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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

प्रथम तरंग ३१३ है। कर्नाटक देशवासियों की भाषा कन्नड़ है। उनका साहित्य कन्नड़ साहित्य कहा जाता है। वर्तमान मैसूर राज्य समस्त कन्नड़ भाषियों का राज्य है। कन्नड़ शब्द संस्कृत कर्णाट का अपभ्रंश है। उक्त तन्त्रों के अनुसार प्राचीन कर्णाटक देश रामनाथ से श्रीरंग तक विस्तृत था। श्रीरंग शब्द वर्तमान श्रीरंगपत्तन के लिए आया है। श्रीरंग कावेरी नदी के दूसरे तट पर तंजोर के दूसरी तरफ है। रामनाथ स्थान रामनाथपुरम् अर्थात् पूर्व रामनद जिला अथवा रामनाथ मठ मदुरा जिला अथवा तुंग और भद्रा नदियों के संगम पर रामेश्वर तीर्थ हो सकता है। कश्मीरी महाकवि विल्हण ने कुन्तल देश को कर्णाट देश का समानार्थक कहा है। विक्रमादित्य षष्ठ को 'कुन्तलेश' तथा 'कर्णान्ते' कहा गया है। कुन्तल देश कर्णाटक का एक भाग हो सकता है। हरिहर राजा द्वितीय के एक लेख सन् १३०७ ई० मे पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट देश में था। विजय नगर साम्राज्य के विस्तार के साथ कर्णाट प्रदेश की सीमा दक्षिण मे बहुत विस्तृत हो गयी थी। तल्लीकोट के युद्ध (सन् १५६५ ई०) के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् वेल्लोर जिला, उत्तरेश अरकाट तक पीछे चले आये थे। उनका राज्य परिमित हो गया था। लघु राज्य होने पर भी उन्हें कर्नाटक का राय कहा जाता है। सन् १६६२-१७०१ ई० मे जुलफिकार अली खा कर्ना- टक का नवाब बना दिया गया था। (४) लाट : दक्षिण तथा गुजरात के मध्य का प्रदेश जिसे ताप्ती तथा नर्मदा नदियां सींचती है। लाट देश था। एक मत है। ताप्ती और माही के मध्य का देश लाट था। बन्धुवर्मा के मन्दसोर शिलालेख में लाट का उल्लेख मिलता है। प्रतिहार राजा कक्कुक ने लाट देश मे बहुत ख्याति प्राप्त की थी। एक ४० और मत है माही और किम नदियों के मध्य यह अंचल था। उत्तरी कोंकन और गुजरात का पुराना नाम कहा जाता है। एक मत है कि यह मध्य गुजरात का भाग है। खेडु के कर्ण के शिलालेख से मालूम होता है कि इसमें मध्य तथा दक्षिणी गुजरात क्षेत्र सम्मिलित थे। बौद्ध साहित्य दीपवंश तथा महावंश के अनुसार लाटराष्ट्र गुजरात था जिसकी राजधानी दीपवंश के अनुसार सिंह- पुर थी। पुराने राष्ट्रकूट और गुजरात के कागजा- तों से प्रतीत होता है कि लाटेश्वर देश गुजरात था। लाटेश्वर राज्य की राजधानी इलापुर थी। महाभारत अनुशासन पर्व (३५ : १७-१२) मे वर्णन आता है कि लाट एक क्षत्रिय जाति थी परन्तु ब्राह्मणों के साथ ईर्ष्या करने के कारण नीच हो गये थे। संमोह तन्त्र में (२ : ३) देशों की तालिका में लाट देश का नाम दिया है। यथा • चोल्यां (पां) चालगौश्च मलपांढ (पालश्च सिंहल। व्योक विडो व्योगश्चैव (१) का(क)र्णाटो लाट एव च॥ शक्ति संगम तन्त्र (३:७ ५५) में लाट देश का उल्लेख मिलता है। अवन्तीतः पश्चिमे तु वैदर्भाद् दक्षिणोत्तरे। लाटदेशः समाख्यातो वरारं शृणु पार्वति ॥ लाट देश उक्त उद्धरणों के आधार पर अवन्ती के पश्चिम तथा विदर्भ (वरार) के उत्तर पश्चिम ठहरता है। लाट देश अधोगामी माही तथा ताप्ती के मध्य में था। राजाओं की शक्ति एवं राज्य विस्तार के कारण यह सीमा कभी-कभी माही से और परे तक चलो जाती थी। उसने भृगुकच्छ (भड़ौच) तथा नवसारिका (नवसारी) के अंचल सम्मिलित थे। कामसूत्र (६:५:२६) के अनुसार लाट देश मालवा के पश्चिम दिशा में था। सन् १४२५ ई० के एक दक्षिणी अभिलेख से पता चलता है कि पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में कन्नडिग, तामिल, तैलंग, इयाल अर्थात् गुजरात के ब्राह्मण

३१४ राजतरंगिणी तस्मिन्प्रयाते प्राप्तेभ्यः नर्शगुम्नत्पराभवम् । नगर्यो नगनाथेभ्यश्श्रुतद्रद्त्वाचमेखलाः ॥ ३०१ ॥ ३०१. उसके चले जाने पर, पुनः लोटे, राजाओं से टूटती अटूट मेखलाओं वाली नगरियों ने उनके पराभव को कहा । काश्मीरं द्वारमापद्य श्वभ्रभ्रष्टस्य दन्तिनः । श्रुत्वा स प्रायतं घोषं तीव्रांमाश्चित्तोऽभवन् ॥ ३०२ ॥ ३०२. कश्मीर द्वार१ पहुँचने पर गर्त२ में गिरे गज३ के आर्तनाद को सुनकर वह हर्ष से रोमांचित होगया । थे। स्कन्द पुराण के पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में निम्न- लिखित ब्राह्मण वर्ग आते हैं : कर्णाटैश्चैव, तैलंगा (द्राविडा) गुर्जरा राष्ट्रवासिनः । आन्ध्राश्च द्राविडाः पंच विन्ध्यदक्षिणवासिनः ॥ कर्णाट, तैलंग, गुर्जर, आन्ध्र तथा राष्ट्रवासी (महाराष्ट्र) पाँच राष्ट्रवासियों को विन्ध्य के दक्षिण रहने वालों में गिनता है। अर्थात् दक्षिणापथ का अर्थ यही लगाया जाता था । विन्ध्य के उत्तर रहने वाले पंच गौड़ ब्राह्मण पुरों की व्याख्या स्कन्दपुराण करता है : सारस्वतः कान्यकुब्जो गौड़मैथिलउत्कलाः । पञ्चगौड़ा इति ख्याता विन्ध्यस्योत्तरवासिनः ॥ विनयचन्द्र की काव्यशिक्षा में लाट देश के ग्रामों की संख्या २१ हजार तथा गुर्जर देश की ७० हजार दी गयी है। स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में लाड किंवा लाट देश की क्रमसंख्या ३८ तथा उसके ग्रामों की संख्या भी २१ हजार दी गयी है । उसमें कच्छ की ग्राम- संख्या १४ हजार, सौराष्ट्र की ५५ हजार तथा गुजरात की ग्राम संख्या ७० हजार दी गयी है। इससे स्पष्ट है कि लाट देश का अस्तित्व प्राचीन काल में गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ से स्वतन्त्र तथा भिन्न था । लाट प्रदेश गुजरात तथा सौराष्ट्र से छोटा और कच्छ से बड़ा था। लाट तथा लाट विषय का उल्लेख प्रथम शताब्दी से सातवी तथा आठवीं शताब्दी तक भारतीय वाङ्- मय में होता रहा है । इस प्रदेश का नाम पुराण तथा महाभारत और रामायण में मुझे नहीं मिल सका है। कौटिल्य ने इसका उल्लेख किया है । लाट देश का प्रवृत्त उस लाट देश को गया था। इसमें गुजरात तथा उत्तरीथ कोंकण का अंश आ जाता था। मुदगों के काल में लाट समुद्र तथा भ्राता मगूदी आदि का उल्लेख मिलता है। लाड देश के अन्तर्गत नगरलता (भड़ोच महरच्छ) तथा ओर्देत (उज्जैन) नगर थे । ३०२. (१) द्वार : द्वार का अर्थ दर्रा या पास है। संस्कृत में दर्रों को 'संकट' कहते हैं। गोवर पास की तरह कश्मीर में दर्रे अर्थात् द्वारों की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध दिया जाता था । द्वारों पर सेना रहती थी । सुरक्षा की दृढ़ व्याख्या की जाती थी । उन्हें द्वारपति, द्वाराधिपति, द्वारपति, द्वारेश, द्वाराधिकारी तथा द्वारनायक कहा जाता था । द्वार के आधीन 'ड्रंग' अर्थात् चौकियाँ होती थी । ड्रंगाधिपति ड्रंग का नायक होता था। यह द्वाराधिप के आधीन होता था। कल्हण ने द्वार का पुनः उल्लेख रा० त० ४:४०४ ५:१३७, ८:१६१० में किया है। विशेष द्रष्टव्य है टिप्पणी १:१२२ पृष्ठ १८४ । (२) गर्त : हस्तिकंज जिसे आइने अकबरी में गलती से हस्तिवत्तर लिख दिया गया है। पीर पंजाल मार्ग पर अलियाबाद सराय से आधा मील अधोभाग में है। ∴

प्रथमतरंग ३१५ तदाकर्णनसंरम्भे सहर्षोऽथ विशुद्धधीः । शतमन्यद्गजेन्द्राणां हठेन निरलोठयत् ॥ ३०३ ॥ ३०३. उस समय विशुद्धधी, प्रसन्न उस राजा ने, उस घोष को सुनने के उत्साह में एक सौ दूसरे हाथियों¹ को बलात् गर्त² में गिरवा दिया ।

