुख्य अर्थ कहा जाता है।]
लौकिकव्यवहारेऽहंगच्छामीत्यादिके बुधः ।
विविच्यैव चिदाभासं कूटस्थात्तं विवक्षति ॥१२॥
ज्ञानी पुरुष जब लौकिक व्यवहार में 'मैं जाता हूँ' ऐसा
बोलता है तब वह चिदाभास को कूटस्थतत्व से पृथक्
करके ही उस चिदाभास को 'अहं' नाम से कहना चाहता है।
[ज्ञानी पुरुष जब 'मैं जाता हूँ' ऐसा कहता है तब वह यह
कभी नहीं भूलता कि कूटस्थ आत्मतत्व जाने वाला पदार्थ नहीं
है। उसे यह सदा स्मरण रहता है कि यह चिदाभास ही
जाता आता है ]
असङ्गोऽहं चिदात्माहमिति शास्त्रीयदृष्टितः ।
अहंशब्दं प्रयुङ्क्तेऽयं कूटस्थे केवले बुधः ॥१३॥
वही ज्ञानी पुरुष शास्त्रीय दृष्टि को लेकर कभी कभी चिदा-
भास से हीन केवल कूटस्थ तत्व में भी 'अहं' शब्द का प्रयोग
किया करता है कि 'मैं असङ्ग हूँ' 'मैं चिदात्मा हूँ'। [यों मुख्य
तया न सही परन्तु लक्षणा से तो चिदात्मा भी अहं शब्द का अर्थ
हो ही जाता है। इसी कारण 'मैं असङ्ग हूँ' यह ज्ञान भी ठीक
हो जाता है।]
ज्ञानिताज्ञानिते त्वात्माभासस्यैव न चात्मनः ।
तथा च कथमाभासः कूटस्थोऽस्मीति बुध्यताम् ॥१४॥
ज्ञानित्व और अज्ञानित्व दोनों आत्माभास को ही होते हैं।
असङ्ग चिद्रूप आत्मा में न तो ज्ञानता ही हो सकती है और
न अज्ञानिता ही रह सकती है [क्योंकि उसे तो अज्ञान की
निवृत्ति की कुछ आवश्यकता ही नहीं होतो। इसलिये कूटस्थ तो
यह जानता ही नहीं कि मैं कूटस्थ हूँ ] फिर तुम्हें यह बताना
चाहिये कि—आभास को यह ज्ञान कैसे हो सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' ?
नायं दोषश्चिदाभासः कूटस्थैकस्वभाववान् ।
आभासत्वस्य मिथ्यात्वात् कूटस्थत्वावशेषणात् ॥१५॥
यह दोष ठीक नहीं,चिदाभास का असली स्वरूप तो कूटस्थ
ही है। वह चिदाभास कूटस्थ से भिन्न तो सिद्ध हो ही नहीं
सकता। क्योंकि आभासत्व तो मिथ्या ही है [ज्ञान के द्वारा]
उसकी कूटस्थता को शेष रख लिया जाता है [जैसे कि दर्पण
में प्रतीत होने वाले मुखाभास का असली स्वरूप तो गरदन पर
लगा हुआ मुख ही है। इसी प्रकार इसे भी जान लो।]
कूटस्थोऽस्मीति बोधोऽपि मिथ्या चेन्नेति को वदेत्।
न हि सत्यतयाऽभीष्टं रज्जुसर्पविसर्पणम् ॥१६॥
यदि चिदाभास मिथ्या है तो उसके आश्रित रहनेवाला
'मैं कूटस्थ हूँ' यह ज्ञान भी तो मिथ्या ही होना चाहिये ? ऐसा
यदि पूछा जाय तो हम कहेंगे कि फिर इस बात का निषेध
हम कब करते हैं ? [कूटस्थ के स्वरूप के अतिरिक्त और जो
भी कुछ है वह सभी मिथ्या है। फिर इस ज्ञान को मिथ्या
मानना भी तो हमें इष्ट ही. है] देखो, रज्जु में जो सर्प कल्पित
कर लिया गया है,वह जब नष्ट होता हुआ प्रतीत हो तब उस
[विसर्पण] को कोई वास्तविक विसर्पण नहीं मानता है।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९
तादृशेनापि बोधेन संसारो हि निवर्तते ।
यक्षानुरूपो हि बलिरित्याहु लौकिका जनाः ॥१७॥
यद्यपि वह बोध मिथ्या ही है तौ भी उससे मिथ्या संसार
तो निवृत्त हो ही जायगा [ जैसे कि सुपने के झूठे व्याघ्र
