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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

५५४ फलदीपिका

मे०वृ०मि०क०सिं०क०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०
श०
बृ०
मं०
सू०
शु०
बु०
**चं

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५५५

शनि २॥ वर्ष एक राशि में रहता है, किस समय उसका शुभ या अशुभ फल होगा ? निर्णय का एक प्रकार तो १३ वें श्लोक में बता दिया अब दूसरा प्रकार बताते हैं । पृष्ठ ५४४ पर लिखे अनुसार ९६ वर्ग का एक चक्र बनाइये और मान लीजिए आपको शनि का गोचर विचार करना है तो पृष्ठ ५४५ पर जो शनि का अष्टक वर्ग बनाने का प्रकार दिया गया है उसी प्रकार से शनि का अष्टक वर्ग बनाइए । लिखा है कि शनि का अटक वर्ग बनाने में सूर्य से १-२-४- ७-८-१०-११ स्थानों में शुभ बिन्दु डालना इसलिये सूर्य वृश्चिक राशि में है और वृश्चिक से १-२-४-७-८-१०-११ हुये—वृश्चिक, धनु, कुम्भ, वृषभ, मिथुन, सिंह और कन्या—इनमें शुभ बिन्दू लगाइये । इस प्रकार अन्य ग्रहों से भी जहाँ जहाँ शुभ विन्दु पड़ने चाहियें वहाँ वहाँ शुभ बिंदु लगाने से पिछले पृष्ठ पर दिया गया शनि का अष्टक वर्ग तैयार होगा । ऊपर मेष में शनि के दो बिन्दु आये हैं—वृष में ४, मिथुन में ३, कर्क में १, सिंह में ७, कन्या में ६, तुला में ४, वृश्चिक में ३, धनु में १, मकर में ३, कुम्भ में ३ और मीन में २। अब आप पृष्ठ ५४५ देखिये जहां शनि का अष्टक वर्ग बनाया है । सिंह लग्न में ७ बिन्दु हैं लग्न से दूसरे कन्या में ६ बिन्दु हैं लग्न से तीसरे तुला में ४ बिन्दु हैं इत्यादि। पृष्ठ ५४५ पर और पृष्ठ ५५४ पर दोनों एक ही कुण्डली के शनि के अष्टक वर्ग हैं तब पृष्ठ ५५४ फिर वही अष्टक वर्ग पुनः क्यों बनाया गया ? इसलिये कि पृष्ठ ५५४ पर जो अष्टक वर्ग बनाया गया है उसमें यह मालूम होता है कि किस-किस ग्रह ने किस-किस राशि में शुभ बिन्दु डाले हैं। इसका प्रयोजन क्या ? यही बताते हैं । प्रत्येक राशि के आठ भाग कीजिये । यह मालूम ही है कि एक राशि में ३० अंश होते हैं इस कारण ३० को ८ से भाग देने पर ३ अंश ४५ कला आए । तीन-तीन अंश और पेंतालीस-पेंतालीस कलाओं के आठ भाग हो गए । चाहे कोई भी राशि हो प्रथम आठवें

५५६ फलदीपिका भाग पर शनि का अधिकार माना है। इसलिये प्रारम्भिक ३ अंश ४५ कला तक शनि की कक्षा कहलाती है। दूसरे अष्टमांश पर बृहस्पति का अधिकार माना है। इस कारण ३°-४५' से ७½ अंश तक बृहस्पति की कक्षा हुई। बृहस्पति के बाद तृतीय अष्टमांश अर्थात् ७°-३०' से ११°-१५' तक मंगल की कक्षा हुई। मंगल के बाद सूर्य की कक्षा, सूर्य के बाद शुक्र की कक्षा, उसके बाद बुध की और बुध के बाद चन्द्रमा की कक्षा होती है। अन्तिम कक्षा २६°-१५' से ३०° तक लग्न की कक्षा होती है। इसी कारण पृष्ठ ५५४ पर जो शनि का अष्टक वर्ग चक्र दिया है उनमें श० बृ०, मं० सू० शु०, बु० च० ल० यह क्रम रखा है। अब देखिये सिंह राशि में शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, बुध, चन्द्र, लग्न, इनसे शुभ बिन्दु पड़े हैं इस कारण जब इन कक्षाओं में शनि जावेगा तब गोचर वश शुभ प्रभाव दिखावेगा किन्तु जब शुक्र की कक्षा में जावेगा (शुक्र की पांचवी कक्षा होती है १५° से १८°-४५' तक) तब शुभ फल नहीं दिखावेगा बल्कि अशुभ फल दिखावेगा क्योंकि शनि के अष्टक वर्ग में शुक्र से सिंह राशि में कोई शुभ बिन्दु नहीं पड़ा। यह सूक्ष्म गोचर विचार है ॥ १६-१९ ॥ सर्वग्रहाणां प्रहितेऽष्टवर्गे तत्कालराशिस्थितबिन्दुयोगे । अष्टाक्षसंख्याधिकविन्दवश्चेत् शुभं तदूने व्यसनं क्रमेण ॥२०॥ अब सर्वाष्टक वर्ग बनाना बताते हैं। निम्नलिखित प्रकार से सर्वाष्टक वर्ग बनाइये। पहले जितने शुभ बिन्दु हैं—उनको किस अष्टक वर्ग में, किस राशि में, कितने शुभ बिन्दु हैं यह लिख लीजिये फिर एक नया अष्टक वर्ग चक्र बनाकर भिन्न-भिन्न अष्टक वर्गों में जितने शुभ बिन्दु हैं उनको प्रत्येक राशि के विचार से जोड़ लीजिए।

तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५५७ उदाहरण के लिए सिंह राशि में सातों अष्टक वर्ग में क्रमशः ५, ६, ५, ५, ७, ५, ७, यह शुभ बिन्दु क्रमशः सूर्य आदि सातों ग्रहों के अष्टक वर्ग में पड़े हैं। इनका योग ४० हुआ तो सर्वाष्टक वर्ग में सिंह राशि में ४० संख्या लिखेंगे। इसी प्रकार प्रत्येक राशि में जितने शुभ बिन्दु पड़े हैं उनका योग सर्वाष्टक वर्ग में लिखा जाता है। सूर्य का अष्टकवर्गं चन्द्रमा का अष्टकवर्गं मंगल का अष्टकवर्गं बुध का अष्टकवर्गं

५५८ फलदीपिका बृहस्पति का अष्टकवर्ग शुक्र का अष्टकवर्ग शनि का अष्टकवर्ग ऽ——ऽ इस प्रकार सर्वाष्टक वर्ग बनाने पर यह देखना चाहिये कि प्रत्येक राशि में कुल कितने शुभ बिन्दु पड़े। जिस राशि में २८ से अधिक शुभ बिन्दु पड़ें, उसमें जब गोचरवश कोई ग्रह जाता है तो अच्छा फल दिखाता है। यदि २८ से कम संख्या हो और उसमें गोचरवश कोई ग्रह जावे तो अशुभ फल दिखावेगा। २८ से संख्या जितनी कम होगी उतना अशुभ फल अधिक होगा। यहाँ एक शंका यह होती है कि

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५५९ मान लीजिये शनि के गोचर का विचार करना है। सर्वाष्टक वर्ग में तो किसी राशि में ३० बिन्दु आवें किन्तु शनि के अष्टक वर्ग में उसके दो ही बिन्दु हैं तब क्या वह शुभ जावेगा ? अथवा मान लीजिये शनि के अष्टक वर्ग में तो ६ बिन्दु हैं किन्तु सर्वाष्टक वर्ग में २२ बिन्दु ही हैं तो क्या शनि का गोचर उस राशि में अशुभ जावेगा । इसका उत्तर यही है कि प्रत्येक ग्रह के स्वयं के अष्टक वर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं और सर्वाष्टक वर्ग में उस राशि में कितने बिन्दु हैं इन दोनों का तारतम्य कर लेना चाहिये । यदि दोनों में शुभ तो गोचर का पूर्ण शुभ फल होगा । यदि दोनों में अशुभ तो पूर्ण अशुभ फल होगा । यदि एक में शुभ और एक में अशुभ तो मध्यम फल समझना चाहिए ॥२०॥ यावन्तस्तुहिनरुचेः शुभाङ्कसंख्या यावन्तः शुभभवने हिमद्युतेर्वा। इत्थं तद्विदितमिहाधिके च तेभ्यः स्वस्त्यूने विपदिति सूचितं परेषाम् ॥२१॥ टिप्पणी :—बहुत से लोग लग्न से भी इस प्रकार विचार करते हैं : मान लीजिये प्रथम भाव में ४० शुभ बिन्दु पड़े तो प्रथम, तेरहवें, पच्चीसवें, ३७वें, ४९वें ६१वें, ७३वें वर्ष में अभ्युदय । यदि अष्टम भाव में कुल १९ बिन्दु पड़े हैं तो ८वें, २०वें, ३२वें, ४४वें, ५६वें, ६८वें वर्ष में शरीर कष्ट आदि। इस प्रकार जिस भाव में अधिक बिन्दु पड़े हों उस-उस वर्ष में और उससे प्रत्येक बारहवें वर्ष में शुभ । जिस भाव में थोड़े बिन्दु पड़े हों उस वर्ष में और उससे प्रत्येक १२वें वर्ष में कष्ट । विशेष विवरण के लिये देखिये श्री जीवनाथ शर्मा विरचित जन्म-पत्रिका विधानम् पृ० ३६-४१ ।