(३) गज-हाथी : वरनीयर इसी प्रकार की औरंगजेब के समय की एक घटना का वर्णन करता है, जबकि हाथी पीर पंजाल पन्तसल या पंचाल धारा पर्वत पर चढ़ रहा था, तो गर्त में गिर गया । ३०३. (१) हाथी : सुंग युन तथा कोसमस इण्डिको प्लीपुस्टेस (पृष्ठ ७९) दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि श्वेत हूणों की सेना में हाथियों का एक बड़ा भारी समूह था । सुंग युन लिखता है कि सेना में सात सौ हाथी थे। इण्डिकोप्लोपुस्टेस से प्रतीत होता है कि 'गोल्लास' (मिहिरकुल) के युद्ध में जाते समय एक सहस्र हाथी से कम उसके पास नहीं थे। (२) गर्त : हस्तिवंज : प्राचीन काल से ही यह घटना जहाँ हुई थी उसे लोग जानते हैं। इस घटना के पश्चात् से मिहिरकुल जिस मार्ग से लौटा था उसे हस्तिवंज कहने लगे थे। आइने अक- बरी में यह घटना राजतरंगिणी से ली गयी है। उसमें गलती से 'हस्तीवतर' स्थान का नाम लिखा है। काश्मीर इतिहास लेखक हैदर मलिक, नारायण कौल और बीरबल कचरू हस्तिवंज ही नाम देते हैं। उसे पीर पंजाल पर्वतमाला में ही स्थित करते हैं। स्टीन ने स्वयं सितम्बर १८६१ में इस स्थान की यात्रा की थी। उसने वहाँ स्थान तथा लोक- श्रुति का पता लगा लिया था। उसने वहाँ का विस्तृत वर्णन टोपो ग्राफी पीर पन्तसाल मार्ग जे० ए० एस० पी० १८९५ पृष्ठ ३७६ पर दिया है। पुराने मुगल मार्ग का वर्णन किया है। हूरपुर अर्थात् शूरपुर (३:२१७) से यह मार्ग कुछ दूर तक रामम्यार नदी के दक्षिण तट के साथ चलता है। फिर मार्ग यह ऊँचाई पार करता वाम अथवा उत्तरी तट पर चलता पुरानी मुगल सराय जिसे 'अलियाबाद' कहते हैं पहुँचता है। दक्षिणी पार्श्व के संकुचित मार्ग के दूसरी तरफ लगभग आध मील अलियाबाद के अधो- भाग में एक ऊँची पर्वतीय ऊर्ध्व भूमि मिलती है। वहाँ से कगार की चट्टान ढालुआ होती नदी के पेटा में मिल जाती हैं। यह झुकी हुई ऊर्ध्वभूमि हस्तिभंज का स्थान कहा जाता है। यहाँ के सभी लोग इस बात को दुहराते हैं। एक राजा का हाथी यहाँ से नीचे खड्ड में गिर गया था। राजा का नाम उन्हें नही मालूम है। हाथी स्वयं गिरा था। अथवा गिरा दिया गया था। यह भी उन्हें मालूम नहीं है। अकबर के सड़क बनवाने के पहले मार्ग हस्तिवंज टीले पर से रामम्यार नदी के दक्षिण तट से जाता था। आइने अकबरी में अबुल फजल भीमबर से काश्मीर के अनेक मार्गों का वर्णन करता है। वह हस्तिवंज (हस्तिवतर) का उल्लेख अलग करता है (२:७१३०)। यह पूर्वकालीन मार्ग था। अकबर की सेना इसी मार्ग से काश्मीर पहुँची थी। पीर पंतसल का मुगल मार्ग जो पोसियाना तथा यहराम गल्ला होकर जाता है वह दक्षिण से उस मार्ग से मिलता है। जो नन्दन सर के पास से दुरहाल दर्रा होता राजोरी जाता है। यहाँ से दक्षिण का मार्ग सीधा पड़ता है। इस मार्ग का लोग अब भी प्रयोग करते हैं। सन् १८४४ तथा १८१९ में सिक्खों ने अपने सैनिक अभियान के लिये इसी मार्ग को चुना था। यह मार्ग रामम्यार नदी के दक्षिण ओर हस्तिवंज के ऊपर होकर जाता है। इस प्रकार नदी पार नहीं करना पड़ता। सीमान्त प्राचीन द्वार अथवा डम्म का स्थान क्रमावर्त में था। (रा० त० ३:२२७)। इस स्थान

३१६ राजतरंगिणी

को स्टीन ने कामरेन क्रीट से पहचाना है। यह वर्तमान द्वार स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण में है। हस्तिवंज से लगभग ३ मील नीचे अर्थात् अधोभाग में है। इससे प्रगट होता है कि पुराना द्वार जिसका उल्लेख श्लोक २०२ में कल्हण ने किया है। उसी दिशा में रहा होगा।

हस्तिवंज जिस मार्ग से पार किया जाता है। यह ऊँचाई पर चढ़ता, धान वाले ढाल से पूर्व की ओर टाँके के पश्चिम पड़ता है। आज भी इस उपे- क्षित मार्ग पर जानवरों पर सामान लादकर ले जाया जा सकता है।

हस्त्यंज नाम से ही प्रकट होता है। स्थान का सम्बन्ध हस्ती अर्थात् हाथियों से रहा होगा। पर्शियन वृत्तान्तरो से पता चलता है। 'वंज' शब्द का अर्थ 'गमन' अर्थात् चलना है। पश्चिमी पंजाबी में वंज माने 'चलना' आज भी प्रयुक्त होता है।

अलिहाबाद सराय श्रीनगर से ४६ मील दूर होगी। पीर पंतशाल या पंजाल दर्रा (संकट) के पड़ाव का स्थान है। मुगलों के समय यह सराय थी। आश्रय प्रदान का काम करती थी। जंगल में है। शीतकाल में हिमाच्छादित हो जाता है। समुद्र की सतह से ११८०० फुट ऊँचा है।

मनीपर्त्ती पर्वत शिखर लगभग १६००० फुट ऊँचा है। कोसर नाग दर्रे पर स्थित कश्मीर की सबसे बड़ी झील है।

इसका प्राचीन नाम क्रमोत्सर है। शिखर का नाम कौन्सरंग है। कोसरंग तीर्थ का वर्णन महाभारत के वन पर्व १८४:५० में दिया गया है। इस शिखर पर मत्स्य भगवान् के सींग से बाँधकर नौका सत्यव्रतो ने बाँधा था। यह शिखर बनिहाल की पश्चिम दिशा में है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, - तीन शिखर हैं। सबसे सबसे ऊँचा शिखर १५५३३ फुट है। इसी प्रसिद्ध कौन्सरा तीर्थ है।

बसुदेव चरित्र के अनुसार तथा हरदत्त सूरी के मत से कथा मिलती है। नाव से दुष्टों प्राणियों के संहार से रक्षा निमित्त उत्पन्न हुई थी। 'महाभारत वन पर्व १८४:५०, नीलमत ३३, हरचरित चिंतामणि ४:२७, ग्रोवर १:१७४, सर्वविस्तार ३:४,१२; ४:१७४, नौबन्धन माहात्म्य )

यह समुद्र की सतह से १३००० फुट ऊँचाई पर है। झील दो मील लम्बी है। झील के चारों ओर हिमालय की अत्यन्त शोभनीय पर्वतमालाएँ तथा शिखर हैं। उनमें ३ शिखर १५००० फुट ऊँचे हैं। वे कौसर नाग सर को जैसे निरन्तर नीचे की ओर देखती रहती हैं। 'पंचाल' ईरानी शब्द है। कश्मीरी में उसे पंतसल कहते हैं। इसका अर्थ होता है यात्रियों के लिए जल का प्रबन्ध । 'पोतला' अथवा 'पौसरा' से इस शब्द का मेल खाता है। पोतला, पोसरा, प्याऊ, सबील, एक ही शब्द के समानार्थक भिन्न नाम हैं। उनका सम्बन्ध पानी से है। पंचाल शब्द के लिए पन्तशाल शब्द का प्रयोग किया गया है। पंचाल महाभारत में एक जनपद के लिए प्रयुक्त किया गया है। (भीष्म पर्व ९ ४१ १८४७)

मैंने इस स्थान को देखा है। यदि ऊपर अर्थात् भारत से आने वाले मार्ग से श्रीनगर की ओर चला जाय तो इस अंचल का सर्व प्रथम प्राचीन स्थान पुष्यान्नाद मिलेगा। यह वर्तमान पूशियान है। तत्पश्चात् पंचाल धारा पड़ेगी। अनन्तर हस्तिवंज और फिर उसके बाद उतराई पर क्रमावर्त्त, द्रग एवं शूरपुर पड़ेगा। शूरपुर को आज कल हुरपूर कहते हैं। तत्पश्चात् प्राचीन दे- ग्राम, नगछोल, मिनार और शुपियान पड़ता है। शुपियान के पश्चात् श्रीनगर और विजयेश्वर तक समथर भूमि मिलने लगती है।

अलिहाबाद सराय रामम्यार नदी के वाम तट पर खड़े ऊँचे पहाड़ के मूल में स्थित है। नवम्बर से अप्रैल तक तुषार से ढँका रहता है। यहाँ उस समय कोई नहीं आता। यह उजड़े, निर्जन स्थान में उपेक्षित पड़ा है। यात्रियों का निवास स्थान प्रवेश द्वार से दूसरी तरफ के आहाते के पश्चिम पार्श्व में है। इमारत भयंकर रूप में गंदी है। उसमें गिरती

[Page Header] प्रथम तरंग ३१७

[Column 1] तथा दरवाजे तक नही लगे हैं । सराय की अपेक्षा इसे अस्तबल कहना ठीक होगा । फिर भी तूफान में इससे रक्षा की जा सकती है । यह इतना ठण्डा तथा डरावना है कि यहाँ पर किसी प्रकार का सामान नही मिलता । सराय के चारो तरफ कैम्प लगाने लायक स्थान हैं । नदी के तट के समीप यहाँ हैजे द्वारा सन् १८७६ मे मरे अल्फ्रेड जान बले एस० डी० की कब्र है । इस सराय पर पहुचने के पूर्व रामम्यार नदी के दक्षिणी तट परे एक स्रोतस्विनी इससे मिलती है । उसे लद्दी नाला कहते हैं । इसके तट से मार्ग नन्दन सर तथा भगसर को जाता है । इन सरों मे राजोरी से दरहल दर्रा से होकर पहुंचा जा सकता है । वहा दो-तीन पडाव डाल कर पैदल पहुंचा जाता है । यहा जाने के लिए बरमगल्ला या पोशियन या हुर- पुर से सामान आदि ले लेना चाहिए । रावलपिण्डी से आने वाले मार्ग पर यह कश्मीर उपत्यका के सबसे समीपवर्ती पडने वाले सर हैं । बड़ी ऊँचाई पर होने के कारण स्थान शीतल, पथरीला तथा रहने योग्य नही है । कठिनता से जलोनी लकड़ी मिलती है । यहा कुछ उपज नही होती । कस्तूरी मृग अलियाबाद सराय के ऊँचे पर्वती स्थानों में मिलते हैं । अलियाबाद में यात्रियो को नही ठहरना चाहिए । सराय से ६ मील दूर शंखोद में ठहरना चाहिए । कैम्प लगाने लायक स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण तट पर मिल जाता है । यहाँ से सुपियान एक दिन मे आया जा सकता है । कैप्टन नाइट ने सन् १८६० जून २७ में यहा की यात्रा की थी । वह अपनी पुस्तक में लिखता है—दो मील दर्रा से नीचे उतरने पर अलियाबाद सराय मिली । वहा पर रहने लायक एक भाग था जिससे एक फकीर या मुल्ला रहता था । और एक युवक बंगाली तोपची जो शिकार खेलने आया था रहता था ! लगभग मध्याह्न काल मे पानी बरसने लगा । वहाँ एक कष्टप्रद रूम में बचाव के

