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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १३३ ॥ पृथ्वीराजजी की कथा का आरंभ करना ॥ पद्धरी ॥ अब कत्थौं कव्य चहुआन राइ । जिम लई भूमि पल पग्ग घाइ ॥ जिम अनंग राज दिय दिल्लि दान । बषनंत बषिय कुल चाहुवान ॥ छं० ॥ ६७२॥ जिम अगम दुग्ग गढ लए कूटि । जिन्हि किर्ति जित्ति संसार लूटि ॥ जिस सेक्कू सेन पग धार पंडि। कै वार साचि जिन बंधि कुंडि ॥ छं० ॥ ६७३ ॥ जिम कमध सेन धर धरिय कीन । विध्वंसि जग्ग संयोगि लीन ॥ अब्बुच्चा राव रच्यौ बलेस । चालुक्क भंजि पट्टन नरेस ॥ छं० ॥ ६७४ ॥ परिहार सिंघ जिम जेर कीन । दरनी विवाहि रस बसि अधीन ॥ देवगिर दुग्ग है धुरनि गाछि । बालुका जीति दै जग्ग धाछि ॥ छं० ॥ ६७५ ॥ रिनथंभ दुग्ग जह्व नरेस । कंन्या विवाहि तिन रषि देस ॥ भंजे मै वास बहु भील्न कंक । भर नीर ग्रेच तिन कढ्ढि बंक ॥ छं० ॥ ६७६ ॥ अनमो मसंद तिन नाम वारि । जुगवंत जीव मूरष गवार ॥ अवतार अप्प करतार होइ । हूओ न और ह्वैहै न कोइ ॥ छं० ॥ ६७७ ॥ अजमेर दुग्ग नृप सोम राइ । अदभूत तेज अरि धरन खाइ ॥ दिल्लिय अनंग तोंअर नरिंद । अनसंक कंक पहुमीस इंद ॥ छं० ॥ ६७८ ॥ तिह सुत्त नांहि यह पुत्ति दोय । किय व्याह कमध चहुआन सोइ ॥ छं० ॥ ६७९ ॥ रू० ॥ ३४० ॥ ॥ सोमेश्वरजी का अपने तेज बल से तपना ॥ कवित्त ॥ तपै तेज चहुआन । सूर सोमेस अप्प बल ॥ तिन सु तेज तरवारि । मुक्क अह सुक्क मुष जल्ल ॥ ३४० पाठान्तर :-कहौं । कहौ । कथ । चहुवांन राय । लइ । पगा । पय । घायं । अनंग । दिलि दां दांन । वषतैत । वषनंति । चाहुवांन । दुगा । दुंगां । जुट्ठि । जिंहि । किंति । जित्ति । लुट्ठि । लुंटि । जिन । मेकूं । मेक्कि । पिडं । के । जिन । कमंध । सैन । धर धरीय किंच । धरंधरी । धीरं । कींच । जिग्य । जंगि । संजौगि । लिंच । लींच । अबुंआ । आंबूआ । जिन । जैर । किंन । देनगिरि । हे । गाहि । दे । धाह । यःभ । डूग । डुंगं । जदैवं । कन्यां । रषि । भंजे । मेवास । मिवास । भरें । गैह । कढि । नांम । जुंगवंत । किरतार । सोइ । हूंओ । हूउन । ह्वैहै । व्है हैं । कोय । दुग । डूंग । नृप । सोम । घरन् । दिलिय । दिल्लीय । तुंवर । पहुवीस । पुढवीस । तिहिं । सुत । यिह । गृह । पुत्री । चहुवांन । चहुआन । सौय ॥

१२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व सुभट भाट संग थान । चित्त चारन चतुरंगम ॥ जहँ तहँ लच्छि निवास । सु बसि विलसंत सुरंगम ॥ सुनियै न श्रवन पर चक्र भय । सुजस सकल जंपै जगत ॥ मानिक राज कुल उद्धरन । सीम पलन जहँ तहँ पगत ॥ छं० ॥ ई८० ॥ रु० ॥ ३४१ ॥ ॥ अनंगपालजी का अपनी दो पुत्रियों में से सुन्दरी बिजैपालजी को और कमला सोमेश्वर जी को प्रदान करना ॥ दूहा ॥ अनग पाल पुत्ती उभय । इक दीनी विजपाल ॥ इक दीनी सोमेस कौं । बीज बवन कलि काल * ॥ छं० ॥ ई८१ ॥ रु० ॥ ३४२ ॥ एक नाम सुर सुंदरी । अनि वर कमला नाम ॥ दरसन सुर नर दुल्भची । मनौं सु कलिका काम ॥ छं० ॥ ई८२ ॥ रु० ॥ ३४३ ॥ ॥ जिस दिन सोमेस का विवाह हुआ उस दिन क्या २ हुआ ॥ कवित्त ॥ ज दिन व्याहि सोमेस । त दिन अमरन मन उदित ॥ त दिन बीर बेताल । काल कलहागम कुदित ॥ त दिन अवनि उमहीय । पुच इक्चि भार उतारै ॥ छत्र तेज छित छज्जि । देव दानव पुंतारै ॥ ३४१ पाठान्तरः—तपे । चहुआन । चहुवांन । मुझ । मुंछ । अच्छ । मुष । सुभट घाट संग भाट चित्त चोरन चतुरंगम । जहां तहां । जिहां तिहां । जह । तह । लछि । वशि । सुनीयै । जंपे । मांनिक । कुल । प्रलन । जिहां तहां । जह । तह ॥ ३४२-३ पाठान्तरः—अनंगपाल । दिनी । विजपाल । बिजैचंद । सोमेस । चिप वपुत्त । चाल । दंड ॥ ३४२ ॥ नांम । सूर सुंदरी । सुदरी । वीच कमला वर नांम । वै । अनि वर मलया नांम । दुल । मनौं । सुं । कांम ॥ ३४३ ॥

  • चंद कवि का यह वाक्य "बीज बवन कलि काल" हमारे पाठकों के ध्यान देकर यह समझने योग्य है कि यद्यपि चंद सोमेश्वर जी के घर का कविराज था परंतु वह कैसा यथार्थ वक्ता था । क्या आज भी कोई कवि अथवा कविराज ऐसा स्पष्ट कह अथवा लिख सक्ता है ?

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६५ ता दिन सु सार सज्जा समह । भ्रम अंतर कायर कपे ॥ मानिकक राइ अनगेस घर । पानि ग्रहन ज दिन थपे ॥ कं० ॥ ६८३ ॥ रू० ॥ ३४४ ॥ ॥ सोमेस्वरजी की राणी के गर्भ रहना और उस का प्रतिदिन बढना ॥ कवित्त ॥ कितिक दिवस अंतरह । गयिय आधान रानि उर ॥ दिन दिन कला बढंत । मेघ ज्यों बढत भद्द धुर ॥ चंद्र कला सित पष्प । जेम बाढंत दिनं दिन ॥ मुगधा जोवन चढत । मिन्नत भरतार षिनंषिन ॥ उदित अधान सुभ गातनह । जेम जलधि पुन्निम बढहि ॥ हुलसंत चीय जे प्रीय चिय । जिम सु जोति जनिता चढहि ॥ कं० ॥ ६८४ ॥ रू० ॥ ३४५ ॥ ॥ सोमेस्वरजी की तुन्नरि राणी का पृथ्वीराजजी को जनना ॥ दूहा ॥ सोमेसर तोन्नर घरनि । अनगपाल पुचीय ॥ तिन सु पिथ्य गर्भं धरिय । दानव कुञ्ज कृचीय ॥ कं० ॥ ६८५ ॥ रू० ॥ ३४६ ॥ ॥ सोमेसजी के प्रथम पुत्र ढुंढा के वर से होना स्मरण कर गंधर्वादि का प्रसन्न होना और उत्सव मनाना ॥ कवित्त ॥ प्रथम पुत्र सोमेस । गंधपुर ढुंढा गद्विय ॥ भई सुद्धि गंध्रवन । पुहप मंगल दुज पट्टिय ॥ अद्धं रैनि अनु जानि । खियौ वालुक सिर सिद्धिय ॥ गयन बयन घन सह । जुद्ध जीवन जय दिद्विय ॥ ३४४ पाठान्तरः—व्याह । सोमेस । ता । भ्रमरंत । भ्रमरंन । उदित । काम कलहागम कुदित । उंमहिय । उमहिय । नाथ मोहि भार उतारै । सेज । क्षिति । छनि । दिव वांनब्वि पुं तारै । पौ । दीन कहुं दवि पुंतारै । कंपीय । कंपीय । मानिक । रायं । अनगैस । ज दिन । थपिय । थपीय । थपै ॥ ३४५ पाठान्तरः—कितकं । आधांन । रांनि । ज्यों मेध वढंत भद्द धुंर । ज्यो । ज्यों मेघ बढुंत भद्द धुर । पष । र्पष । जैम । यौवनं । षिन षिनं । षिनि पन । उदित अधान सुभगतनह । जैम । पूनिम । पूंनिम । हुलषंत । जै । जीय । ज्योति ॥ ३४६ पाठान्तरः—सोमेशरं । तुंअर । यम्भ पिथं । पिथ्यै । क्षित्रीय ॥