को देखकर चौकने से किसी की निद्रा टूट जाती है] लोक में
कहा भी जाता है कि—जैसा यक्ष वैसी बलि, [जैसी शीतला
देवी, वैसी ही उसकी गधे की सवारी । यह इस कारण कहते
हैं कि जब यह संसार मिथ्या ही है तो यह मिथ्या बोध से भी
मर जायगा ] ।
तत्सादाभासपुरुषः सकूटस्थो विविच्य तम् ।
कूटस्थोऽस्मीति विज्ञातुमर्हती त्यभ्यधाच्छ्रुतिः ॥१८॥
[ क्योंकि कूटस्थ ही चिदाभास का निज स्वरूप है ] इस
कारण कूटस्थ सहित जो चिदाभास है वह उस कूटस्थ को
अपने मिथ्या स्वरूप से पृथक् करके [ मुख्य वृत्ति से तो नहीं
किन्तु लक्षणा वृत्ति से तो ] यह जान ही सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' [ मेरा असली रूप कूटस्थ है ] इसी अभिप्राय को
लेकर श्रुति ने 'अस्मि' यह पद कहा है ।
असन्दिग्धाविपर्यस्तबोधो देहात्मनीक्ष्यते ।
तद्वदत्रेति निर्णैतु मयमित्यभिधीयते ॥१९॥
[मूल श्रुति के 'पुरुष' तथा 'अस्मि' इन दो पदों का व्या-
ख्यान यहां तक हो चुका । अब 'अयम्' का व्याख्यान किया
जाता है] लौकिक लोगों को इस प्रसिद्ध देहरूपी आत्मा में
संशय और विपर्यय से रहित बोध पाया जाता है [वे बिना
सन्देह और बिना विपर्यय के इस देह को मैं हूँ कहते हैं । वे
२३० पञ्चदशी
जब बड़े मेलों में घुसते हैं तब -अपने शरीरों पर कोई चिन्ह
करके नहीं घुसते। अपने शरीर के अपने होने में उन्हें कभी
सन्देह नहीं होता ] ठीक इसी प्रकार प्रत्यगात्मा के विषय में
ऐसा ही दृढ़ ज्ञान, मुक्ति को पाने के लिये आवश्यक है। इसी
बात का निर्णय करने के लिये श्रुति में 'अयम्' यह पद कहा है।
देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम्।
आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥२०॥
'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा जो देहात्मविषय में लोगों का दृढ़
निश्चय पाया जाता है, उसके समान ही यदि किसी को
प्रत्यगात्मा के विषय में, देहात्मज्ञान की बाधा करने वाला ज्ञान
हो जाय [कि यही आत्मतत्व मैं हूँ। यही ब्रह्मतत्व मैं हूँ]
वह विद्वान् मुक्त होना न चाहने पर भी मुक्त हो जाता है
[क्योंकि उसका संसार का कारण अज्ञान तो ज्ञान से बाधित
हो चुका है ]
अयमित्यपरोक्षत्व-मुच्यते चेत्तदुच्यताम् ।
स्वयंप्रकाशचैतन्यमपरोक्षं सदा यतः ॥२१॥
'अयम्' का अर्थ लोक में 'अपरोक्षत्व' होता है। सो इस
श्रुति में भी 'अयं' इस शब्द से अपरोक्षता ही लिया गया है,
ऐसा यदि कोई कहे तो उसकी बात भी मान लो कि हाँ यह
अर्थ भी लिया जा सकता है। क्योंकि स्वयंप्रकाश [अर्थात् किसी
साधनान्तर की सहायता के बिना प्रतीत होने वाला] चैतन्य तो
सदा ही प्रत्यक्ष रहता है [यह हमारा सिद्धान्त ही है]
परोक्षमपरोक्षं च ज्ञानमज्ञानमित्यदः ।
नित्यापरोक्षरूपेऽपि द्वयं स्याद् दशमे यथा ॥२२॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
'परोक्ष' और 'अपरोक्ष' का विरोधी जोड़ा इसी प्रकार
'ज्ञान' और 'अज्ञान' का विरोधी जोड़ा, यह दोनों ही नित्य