[Column 2] लिए गया । वहाँ की फर्श सीलन से भरी थी । वहाँ पत्थर के बहुत ही सुन्दर संगतराशी की एक खिडकी थी । वहाँ की शेष इमारतों से वह मेल नही खाती थी । सराय के बीच में हरा जल से भरा एक गड्डा था । पृष्ठ ७१ डब्ल्यु०डब्ल्यु० अल्फ्रेड (१८७५) संक्षेप मे केवल इतना कहता है । पोशियन से अलियाबाद सराय आया जाता है । दोनो के मध्य में दूरी ११ मील है । एक दिन मे मार्ग खत्म किया जा सकता है । मुख्य दर्रा पीर पंजाल का यहाँ से पार किया जाता है । वह ऊँचो और खडी चढ़ाई है । चढाई ऊँचाई पर टेढा मेढा घोर पहाड का किनारा काटकर कर मार्ग बनाया गया है । मार्ग काफी अच्छा है । परन्तु कही कही पर बडे बड़े पत्थरों के ढोको और असम्बन्धित पत्थरो के कारण उवड खाबड है । मुझे बड़ा आश्चर्य मालूम होता था कि कैसे खच्चूँ । खच्चड लदे हुए एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर बिल्ली की तरह कूदने हुए चलते थे । ऊपर की चढ़ाई धीमी पड़ जाती है । पेत- शिया से प्रस्थान करने पर चार घण्टे में शिखर पर पहुँचते हैं । जहाँ से पाशियाना ६ मील पीछे छूट जाता है । शिविर उतराई क्रमश: सरल दूर्वाच्छादित प्लेटो पर से आरम्भ हो जाती है । ५ मील लम्बा तथा आठ मिल चौड़ा मार्ग ५ मील चलकर अलियाबाद सराय पहुंचा देता है । यह यात्रियों के लिए एक साधारण आश्रम स्थान है । यह एकाकी एक निर्जन स्थान में खडा है । वर्ष के अधिक महीनो में वह वीरान पड़ा रहता है । क्योकि बर्फ के कारण यहाँ पहुँचना कठिन हो जाता है । बादशाह ( औरंगजेव ) पीर पंजाल पर्वत पर चढ रहे थे । वह पहाडो में सबसे ऊँचा था । वहाँ से कश्मीर का दृश्य मिल जाता है । बादशाह के पीछे हाथियो की लम्बी कतार थी । जिनमें महिलाएँ थी । हौदों तथा अम्बारियो में बैठी थी । पहला हाथी लम्बी चढ़ाई देखकर भयभीत हो गया । वह पीछे

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[Header] प्रथम तरंग ३१७

[Left Column] तथा दरवाजे तक नहीं लगे हैं। सराय की अपेक्षा इसे अस्तबल कहना ठीक होगा। फिर भी तूफ़ान में इसमें रक्षा की जा सकती है। यह इतना ठण्डा तथा डरावना है कि यहाँ पर किसी प्रकार का सामान नहीं मिलता। सराय के चारों तरफ कैम्प लगाने लायक स्थान है। नदी के तट के समीप यहाँ हैजे द्वारा सन् १८७६ में मरे अल्फ्रेड जान वले एस० टी० की कब्र है। इस सराय पर पहुंचने के पूर्व रामम्बार नदी के दक्षिणी तट परे एक स्रोतस्विनी इससे मिलती है। उसे लट्टी नाला कहते हैं। इसके तट से मार्ग नन्दन सर तथा भगसर को जाता है। इन सरों में राजौरी से दरहल दर्रा से होकर पहुंचा जा सकता है। वहां दो-तीन पड़ाव डाल कर पैदल पहुंचा जाता है। यहां जाने के लिए बरमगल्ला या पोशियन या हुर- पुर से सामान आदि ले लेना चाहिए। रावलपिण्डी से आने वाले मार्ग पर यह कश्मीर उपत्यका के सबसे समीपवर्ती पड़ने वाले सर हैं। बड़ी ऊंचाई पर होने के कारण स्थान शीतल, पथरीला तथा रहने योग्य नहीं है। कठिनता से जलोनी लकड़ी मिलती है। यहाँ कुछ उपज नहीं होती। कस्तूरी मृग अलियाबाद सराय के ऊँचे पर्वतीय स्थाना में मिलते हैं। अलियाबाद में यात्रियों को नहीं ठहरना चाहिए। सराय से ६ मील दूर शादीद में ठहरना चाहिए। कैम्प लगाने लायक स्थान रामम्बार नदी के दक्षिण तट पर मिल जाता है। यहाँ से सुपियान एक दिन में जाया जा सकता है। कैप्टन नाइट ने सन् १८६० जून २७ में यहां की यात्रा की थी। वह अपनी पुस्तक में लिखता है—दो मील दर्रा से नीचे उतरने पर अलियाबाद सराय मिली। वहां पर रहने लायक एक भाग था जिसमें एक फकीर या मुल्ला रहता था। और एक युवक बंगाली तोपची जो शिकार खेलने आया था रहता था ! लगभग मध्याह्न काल में पानी बरसने लगा। वहीं एक कष्टप्रद रूम में बचाव के

[Right Column] लिए गया। वहाँ की फर्श सीलन से भरी थी। वहाँ पत्थर के बहुत ही सुन्दर संगतराशी की एक खिड़की थी। वहाँ की शेष इमारतों से वह मेल नहीं खाती थी। सराय के बीच में हरा जल से भरा एक गड्ढा था। पृष्ठ ७१ डब्ल्यू०डब्ल्यू० अटर्केड (१८७५) संक्षेप में केवल इतना कहता है। पोशियन में अलियाबाद सराय जाया जाता है। दोनों के मध्य में दूरी ११ मील है। एक दिन में मार्ग खत्म किया जा सकता है। मुख्य दर्रा पीर पंजाल का यहाँ से पार किया जाता है। वह ऊंची और खड़ी चढ़ाई है। चढ़ाई ऊंचाई पर टेढ़ा मेढ़ा घोर पहाड़ का किनारा काटकर कर मार्ग बनाया गया है। मार्ग काफी अच्छा है। परन्तु कहीं कहीं पर बड़े बड़े पत्थरों के ढोंकों और असम्बन्धित पत्थरों के कारण उबड़ खाबड़ है। मुझे बड़ा आश्चर्य मालूम होता था कि कैसे रहूँ। खच्चड लदे हुए एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर बिल्ली की तरह कूदते हुए चलते थे। ऊपर को चढ़ाई धीमी पड़ जाती है। पेत- शिया से प्रस्थान करने पर चार घण्टे में शिखर पर पहुँचते हैं। जहाँ से पोशियाना ६ मील पीछे छूट जाता है। शिविर उतराई क्रमशः सरल दूर्वाच्छादित प्लेटो दर से आरम्भ हो जाती है। ५ मील लम्बा तथा आठ मील चौड़ा मार्ग ५ मील चलकर अलियाबाद सराय पहुँचा देता है। यह यात्रियों के लिए एक साधारण आश्रम स्थान है। यह एकाकी एक निर्जन स्थान में खड़ा है। वर्ष के अधिक महीनो में वह वीरान पड़ा रहता है। क्योकि बर्फ के कारण यहाँ पहुँचना कठिन हो जाता है। वादशाह (औरंगजेब) पीर पंजाल पर्वत पर चढ़ रहे थे। वह पहाड़ों में सबसे ऊँचा था। वहाँ से कश्मीर का दृश्य मिल जाता है। बादशाह के पीछे हाथियों की लम्बी कतार थी। जिनमें महिलाएँ थीं। हौदों तथा अम्बारियो में बैठी थी। पहला हाथी लम्बी चढ़ाई देखकर भयभीत हो गया। वह पीछे

३१८ राजतरंगिणी

हटा । उनके पीछे हटने पर पीछे वाले हाथी अपने पीछे वाले हाथी को धक्का दिये । इस प्रकार हट जाने के कारण पंक्ति में हाथियों ने अपने पिछले आने वाले को हटात् धक्का दिया । वहाँ चढ़ाई और मार्ग पतला था । घूम न सकने के कारण उस घबड़ाहट में १५ हाथी ऊँची चढ़ाई से नीचे गिर गये । उन पर बशी स्त्रियों में तीन मर गई । शेष इस लिए बच गयी कि वहाँ चढ़ाई बहुत ऊँची नहीं थी । हाथियो को बचाने का कोई उपाय नहीं था । हाथी जब अच्छी सड़क पर गिर जाते हैं उस समय भी उन्हें उठने में कष्ट होता है । हाथियों के गिरने के दो दिन पश्चात् हम लोग इस मार्ग से गुजरे । मैंने उन गरीब हाथियों को देखा कि उनमें कुछ अभी भी गूँड हिला रहे थे । बादशाही फौज जो एक ही पंक्ति से इस मार्ग से जा रही थी उसे बहुत असुवि- धाओं का सामना करना पड़ा था । शेष दिन तथा रात गिरे स्त्रियों तथा सामान बचाने मे लगाया गया।

हमें तीन चीजें स्मरण रहेंगी जब हम यहाँ से आ रहे थे । पहला तो यहाँ गरमी तथा ठंडक दोनों ऋतुओं का अनुभव एक ही घण्टा के बीच में हुआ । चढ़ते समय बड़ी धूप लगी और पसीना आने लगा । चोटी पर पहुँचने हो जमा बर्फ मिला । बर्फ काटकर जाने वाली फौज ने रास्ता बना दिया था । कुछ पानी वरसने लगा था । शरीर को चुभने वाली ठण्डी हवा चलने लगी थी ।

दूसरी चीज यह थी कि २०० कदम के बीच ही दो दिशाओं से एक साथ हवा चल रही थी । चोटी पर चढ़ने के समय यह उत्तर से बह रही थी । जब मैं उतरने लगा तो वह पीठ की तरफ अर्थात् दक्षिण से बहने लगी ।