१३६ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व सित सुभट सूर छह सय्य चकि । चंद अह कीरति करन ॥ संजोगि जोति तप राशि सत । वरष तीस दसछ बरन ॥ छं० ॥ ६८६ ॥ रू० ॥ ३४७ ॥ कवित्त ॥ बज तापस तप तपिय । आप बीसल सिर धारिय ॥ बरष असी तीन सै । गुच्छा ढिल्ली ढिग नारिय ॥ † सित अंजन रजनीय । पुरनि गंध्रव पग धारिय ॥ † * * * * * * अवतारलियौ प्रिथिराज पहु । ता दिन दान अनंत दिय ॥ कनवज्ज देस गज्जन पटन । किलकिलंत कालंकनिय ॥ छं० ॥ ६८७ ॥ रू० ॥ ३४८ ॥ ॥ जिस दिन पृथ्वीराजजी का जन्म हुआ उस दिन देशान्तरों में क्या २ हुआ ॥ कवित्त ॥ ज दिन जनम प्रिथिराज । षरिंग बत्तह कनवज्जह ॥ ज दिनं जनम प्रिथिराज । त दिन गज्जन पुर भज्जह ॥ ज दिन जनम प्रिथिराज । त दिन पहन वै सड्डिय ॥ ज दिन जनम प्रिथिराज । त दिन मन कालन घड्डिय ॥ ज दिन जनम प्रिथिराज भौ । त दिन भार धर उत्तरिय ॥ बत्तरीय अंस अंसन ब्रहम । रची जुगें जुग बत्तरिय ॥ छं० ॥ ६८८ ॥ रू० ॥ ३४९ ॥ ३४७ पाठान्तरः-सोमैस । गधपुर । ढुंढां धारीय । भइ मुद्दि गंध्रवन । गंधूवन । पढिय । रैन । रैनि । जांनि । लयौ । लीये । वालिक । वालक । सुर । सड्डिय । गैन वैन । घसद् । गैन । वैन घन सद । सुड्ड जीपन जय द्वितीय । सतं । सुर । जोति । सन ॥ † यह दोनों तुक सं० १८४५ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ * यह तुक हमारे पास की किसी भी पुस्तक में नहीं है ॥ ३४८ पाठान्तरः-बलि । सिल । धारीय । रंजनीय । गंध्रव । धारीय । लीयौ । प्रिथीराज । दांन । कनवज । दैसं । गजन । प्रटन । प्रट्टन । किलकंतं । कालक नीय ॥ ३४९ पाठान्तरः-डिनि । जनमि । प्रिथोराज । परिग वत्तह कनवजह । जनमी । गंजन पुर भंजन । गजन पुर भजह । जा । ता । वै । सड्डीय । जनमी । ता । जनिमि । भय । जहिन जनंम प्रथ्रिराज भुअं । भुय । ता । उतरिय । अवतारिय । अवतरीप । जुगे । जुग । बत्तरीप ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १३५ ॥ अनंगपालजी का अपनी पुत्री के पुत्र को देखना और उत्सव करना ॥ कवित्त ॥ अनग पुहवै नरेस । व्यास जग जोत बुलाइय ॥ जुगंन लिद्धि अनुजा सुत । नाम चिहु चक्क चलाइय ॥ पुप्फ पानि धरि धूप । पिध्य पाइन दो अंसह ॥ कलि अवतार कुलाह । अंसपति पारन कंसह ॥ बहु जुद्ध रुद्द कलि जुग्ग वर । श्रित सित्त दैतन भिरन ॥ कवि चंद दिली थद्द कारने । इह अपुव्व अवतार लिन ॥ छं० ॥ ६७९ ॥ रु० ॥ ३५० ॥ पुत्री पुत्र उछाह । दान मानह घन दिड्डिय ॥ धाम २* गावत धम रि । मनहु अचि वन मनि लिड्डिय ॥ कनवज जैचंद मात । भयो संभरि वचनी सुत ॥ तिन पवंत दुज पठिय । धार जर चीर थपिय युत ॥ प्रछिराहू परीघह दान दुज । किय समाप सब्वन विवरि ॥ दस दिवस रषि अप्पन अवर । अति उछाह आनंग करि ॥ छं० ॥ ६८० ॥ रु० ॥ ३५१ ॥

  • इस को कोई नई बात नहीं समझना चाहिये किन्तु बहुत पुरानी रीति है कि काव्य में जहां एक शब्द दो बार प्रयोग होता है और दो बार उस का पृथक २ प्रयोग करने से छंद टूटता हो तो उस को एक बार लिख कर उसके आगे २ दो का अंक कर देते हैं और उस से अभिप्राय यह रहता है कि उस को गद्य में करने के समय अथवा उस का अर्थ करते समय उस शब्द को दो बार प्रयोग कर लेना कि उस के गौरव का नाश न हो जाय । ऐसे प्रयोग प्राचीन कवियों के काव्यों में आते हैं परंतु अब लोगों ने उन के स्थानों में नये पाठ धर दिये हैं और इस सूक्ष्म कारण पर ध्यान नहीं दिया है । किन्तु गद्य में तो अब तक यह रीति भले प्रकार प्रचलित है ॥

३५०-५१ पाठान्तर :- अनंगपाल । पुहवी । योति । भुलाईय । लिहू । दिहू । सु । तनि । नांम चिहुं चक्र चह्नाइय । चलाईय । पुफ्फ पांनि । पिथ । पायन । द्वौ । असह । कुलांह । असपति । बहुं । जुड्डु । जुंगा । जुग । भ्यत । ध्रित सित । देतन । भिरिय । करत इह अपूरव अवतार लीय । अपुव; ॥ ३५० ॥ दांन । मांन दिह्रीय । धांम धांम । धमारि । मनहुं अदि वंत मनि लह्रीय । कनवजह । कनवज्जह । जैचंद । जेचंद । पिता बहिनी सुतनी सुत । तिम । यवंग । दुजि । पठीय । थपीय । थुति । श्रुति । पहिराय । परिग्राह । परिगह । दांन । कोय । न्येमाप । समाप । सवन । विवर । दिस । रिषि । रषि । अपन ॥

१३८ पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व ॥ पृथ्वीराजजी का जन्म होना सुन कर सोमेसजी का उत्सव करना ॥ दूहा ॥ सुनि सोमेस बधाइ दिय । दै गै चीर गुराव ॥ अति उछाह आनंद भरि । नृप मुख चढ़िय आव ॥ कं० ॥ ई८१ ॥ रु० ॥ ३५२ ॥ ॥ सोमेसजी का पृथ्वीराजजी को अपने घर लाने को कहना ॥ दूहा ॥ तब बुलाइ सोमेस बर । लौहानी अरु चंद ॥ लै आवहुँ अजमेर घर । पछौतै घरछ सु इंद ॥ कं० ॥ ई८२ ॥ रु० ॥ ३५३ ॥ ॥ सोमेसजी का पृथ्वीराजजी को अजमेर ले आना ॥ दूहा ॥ करि आनो * उछ्छाह किय । चलिय राज अजमेर ॥ सहस बाजि है सुभर बर । सत्त सषी मनि मेर ॥ कं० ॥ ई८३ ॥ रु० ॥ ३५४ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् और उनके प्रागट्य का हेतु ॥ दूहा ॥ एकादस सै पंच दह । विक्रम साक अनंद ॥ तिच्छि रिपु जय पुर हरन कां । भय प्रथिराज नरिंद ॥ कं० ॥ ई८४ ॥ रु० ॥ ३५५ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के शक की संज्ञा का सूत्ररूप कवि का वाक्य ॥ दूहा ॥ एकादस सै पंच दह † । विक्रम जम भ्रम सुत्त ॥ छतिय साक प्रथिराज कौ । लिख्यौ विप्र गुन गुप्त ॥ कं० ॥ ई८५ ॥ रु० ॥ ३५६ ॥ ३५२ पाठान्तरः-दीय । हे । गे । बीर । भर । मुंह । चढ़ियं । आब ॥ ३५३ पाठान्तरः-चलाय । सौमेस । लौहंनी । पुर गजब अति सासनह । महन तथ कवि चंद पुरं गंञ्जन अति हरि आसनहं । पुहंन तथ कवि चंद । आवहुं । घर ।