५६० फलदीपिका प्रायः षष्ठ, अष्टम, द्वादश—यह तीनों अशुभ भवन माने जाते हैं बाकी के शुभ भवन । शुभ भवनों में अधिक बिन्दु होना शुभ है । इसी प्रकार चन्द्र लग्न से विचार कीजिये । (क) यदि चन्द्र लग्न से शुभ भवनों में २८ से अधिक संख्या हो तो उन-उन भावों की समृद्धि होती है यदि २८ से कम हो तो उन-उन भावों की हानि होती है । (ख) चन्द्रमा से किन भावों में शुभ ग्रह पड़े हैं यह देखिये । यदि इन शुभ ग्रहाधिष्ठित राशियों में २८ से अधिक बिन्दु हैं तो इन भावों की समृद्धि समझनी चाहिये । यदि २८ से कम हों उस-उस भाव सम्बन्धी विपत्ति समझनी चाहिये ॥२१॥ कतुः स्वजन्मसमयावसथग्रहाणां कृत्वाष्टवर्गकथिताक्षविधानमत्र । बह्वक्षयोगवशतः शुभराशिमास- भावग्रहस्थितिषु कर्मशुभं विदध्यात् ॥२२॥ ऊपर जो सर्वाष्टक वर्ग बनाना बताया गया है उसका एक अन्य उपयोग और बताते हैं । अपने जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में थे और जो जन्म लग्न और सात ग्रह—या उन आठ आधारों पर जो सर्वाष्टक वर्ग तैयार किया गया है उसमें जिस-जिस राशि में अधिक बिन्दु हों उनमें शुभ कार्य करने चाहियें । ऐसा करने से विशेष सफलता प्राप्त होगी । उदाहरण के लिये जन्म लग्न सिंह है और सिंह राशि में सर्वाष्टक वर्ग में ४० बिन्दु पड़े हैं तो जब सिंह में सूर्य हो या सिंह में चन्द्रमा हो या सिंह में बृहस्पति हो या जब पूर्वीय क्षितिज पर सिंह लग्न उदित हो तब इस कुण्डली वाला जातक जो-जो कार्य करेगा । उसमें विशेष सफलता होगी। प्रत्येक मनुष्य को कौन सा वर्ष, मास

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५६१ या दिन अधिक अनुकूल या सफलता देने वाला होगा यह देखने के लिए सर्वाष्टक वर्ग एक साधन है ॥ २२ ॥ पापोऽपि स्वगृहस्थश्चेद्भाववृद्धिं करोत्यलम् । नीचारातिगृहस्थश्चेत्कुर्याद्भावक्षयं ध्रुवम् ॥२३॥ अब गोचर विचार के सम्बन्ध में एक नवीन सिद्धान्त और बताते हैं। यदि पापी ग्रह भी अपने भाव में जावे तो भाव की वृद्धि करता है। किन्तु यदि कोई ग्रह नीच राशि का हो या शत्रु राशि का हो तो उस भाव को बिगाड़ता है ॥ २३ ॥ स्वोच्चस्थोऽपि शुभो भावहानिं दुःस्थानपो यदि । सुस्थानपश्चेत् स्वोच्चस्थः पापी भावानुकूल्यकृत् ॥२४॥ यदि कोई ग्रह दुःस्थान का मालिक हो तो चाहे वह शुभ हो और उच्च राशि में भी हो--जिस भाव में है उस भाव को बिगाड़ेगा। किन्तु यदि सुस्थान का मालिक होकर उच्च स्थान में है तो उस भाव को बढ़ावेगा ॥२४॥ टिप्पणी :--ऊपर श्लोक २३ और २४ में जो सिद्धान्त बताये गये हैं वे यद्यपि इस अध्याय में गोचर के प्रकरण में कहे गये हैं किन्तु इनका उपयोग जन्म कुण्डली तथा गोचर दोनों में समान रूप से कर सकते हैं।