तीसरी चीज यहाँ पर मुझमे एक फकीर से भेंट हुई । यह जहाँगीर के समय से यहाँ की चोटी पर रहता था । उसके धर्म के विषय में नहीं कहा जा सकता था कि वह किस धर्म का अनुयायी था। कहा जाता था कि वह अलौकिक बातें करता था । वह विचित्र बिजली पैदा कर देता था । हवा का तूफानं चला देता था । वह तुषार तथा वर्षा तक करा देता था ।

उसकी सफेद और घनी दाढ़ी बहुत लम्बी थी । वह बड़ी रुखाई तथा कड़ाहट के साथ भीख माँगता था । वह देखने में जंगली मालूम होता था । यह यात्रियो के एक पत्थर पर रखे गये कतार में मिट्टी के वरतन से पानी पी लेने के संकेत के साथ जल्दी से जल्दी चुपचाप चोटी छोड़कर चले जाने का इशारा करते हुए वहाँ ठहरने के लिए हाथ से मना करता था । वह उन लोगों पर बड़ा गुस्सा होता था जो हल्ला करते थे । मैं उसको गुफा में गया । आधा रुपया उसके हाथ पर रखा । उसको देखा कि मुखाकृति पर कुछ कोमलता आई है । उसने मुझे बताया कि यहाँ हल्ला करने से बड़ी भयंकर आंधी आती है । औरंगजेव ने उसकी सलाह पर बुद्धिमानी से काम लिया । फौज को जरदो तथा चुपचाप चले जाने का आदेश दिया । उसका पिता शाहजहाँ भी इसी प्रकार विवेक से काम लेता था। जहाँगीर ने एक बार उसके कहने के अनुसार काम नहीं किया और झाँझ तथा तुरही बजवाया । वह बड़ी कठिनता से विनाश होने से बच पाया । पृष्ठ ४०८-४१०

पुस्तक का सम्पादक इस पर नोट लिखता है कि आज कल भी कश्मीर के पर्वतों की चोटी पर स्थित पवित्र स्थानों पर यात्रा करने वाले मन्त्रादि तथा प्रार्थना नही करते जब कि वे बर्फ के किनारे पहुँचते हैं । क्योंकि वाणी की प्रतिध्वनि के अवालांच को अस्थिर कर देता है और उसके लपेट में कितने ही नर नारी नष्ट हो जाते हैं । नोट पृष्ठ ४१०

उक्त वर्णित फकीर की मजार सम्भवतः दरों की चोटी पर है । यहाँ बहुत यात्री अब भी आते हैं । कश्मीरी बहुत दूर से लाश दफनाने के लिए यहाँ लाते हैं। आज भी अठ्ठाहवे वॉच टावर के पास एक फकीर दिखाई पड़ता है । वह दर्रा की चोटी पर रहता है। यह यात्रियों को धूप, पानी तथा आवश्यक सामान देता है । नोट पृष्ट ४०९

प्रथम तरंग ३१९ स्पर्शोऽङ्गानि यथा वाचं कीर्तनं पापिनां तथा । संदूषयेदतो नोक्ता तस्यान्याऽपि नृशंसता ॥ ३०४ ॥ ३०४. जिस प्रकार पापियों का स्पर्श अंगों को दूषित करता है, उसी प्रकार पापियों का कीर्तन वाणी को सन्दूषित करता है। अतएव उसकी अन्य नृशंसता का वर्णन नही किया गया है। को वेत्त्यद्भुतचेष्टानां कृत्यं प्राकृतचेतसाम् । धर्मं सुकृतप्राप्तिहेतोः सोऽपि यदाददे ॥ ३०५ ॥ ३०५ अद्भुत चेष्टा करने वाले सामान्य चेतस प्राणियों के कृत्य को कौन जान सकता है, जबकि वे भी सुकृति प्राप्ति हेतु धर्म का आश्रय लेते हैं । श्रीनगर्यां हि दुर्बुद्धिर्विदधे मिहिरेश्वरम् । होलाडायां स मिहिरपुराख्यं पृथुपत्तनम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. उस दुर्बुद्धि राजा ने श्रीनगर में मिहिरेश्वर¹ तथा होलाडा² में मिहिरपुर³ नामक महा नगरों की स्थापना की।

आईने अकबरी में भी यह कहानी दी गयी है । मिहिरकुल लज्जाहीन क्रूर राजा था । स्वर्ग ने उसे इजाज़त नही दी थी कि वह काफी फतह करे । एक बार जब यह पर्वत से हस्तीवत्तर स्थान पर उतर रहा था तो एक हाथो फिसल कर गर्त में चला गया । मृत्युमुख कष्ट में पड़े हाथी का आर्तनाद सुनकर मिहिरकुल प्रसन्न हो गया । तुरन्त आदेश दिया कि एक सौ हाथी और उस स्थान पर ढकेल दिए जाएँ । बह क्रूर राजा उन हाथियों का करुण क्रन्दन सुनकर आनन्द विभोर हो उठा । वरनीयर कहता है कि औरंगजेब जब कश्मीर जा रहा था तो इस स्थान पर १५ हाथी नीचे गिर कर मर गये । विचित्र बात है कि सुंग-युन तथा यूनानी लेखक कोसमस दोनों ही हूणों की सेना में विशाल हाथीवाहिनी का वर्णन करते हैं । सुंगयुन सशस्त्र सुसज्जित ७०० शिक्षित हाथियों का वर्णन मिहिरकुल की सेना में करता है । कोसमस ने गोल्ला को युद्ध पर एक हजार से कम हाथियों के साथ जाते नही बहुता । पीर पंजाल का प्राचीन नाम पंचाल धारा है। यह कश्मीर को दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर स्थित है।

निम्नलिखित उल्लेख नीलमत पुराण में इसके सन्दर्भ मे आता है : तदा स्थापयते राजंस्तां च नावं जगद्गुरुः । मत्स्यरूपधरो विष्णुः शृङ्गे कृत्वापकंपयति ॥ आकृष्य नावं तां देवस्तस्मिन्पर्वतमस्तके । बद्ध्वा व्रजति भूपाल हाभिज्ञातां तद्गतिम् ॥ इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमं । नौबन्धनमिति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥ ६०-६३: 39-41 नानेतान् शिखरान्पश्य महाविष्णुमहेश्वरान् । नौबन्धशिखरं यत्तु स एव नृप शंकरः ॥ क्षेमेन्द्र कवि ने समयमातृका में वर्णन किया है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३०५ में 'वेत्यद्भुत' का पाठभेद 'वेत्युद्वृत्त' मिलता है । श्लोकसंख्या ३०६ में 'होलाडाया' का पाठभेद 'होलाढायां', 'होलाह्लायां', 'होलडाया' तथा 'होलाट्टायां' मिलता है।

३२० राजतरंगिणी अग्रहारानगृह्णिरे गान्धाराब्राह्मणास्ततः । समानशीलास्तस्यैव ध्रुवं तेऽपि द्विजाधमाः ॥ ३०७ ॥ ३०७. उसके समान शील वाले, ये द्विजाधम गान्धार¹ ब्राह्मणों ने उस राजा से अग्रहार ग्रहण किया । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ३०६ (१) मिहिरेश्वर : यह मन्दिर कहीं था श्लोकसंख्या ३०७ में 'गान्धारश्रा' या पाठभेद कुछ पता नहीं चलता । राजा मिहिरकुल ने अपने 'गान्धाराश्रा', मिलता है । नाम पर मिहिरेश्वर की स्थापना की । इससे पता ३०७ (१) गान्धार : काबुल उपत्यका या चलता है कि वह पूर्णतया शिवभक्त था । गान्धार एक प्रदेश था । इसमें अप्रहार, लम्बक (लघमान) कपिशा (काबुल तथा कोहिस्तान का उत्तरी (२) होल्हडा : प्राचीन हाल्दा अंचल अवन्तीपुर भाग) तथा पुरुषपुर (पेशावर) सम्मिलित थे । के दक्षिण दिशा में है। इसके पूर्व कटिहा, अवच्छेद, गान्धार के ब्राह्मणों का वर्णन महाभारत के वर्ण गोल तथा उत्तर में पर्वत और पश्चिम में वितस्ता पर्व में आता है। उनका वर्णन पंजाब के ब्राह्मणों के नदी पड़ती है। होलडा क्षेत्र इस समय वुलर साथ उनके मसनातनी आचार के सम्बन्ध में किया परगना नाम से विख्यात है । काश्मीर उपत्यका में गया है । महाभारत की बातो का ही समर्थन कल्हण वितस्ता के उत्तर- पूर्व दक्षिणत्तर तथा वीही परगना के वर्णन से मिलता है । कल्हण उन्हें द्विजाधम कहा के बीच में स्थित है । इसका प्रशासकीय केन्द्र थाल है। महाभारत काल में भी गान्धार ब्राह्मणों के है । लार अर्थात् लोहर तथा देवसर के सम्बन्ध में आचार उत्कृष्ट नही माने गये थे और लगभग ३ इसका पुनः उल्लेख आया है । रा० त० ८:३११५ । हजार वर्ष पश्चात् कल्हण ने उनकी निन्दा दूषित तरग ७।१२२८ के श्लोकों से प्रकट होता है कि यह तथा क्रूर मिहिरकुल द्वारा किए गए दान लेने के मदव राज्य मे था । मदव राज्य मराज़ है । काश्मीर कारण किया है । काश्मीर के ब्राह्मणों ने सम्भवतः उपत्यका का पूर्वीय भाग है। इसका स्थान रा० त० पापी तथा दुरात्मा के हाथों द्वारा प्रदत्त पाप धन रूप ८:१४३० के वर्णन से और स्पष्ट हो जाता है । राजा दान लेना अस्वीकार किया था । अतएव गैर जयसिंह के दो अधिकारी होल्डा के विद्रोही डामरों काश्मीरी अर्थात् गान्धार के ब्राह्मणों को दान देने की द्वारा घेर लिये गये थे । यह स्थान अवन्ति स्वामी का बात कहकर कल्हण काश्मीरी ब्राह्मणों के चरित्र की मन्दिर था । अवन्तीपुर मे था । अवन्तीपुर उत्तर पर- गौण रूप से प्रशंसा करता है । गना में है । रा० तरंगिणी (८:७३३,२८०८,३११५) नीलमत पुराण में गान्धार देश का उल्लेख से और समर्थन मिलता है । होलडा के डामर खूद्यवी मिलता है : अर्थात् खुव के डामरों के साथ दिखाये गये है । खुव दर्वाभिसार गन्धार जुहुण्डुङ्गास्त्वान खशान् । वीही परगना के समीप था । जोनराज के वर्णन तंगणान् माण्डवान् मद्रांश्चन्तर्गिरि बहिर्गिरीन् ॥ (श्लोक सं० ५४८) से मालूम होता है । ४०:५२२ (३) मिहिरपुर . स्थान का पता नहीं चला है । दार्वीभिसारगान्धारजालन्धरशका रसाः । इस नाम तथा इससे मिलते किसी अपभ्रंश नाम का तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिः बहिर्गिरिः ॥ कोई स्थान अभी तक नहीं पाया जा सका है । १३9:१८२

