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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् २०१

चित्रदीपप्रकरणम् २०१
मुमुक्षुभाव ही रहता है और न कभी यह मुक्त ही होता है ।
यही परमार्थ है । [ निरोध, उत्पत्ति, बद्धता, साधक भाव,
मुमुक्षुत्व तथा मुक्ति यह कुछ भी वास्तविक नहीं है ।
ये सब तो आत्म-सागर में आने वाली क्षुद्र लहरें हैं। ये
सब तो आत्मसमुद्र में उठ खड़े हुए तुच्छ बुलबुले हैं। समुद्र के
गम्भीर अन्तस्तल के नाई यह आत्मसागर सदा शान्त और एक-
रस ही बना रहता है । उपर्युक्त घटनाओं में से एक भी घटना
'पारमार्थिक नहीं है । बस यही सम्पूर्ण शास्त्रों का निचोड़ किंवा
परमार्थ बात है ] ।
मायाख्यायाः कामधेनो र्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ ।
यथेच्छं पिबतां द्वैतं तत्त्वं त्वद्वैतमेव हि ॥२३६॥
इस सब कथन का सारांश तो यही है कि माया नाम की एक
कामधेनु है, उसके दो बच्चे हैं, एक का नाम 'जीव' है दूसरे का
नाम 'ईश्वर' है । वे दोनों बच्चे द्वैत रूपी दूध को भले ही पेट
भर भर पीते रहें [ वे इसमें किलोलें किया करें ] परन्तु तत्व
तो अद्वैत ही है ।
कूटस्थब्रह्मणोर्भेदों नाममात्रादृते न हि ।
घटाकाशमहाकाशौ वियुज्यते न हि क्वचित् ॥२३७॥
कूटस्थ और ब्रह्म [ दोनों ही पारमार्थिक हैं परन्तु इनका
भेद पारमार्थिक नहीं है क्योंकि इन ] का भेद तो नाम मात्र के
अतिरिक्त कुछ भी नहीं है [ इनका भेद तो कहने ही कहने को
है ] जैसे घटाकाश और महाकाश [ कहने ही कहने को पृथक्
पृथक् होते हैं वस्तुतः इन दोनों ] का पार्थक्य कभी
नहीं होता ।
१३

की उत्पत्ति से पहले जिस अद्वैत ब्रह्मतत्व का प्रतिपादन किया

२०२ पञ्चदशी
यदद्वैतं श्रुतं सृष्टेः प्राक्, तदेवाद्य, चोपरि।
मुक्तावपि, वृथा माया भ्रामयत्यखिलान् जनान् ॥२३८॥
सदेव सोम्येदमग्र आसीत् (छा० ६-२-१) इस श्रुति में सृष्टि
की उत्पत्ति से पहले जिस अद्वैत ब्रह्मतत्व का प्रतिपादन किया
गया है, वही अद्वैत तत्व तीनों कालों में रहता है—वही आज
भी मौजूद है और भविष्यत् में मुक्ति हो जाने पर भी वही बना
रहेगा [इतना होने पर भी सभी को जो भेद का पक्षपात हो
रहा है उसका कारण तो यह है कि] इस माया ने इन लोगों
को वृथा ही भरमा रक्खा है [तत्व ज्ञान से हीन होने के कारण
इन लोगों को ऐसा अभिनिवेश हो गया है।]
ये वदन्तीत्थमेतेपि भ्राम्यन्ते विद्ययात्र किम् ?
न यथापूर्वमेतेषामत्र भ्रान्ते रदर्शनात् ॥२३९॥
प्रपंच को मायामय और तत्व को अद्वितीय जो लोग बताते
हैं, वे भी तो [अविद्या के वश में आकर] भरमाये फिर ही रहे
हैं—[वे भी तो संसार में फँसे ही देखे जाते हैं] ऐसी कोरी
विद्या किंवा ऐसे कोरे तत्वज्ञान का फिर हम क्या करें? ऐसी
शंका करने वाले से कहो कि इन लोगों को यहाँ पहले जैसी
भ्रान्ति नहीं रह गयी है [प्रारब्ध कर्म के वश से वे लोग व्यव-
हार में फँसे भी रहें परन्तु इनको पहले जैसा अभिनिवेश (आग्रह
आसक्ति] नहीं होता है क्योंकि बन्धन मन की चीज है, वह ज्ञानी
का टूट जाता है। अद्वैत तत्व भावप्रधान है। क्रियाओं को देख कर
तत्वज्ञानी का निश्चय नहीं हो सकता। क्रिया तो ज्ञानी और
अज्ञानी दोनों एक ही जैसी करते हैं। भेद इतना है कि ज्ञानी
नाटक के पात्रों की तरह अपने हिस्से आया काम कर जाता