अपरोक्ष आत्मा में भी हो ही सकते हैं। जैसे कि दशवें में ये
दोनों ही [विरोधी बातें] पाये जाते हैं।
नवसंख्याहृतज्ञानो दशमो विभ्रमात्तदा।
न वेत्ति दशमोऽस्मीति वीक्षमाणोऽपि तान्नव ॥२३॥
[दस आदमी किसी नदी को पार उतरे। उतर कर अपने
आदमियों को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़ कर
शेष नौ को गिन लेता था। परिणाम में वे नदी के किनारे बैठ
कर दसवें को रो रहे थे कि हाय ! दसवाँ डूब गया] उस
गिनने वाले दसवें को अपना जो ज्ञान होता था उस ज्ञान को
नौ (९) की गिनती ने दबा दिया था। वह दसवां, पुरुष उन,
नौ को प्रत्यक्ष देखता भी था। परन्तु भ्रान्ति में फंसकर,
गिनने वाला अपने आप को नहीं जानता था कि 'मैं ही तो
दसवां हूँ' [शेष नवों को देखता था, परन्तु अपनी ओर उस
का ध्यान नहीं जाता था। उस का सारा ध्यान नौ ने खेंच
लिया था]।
न भाति नास्ति दशम इति स्वं दशमं तदा।
मत्वा वक्ति तदज्ञानकृतमावरणं विदुः ॥२४॥
तब वह दसवां पुरुष [यद्यपि वह स्वयं ही दशवां है, फिर
भी] अपने ही को कह बैठता है कि—दसवां न तो मुझे प्रतीत
ही होता है और न दसवां है ही। बुद्धिमान लोग इसी को तो
अज्ञान का किया हुआ आवरण [परदा] बताते हैं।
२३२ पञ्चदशी
नद्यां ममार दशम इति शोचन् प्ररोदिति ।
अज्ञानकृतविक्षेपं रोदनादिं विदुर्बुधाः ॥२५॥
अब वह दसवां मनुष्य शोक करता और रोता है कि हाय !
दसवां तो नदी में डूब मरा । बुद्धिमान् लोग इस रोदन आदि
को अज्ञान का किया हुआ विक्षेप समझते हैं ।
न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा ।
परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत् ॥२६॥
जब कोई आप्त पुरुष आकर कहता है कि—भाई दसवां
मरा नहीं, वह तो यहीं है, तब इस आप्त वचन को सुनकर
परोक्षरूप से दसवें को जान जाता है । जैसे शास्त्र के कहने से
स्वर्गादिलोक को परोक्षरूप से जान लिया जाता है ।
त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः ।
अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति ॥२७॥
उस आप्त पुरुष ने, नौ को गिनने के बाद उससे कह दिया
[बता दिया] कि 'दसवां तो तू ही है' बस अब तो उसने अपरोक्ष-
रूप से अपने आपको जान लिया कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ।
अब तो वह परमहृष्ट होता है, अब वह पहले की तरह रोता नहीं है।
अज्ञानावृतिविक्षेपद्विविधज्ञानतृप्तयः ।
शोकापगम इत्येते योजनीयाश्चिदात्मनि ॥२८॥
(१) अज्ञान (२) आवरण (३) विक्षेप (४) परोक्षज्ञान
(५) अपरोक्ष ज्ञान (६) तृप्ति तथा (७) शोकनाश ये सातों
अवस्थायें जो दृष्टान्तभूत दसवें में दिखाई गयी हैं, दार्ष्टान्तिक
चिदात्मा में भी लगा लेनी चाहियें ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
संसारासक्तचित्तः संश्चिदाभासः कदाचन ।
स्वयंप्रकाशकूटस्थं स्वतत्त्वं नैव वेत्ययम् ॥२९॥
यह विचारा चिदाभास, संसार अर्थात् विषयोपार्जन के
ध्यान में मस्त हुआ हुआ, अपने स्वयं प्रकाश कूटस्थ आत्मतत्व