प्रथम तरंग ३२१ मेघागमः फणिभुजं प्रथितन्धकारः प्रीणाति हंसममलो जलदात्ययश्च । प्रीतेः समानरुचितैव भवेन्निमित्तं दातुः प्रतिग्रहकृतश्च परस्परस्य ॥ ३०८ ॥ ३०८. घोर अन्धकार वाले मेघ का आगमन मयूर को तथा जलद का निर्मल अन्त हंस को प्रसन्न करता है। क्यों कि दाता एवं ग्रहीता की समान रुचि ही परस्पर प्रेम का कारण होती है। स वर्षसप्ततिं भुक्त्वा भुवं भूलोकभैरवः । भूरिरोगादितवपुः प्राविशज्जातवेदसम् ॥ ३०६ ॥ ३०६. वह भूलोक भैरव सत्तर वर्ष भूमि का भोग करके अत्यधिक रोग ग्रस्त होकर, अग्नि में प्रवेश किया। सोऽयं त्रिकोटिहा मुक्तो यः स्वात्मन्यपि निर्घृणः । देहत्यागेऽस्य गगनादुच्चचारैति भारती ॥ ३१० ॥ ३१०. इसके शरीर त्यागने पर गगन से यह भारती उच्चरित हुई—'त्रिकोटिहन्ता वह मिहिरकुल मुक्त हो गया, जिसने अपने शरीर पर भी दया नहीं की।'

उरुचः श्रोक्रणो वायुः शुक्लो मध्वणो यमः । मण्डक नासो गन्धारो नागः शूर्पारकिर्ध्वनिः ॥ 894:१०६४ विशेष द्रष्टव्य है-'गन्धार' पृष्ठ १०६ टिप्पणी श्लोक १:६५ पाठभेद : श्लोक संख्या ३०८ में 'त्ययश्च' का 'त्ययस्य' 'निमित्तम्' का 'नितान्तं' तथा 'ग्रहकृतश्च' का पाठभेद 'ग्रहहृतश्च' मिलता है। ३०९.(१) भूलोकभैरव : अष्ट भैरव निर्दिष्ट हैं, उनके नाम हैं—असितांग, रुद्र, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कुरुपति किंवा कपालिन्, भीषण एवं संहार। भैरव की गणना रुद्र गणों में होती है। भैरव वाराणसी नगर के क्षेत्रपाल (कोतवाल) हैं। लिंग पुराण वीरभद्र को ही भैरव का रूप मानता है। कालिका पुराण में भैरव स्तोत्र नामक मंत्र की विस्तृत व्याख्या उपलब्ध है। उसके अनुसार वारा- णसी अमुरभिध्यात राजा विजय भैरव का वंशज ४१ था। उसने खाण्डवी नगर को विध्वस्त कर खाण्डव वन निर्माण किया था। (कालिका पुराण ९२)। भैरव की उत्पत्ति की कथा लिंग पुराण (१:९८) में दी गयी है। एक समय विष्णु तथा ब्रह्मा गर्वोद्धत होकर भगवान् शंकर का अपमान करने लगे। शिव क्रुद्ध हुए। एक अत्यन्त भयानक शिवगण को उत्पन्न किया। वही भैरव हैं। उत्पन्न होते ही वाम कर की उंगली के नख से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट डाला। ब्रह्मा ने अपने पाँचवें मुख से शिव की निन्दा की थी। अतएव उसे ब्रह्म हत्या का पातक लग गया। शिव ने ब्रह्मा का कपाल भैरव को थमा दिया। आदेश दिया कि कपाल में भिक्षा मांगो। साथ ही शंकर ने ब्रह्म हत्या से एक स्त्री का निर्माण किया। और उसे भैरव का अनुकरण करने का आदेश दिया। अन्ततोगत्वा वाराणसी क्षेत्र में प्रवेश करने पर इसकी ब्रह्म हत्या दूर हो गयी। तत्पश्चात् ब्रह्मा का कपाल भैरव के हाथ से गिर गया। जिस स्थान पर

३२२ राजतरंगिणी इत्युचुर्यै मते तेषां स एव परिहारदः । खण्डयन्वीतघृणतामग्रहारादिकर्मभिः ॥ ३११ ॥ ३११. जो लोग इस प्रकार कहते थे, उनके मन मे था। परिहार देने वाले, उसी राजा ने अपनी निर्दयता को, अग्रहारादि कर्मों द्वारा खण्डित कर दिया था। आक्रान्ते दारदैर्भोट्टै म्लैच्छैरशुचिकर्मभि । विनष्टधर्मे देशेऽस्मिन्पुण्याचारप्रवर्तनम् ॥ ३१२ ॥ ३१२. दरदों, १ भोट्टों, २ म्लेच्छों ३ तथा अन्य अशुचि कर्मों द्वारा आक्रान्त इस विनष्टधर्म देश में उसने पुण्याचार का प्रवर्तन किया ।

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[बायाँ कॉलम] गिर गया उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं । ( शिव० शत: ८ तथा स्कन्ध पुराण ३:१:२४) । [बायाँ कॉलम] भैरवी यातना काशी में एक प्रचलित शब्द है। काशी में मृत व्यक्ति को भैरव दो घड़ी में यातना देकर उसे मुक्ति दे देते हैं। इसी के आधार पर कहा जाता है कि काशी में मरने से मुक्ति होती है। [बायाँ कॉलम] कल्हण ने भू-लोक भैरव मिहिरकुल को कहा है। वह इतना भयंकर था कि काल स्वरूप भैरव तुल्य था। इस भूमि का अर्थात् मानव रूप यह भैरव था। [बायाँ कॉलम] पाठभेद : [बायाँ कॉलम] श्लोक संख्या ३१० में 'गगना' का पाठभेद 'गद्यना' मिलता है। [बायाँ कॉलम] ३१०. (१) भारती : इसका शाब्दिक अर्थ सरस्वती, वाणी, तथा वाणी की अधिष्ठात्री है। यहाँ पर कल्हणने आकाश वाणी के अर्थ में प्रयोग किया है। वह वाणी जो सुनाई पड़ती है। परन्तु कहने वाला दिखाई नहीं पड़ता । [बायाँ कॉलम] ३११. (१) खण्डित : दान की महिमा का वर्णन कल्हण यहाँ करता है। दान के द्वारा मिहिरकुल के नृशंस एवं निर्दयता पूर्ण कार्यों के दोषों किंवा पापों का मोचन हो गया था। यदि मिहिरकुल ने क्रूरता की तो उसने उपकार भी किया था। कल्हण उसके गुण एवं अवगुण दोनो चरित्रो का यहाँ चित्रण करता है ।

[दायाँ कॉलम] पाठभेद : [दायाँ कॉलम] श्लोक संख्या ३१२ में 'भोट्टै' का पाठभेद 'भोंट्टै' तथा 'भोट्टै' मिलता है। [दायाँ कॉलम] पादटिप्पणियाँ : [दायाँ कॉलम] ३१२. (१) दरद : कल्हण वर्णित दरद जाति आधुनिक दरद है। ये आर्य जातीय हैं। प्राचीन यूनानी लोगों को उनका ज्ञान था। ये इस समय भी सिंधु नदी के पश्चिम चित्राल और यासीन से गिलगिट, चिलास, बुंजी तथा कृष्णगंगा की उपत्यका में रहते हैं। उनका निवास स्थान काश्मीर के उत्तर दिशा में है। (रा० त० ७:११७१ तथा ८:२७०९) दरद के कुछ ग्रामों में विचित्र प्रथा है। धर्म परिवर्तन बहुत होता रहता है। बौद्ध माता-पिता का पुत्र मुसलमान और मुसलमान माता-पिता का पुत्र बौद्ध धर्मावलम्बी हो जाता है। इस ओर के दरदो में किसी भी धर्म के प्रति विशेष आस्था नही है। [दायाँ कॉलम] यूनानी इतिहास लेखक हिरोडोट्स के समय से आज तक दरदो के निवास स्थानों में सम्भवतः कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह कश्मीर की उपत्यका के उत्तरीय पर्वत माला में सुदूर पडता है। [दायाँ कॉलम] (२) भौट्ट : तिब्बत वंशीय जाति है। कश्मीर के पूर्व तथा पूर्व-उत्तर अर्थात् वर्तमान काश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र रुद्दाख पास तथा कुछ स्कर्दू में निवास करते हैं। जो जिला पास (रा० त० ८:२८८६) के वर्णन से मालूम होता है कि