  • स्त्री को उसका पति अथवा पति के सगे संबन्धी आदि उसके पिता के घर से अपने घर लाते हैं वह आना अथवा आनो कहलाता है ॥ ३५४ पाठान्तरः-उछाह । कोय । चलीय । हे । वर सत । मति । मैर ॥ ३५५ पाठान्तरः-एकादश । सैं । सं । शाकं । तिह रिपु पुर जय हरन को । हुआ । हुय । भे । पृथीराज ॥ बूंदी वाली सं० १८४५ की पुस्तक में इसके स्थान में ३५६ रूपक है और उस के स्थान में यह है ॥ † इसकी पहिली आधी तुक का पाठ हमारे पास की सब पुस्तकों में “एकादस समये सु कृत” करके है किन्तु जो हमने रक्खा है वह बूंदी राजे की पुस्तक से उद्धृत किया है । ३५६ पाठान्तरः-एकादर्श । समये । समये । धर्म । सुंत । चौर्यांत । चौर्यान । शाके । पृथीराज । प्रथिराज । कौं ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५६ इन रूपक ३७५ और ३७६ पर हम यह टिप्पणी अत्यन्त आनन्द के साथ लिखकर हिन्दी भाषा के महा कवि चंद वरदाई की संवत् संबन्धी बड़ी कठिनता के इस शोध को पुरातत्व वेत्ताओं की सेवा में भले प्रकार विचार करने को प्रवेश करते हैं । यद्यपि हमारे ज्योतिष शास्त्रादि के अच्छे २ विद्वान इष्ट मित्रों में से कितनेक महाशय कि जिन को यह शोध विदित हो गया है हमको First discovery प्रथम शोध करने का मान देते हैं किन्तु हम उनकी परम प्रीति और न्याय बुद्धि के साथ गुण ग्राहकता के लिये अत्यन्त आभारी होकर तथापि यह कहते हैं कि जब अन्य पुरातत्ववेत्ता विद्वान् भी हमारे इस शोध को उसके गुण दोषों का अन्वेषण करके स्वीकार करेंगे तब हम अपने को स्वकीयत्या कृत कृत्य समझेंगे । अब आप चंद की संवत् संबन्धी कठिनता को इस प्रकार से समझने का प्रयत्न करें कि प्रथम तो रूपक ३७५ को बहुत ध्यान देकर पढ़ें । तदनन्तर उसका अन्वय करके यह अर्थ करें कि (एकादस से पन्दरह) ग्यारह से पंदरह (अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनन्द साक) अनन्द विक्रम का साक अथवा विक्रम का अनन्द साक (तिथि) कि जिसमें (रिपुजय) शत्रुओं को विजय करने (पुरहरन) और नगर अथवा देश देशान्तरों को हरन करने (कौं) को (प्रिथिराज नरिंद) पृथ्वीराज नामक नरेंद्र (भय.) उत्पन्न हुए ॥ तदनन्तर इसके प्रत्येक शब्द और वाक्यखंड पर सूक्ष्म दृष्टि देकर अन्वेषण करें कि उसमें चंद की Archaic style प्राचीन गूढ भाषा होने के कारण संवत् संबन्धी कठिनता कहां और क्या घुसी हुई है। कवि के प्रतिकूल नहीं किन्तु अनुकूल विचार करने पर आप की न्याय-बुद्धि झट खोज कर पकड़ लावेगी कि विक्रम साक अनन्द वाक्यखंड में-और उसमें भी अनन्द शब्द में हम लोगों को इतने वर्षों से गड़बड़ा कर भ्रमा रखनेवाली चंद की लाघवता भरी हुई है। इतनी जड़ हाथ में आय जाने पर अनन्द शब्द के अर्थ की गहराई को ध्यान में लेकर पक्षपात रहित विचार से निश्चय कीजिये कि यहां चंद ने उसका क्या अर्थ माना है । निदान आप को समझ पड़ेगा कि अनन्द शब्द का अर्थ यहां चंद ने केवल नव-संख्या-रहित का रक्खा है अर्थात् अ = रहित और नन्द = नव ९। अब विक्रमे साक अनन्द को क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनन्द साक करके उसका अर्थ करो कि नवं-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम का नव-रहित शक अर्थात् १००-९ = ९० । ९१ अर्थात् विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ९० । ९१ से प्रारंभ हुआ है । यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैकड़ों वर्षों से यह कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तो अब तक प्रचलित है और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह कर अब अप्रचलित होगया है। और हमने भी जो कुछ इस के विषय की विशेष दंत कथा कोटां राज्य के विद्वान कविराज श्री चंडीदानजी से सुनी थी वह इस महाकाव्य की संरता में जैसी की तैसी लिख दियो है अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं । एक तो सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है। इसी के साथ इतना यहां का यहां और भी अन्वेषण कर लीजिये कि हमारे शोध के अनुसार जो ९० । ९१ वर्ष का अंतर उक्त दोनों संवतों का प्रत्यक्ष हुआ है उसके अनुसार इस महाकाव्य के संवत् मिलते हैं कि नहीं। पाठकों को विशेष श्रम न पड़े अतएव हम स्वयम् नीचे के कोष्ठक में कुछ संवतों को सिद्ध कर दिखाते हैं:-

३. चामुण्डराय एवं मण्डोवर युद्ध

१४० . पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व

पृथ्वीराजरासे के अनन्द संवतों का कोष्टक ।

पृथ्वीराजजी कारासे में लिखे आनन्द संवत मेंसनन्द और आनन्द संवतों का अंतर जोड़ेयह सनन्द संवत् हुआ उस मेंपृथ्वीराजजी की शेष वय जोड़ापरीक्षा के लिये अंतिम लड़ाई का सिद्ध संवत्
जन्म१११५९० । ९११२०५ । ६४३१२४८ । ९
दिल्ली गोदजाना११२२ *९० । ९११२१२ । ३३६१२४८ । ९
कै मास जुद्ध११४०९० । ९११२३० । ११८१२४८ । ९
कनोज जाना११५१९० । ९११२४१ । २१२४८ । ९
अंतिम लड़ाई११५८९० । ९११२४८ । ९१२४८ । ९

जो कुछ हमने यहां तक कहा है उस से और सब बातें तो हमारे पाठकों के मन में बैठ गई होंगी किन्तु ३५५ रूपक में जो अनन्द शब्द प्रयोग हुआ है उस में किसी २ को कुछ संदेह रहेगा; अतएव हम फिर उस के विषय में कुछ अधिक कहते हैं। देखो संशय करना कोई बुरी बात नहीं है किन्तु वह सिद्धान्त का मूल है । हमारे गौतम ऋषि ने अपने न्याय-दर्शन में प्रमाण और प्रमेय के पीछे संशय को एक पदार्थ माना है और उसको दूर करने के लिये ही मानो सब न्यायशास्त्र रचा गया है। यदि आनन्द का नव-संख्या-रहित का अर्थ किसी की सम्मति में ठीक नहीं जंचता हो तो उस से इस स्थल में बहुत अच्छी तरह घटता हुआ कोई दूसरा अर्थ बतलाना चाहिये । परंतु बात तब है कि वह सर्व तंत्र सिद्धान्त universally true से उसी तरह सिद्ध होसक्ता हो कि जैसे हमने यहां अपना विचार सिद्ध कर दिखाया है । सब लोग जानते हैं कि हमारे इस शोध के पहिले तक युवा और मध्य वय के कोई २ कवि लोग इस अनन्द संज्ञा वाचक शब्द का गुण वाचक अर्थ शुभ Auspicious का करते रहे हैं और चारण जाति के महामहोपाध्याय कविराज श्रीश्यामलदासजी ने भी अपने इस महाकाव्य के खंडन-ग्रंथ में यही अर्थ माना है । परंतु विद्वानों के विचारने और न्याय करने का स्थल है कि इस दोहे में आनन्द पाठ नहीं है और न छंद के लक्षण के अनुसार वह बन सक्ता है किन्तु स्पष्ट अनन्द पाठ है। यदि यहां संज्ञा वाचक आनन्द पाठ भी होता तो भी उस का गुण वाचक शुभ का अर्थ नहीं हो सक्ता था परंतु संस्कृत भाषा का थोड़ासा ज्ञान रखने वाला भी यह जान सक्ता है अथवा जिनके पास संस्कृत भाषा के कोषों की पुस्तकें हैं वह उनके बल से भी जान सक्ते हैं कि वाचस्प- त्यबृहत् संस्कृताभिधान के पृष्ठ १४९ और शब्दार्थचिंतामणि के पृष्ठ ६९ में स्पष्ट अनन्द के यह अर्थ लिखे हैं कि “त्रि० न नन्दयति नन्द, आनन्दयितृभिन्ने, अनानन्दे असुखे” इत्यादि। देखो जब अनन्द शब्द का सत्य अर्थ दुःख का है तो फिर क्या सुख और शुभ का अर्थ करना अयोग्य नहीं है । यदि कवि लोग जैसे अलंकार और नायका भेद की सूक्ष्मता जान लेने के लिये परिश्रम करते हैं वैसे ही जो सूक्ष्म दृष्टि देकर देखते तो झट जान लेते कि यहां कवि गूढार्थ में संवत का भेद बता रहा

  • यह संवत् हमने पृथ्वीराजजी के जो पवाने हमको मिले हैं उन की काप में लिखा हुआ है उन से ग्रहण किया है किन्तु रासे की अब तक प्राप्त हुई पुस्तकों में तो किसी में ११३८ और किसी में ११३८ लिखा मिलता है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १४१

है और सुख अथवा दुःख और शुभ अथवा अशुभ के स्थूल अर्थों को प्रयोग में नहीं लेता है । व्याकरण शास्त्र की रीति से भी आनन्द और अनन्द शब्दों की प्रयोग सिद्धी में अंतर है । अब हमारे अर्थ की पुष्टि में विचार कीजिये - १ प्रथम तो विचार करने पहिले ऐसे २ दुराग्रहों से अपने २ हृदय को अपवित्र नहीं कर रखना चाहिये कि चंद ऐसा मूर्ख था कि उसे अनुस्वार और विसर्ग तक का ज्ञान न था और न वह संस्कृतादि किसी भाषा में व्युत्पन्न पंडित था और जितनी भूलें इस महाकाव्य में मिलती हैं वह सब उसने ही कियीं हैं ॥ २ दूसरे देखो कि कवि यहां विक्रम के शक की संख्या के विशेषण में अनन्द शब्द का प्रयोग करता है और यहां संख्या-वाचक अर्थ का ही प्रसंग है । और इस बात की भी कुछ अत्याव- श्यकता नहीं है कि हम यहां अनन्द को आनन्द का अपभ्रंश आदि समझ कर शुभ का ही अर्थ करें क्योंकि कवि इस के साथ ही रूपक ३५६ में स्पष्ट "तृतीय साक पृथिराज कौँ लिख्यो" कहता है । और संज्ञा वाचक आनन्द का अपभ्रंश रूप अनन्द कि जो तथापि संज्ञा वाचक ही होगा, उस का गुण वाचक अर्थ शुभ auspicious कदापि नहीं बन सक्ता ॥ ३ तीसरे इस स्थल के प्रसंग से अनन्द शब्द को अ + नन्द से बना मानना चाहिये । और अ का यहां रहित अर्थ करने के लिये इस श्लोक को प्रमाण में लेना चाहिये :- "तत्साहश्यमभावश्च, तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नञर्थाः षट प्रकीर्त्तिताः" ॥ और नन्द के नव संख्या वाचक अर्थ के ग्रहण करने को वैसे ही समझे जैसे सर्प शब्द ७ सात के वाचक की भांति "नव नन्दा भविष्यन्ति-चाणक्यो यान् हनिष्यति' स्कं० पु० । तथा श्रीधर स्वामी कृत भागवत की टीका में 'तेषां सपुत्राणां नवसंख्यत्वेन तत्तुल्य संख्या के" स्पष्ट ही है अतएव अधिक प्रमाण नहीं लिखते हैं ॥ ४ चौथे चंद का अनन्द शब्द प्रयोग करने से उस का यह आन्तरीय अभिप्राय होना ज्ञात होता है कि विक्रम का जो प्रचलित संवत् है उस की मूल संख्या में संकर राजा नन्द का कुछ समय मिला हुआ है अर्थात् वह संवत् जिस गणित के अनुसार है वह उक्त नन्द के समय सहित थी और चंद ने जिस प्रकार से काल निरूपण किया है वह नन्द के समय रहित है अर्थात् चंद का लिखा विक्रमी संवत् शुद्ध विक्रमी है । इसी लिये हमने इन दोनों संवतों को अनन्द और सनन्द नामों से इस टिप्पण भर में ग्रहण किये हैं । यदि कोई मनुष्य यह हठ कर बैठे कि हमको चंद का अनन्द संवत् केवल प्रत्यक्ष प्रमाणों से ही सिद्ध कर दिखाओ तो क्या यह हमारा उसको उत्तर देना अन्यथा होगा कि जिस प्रमाण रूप प्रचलित विक्रमी संवत् की अपेक्षा से तुम चंद के लिखे अनन्द संवत् रूपी प्रमेय को सिद्ध कराना चाहते हो तो प्रथम तुम अपने प्रमाण को वैसे ही प्रत्यक्ष प्रमाणों से निर्दोषी सिद्ध कर दिखाओ कि फिर हम उसको प्रमाण रूप मान कर चंद के अनन्द संवत् रूपी प्रमेय को सिद्ध कर उसकी अशुद्धता समझ लें; क्योंकि यह दावा तुम्हारा है कि चंद का लिखा संवत् अशुद्ध है । अतएव वादो के करने का काम हम ही करके प्रचलित विक्रमी संवत् की सत्यता की परीक्षा करते हैं । परीक्षा करने के पहिले एक यह सिद्ध हुई सी बात स्मरण कर लेनी चाहिये कि आज तक सर विलियम जोन्स, मिस्टर सैम्यूऐल डेविस, कौलब्रुक, बैन्टली, हाल, लैसन, डाक्टर भाऊ दांजी, बुलर, व्हिंटनी, अलबीरुनी, डाक्टर हंटर और डाक्टर कर्ण आदि ने जो २ शोध बड़े २ परिश्रम से विक्रमादित्यजी का ठीक समय निश्चय करने के लिये कई एक प्रकारों से अर्थात् विक्रमादित्यजी के समकालीन राजा और ग्रंथकर्ता आदि के समयादि का भी विचार करके किये हैं उन से सिवाय इस प्रकार के सिद्धान्त