को कभी पहचानता ही नहीं [वह तो दिन रात शरीर आदि
की चाकरी में लगा रहता है, उसे आत्मतत्व को पहचानने की
फुर्सत ही नहीं है । वह अपने आत्मतत्व की बात को एक
अप्रासंगिक (बे मौक़े) बात समझता है । बात चीत चलने
पर वह आत्मतत्व को खूब ही फटकारता है, बस यही उस की
अज्ञान नाम की पहली अवस्था कहाती है]
न भाति नास्ति कूटस्थ इति वक्ति प्रसङ्गतः ।
कर्ता भोक्ताहमस्मीति विक्षेपं प्रतिपद्यते ॥३०॥
चिदात्मा के विषय की जब बात चीत चलती है तब सदा
यही कहता है कि महाशय कूटस्थ का न तो मुझे भान ही
होता है और न वह है ही [यही अज्ञान की की हुई आवरण
नाम की दूसरी अवस्था कहाती है] इसी से आत्मा को यह
कहने लगता है कि 'मैं कर्ता हूँ' 'मैं भोक्ता हूँ' यही विक्षेप नाम
की तीसरी अवस्था होने लगती है ।
अस्ति कूटस्थ इत्यादौ परोक्षं वेत्ति वार्तया ।
पश्चात् कूटस्थ एवास्मीत्येवं वेत्ति विचारतः ॥३१॥
बात चीत में जब कोई समझाता है तब उसे परोक्षज्ञान नाम
की चौथी अवस्था आ जाती है कि 'कूटस्थ है' [श्रवणादि का
जब परिपाक हो जाता है तब] पीछे से वह यह प्रत्यक्ष रूप से
१५
२६४ पञ्चदशी
जानता है कि मैं तो कूटस्थ ही हूँ । यही उसकी अपरोक्षज्ञान
नाम की पांचवीं अवस्था कहाती है ।
कर्ता भोक्तेत्येवमादिशोकजातं प्रमुञ्चति ।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव तुष्यति ॥३२॥
[कूटस्थ असङ्ग आत्मा का ज्ञान जब हो जाता है तब]
कर्ता भोक्ता आदि जितने भी शोक हैं उन सब को छोड़ देता है।
[यही शोकापगम नाम की छठी अवस्था कहाती है] । जो कुछ
करना था सो कर लिया, जो कुछ पाना था सो पा लिया, ऐसा
समझ कर वह संतुष्ट हो जाता है । [यही उसकी तृप्ति नाम की
सातवीं अवस्था कहाती है] ।
अज्ञान मावृति स्तद्वद् विक्षेपश्च परोक्षधीः ।
अपरोक्षमत्तिः शोकमोक्ष स्तृप्ति निरंकुशा ॥३३॥
अज्ञान, आवरण, विक्षेप, परोक्षज्ञान, अपरोक्षज्ञान, शोक-
राहित्य और निरङ्कुश तृप्ति [यों ये सातों अवस्थाएं इस
दाष्ट्रान्तिक में भी होती हैं]।
सप्तावस्था इमाःसन्ति चिदाभासस्य तास्वसौ ।
बन्धमोक्षौ स्थितौ, तत्र तिस्त्रो बन्धकृतः स्मृताः॥३४॥
ये सातों अवस्थाएं चिदाभास की ही हैं। [कूटस्थ की नहीं]
ये बन्ध और मोक्ष इन सातों अवस्थाओं में ही समा जाते हैं।
इन सातों में पहली तीन [अज्ञान आवरण तथा विक्षेप] अवस्थाएं
बन्ध करने वाली हैं। [पिछली चार मोक्ष की अवस्थाएं हैं] ।
न जानामीत्युदासीनव्यवहारस्य कारणम् ।
विचारप्रागभावेन युक्तमज्ञानमीरितम् ॥३५॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३५
जिसके साथ आत्मतत्व के विचार का प्रागभाव नियम
से रहता हो, तथा जो ‘हम नहीं जानते आत्मतत्व क्या चीज़
है’ ऐसा उदासीन व्यवहार कराता हो, उसी को ‘अज्ञान’
कहते हैं।
अमार्गेण विचार्याथ नास्ति नो भाति चेत्यसौ ।
विपरीतव्यवहृति रावृतेः कार्यमिष्यते ॥३६॥
[शास्त्रोक्त पद्धति को छोड़ कर] जब अमार्ग (केवल तर्क)
से विचार करके, यह विपरीत व्यवहार किया जाने लगता है