प्रथम तरंग ३२३ दरस तथा लद्दाख के ऊँचे पर्वत भोट्ट तथा काश्मीर के मध्य जलच्छाया बनाता था । श्री जोनराज ने द्वितीय राजतरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । कल्हण वर्णित भोट्ट यही लोग थे । धनाम्बु प्राप्य भौट्टेभ्यः कश्मीरजनविक्रयात् । गज्जंन्नाशाः प्यधात्सर्वांस्तदा रिञ्चनवारिदः ॥१५८ भौट्टांल्लहरकोट्टान्तः पट्टचिक्यकौतुकान् । प्रत्यहं वचनोद्योगै रिञ्चनोऽपविसृष्टवान् ॥ १६७॥ ✕ ✕ ✕ स्वदेशे मन्त्रिणोस्तस्य कोट्टभट्टोदयश्रियः । समरेषु भरंवासीच्चन्द्रडामरलौलयोः ॥ ३९९ ॥ ✕ ✕ ✕ केवलं हृदयं शून्यं भौट्टानां नाभवत्तदा । भूमिपालभयावेशात् कोपोऽपि चिरमज्जितः ॥८२५॥ श्रीवर ने तृतीय अर्थात् जोनराज तरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । अथाशङ्क्या नृपः पापं शत्रूघात् कतिचिद्दिनैः । बहिर्निष्कासयामास भुट्टमार्गेण तं सुतम् ॥१:७१॥ ✕ ✕ ✕ कालेनादमखानेऽथ भुट्टान् जित्वा समागते । हाजियखानोऽकरोद्यात्राः लोहराद्रौ नृपाज्ञया ॥३:८२॥ ✕ ✕ ✕ पित्र्याः पैतामहा वापि विरुद्धा बन्धनेऽवसन् । भुट्टदेशं धिया तस्य तेषां निष्कासनं व्यधात् ॥३:३२ सम्मोह तन्त्र में भोट देश का उल्लेख किया गया है : ऐराकभोटीतचीन (मा) महाचीनस्तथैव च । नेपाल(लः) शीलहट्टश्च, गौडकोशलमगधाः ॥ -शक्ति संगम तन्त्र ३:७:३३ काश्मीरं तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवि ऐराकः परिकीर्तितः ॥ ३३ ॥ उक्त उल्लेखों से भोट देश का महाचीन, नेपाल, काश्मीर, कामरूप ऐराक के समीप वर्णन किया है । काश्मीर से कामरूप अर्थात् आसाम तक यह अंचल लम्बा था । मानसरोवर के दक्षिण था । इस प्रकार प्राचीन भोट्ट देश की सीमा उत्तर में मानसरोवर, दक्षिण में नेपाल, पूर्व में कामरूप किंवा आसाम तथा पश्चिम में काश्मीर था । वर्तमान तिब्बत का यह दक्षिणी भाग था । वर्तमान भूटान सिक्किम तथा तिब्बत का वह दक्षिणी भाग जो मानसरोवर के दक्षिण में पड़ता था, भोट देश में सम्मिलित समझा गया था । तिब्बती लोगों के लिए भोट्ट, भोटिया तथा भोट शब्द का प्रयोग किया गया है । कल्हण ने 'भुट्टराष्ट्राधवन' भोट्ट देश जाने वाले मार्ग जोजिला पास का नाम दिया है । (रा० त० ८:२८८७) (३) म्लेच्छ : यह सम्भवतः हूणों के लिये प्रयुक्त किया गया है जो सिन्धु महानद के उस पार रहते थे । किन्तु म्लेच्छ शब्द का रूप तथा उससे सम्बन्धित होने वाले लोगों की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है । मुद्राराक्षस अंक प्रथम (१:२) में चाणक्य कहता है-'यथा तस्य म्लेच्छराजबलस्य मध्यात् प्रधानतमाः पञ्च राजान' परया भक्त्या राक्षसमनुवर्तन्ते । ते यथा- कौलूतश्चित्रवर्मा मलयनरपतिः सिंहनादो नृसिंहः काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपुमहिमो सैन्धवः सिन्धुषेणः। मेघाक्षः पञ्चमोऽस्मिन् पृथुतुरगबलः पारसीकाधिराजो म्लेच्छ राज मलयकेतु की सेना के पाँच प्रमुख राजगण राक्षस के बड़े भक्त तथा अनुयायी थे । उनका नाम- कुलूतराज चित्रवर्मा, मलयनरेश सिंहनाद, काश्मीर के राजा पुष्कराक्ष, सिन्धु- देशाधिपति सिन्धुषेण, पारसीकाधिराज मेघाक्ष था । राक्षस छठवें अंक में मलयकेतु को म्लेच्छ कहता हैः-

३२२ राजतरंगिणी इत्यूचुर्ये मते तेषां स एव परिहारदः । खण्डयन्वीतघृणतामग्रहारादिकर्मभिः ॥ ३११ ॥ ३११. जो लोग इस प्रकार कहते थे, उनके मन मे था । परिहार देने वाले, उसी राजा ने अपनी निर्दयता को, अग्रहारादि कर्मों द्वारा खण्डित कर दिया था । आक्रान्ते दारदैर्भाट्टैर्म्लेंच्छैरशुचिकर्मभि । विनष्टधर्मे देशेऽस्मिन्पुण्याचारप्रवर्तनम् ॥ ३१२ ॥ ३१२. दरदों, १ भोट्टों, २ म्लेच्छों ३ तथा अन्य अशुचि कर्मों द्वारा आक्रान्त इस विनष्टधर्म देश मे उसने पुण्याचार का प्रवर्तन किया । गिर गया उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं । ( शिव० शत० ८ तथा स्कन्ध पुराण ३:१:२४) । भैरवी यातना काशी में एक प्रचलित शब्द है। काशी में मृत व्यक्ति को भैरव दो घड़ी में यातना देकर उसे मुक्ति दे देते हैं । इसी के आधार पर कहा जाता है कि काशी मे मरने से मुक्ति होती है । कल्हण ने भू-लोक भैरव मिहिरकुल को कहा है। वह इतना भयंकर था कि काल स्वरूप भैरव तुल्य था । इस भूमि का अर्थात् मानव रूप यह भैरव था। पाठभेद : श्लोक संख्या ३१० में 'गगना' का पाठभेद 'गखना' मिलता है । ३१०. (१) भारती : इसका शाब्दिक अर्थ सरस्वती, वाणी, तथा वाणी की अधिष्ठात्री है। यहाँ पर कल्हणने आकाश वाणी के अर्थ में प्रयोग किया है। वह वाणी जो सुनाई पड़ती है । परन्तु कहने वाला दिखाई नही पड़ता । ३११. (१) खण्डित : दान की महिमा का वर्णन कल्हण यहाँ करता है । दान के द्वारा मिहिर- कुल के नृशंस एवं निर्दयता पूर्ण कार्यों के दोषों किंवा पापो का मोचन हो गया था। यदि मिहिरकुल ने क्रूरता की तो उसने उपकार भो किया था । कल्हण उसके गुण एवं अवगुण दोनों चरित्रो का यहाँ चित्रण करता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३१२ में 'भौट्टै' का पाठभेद 'भोट्टै' तथा 'भट्टै' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३१२. (१) दरद : कल्हण वर्णित दरद जाति आधुनिक दरद है । ये आर्य जातीय है। प्राचीन यूनानी लोगों को उनका ज्ञान था। वे इस समय भी सिंधु नदी के पश्चिम चित्राल और यागीन से गिलगिट, चिलास, गुंजी तथा कृष्णगंगा की उपत्यका में रहते हैं। उनका निवास स्थान काश्मीर के उत्तर दिशा मे है। (रा० त० ७:११७१ तथा ८:२७०९) दरद के कुछ ग्रामो में विचित्र प्रथा है । धर्म परिवर्तन बहुत होता रहता है । बौद्ध माता-पिता का पुत्र मुसलमान और मुसलमान माता- पिता का पुत्र बौद्ध धर्मावलम्बी हो जाता है। इस ओर के दरदों में किसी भी धर्म के प्रति विशेष आस्था नहीं है । यूनानी इतिहास लेखक हिरोडोट्स के समय से आज तक दरदों के निवास स्थानों में सम्भवतः कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह कश्मीर की उपत्यका के उत्तरीय पर्वत माला में सुदूर पड़ता है। (२) भोट्ट : तिब्बत वंशीय जाति है। कश्मीर के पूर्व तथा पूर्व-उत्तर अर्थात् वर्तमान काश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र लद्दाख पास तथा कुछ स्कर्दू में निवास करते हैं । जो जिला पास (रा० त० ८:२८८६) के वर्णन से मालूम होता है कि

दरस तथा लद्दाख के ऊँचे पर्वत भोट्ट तथा काश्मीर के मध्य जलच्छाया बनाता था । श्री जोनराज ने द्वितीय राजतरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । कल्हण वर्णित भोट्ट यही लोग थे । धनाम्बु प्राप्य भोट्टेभ्यः कश्मीरजनथिक्रयान् । गञ्जेन्नाशाः व्यधात्सर्वास्तदा रिञ्चनयारिदः ॥१५८ भोट्टांल्लहरकोटान्तः पट्टविक्रय कौतुकान् । प्रत्यहं वचनोद्यौगै रिञ्चनोऽप्यभिसृष्टवान् ॥ १६७॥ ✕ ✕ ✕ स्वदेशे मन्त्रिणोस्तस्य कोटभट्टोदयधियोः । समरेषु भरश्वासीच्छङ्ग्रडामरलौल्योः ॥ ३९९ ॥ ✕ ✕ ✕ केवलं हृदयं शून्यं भोट्टानां नाभवत्तदा । भूमिपालभयावेशात् कोपोऽपि चिरसञ्चितः ॥८२५॥ श्रीवर ने तृतीय अर्थात् जोनराज तरङ्गिणी में भोट्टो का उल्लेख किया हैं । अथाशङ्क्या नृपः पापं तद्बधात् कतिचिद्दिनैः । बहिर्निष्कासयामास भुट्टमार्गेण तं सुतम् ॥१:७१॥ ✕ ✕ ✕ कालेनादमखानेऽथ भुट्टान् जित्वा समागते । हाजियरानेऽकरोद्यात्राः लोहराद्रौ नृपाज्ञया ॥१:८२॥ ✕ ✕ ✕ पित्र्याः पैतामहा वापि चिरुद्धा बन्धनेऽवसन् । भुट्टदेशं धिया तस्य तेषां निष्कासनं व्यधात् ॥३:३२ सम्मोह तन्त्र में भोट देश का उल्लेख किया गया है : ऐराकमोटांस्तथाचीन ( ना ) महाचीनस्तथैव च । नेपाल( ज्ञः ) शीलहट्टश्च, गौडकोशलमगधाः ॥ —शक्ति संगम तन्त्र ३:७:३३ काश्मीरं तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवि ऐराकः परिकीर्त्तितः ॥ ३६ ॥ उक्त उल्लेखों से भोट देश का महाचीन, नेपाल, काश्मीर, कामरूप ऐराक के समीप वर्णन किया है। काश्मीर से कामरूप अर्थात् आसाम तक यह अंचल लम्बा था । मानसरोवर के दक्षिण था । इस प्रकार प्राचीन भोट्ट देश की सीमा उत्तर में मानसरोवर, दक्षिण में नेपाल, पूर्व में कामरूप किंवा आसाम तथा पश्चिम मे काश्मीर था । वर्तमान तिब्बत का यह दक्षिणी भाग था । वर्तमान भूटान सिक्किम तथा तिब्बत का यह दक्षिणी भाग जो मानसरोवर के दक्षिण में पड़ता था, भोट देश में सम्मिलित समझा गया था। तिब्बती लोगो के लिए भोट्ट, भोटिया तथा भोट शब्द का प्रयोग किया गया है । कल्हण ने 'भुट्टराष्ट्राध्वन' भोट्ट देश जाने वाले मार्ग जोजिला पास का नाम दिया है । (रा० त० ८:२८८७) (३) म्लेच्छ : यह सम्भवतः हूणों के लिये प्रयुक्त किया गया है जो सिन्धु महानद के उस पार रहते थे । किन्तु म्लेच्छ शब्द का रूप तथा उससे सम्बन्धित होने वाले लोगो की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है । मुद्राराक्षस अंक प्रथम (१:२) मे चाणक्य कहता है—'यथा तस्य म्लेच्छराजबलस्य मध्यात् प्रधानतमाः पञ्च राजानः परया भक्त्या राक्षरामनुवर्त्तन्ते । ते यथा— कौलूतश्चित्रवर्मा मलयनरपतिः सिंहनादो नृसिंहः काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपुमहिमो सैन्धवः सिन्धुषेणः। मेघाक्षः पञ्चमोऽस्मिन् पृथुतुरगबलः पारसीकाधिराजो म्लेच्छ राज मलयकेतु की सेना के पाँच प्रमुख राजगण राक्षस के बड़े भक्त तथा अनुयायी थे । उनका नाम— कुलूतराज चित्रवर्मा, मलयनरेश सिहनाद, काश्मीर के राजा पुष्कराक्ष, सिन्धु- देशाधिपति सिन्धुषेण, पारसीकाधिराज मेघाक्ष था । राक्षस छठवें अंक में मलयकेतु को म्लेच्छ कहता है:—