१४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ] कर लेने के कि वर्तमान विक्रमी में से १३५ वर्ष घटाने से शालिवाहन का शक और ५६ वा ५७ घटाने से ईसवी सन् और इसी प्रकार से अन्य संवत् भी और इसी हिसाब से ईसा मसीह के ५६ वा ५७ वर्ष पहिले कोई विक्रम नाम का राजा हुआ था कि जिस का यह संवत् प्रचलित है, न तो कोई और फल निकला है और न कोई वैसा प्रामाणिक प्रत्यक्ष प्रमाण किसी को मिला है और न कोई आज दे सक्ता है कि जैसा विचारे स्वर्गवासी चंद कवि के लिखे संवतों को सिद्ध करने के लिये बड़ी धूम धाम से हम चाहते हैं । क्या यह न्याय है कि विक्रम के प्रचलित संवत् को सिद्ध करने के समय तो हम गोल माल कर जांवे और चंद के संवत् को सिद्ध करने के लिये दूसरे से प्रत्यक्ष प्रमाण मांगे ? फिर विचार कीजिए कि संस्कृत भाषा के कोषाद्रि में जो यह :- "तत्र शककारकस्य विक्रमादित्यस्य हननात् शालिवाहनस्य शक कर्तृत्वम्" लिखा प्राप्त होता है और आईन अकबरी के ग्रंथकर्त्ता ने भी यही आशय ग्रहण किया है । इस से विक्रमादित्यजी का मरण तो १३५ में होना निश्चित ही है तथा १३५ वर्ष तक राज्य करना भी स्वतः सिद्ध है । अब रहा यह कि विक्रम के संवत् का प्रारंभ उनके जन्म से अथवा गद्दी पर बैठने के दिन से अथवा गद्दी पर बैठने पीछे किसी बड़े कार्य के करने के दिन से हुआ है । यदि ज्योतिर्विदाभरण को कदाचित् सत्य होने की अपेक्षा असत्य ही मानें और उसे किसी भी समय में बना क्यों न ग्रहण करें तथापि उस के अतिरिक्त कोई अन्य प्रमाण दृष्टि में नहीं आता कि जिस के इस :- "निहन्ति यो भूतलमंडले शकान् । सपंचकोट्यञ्जदलप्रमान् कलौ ॥ स राजपुत्रः शककारको भवेत् । नृपाधिराज्ये हुतशाककर्तृ हा ॥” वाक्य के अनुसार पचपन करोड़ शकों को अथवा किसी शक-कर्त्ता को मारने से विक्रमी संवत् का प्रारंभ होना ही अति संभावित प्रतीत होता है । तदनन्तर यह अनुमान करना भी अनुचित नहीं है कि विक्रम ने कुछ अपने बालकपन में तो ऐसा बड़ा साका किया ही न होगा किन्तु उस समय उस की कम से कम २५ वर्ष की वय तो भी होगी कि १३५ + २५ = १६० एक सौ साठ वर्ष की सब वय सिद्ध होती है । निदान उसको हम पृथ्वीराजजी और समरसीजी के ९० वर्ष तक न जीव सक्ने के अनुमान की अपेक्षा से बहुत ही असंभव समझ सक्ते हैं । सारांश यही है कि चंद ने विक्रम की १६० वर्ष की वय की असम्भाव्यता से जो अपने लिखे संवतों को आनन्द संवत् संज्ञा दियी है वह अन्यथा नहीं है और प्रचलित विक्रमी संवत् कि जिस को हम सनन्द कहते हैं उस में अवश्यमेव कुछ नन्द का समय मिला हुआ है और वह चंद के संवत् को दोष देने जैसा स्वयम् निर्दोषी प्रमाण रूप नहीं है । जब कि प्रचलित विक्रमी संवत् अपने को भले प्रकार सिद्ध कर प्रमाण नहीं दे सक्ता तो वह जिस प्रकार से आज माना जाता है उसी प्रकार पृथ्वीराजरासे के संवत् ९० । ९१ वर्ष के अंतर से माने जाने में भी कुछ हानि दृष्टि नहीं आती । हमको एक बड़ा शोक इस बात का है कि यदि विद्वानों ने रूपक ३५५ और ३५६ को एक दूसरे की संगति लगा कर विचारे होते और रूपक ३५६ को बिलकुल ही न छोड़ दिया होता तो रासे के संवतों के विषय में संदेह ही नहीं हुआ होता क्योंकि वे दोनों रूपक मानों खड़े हुए पुकार २ कर कह रहे हैं कि हमारे आशय यह हैं ॥ ५ पांचवें चंद के नवें नन्द के समय को नहीं ग्रहण करने का एक यह भी प्रबल कारण सब के ध्यान में आय सक्ने जैसा है; कि महानन्द को नौ पुत्र थे, आठ तो विवाहिता रानियों से और एक चंद्रगुप्त नामक मुरा नाम की नाइन उपस्त्री से । हमारी इस बात को भी स्मरण में रखनी चाहिये कि मुरा नाम की नाइन से उत्पन्न होने के कारण चंद्रगुप्त और उस के वंशज मौर्य्य कहलाये हैं । अन्य देश देशान्तर के मनुष्यों की अपेक्षा हमारे स्वदेशीय बन्धुओं के