चौबीसवाँ अध्याय अष्टकवर्गफल अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहः स्मृतः । तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्द्धयेच्छोध्यपिण्डकम् ॥१॥ अब होरासार में जो अष्टक वर्ग का फल दिया है वह बतलाते हैं। सूर्य जिस राशि में हो उस राशि से जो नवम (९वीं) राशि हो उसे “पिता का घर” कहते हैं अर्थात् उस घर से पिता का विचार करना । सूर्य के अष्टक वर्ग में—उस 'पिता के घर' में जितने शुभ बिन्दु हों— उस संख्या से "शोध्यपिण्ड" को गुणा करना । शोध्यपिण्ड कैसे बनाया जाता है, यह आगे बतलावेंगे ॥ १ ॥ सप्तविंशहताल्लब्धं नक्षत्रं याति भानुजे । तस्मिन् काले पितृक्लेशो भविष्यति न संशयः ॥२॥ यह जो (ऊपर के बताये हुए प्रकार से) संख्या आई—उस संख्या को सत्ताइस से भाग देना । शेष संख्या से जो नक्षत्र आवे (जैसे अश्विनी से १, भरणी से २, कृत्तिका से ३ आदि) उस नक्षत्र में जब गोचर में शनि आवे तो जातक के पिता को अवश्य क्लेश होता है । ॥२॥ तत्तत्रिकोणगते वाऽपि पितृतुल्यस्य वा मृतिः । संयोगः शोध्यशेषाणां शोध्यपिण्ड इति स्मृतः ॥३॥ अथवा ऊपर (श्लोक २ में) जो नक्षत्र आया है, उससे त्रिकोण में जब शनि आता है तो पिता के तुल्य—चाचा आदि की मृत्यु

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६३ होती है। अश्विनी की संख्या १ है—इससे त्रिकोण में मघा और मूल हुए। भरणी के त्रिकोण में पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ हुए। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों का त्रिकोण होता है। त्रिकोण शोधन और एकाधि- पत्य शोधन के बाद जो शुभ बिन्दु बच जाते हैं, उन्हें शोध्य पिंड कहते हैं। यह त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन का प्रकार आगे बतलावेंगे ॥३॥ लग्नात्सुखेश्वरांशेशदशायां च पितृक्षयः । सुखनाथदशायां वा पितृतुल्यमृतिं वदेत् ॥४॥ लग्न से चौथे घर का स्वामी जिस नवांश में हो—उस नवांश के स्वामी की दशा में पिता की मृत्यु होती है। चौथे घर के मालिक की दशा में पिता-तुल्य (चाचा आदि) की मृत्यु होती है ॥४॥ संशोध्य पिण्डं सूर्यस्य रन्ध्रमानेन वर्द्धयेत् । द्वादशेन हृताच्छेषराशिं याते दिवाकरे ॥५॥ तत्त्रिकोणगते वाऽपि मरणं तस्य निर्दिशेत् । एवं ग्रहाणां सर्वेषां चिन्तयेन्मतिमान्नरः ॥६॥ सूर्याष्टक वर्ग में जो शोध्यपिंड हो उसमें ८ जोड़िये और जो जोड़ आवे, उसमें १२ का भाग दीजिये। जो शेष बचे उस वाली राशि में (जैसे १ शेष बचे तो मेष, २ शेष बचे तो वृष इत्यादि) जब सूर्य आवे या उससे पांचवीं या नवीं राशि में जब सूर्य आवे (गोचरवश) तब पिता की मृत्यु की संभावना होती है। वैसे तो प्रतिवर्ष सूर्य उन राशियों में आता है, किन्तु यहाँ अभिप्राय यह है कि जब दशा, अन्तर्दशा के विचार से, तथा शनि के गोचर विचार से पिता की मृत्यु

५६४ फलदीपिका मालूम पड़ती हो तब उस वर्ष में किस महीने में मृत्यु की संभावना है यह देखने के लिये सूर्य का गोचर फल बताया गया है। जैसे सूर्य के अष्टक वर्ग से ऊपर के श्लोकों में पिता का मृत्युकाल निश्चय करने के नियम बताये गये, इसी प्रकार चन्द्रमा के अष्टकवर्ग से माता का मंगल के अष्टकवर्ग से भाई का··इत्यादि विचार बुद्धिमान् व्यक्ति को करना चाहिये ॥५-६॥ चन्द्रात्सुखफलैः पिण्डं हत्वा सारावशेषितम् । शनौ याते मातृहानिः त्रिकोणक्षंगतेऽपि वा ॥७॥ चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में चन्द्रमा से चौथी राशि में जितने शुभ बिन्दु हों उनको चन्द्रमा के अष्टक वर्ग के शोध्यपिंड से गुणा कीजिये। जो गुणन फल आवे उसमें २७ का भाग दीजिये। जो शेष आवे उस नक्षत्र की संख्या में या उससे त्रिकोण के नक्षत्र में जब शनि गोचरवश आवे तब माता की मृत्यु की संभावना होती है ॥७॥ चन्द्रात्सुखाष्टमेशांशत्रिकोणे दिवसाधिपे । मातुर्वियोगं तन्मासे निर्दिशेल्लग्नतः पितुः ॥८॥ चन्द्रमा जिस राशि में हो—उससे चौथे और आठवें घर के मालिक किस नवांश में बैठे हैं यह देखिये । जब इन नवांश से गोचर वश सूर्य त्रिकोण में जावे—तो माता की मृत्यु होती है। जैसे ऊपर चन्द्रमा से चौथे और आठवें के मालिक किन नवांशों में हैं, वैसे लग्न से चौथे और आठवें के मालिक किन नवांशों में हैं यह देखिये—उन नवांश राशियों से जब त्रिकोण में सूर्य जावे तो पिता की मृत्यु होती है ॥८॥