चित्रदीपप्रकरणम् २०२

चित्रदीपप्रकरणम् २०२
है और अज्ञानी रो झींक कर अपने हिस्से आया काम असक्ति
या द्वेष से करता है।
ऐहिकामुष्मिकः सर्वः संसारो वास्तवस्ततः ।
न भाति नास्ति चाद्वैतमित्यज्ञानिविनिश्चयः ॥२४०॥
[स्त्री पुत्रादि का पोषण आदि] ऐहिक तथा [स्वर्ग सुखादि
का अनुभव आदि] आमुष्मिक यह सब संसार वास्तव ही है
और अद्वैत नाम की कोई चीज़ न तो प्रतीत ही होती है और
न वह है ही। बस यही अज्ञानी लोगों की धारणा होती है।
ज्ञानिनो विपरीतोऽस्मान्निश्चयः सम्यगीक्ष्यते ।
स्वस्वनिश्चयतो बद्धो मुक्तोऽहं चेति मन्यते ॥२४१॥
ज्ञानी लोगों को तो इससे विपरीत निश्चय होता है, जो
ज्ञानियों में स्पष्ट ही देखा जाता है [ वे समझते हैं कि अद्वैत ही
एक पारमार्थिक वस्तु है तथा उन्हें अद्वैत की प्रतीति भी होती
है। संसार को तो वे निश्चित रूप से अपारमार्थिक किंवा मिथ्या
समझे रहते हैं। हम तो यही समझते हैं कि] अपने अपने निश्चय
के अनुसार कोई अपने को बद्ध और कोई अपने को मुक्त माना
करते हैं।
नाद्वैतमपरोक्षं चेन्न चिद्रूपेण भासनात् ।
अशेषेण न भातं चेद् द्वैतं किं भासतेऽखिलम् ॥२४२॥
'अद्वैत तो किसी को प्रत्यक्ष ही नहीं होता है ऐसा कहना
ठीक नहीं है। क्योंकि 'घट की स्फूर्ति होती है, पट की स्फूर्ति
होती है' इत्यादि चिद्रूप से उस अद्वैततत्व की प्रतीति सभी को
[ सब पदार्थों में ] हो रही है। इस पर भी यदि यह कहो कि
सम्पूर्ण अद्वैत का भान तो किसी को होता ही नहीं, तो हम यह

२०४ पंचदशी
कहेंगे कि ऐसे तो सम्पूर्ण द्वैत का भान भी किसी को नहीं होता
है [यों यह दोष दोनों पक्षों में समान ही है]
दिङ्मात्रेण विभानं तु द्वयोरपि समं खलु ।
द्वैतसिद्धिर्यदद्वैतसिद्धिस्ते तावता न किम् ॥२४३॥
एक देश का भान हो जाना तो द्वैत और अद्वैत दोनों पक्षों
में समान ही है। द्वैत के किसी एक देश को देखकर जैसे तुम
सम्पूर्ण द्वैत को सिद्ध कर लेते हो [उस पर विश्वास कर लेते हो]
इसी प्रकार अद्वैत के एक देश को जानकर अद्वैत का निश्चय तुम्हें
क्यों नहीं होता है सो हमें भी बताओ ?
द्वैतेन हीन मद्वैतं, द्वैतज्ञाने कथं त्विदम् ।
चिद्भानं त्वविरोध्यस्य द्वैतस्यातोऽसमे उभे ॥२४४॥
पूर्वपक्षी कहता है कि, द्वैत से जो हीन हो वही तो 'अद्वैत'
है । सो भाई, जब तक द्वैत का ज्ञान बना हुआ है तब तक अद्वैत
ठहरेगा ही कैसे यह हमें बताओ ? [२४२ श्लोक में तुम कह
चुके हो कि चिद्रूप से अद्वैततत्व का भास हो रहा है सो तुम्हारा
वह] चिद्भान तो इस द्वैत का विरोध करता ही नहीं । इस कारण
तुम हमारी तरह यह नहीं कह सकते हो कि अद्वैत का विरोधी
होने से अद्वैत के रहते रहते द्वैत की सिद्धि कैसे हो जायगी ।
एवं तर्हि शृणु द्वैतमसन् मायामयत्वतः ।
तेन वास्तवमद्वैतं परिशेषाद् विभासते ॥२४५॥
सिद्धान्ती इसका उत्तर यों देता है—हम जो द्वैत को असत्
बताते हैं उसका कारण भी हम से सुन लो—हमारा कहना है
कि मायामय होने के कारण यह द्वैत असत् है । जब इस प्रकार
द्वैत का निषेध कर डाला जाता है तब परिशेष से वास्तव अद्वैत ही

चित्रदीपप्रकरणम् २०५

चित्रदीपप्रकरणम् २०५

ज्ञानी को भासने लगता है । [प्राप्त हुए सभी पदार्थों का निषेध
करते जाने पर जहां हमारा निषेध लागू न हो सकता हो उसका
सत्यत्व निश्चय कर लेना ‘परिशेष’ है।
अचिन्त्यरचनारूपं मायैव सकलं जगत् ।
इति निश्चित्य वस्तुत्वमद्वैते परिशेष्यताम् ॥२४६॥
इस जगत् की न तो रचना ही समझ में आती है और न
इसका कुछ रूप ही ध्यान पर चढ़ता है यों ‘अचिन्त्यरचना’ और
‘अचिन्त्यरूप’ वाला होने से यह सम्पूर्ण जगत् ‘माया’ किंवा
‘मिथ्या’ ही है । इस प्रकार अनिर्वचनीय होने के कारण द्वैत के
मिथ्यात्व का निश्चय करके, परिशेष से अद्वैत को ही वास्तव
समझ लेना चाहिये ।
पुनर्द्वैतस्य वस्तुत्वं भाति चेत् त्वं तथा पुनः ।
परिशीलय कोवात्र प्रयासस्तेन ते वद ॥२४७॥
यदि तो पूर्ववासनाओं की प्रबलता से फिर फिर द्वैत की
सत्यता का भान तुम्हें होता हो तो, तुम्हें चाहिये कि तुम फिर
फिर विचार किया करो । बताओ कि विचार करने में तुम्हें कौन
सी मेहनत पड़ेगी ? [यही बात ‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’ इस सूत्र
में वेदान्त दर्शन के चतुर्थ अध्याय में कही गयी है कि आत्मा के
श्रवणादि की आवृत्ति करते रहना चाहिये। क्योंकि अनादि काल
की द्वैतवासनायें साधक पर लौट लौट कर हमला करेंगी।
अपना पूर्वाधिकार पाने के लिये जी तोड़ कोशिश करेंगी। इस
लिये भुलावे से बचने के लिये साधक को विवेक को दुहराते
रहना चाहिये ] ।