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १४३ समीप कुलीन और अकुलीनों में परस्पर हाड़ बैर का होना कोई आश्चर्यदायक बात नहीं है क्योंकि यह व्यवहार सदा से चला आया है और आज भी मध्य छोटे बड़ों में विद्यमान है अर्थात् कोई अकुलीन चाहे जितनी उन्नति की दशा को क्यों न प्राप्त हो जाय और कोई कुलीन चाहे जैसा दरिद्री भी क्यों न हो जाय किन्तु वह कुलीन उस अकुलीन को संकर ही समझेगा । और इस से सदा दोनों में परस्पर द्वेष रह कर जो जब प्रबल होगा तब वह उस निर्बल को अवश्य नाश कर देगा और वे दोनों अपनी २ वंशावली में अपने २ वैरी का नाम तक नहीं गिनेंगे । इसी कारण से हमारे आर्य-काल-निरूपकों The Arya Chronologists की भी यह शैली होगई है कि जो स्वयम् कुलीन हैं अथवा कुलीनों के पक्षपाती हैं वह उस अकुलीन राजा के नाम और समय को अपनी संपादित ख्यात में नहीं लिखते हैं और उस के समय आदिक को या तो उस के आगे पीछे के किसी कुलीन राजा में मिला देते हैं अथवा ऐसे स्थलों में यह लिख देते हैं कि इतने समय तक "कटार अथवा तरवारि ने राज किया इत्यादि" । इस के अनेक उदाहरण राजपुत्रों की वंशावलियों में मिल सक्ते हैं परंतु एक ऐसा आधुनिक उदाहरण है कि जिस को सर्व साधारण जानते हैं वह मेवाड़ राज की वंशावली में बनवीर का है कि उस से ही विचार देखिये । क्या तो मेवाड़ देश के परम कुलीन महाराणाजी साहब और क्या और कुलीन उमराव सरदार और पासवानादि लोग और क्या हम जो कदाचित् मेवाड़ की ख्यात Chronicles लिखें तौ बनवीर का नाम और उस का समय हमारी कुलीन अवली में न तौ किसी २ ने मिलाया है और न हम मिलावेंगे किन्तु उस का वृत्त सब के जानने के लिये हम एक पृथक टिप्पण में लिख देंगे कि जिस से हम को पुरातत्त्ववेत्ता वृत्त का चोर न ठहरावें और जो कोई कदाचित् हम को ऐसा करने के कारण मुत्तुग्रास्सित्र अर्थात् दुराग्रही भी कहेंगे तौ हम उस को अपनी एक अति प्रिय पदवी समझ कर तथापि अभिमान करेंगे । इसी लिये कुलीन क्षत्रियों के अभिमानी चंद बरदाई ने विक्रमादित्यजी के समय में से अकुलीन मौर्य समय ९० । ८१ वर्ष का ह्रास करके शुद्ध क्षत्रिय समय ग्रहण किया है और उस का नाम विक्रम का अनन्द संवत् अर्थात् पृथ्वीराजजी का तृतीय शक रक्खा है । हम यह यहां तक भी मान कर कह सक्ते हैं कि यदि आज इस विषय को समर्थन करने को कोई भी प्रमाण न मिले तथापि चंद की निज-काल-निरूपण शैली होना तौ स्वयम् सिद्ध ही है ॥ ६ छठें चंद के प्रयोग किये हुए विक्रम के अनन्द संवत् का प्रचार बारहवें शतक तक की राजकीय व्यवहार की लिखावटों में भी हमको प्राप्त हुआ है अर्थात् हम को शोध करते २ हमारे स्वदेशी अंतिम बादशाह पृथ्वीराजजी और रावल समरसींजी और महाराणी पृथा बाईजी के कुछ पट्टे परवाने मिले हैं कि उन के संवत् भी इस महाकाव्य में लिखे संवतों से ठीक २ मिलते हैं और पृथ्वीराजजी के परवानों में जो मुहर अर्थात् छाप है उस में उन के राज्याभिषेक का सं० ११२२ लिखा है । इन परवानों के प्रतिरूप अर्थात् Photo हमने हमारी ओर से ऐशि- याटिक सोसाइटी बंगाल को भेट करने के लिये हमारे स्वदेशी परम प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डाक्टर राय बहादुर राजा राजेन्द्रलाल जी मित्र एल० एल० डी०, सी० आई० ई० के पास भेजे हैं और उन के अकृत्रिम होने के विषय में हमारे परस्पर बहुत कुछ पत्र व्यवहार हुआ है । यदि हमारे राजा साहब अकस्मात् रोग ग्रस्त न हो गये होते तो वे हमारे इस बड़े परिश्रम से प्राप्त किये हुए प्राचीन लेखों को अपने विचार सहित पुरातत्त्ववेत्ताओं की मंडली में प्रवेश किये होते । इन परवानों के अतिरिक्त हम को और भी कई एक प्रमाण प्राप्त होने की दृढाशा है कि जिन को

१४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व

हम उस समय विद्वत् मंडली में प्रवेश करेंगे कि जब कोई विद्वान् उन को कृत्रिम होने का दोष देगा । देखिए जोधपुर राज्य के काल-निरूपक राजा जयचंदजी को सं० ११३२ में और शिवजी और सैतरामजी को सं० ११६८ में और जयपुर राज्य वाले पज्जूनजी को सं० ११२७ में होना आज तक निःसंदेह मानते हैं और यह संवत् भी हमारे अन्वेषण किये हुए ९१ वर्ष के अंतर के जोड़ने से सनन्द विक्रमी हो कर संप्रत काल के शोध हुए समय से मिल जाते हैं। इस के अतिरिक्त रावल समरसींजी की जिन प्रशस्तियों को हमारे मित्र महामहोपाध्याय कविराज श्यामलदासजी ने अपने अनुमान के सिद्ध करने को प्रमाण में मानी हैं वह भी एक आन्तरिक हिसाब से indirectly हमारे शोध किये इस आनन्द संवत् को और उस के प्रचार को पुष्ट और सिद्ध करती हैं । देखिए और इन दो ध्रुवों को अपने ध्यान में रख लीजिए कि प्रथम तो रावल बापाजी के नाम पर सब ख्यात की पुस्तकों में सदैव से सं० १६१ लिखा चला आता है कि जिस को कर्नल टौड साहब ने तो बल्लभी के नाश से चीतोड़ प्राप्त होने तक का समय माना है और मेवाड़ के छोटे २ लड़के तक इतना अवश्य जानते हैं कि बापाजी सं० १६१ में हुए और उन्होंने १०१ वर्ष राज्य किया अथवा उनकी वय १०१ वर्ष की हुई और ऐसे आज तक के इस बड़े निश्चय के साथ सर्वसाधारणों के मानने को महामहोपाध्याय कविराजजी भी कदापि अस्वीकार नहीं कर सक्ते हैं। दूसरे रावल समरसींजी के नाम पर भी उसी तरह सर्व साधारणों के दृढ निश्चय के साथ ११०६ का संवत् ख्यातियों में लिखा हुआ बराबर चला आता है । अब आप हमारे पाठक उक्त सब प्रशस्तियों के सब संवत् अर्थात् १३३२, १३३५, १३४२ और १३४४ में से बापा जी के पूर्व का समय १६१ घटा कर देखें तो ११७१, ११७४, ११५१ और ११५३ पावेंगे कि जो हमारे आनन्द विक्रमी से मिलजाते हैं । क्या यह प्रशस्तिये भी हमारे आनन्द विक्रमी संवतों से आंतरिक हिसाब से नहीं मिल जाती हैं? यह क्यों मिल जाती हैं इस बात के भेद को हम हमारी समझ के अनुसार जानते हुए भी अभी प्रकाश नहीं करते हैं किन्तु किसी उचित समय पर उसे शास्त्रार्थ के साथ प्रकाश करके हमारे मेवाड़ राज की वंशावली को शुद्ध और प्रतिपादन कर मेवाड़ देश की एक अमूल्य सेवा करेंगे ॥ ७ सातवें यदि कोई यह तर्क करै कि राजा नन्द के विक्रमादित्यजी से पहिले अथवा पीछे होने का मतान्तर प्राचीन समय के विद्वानों में होना कुछ भी सिद्ध हो जाय तब हम यह अनुमान कर सक्ते हैं कि आनन्द और सनन्द सवतों के भेद अवश्य हो सक्ते हैं। अतएव हमारा कहना यह है कि जिस किसी को इस विषय का कुछ मतान्तर होना समझना हो वह एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के स्थापन-करनेवाले सर विलियम जोन्स साहिब Sir William Jones के लिखित The Chronology of the Hindus हिन्दुओं का काल-निरूपण नामक विषय के अंतिम दो तीन लेख-खंड अर्थात् फिकरे पढ कर समझ लें (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक २ Asiatic Researches Vol. II) परंतु स्मरण रहे कि हम राजा नन्द का विक्रम से पहिले होना हमारे देशी शास्त्रों के अनुसार मानते हैं ॥ पाठको ! रूपक ३५६ भी पुरातत्व विद्या में बडा उपयोगी है । उस में आप को मालूम होगा कि चंद यह तात्पर्य वर्णन करता है कि जिस ११०० अथवा १११५ में पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए हैं वह संख्या कैसी है कि उसी ११०० अर्थात् १११५ में धर्म-सुत हुए थे तथा उसी ११०० अथवा १११५ में विक्रमादित्यजी भी हुए थे और उसी में अर्थात् विक्रम से ११०० अथवा १११५ वर्ष पीछे पृथ्वीराज जी हुए हैं कि जिन का यह तृतीय शक मैं ने विप्रगुप्त (ब्रह्मगुप्त)

[ आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १४५ ॥ सोमेश्वरजी के अपूर्व तप से पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए ॥ श्लोक ॥ सोमेश्वर मच्चावाहो । तस्यापूर्व तपो गुणैः ॥ तेने पुण्यं जगज्जेता । गर्भान्ते पृथुराजकम् ॥ छं० ॥ ६८६ ॥ रू० ॥ ३५७ ॥ ॥ सोमेश्वरजी को राव (वेन) को बधाई देना ॥ पहरी ॥ अनगेस पुत्रि हुअ पुत्र जन्म । विज्जन्न चमक जनु मेघ घन्म ॥ बधाइ राव * सोमेश दीन । इक सहस हेम हय हुकम कीन ॥ छं० ६८७ ॥ को गुन कर लिया है (लिख्यो विप्र तुन गुप्त) क्या चंद यह अमूल्य पुरातत्व इस रूपक में नहीं कहता है? नहीं-हम को निःसंदेह यही कहता हुआ दृष्टि आता है!! यदि यहां धर्मसुत का अर्थ युधिष्ठिर का ग्रहण हो सक्ता है तो हमारे देशी महाकवि का विक्रम से युधिष्ठिर तक का ११०० अथवा १११५ वर्ष का अंतर मानना मिस्टर वैन्टली साहब के अनुमान ११२३ के से बहुत मिलता हुआ है अर्थात् उस में केवल २३ अथवा ८ वर्ष का ही अंतर है । और यह हमारे स्वदेशी काल-निरूपकों की गणना से भी मिलता हुआ है क्योंकि ११०० अथवा १११५ युधिष्ठिर से चेमक तक तथा उम से विक्रम तक ११०० अथवा १११५ और विक्रम से पृथ्वीराजजी तक ११०० अथवा १११५ और इस गणना के अनुसार ८१४ कलि गत में युधिष्ठिर हुए । तथा चंद के कहे विप्रगुप्त कि जिस को हम ब्रह्मगुप्त होना अनुमान करते हैं उस के विषय में मिस्टर वैन्टली साहब यह कहते हैं कि वह विक्रमी ५८३ तदनुसार ५२० ई० में हुआ था । उस ने ब्रह्म-कल्प की गणना का प्रकार स्थापन और प्रकाश किया था कि जिस पर आधुनिक ज्योतिष का आधार है और ऐतिहासिक संवत् भी उसी के अनुसार परिवर्तन हुए हैं (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक ८ पृष्ठ २३६-७ See Asiatic Researches Vol VIII. page 236-7.) इस ब्रह्मगुप्त की गणित में और अन्य ज्योतिषाचार्यों के सिद्धान्तों में कुछ अंतर है कि जिस के लिये अन्य कोई २ इस ब्रह्मगुप्त को दोष देते हैं कि इस का कुछ विवरण Mr. Samuel Davis मिस्टर सैम्यूएल डेविस साहब के लिखित हिन्दुओं की ज्योतिष विद्या The Astronomical Computations of the Hindus नामक लेख के पढने से ज्ञात हो सक्ता है (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक See Asiatic Researches Vol. II.) इस संवत् सम्बन्धी झगड़े में हमारा अंतिम निवेदन यह है कि यह पुरातत्वविद्या ऐसी बड़ी सूक्ष्म और अथाह गहरी है कि जो विद्वान उस में कदाचित् थोड़ा सा भी चूक जावे तो वह उस में डूब जाता है और उस को खारे पानी के समुद्र में तिरना बहुत कठिन है और उस में पड़ी हुई किसी वस्तु को वही गोताखोर अर्थात् शोधक निकाल सकता है कि जिसे धर्मरूपी प्राण को शुद्ध अंतःकरण में स्थिति करके गोता मारने का अभ्यास होता है ॥ ३५७ पाठान्तर :-सोमेसर । सोमैस्वर । तस्या । पूर्वे । तयं । गुने । गुणो । पुन्य । जगंन्जता । गर्भानं । गर्भान । प्रथ्रिराजयं । पृथुराजयं । पृथीराजये ॥ इस रूपक के शुद्ध और अशुद्ध पाठों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने से ज्ञात हो सक्ता है कि दुष्ट लेखकों ने उन को कैसे २ भ्रष्ट कर दिये हैं कि जिस के लिये स्वर्ग वासी विचारे चंद को हम लोगों के दिये अनेक दोष सहने पड़ते हैं ॥