३२४ राजतरंगिणी आर्यदेश्यान्स संस्थाप्य व्यतनोद्दारुणं तपः । संकल्प्य स्ववपुर्दाहं प्रायश्चित्तक्रियां व्यधात् ॥३१३॥ ३१३. आर्य देशीय१ जनों को संस्थापित कर, उसने दारुण तपस्या२ की । शरीर दाह३ का संकल्प करके प्रायश्चित्त कर्म किया । मलयकेतु पर्वतीय राजकुमार है । उसके साथी धर्माचरण त्यागी, निर्दय, परपीड़क, चण्ड, नित्य कुलूत आदि राजा पर्वतीय हैं। हिंसक तथा अविवेकी व्यक्ति म्लेच्छ है । कल्हण का वर्णन स्पष्ट इस ओर संकेत करता है 'मृच्छकटिकम्' नाटक में म्लेच्छों को अशुद्ध कि सीमा पर रहने वाले म्लेच्छादि काश्मीर में भाषा भाषी कहा गया है । उनका उच्चारण ठीक प्रवेश कर पुराने आचार को नष्ट कर दिये थे । म्लेच्छ नहीं होता था । (अंक ६) एवं काश्मीरियों का सम्पर्क इससे प्रकट होता है । पाठभेदः म्लेच्छ शब्द का अर्थ शुक्रनीति के समय घोर श्लोक संख्या ३१३ में 'देश्यान्' का पाठभेद रूप ले लिया था । आचार भ्रष्ट निकृष्ट तथा हेय 'देशान्' मिलता है । व्यक्तियों तथा वर्ग के लिये म्लेच्छ शब्द प्रयुक्त होने पादटिप्पणियाँ लगा था । समय के साथ शब्द के अर्थ तथा भाव ३१३ (१) आर्य देशीय : आर्यदेशीय ब्राह्मणों में परिवर्तन होता है । म्लेच्छ शब्द इसका एक के कश्मीर में बसाने का उल्लेख मिलता है । परन्तु उदाहरण है । 'आर्यदेशीय जनों' का यहाँ उल्लेख किया गया है । न जात्या ब्राह्मणश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न । मिहिरकुल, प्रतीत होता है, आर्यदेश अर्थात् कश्मीर न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥१:३८॥ के बाहर पंजाब आदि भारतीय भागों से सभी श्रेणियों जन्मना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और म्लेच्छ तथा वर्गों के जनों को लाकर कश्मीर में आबाद नहीं होते किन्तु गुण एवं कर्म के भेद के अनुसार किया था । होते हैं । (२) दारुण तपस्या : प्रतीत होता है, मिहिरकुल राजा को भी म्लेच्छ कहा गया है यदि वह योगी था । उसने दारुण तपस्या की थी । उसकी अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करता- तपस्या इतनी उग्र थी कि उसने स्वेच्छया आग में असत्यवादिनं गूढ़चारं न चैश्च शास्ति यः । प्रवेश किया । स यो म्लेच्छ इत्युक्तः प्रजाप्राणधनापहः ॥ १:१३६॥ राजा सिद्ध के प्रसंग में लिखा जा चुका है। असत्यवादी, गूढ़चारी का जो राजा शासन नहीं कि वह भी योगी था । उसने भी तपस्या की । करता वह प्रजा के प्राण एवं धन का अपहर्त्ता तत्पश्चात् सप्तलोक प्राण विसर्जन किया । म्लेच्छ है । यहाँ प्राण विसर्जन की प्रक्रिया अत्यन्त क्रूर तथा म्लेच्छ की एक और परिभाषा शुक्रनीति रोमांचित करने वाली है । मिहिरकुल का यह करती है- चरित्र वर्णन उसे योगियों की श्रेणी में रख देता है । त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणाः परपीड़काः । उसे सांसारिक माया व्याप्त नहीं थी । श्लोक संख्या चण्डाश्च हिंसका नित्यं म्लेच्छास्ते ह्यस्यविवेकिनः। ३१५ के वर्णन से प्रकट होता है । उसने छुरी,

प्रथम तरंग ३२५ अत एवाऽग्रहाराणां सहस्रं प्रत्यपादयत् । गान्धारदेशजातेभ्यो द्विजेभ्यो विजये श्वरे ॥३१४॥ ३१४. अतएव विजयेश्वर में उसने एक सहस्र अग्रहार गान्धार देशीय द्विजों^१ को दिया । क्षुरखङ्गासिधेन्वादिपूर्णे यः फलके तदा । वह्निप्रदीप्ते सहसा पर्यन्ते स्वां तनुं जहौ ॥३१५॥ ३१५. तत्पश्चात् उसने सहसा क्षुर, खड्ग, असिधेनु आदि से पूर्ण वह्नि प्रदीप्त फलक पर अपने शरीर^३ को डाल दिया ।

कृपाण, असि आदि जड़ित तपे तख्त पर अपना शरीर डाल दिया था । उसका शरीर गर्म तीक्ष्ण धार वाले वस्तुओ से छिद गया । गर्म लोहा घावो में घुस गया । उसे दारुण कष्ट दिया । इस प्रकार वह फलक पर जलता, घावों से छिदता, प्राण विसर्जन किया । यह कार्य साधारण नही है । उसके इस कार्य से प्रकट होता है । वह नृशंस होते भी कितना व्यक्तित्व सम्पन्न, प्रतिभाशाली, उग्र तेजस्वी पुरुष था । पादटिप्पणी : ३१४ (१) गान्धारदेशीय द्विज : काश्मीर के ब्राह्मणों से, प्रतीत होता है, मिहिरकुल अप्रसन्न था । अपनी इस अप्रसन्नता के प्रतीक स्वरूप, उसने द्विजाधम गान्धार ब्राह्मणोंको, जो कि आचार-हीन महाभारत काल से ही कहे जाते थे, प्रश्रय दिया । उन्हें दान देकर उनकी मर्यादा ऊपर उठाने का प्रयास किया । विजयेश्वर के उल्लेख से मालूम होता है । उन दिनों वह स्थान ब्राह्मणो तथा पुण्यकर्मियो का केन्द्र हो गया था । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३१५ मे 'धेन्वा' का 'धन्वादि' तथा 'क्षुर' का 'खर' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियां : ३१५ ( १ ) श्लोक ३१२-३१६ : एक मत है कि श्लोक ३१२ से ३१६ तक 'कुलकम्' है । श्री स्टीन ने ३१२ से ३१६ तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने ३१२ से ३१७ तक इन्हें 'कुलकम्' मानकर उनका एक साथ अनुवाद किया है । मैने यहाँ श्लोकों के प्रत्येक पदों को भिन्न मानकर अनुवाद किया है । यदि सबका एक साथ 'कुलकम्' समझ-कर अनुवाद किया जाय तो अनुवाद सरल तथा साहित्यिक दृष्टि से अच्छा और भाव प्रधान होगा । परन्तु प्रत्येक श्लोक के शाब्दिक अर्थो का तात्पर्य समझने में कठिनाई होगी । (२) असिधेनु : यहाँ पर छुरी के अर्थ में प्रयोग किया गया है । छोटी छुरी आदि को असि-धेनु कहते हैं । (३) शरीर : कल्हण ने यहाँ तीसरे उदाहरण से योग, साधन एवं मनोबल के कारण स्वतः शरीर त्यागने का वर्णन किया है। इसके पूर्व जलोक ने सपत्नीक तपस्या द्वारा तथा सिद्ध ने अपनी शिद्धता द्वारा शरीर त्याग किया था । मिहिरकुल ने अपने अद्भुत मनोबल के द्वारा शरीर त्याग किया । कल्हण ने यह तीसरा प्रकार स्वेच्छया शरीर त्याग का उपस्थित किया है । स्वतः आत्मदाह से प्राण विसर्जन करना प्राचीन काल से प्रचलित था । परन्तु यह आत्महत्या सनातनी विचार के अनुसार माना जायगा । बौद्ध देशों में आज-कल भी प्रचलित है । वीतनाम के