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६५ भौमात्तृतीयाराशिस्थफलैर्भ्रातृगणं वदेत् । बुधात्सुखफलैर्बन्धुगणं वा मातुलस्य च ॥६॥ मंगल के अष्टक वर्ग में—मंगल जिस राशि में है उससे तृतीय राशि में मंगल के अष्टकवर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं यह देखिये । उतने ही भाई उस जातक के होंगे। बुध के अष्टक वर्ग में बुध जिस राशि में है उससे चौथी राशि में कितने शुभ बिन्दु हैं ? जितने शुभ बिन्दु हों उतने ही मामा या बन्धु होंगे ॥९॥ गुरुस्थितसुतस्थाने यावतां विद्यते फलम् । शत्रु नीचग्रहं त्यक्त्वा शेषास्तस्यात्मजाः स्मृताः ॥१०॥ बृहस्पति के अष्टकवर्ग में बृहस्पति जिस राशि में है—उससे पंचम राशि में जितने शुभ बिन्दु होंगें उतने ही पुत्र होंगे । किन्तु यदि किसी शत्रु या नीच ग्रह ने इस राशि में बिन्दु प्रदान किया हो—ऐसे शत्रु, नीच ग्रह के बिन्दु कम कर दीजिये ॥१०॥ गुरोरष्टकवर्गे तु शोध्यशिष्टफलानि वै । क्रूरराशिफलं त्यक्त्वा शेषास्तस्यात्मजाः स्मृताः ॥११॥ बृहस्पति के अष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या आवे—उसमें से क्रूर राशियों में जो बिन्दु हों उन्हें कम कर दीजिये । शेष जितने बचें उतने ही पुत्र होंगे ॥११॥ फलाधिकं भृगोर्यत्र तत्र भार्याजनिर्यदि । तस्यां वंशाभिवृद्धिः स्यादल्पे क्षीणार्थसंततिः ॥१२॥ शुक्र के अष्टक वर्ग में जिन राशियों में अधिक शुभ बिन्दु हैं उस

५६६ फलदीपिका राशि में जिस कन्या का जन्म है (कन्या की चन्द्र राशि हो या जन्म लग्न हो) उससे विवाह होने से वंश की वृद्धि होगी। यदि जातक की कुंडली में शुक्र के अष्टक वर्ग में जिस राशि में थोड़े शुभ बिन्दु हों— उस जन्म लग्न या चन्द्र राशि वाली कन्या से विवाह हो तो सन्तान थोड़ी होगी। टीकाकारों ने इस श्लोक का अर्थ निम्न प्रकार से भी किया है— जिस राशि में—जातक के शुक्र के अष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु हों—उस राशि की दशा में जिस कन्या का जन्म हुआ हो, उस कन्या से विवाह विशेष सन्तानप्रद होती है और जातक के शुक्राष्टक वर्ग में जिस राशि में कम शुभ बिन्दु हों—उस दिशा में जन्म लेने वाली कन्या से विवाह करने से कम सन्तान होती है ॥१२॥ शोध्यपिण्डं शनेर्लग्नाद्धत्वा रन्ध्रफलैः सुखैः । हृत्वावशेषभं याते मन्दे जीवेऽपि वा मृतिः ॥१३॥ शनि के अष्टक वर्ग में जो शोध्यपिंड की संख्या हो—उसे शनि के अष्टक वर्ग में लग्न से अष्टम राशि में जितने शुभ बिन्दु हों उनसे गुणा कीजिये। २७ का भाग दीजिये। जो शेष आवे उस संख्या के नक्षत्र में जब गोचर से बृहस्पति या शनि जावे तो जातक की मृत्यु हो सकती है। (जब मारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा हो तभी यह फल होता है) ॥१३॥ लग्नादिमन्दान्तफलक्यसंख्या- वर्षे विपत्तिस्तु तथार्कपुत्रात् । यावद्विलग्नान्तफलानि तस्मिन्- नाशो हि तद्योगसमानवर्षे ॥१४॥

चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६७ लग्न से लेकर शनि राशि जिस राशि में है उस राशि तक (जन्म लग्न तथा शनि जिस राशि में हैं दोनों को शामिल करना चाहिये और बीच की सारी राशियाँ भी शामिल होंगी) — शनि के अष्टक वर्ग में जितने शुभ बिन्दु हैं—जोड़िये। यह जो संख्या आवे जातक के जीवन में इस वर्ष में विपत्ति होगी। इसी प्रकार शनि जिस राशि में है—उससे लग्न तक (शनि जिस राशि में है तथा लग्न दोनों को बीच की राशियों के साथ शामिल कीजिये)—शनि के अष्टक वर्ग में कितने बिन्दु हैं—इनको जोड़िये। यह जो जोड़ आवे इसके बराबर वाले वर्ष में—(जैसे जोड़ १५ आया तो १५वें वर्ष में) कष्ट होगा ॥१५॥ अष्टमस्थफलैर्लग्नात्पिण्डं हत्वा सुखैर्भजेत् । फलमायुर्विजानीयात्प्राग्वद्धेलां तु कल्पयेत् ॥१५॥ शनि के अष्टक वर्ग में जो शोध्यपिण्ड आवे उसे लग्न से अष्टम में जितने शुभ बिन्दु हों उनसे गुणा कीजिये। जो गुणनफल आवे उसमें २७ का भाग दीजिये। जो लब्धि आवे—उतने वर्ष की आयु जातक की होगी। मृत्यु का समय पूर्वलिखित नियमों के अनुसार निश्चित करे ॥१५॥ त्रिकोणेषु तु यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत् । एकस्मिन् भवने शून्ये तत्तत्रिकोणं न शोधयेत् ॥१६॥ भवनद्वयशून्ये तु शोधयेदन्यमन्दिरम् । समत्वे सर्वगेहेषु सर्वं संशोधयेत्तदा ॥१७॥ त्रिकोण शोधन : अब त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन बताया जावेगा। यह अष्टक वर्ग का एक आवश्यक अंग है। मन्त्रेश्वर का इस सम्बन्ध में

५६८ फलदीपिका क्या विचार है यह बताने से पहिले इस विषय का थोड़ा सा परिचय दे देना जरूरी है जिससे पाठकों को श्लोकों को समझने में कठिनता न हो । (i) मेष, सिंह और धनु एक त्रिकोण बनाते हैं क्योंकि मेष से सिंह पाँचवीं राशि, सिंह से धनु पाँचवीं और धनु से मेष पाँचवीं राशि होती है । (ii) इसी प्रकार वृष कन्या और मकर यह दूसरा त्रिकोण हुआ । (iii) मिथुन, तुला, कुंभ यह तीसरा त्रिकोण हुआ । (iv) कर्क, वृश्चिक, मीन यह चौथा त्रिकोण हुआ । पहिले अष्टक वर्ग बनाने का प्रकार बता चुके हैं । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि इन सातों ग्रहों के सात अष्टक वर्ग बने । प्रत्येक अष्टक वर्ग का अलग-अलग त्रिकोण शोधन होता है । मान लीजिये आपको सूर्य अष्टक वर्ग का त्रिकोण शोधन करना है तो देखिये मेष, सिंह तथा धनु तीनों राशियों में कितने बिन्दु हैं : मेष में ३, सिंह में ५ तथा धनु में ४ हैं । अब संस्कृत के आचार्यों में—ज्योतिष के मनीषियों में—विविध उद्भट विद्वानों में मतभेद है कि त्रिकोण शोधन किस प्रकार किया जावे : (१) प्रथम मत यह है कि त्रिकोण की तीनों राशियों में—जिसमें सबसे कम संख्या हो उसे अन्य त्रिकोण की बाकी जो दो राशियाँ हैं—उनमें जो संख्या है—उनमें से घटाइये । उदाहरण के लिये सूर्य के अष्टक वर्ग में मेष में ३, सिंह में ५ तथा धनु में ४ हैं । इन तीनों में सबसे कम संख्या ३ है तो इस ३ को सिंह राशि में जो ५ संख्या है उसमें से घटा कर सिंह राशि के नीचे ५—३ = २ स्थापित