  • देखो मालूम होता है कि चंद यहां अपने बाप का स्पष्ट नाम नहीं लेकर मुहावरे से राव शब्द प्रयोग कर राव वेन का निर्देश करता है ॥ १०

१४६ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व दिय ग्रास एक हथ इक हत्थ । परिग्रह प्रसाद सह कीन तथ्य ॥ नीसांन वाजि दरबार जोर । घन गर्ज्ज जान दरिया हिलोर ॥ कं० ॥ ६९८ ॥ पधराइ राइ मुख दरस कीन । क्रित क्रम्म पुब्ब फल मान लीन ॥ करि जात क्रम्म मति ग्रंथ सोधि । वेदोक्त विष्प बर बुद्धि बोधि ॥ कं० ॥ ६९९ ॥ मंगल उच्चार करि नृत्य गान । अच्छरि अलाप सुर भुवन जान ॥ कं० ॥ ७०० ॥ रु० ॥ ३५८ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्मोत्तर गुणों का वर्णन ॥ साटक ॥ जन्मोत्तरि गुन जन्म राजन् वरं, चालीस वर्षं चती ॥ सा भोगं धर लक्ष्कि टिल्लति वरं, पंजाब पंचौ पथं ॥ इंद्रं प्रस्थय संभरी ववरयं, सोमेसजा जोतयं ॥ भुक्तं सुक्तय वंधि गज्जन वरं, जन्मं करं सुक्तयं ॥ कं० ॥ ७०१ ॥ रु० ॥ ३५९ ॥ ॥ सोमेसजी को पृथ्वीराजजी के जन्मोत्तर गुन सुन कर हर्ष और शोक होना ॥ कवित्त ॥ सोम वत्त सुनि श्रवन । हर्ष अरु सोक उपन्नौ ॥ दैव काल संजोग । तपै ढिल्ली घर थन्नौ ॥ कथै व्यास संभरी । क्रन्न इह वत्त प्रमानं ॥ किं जानै किं होइ । घरी इक गहन जानं ॥ खिस्मान मान संभर धनी । सुनी कित्ति अनगेस बर ॥ संची प्रमान सब इष्ट गुरु। कथै राज पृथिराज बर ॥ कं०॥ ७०२॥ रु०॥ ३६०॥ † ३५८ पाठान्तरः-अनगैस । हुव । विजलं । बिजुलि । चमक । जुंनु । मेघ । जन्म । बढ़ाय । राज । सोमेस । दीय । यांम । इक । इक । हथ । हथ । परिगह । परीग्रह । कीन । तथ । वन्नि । गर्ज्ज । जांणि । पधराय । राय । मुख । सरसन । हरष । कर्म । पुब । मंनि । क्रंम्म । मनि । वेदोक्त । विप्र । बुधि । प्रमोधि । गांम । ग्यांन । अछिर । अकर । सुरं । भूवन । जांनि ॥ ३५९ पाठान्तरः-जन्मोत्तरि । राजन्म । बर । चालीस । वर्ष । घटी । सोभाग्यं । सौभाग्यं । लक्ष्छि । दिलित । दिल्लिते । घर । पंचं । पंच । इंद्रप्रस्ख । ववरय । जोतियं । जोतियं । भुक्त । वर । जन्यं ॥ ३६० पाठान्तरः-सोम्र । वती । उपनौ । उपन्नो । दैव । संजोग । ढिल्ली । घरं । धंनो । क्रन । वत । जाने । होय । यक । घटिन । जांन समानं । संभरि । सुतिकित्ती । प्रमांन । प्रथौराज । पृथीराज ॥ † यह रूपक हमारे पास की और सब पुस्तकों में तो है किन्तु सं० १७७० वाली में नहीं है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १४० ॥ विक्रम के सदृश पृथ्वीराजजी हुए कि जिन की बुद्धि का वर्णन चंद करता है ॥ दूहा ॥ विक्रम राज सरीस भा । बुधि ब्रंनन कवि चंद ॥ भूत भविष्यत बत्तमन । कहत अनूपम कंद ॥ छं० ॥ ७०३ ॥ रु० ॥ ३६१ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म समय के ग्रहों की स्थिति ॥ दूहा ॥ ग्रह स पंच चव हंस छह । लगन सु अष्टम मंद ॥ दुनिया गुरु मेषच तरनि । चिच्चह जनम नरिंद ॥ छं० ॥ ७०४ ॥ रु० ॥ ३६२ ॥ ॥ सोमेस्वरजी का दरबार में बैठ ज्योतिषियों से पृथ्वीराजजी की जन्मपत्री का फल पूछना और पंडितों का फल वर्णन करना ॥ पद्धरी ॥ दरबार बैठि सोमेस राइ । लीने हजूर जोतिग बुलाइ ॥ कछौ जन्म कर्म बालक विनोद । सुभ लगन महूरत सुनत सोद ॥ छं० ॥ ७०५ ॥ संवत्त दूक्क दस पंच अग्ग । वैसाष मास पष कृष्ण खग ॥ गुर सिद्धि जोग चिचा निषच । गर नाम करन सिसु परम चित्त ॥ छं० ॥ ७०६ ॥ ऊषा प्रकास दूक घरिय रात । पल तीस अंस चय बाल जाति ॥ गुरु वुद्ध सुक्र परि दसै थान । अष्टमै वार शनि फल विनान ॥ छं० ॥ ७०७ ॥ पंच दुअ थान परि सोम भोम । ग्यारमै राह पल करन चोम ॥ छं० ॥ ७०८ ॥ बारमै सूर सो करन रंग । अनमी नमाइ तिन करै भंग ॥ विन पेस सेव रचि चैन कोइ । भंजै मिवास सुप न दिन होइ ॥ छं० ॥ ७०८ ॥ पृथिराज नाम बज् हरै कुंच । दिक्षीय तषत मंडै सु कूच ॥ च्यालीस तीन तिन वर्ष साज । कलि पुछमि इंद्र उद्धार काज ॥ छं० ॥ ७१० ॥ पर लछै द्रव्य पर हरै भूमि । सुष लछै अंग जब होइ झूमि ॥ बरनीय अष्ट दुय लेय व्याह । तिनं दुग्गं तात थपि अप्प वाहि ॥ छं० ॥ ७११ ॥ ३६१ पाठान्तर :- सरीर । बुद्धि । भ्रनन । वत्तैमान ॥ ३६२ पाठान्तर :- हंस सह । लग्न । थले । गुर । तसणि जन्म । नटिन । नरिदः । अरिंद । ३६३ पाठान्तर :- सोमेस राय । हंजूर । पंडित । बुलाय । कर्म्म । बालिक । मूंहूरत । संवत् । संवतह । दूँक दस । दह द्वक । दश पंच अग्र । पंच अग्र । वैशाष । वैसाष द्वितीय । पख्य । कृष्ट' लय । सिद्धि । सिंध । जोग । योग । निच्चन । नक्षन्त्र । गुर । गुरु । सिसुं । घरी । जांति । गुरुं । दसम । दशम । यांन । अष्टमे यांन । शति । विनांन । दूअ । यांनं । सोम भौम । होम । बारमे । करण । करें । सैव । हैं । कोई । कोय । भंजे । मेवास । मैवास । सुपं । तं । होइ । नांम ।

१४८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व संक्षेप विरद उच्चार कीन । क्यौं सकौं जंपि मो बुद्धि छीन ॥ सुनि राइ दान संज्यौ अपार । है गै सु वस्त्र द्रव्या न पार ॥ छं० ॥ ७१२ ॥ सब सहर नारि श्रृंगार कीन । अप अप्प झुंड मिलि चलि नवीन ॥ थपि कनक थार भरि द्रव्य दूब । पट कूल जरफ जर कसी ऊब ॥ छं० ॥ ७१३ ॥ अछ्छित अनूप रोचन सुरंग । मृदु कमल हास लोइन कुरंग ॥ इक जात मद्धि इक फिरत गेह । पचिराइ परस पर बढत नेह ॥ छं० ॥ ७१४ ॥ दरबार भीर बरनी न जाइ । सुगंध वास नासा अघाइ ॥ बिगसंत बदन छत्तीस बंस । जदुनाथ जन्म जनु जदुन वंस ॥ छं० ॥ ७१५ ॥ रु० ॥ ३६३ ॥ हरें । स्तून । श्चत्र । दिलिय । दिल्लिय । मंडे । बूंदीवाली में=चालीस वर्ष तिन मांस साज । चालीस । पुहवि । हरे । भूम । संप । भूम । वर्णीय । वरनीय । अष्ट बल । लेइ । व्यांहि । हुंनग । ढुंग । थैपि । चाहि । विश्र्द्र । उचार । सकौ । जपि । मै। । सुंनि । राय । दांन । हय । गाय । द्रव्यान । च्चय्राम । श्रंगार । झंड । नवान । कुंल । कल । उब्ब । अक्षित । रौचन । लोइन । कुरंग । जाय । मधि । येह । नैह । जाय । सुगंध । नाशा । अघाय । विगसत । छत्रीस । यदुनाथ । यदुन । जैसे कवि चंद रूपक ३५५ और ३५६ में अपनी प्राचीन गूढ भाषा के गूढार्थ में पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् वर्णन कर आया है; वैसे ही यहां भी वह इन रूपक ३६२ और ३६३ में उन की जन्मपत्री तथा उस के ग्रहों का फलादेश वर्णन करता है । इन दोनों रूपकों के पाठ जहां तक हमारे पास की पुस्तकों से शुद्ध सके वहां तक हमने शोध दिये हैं; कि उन के इतने ही शुद्धने पर जो कई एक शंका अब तक लोग करते थे वह दूर हो गई । और जो इसी तरह और भी कुछ प्राचीन पुस्तकें मिल जावैं और उन से यह रूपक फिर शोध दिये जावैं तो आशा है कि इन रूपकों में लिखी ज्योतिष शास्त्र संबन्धी सब बात मिल जावैं और विद्वानों की जो २ शंका अब भी बाकी रहती हैं वह भी निवारण हो जांय । इस के अतिरिक्त हमारे पाठक यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस रासे जैसी भ्रष्ट लिखित प्राचीन पुस्तकों में अथवा वैसे ही कोई २ बड़े प्रतापी मनुष्यों की जन्मपत्री अथवा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस का कुछ अन्वेषण किया जावे ऐसा कुछ विषय हम को वर्त्तमान समय में कहीं लिखा हुआ प्राप्त होता है उस को यथायोग्य रीति से शोध लेना कैसा कठिन है । उस में भी फिर चंद की जैसी गूढार्थ की कठिनता और ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्तियों के मतान्तर पर दृष्टि दियी जावे तो प्रत्येक सज्जन मनुष्य सुख पूर्वक कह सकता है कि यह कार्य बहुत ही कठिन है और जो कदाचित् ऐसी कठिनता का कुछ पता लगा सकें तो हमारे स्वदेशी जगत विख्यात ज्योतिष शास्त्राचार्य पंडित वर श्री बापूदेवजी शास्त्री अथवा उन के शिष्य वर्ग में से भी कोई लगा सक्ते हैं; किन्तु अन्य के वश का यह कार्य नहीं है । इस जन्मपत्री को शोधने के लिये हमने बड़ा परिश्रम कर रक्खा है अर्थात् जितने पाठान्तर रासे की भिन्न २ पुस्तकों में से मिलते जाते हैं और जितनी भिन्न २ प्रकार की पृथ्वीराजजी की जन्मपत्रियें भरतखंड में से मिलती हैं वह भी एकत्र किये जाते हैं और ब्रह्मगुप्त का रचित ज्योतिष शास्त्र का पुस्तक भी प्राप्त करने का उद्योग कर रहे हैं, कि

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[ आदि पर्व ] | पृथ्वीराजरासो । | १४६ जिस का चंद का आश्रय करना उसकी शैली से अनुमान होता है। इस प्रकार से शोध होने पर हम इस जन्मपत्री के विषय में जिन विद्वान के गणित के अनुसार जो बात निश्चय होगी वह प्रकाश करेंगे। किन्तु अभी हम कुछ उन शंकाओं के विषय में भी कहते हैं कि जो इस विषय में महामहोपाध्याय कविराज श्री श्यामलदासजी ने कवि का सरल और स्पष्ट अर्थ न समझ कर केवल प्रतिदून-अनुमान-जन्यभ्रम के वश हो अपने खंडन-ग्रंथ में कियी हैं:- १ प्रथम कविराजजी ने पृथ्वीराजजी के जन्म संवत् के प्रकाश करने वाले रूपक ३५५ के साथ का रूपक ३५६ जैसे अपने खंडन-ग्रंथ में छोड़ दिया है वैसे ही यहां भी उन्होंने रूपक ३६२ को छोड़ कर केवल रूपक ३६३ के आधार पर जन्मपत्री के संबन्धित दोष दिये हैं। इन दोनों स्थलों को हमारे विद्वान पाठक विचार कर समझ सक्ते हैं कि रूपक ३५६ और ३६२ को छोड़ देना उचित था कि नहीं और उन का रूपक ३५५ और ३६३ के साथ पूर्ण संबन्ध है कि नहीं। यदि पूर्ण संबन्ध है तो निर्णय करने के समय उन का त्याग देना किसी वास्तविक पुरातत्ववेत्ता के लिये कैसा अनुचित कर्म है ॥ २ दूसरे जो कुछ दोष इस विषय में दिये गये हैं वह मालूम होते हैं कि किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही दिये गये हैं। किन्तु मैं आशा करता हूं कि डाक्टर हार्नली साहब कि जिनों ने अपने हाथ से रासे के कुछ भाग को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि देकर शोधा है वे भले प्रकार साक्षी दे सक्ते हैं कि इस ग्रंथ के पाठान्तर, अपपाठ, विशेष पाठ और न्यून पाठ आदिक की क्या दशा है और क्या किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही किसी बात का निर्णय होना उचित है ॥ ३ तीसरे यदि रूपक ३६२ न छोड़ दिया गया होता और पुरातत्ववेत्ताओं के निर्णय करने की रीति से ध्यान दिया गया होता तो कविराजजी अपनी कितनीक शंकाओं के समाधान स्वयम् इन रूपकों और भिन्न २ पाठान्तरों से जान सक्ते थे जैसे कि:- (क) रूपक ३६२ से पृथ्वीराजजी के जन्म की दूज तिथि ज्ञात होती है। यदि तिथि की संख्या का शब्द अशुद्ध भी हो तो भी हम कवि के कहे चित्रा नक्षत्र से स्पष्ट अनुमान कर सक्ते हैं कि या तो यह दूज कवि ने पड़वा उपरान्त की ग्रहण कियी है अथवा किसी और तिथी की संख्या वहां भ्रष्ट हो गई है। हम ज्योतिष शास्त्र तो नहीं जानते हैं किन्तु हम लोग पंचद्रावड़ ब्राह्मणों में अभी तक प्राचीन प्रणाली चली आती है कि यज्ञोपवीत होने पर सात वर्ष के बालक को भी पितादि वेदाङ्गों के कुक धुवे अर्थात् गुरु सिखाये कहते हैं उन के अनुसार हम यह कह सक्ते हैं कि हमारे आर्य मासों के नाम नक्षत्रों पर से पड़े हैं और प्रत्येक महिने का नक्षत्र शुदी १४ किंवा पूनम अथवा वदी प्रतिपदा के दिवस में होता है अतएव इस दूज के स्थान में कोई ऐसी ही तिथि थी कि जो भ्रष्ट हो गई है। देखो कविराजजी ने "वैसाख तृतीय पख कृष्ण लग्न" पाठ लिखा है उस के स्थान में हम को सं० १६४७ । १७९० और १८४५ की पुस्तकों में यह "वैसाख मास पष कृष्ण लग्न वा अग्न" पाठ लिखा मिलता है और वह एक प्रकार से ठीक भी दीखता है क्योंकि रूपक ३६२ में कवि तिथि कह आया है अतएव अब वह यहां शेष मास और पक्ष कहता है। चित्रा नक्षत्र के विषय में कुछ गोलमाल किसी पुस्तक में दृष्टि नहीं आती और वैशाख के विषय में कुछ गड़बड़ सी दीखती है अतएव जो कोई चित्रा से चैत्र मास का होना अनुमान करें तो हमारी सम्मति में तो वह कोई आश्चर्य दायक बात नहीं है ॥

१५० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व (ख) कविराजजी ने कवि के कहे "बारमै सूर सो करन रंग" पर ही विशेष दोष दिया है और उसका बारहवें घर में होना असंभव माना है तथा इतनी ही बात पर दोष देकर अन्य ग्रहों का कुछ शोध नहीं किया है। परंतु जो वे रूपक ३६२ के तीसरे चरण पर कुछ थोड़ी सी भी दृष्टि देते तो उनको मालूम हो जाता कि चंद कवि मेष का सूर्य होना स्वयम् कहता है कि जो संभव भी हैं "दुतिया गुरु मेषह तरनि" इस से यह भी समझ सक्ते थे कि जब मेष का सूर्य बारहवें घर में होना कवि कहता है तब वृष लग्न भी है और "ऊषा प्रकाश इक घरिय रात" से कवि का गूढार्थ भी यह है कि पृथ्वीराजजी का सूर्योदय के पश्चात् जन्म होने से ऊषा एक घड़ी थी अर्थात् ऊषा के एक घड़ी पीछे उनका जन्म हुआ ॥ (ग) कविराजजी के खंडन ग्रंथ में 'गुरू सिद्दु जोग चित्रा नखत्त' पाठ से सिद्दु योग ग्रहण किया है कि जो चित्रा नक्षत्र के साथ वा पास आना असंभव है परंतु थोड़ी सी भी सूक्ष्म दृष्टि देकर देखते अथवा पुस्तकान्तर में पाठ देखते तो कितनेक पुस्तकों में सिद्धि पाठ जैसे हम को मिल गया वैसे मिल जाता ॥ (घ) कविराजजी ने अपने खंडन ग्रंथ में बड़ी २ सूक्ष्म युक्तियों से सूक्ष्मतर अनुमान किये हैं परंतु एक इस स्थान पर वे बड़ी ही बेतरह चूक गये हैं। उन्हों ने 'गुरु नाम करन सिसु परम हित्त' का गुरु पाठ से धोखा खाकर यह अर्थ किया है कि 'गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा' किंतु यह अर्थ बिलकुल ही असत्य है। यद्यपि इस गुरु पाठ का पुस्तकान्तर में गर पाठ स्पष्ट मिलता है परंतु वह न भी मिले तथापि पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान इस छंद की प्रत्येक तुक की एक दूसरी से संगति मिला कर भले प्रकार जान सक्ते हैं कि कवि "तिथि वारं च नक्षत्रं योगं करण मेवच" के अनुसार यहां यह कहता है कि "गर नामक करण शिशु को परम हितकारी है" न कि यह कि-गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा-हमारे हे सज्जन पाठको! आप सोचो, विचारो, न्याय करो, और सत्य २ कहो कि यह महा अनर्थ करने वाली भूल है कि नहीं और जो हम इतना परिश्रम केवल स्वदेश वत्सलता से उत्थापित हो कर न करते तो हमारे देश की हिन्दी भाषा और ऐतिहासिक विद्याओं की कितनी हानि संभव थी। राजपूताने के कितनेक कवि लोग अपने को हिन्दी भाषा के काव्यों में ऐसा उत्कृष्ट समझते हैं कि मानो अन्यदेशीय उनके आगे कुछ माल ही नहीं है परंतु इस अवसर पर हमको मिस्टर जोन बीम्स साहब Mr. John Beames का यह कहना स्मरण आता है कि "The Pandits of Rajputana even do not understand Chand beyond the general drift of the poem." "राजपूताने के पंडित भी चंद के काव्य को उसके एक साधारण भावार्थ के सिवाय नहीं समझते हैं" ॥ (ङ) कविराजजी के लिखे पाठ में "पंच में थान परिसोम भोम" है और हम को पुस्तकान्तर में "पंच दुग्ग थान परि सोम भोम" पाठ मिला है। क्या इस से जन्म पत्री के ग्रहों में कुछ अंतर नहीं पड़ जाता है? और क्या जब तक कि अनेक प्राचीन पुस्तकों से इन रूपकों का पाठ मिलान कर के शुद्ध न किया जावे तब तक जन्मपत्री को अशुद्ध कह देना मानों सहसा सिद्धान्त कर लेना नहीं है? यदि कोई २ विद्यमान पुरातत्त्ववेत्ता अपने सहसा सिद्धान्त कर लेने को अच्छा समझ लेना अयोग्य नहीं समझेंगे और वे इस प्रचार को एक कलम बंद नहीं कर देंगे तो पुरातत्त्वविद्या को निःसीम हानि पहुंचनी संभव है। यहां कन्या का चंद्रमा और पृथ्वीराजजी का पृथ्विीराज नाम होने के कारण उनकी कन्या राशि का होना स्पष्ट है। और

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ। १५१ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म होने पर क्या २ आश्चर्यदायक बात हुई ॥ कवित्त ॥ भयौ जनम पृथिराज । ढुग्ग पर छरिय सिपर गुर ॥ भयौ भूमि भूचाल । धमकि धम धम्म अरिनि पुर ॥ गठन कोट सें लोट । नीर सरितन बहु वढ्ढिय ॥ भै चक भय भूमिया । चमक चक्रित चित चट्टिय ॥ घुरसान थान पन्न भल परिय । ग्रभ पात भय ग्रभनिय ॥ बेताल बीर विकसे मनह । हुंकारत पच्छ देवनिय ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ रु० ॥ ३६४ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी की बाल अवस्था के चरित्रों का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वरष वधै विय बाल । पिथ्य वढ्दै इक मासह ॥ घरी दीघ पल पध्य । मास लखिय त्रप तासद्द ॥ मनिगन कंठला कंठ । महि केहरि नष सोहत ॥ घूघर वारे चिहुर । रुचिर वानी मन मोहत ॥ ज्योतिष शास्त्र के एक अचल धुवे के अनुसार यह अनुमान कर लेने का काम भी चंद ने हमारे ऊपर ही छोड़ दिया है कि कन्या के चंद्रमा के साथ केतु भी है क्योंकि राहु और केतु सदा परस्पर सात में स्थान में रहते हैं ॥ ३६४ पाठान्तर:-जन्म । प्रिथीराज । पृथीराज । प्रथ्यिराज । दुग । डुंग । भूबाल । धंम । कोट । सै । लोट । वहि । वढिय । भैचक्क भय भूमियान । भय चक्रित भूमिया । चमकि । चढिय । घुरसांन । धांन । परीय । यभ । यभ । वैताल । विकसैं । नयन । हुंकारन । दैवनीय ॥ इस रूपक में जो कुछ आश्चर्यदायक बातों के भाव कवि ने कहे हैं वह कोई वास्तविक आश्चर्य नहीं है किन्तु कवि लोग बड़े २ प्रतापी पुरुषों के जन्मादि के वर्णन में अद्भुत रस का प्राश्रय करके प्रायः ऐसा प्रसंग बांधा करते हैं । देखो जैसे यहां "धमकि धम धम्म अरिन पुर" अथवा 'घुरसान थान पल भल परिय" कवि ने कहा है । वैसे ही तबकात नासरी नामक फारसी तवारीख़ में देखो कि महमूद गज़नी जिस रात्रि को उत्पन्न हुआ था उसी समय सिन्धु नदी के किनारे के एक मंदिर का फट जाना उस में लिखा है । उस से केवल इतना ही समझ लेना चाहिये कि महमूद मंदिरों को भ्रष्ट करने और मूर्तियों को तोड़ फोड़ डालने वाला हुआ है अतएव कवि ने उस के जन्म समय भी वैसा ही उस के प्रताप का एक चिन्ह वर्णन किया है । इस रूपक में बीर और अद्भुत रस मिले हुए हैं अंतएव आतेप करने वाले अथवा किसी कोमल हृदय वाले मनुष्य के कान उस के पढ़ते ही खड़े हो जाते हैं, अर्थात्, रस अपना प्रभाव उस को प्रत्यक्ष दिखा देता है ॥ ३६५ पाठान्तर :- बघे । पिथ । बाधे । पल पलघ । पष्य । पष । लष्यीय । लषीय । घष । मनिगनि । कंठला । मधि । केहरि । सौहत । वाले कैंस । वारे केस । केसरि । सुमंडि । सुंमं । दरसन । ज्योति । ज्योति । जरत । रक । किन । हुलसि । परत ॥

· १५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व केसर सु संडि सुभ भाल छवि । दसन जोति हीरा हरत ॥ नहं तखप दुक्क थह छिन रहत । हुलसि हुलसि उठि उठि गिरत ॥ छं० ॥ ७१७ ॥ रू० ॥ ३६५ ॥ दूहा ॥ रज रंजित अंजित नयन । घुंठन डोलत भूसि ॥ लेत बलैया मात ऋषि । भरि कपोल मुख चूंमि ॥ छं० ॥ ७१८ ॥ रू० ॥ ३६६ ॥ पद्धरी ॥ अंगुरिन लग्गि रगि चलत बाल । सर मड्डि उठत गज हंस चाल ॥ मिलि बाल जाल फबि रची केलि । बढि रही दुंद जनु बीज बेलि ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ जनु रमत कमल दल अमल अंग । तप तेज बढ्ढि मुख पिच नग्ग ॥ सब देव तेज देखंत चंग । उद्धार अंग अदभुत प्रसंग ॥ छं० ॥ ७२० ॥ सँग बाल बैठि भोजन करंत । परिवार वस्तु लै हठ धरंत ॥ आदर अदब्ब सघ्धीन देत । बगसीस करत चिय परम हेत ॥ छं० ॥ ७२१ ॥ है हत्थि चढत बढ़त अनंद । मन मौज वैज कवि पढत छंद ॥ जिन हृदय कमल विद्याल चेत । छल छेद भेद तिन बुद्धि लेत ॥ छं० ॥ ७२२ ॥ पाइक्क संग कायक्क केलि । धरि धूप ध्वथं बाहंत खोलि ॥ गचि बग्ग हत्थ फेरत तुरंत । नट नृत्य निपुन धावत कुरंग ॥ छं० ॥ ७२३ ॥ जल केलि करत मिलि सजन संग । अल्लोल कलभ जनु सरति रंग ॥ पकवांन पांन सुगंध पूर । सादक्क सु सोद सुख सुखन जूर ॥ छं० ॥ ७२४ ॥ खेलत अखेट संग श्वानडोर । बग्गुर बधंत खर गोस कोर ॥ सुख घरिय पहर दिन पष मास । सोमेस सूर चित बढत आस ॥ छं० ॥ ७२५ ॥ जिम राम कृष्ण सुष नंद गेह । संभरिय राय तिम दसा देह ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ रू० ॥ ३६७ ॥ ३६६ पाठान्तरः-अजांत । घूठन । डौलत । वलइया । मुंख चूंम ॥ ३६७ पाठान्तरः-लाँगि । लगि लगि । लोल । कैलि । अग । तैनि । बढि । पचिगं । पन्त्रि नग । तैज । द्वेषत । उद्दार । अद्भूत । सुरंग । संग । बैठ । करत । वस्तू । वस्त । हठि । अद्वब । सधीन । दीय । हथि । वढत । मोज । वोज । रिदे । सुहेत । विद्यां सु । छल । वेदि । भैदि । छेदिं । बुधि । पाइक । झाइक । कैलि । घोप । धौप । हथ । बाहंत । वग । हथ । नृत्य निपुन्य । तुरंग । फैलि । अलोल । सरणि । सुगंघ । पुर । षैलतं । आखेट । संगि । स्वांन । डोरि । बगुरि ।