२०६ पञ्चदशी
कियन्तं कालमिति चेत् खेदोऽयं द्वैत इष्यताम् ।
अद्वैते तु न युक्तोऽयं सर्वानर्थनिवारणात् ॥२४८॥
'विचार कब तक करें' यह खेद तो द्वैत में ही हो सकता है,
सम्पूर्ण अनर्थों का निवारण हो जाने से अद्वैत में तो यह खेद
युक्त ही नहीं है ।
यदि पूछो कि फिर कितने समय तक इस प्रकार विचार
करते चलें तो उसका उत्तर यह है कि—प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त हो
जाने पर यह विचार स्वयमेव समाप्त हो जाता है, यह बात इसी
प्रकरण के पन्द्रहवें श्लोक में कही जा चुकी है । विचार करते
जाने का अनन्त खेद तो द्वैतवाद में ही हो सकता है। आत्म-
दर्शन हो जाने पर सम्पूर्ण अनर्थों के भाग जाने से, अद्वैत में तो
यह खेद करना, किंवा अपने सामने एक अनन्त काम पड़ा हुआ
देखना, युक्त ही नहीं है । जब अद्वैत का पूर्ण साक्षात्कार होगा
तब विचार अपने आप छूट जायगा । विचार का अपने आप
छूट जाना, पेट भरी हुई जोक (जलौका) की तरह गिर पड़ना,
ही अद्वैत प्राप्ति की सूचना है ।
क्षुत्पिपासादयो दृष्टा यथापूर्वं मयीति चेत् ।
मच्छब्दवाच्येऽहंकारे दृश्यतां नेति को वदेत् ॥२४९॥
अद्वैत को समझ लेने पर अब भी पहले ही की तरह मैं तो
अपने में उन्हीं पहले की भूख प्यासों को देख रहा हूँ । फिर
आत्मज्ञान को सम्पूर्ण अनर्थों को भगा देने वाला कैसे मान
लूँ ? ऐसा यदि कहा जाय तो उसका उत्तर यह है कि [मैं के दो
अर्थ होते हैं एक 'अहंकार' दूसरा 'चिदात्मा' । सो भाई असंग
और अविषय होने के कारण चिदात्मा को तो भूख प्यास लगती

चित्रदीपप्रकरणम् २०७

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ही नहीं।] ये भूख प्यास आदि तो मैं के अहंकार रूपी (दूसरे)
अर्थ में ही पायी जाती हैं। भूख प्यास लगने को तो कोई भी मना
नहीं करता है। [हमारा कहना तो केवल इतना ही है कि—
चिदात्मतत्व को भूख प्यास नहीं लगतीं, अहंकार को लगती हैं]
चिप्द्रेऽपि प्रसज्येरंस्तादात्म्याध्यासतो यदि ।
माध्यासं कुरु किन्तु त्वं विवेकं कुरु सर्वदा ॥२५०॥
यदि [कहा जाय कि चिदात्मा में भूख प्यास वस्तुतः न होती
हों तो न हों किन्तु] तादात्म्याध्यास किंवा भ्रम से तो चिदात्मा
में भी यदि भूख प्यास लगने लगें तो हम क्या करें ? इसका
उत्तर यह है कि [इस बात को पहचानने के बाद तुम यह करो
कि] अनर्थ की जड़ इस अध्यास को करना ही छोड़ दो और
अध्यास को निवृत्त करने के लिये सदा ही विवेक करते रहा करो।
झटित्यध्यास आयाति दृढवासनयेति चेत् ।
आवर्तयेद् विवेकं च दृढं वासयितुं सदा ॥२५१॥
यदि तो अनादि दृढ वासनाओं की प्रबलता से यह गया
हुआ भी अध्यास वार बार लौट कर आता हो तो, उसको निवृत्त
करने के लिये विवेक की आवृत्ति ही करनी चाहिये। जिससे कि
विवेक की वासनायें दृढ हो जांय [इसके अतिरिक्त अध्यास को
हटाने का अन्य कोई भी उपाय नहीं है। जैसे अध्यास ने हमारे
हृदय में जड़ पकड़ ली हैं इसी तरह विवेक को बद्धमूल करने के
लिये—अध्यास की जगह विवेक को दे देने के लिये—विवेक
की अनन्त आवृत्तियें करनी पड़ेंगी]।
विवेके द्वैतमिथ्यात्वं युक्त्यैवेति न भण्यताम् ।
अचिन्त्यरचनात्वस्यानुभूतिर्हि स्वसाक्षिकी ॥२५२॥

विचार करने पर द्वैत का मिथ्यापन तो केवल युक्ति से ही
सिद्ध होता है। अनुभव से द्वैत का मिथ्यापन सिद्ध नहीं होता
ऐसा कभी भी न कहना चाहिये। क्योंकि इस द्वैत के अचिन्त्य
रचनापने का किंवा मिथ्यापने का जो अनुभव होता है उसका
साक्षी तो अपना आत्मा ही है [इस द्वैत की रचना का चिन्तन
भी नहीं हो सकता यह तो प्रत्येक का अनुभव कह ही रहा है]।
चिदप्यचिन्त्यरचना यदि तर्ह्यस्तु नो वयम् ।
चितिं सुचिन्त्यरचनां ब्रूमो नित्यत्वकारणात् ॥२५३॥
यदि यह कहा जाय कि ऐसे तो चिदात्मा की रचना भी
अचिन्त्य ही है फिर बताओ कि वह मिथ्या क्यों नहीं होता ?
तो हम कहेंगे कि आत्मा अचिन्त्यरचना वाला है तो हुआ करो।
हम तो उसको नित्य होने के कारण सुचिन्त्य रचना वाला कभी
नहीं कहते । [नित्यपदार्थों की रचना होती ही नहीं इसी कारण
उनको भी अचिन्त्यरचना वाला माना जाता है]।
प्रागभावो नानुभूतश्चितेर्नित्या ततश्चितिः ।
द्वैतस्य प्रागभावस्तु चैतन्येनानुभूयते ॥२५४॥
चिति के नित्य होने का कारण तो यह है कि—इसके प्राग-
भाव को किसी ने आज तक अनुभव किया ही नहीं। उस द्वैत के
प्रागभाव को तो यह चैतन्य ही अनुभव किया करता है। [देखते
हैं कि जाग्रदादि द्वैत के अभाव को सुषुप्ति के समय यह साक्षी
चैतन्य ही अनुभव करता है]।
प्रागभावयुतं द्वैतं रच्यते हि घटादिवत् ।
तथापि रचनाऽचिन्त्या मिथ्या तेनेन्द्रजालवत् ॥२५५॥
प्रागभाव से युक्त होने के कारण, यह द्वैत, घटादि के समान

चित्रदीपप्रकरणम् २०९

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ही, रचा तो जाता है, परन्तु इसकी रचना अचिन्त्य ही है [इसकी
रचना किसी की समझ में आने वाली नहीं है। कोई भी यथार्थ
रूप से इसकी रचना को जान नहीं सका है] इससे यही कहना
पड़ता है कि यह इन्द्रजाल के समान मिथ्या ही है [जो चीज़
रची तो जाय पर उसकी रचना अचिन्त्य हो, उसे 'मिथ्या' कहा
जाता है। यह मिथ्या का लक्षण द्वैत में मिलता है, इससे द्वैत का
मिथ्यापन सिद्ध हो चुका ] ।
चित्प्रत्यक्षा ततोऽन्यस्य मिथ्यात्वं चानुभूयते ।
नाद्वैतमपरोक्षं चेत्येतन्न व्याहतं कथम् ॥२५६॥
[स्वप्रकाश होने के कारण] चिति तो नित्य ही प्रत्यक्ष प्रतीत
हो रही है। उस चिति से भिन्न जो भी कुछ है,उस सब के मिथ्या-
भाव को भी वही चिति अनुभव कर रही है। यह बात यहां
तक सिद्ध की जा चुकी। इतने पर भी जब कोई यह कह बैठे कि
हमें तो अद्वैत का अपरोक्ष [प्रत्यक्ष] नहीं होता है तो उसके इस
कथन में व्याघात दोष क्यों नहीं है ? [इसी प्रकरण के २४२
श्लोक में अद्वैत के प्रत्यक्ष होने की बात भले प्रकार समझा दी है
इस कारण अद्वैत का प्रत्यक्ष न होना विरुद्ध बात है। जो अद्वैत
होगा वह तो प्रत्यक्ष होगा ही ] ।
इत्थं ज्ञात्वाप्यसन्तुष्टाः केचित् कुत इतीर्यताम् ।
चार्वाकादेः प्रबुद्धस्याप्यात्मा देहः कुतो वद ॥२५७॥
वेदान्त की बतायी इस महावार्ता को जान कर भी, बहुत
से लोग इससे सन्तुष्ट क्यों नहीं हैं ? [उन्हें इस पर विश्वास क्यों
नहीं होता है ? ] यह जब हम से पूछा जायगा तब हम कहेंगे
कि-तुम यह बताओ कि ऊहापोह करने में परम प्रवीण

२१० पञ्चदशी
समझदार] चार्वाक आदि लोग भला देह को ही आत्मा क्योंकर
मानते हैं? [भाव यह है कि जिन लोगों को मताध्यास हो जाता
है वे दूसरे की उचित बात को भी अपने हृदयमन्दिर में घुसने
नहीं देते हैं] ।
सम्यग्विचारो नास्त्यस्य धीदोषादिति चेत् तथा ।
असन्तुष्टास्तु शास्त्रार्थं न त्वैक्षन्त विशेषतः ॥२५८॥
यदि कहा जाय कि 'इस चार्वाक ने तो धीदोष के कारण
भले प्रकार विचार ही नहीं किया है तो हम कहेंगे कि बुद्धिदोष के
कारण ही जो लोग असन्तुष्ट हैं उन्होंने कभी वेदान्त की गुह्य
बात का गम्भीर विचार ही नहीं किया है । [वे ऊपर ऊपर इसे
सुनकर हंसी में टाल जाते हैं। नहीं तो बताओ कि सारे संसार
का प्रत्यक्ष तो हमें हो, परन्तु अपने आपे का हमें प्रत्यक्ष न हो--
अपना आपा हमें परोक्ष बना रहे—संसार में इससे बड़ी मूर्खता
और इससे बड़ा अपराध और कोई हो सकता है ?]
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
इति श्रौतं फलं दृष्टं नेति चेद् दृष्टमेव तत् ॥२५९॥
इस मुमुक्षु के हृदय में जो काम अथवा इच्छादि घुसे बैठे
हैं, वे सब के सब जब [मुमुक्षु के हृदय में से] निकल कर भाग
जाते हैं-[तत्व ज्ञान के प्रभाव से अध्यास के निवृत्त होते ही जब
वे सब निवृत्त हो जाते हैं] तो फिर अचम्भे की बात देखो कि-
देह के साथ तादात्म्याध्यास करके बार बार मर मिटने वाला
ही यह पुरुष तुरन्त ही अमर पद को पा जाता है [क्योंकि वह
तो इस हाड मांस के देह में ही सत्यादि स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो
जाता है। तत्व ज्ञान का ऐसा ही श्रौत महाफल देखा जाता है।]

चित्रदीपप्रकरणम् २११

चित्रदीपप्रकरणम् २११
फिर भी यदि यह कहा जाय कि यह कामनिवृत्ति आदि महाफल
श्रुति ने कह ही कह दिया है, परन्तु ऐसा कहीं देखा नहीं जाता
है तो हम फिर प्रबल शब्दों में कहेंगे कि ऐसा फल देखा भी गया
है। [आज कल भी बहुत से ऐसे योगी महात्मा हैं कि जिनका
ग्रन्थिभेद हो चुका है, वे अमर हो चुके हैं और यहीं अमर पद
को पा चुके हैं ]
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयग्रन्थयस्त्विति ।
कामा ग्रन्थिस्वरूपेण व्याख्याता वाक्यशेषतः ॥२६०॥
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते (कठ० ६-१५) इस वाक्य में कामनाओं
को ही ग्रन्थिरूप कहा गया है। इस वाक्य में कामनाओं से छुट-
कारे को ही ग्रन्थिभेद बताया है [अहंकार और चिदात्मा का
तादात्म्याध्यास जब निवृत्त हो जाता है तब उसी को 'ग्रन्थिभेद'
कहते हैं। वह ग्रन्थिभेद तो हो जाय और किसी को उसका
प्रत्यक्ष न हो यह कैसे सम्भव हो सकता है ? इसी से कहा
था कि कामनिवृत्ति रूपी फल देखा भी गया है यह केवल
पुस्तकों में लिखने की ही बात नहीं है। ]
अहंकारचिदात्मानावेकीकृत्याविवेकतः ।
इदं मे स्यादिदं मे स्यादितीच्छाः कामशब्दिताः॥२६१॥
अहंकार और चिदात्मा को, अपने अज्ञान से, एक बना
कर, ऐसी आशा करने लगना कि 'यह भी मुझे मिले' और
'वह भी मुझे मिले' बस यही इच्छायें 'काम' कहाती हैं।
अप्रवेश्य चिदात्मानं पृथक् पश्यन्नहंकृतिम् ।
इच्छंस्तु कोटिवस्तूनि न बाधो ग्रन्थिभेदतः ॥२६२॥
चिदात्मा को तो उसमें प्रविष्ट न किया जाय और अहंकार

२१२ पञ्चदशी
को उससे पृथक् देख लिया जाय। फिर तो चाहे कोई करोड़ों
वस्तुओं की इच्छा करता रहो, ग्रन्थिभेद हो जाने के कारण फिर
उसकी कुछ भी हानि नहीं होनी है। [तात्पर्य यह कि अध्यास-
मूलक काम ही त्याज्य है। साधारणतया सब कामों को त्याज्य
कहने में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है। जिन कामनाओं के मूल में
अध्यास नहीं होता उनसे किसी हानि की सम्भावना नहीं होती।
प्रत्युत उन अध्यासहीन कामनाओं से ही लोकसंग्रह किंवा लोक-
शिक्षण होता है। कई साधक साधना करते करते ऐसे चतुर हो
जाते हैं कि वे चिदात्मा और अहंकार को कभी मिलने ही नहीं
देते। ऐसे साधक करोड़ों पदार्थों की इच्छा भी करें तो भी उनके
पथभ्रष्ट हो जाने की शंका नहीं रह जाती ] ।
ग्रन्थिभेदेऽपि संभाव्या इच्छाः प्रारब्धदोषतः ।
बुद्ध्वापि पापबाहुल्या दसन्तोषो यथा तव ॥२६३॥
ग्रन्थिभेद हो जाने पर भी, प्रारब्ध दोष के कारण, इच्छाओं
का होना संभव ही है। जैसे कि आत्मतत्व को समझ कर भी,
पापों की अधिकता से तुझे अभी तक सन्तोष नहीं हो रहा है।
[जब अध्यास ही न रहेगा तब कामनायें उत्पन्न ही कैसे हो
सकेंगी ? इसका समाधान यह है कि प्रारब्ध कर्म की प्रबलता
से, निर्वीर्य कामनायें, ज्ञानी को उत्पन्न हो ही सकती हैं ] ।
अहंकारगतेच्छाद्यै र्देहव्याध्यादिभिस्तथा ।
वृक्षादिजन्मनाशैर्वा चिद्रूपात्मनि किं भवेत् ॥२६४॥
[ अध्यास से रहित हो चुके हुए ] अहंकार में जो इच्छा
आदि होते हैं, उनसे चिद्रूप आत्मा में, ठीक इसी प्रकार कुछ
भी विकार नहीं हो सकता, जिस प्रकार देह की व्याधियों से

चित्रदीपप्रकरणम् २१३

चित्रदीपप्रकरणम् २१३
देहसम्बन्धरहित आत्मा की बाधा नहीं होती है । अथवा यों
समझो कि जैसे वृक्षादि के उत्पन्न होने या विनष्ट हो जाने से
आत्मतत्व का कुछ नहीं बिगड़ता है ।
ग्रन्थिभेदात् पुराप्येवमिति चेत् तन्न विस्मर ।
अयमेव ग्रन्थिभेदस्तव तेन कृती भवान् ॥२६५॥
यदि कोई यह कहे कि—ग्रन्थिभेद जब तक नहीं हुआ
था, तब तक भी तो कामादि से इस आत्मा की बाधा नहीं होती
थी [यह आत्मतत्व तो पहले भी ऐसा ही था] तो हम उससे
कहेंगे कि—बस इस महावार्ता को कभी न भूल जाना । ऐसी
समझ आ जाना ही तो 'ग्रन्थिभेद' कहाता है । तेरा ग्रन्थिभेद
हो चुका है । इस ग्रन्थिभेद के कारण तुम कृतकृत्य हो चुके हो ।
नैवं जानन्ति मूढाश्चेत् सोऽयं ग्रन्थिर्न चापरः ।
ग्रन्थितद्भेदमात्रेण वैषम्यं मूढबुद्धयोः ॥२६६॥
यदि कहो कि—साधारण लोग तो ऐसा नहीं समझते हैं,
तो हम कहेंगे कि यही तो 'ग्रन्थि' है—[ऐसा ज्ञान न होना ही
'ग्रन्थि' कहाती है] इसके अतिरिक्त और कोई ग्रन्थि नाम का
पदार्थ नहीं होता है । मूढ और ज्ञानी में यही तो केवल अन्तर
होता है कि—मूढों की तो ग्रन्थि लगी रहती है तथा ज्ञानी की
ग्रन्थि खुल जाती है ।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा देहेन्द्रियमनोधियाम् ।
न किञ्चिदपि वैषम्य मस्त्यज्ञानिविबुद्धयोः ॥२६७॥
देह इन्द्रिय मन और बुद्धि जब किसी काम में प्रवृत्त और
किसी काम से निवृत्त होती हैं, तब अज्ञानी और ज्ञानी में स्वल्प
भी अन्तर नहीं पाया जाता ।

२१४ पंचदशी
और अज्ञानी में केवल 'ग्रन्थि' और 'ग्रन्थि भेद' का ही अन्तर
(फर्क) होता है] ।
व्रात्यश्रोत्रिययो र्वेदपाठापाठकृता भिदा ।
नाहारादावस्ति भेदः सोयं न्यायोऽत्र योज्यताम् ॥२६८॥
देखते नहीं हो कि—'व्रात्य' तथा 'श्रोत्रिय' में केवल वेद-
पाठ कर सकने और न कर सकने का ही तो अन्तर होता है ।
उनके खान पान में कोई भी भेद नहीं होता । इसी न्याय को
यहाँ भी लगा लेना चाहिये ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ।
उदासीनवदासीन इति ग्रन्थिभिदोच्यते ॥२६९॥
ज्ञानी की ग्रन्थि नहीं रहती यह बात गीता ने भी कही
है—ऊपर आ पड़े दुःखों में द्वेष नहीं करता, जाते हुए सुखों
से ठहरने को नहीं कहता । केवल उदासीन की तरह से रहने
लगता है । बस इसी को तो 'ग्रन्थि-भेद' कहते हैं ।
औदासीन्यं विधेयं चेद् वच्छब्दव्यर्थता तदा ।
न शक्ता अस्य देहाद्या इति चेद् रोग एव सः ॥२७०॥
ग्रन्थिभेद का वर्णन करने वाले इस गीतावाक्य में यदि
उदासीनता का विधान माना जायगा [कि उसे उदासीन की
तरह रहने लगना चाहिये । दुनियाँ के काम छोड़कर भाग जाना
चाहिये] तो उदासीनवदासीनः (गीता १४-२३) इस वाक्य में
वत् शब्द का प्रयोग ही निष्प्रयोजन होगा । ['वत्'शब्द का अभि-
प्राय यह है कि उदासीन (बेगारी) जैसे काम करते हैं उसके फल से
जैसे उन्हें कुछ भी मतलब नहीं होता इस तरह से रहने लगे।
फलासक्ति को छोड़ दे। अन्दर से त्याग और बाहर से संग हो यही

चित्रदीपप्रकरणम् २१५

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चित्रदीपप्रकरणम् २१५

इसका भाव है] यदि कहो कि ज्ञान होने पर ऐसी हालत हो जाती है
कि ज्ञानी के देहादि कुछ काम कर ही नहीं सकते, तो हमें यह
बात सुनकर हंसी आती है कि ज्ञानी के शरीर को अशक्त कर
देने वाला वह ज्ञान क्या हुआ ? वह तो एक रोग ही हुआ [वह
ज्ञान तो एक प्रकार 'लकवा' ( पक्षाघात) हुआ]।
तत्त्वबोधं क्षयं व्याधिं मन्यन्ते ये महाधियः ।
तेषां प्रज्ञातिविशदा किं तेषां दुःशकं वद ॥२७१॥
जो महाबुद्धि लोग तत्वबोध को एक प्रकार का क्षयरोग
मानते हैं—[कि तत्वज्ञानी के हाथ पैर उठते ही नहीं] उनकी
बुद्धि के विषय में हम क्या कहें ? उनकी बुद्धि बड़ी विशद
है। ऐसे पुरुषों को असाध्य ही क्या है ? [वे जो चाहें कह
सकते हैं]
भरतादे रवृत्तिः पुराणोक्तेति चेत्तदा ।
जक्षन् क्रीडन् रतिं विन्दन्नित्यश्रौषीर्न किं श्रुतिम्॥२७२॥
यदि कहा जाय कि 'जडभरत आदि महात्मा लोग कुछ
भी नहीं करते थे' यह बात पुराण में कही गयी है। पुराणों
का कहना है कि—ज्ञानी लोग किसी काम में प्रवृत्त होते ही
नहीं। तो हम उससे कहेंगे कि—जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा
यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम् (छा० ८–१२–३) यह
श्रुति का वाक्य क्या तुमने नहीं सुना है ? जिसमें ज्ञानी की
प्रवृत्ति का विधान किया गया है—[तुम्हारा उपर्युक्त आक्षेप
श्रुति के मर्म को न जानने के कारण से है।]
न ह्याहारादि सन्त्यज्य भरताद्याः स्थिताः क्वचित् ।
काष्ठपाषाणवत् किन्तु संगभीता उदासते ॥२७३॥

२१६ पञ्चदशी
भरतादि ने भी काष्ठ या पाषाण की तरह खान पान
आदि का परित्याग तो कभी भी नहीं किया था। किन्तु वे
लोग संगदोष के लग जाने के डर से; उदासीन रहते थे ।
[पुराणों का तात्पर्य भी उनकी उदासीनता के दिखाने में ही है ]
सङ्गी हि बध्यते लोके निःसङ्गः सुखमश्नुते ।
तेन सङ्गः परित्याज्यः सर्वदा सुखमिच्छता ॥२७४॥
लोक में देखते हैं कि सङ्ग करने वाले लोग ही बँधे फिरते
हैं। निःसंग लोगों को मौज मारते हुए पाया जाता है । इससे
जो लोग नित्य सुख की इच्छा रखते हों, उन्हें संग का परि-
त्याग सदा के लिये कर देना चाहिये ।
अज्ञात्वा शास्त्रहृदयं मूढो वक्त्यन्यथान्यथा ।
मूर्खाणां निर्णय स्त्वास्तामस्मत्सिद्धान्त उच्यते॥२७५॥
मूर्ख लोग शास्त्र के मर्म को तो पहचानते नहीं और कुछ
का कुछ कहने लगते हैं। इस कारण उनकी बात को यहीं
छोड़ कर अब हम अपनी प्रकृत बात, किंवा शास्त्र के रहस्य
का वर्णन करते हैं ।
वैराग्यबोधोपरमाः सहायास्ते परस्परम् ।
प्रायेण सह वर्तन्ते वियुज्यन्ते क्वचित् क्वचित् ॥२७६॥
शास्त्र का सिद्धान्त तो यह है कि—'वैराग्य' 'बोध' तथा
'उपरम' ये तीनों परस्पर के सहायक हैं। ये तीनों प्रायः करके
साथ ही साथ रहते हैं। कहीं कहीं तो ये अलग अलग भी
पाये जाते हैं। . .
हेतुस्वरूपकार्याणि भिन्नान्येषामसङ्करः ।
यथावदवगन्तव्यः शास्त्रार्थं प्रविविच्यता ॥२७७॥

चित्रदीपप्रकरणम् २१७

चित्रदीपप्रकरणम् २१७
इन [वैराग्य बोध तथा उपरम] तीनों के कारण, स्वरूप,
तथा कार्य भिन्न भिन्न हैं । इससे ये तीनों एक नहीं हैं । शास्त्रार्थ
का विवेक करने वाले लोगों को इनका भेद ठीक ठीक रीति से
समझ लेना चाहिये ।
दोषदृष्टि र्जिहासा च पुनर्भोगेष्वदीनता ।
असाधारणहेत्वाद्या वैराग्यस्य त्रयोऽप्यमी ॥२७८॥
विषयों में दोषदृष्टि, वैराग्य का मुख्य कारण होता है । विषयों
को छोड़ने की अभिलाषा, वैराग्य का 'स्वरूप' कहाता है । भोगों
के प्रति दीनता का न रहना, वैराग्य का 'फल' माना जाता है ।
श्रवणादित्रयं तद्वत् तत्वमिथ्याविवेचनम् ।
पुनर्ग्रन्थेरनुदयो बोधस्यैते त्रयो मताः ॥२७९॥
श्रवण मनन तथा निदिध्यासन, ये तीनों बोध के मुख्य
'कारण' हैं। सत्य और मिथ्या का विवेक, बोध का 'स्वरूप' होता
है । ग्रन्थि का फिर कभी भी उदय न होना, बोध का 'कार्य'
बताया जाता है ।
यमादिर्धीनिरोधश्च व्यवहारस्य संक्षयः ।
स्युर्हेत्वाद्या उपरते रित्यसंकर ईरितः ॥२८०॥
उपरति के मुख्य 'कारण' यम नियमादि हैं। बुद्धि का
निरोध हो जाना, उपरति का 'स्वरूप' है । व्यवहार का समाप्त
हो जाना, उपरति का 'फल' माना गया है । यों इन तीनों के
भेद का वर्णन किया गया ।
तत्त्वबोधः प्रधानं स्यात् साक्षान्मोक्षप्रदत्वतः ।
बोधोपकारिणावेतौ वैराग्योपरमावुभौ ॥२८१॥

२१८ पञ्चदशी
[तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे०
३--८) इस श्रुति के आधार से कहते हैं कि--इन तीनों में]
तत्वबोध ही प्रधान है । क्योंकि यही साक्षात् मोक्ष का देने
वाला है । वैराग्य तथा उपरति ये दोनों तो इसी तत्ववोध [ज्ञान]
के सहायक होते हैं ।
त्रयोप्यत्यन्तपक्काश्चेन्महत् स्तपसः फलम् ।
दुरितेन क्वचित् किंचित् कदाचित् प्रतिबध्यते ॥२८२॥
यदि ये तीनों अत्यन्त पक्के हो जायँ तो यह मामूली पुण्यों
का फल नहीं है । [क्योंकि जब करोड़ों जन्मों में कमाये हुए
पुण्यों का परिपाक होता है तब कहीं ये तीनों इकट्ठे हो पाते
हैं। नहीं तो] प्रतिबन्ध करने वाले पाप के प्रभाव से किसी पुरुष
में किसी काल में इन तीनों में से एक आध का प्रतिबन्ध हो
जाता है ।
वैराग्योपरती पूर्णे बोधस्तु प्रतिबध्यत ।
यस्य तस्य न मोक्षोस्ति पुण्यलोकस्तपोबलात् ॥२८३॥
वैराग्य और उपरति तो पूर्ण हो चुके हों और आत्मबोध
न हुआ हो तो उस विचारे तपस्वी को मोक्ष नहीं मिलेगा ।
उस को तो उस के तपोबल से किसी पुण्यलोक की प्राप्ति हो
जायगी [भाव यही हुआ कि--तत्वज्ञान के न होने पर मोक्ष
का मिलना असम्भव ही है ।]
पूर्णे बोधे तदन्यौ द्वौ प्रतिबद्धौ यदा तदा ।
मोक्षो विनिश्चितः किन्तु दृष्टदुःखं न नश्यति ॥२८४॥
यदि किसी का ज्ञान तो पूर्ण हो चुका हो और वैराग्य
तथा उपरति उसे न हो गये हों, तो मोक्ष तो उसे मिलेगा ही,

चित्रदीपप्रकरणम् २१९

चित्रदीपप्रकरणम् २१९
परन्तु उसके दृष्टदुःखों का नाश नहीं हो सकेगा। [अथवा यों
कहो कि जीवन्मुक्ति का मज़ा उसके हाथ नहीं आयेगा]
नित्यानित्यवस्तुविवेक, शमादि साधन, वैराग्य और मुमुक्षु
भाव के रहने पर ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान हो जाय और
वैराग्य तथा उपरति न हों यह एक असाधारण अवस्था का वर्णन
ग्रन्थकार कर रहे हैं। हम लोग ऐसी अवस्था की कल्पना ही कर
सकते हैं। साधारणतया यह बात ठीक नहीं प्रतीत होती। परन्तु
ग्रन्थकार के अनुभवी होने के कारण इसको हम अपनी बुद्धि की
पहुँच के परे की बात मानकर चुप हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में
द्वैतविवेक प्रकरण के ५१ से ५७ तक श्लोक देखने से इस सिद्धान्त
की पुष्टि नहीं होती। इस कारण ज्ञान हो जाने और वैराग्य तथा
उपरति न होने की बात को हमारी बुद्धि बड़ी कठिनता से स्वीकार
करती है। ऐसा मालूम होता है कि कोई ऐसी अवस्था होती होगी—
कि ज्ञानी का ज्ञान किसी विषयभक्ति के कारण दबा पड़ा रहता
होगा और मृत्यु के समय उसकी वासनायें हट जाती होंगी और
उसे मुक्ति मिल जाती होगी। साधारण सिद्धान्त तो यही है कि
विमुक्तश्च विमुच्यते अर्थात् जीवन्मुक्तों को ही विदेहमुक्ति मिलती है।
ब्रह्मलोकतृणीकारो वैराग्यस्यावधिर्मतः ।
देहात्मवत् परात्मत्वदार्ढ्ये बोधः समाप्यते ॥२८५॥
ब्रह्मलोक मिलने लगे और उसे तृणतुल्य तुच्छ समझ कर
छोड़ दिया जाय यही वैराग्य की अन्तिम दशा है। अज्ञानी लोग
जैसे देह को आत्मा समझे बैठे हैं,वैसी दृढता के साथ,पर तत्व
को आत्मा समझ लिया जाय तो बस, यहाँ पहुँच कर बोध भी
समाप्त हो जाता है । [यही बोध की हद मानी गयी हैं]

२२० पञ्चदशी
सुप्तिवद् विस्मृतिः सीमा भवेदूपरमस्य हि ।
दिशानया विनिश्चेयं तारतम्यमवान्तरम् ॥२८६॥
सोते हुए जैसे हम जगत् को भूल जाते हैं, जागते हुए भी
जब कोई इसी प्रकार जगत् को भूल जाय [मानो जगत् नाम
की कोई चीज़ ही न रही हो] बस इसी को उपरति की सीमा
समझ लेना । इनका अवान्तर न्यूनाधिकभाव तो इसी रीति से
अपनी अपनी बुद्धि से निश्चय कर लेना चाहिये ।
आरब्धकर्मनानात्वाद् बुद्धानामन्यथान्यथा ।
वर्तनं, तेन शास्त्रार्थे भ्रमितव्यं न पण्डितैः ॥२८७॥
प्रारब्ध कर्मों के नाना प्रकार का होने से, ज्ञानी लोग भी
भिन्न भिन्न प्रकार के आचरण वाले होते हैं। उनके भिन्न भिन्न
बर्तावों को देखकर शास्त्रार्थ के विषय में पण्डितों को भ्रम में
नहीं पड़ जाना चाहिये । [तत्त्वज्ञानी लोग भी रागादि वाले
होने से भिन्न प्रकार के आचरणों वाले पाये जाते हैं। फिर हम
ज्ञान को भी मुक्ति दिलाने वाला कैसे मान लें ? इस शंका का
समाधान यही है कि—ज्ञानी के शरीर के रोग या भूख आदि
जैसे उसके प्रारब्ध के फल होते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी के राग द्वेष
आदि भी तो उसके प्रारब्ध कर्मों के ही फल हैं। इस कारण वे
रागादि, रोग आदि की तरह ही, ज्ञानी की मुक्ति का प्रतिबन्ध
नहीं कर सकते हैं।]
स्वस्वकर्मानुसारेण वर्तन्तां ते यथा तथा ।
अविशिष्टः सर्वबोधः समा मुक्तिरिति स्थितिः ॥२८८॥
सब लोगों को यह निश्चय कर रखना चाहिये कि—वे
ज्ञानी लोग अपने अपने प्रारब्ध कर्मों के अनुसार जैसा तैसा