३२८ राजतरंगिणी द्वाभिसारगांधारजालंधरशकाः खसाः । तंगणा माण्डवाश्चैव धान्तगिरिर्यहिर्गिरिः १३९ = १८२ नौलमत में 'खशा' तथा 'खश' एक ही शब्द किंवा समानार्थक समझना चाहिए । कल्हण ने खशो का बहुत वर्णन किया है। उन्हें इस समय खख्खा भी कहते हैं । खखल मुसलमान भी है । उन्हें राजपूत मुसलमान भी कहा जाता है। राजतरंगिणी में अनेक स्थानो पर राजोरी अर्थात् राजपुरी का शासक खशो के राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना को खशा कहा गया है (रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६, १८६८, १८९५ ) । राजपुरी से पूर्व की ओर चलने पर आन्स नदी की ऊपरी उपत्यका मिलती है। इस नदी को अब पंजगव्वर कहते है। श्रीवर ने जोन राजतरंगणी में इसका उल्लेख किया है । पञ्चगह्वरजाः केचित् सिन्धूपत्यन्वयोदिताः । रशा म्लेच्छास्तथान्येऽपि रुरुधुः सर्वतो दिशः ॥ उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशों का निवास-स्थान कहा है। उससे पूर्व बाणशाल अर्थात् आधुनिक बानहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है। यही पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी (रा० त० ८ : १६६५) । राजतरंगिणी (८ : १७७ तथा १०७४) के वर्णन से प्रतीत होता है कि वह सब उपत्यका जो बनिहाल से चन्द्रभागा तक जाती है, जिसे अब 'विचलारी' कहते हैं, और जिसे पुरावृत्तिकार 'विशालटा' कहते है, खशों से आबाद थी । राजोरी के पूर्व अंचल को भी संज्ञा अनेक स्थानो पर पंचगह्वर नाम से दी गयी है ।... खशालय का भी वर्णन कल्हण ने (रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २९०, २९९) किया है। यहाँ भी खश जाति रहती थी। खशालय ही खैशाल की उपत्यका है। इसे कशेर भो कहते है। वह दक्षिण- पूर्व में मारवल पास से काश्मीर के एक कोने से होती किश्तवार तक चली जाती हैं। खशालय का पुराना नाम खशाली श्रीवर के अनुसार मालूम होता है (रा० त० ७:३९९ ) राज्यं नश्यति हप्यति याह्या खशालीनका । लोकः क्लिश्यति लुण्टिदाहकरणैश्चौरैः स्पकं पश्यति ॥ ४ : ४५२ ॥ मुद्राराक्षस नाटक में 'खश' को एक सैनिक जाति के रूप में चित्रित किया गया है। मलयकेतु ने चन्द्रसेन पर आक्रमण करने की जो योजना बनायी थी उनमें खस सेना को अग्रिम पंक्ति में रखा था । प्रस्थातव्यं पुरस्तात् खसमगधगणैर्गार्णमुव्यूह्य सैन्यै र्गान्धारैर्मध्यमाने सयवनपतिभिः संविधेयप्रपन्न । ( मुद्राराक्षस नाटक अंक ५) यहाँ महत्वपूर्ण बात मुद्राराक्षस में पांच पर्वतीय राजाओं में काश्मीर गजा का उल्लेख है। पाँचों पर्वतीय राजा मलयकेतु के पक्ष में थे। यहाँ यह विचारणीय है कि काश्मीरी सेना का नाम न देकर खस का उल्लेख किया गया है। खस काश्मीर में आवाद थे। वे बली थे। सेना में थे। युद्ध में भाग लेते थे । खस को अग्रभाग में; यवन, गान्धार, को मध्य, तथा पृष्ठ भाग में चेदि हूण एवं शक सेना रखी गयी थी। इससे प्रकट होता है । 'खस' वीर सैनिक थे । निपुण योद्धा थे । अन्यथा उन्हें अग्रिम पंक्ति में रखने का कोई अर्थ नही था । खस के सम्बन्ध में 'मृच्छकटिकम्' नाटक छठे अंक में चन्दनक के मुख से मिथ्या बात छिपाने के कारण अशुद्ध तथा स्फुट शब्द निकल जाने पर वह पकड़ा जाने लगा तो उसका स्पष्टीकरण करता कहता है- 'अरे को अप्पञ्चओ तुह ? वयं दक्खिणत्ता अव्वत्तभाषिणो खस-णत्ति खड़ो विलम्..................अणेअदेस भासाभिण्णा जहेट्ठं मत्त, आम 'दट्ठो दिट्ठा वा, अज्जौ अज्जेआ वा ।' खस, खत्ति आदि........... देश भाषा से अन- भिज्ञ होने के कारण मनमाना 'देखा गया' देखी गयी' 'आर्य या भार्या' आदि बोला करते हैं।

प्रथम तरंग३२९


राजपुरो से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा रा० त० ६ : ३१२ में वर्णित वृन्त मे एक व्यक्ति तुंग खस मिलता है। वह चरवाहा था। रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया। (रा० त० ७ : ७७३) प्रतीत होता है। तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् काश्मीर के राजा हुए थे। उन्हें निम्न समझा जाता था। खस लोगो की भाषा परिष्कृत नही थी। वे अशुद्ध बोलते थे। इससे प्रतीत होता है वे विशेष सुसंस्कृत नही थे। वे पर्वतीय थे। नगर निवासियो के समान व्याकरण शुद्ध भाषा बोलन के आदी नही थे। खशालय काश्मीर उपत्यका के पूर्व दक्षिण वर्तमान उदिल क्षेत्र है। वह क्षेत्र भृंग तथा शाहाबाद अंचल के पूर्व दक्षिण ओर पड़ेगा। बक्री बल तथा मरबल पास इसके पश्चिम में पड़ेंगे। इसका वर्णन शुक चौथी राजतरंगिणी में करता है। 'खशालयस्थं चक्रेशं त्रिसृष्टस्तैर्महात्मभिः । लेखहारस्तमाह स्म मार्गेश मुखवाचिकम् ॥ शुक० रा० : २ : २ : ३५ वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खस रहते थे। वोराका को खसो का एक केन्द्र कहा गया है। (रा० त० ८ : ४०९) यह स्थान प्राचीन दृशद्वती के समीप था। दृशद्वती को इस समय द्वारावेशी कहते है। वितस्ता उपत्यका का यह भाग कधाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। आधुनिक खक्ख जाति और खस एक ही है। काश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय प्रायः सरदार इसी जाति के हैं। खक्ख शब्द खस का अपभ्रंश है। वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार सिख राज आगमन के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे। अपने पड़ोसी बोम्बा कबीले के साथ सख लोग काश्मीर के लिए एक समस्या हो गये थे। उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमामुद्दीन के समय में (१८४६) किया गया था, अभी तक लोगो को याद है। काश्मीर के मर्दुमशुमारी सन् १८९१ ई० के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ दी गई है। उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो का एक उपजाति लिखी गयी है। (पृष्ठ २०१) खश जाति का मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रिता जाति कहा गया है। अर्थात् यह जाति पर्वत में रहती थी। अतो देशान् प्रपश्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये। नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुमेणाः खशाः ॥

    • + गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् समान् ॥ ॥ ५७ : ५६ ॥ महाभारत सभा पर्व में भी खस जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शको तथा दरद जातियो तुल्य अर्ध सभ्य जाति में शामिल किया गया है। महाभारत सभा पर्व : (५१६ : १८४९) तथा (द्रोण पर्व ११ : ७९९ : १२१, ७)। सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर उल्लेख आता है । वे मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलदा नदी की उपत्यका में रहते थे। (सभा पर्व ५१ : १८४८; ५१ : १८४९)। शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकली है और पश्चिम सागर में गिरती है। (मत्स्य पुराण : १२० : ३३)। मनु ने उन्हें क्षत्री माना है। परन्तु ब्राह्मणो के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये। (मनुस्मृति १० : ४३ : ४)। उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं। मार्कण्डेय पुराण (३४६ : ३५०) के अनुसार उन्हें शल्य, नीप, शक और शूरसेन आदि जातियों के साथ रखा गया है। सेन तथा पालवंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है।

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३३० राजतरंगिणी [स्तम्भ १] बृहद् संहिता में—कुलूत, तंगण, खश, काश्मीरा उल्लेख किया गया है। (१० : १२)। ऋग्वेद सहिता (१ : ११७) में खस जाति का उल्लेख मिलता है। खसा : प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी। कश्यप प्रजापति को दी गयी थी। उससे यक्ष राक्षसादि हुए। मार्कण्डेय पुराण में ‘कुरवो गुर्गणा खसा:,’ ‘वायु पुराण में ‘क्षुपणास्त- ङ्गण खसा:’ ‘कुणपास्तगणा: खसा:,‘ ‘धुपनास्तङ्ग- णास्त्वसा:’ ‘क्षुपनास्तङ्कणा स्वसा:’। ब्रह्माण्ड पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा: खसा:,’ मत्स्यपुराण मे ‘कुपथा अपयास्तया’ वामन पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा खसा.’ कुपय किंवा अपथ हिमालय मे कोई स्थान था। खस देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है। मत्स्य पुराण में बर्बर तथा यवनों के साथ खसों का उल्लेख किया गया है। ‘बर्बरान् यवनान् खसान्’। वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में ‘पारदान, सौगनान्खसान्’ ‘पारदास्ताङ्गणान्खसान्’, ‘किम्पुरुषान् खसान्’ का उल्लेख पारद तङ्गण तथा किम्पुरुष के साथ आया है। द्रोण पर्व महाभारत में खस जाति का उल्लेख दरद आदि के साथ किया गया है। तैस्तु पुनर्व्याप्तमुखास्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः । अयोहस्ताः शूलहस्ता दरदास्तङ्गणाः खसाः ॥ ( १२१ । ४२ ) काशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति का नाम मगध तथा लोहित्य के साथ पूर्व दिशा मे रखा गया है। परन्तु यह काश्मीरी साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। अपितु आसाम खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो सकती है। अथवा खस जाति जिसका उल्लेख बंगाल के पाल राजाओं के शिला- लेखों में है वे ये जिनका आवागमन बंगाल, आसाम [स्तम्भ २] तक होता रहा है, अथवा कहीं यही आबाद रहे होंगे। शूद्राभीराश्च दरदाः काश्मीराःपशुभिः सह ।।६७।। खाशीराश्चान्तचाराश्च पद्गया गिरिगह्वराः । आत्रेयाः सभरद्वाजास्तथैव स्तनपोषिकाः ।। (भीष्मपर्व ९ : ६८ ) दरद और काश्मीर के साथ ही खस का उल्लेख किया गया है। खाशीर, खसा, खश एवं खस शब्द एक ही जाति के लिए प्रयुक्त किये गये हैं। (भीष्म पर्व ९ : ६८)। भागवत पुराण ( २ : ४ : १३ ) के अनुसार खस जाति पतित हो गयी थी परन्तु भागवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण ( २ : २६ : १४५ तथा ३ : ६९ १२० ) में उल्लेख आता है। विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। और वे म्लेच्छ माने गये। हरिवंश पुराण ( १४ ० ७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमे होकर चक्षु नदी बहती है। ( ब्रह्माण्ड पुराण २ : १६ : ४६ तथा मत्स्य पुराण १२१ : ४३, १४४ : ५७ ) वायु पुराण मे एक पर्वतीय जनपद कहा गया है। यहाँ खस के स्थान पर खश शब्द का प्रयोग किया गया है। वायुपुराण ( ४५ : ३१५ तथा ४७ : ४७,) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिला- लेख मे हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। हरिवंश पुराण ( १३ : २३-३४ ) में उल्लेख आता है। रघुवंशी राजा बाहु को हैहय तथा ताल- जंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद