राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग २५१ राज्ञा प्रवर्तिते तेन पुनन्नीलोदिते विधौ । भिक्षवो हिमदोषाश्च सर्वतः प्रशमं ययुः ॥ १८६ ॥ १८६. राजा द्वारा नीलोक्त विधि को पुनः प्रवर्तित करने पर भिक्षु तथा हिम दोष सर्वतः शान्त हो गये । काले काले प्रजापुण्यैः संभवन्ति महीभुजः । यैर्मण्डलस्य क्रियते दूरोत्सन्नस्य योजनम् । १८७ ॥ १८७. प्रजा के पुण्य के कारण समय-समय पर ऐसे नृपों का जन्म सम्भव१ होता है जो अत्यन्त छिन्न-भिन्न हुए राज्य का योजन (पुनर्संघटन) करते हैं ।
मालूम होता है । बौद्धों के विरुद्ध हुए आन्दो- लन तथा पुरातन धर्म के पुनःस्थापन निमित्त गोनन्द ने विशेष प्रयास किया होगा । अतएव या तो अभिमन्यु ने गोनन्द को स्वयं अपना उत्तराधिकारी बनाया होगा । अथवा सन्तान हीन उसके मरने पर प्रजा ने गोनन्द को राजा निर्वाचित कर लिया होगा । (३) नाग यात्रा नाग यज्ञ : नील मत पुराण द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८६ मे 'हिमदोषाश्च' का 'हिम- दोषाञ्च' तथा 'हि सदोषाश्च' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १८६ (१) दोष शान्ति : कल्हण ने प्राकृतिक प्रकोप किस प्रकार रोका गया था तथा रोका जा सकता है । उसका वहाँ उल्लेख किया है । तपस्या, पूजा, पाठ, यज्ञादि एवं नीलमत विहित संस्कारों तथा कर्मों के कारण बौद्ध तथा हिमपात दोनों का समय हो गया । १८७ (१) सम्भव : यहाँ गीता की ओर लक्ष्य कल्हण करता है । धर्म की जब जब हानि होती है तो भगवान् का अवतार सम्भव होता है उसी प्रकार प्रजा यदि पुण्य कार्य करती है तो राज्य को समृद्धिशाली, सुगठित बनाने के लिये सुयोग्य नृपो का जन्म सम्भव होता है । गीता के धार्मिक सिद्धान्त 'सम्भवामि युगे-युगे' को कल्हण ने राजनीति क्षेत्र में 'संभवन्ति महीभुज ' कह कर दोनो की समा- नता की है । वह प्रजा को पुण्य कर्मी होने के लिये संकेत करता है । प्रजा के पुण्य के कारण उत्तम राजाओ का आविर्भाव सम्भव होता है । प्रजा के पाप के कारण क्रूरकर्मा राजा उत्पन्न होते हैं । कल्हण ने कर्म सिद्धान्त को राजनीति में लागू किया है । 'मैन एण्ड टेक्नीक' में थी स्पेंग्लर ने इस कर्म सिद्धान्त को घोर लक्ष्य किया है । उसमें प्राचीन भारतीय कर्म सिद्धान्त की झलक मिलती है । वह कहता है । यह हमारी शक्ति में नहीं है कि हम यह चुनें कि हम तीन सहस्र वर्ष पूर्व किसी मिस्री कृषक, किसी ईरानी राजा, अथवा आधुनिक जगत् के अवारो की सन्तान बनें । यह भाग्य कुछ इस प्रकार का है कि हमे स्वीकार करना पड़ेगा । यह हमे किस परिस्थिति, विचार एवं कार्य की ओर प्रवृत्त करता है । जिसके विषय में दार्शनिक बातें करते हैं । किन्तु केवल समय के आदमी होते हैं, स्थान के आदमी होते हैं जाति के आदमी होते हैं, व्यक्तिगत वर्गों के आदमी होते हैं जो समरागण में एक निर्दय द्वित्व में सन्तोष करते हैं और जीतते या हारते हैं जब कि उनके चारो तरफ विश्व शनैः शनैः गतिशील ईश्वर के निर्लिप्त भाव तुल्य रहता है । यह संघर्ष जीवन है निःसन्देह जीवन नीत्से के भाव में एक निर्दय- दयाहीन है जिसमे इच्छा द्वारा शक्ति प्राप्ति के संघर्ष का कोई स्थान नहीं है ।
२५४ राजतरंगिणी ये प्रजापीडनपग्ने विनश्यन्ति सान्वयाः । नष्टं तु ये योजयेयुस्तेषां वंशानुगाः श्रियः॥ १८८ ॥ १८८. जो प्रजापीड़क राजा होते हैं वे कुलसहित नष्ट हो जाते हैं और जो नष्ट गत को सुव्यवस्थित करते हैं, उनके वंश का अनुगामिनी श्री होती है। इत्येतत्प्रतिवृत्तान्तं देशेऽस्मिन्वीक्ष्य लक्षणम् । भाविनां भूमिपालानां प्राज्ञैर्ज्ञेयं शुभाशुभम् ॥ १८६ ॥ १८९। विज्ञ जन राजाओं न इन प्रतिवृत्तान्तों को देखकर भावी भूपालों के शुभाशुभ कर्म को समझ लेते हैं। नवीकृतवतो देश तस्य वंश्यैरियं मही। सिद्धैः प्रवरसेनार्थेद्धिरं भुक्ता सुकर्मभिः ॥ १८० ॥ १८०. देश को नवीकृत करने वाले उस राजा (गोनन्द) के वंशज, प्रवरसेन आदि सिद्ध थे तथा अपने सुकर्मों द्वारा पृथिवी का चिरकाल तक भोग किये। कल्हण इसी ओर संकेत करता है। हम चाहते उनके द्वारा उसके यश, कुल तथा राज्य की भी- कुछ हैं। होता कुछ है। यह क्या होता है ? इसे वृद्धि होती है। अन्यथा सब कुछ नष्ट हो जाता है। कर्म का फल कहा जाता है। कल्हण जनता को व्यास ने १८ पुराणों को लिखने के पश्चात् अपना सचेत करता है। यदि यह पुण्यशाला होगी तो अच्छा निष्कर्ष निकाला है। आदर्श नृपों का राज्यसूत्र परिपालन सम्भव है अष्टादश पुराणेषु ... सारमुक्तम् । अन्यथा क्रूर होने पर पापी क्रिया दूषित होने पर परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ उसे उसके कर्मानुसार उसी प्रकार के अवांछित राजाओं की प्राप्ति होगी। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १८८ में 'विनश्यन्ति सान्वयाः' श्लोक संख्या १८९ में 'देशे' का 'दैवे' तथा का पाठभेद 'नश्येयुः सहानुया' मिलता है। 'दैवी' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : १८८ (१) श्री : कल्हण ने सूत्रवत् यहाँ १८९ (१) शुभाशुभ कर्म : कल्हण राजा के राजाओं के भाग्य तथा उनके भविष्य की तरफ जीवन चरित्र तथा उनके शुभाशुभ कर्मों पर लक्ष्य कर इस श्लोक से चेतावनी दी है। पाप पूरा प्रकाश डालता उन्हें चेतावनी देता है। पूर्व- का परिणाम सर्वनाश है। पुण्य का परिणाम श्री वर्ती राजाओं का इतिहास एवं वृत्तान्त उनके कर्मों की प्राप्ति करना है। राजा को पुण्याश्रयी होना पर आधारित रहता है। राज्य के घटना चक्र कर्मों चाहिए। राज्य को सुव्यवस्थित करना, जनता का के कारण घटित होते हैं। यह घटना चक्र उनका सन्तानवत् पालन करना, जनता के सुख-दुख को यह प्रतिवृत्तान्त भविष्य के भूपालों के लिए उदाहरण अपना सुख-दुःख समझना, उनके निमित्त बड़ा से है। उनका भविष्य किसी अलौकिक शक्ति द्वारा बड़ा त्याग करना यह राजा का पुण्य कार्य है। परिचालित नहीं होगा। अपितु वह नियन्त्रित होगा। जीवन में मोड़ लेगा उनके कर्मों के द्वारा। वही उनके भविष्य के शुभ तथा अशुभ का निर्णय
प्रथम तरंग २५५ गोनन्दान्वयिनामाद्यः स रघूणां रघुर्यथा । नृपतिः काश्यपीं वर्षान्पञ्चत्रिंशतिमन्वशात् ॥ १६१ ॥ १६१. यह राजा जो गोनन्द वंश में प्रथम राजा रघुवंशियों¹ में रघु तुल्य हुआ था । इस काश्यपी² का पैंतीस वर्ष³ तक शासन किया । वर्षषष्टिं सषण्मासैः षड्भिर्वर्षैर्विवर्जिताम् । विभीषणाभिधोऽरक्षत्क्षितिं गोनन्दनन्दनः ॥ १९२ ॥ १९२. तत्पश्चात् गोनन्द नन्दन विभीषण नामक राजा ने तत्पश्चात् साठ वर्ष में ६ वर्ष ६ माह कम अर्थात् तिरपन वर्ष छह मास क्षिति की रक्षा की ।
करते हैं । यही उनके भाग्य का निर्णय करेगा । विद्वान् इनसे शिक्षा लेकर राजाओं को चेतावनी देते रहे, जनता तथा राजा का मार्ग दर्शन करते रहे यही अभिप्राय यहाँ कल्हण का है । पाठभेद : श्लोक संख्या १९० में 'वन्द्यं' का 'वंशं' तथा 'सुकर्म' का पाठभेद 'स्वकर्म' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९० (१) नवीकृत : कल्हण का तात्पर्य यहाँ सुधारने से है। गोनन्द वंशीय राजाओं ने कश्मीर में सुधार किया था । शासन तथा शान्ति स्थापित की थी । आध्यात्मिक विचारधारा, प्राचीन नील- मत द्वारा विहित धर्म तथा संस्कारों की ओर मोड़कर उनका देश में प्रचार किया था । हिमपात तथा बौद्धो दोनों के प्रबल दोषों से कश्मीर मंडल का उद्धार किया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १६१ में 'गोनन्दा' का 'गोनर्दा' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९१ (१) रघुवंश : रघु इक्ष्वाकु वंश में एक अतिश्रेष्ठ राजा हुए हैं । यह भगवान् राम के पूर्व पुरुष थे । राम का एक नाम रघुनाथ इसी रघु के कारण पड़ा है । महाभारत में वर्णित प्राचीन राजाओं की नामावली में रघु का नाम लिया गया है । (म० आ० १ : १७२) भागवत, विष्णु एवं वायु पुराणों के अनुसार रघु राजा दीर्घबाहु का पुत्र था । राजा दिलीप खट्वांग के पौत्र थे । किन्तु मत्स्य तथा पद्म पुराणों में रघु को निघ्न राजा का पुत्र कहा गया है । (पद्म० सृ० . ८) कालिदास ने रघुवंश में रघु को राजा दिलीप का पुत्र कहा है । नन्दिनी धेनु के प्रसाद स्वरूप रघु पुत्र राजा दिलीप को प्राप्त हुआ था । इक्ष्वाकु वंश में सर्व श्रेष्ठ होने के कारण हरिवंश पुराण (१ : १५) ने इसे अयोध्या का प्रथम राजा माना है । इस कालान्तर में इक्ष्वाकु वंश रघुवंश नाम से विख्यात हुआ है । रघुवंश (५) तथा स्कन्द (२ : ८२) पुराण में रघु के दान एवं गौरव का वर्णन किया गया है । रघु को अपने पूर्वज युवनाश्व राजा द्वारा दिव्य खड्ग प्राप्त हुआ था । इस खड्ग को उसने अपने वंशज हरिश्चाश्व को दे दिया था । रघु के पुत्र अज थे । अज के पुत्र दशरथ थे । दशरथ के पुत्र भगवान् रामचन्द्र थे । कल्हण ने रघुवंश में जैसे रघु श्रेष्ठ थे । उनके नाम पर वंश चला था । उसी प्रकार गोनन्द वंश में यह गोनन्द राजा सर्व श्रेष्ठ हुआ था । उसी के नाम पर इस वंश की ख्याति गोनन्द वंश से हुई । यहाँ कल्हण रघु वंश की गोनन्द वंश तथा रघु की गोनन्द से तुलना करता है।
२५६ राजतरंगिणी इन्द्रजिद्रावणावास्तां पितापुत्रौ नृपौ क्रमात् । पञ्चत्रिंशत्सहाद्धैश्च वर्षांस्त्रिंशद्ययोर्ययुः ॥ १५३ ॥ १५३. पिता तथा पुत्र इन्द्रजीत१ तथा रावण२ राजाओं ने क्रमशः ३५ वर्ष ६ मास तथा तीस वर्ष राज्य किये। बिन्दुरेखाच्छविर्यस्य दृष्टा भाव्यर्थशंमिनी । स रावणस्य पूजार्थं लिङ्गं भाति वटेश्वरः ॥ १५४ ॥ १५४. वटेश्वर नामक लिंग की रावण पूजा निमित्त उपयोग करता था। वह लिंग आज भी चमकता है। लिंग के चमकते बिन्दु एवं रेखाएँ भविष्य की सूचना देती हैं। ( ) काश्यपी : कल्हण कश्मीर को यहाँ काश्यपी अर्थात् कश्यप के देश के नाम से सम्बोधित करता है । (३) काल उल्लेख : कल्हण गोनन्द तृतीय के समय से क्रमबद्ध संवत् तथा राज्यकाल अपने इतिहास राजतरंगिणी में देना आरम्भ करता है। वह राजाओ का विधिवत् नाम देता है। उसने कश्मीर मण्डल की क्रमानुसार वंशावली तथा राज्य का वर्णन किया है। जीत नाम तथा उसका राज्यकाल ३५ वर्ष ६ मास दिया है । हसन के अनुसार राजा इन्द्रजीत क० १९५१ में बाप की जगह तख्त नशीन होकर कश्मीर और हिन्दुस्तान के आसपास के इलाकों पर काबिज हुआ। बाप की सल्तनत को अदल व इन्साफ से आबाद किया । ३५ वरस और ६ माह हकूमत की सतरंज खेलकर जिन्दगी का बिस्तरा लपेट लिया । पृष्ठ ४५. पाठभेद : श्लोक संख्या १९२ में 'गोनन्द' का 'गोनर्द' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९२ (१) आइने अकबरी में नाम विशन तथा राज्यकाल ५३ वर्ष दिया गया है । विभीषण का राज्यकाल लौकिक वर्ष १९२६ होना चाहिए । कल्हण ने राज्याभिषेक का कोई संवत् तथा काल नहीं दिया है । हसन के अनुसार—राजा बवीशान क ० १८९७ संवत् में बाप का जानशीन ताजशाही सर पर रखा और रियाया की आसाइश और खुशहाली में तिरपन साल बसर करके इस जहान से रुखसत हुआ। पृष्ठ ४५। १९३ (१) इन्द्रजीत : आइने अकबरी ने इन्दर- (२) रावण : आइने अकबरी ने रावेन नाम तथा उसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया है । गणना से लौकिक वर्ष २०१७ आता है । हसन के अनुसार राजा रावन बाप के मरने के बाद क० १९८६ में ताजशाही सर पर रख कर हिन्दुस्तान की सरज़मीन के बहुत से शहर फतह किये । तीस साल तक हुक्मरा था। पूजा-पाठ के लिये बटेश्वर का मन्दिर तामीर किया । मुमग्रफ गुलतस्तए काश्मीर ने उसे बादशाह का मन्दिर ख्याल किया है । हालांकि यह बिल्कुल गलत है । मतरजुम रत्नाकर ने बड़शाह के मन्दिर का नाम सोकथी बताया है । पृष्ठ ४५. पाठभेद : श्लोकसंख्या १५४ में 'पूजार्थं' का पाठभेद 'पूजार्ह' मिलता है ।
प्रथम तरंग २५७ चतुःशालामठस्यान्तः कृतायाऽदायि भूभुजा । वटेश्वराय निखिलं तेन कश्मीरमण्डलम् ॥ १९५ ॥ १९५. चतुःशाला मठ¹ में स्थापित वटेश्वर पर उस राजा ने निखिल कश्मीर मण्डल चढ़ा दिया था। पञ्चत्रिंशतमब्दानां क्ष्मां बुभोज महाभुजः । रावणक्षोणिभृत्सूनुः सार्धामन्यो विभीषणः ॥ १९६ ॥ १९६. रावण का पुत्र महाभुज विभीषण¹ राजा हुआ । उसने पैंतीस वर्ष छह मास पृथ्वी का राज्य किया । किंनरापरनामाऽथ किंनरैर्गीतविक्रमः । विभीषणस्य पुत्रोऽभून्नरनामा नराधिपः ॥ १९७ ॥ १९७. जिस नर¹ किंवा किन्नर राजा का विक्रम गीत किन्नर² गाते हैं। वह अपने पिता विभीषण के पश्चात् नराधिप हुआ । पाठभेद : श्लोकसंख्या १९५ में 'शाला' का 'शाल' तथा 'कश्मीर' का पाठभेद 'काश्मीर' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९५ (१) वटेश्वर तथा चतुःशाला मठ : इस अद्भुत वटेश्वर लिंग का पुनः राजतरंगिणी में कहीं उल्लेख नहीं करता । उनका स्थान किस दिशा अथवा स्थान में था । कल्हण के समय तक दोनों का अस्तित्व था । वे इतने प्रसिद्ध थे कि कल्हण ने उनके स्थानादि का वर्णन करना साधारण बात समझकर नहीं किया । आगरा से ३० मील दक्षिण-पूर्व यमुना के दक्षिण तट पर वटेश्वर है । आज भी बैलों का मेला लगता है । यह प्राचीन नगर है। यहाँ प्राचीन खण्डहर तथा ध्वंसावशेष हैं। यह वटेश्वर महादेव का स्थान है । तीर्थ है । इसी के आधार पर या मौलिक रूप से वटेश्वर के मन्दिर में वटेश्वर महादेव की स्थापना निमित्त निर्माण कराया गया होगा । काश्मीर मण्डल को राजाओं ने कई बार भगव-दर्पण किया है। कनिष्क ने समस्त कश्मीर धर्म हेतु अर्पित कर दिया था । मेवाड़ के राजा भी अपना राज्य एकलिंग का मानते थे । भारतीय स्वतन्त्रता ३३ के पूर्व स्वयं अपने को भगवान् का सेवक समझ राज्य की व्यवस्था करते थे । पाठभेद : श्लोकसंख्या १९६ में 'क्षोणि' का 'क्षोणि', 'क्षोणि' तथा 'सार्धा' का 'सार्धं' 'साधा' 'सार्ध्व' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९६ (१) विभीषण : आइने अकबरी ने नोयोबुन नाम तथा उसका राज्यकाल ३५ वर्ष ६ मास दिया है । गणन से राज्यारोहण का लौकिक वर्ष २०४८ आता है । वैबुद्दीन यहाँ एक दूसरे राजा इन्द्रायन को रखता है। उसे कैलाश सिंह का पुत्र बताता है । हसन कहता है- राजा वबोशन दोम रावन का बेटा था । क० २०१६ में तख्त शाही पर बैठा । चूंकि इल्म मौशीकी बखूबी सीखा था इसलिए हमेशा साजो सरोद और गाने बजाने में अपने औकात बसर करता था। तबियत मौजू पाई थी । इसलिए लोग इसे बहुत बड़ा शायर भी मानते हैं। ३६ वर्ष हकूमत में गुजारा । पृष्ठ ४५
२५८ राजतरंगिणी सदाचारोऽपि स नृपः प्रजाभाग्यविपर्ययैः । व्यधाद्विषयदोषेण महानर्थपरंपराम् ॥ १६८ ॥ १६८. यद्यपि वह राजा सदाचारी था । परन्तु प्रजा के भाग्य¹ विपर्यय के कारण विषय दोष की बाधा लग गयी और महा अनर्थ करने लगा ।
१९७ (१) नर : आइने अकबरी ने नाम नरां दिया है। यह भी लिखा है कि उसे खर भी कहते हैं। राज्यकाल ३६ वर्ष ९ मास दिया है। अबुल फजल ने लिखा है कि इस राजा की मदद से ब्राह्मणों के अनुयायियो ने बौद्धों के विहारों को जला दिया । अन्य मुस्लिम लेखकों ने उसे नूज लिखा है। उनकी गणना से लौकिक वर्ष २०८३३ आता है। हसन लिखता है—'राजा नर क० २०५२ में बाप के कायम मुकाम होकर ताजशाही सर पर रखा । इन्साफ पसन्द और सखी था लेकिन अपनी रानी के साथ सख्त उलफत रखता था । रात-दिन उसी के पास बैठने में अपने औकात बसर करता। इसलिए रियाया की देख-भाल की उसे फुरसत नहीं थी । कैफियत—'मज़हब जैन का एक बड़ा आबिद व ज़ाहिद इन्सान मुकाम कागर में रहा करता था । जोग माया के जोर से उसने एक ऐसा तिलस्म और जादू किया हुआ था कि वह तो सबको देख सकता लेकिन उसे कोई न देख सकता । इस जादू के जोर से वह लोगों के घर में दाखिल हो जाता और उनकी औरतों और लड़कियों से ज़नाह किया करता । यहाँ तक कि राजा की रानी से मदारखलत करने लगा । राजा को जब इस बात का पता लगा तो उसके तनबदन में आग लग गयी। इस बिना पर उसने बौद्धों के सारे इबादतखानो और मन्दिरो के इन- हदाम का हुक्म दे दिया और उन में आग लगवा दी। उनका तमाम माल, दौलत, जागीर और गांव और मकानात बरहमनो को बख्श दिये । दरयाए झेलम के किनारे मुकाम चवदर मुत्तसिल बैजवारह एक शहर बनवाया और वहाँ अपने लिए एक आलीशान महल निहायत पुरूनगी और शानवाला तामीर कराया ।
कैफियत—'मोरखीन लिखते हैं कि इसके हकूमत में विशाक नाम का एक बरहमन था । शेशरम नाग की लड़की को अपने निकाह में लाये हुए था। राजा नर उस पर फेमफता हो गया । अपने साथ सुलाने और सुहबत करने के लिए राजा मजकूर ने बरहमन मजकूर पर जबर तशद्दुद किया । यह बात सुनकर शेशरम नाग गुस्सा मे भर गया और राजा के बनाए हुए शहर पर आग बरसाना शुरू कर दी। शहर और शहर वालों को थोड़ी ही देर में तबाह व बरबाद कर डाला। इसके बाद शेशरम नाग की बहन रमती ने गुस्सा से भरपूर हो कर बीस कोस तक शहर मजकूर पर पत्थरों की बारिश की जिसके वायस यह शहर ही दुनिया से मादोम हो गया । इसका मुफसल किस्सा शेशरम नाग के जिक्र में मजकूर है। राजा नर की मुद्दत हकूमत उनतालीस साल और नव महीना थी । पृष्ठ ४६ (२) किन्नर : दश देवयोनियों में एक योनि है। शरीर मनुष्य तथा मुख अश्व तुल्य होता है "स्यात्किं- नरः किम्पुरुषस्तुरंगवदनो मयुः ।" (१:२७) वैदिक साहित्य में मुझे किन्नर जाति का वर्णन किंवा उल्लेख नहीं मिला । सम्भव है यहाँ अश्व तुल्य का अर्थ मुख लम्बा समझा गया है। वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणों मे किन्नरों का उल्लेख आता है । यथा : गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खगान् ॥ हिमालय पर्वतीय सीमावर्तीथ जाति का उल्लेख न होना विज्ञ पाठकों को चकित करेगा । इस पर गवेषणा की आवश्यकता है । १९८ (१) भाग्य विपर्यय : कल्हण यहाँ पर पुनः दुष्ट राजा होने अथवा राजा के दुष्ट हो जाने का दोष प्रजा पर मढ़ा है। प्रजा के भाग्य के कारण
प्रथम तरंग २५९ विहारे निवसन्नेकः किन्नरग्रामवर्तिनि । तस्य योगबलात्कोऽपि श्रमणोऽपाहरत्प्रियाम् ॥ १९९ ॥ १९९. किन्नरग्राम¹ स्थित एक 'विहार में रहने वाले श्रमण² ने योग बल द्वारा उसकी प्रिया का हरण कर लिया। विहाराणां सहस्राणि तत्कोपान्निर्ददाह सः । अजिग्रहच्च तद्ग्रामान्द्विजैर्मध्यमठाश्रयैः ॥ २०० ॥ २००. इस कारण कुपित होकर राजा ने सहस्रों विहारों¹ को जलवा दिया और उन विहारों पर चढ़े ग्रामों को मध्यमठ² निवासी ब्राह्मणों को दे दिया। ऋद्धापणं राजपथैर्नौयानोज्ज्वलनिम्नगम् । स्फीतपुष्पफलोद्यानं स्वर्गस्येवाभिधान्तरम् ॥ २०१ ॥ दिग्जयोपार्जितैर्वित्तैर्जितवित्तेशपत्तनम् । वितस्तापुलिने तेन नगरं निरमीयत ॥ २०२ ॥ २०१-२०२. दिग्विजय द्वारा उपार्जित धन से वितस्ता पुलिन में राजा ने एक नगर¹ निर्माण कराया था। वहाँ आने वाले राजपथों द्वारा बाजार सामानों से लदा था। नौकाओं के आवागमन से नदी की गरिमा बढ़ गयी थी। प्रभूत पुष्प एवं फलोद्यानों से पूर्ण नगर दूसरे स्वर्ग सदृश लगता था। वह नगर कुबेर की भी पुरी को मात करने वाला था। प्रजा को बुरे राजा की प्राप्ति होती है। यहाँ पर लोकतान्त्रिक सिद्धान्त की गौण रूप से पुष्टि की गयी है। प्रजा को जागरूक होना चाहिए। वह उसका भी कर्तव्य है कि सच्चरित्र राजा को दुश्चरित्र होने से बचाये। कल्हण ने यहाँ पर यह भी संकेत किया है कि सच्चरित्र राजा भी विषय दोष में लिप्त हो सकता है। यदि मन्त्रिगण, प्रजागण राजा को निरंकुश कर देते हैं तो निश्चय ही दोषों की ओर प्रवाहित हो जाता है। राजा चाटुकार, स्वार्थी, कुटिल पार्षदों से भी घिरा रहता है। वे अपने स्वार्थ सिद्धि किंवा राजा को प्रसन्न करने के लिए सन्मार्ग से कुमार्ग में बदल देते हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या १९९ में 'विहारे' का 'विकारे', 'विकारो', पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १९९ (१) किन्नर ग्राम : कश्मीर के मागिम परगना में कानिर ग्राम हो सकता है। एक किन्नौर क्षेत्र है जो किन्नर जाति का मूल स्थान माना जाता है। हिमाचल प्रदेश में है। मैं यहाँ गया हूँ। यहाँ के लोगों का मुख सुन्दर होता है। आकृति आर्यों तुल्य है। कहीं-कहीं पर्वतीय तथा मंगोल मिश्रण मालूम होता है। सम्भव है। पूर्व काल में इस स्थान पर लद्दाखी ढंग के आदमी अधिक रहते रहे हों। जिनका मुख लम्बा होता है। मैं लद्दाख में गया। वहाँ के लोगों की मुखाकृति देखकर पहली प्रतिक्रिया मेरी यही हुई कि वे आर्यवंशीय नहीं हैं। उनका मुख गोल होने की अपेक्षा लम्बा तथा चपटा अधिक होता है,। यहाँ अश्व की तरह मुख यदि शाब्दिक अर्थ में मान लिया जाय तो उन्हें हयग्रीव मनुष्य कहना होगा जो गलत होगा। (२) श्रमण : बौद्ध भिक्षु । पाठभेद : श्लोक संख्या २०० में 'अजिग्रहच्च' का पाठ भेद 'अजिग्रहश्च' मिलता है।
२६० राजतरंगिणी तत्रैकस्मिन्किलोद्याने स्वच्छस्वादुजलाश्रितम् । आसीत्सुश्रवसो नाम्नो नागस्य वसतिः सरः ॥ २०३ ॥ २०३. वहाँ किसी एक उद्यान में स्वच्छ सुस्वादु जल मय सरोवर था । वहाँ सुश्रवा¹ नामक नाग निवास करता था । पादटिप्पणियाँ :
२०० (१) विहारदाह : कश्मीर में यह एक और उदाहरण मिलता है । जब राजा ने कुपित होकर धार्मिक स्थानों में आग लगवा दी थी । कश्मीर के अनेक राजाओं ने भविष्य में धार्मिक स्थानों को नष्ट करने का प्रयास किया है । राजा विषय वासना में लिप्त हो गया था । उसका प्रभाव अन्त:पुर में पड़ना अवश्यम्भावी था । राजा के कारण नैतिक पतन हो रहा था । इसका यह एक ज्वलन्त उदाहरण है कि एक श्रमण का यह साहस हुआ कि वह राजा की प्रिया को उठा ले गया । (२) मध्यमठ : इस स्थान का निश्चय नहीं किया जा सकता कि कहाँ था । कल्हण इस स्थान के विषय में कुछ संकेत भी नहीं करता । श्लोक संख्या २०१ तथा २०२ युग्म हैं । दोनों का अर्थ एक साथ किया गया है । २०१-२०२ (१) नगर किन्नर किंवा नर- पुर : राजा नर के पत्तन अर्थात् नगर का दो नाम दिया गया है । (रा० त० १ : २७४) उसे किन्नरपुर तथा (रा० त० १ . २४४) नरपुर कहा गया है । कल्हण ने चक्रधर का वर्णन (रा० त० १ : २६१, २७०, ८ . ९६१) करते हुए इस नगर का स्थान विजयेश्वर अथवा विजन्नोर के अत्यन्त समीप रखा है । यही बात स्थानीय जनश्रुति से भी प्रकट होती है । विजन्नोर से १ मील नीचे एक उदर है । जिसे आज भी तस्कदर (चक्रधर) कहते हैं। यही पर चक्रधर का मन्दिर था। यहाँ वितस्ता एक प्रायद्वीप बनाती है। इस अधित्यका के दक्षिण-पूर्व कोन के समीप एक मूर्च्छा नीची भूमि है। यहाँ स्टीन को अपनी यात्रा (सन् १८८९ तथा १८९५) में स्थानीय लोगों से मालूम होता था कि इसी स्थान को सुश्रवा नाग का निवास स्थान कहा जाता था । कल्हण द्वारा वर्णित पुनरावृत्ति अभी तक स्था- नीय लोगों की परम्परा तथा स्मृति में जीवित है। तस्कदर के टीले तथा विजन्नोर के मध्य के स्थान को लोग उस नगर की संज्ञा देते हैं जिसे नागों ने भस्म कर दिया था । प्राचीन यूनानी तथा भारतीय शककालीन मुद्राएँ बहुत सङ्ख्या में यहाँ मुख्यतया नदी पुलिन से प्राप्त हुई हैं । इन मुद्राओं की प्राप्ति द्वारा इस स्थान की प्राचीनता में किसी प्रकार का संदेह नहीं रह जाता । यहाँ बाढ के समय प्रति वर्ष जल आ जाता है । यदि उदर में खनन का कार्य किया जाय तो कुछ प्राचीन ऐतिहासिक सामग्रियाँ प्राप्त हो सकती हैं। कल्हण ( रा० त० १ : २७० ) के उल्लेख से प्रकट होता है कि उसके समय में भी यह स्थान अपना प्राचीन गौरव समाप्त कर ध्वंसावस्था में पड़ा था । पृष्ठ ८३ की टिप्पणियाँ द्रष्टव्य हैं । मैने विजयेश्वर की यात्रा में इस स्थान को देखा है । श्री स्टीन ने जिस जनश्रुति का उल्लेख किया । उसे मैंने अतिवृद्धों से सुना है । आधुनिक काल मे लोग ॰ उसे भूल चुके हैं । भूल रहे हैं । वे इन संविधानों को कपोल कल्पना मानते हैं । अन्तरीप का दृश्य सुहावना है । स्थान के प्राचीन भूगोल तथा वर्णन में परिवर्तन हो गया है । बाढ़ के जल के कारण मूल रूप बदल गया है । कल्हण के समय निस्सन्देह बहुत कुछ प्राचीन अवशेष तथा रूप स्थायी रहे होंगे ।
प्रथम तरंग २६१ कदाचित्तस्य दूराध्वक्लान्तो मध्यन्दिने युवा । छायार्थी तत्सरःकच्छं विशाखाख्योऽविशद्विजः ॥ २०४ ॥ २०४. किसी समय मध्याह्नकाल में एक युवक विशाख नामक ब्राह्मण दूर मार्ग से थका हुआ उस सरोवर तट पर छाया निमित्त आया । सच्छायपादपतले समीरैः शमितक्लमः । शनैर्जलमुपस्पृश्य भोक्तुं सक्तून्प्रचक्रमे ॥ २०५ ॥ २०५. उस पादप तल की सुच्छाया में समीर के कारण उसकी क्लान्ति का शमन हो गया । हाथ-मुँह धोकर धीरे धीरे सत्तू¹ खाने लगा । पाठभेद : श्लोक संख्या २०३ में 'स्थितम्' का 'स्थितः' तथा 'सरः' का 'सारः' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०३ (१) सुश्रवा नाग : हरचरित चिन्ता- मणि (१०:२४८) में तथा नीलमत पुराण में सुश्रवा नाग का उल्लेख मिलता है । सुश्रवा नाग का स्थान विजयेश्वर तीर्थ के समीप था । आखुफालौ फलाफञ्च नागः कानसरस्तथा । सुश्रवो देवपालश्च नागेन्द्रोऽथ बलाहकः ॥ नी० ८९२:1062 (२) चन्द्रलेखा : श्लोक संख्या २०१ से २७९ तक चन्द्रलेखा उपाख्यान कल्हण ने वर्णन किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २०४ में 'मध्यं' वा पाठभेद 'मध्या', 'मध्ये' तथा 'मध्य' मिलता है । श्लोक संख्या २०५ में 'शर्मर्जलं' का पाठभेद 'सरोजलं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०५ (१) सत्तू : प्रचलित शब्द सत्तू है । पूर्वीय उत्तर प्रदेश तथा बिहार में मध्याह्न काल में गरीबों का एक मात्र भोजन है । पर्वतीय क्षेत्रों में सत्तू का प्रयोग किया जाता है । प्रायः भारतवर्ष मात्र में सत्तू का किसी न किसी रूप में प्रचलन है । यह बना बनाया भोजन है । मक्का, ज्वार, बाजरा, यव-चना का मुख्यतया सत्तू बनता है । यव-चना का मिश्रित सत्तू अत्यन्त स्वादिष्ट होता है । वह रोटी और दाल दोनों पोषक गुणों का मिश्रण है । मैं ग्रीष्म ऋतु में प्रायः सत्तू खाता हूँ । सत्तू मध्याह्न काल के पूर्व खाना चाहिए । सत्तू खाने के कई प्रकार हैं । पहला प्रकार नमक मिर्च, तथा आम की चटनी अथवा अचार से, तथा दूसरा प्रकार मीठा सत्तू खाने का है । इसमें दूध, चीनी अथवा घी चीनी मिलाते हैं । नमकीन सत्तू में भी सम्पन्न लोग घी मिलाकर प्रयोग करते हैं । सत्तू के होटल भी चलते हैं । उन्हें तुरन्त होटल कहा जाता है । जहाँ तुरन्त भोजन मिल जाता है । सत्तू का वेदोक्त नाम सक्तू है । परवर्ती संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में सक्तू शब्द विशेषतः यव के सक्तू का वाचक है । (सं० सं० ६:४:१०: ६, वा० सं० १९ २१, श० ब्रा० १:६:३१६,- ९:१:१:८) ऋग्वेद में केवल एक बार (१०:७१:२) इसका उल्लेख तितउ (चलनी) से चालने के प्रसंग में आया है । शतपथ ब्राह्मण (१३:२:१३) में 'देवानां वा एतद् रूपं यत्सक्तवः' में सक्तु का उल्लेख किया गया है । इसी प्रकार 'प्रजापतेर्वा एतद् रूपं यत्सक्तव .' का उल्लेख, तैत्तिरीय ब्राह्मण (३:८:१४:५) में किया गया है । सत्तू का इतना महत्त्व दिया गया है कि सत्तू संक्रान्ति पर्व के दिन सत्तू खाना धार्मिक कृत्य मान
३६० राजतरंगिणी तत्रैकस्मिन्किलोद्याने स्वच्छस्वादुजलाश्रितम् । आसीत्सुश्रवसो नाम्नो नागस्य वसतिः सरः ॥ २०३ ॥ २०३. वहाँ किसी एक उद्यान में स्वच्छ सुस्वादु जल मय सरोवर था। वहाँ सुश्रवा१ नामक नाग निवास करता था । पादटिप्पणियाँ : २०० (१) विहारदाह : कश्मीर में यह एक और उदाहरण मिलता है। जब राजा ने कुपित होकर धार्मिक स्थानों में आग लगवा दी थी । कश्मीर के अनेक राजाओं ने भविष्य में धार्मिक स्थानों को नष्ट करने का प्रयास किया है । राजा विषय वासना में लिप्त हो गया था । उसका प्रभाव अन्तःपुर में पड़ना अवश्यम्भावी था । राजा के कारण नैतिक पतन हो रहा था । इसका यह एक ज्वलन्त उदाहरण है कि एक श्रमण का यह साहस हुआ कि वह राजा की प्रिया को उठा ले गया । (२) मध्यमठ : इस स्थान का निश्चय नहीं किया जा सकता कि कहाँ था । कल्हण इस स्थान के विषय में कुछ संकेत भी नहीं करता । श्लोक संख्या २०१ तथा २०२ युग्म हैं । दोनों का अर्थ एक साथ किया गया है । २०१-२०२ (१) नगर किन्नर किंवा नर- पुर : राजा नर के पत्तन अर्थात् नगर का दो नाम दिया गया है । (रा० त० १ : २७४) उसे किन्नरपुर तथा (रा० त० १ : २४४) नरपुर कहा गया है । कल्हण ने चक्रधर का वर्णन (रा० त० १ : २६१, २७०, ८ १६१) करते हुए इस नगर का स्थान विजयेश्वर अथवा विजद्रोर के अत्यन्त समीप रखा है । यही बात स्थानीय जनश्रुति से भी प्रकट होती है । विजद्रोर से १ मील नीचे एक उदर है । जिसे आज भी तम्बरदर (चक्रधर) कहते हैं । यही पर चक्रधर का मन्दिर था । यहाँ वितस्ता एक प्रायद्वीप बनाती है । इन अधित्यका के दक्षिण-पूर्व कोने के समीप एक सूखी नीची भूमि है। वहाँ स्टीन को अपनी यात्रा (सन् १८८९ तथा १८९५) में स्थानीय लोगों से मालूम होता था कि इसी स्थान को सुश्रवा नाग का निवास स्थान कहा जाता था । कल्हण द्वारा वर्णित पुनरावृत्ति अभी तक स्था- नीय लोगों की परम्परा तथा स्मृति में जीवित है। तस्वरदर के टीले तथा विजद्रोर के मध्य के स्थान को लोग उस नगर की संज्ञा देते हैं जिसे नागों ने भस्म कर दिया था । प्राचीन यूनानी तथा भारतीय शककालीन मुद्राएँ बहुत संख्या में यहाँ मुख्यतया नदी पुलिन से प्राप्त हुई है । इन मुद्राओं की प्राप्ति द्वारा इस स्थान की प्राचीनता में किसी प्रकार का संदेह नहीं रह जाता । यहाँ बाढ़ के समय प्रति वर्ष जल आ जाता है । यदि उदर में खनन का कार्य किया जाय तो कुछ प्राचीन ऐतिहासिक सामग्रियाँ प्राप्त हो सकती हैं । कल्हण ( रा० त० १ : २७० ) के उल्लेख से प्रकट होता है कि उसके समय में भी यह स्थान अपना प्राचीन गौरव समाप्त कर ध्वंसावस्था में पड़ा था । पृष्ठ ८३ की टिप्पणियाँ द्रष्टव्य हैं । मैंने विजयेश्वर की यात्रा में इस स्थान को देखा है। श्री स्टीन ने जिस जनश्रुति का उल्लेख किया । उसे मैंने अतिवृद्धों से सुना है । आधुनिक काल से लोग - उसे भूल चुके हैं। भूल रहे हैं । वे इन संविधानों को कपोल कल्पना मानते हैं । अन्तरीप का दृश्य सुहावना है । स्थान के प्राचीन भूगोल तथा वर्णन में परिवर्तन हो गया है । बाढ़ के जल के कारण मूल रूप बदल गया है । कल्हण के समय निस्सन्देह बहुत कुछ प्राचीन अवशेष तथा रूप स्थायी रहे होंगे ।
प्रथम तरंग २६१ कदाचित्तस्य दूराध्वक्लान्तो मध्यन्दिने युवा । छायार्थी तत्सरःकच्छं विशाखाख्योऽविशद्द्विजः ॥ २०४ ॥ २०४. किसी समय मध्याह्नकाल में एक युवक विशाख नामक ब्राह्मण दूर मार्ग से थका हुआ उस सरोवर तट पर छाया निमित्त आया । सच्छायपादपतले समीरैः शमितक्लमः । शनैर्जलमुपस्पृश्य भोक्तुं सक्तूनप्रचक्रमे ॥ २०५ ॥ २०५. उस पादप तल की सुछाया मे समीर के कारण उसकी क्लान्ति का शमन हो गया । हाथ-मुँह धोकर धीरे धीरे सत्तू ¹ खाने लगा । पाठभेद : श्लोक संख्या २०२ में 'द्विचतम्' का 'द्विचतः' तथा 'सरः' का 'सारः' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०३ (१) सुश्रवा नाग : हरचरित चिन्ता- मणि (१०:२४८) में तथा नीलमत पुराण मे सुश्रवा नाग का उल्लेख मिलता है । सुश्रवा नाग का स्थान विजयेश्वर तीर्थ के समीप था । आधुकालो फलाफश्च नागः कानसरस्तथा । सुश्रवो देवपालश्च नागेन्द्रोऽथ वलाहकः ॥ नी० ८६२:1062 (२) चन्द्रलेखा : श्लोक संख्या २०३ से २७९ तक चन्द्रलेखा उपाख्यान कल्हण ने वर्णन किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २०४ में 'मध्यं' का पाठभेद 'मध्या', 'मध्ये' तथा 'मध्य' मिलता है । श्लोक संख्या २०५ में 'शनैर्जल' का पाठभेद 'सरोजल' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०५ (१) सत्तू : प्रचलित शब्द सत्तू है। पूर्वीय उत्तर प्रदेश तथा विहार मे मध्याह्न काल में गरीबो का एक मात्र भोजन है। पर्वतीय क्षेत्रों में सत्तू का प्रयोग किया जाता है। प्रायः भारतवर्ष मात्र में सत्तू का किसी न किसी रूप में प्रचलन है। यह बना बनाया भोजन है। मक्का, ज्वार, बाजरा, यव-चना का मुख्यतया सत्तू बनता है । यव-चना का मिश्रित सत्तू अत्यन्त स्वादिष्ट होता है । वह रोटी और दाल दोनों पोषक गुणो का मिश्रण है । मै ग्रीष्म ऋतु में प्रायः सत्तू खाता हूँ । सत्तू मध्याह्न काल के पूर्व खाना चाहिए । सत्तू खाने के कई प्रकार हैं। पहला प्रकार नमक मिर्च, तथा आम की चटनी अथवा अचार से, तथा दूसरा प्रकार मीठा सत्तू खाने का है । इसमें दूध, चीनी अथवा घी चीनी मिलाते हैं । नमकीन सत्तू में भी सम्पन्न लोग घी मिलाकर प्रयोग करते हैं । सत्तू के होटल भी चलते है । उन्हे तुरन्त होटल कहा जाता है। जहाँ तुरन्त भोजन मिल जाता है । सत्तू का वेदोक्त नाम सक्तू है । परवर्ती संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थो में सक्तू शब्द विशेषतः यव के सक्तू का वाचक है । (तै० सं० ६:४:१०: ६, वा० सं० १९:२१, श० ब्रा० १:६:३१६,- ९:१:१:८) ऋग्वेद में केवल एक बार (१०:७१:२) इसका उल्लेख तितउ (चलनी) से चालने के प्रसंग में आया है । शतपथ ब्राह्मण (१३:२:१३) में 'देवानां वा एतद् रूपं यत्सक्तवः' में सक्तु का उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार 'प्रजापतेर्वा एतद् रूपं यत्सक्तवः' का उल्लेख, तैत्तिरीय ब्राह्मण (३:८:१४:५) में किया गया है । सत्तू का इतना महत्त्व दिया गया है कि सत्तू संक्रान्ति पर्व के दिन सत्तू खाना धार्मिक कृत्य मान
२६२ राजतरंगिणी तान्पाणौ गृह्णतैवाथ तेन तीरविहारिभिः । पूर्वमाकर्णितो हंसैः शुश्रुवे नूपुरध्वनिः ॥ २०६ ॥ २०६. उसने ग्रास हाथ में लिया ही था कि नूपुरध्वनि सुना। उस ध्वनि को तटपर विहार करने वाले हंसों द्वारा पूर्व ही सुन चुका था । निर्गते मञ्जरीकुञ्जादपश्यत्पुरतस्ततः । कन्ये नीलनिचोलिन्यौ स केचिच्चारुलोचने ॥ २०७ ॥ २०७. नील निचोल¹ धारिणी चारुलोचना दो कन्याओं को उसने मंजरी कुञ्ज से निकलती सम्मुख देखा । कर्णिकापद्मरागाब्जनाललीलायितस्पृशा । मनोज्ञधवलापाङ्गे तनीयोऽञ्जनरेखया ॥ २०८ ॥ २०८. मनोज्ञ धवल अपांग की पतली अंजन रेखा, उसके कर्ण कुण्डल में लगे पद्मराग मणि के कमल नाल तुल्य लग रही थी । हारिनेत्राञ्चलैर्मन्दमारुतान्दोलनाकुलैः । सनाथांसयुगे रूपपताकापल्लवैरिव ॥ २०९ ॥ २०९. उनके दोनों स्कन्धों¹ पर मन्द मन्द मरुत के आन्दोलन से आकुल मंजुल नेत्रांचल, सौन्दर्य के पताका पल्लव सदृश लग रहे थे । लिया गया है। इस दिन ब्राह्मणों को सत्तू, एक झंझर भरा जल तथा दक्षिणा देने की परम्परा प्रचलित है । वैदिक साहित्य में इन्द्र के प्रसंग में वर्णन मिलता है। उनका स्वागत सत्तू तथा सोमरस से किया जाता था । पाठभेद : श्लोक संख्या २०७ में 'निर्गते' का पाठभेद 'निर्गतो' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०७ (१) निचोल : चोल का शाब्दिक अर्थ चोली अथवा अंगिया है। चोल अथवा निचोल संस्कृत शब्द का अर्थ चादर, ओढ़नी, घूँघट, बुरका, पलंग- पोश तथा पालकी का परदा होता है। सर्वात्लक का अर्थ चोली तथा सदरी होता है । शाल शब्द निचोल से निकला है अतः भाषा में कह सकते हैं शाल शब्द चोल का अपभ्रंश है। सुदूर पुरा काल से कश्मीर का शाल प्रसिद्ध रहा है। यह कहना भ्रामक है। कश्मीर में शाल का बनना मुसलिम काल में आरम्भ हुआ था। यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट ने शाल को विख्यात किया था। राज्यमुकुट धारण करते समय उसने शाल को मान्यता दी थी। उस समय पेरिस में उन्हें 'शाले दिकश्मीर' कहा जाता था । २०९ (१) स्कन्ध : कालिदास के समान कल्हण नारी रूप का प्रशंसक रहा है। वह जहाँ भी कही नारी का वर्णन करता है उसका वर्णन अत्यन्त परिष्कृत, सौन्दर्यमय उसकी कवित्व प्रतिभा को प्रकट करता है। कालिदास ने नारी के स्कन्धों का सुन्दर वर्णन किया है। कल्हण ने भी यहाँ स्कन्धों की सुन्दरता का अति उत्तम वर्णन किया है । इस प्रकार कल्हण उँगलियों का वर्णन श्लोक संख्या २५३ में करता है ।
प्रथम तरंग २६३ ते शशाङ्कानने दृष्ट्वा शनैरभ्यर्णमागते । विरगमाशनादारम्भान्मुहुर्व्रीडाजडीकृतः ॥ २१० ॥ २१०. उन शशांक आनन कन्याओं को समीप आयी देखकर वह लज्जा विमूढ़ हो भोजन आरम्भ करना बन्द कर दिया। भुञ्जाने कच्छगुच्छानां शिम्बोम्बुजलोचने । ते पुनर्दृष्टवानग्रे किंचिद्व्यापारितेक्षणः ॥ २११ ॥ २११. उसने किंचित् नेत्रघुमाकर देखा। कमलोचना वे दोनों कन्याएँ कच्छ गुच्छ१ की फलियाँ खा रही थीं। आकृतेर्हा धिगिदृश्या भोज्यमेतदिति द्विजः । ध्यायन्कृपार्द्रः संमान्य स ते सक्तूनभाजयत् ॥ २१२ ॥ २१२. 'धिक्कार है ! इस रूप का यह भोजन ? सम्मान्य तथा दयार्द्र उस ब्राह्मण ने उन दोनों कन्याओं को सत्तू खिलाया। उपनिन्ये च संगृह्य पुटकैश्चटसीकृतैः । तयोः पानाय पानीयं सरसः स्वच्छशीतलम् ॥ २१३ ॥ २१३. तत्पश्चात् पीने के लिये पत्रपुटक१ में स्वच्छ एवं शीतल सरोवर जल लाकर दिया। (२) तिलकम् : कल्हण ने युग्मम् तिलकम् तथा कुलकम्, तीनों श्लोक रचना शैली को किसी विषयों घटनाओं एवं श्रृंगार वर्णन के लिए अपनाया है। दो श्लोक में जहाँ भाव किंवा घटना प्रकट की जाती है उसे युग्मम्, तीन श्लोकों में प्रकट की जाती है उसे तिलकम् तथा पाँच से पन्द्रह श्लोक में जहाँ प्रकट किया जाता है उसे कुलकम् कहा जाता है। कल्हण ने श्लोक संख्या २०८, २०९, २१० तिलकम् में कन्याओं के सौन्दर्य का वर्णन किया है। प्रायः सभी अनुवादकर्ताओं ने तीनों श्लोक का अनुवाद एक ही मे किया है। मैंने उन्हें श्लोक के क्रम से दिया है। इन श्लोकों का रूप वर्णन अनुवाद में नहीं लाया जा सकता। तीनों श्लोक कल्हण की उत्तम कवित्व प्रतिभा प्रकट करते हैं। उनका रस उनके मूल में ही है। उनका अनुवाद कठिन है। प्रायः सभी अनुवादकारों ने भिन्न-भिन्न शैली तथा शब्दों का विभिन्न अर्थ करते हुए अनुवाद किया है। मैं स्वयं नही कह सकता कि इनका अनुवाद करने में मैं सफल हो सका हूं। पाठभेद : श्लोकसंख्या २१० में 'व्रीडा' का 'व्रीड' पाठ- भेद मिलता है। श्लोक संख्या २११ में 'दृष्ट्वा' का पाठभेद 'धृंष्ट्वा' 'सृष्ट्वा' तथा 'पृष्ट्वा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २११ (१) कच्छ गुच्छ : कश्मीर में इसे 'कचदन' कहते हैं। एक प्रकार की घास है। उपत्यका के घर तथा सुनिश्चित नदी के समीप बहुत होता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २१२ में 'कृपार्द्र' का पाठभेद 'कृपाद्री' मिलता है। श्लोक संख्या २१३ में 'शीतलम्' का 'शीत्कृतम्' पाठभेद मिलता है।
२६२ राजतरंगिणी तान्याणौ गृहीतैवाथ तेन तीरविहारिभिः । पूर्वमाकणितो हंसैः शुश्रुवे नूपुरध्वनिः ॥ २०६ ॥ २०६. उसने ग्रास हाथ में लिया ही था कि नूपुरध्वनि सुना। उस ध्वनि को तटपर विहार करने वाले हंसों द्वारा पूर्व ही सुन चुका था। निर्गते मञ्जरीकुञ्जादपश्यत्पुरतस्ततः । कन्ये नीलनिचोलिन्यौ स केचिच्चारुलोचने ॥ २०७ ॥ २०७. नील निचोल¹ धारिणी चारुलोचना दो कन्याओं को उसने मंजरी कुञ्ज से निकलती सम्मुख देखा। कर्णिकापद्मरागाब्जनाललीलायितस्पृशा । मनोज्ञधवलापाङ्गे तनीयोऽञ्जनरेखया ॥ २०८ ॥ २०८. मनोज्ञ धवल अपांग की पतली अंजन रेखा, उसके कर्ण कुण्डल में लगे पद्मराग मणि के कमल नाल तुल्य लग रही थी। हारिनेत्राञ्चलैर्मन्दमारुतान्दोलनाकुलैः । सनाथांसयुगे रूपपताकापल्लवैरिव ॥ २०६ ॥ २०६. उनके दोनों स्कन्धों¹ पर मन्द मन्द मरुत के आन्दोलन से आकुल मंजुल नेत्रांचल, सौन्दर्य के पताका पल्लव सदृश लग रहे थे। लिया गया है। इस दिन ब्राह्मणों को सत्तू, एक झंझर भरा जल तथा दक्षिणा देने की परम्परा प्रचलित है। वैदिक साहित्य में इन्द्र के प्रसंग मे वर्णन मिलता है। उनका स्वागत सत्तू तथा सोमरस से किया जाता था। पाठभेद : श्लोक संख्या २०७ में 'निर्गते' का पाठभेद 'निर्गतो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २०७ (१) निचोल : चोल का शाब्दिक अर्थ चोली अथवा अंगिया है। चोले अथवा निचोल संस्कृत शब्द का अर्थ चादर, ओढनी, घूंघट, बुरका, पलंग- पोश तथा पालकी का परदा होता है। सचोलक का अर्थ चोली तथा सदरी होता है। शाल शब्द निचोल से निकला है सरल भाषा में कह सकते है शाल शब्द चोल का अपभ्रंश है। सुदूर पुरा काल से कश्मीर का शाल प्रसिद्ध रहा है। यह कहना भ्रामक है। कश्मीर में शाल का बनना मुस्लिम काल में प्रारम्भ हुआ था। यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट ने शाल को विख्यात किया था। राज्यमुकुट धारण करते समय उसने शाल को मान्यता दी थी। उस समय पेरिस मे उन्हें 'शाले दिकश्मीर' कहा जाता था। २०९ (१) स्कन्ध : कालिदास के समान कल्हण नारी रूप का प्रशंसक रहा है। वह जहाँ भी कही नारी का वर्णन करता है उसका वर्णन अत्यन्त परिष्कृत, सौन्दर्यमय उसकी कवित्व प्रतिभा को प्रकट करता है। कालिदास ने नारी के स्कन्धों का सुन्दर वर्णन किया है। कल्हण ने भी वहाँ स्कन्धो की सुन्दरता का अति उत्तम वर्णन किया है। इस प्रकार कल्हण उँगलियो का वर्णन श्लोक संख्या २५३ में करता है।
प्रथम तरंग २६३ ते शशाङ्कानने दृष्ट्वा शनैरभ्यर्णमागते । विररामाशनालम्भान्मुहुर्व्रीडाजडीकृतः ॥ २१० ॥ २१०. उन शशांक आनन कन्याओं को समीप आयो देखकर वह लज्जा विमूढ़ हो भोजन आरम्भ करना बन्द कर दिया । भुञ्जाने कच्छगुच्छानां शिम्बोरम्बुजलोचने । ते पुनर्दृष्टवानग्रे किंचिद्व्यापारितेक्षणः ॥ २११ ॥ २११. उसने किंचित् नेत्रघुमाकर देखा। कमललोचना वे दोनों कन्याएँ कच्छ गुच्छ १ की फलियाँ खा रही थीं। आकृतेर्हा धिगीडृश्या भोज्यमेतदिति द्विजः । ध्यायन्कृपार्द्रः संमान्य स ते सक्तूनभोजयत् ॥ २१२ ॥ २१२. 'धिक्कार है ! इस रूप का यह भोजन ? सम्मान्य तथा दयार्द्र उस ब्राह्मण ने उन दोनों कन्याओं को सत्तू खिलाया । उपनिन्ये च संगृह्य पुटकैश्चटसीकृतैः । तयोः पानाय पानीयं सरसः स्वच्छशीतलम् ॥ २१३ ॥ २१३. तत्पश्चात् पीने के लिये पत्रपुटक में स्वच्छ एवं शीतल सरोवर जल लाकर दिया । (२) तिलकम् : कल्हण ने युग्मम् तिलकम् तथा मैं स्वयं नहीं कह सकता कि इनका अनुवाद करने में कुलकम्, तीनों श्लोक रचना शैली को किसी विषयो मैं सफल हो सका हूं । घटनाओ एवं श्रृंगार वर्णन के लिए अपनाया है। पाठभेद : दो श्लोक में जहाँ भाव किवा घटना प्रकट की जाती श्लोकसंख्या २१० में 'व्रीडा' का 'व्रोड' पाठ- है उसे युग्मम्, तीन श्लोकों में प्रकट की जाती है भेद मिलता है। उसे तिलकम् तथा पाँच से पन्द्रह श्लोक में जहाँ श्लोक संख्या २११ मे 'दृष्ट्वा' का पाठभेद प्रकट किया जाता है उसे कुलकम् कहा जाता है। 'धृष्ट्वा' 'सृष्ट्वा' तथा 'पृष्ट्वा' मिलता है। कल्हण ने श्लोक संख्या २०८, २०९, २१० पादटिप्पणियाँ : तिलकम् में कन्याओं के सौन्दर्य का वर्णन किया है। २११ (१) कच्छ गुच्छ : कश्मीर में इसे 'कचदन' प्रायः सभी अनुवादकताओं ने तीनो श्लोक का कहते हैं। एक प्रकार की घास है। उपत्यका के चर अनुवाद एक ही मे किया है। मैने उन्हें श्लोक के तथा सुसिंचित नदी के समीप बहुत होता है । क्रम से दिया है। इन श्लोकों का रूप वर्णन अनुवाद पाठभेद : में नहीं लाया जा सकता । तीनों श्लोक कल्हण श्लोक संख्या २१२ में 'कृपार्द्र' का पाठभेद की उत्तम कवित्व प्रतिभा प्रकट करते है। उनका 'कृपाद्रीः' मिलता है। रस उनके मूल मे ही है। उनका अनुवाद कठिन है। श्लोक संख्या २१३ में 'शीतलम्' का 'शीत्कृतम्' प्रायः सभी अनुवादकारों ने भिन्न-भिन्न शैली तथा पाठभेद मिलता है। शब्दों का विभिन्न अर्थ करते हुए अनुवाद किया है ।
२६४ राजतरंगिणी आचान्ते शुचितां प्राप्ते कृतासनपरिग्रहे । ततश्च वीजयन्पर्णतालवृन्तैरभाषत ॥ २१४ ॥ २१४. भोजनोपरान्त जल से शुद्ध होकर, उनके आसन ग्रहण करने पर विशाख पत्र ताल वृन्त (पंखा) से हवा करता हुआ बोला । भवत्यौ पूर्वसुकृतैः कैश्चित्संप्राप्तदर्शनः । चापलाद्विप्रसुलभात्प्रष्टुमिच्छत्ययं जनः ॥ २१५ ॥ २१५. पूर्वकृत सत्कर्मों से आप दोनों का दर्शन प्राप्त हुआ । अब विप्रसुलभ चपलता के कारण यह जन' कुछ पूछना चाहता है । कल्याणिनीभ्यां कतमा पुण्या जातिः परिष्कृता । कुत्र वा क्लान्तमेतादृग्विरसं येन भुज्यते ॥ २१६ ॥ २१६. 'कल्याणिनी आप दोनो ने कहाँ और कौन सी पुण्य जाति को अलंकृत किया है ? जिसके कारण इस प्रकार के क्लान्त एवं नीरस वस्तु को खाती हैं।' एका समूचे विद्ध्यावामस्य सुश्रवसः सुते । स्वादु भोक्तव्यमप्राप्तं किमीदृङ् नोपभुज्यते ॥ २१७ ॥ २१७. उनमें से एक ने कहा—हम सुश्रवा नाग की कन्या हैं। सुस्वादु' वस्तु के अभाव हम क्या यह भी न खाएँ ? [बायाँ स्तम्भ] पादटिप्पणियाँ : २१३ (१) पुटक : यहाँ पर पत्तो के दोनों से अर्थ है । विशाख ने समीपवर्ती कमल पत्र अथवा किसी अन्य वृक्ष किंवा पौधे के पत्तो से दोना बनाकर उनमें कन्याओ को जल पीने के लिये दिया । २१४ (१) तालवृन्तः : ताल पंखा अर्थ यहाँ लगता है । प्रतीत होता है । कश्मीर के दक्षिण पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा दक्षिणापथ में प्रचलित ताल अर्थात् ताड़ के पंखों का प्रचलन हो गया था । २१५ (१) जन : कुछ विद्वान् अनुवादको ने 'जन' का अनुवाद आप का विनम्र सेवक' किया है । मैंने यहाँ मूल जन शब्द ही रख दिया है । जन शब्द प्रचलित है । बोधगम्य है । कल्हण ने प्रकृत जन शब्द प्रायः जन साधारण के लिये प्रयोग किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २१६ में 'परिष्कृता' का ० ' मिलता है । [दायाँ स्तम्भ] २१६ (१) प्रश्न : कल्हण की प्रश्न शैली कालिदास की शकुन्तला नाटक शैली जैसी है । नाटक के प्रथम अंक में कण्व के आश्रम की युवतियों तथा दुष्यन्त के बीच हुए प्रश्नोत्तर का स्मरण कराती है । निष्कर्ष निकाला जा सकता है । कल्हण ने इतिहास के साथ ही साथ साहित्य संस्कृत एवं काव्य का यथेष्ट अध्ययन किया था । यह शैली ऋग्वेद में उर्वशी और पुरुरवा के संवाद तथा यम-यमी के प्रश्नोत्तर में भी मिलता है । पाठभेद : श्लोक संख्या २१७ मे 'प्राप्त' का पाठभेद 'प्राप्य' तथा 'मप्राप्य' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २१७ (१) सुस्वादु : कल्हण ने बड़ी ही सरल, मर्मस्पर्शी शैली तथा भाषा मे कन्याओं की दयनीय दशा का चित्रण किया है । स्वादिष्ट भोजन के अभाव में जो कुछ मिल जाय वही बहुत कुछ है ।
प्रथम तरंग २६५ पित्रा विद्याधरेन्द्राय प्रदातुं पार्रकल्पिता । इरावत्यहमेषा च चन्द्रलेखा यवीयसी ॥ २१८ ॥ २१८. 'पिता ने विद्याधरेन्द्र¹ को मुझे देने की परिकल्पना की है। मेरा नाम इरावती² और इस युवती का चन्द्रलेखा³ है।' पुनर्द्विजोऽभ्यधादेवं नैष्किञ्चन्यं किमस्ति यः । ताभ्यामवादि तातोऽत्र हेतुं वेत्ति स पृच्छ्यताम् ॥ २१९ ॥ २१९. द्विज ने पुनः कहा—आप इतनी निष्किञ्चन (दरिद्र) क्यों हैं ? उन दोनों ने उत्तर दिया इसका कारण पिता जी जानते हैं। उनसे पूछिए। ज्येष्ठेऽत्र कृष्णद्वादश्यां यात्रायै तक्षकस्य तम् । आगतं चूडया तोयस्यन्दिन्या ज्ञास्यसि ध्रुवम् ॥ २२० ॥ २२०. 'ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी को तक्षक नाग¹ की यात्रा के लिये आये हुए, उनके जलस्यन्दी चूड़ा से उन्हें निश्चय जान लेंगे।' पाठभेद : श्लोक संख्या २१८ में 'च' का 'मे' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २१८ (१) विद्याधरेन्द्र : विद्याधरेन्द्र जाति के राजा का अर्थ यहाँ है। विद्याधर एक देव योनि विशेष है। पुराणों में इनके राजाओं का नाम चित्र- केतु, चित्ररथ, अथवा सुदर्शन दिया गया है। (मा० ६.१७:१;११.१६२९) वायु पुराण (३८- १६) में पुलोमन को विद्याधरपति कहा गया है। इनकी स्त्रियों को विद्याधरी कहा जाता है। (ब्रह्माण्ड पु० ३:५०.४०) इन देवताओं के शैवेय, विक्रान्त एवं सोमनस नामक तीन प्रमुख गण थे। (वायु० ३०:८८) इनका विद्याधर नामक नगर ताम्रपर्णी सरोवर एवं पतंग पर्वतमालाओं के मध्य है। (मत्स्य० ६५:१८) (२) इरावती : पंजाब की एक नदी है। रावी का नाम इरावती है। ब्रह्मा की भी एक नदी का नाम है। कश्यप की कन्या का नाम इरावती है। इरावती का विस्तृत वंश ब्रह्माण्ड में है। यहाँ पर यह शब्द केवल नाम के लिये प्रयुक्त किया गया है। ३४ (३) चन्द्रलेखा : चन्द्रलेखा का अर्थ चन्द्रमा की कला है। एक अप्सरा का भी नाम चन्द्रलेखा पुरा साहित्य में आता है। चन्द्रलेखा बाणासुर की कन्या एवं उषा की सखी थी। यहाँ केवल नाम का बोधक है। पाठभेद : श्लोकसंख्या २२० में 'ज्येष्ठे' का 'ज्यैष्ठे' तथा 'चूडया' का पाठभेद 'चूलया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २२० (१) तक्षक नाग : वीही परगना के जयवन वर्तमान जेवन के समीप एक पवित्र स्वच्छ नाग है। सिपोर से दो मील से भी कम दूरी पर उत्तर-पश्चिम जेवन पड़ता है। वह नाग सरोवर आज भी वर्तमान है। मैं वहाँ पर दो बार आ चुका हूँ। उसमें आज भी तक्षक नाग की पूजा की जाती है। यह स्थान श्रीनगर से ५ मील दूर है। विक्रमांकदेव चरित्र के लेखक विल्हण ने इसका बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। इसके समीप ही खोनमुख ग्राम में उसका जन्म हुआ था। (१८:७०) विल्हण कहता है : प्रवरपुर (श्रीनगर) से डेढ़ गव्यूती पर स्थित है। जयवन में एक ऊँचा स्मारक है। उसे जयवन कहते
२६६ | राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ] हैं। यहाँ स्वच्छ जल पूर्ण एक सरोवर है। तक्षक का वह पवित्र स्थान है। तक्षक नागों का राजा है। धर्म नष्ट करने वाले कलि का मस्तक चक्रतुल्य नाग ने यहाँ उड़ा दिया था। पुरावृत्त है। तक्षक नाग ने इस क्षेत्र में केसर की खेती सर्वप्रथम करना आरम्भ किया था। आइने अकबरी में वर्णन आता है। ज्येष्ठमास में जब केसर की खेती आरम्भ की जाती है तो इस जलाशय की तीर्थ यात्रा की जाती है। (२:३५८ तथा रा० त० ४:१३१) माहात्म्य से प्रकट होता है कि हर्षेश्वर तीर्थ में तक्षक नाग का स्थान है। (श्लोक ८०) ज्येष्ठ की पूर्णिमा को हर्षेश्वर की तीर्थ यात्रा के समय तक्षक नाग के स्थान पर भी जाना चाहिए। तक्षक नाग का उल्लेख कल्हण ने पुनः रा० त० ४:२१६ में किया है। नीलमत पुराण में उल्लेख है : द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालौ द्वौ च कच्छपौ । द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गजौ द्वौ च तक्षकौ ॥ ४४५ नरपुर के प्रसंग में तक्षक नाग की यात्रा का वर्णन कल्हण ने किया है। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में इस तीर्थ का महत्त्व था। महाभारत में प्राप्य तीर्थों की तालिका में कश्मीर के केवल इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है। काश्मीरेष्वेव नागस्य भवनं तक्षकस्य च। वितस्ताख्यमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥ (म० व० ८२:९०) कश्मीर में नाग, विष्णु, शिव एवं सूर्य की पूजा अन्य देवताओं की अपेक्षा विशेष प्रचलित थी। अबुल फजल कश्मीर के देव स्थानों की निम्न- लिखित तालिका देता है—शिव = ४५, विष्णु = ६४, सूर्य = ३, दुर्गा = २२ और नाग = ७०० ।
[दायाँ स्तम्भ] आठवीं शताब्दी तक वराह तथा नरसिंह की पूजा प्रचलित हो गयी थी। अबुल फजल की उक्त तालिका से स्पष्ट है कि नाग पूजा तथा देवस्थान कश्मीर में सर्वाधिक लोकप्रिय थे। तक्षक नाग कश्यप एवं कद्रू का पुत्र था। (विष्णु १:१५; मत्स्य ६:७, म० पा० ५९:४०, ह० वं० १:३:१२१) उसके दो पुत्र अश्वसेन तथा श्रुतसेन थे। (म० आ० १:१४५–१४६) अर्जुन ने खाण्डव वन अग्नि को दिया। उस समय यहाँ तक्षक, उसकी पत्नी तथा अश्वसेन उप- स्थित थे। अश्वसेन की माता ने पुत्र को मुख में ले लिया। यह आकाशमार्ग द्वारा भागने लगी। अर्जुन ने बाणों द्वारा उसका शिरश्छेद कर दिया। तक्षक के मित्र इन्द्र थे। इन्द्र ने अश्वसेन की रक्षा का विचार किया। उसने अश्वसेन की रक्षा की (म० आ० २१८:६) इस घटना के समय तक्षक कुरुक्षेत्र में था। (म० आ० २१९: १३) तत्पश्चात् ऋषि शमीक के पुत्र शृंगी की प्रेरणा पर अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को डँस कर उसकी मृत्यु का कारण हुआ। जनमेजय तथा तक्षक में शत्रुता वेद ऋषि के शिष्य उतंक के कारण हुई थी। पौष्य राजा की रानी का गुरु उत्तंक था। पौष्य पत्नी ने अपना कुण्डल गुरुदक्षिणा स्वरूप उतंक को दिया। (म० आ० ३.२५) तक्षक नाग उस कुण्डल को हस्तगत करना चाहता था। उसने एक क्षपणक का वेष धारण किया। वह कभी दृश्य होता था। कभी अदृश्य हो जाता था। उतंक मार्ग में कुण्डल रखकर लघुशंका करने लगे। क्षपणक रूपधारी तक्षक ने कुण्डल चुरा लिया। उतंक आचमन कर लौटे। उन्होंने देखा। क्षपणक कुण्डल सहित भागा जा रहा था। उतंक ने पीछा किया। क्षपणक ने अपना मूल स्वरूप धारण किया। एक विवर में तक्षक नाग रूप प्रवेश किया। पाताल में पहुँचा। उतंकने बिल किया
प्रथम तरंग २६७ द्रक्ष्यस्यावामपि तदा तदभ्यर्णकृतस्थिती । इत्युक्त्या फणिकन्ये ते क्षणादास्तां तिरोहिते ॥ २२१ ॥ २२१. 'उस समय हम दोनों को भी उनके समीप स्थित देखेंगे' यह कहकर वे फणि- कन्याएं तत्क्षण तिरोहित हो गयीं । क्रमात्प्रववृते सोऽथ नटचारणसंकुलः । प्रेक्षिलोकसमाकीर्णस्तत्र यात्रामहोत्सवः ॥ २२२ ॥ २२२. वहाँ नट चारण संकुल प्रेक्षक समाकीर्ण नाग यात्रा महोत्सव क्रम से आरम्भ हुआ । द्विजोऽपि कौतुकाकृष्टः पर्यटन् रङ्गमञ्जसा । कन्योक्तचिह्नज्ञातस्य नागस्याऽन्तिकमाययौ ॥ २२३ ॥ २२३. कौतुकाकृष्ट वह द्विज भी शीघ्रता पूर्वक मेले में पर्यटन करता हुआ, कन्या द्वारा बताए, चिन्ह से ज्ञात नाग के समीप आ गया । पार्श्वस्थिताभ्यां कन्याभ्यां पूर्वमावेदितोऽथ सः । द्विजन्मने व्याजहार स्वागतं नागनायकः ॥ २२४ ॥ २२४. पार्श्व स्थित दोनों कन्याओं ने उसके विषय में पिता को जना दिया था । अतएव नागनायक ने ब्राह्मण के लिये कहा--'स्वागत' । ततः कथान्तरे क्वाऽपि पृष्टः कारणमापदाम् । जगाद तं द्विजन्मानं निःश्वस्य श्वसनाशनः ॥ २२५ ॥ २२५. तदनन्तर कथा प्रसंग में आपदाओं का कारण पूछने पर उस द्विजन्मा से निःश्वास लेकर श्वसनाशन१ (नाग) बोला : विवर खोदा । पाताल पहुंचा । नागों की स्तुति की । (म० भा० ३:१५४-१५८ दे० भा० २:१०) । तक्षक को नष्ट करने की कामना से, ऋषि उत्तंक ने जनमेजय को सर्प यज्ञ करने के लिये, प्रेरित किया । सर्पसत्र राजा ने आयोजित किया । उसमें अट्ठारह सर्पकुल जलकर मर गये थे पिच्छाडक, मंडलक, पिंडसिक्त, रमेणक, उच्छिक, शरभ, भंग, विल्वतेजस, विरोहण, शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेचन, मुद्गर, शिशुरोमन, सुरोमान तथा महाहनु थे । तक्षक नाग ऋषि आस्तीक की कृपा से नागयज्ञ में हवि होने से बच गया । (म० भा० ४८:१८) महाभारत वर्णित कश्मीर के इस तीर्थ का महत्त्व आज भी है। भेवन ग्राम के समीप एक बड़े निर्मल सरोवर में तक्षक नाग की पूजा की जाती है । (रा० त० ७:६०७) पाठभेद : श्लोक संख्या २२१ में 'तद' का 'पाठभेद 'तदा' मिलता है । श्लोक संख्या २२४ में 'वेदितोऽथ' का पाठभेद 'वेदिताय' मिलता है । २२५ (१) श्वसनाशन : इसका अर्थ यहाँ नाग किंवा सर्प है । 'श्वसनः स्पर्शनो वायुः इत्यमरः'
२६८ राजतरङ्गिणी अभिमानवतां ब्रह्मन्नुक्तायुक्तविवेकिनाम् । युज्यतेऽवश्यभोग्यानां दुःखानामप्रकाशनम् ॥ २२६ ॥ २२६. 'ब्रह्मन्' ! स्वाभिमानी युक्तायुक्तविवेकी जन अवश्यमेव भोग्य दुःखों को प्रकाशित करना ठीक नहीं समझते । परदुःखं समाकर्ण्य स्वभावसुजनो जनः । उपकारसमर्थत्वादप्राप्नोति हृदयव्यथाम् ॥२२७ ॥ २२७. 'स्वभावतः सज्जन जन, पर दुःख सुनकर उपकार करने में असमर्थ होने के कारण हार्दिक व्यथा का अनुभव करते हैं । वृत्तिं स्वां बहु मन्यते हृदि शुचं धत्तेऽनुकम्पोक्तिभि- र्व्यक्तं निन्दति योग्यतां मितमतिः कुर्वन्स्तुतोगत्मनः । गर्ह्योपायनिषेवणं कथयति स्थास्नुं यदन्यापदं श्रुत्वा दुःखमरंतुदां वितनुते पीडां जनः प्राकृतः ॥ २२८ ॥ २२८. मितमति साधारण जन दुखियों के दुःख को सुनकर, आत्मश्लाघा करता हुआ, उनकी अपेक्षा अपनी वृत्ति श्रेष्ठ समझता है । तथापि हृदय में शोक धारण करता हुआ, सहानुभूति पूर्ण वचनों से उनकी योग्यता की स्पष्ट निन्दा करता है । दुःख निवृत्ति निमित्त कुत्सित उपायों के आश्रय की मन्त्रणा देता है । अत एव विवेक्तॄणां यावदायूः स्वमानसे । जीर्णानि सुखदुःखानि दहन्त्यन्ते चिताऽनलः ॥ २२९ ॥ २२९. अतएव विवेकियों के मन में आजीवन जीर्ण हुए सुख-दुःख अन्त में चितानल ही जलाते हैं । अर्थात् वायु जिसका भोजन है उसे नाग कहते हैं । श्लोक संख्या २२८ में 'मति.' का 'मतेः'; सर्प हवा पीकर रहते हैं यह आम कहावत है । 'स्तुतोरा' का 'स्तुतेरा'; 'निषेवण' का 'निषेवन' तथा 'जनः' का 'पुनः' पाठभेद मिलता है । २२६ (१) दुःखः कल्हण का यह श्लोक अत्यन्त मार्मिक है । उसने स्वाभिमानी और विवेकी लोगों पादटिप्पणियाँ : के चरित्र का चित्रण किया है । वे भाग्य विपर्यय के कारण आये हुए दुःखों को चुपचाप सह लेते हैं । उसे २२८ (१) यह शार्दूल विक्रीडित छन्द है । प्रकट करने का किंचित् मात्र प्रयास नहीं करते । इसका लक्षण निम्न प्रकार से है । इसी भाव को कवि रहीम व्यक्त करता है । सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् । रहिमन निज मन को व्यथा मन ही राखो गोय । सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहै कोय ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २२९ में 'विवेक्तॄणां' का 'विव- श्लोक संख्या २२७ में 'समाकर्ण्य' का 'यदा क्तृणां', 'जीर्णानि' का 'दीर्घानि' तथा 'दीर्घाणि' कर्ण्य' तथा 'स्वभाव' का 'सुभाव' पाठभेद मिलता है । और 'चितानलः' का 'चितानिलः' पाठभेद मिलता है ।