  • आगे के पृष्ठ पर सर्वाष्टक वर्ग दिया जा रहा है जिसकी त्रिकोण शोधन में आवश्यकता पड़ेगी ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६९ सर्वाष्टक वर्ग

ग्र०/रा०मे०वृ०मि०क०सिं०क०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०योग
सू०४८
चं०४९
मं०३९
बु०५४
बृ०५६
शु०५२
श०३९
योग२६३३२८२४४०३६२६२५२४२९२३१९३३७

५७० फलदीपिका कीजिये । इसी प्रकार ३ को—धनु राशि में जो ४ संख्या है उसमें से घटाकर धनु राशि के नीचे ४-३=१ यह संख्या स्थापित कीजिये । मेष में ३-३=० रहेगा । इसी प्रकार सूर्याष्टक वर्ग में वृष, कन्या, मकर—इन तीनों त्रिकोण राशियों को लीजिये—वृष में ७ संख्या है, कन्या में ३ तथा मकर में ३ । इन तीनों में अर्थात् ७ तथा ३ तथा ३ में—३ सबसे कम है । इस कारण ३ को ७ में से घटाकर वृष में ४ तथा कन्या में ३-३ =० एवं मकर में ३-३=० रखिये यह सामान्य नियम होना चाहिये । अब मिथुन, तुला तथा कुंभ राशियों में सूर्याष्टक वर्ग में कितने बिन्दु हैं यह देखिये । मिथुन में ४, तुला में ४ तथा कुंभ में ५ हैं। उपर्युक्त नियम के अनुसार सब से कम संख्या ४ है, इसलिये इस ४ को—तीनों राशि की संख्याओं में से-प्रत्येक में से घटाकर मिथुन में ४-४=०, तुला में ४-४=० तथा कुंभ में ५-४=१ स्थापित करना चाहिये यह सामान्य नियम हुआ । अब चौथा त्रिकोण लीजिये अर्थात् सूर्याष्टक वर्ग की कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ । कर्क में ४ संख्या है, वृश्चिक में ५ तथा मीन में १ । इनमें सबसे कम संख्या १ है । इसलिये इस १ को कर्क वाली ४ संख्या में से घटाकर कर्क में ४-१=३ रखिये तथा वृश्चिक में ५-१=४ स्थापित कीजिये । मीन में तो १-१=० हो ही जावेगा । इस नियम को जिसे "प्रथम-मत" के नाम से ऊपर समझाया गया है—हम निम्नलिखित प्रकार से निर्दिष्ट कर सकते हैं: (क) त्रिकोण की तीन राशियों में—जिसमें सबसे कम संख्या है—उस सबसे कम वाली संख्या को--त्रिकोण की दोनों राशियों में से अलग-अलग घटाकर जो शेष बचें, उन-उन शेष को--उन-उन राशियों के नीचे स्थापित करे ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७१ (ख) यदि त्रिकोण की एक राशि में शून्य हो तो उस शून्य को त्रिकोण की अन्य दो राशियों को घटाने से कोई अन्तर नहीं पड़ेगा और त्रिकोण की अन्य दो राशियों में जो संख्या पहिले से थी वह वैसी की वैसी रहेगी । (ग) यदि त्रिकोण की तीनों राशियों में समान संख्या हो तो -उस संख्या को त्रिकोण की तीनों राशियों में से घटाने से-तीनों ही जगह ० शेष रहेगा । उदाहरण के लिये आपको मंगल के अष्टक वर्ग में त्रिकोण शोधन करना है और वृष, कन्या, मकर इस त्रिकोण का शोधन करना है; तो देखिये मंगल के अष्टक वर्ग में वृष में ४ संख्या है, कन्या में भी ४ है तथा मकर में भी ४ । अब इस '४' को वृष के ४ में से घटाया तो ४-४ = ० शेष रहा । इसी प्रकार कन्या में ४-४ = ० और मकर में भी ४-४ = ० शेष हुआ । यह ऊपर जो प्रथम मत बताया गया है वह पराशर का है । दूसरा मत : अब दूसरा मत दिया जाता है । मान लीजिये आप को सूर्याष्टक वर्ग का त्रिकोण शोधन करना है । मेष में ३ है, सिंह में ५ तथा धनु में ४ । इन तीनों में सब से कम संख्या ३ है । इसलिये मेष में ३, सिंह में भी ३ रखिये तथा धनु में भी ३ । वृषभ में ७ है, कन्या में ३ तथा मकर में ३ तो, इनमें न्यून संख्या ३ है । इस कारण वृष में भी ३ रखिये, कन्या में ३ तथा मकर में ३ तो रहेंगी ही । सूर्याष्टक वर्ग में मिथुन में ४, तुला में ४ तथा कुंभ में ५ है। सबसे कम ४ है—इसलिये कुंभ में ४ स्थापित कीजिये । मिथुन तथा तुला में तो—प्रत्येक में ४ रहेंगी ही । कर्क में ४, वृश्चिक में ५ तथा मीन में १ है। सबसे कम '१'