कि ‘कूटस्थ न तो है ही और न प्रतीत ही होता है’ तब इसी
को ‘आवरण का कार्य’ कहते हैं।
देहद्वयचिदाभासरूपो विक्षेप ईरितः ।
कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्योऽस्य बन्धकः॥३७॥
स्थूल और सूक्ष्म दोनों देहों के सहित जो चिदाभास है
वही ‘विक्षेप’ कहाता है। बन्धक अर्थात् बन्धन कराने वाला
कर्तृत्व प्रमातृत्व रूपी जो संसार नाम का सम्पूर्ण शोक है वह
सब इसी चिदाभास का उत्पन्न किया हुआ है।
अज्ञानमावृतिश्चैते विक्षेपात् प्राक् प्रसिद्धयतः ।
यद्यप्यथाप्यवस्थे ते विक्षेपस्यैव नात्मनः ॥३८॥
यद्यपि ‘अज्ञान’ और ‘आवरण’ ये दोनों अवस्थाएं विक्षेप
से पहली हैं, तौ भी ये दोनों अवस्थाएं आत्मा की नहीं हैं
[क्योंकि असङ्ग होने के कारण आत्मा की तो कोई अवस्था
[ही नहीं होती] और कोई गति न होने से इनको चिदाभास की
ही अवस्था मानना पड़ता है।
[ उत्पादक ] संस्कार तो थे ही, इस कारण से 'अज्ञान' और
२३६ पञ्चदशी
विक्षेपोत्पत्तितः पूर्वमपि विक्षेपसंस्कृतिः ।
अस्त्येव तदवस्थात्वमविरुद्धं ततस्तयोः ॥३९॥
जब तक विक्षेप उत्पन्न नहीं हुआ था, तब भी विक्षेप के
[ उत्पादक ] संस्कार तो थे ही, इस कारण से 'अज्ञान' और
'आवरण' दोनों को विक्षेप की अवस्था कहने में कोई विरोध
नहीं रह जाता ।
ब्रह्मण्यरारोपितत्वेन ब्रह्मावस्थे इमे इति ।
न शङ्कनीयं, सर्वासां ब्रह्मण्येवाधिरोपणात् ॥४०॥
[अज्ञात रहने वाले संस्कारों के सहारे से, इन दोनों को
विक्षेप की अवस्था कहने से तो यही अच्छा है कि ] ब्रह्म में
आरोपित होने से इन दोनों को ब्रह्म की ही अवस्था मान लिया
जाय, ऐसी शंका न करनी चाहिए । क्योंकि यों तो सारी ही
अवस्थाएं ब्रह्म में आरोपित हैं [ फिर तो सभी को ब्रह्म की
अवस्था कह देना होगा ] ।
संसार्यहं विबुद्धोहं निःशोकस्तुष्ट इत्यपि ।
जीवगा उत्तरावस्था भान्ति न ब्रह्मगा यदि ॥४१॥
तर्ह्यज्ञोहं ब्रह्मसत्वभाने मद्दृष्टितो नहि ।
इति पूर्वे अवस्थे च भासेते जीवगे खलु ॥४२॥
मैं संसारी [ कर्तृत्व आदि धर्म वाला ] हूँ, मैं विबुद्ध हूँ
अर्थात् मुझे तत्व का साक्षात्कार हो चुका है, अब मुझे शोक
नहीं रहा, मैं अब पूर्ण तुष्ट हो चुका हूँ, ये पिछली चारों अव-
स्थाएं तो स्पष्ट ही जीव के आश्रित प्रतीत हो रही हैं,इस कारण
हम इन चारों को ब्रह्माश्चित नहीं कहते हैं । किन्तु विक्षेप से
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३७
पहली उन दो अवस्थाओं को (अज्ञान और आवरण को) ही
ब्रह्माश्चित कहते हैं, ऐसी शंका यदि कोई करे तो उससे कहो कि
तब तो पहली दोनों (अज्ञान और आवरण नाम की) अवस्थाएं
भी जीव के आश्रित ही प्रतीत होती हैं, इसलिए वे जीव की
ही अवस्थाएं हैं, तभी तो कहा जाता है कि मैं अज्ञ हूँ, ब्रह्म
की सत्ता और ब्रह्म का भान मेरे अनुभव में आता ही नहीं।
अज्ञानस्याश्रयो ब्रह्मेत्यधिष्ठानतया जगुः।
जीवावस्थात्वमज्ञानाभिमानित्वादवादिषम् ॥४३॥
पूर्वाचार्यों ने जो ब्रह्म को अज्ञान का आश्रय कहा है,उनका