५७२ फलदीपिका है । इसलिये सूर्याष्टक वर्ग के त्रिकोण शोधन के उपरान्त कर्क में १, वृश्चिक में १ तथा मीन में १ रखिये । यह द्वितीय मत "होरा-रत्न" के लेखक बलभद्रजी का है । पराशर का मत उत्तर भारत में विशेष प्रचलित है । बलभद्रजी का दक्षिण भारत में : मूल ग्रंथ का संस्कृत श्लोकांश निम्नलिखित है :— त्रिकोणेषु तु यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत् अर्थात् त्रिकोणों में जो कम है उसके बराबर तीनों में शोधन करे । एक मत कहता है कि इसका अर्थ हुआ उस न्यून संख्या को तीनों में से कम करे । दूसरा मत कहता है—उस न्यून संख्या के बराबर—तीनों में रखें । मन्त्रेश्वर का मत : मंत्रेश्वर महाराज ने अपनी फलदीपिका में संस्कृत के वही शब्द दिये हैं जो पराशर जी या बलभद्र जी के ग्रंथों में मिलते हैं अर्थात् श्लोक १६ और १७ । अर्थात् (१) सूर्य या किसी अन्य ग्रह के अष्टक वर्ग में त्रिकोण शोधन करना हो तो—त्रिकोण की तीनों राशियों में से जिसमें सबसे कम संख्या हो उसके समान तीनों में शोधन करे । प्रश्न उठता है कि उसके समान संख्या तीनों में घटा कर शोधन करे—अर्थात् घटाकर शेष स्थापित करे या उसके समान संख्या शोधन करे अर्थात् उसके समान संख्या स्थापित करे । उपर्युक्त श्लोकों के दो अर्थ हो सकते हैं। पराशर जी के टीका- कार जो अर्थ करते चले आये हैं—वह प्रथम मत के नाम से ऊपर समझाया गया है। बलभद्र जी इसी श्लोक की जो व्याख्या होरारत्न में करते हैं—और जो दक्षिण भारत में प्रचलित है वह द्वितीय मत के नाम से ऊपर कह चुके हैं ।

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७३ (२) यदि त्रिकोण की दो राशियों में शून्य हो तो तीसरी राशि का शोधन करें। अर्थात् तीसरी राशि में भी शून्य स्थापित करे। (इस मत से बलभद्रजी के मत की पुष्टि होती है। क्योंकि पराशरजी के टीकाकारों के अनुसार तो—न्यून को अधिक में से घटाकर—शेष को अधिक के स्थान में रखना। शून्य को अधिक में से घटाया तो जैसी संख्या थी वैसी ही रहनी चाहिये। परन्तु फलदीपिकाकार लिखते हैं कि उसे शोधन करे तो इसका अर्थ यही हुआ कि वहाँ भी ० स्थापित करे। (३) यदि तीनों राशियों में समान संख्या हो तो तीनों को शोधन करे। अर्थात् तीनों राशियों में ० रखें। *जातक पारिजात का भी मत है कि (१) त्रिकोण की तीनों राशियों में—जिसमें सबसे कम वाली संख्या हो—वही सबसे कम वाली संख्या अन्य दोनों राशियों में स्थापित कर, (२) यदि तीनों राशियों में से एक में शून्य हो तो बाकी दोनों का शोधन न करे,(३) यदि तीनों में समान संख्या हो तो सबके स्थान में ० रख दे। प्रश्न मार्ग का मत है कि भूचक्रे निहतेऽष्टवर्गजफले भेषु त्रिकोणेषु यन्न्यूनं तेन समं त्यजेत्त्रिषु च यद्येकत्र न स्यात् फलम् । जह्यात् सर्वमथान्ययोर्यदि फलान्येकत्र चेत्केवलं जह्यात्तानि यदा समं त्रिषु तदा सर्वं विशोध्यं ततः ॥ इस मत के अनुसार यदि त्रिकोण की एक अथवा दो राशियों में कोई संख्या न हो तो—तो त्रिकोण की तीनों राशियों में ० स्थापित करे। यदि तीनों में समान संख्या हो तो भी तीनों राशियों में ० रखे। *देखिये जातक पारिजात अध्याय १० श्लोक ३८।