तात्पर्य उसे अधिष्ठान बताने में ही है। हमने तो अज्ञान का
अभिमानी होने से उस (अज्ञान) को जीव की अवस्था कह
दिया था।
ज्ञानद्वयेन नष्टेऽस्मिन्नज्ञाने तत्कृतावृत्तिः।
न भाति नास्ति चेत्येषा द्विविधापि विनश्यति ॥४४॥
परोक्षज्ञान और अपरोक्षज्ञान के द्वारा जब यह आवरण
करने वाला अज्ञान नष्ट हो जाता है,तब उस अज्ञान का उत्पन्न
किया हुआ दोनों ही प्रकार का आवरण* 'कि वह नहीं है और
प्रतीत भी नहीं होता है' विनष्ट हो जाता है [क्योंकि उसका
कारण ही नहीं रहता। यों परोक्षज्ञान और अपरोक्षज्ञान नाम
की दोनों अवस्थाएं अज्ञान और आवरण को हटा कर मुक्ति का
कारण हो जाती हैं]।
*आवरण दो प्रकार का होता है एक असत्वापादक [नहीं है
कहलाने वाला] कि वह है.ही नहीं, दूसरा अभानापादक [प्रतीत नहीं
होता कहलाने वाला] कि वह मुझे प्रतीत नहीं होता।
२३८ पञ्चदशी
परोक्षज्ञानतो नश्येदसत्वावृतिहेतुता ।
अपरोक्षज्ञाननाश्या ह्यभानावृतिहेतुता ॥४५॥
['कूटस्थ है' ऐसा] परोक्षज्ञान जब हो जाता है, तब
अज्ञान की असत्वावरण शक्ति नष्ट हो जाती है [फिर वह
साधक 'ब्रह्म नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहता] जब तो [मैं ही
कूटस्थ हूँ' ऐसा] प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है फिर [कूटस्थ की
प्रतीति मुझे नहीं होती ऐसा] अभानावरण भी भाग जाता है ।
[असत्वावरण अनुभवीगुरु के समझाने से जाता है,अभानावरण
अपने प्रयत्न से साक्षात् होने पर हटाया जाता है ] ।
अभानावर्णे नष्टे जीवत्वारोपसंक्षयात् ।
कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्यो निवर्तते ॥४६॥
[पिछली दोनों अवस्थायें ज्ञान का फल हैं । अब उन में
से पहली शोकनिवृत्ति नाम की अवस्था को कहा जाता है कि]
अभानावरण जब निवृत्त हो जाता है तब भ्रान्ति से प्रतीत
होने वाला जीवत्व भी नहीं रहता और फिर तो [जीव भाव
के कारण बना हुआ] कर्ता भोक्ता रूपी संसार नाम का सभी
शोक भाग जाता है ।
निवृत्ते सर्वसंसारे नित्यमुक्तत्वभासनात् ।
निरङ्कुशा भवेत् तृप्तिः पुनः शोकासमुद्भवात् ॥४७॥
जब [कर्तृत्व आदि रूप वाला] सब संसार नहीं रहता
तब [मेघों के हट जाने से सूर्य का भास जैसे हो जाता है उसी
तरह] आत्मा के नित्यमुक्तपने का भास होने लगता है । फिर
तो निर्मर्याद तृप्ति हो जाती है । क्योंकि फिर कभी शोक की
उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३९
अपरोक्षज्ञानशोकनिवृत्याख्ये उभे इमे ।
अवस्थे जीवगे ब्रूते आत्मानं चेदिति श्रुतिः ॥४८॥
चिदाभास की जो सात अवस्थायें ऊपर बतायी गयी हैं,
उनमें जो 'प्रत्यक्षज्ञान' और 'शोकनिवृत्ति' नाम की दो पिछली
अवस्थायें जीवों में पायी जाती हैं, उन्हीं का प्रतिपादन'आत्मानं
चेद्विजानीयात्' इस श्रुति ने किया है । [यों हम ने प्रकरण से
बाहर कुछ भी वर्णन नहीं किया ।]
अयमित्यपरोक्षत्वमुक्तं तद् द्विविधं भवेत् ।
विषयस्वप्रकाशत्वाद् धियाप्येवं तदीक्षणात् ॥४९॥
'अयम्' यह शब्द जिस अपरोक्षता का वर्णन करता है.
वह अपरोक्षता दो तरह की होती है । एक तो यह कि वह
विषय ही स्वयं प्रकाश है [वह अपने व्यवहार के लिये दूसरे
साधन का मुँह ही नहीं तकता] दूसरे यह कि बुद्धि से भी उस
आत्मा को स्वयं प्रकाश ही देख या जान लिया जाता है । [यह
आत्मवार्ता तोतों के राम राम की तरह केवल कहने ही कहने
की न रह जाय, किन्तु अपने हृदय को जब इस महान तत्व
की दीक्षा दे दी जाती है,जब हृदय पटल में अनुभव के अक्षरों
में लिख कर आत्मवार्ता टांग दी जाती है, उस अवस्था का
वर्णन इसमें है ]
परोक्षज्ञानकालेऽपि विषयस्वप्रकाशता ।
समा, ब्रह्म स्वप्रकाशमस्तीत्येवं विवोधनात् ॥५०॥
जब किसी को उसका परोक्षज्ञान हो ( प्रत्यक्ष न हुआ हो )
तब भी आत्मा नाम का विषय तो स्वप्रकाश रहता ही है ।
२४० पंचदशी
परोक्षज्ञान के समय भी वह ब्रह्म स्वयंप्रकाश ही रहता है] क्यों
कि तब [परोक्षज्ञान के समय] उसे यही ज्ञान तो होता है कि
स्वयंप्रकाश ब्रह्म नाम की वस्तु इस संसार में है।
अहं ब्रह्मेत्यनुल्लिख्य ब्रह्मास्तीत्येवमुल्लिखत् ।
परोक्षज्ञानमेतन्न भ्रान्तं वाधानिरूपणात् ॥५१॥
परोक्षज्ञान में केवल इतनी ही कमी तो है कि वह साधक
के हृदय में 'मैं ब्रह्म हूँ' इस महावार्ता को [अनुभव के अक्षरों
में] लिख नहीं देता है। वह तो उसे केवल यही बताता है कि
ब्रह्म नाम का कोई पदार्थ है। सो भाई ! यह परोक्षज्ञान भ्रान्त
ज्ञान नहीं है क्योंकि इस [परोक्षज्ञान] की बाधा का निरूपण
तो हो ही नहीं सकता। [इस परोक्षज्ञान को अधूरा ज्ञान तो
कह सकते हैं, भ्रान्त नहीं कह सकते]
ब्रह्म नास्तीति मानं चेत् स्याद् वाध्येत तदा ध्रुवम् ।
न चैवं प्रबलं मानं पश्यामोऽतो न बाध्यते ॥५२॥
[परोक्षज्ञान की बाधा नहीं होती, इसी को स्पष्ट करके
दिखाया जाता है कि] यदि कोई ऐसा प्रमाण मिल जाता जो
यह सिद्ध कर देता कि 'ब्रह्म नहीं है' तब तो निश्चय ही इस
परोक्षज्ञान की भी बाधा हो जाती। परन्तु ऐसा प्रबल प्रमाण
तो हमें मिलता ही नहीं। इससे [हम तो यही कहते हैं कि]
इस परोक्षज्ञान की बाधा नहीं होती है।
व्यक्त्यनुल्लेखमात्रेण भ्रमत्वे स्वर्गधीरपि ।
भ्रान्तिः स्याद्व्यक्त्यनुल्लेखात् सामान्योल्लेखदर्शनात् ॥
परोक्षज्ञान से ब्रह्मव्यक्ति का उल्लेख नहीं होता है, केवल
इतने से कारण से यदि परोक्षज्ञान को भ्रान्तज्ञान माना जायगा