राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
परिशिष्ट ज ६३
स्कन्द पुराण (१:२:४०) में शकों का उल्लेख आया है। कलियुग आरम्भ में उन्हें एक लाख एक वर्ष राज्य करना लिखा है। राजा सगर ने इन्हें जीता था। इसका उल्लेख भागवत पुराण (९:८:५) में मिलता है। शक यवनों का वशिष्ठ के शरण जाने का उल्लेख पद्मपुराण (६० : २०) में किया गया है। पतंजलि ने इनका निर्देश पातंजलि सूत्र (२:४:१०) में किया है। महाभारत में शक देश तथा शक जाति का निम्नलिखित स्थानों पर निम्नलिखित संदर्भ के साथ उल्लेख किया गया है। 'एक भारतीय जनपद और जाति। शक जाति के लोग वशिष्ठ की नन्दिनी गाय के मन से प्रकट हुए थे (आदि० १७४-३६)। भीमसेन ने पूर्व-दिग्विजय के समय शकों को परास्त किया था (सभा० ३०:१४)। नकुल ने भी इन पर विजय पायी थी (सभा० ३२ : १७)। शक देश और जाति के राजा राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर के लिए भेंट लाए थे (सभा० ५१:३०)। कलियुग में शक आदि जातियों के लोगों के राजा होने का उल्लेख मिलता है। (वन० १८८ : १५)। शक देश के राजा के पास पाण्डवों की ओर से रण-निमन्त्रण भेजने का विचार किया गया था (उद्योग० ४:१५)। ये काम्बोज राज सुदक्षिण के साथ दुर्योधन की सेना में सम्मिलित हुए थे (उद्योग १९:२१)। शक एक भारतीय जनपद का नाम है (भी० म० ९०५१)। भगवान् श्रीकृष्ण ने शक देश पर विजय पायी थी (द्रोण० ११:१८)। सात्यकि ने बहुत से शक सैनिकों का संहार किया था (द्रोण० ११९:४५ ११९:४५, ५३)। कर्ण ने भी शक देश को जीता था (कर्ण० ८:१८)। शक पहले क्षत्रिय थे, परन्तु ब्राह्मणों के दर्शन से वंचित होने के कारण (अपने धर्म-कर्म से भ्रष्ट हो) शूद्र भाव प्राप्त किये थे। (अनु० ३३:२१)। मनु संहिता में उन्हें वृषल क्षत्रिय कहा है। प्राचीन शकों का मूल स्थान इस समय रूस गणतन्त्र राज्य में है। रूसी इतिहासकारों ने इस पर यथेष्ट अन्वेषण किया है। उन्होंने शक जाति को दुनार अर्थात् डैन्यूब नदी से त्यान्शान् अल्ताई के मध्य की भूमि को भारतीय शक द्वीप माना है। प्राचीन ईरानी भाषा में इसकी संज्ञा शकान वैश्जा दिया गया है। इसको शास्थान तथा शीस्तान कहते हैं। हूणों के कारण शक जाति तथा देश विघटित हो गया था। एक मत है ओक्सस तथा जक्सस रीज नदी की उपत्यका से पामीर के मूल तक उनका निवास क्षेत्र था। वह क्षेत्र वर्तमान सभी तुर्किस्तान चीनी तुर्किस्तान तथा मध्य एशिया है। यूरोपीय लेखकों ने शकों को शकाई तथा चीनी लेखकों ने 'शे' लिखा है। उनके मतानुसार मूल शब्द 'शैक' अथवा 'शोक' था। चीनी लेखक उन्हें पशुपालक जाति कहते हैं। उनका मत है कि वे काशगर के समीपवर्ती भूभाग में विचरण करते थे। सन् १६४ ई० पू० ए-चो-जाति ने उन पर पूर्व दिशा से आक्रमण किया। वे उद्वासित हो गये। उनका एक भाग अफगानिस्तान के पश्चिमी खण्ड में बस गया। उस खण्ड को शीस्तान अथवा शकस्थान कहते हैं। उनका दूसरी शाखा पूर्वी ईरान में जाकर आबाद हुई। शक जाति इस प्रकार दो शाखाओं में विभाजित हो गयी थी। यह भी मत है कि एक शाखा ने तुर्किस्तान से कश्मीर में प्रवेश किया। वे कश्मीर के दक्षिण में आबाद हो गये थे। दूसरी शाखा जो पूर्वी ईरान में आबाद हो गयी थी उसका सम्बन्ध पल्लव जाति से हुआ। वह शाखा भारतवर्ष में कालान्तर में आयी। यह शाखा भारत में खैबर पास से न आकर बोलन पास किंवा मुल्ला पास द्वारा भारत में प्रवेश की थी। मलाया प्रायद्वीप के वनों में एक आदिम जाति रहती है। उसका नाम शकाई है। उसकी संज्ञा
६४ राजतरंगिणी शिमोर्ट भी दी गयी है । मुख्यतः फरेक क्षेत्र के दक्षिण पूर्व मे मिलते हैं । अब तक यह घुमन्तू जाति है । आधुनिक काल में ईख तथा धान की खेती करने लगे हैं । एक मत और है । श्याम अर्थात् थाईलैण्ड की मीकांग (मातु गंगा) नदी के तट पर बसी हुई शक अथवा शुक जाति को शक जाति का मूलस्थान मानकर श्यामको शक द्वीप कुछ विद्वान् मानते हैं । इसी प्रकार वरमा देश के थेक किंवा शक जाति को शक मानने का प्रयास किया गया है । यह धारणा विष्णु पुराण वर्णित शाक वृक्ष, शक स्थान आदि से होती है । विद्वानों ने विष्णु पुराण वर्णित शाक वृक्ष को मैशक अर्थात् सागवान वृक्ष माना है । वर्मा, श्याम, कम्बोडिया तथा इण्डोनेशिया में सागवान वृक्ष अधिक पाये जाते हैं । अतएव इस भूखण्ड को शकद्वीप मानने का एक प्रयास किया गया है । शक द्वीप के साथ क्षीरोद सागर किंवा क्षीरार्णव का वर्णन मिलता है । श्याम कम्बोडिया के दक्षिण तथा मलय प्रायद्वीप के पूर्व जो समुद्रीय जल-खण्ड चीन सागर को मिलाता है उसका प्राचीन नाम केदरेन्दज अथवा करन्देन्दज है । भाषाविद् विद्वान् केदेरेन्दज को क्षीरोद शब्द का अपभ्रंश मानते हैं । परन्तु यह मत भ्रामक है । भविष्य पुराण में क्षीरोद शब्द आया है उसी के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है । लवणोदात्परे पारे क्षीरोदेन समावृतः । जम्बूद्वीपात्परे यस्माच्छाकद्वीप इति स्मृतः ॥ महाभारत (६ . १२ : ९) में क्षीरोद का उल्लेख किया गया है। इन्हीं शब्दों के उल्लेख पर श्याम तथा कम्बोडिया को शक द्वीप प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है । आर्य तथा शक जाति के रूप, आकारादि में विभिन्नता नगण्य है । ई० पू० छठीं तथा पांचवी शताब्दी में यूनानी इतिहासकारों ने पारसी सम्राट् 'दारियोस' अर्थात् 'दारियस' की सेना में शकों का उल्लेख किया है । उन्होने वर्णन किया है कि शकों के देश में लोहा तथा चांदी नहीं होता । उन धातुओं का प्रयोग वे नहीं करते थे । किन्तु स्वर्ण तथा ताम्बा का प्रयोग वे करते दिखायी देते थे । उस समय शकों में सुवर्ण तथा ताम्र दोनो धातुओ का प्रयोग देखा गया था । ई०पू० ५१३ वर्ष में दारयोस ने कृष्ण सागर के तटवर्ती क्षेत्र दाकों पर आक्रमण किया था । ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में उत्तर पश्चिम भारत मे तथा उसके सीमान्त पर शासन करने वाले अनेक यूनानी शासकों का शक नाम था । ईसा पूर्व १२८ वर्ष में एक चीनी सैनिक पर्यटक चाइच्बान शकों के नगर वारन्तर में गया था । उसने उन्हें तम्बुओं में निवास करते देखा था । उनका जीवन निर्वाह पशु-पालन पर निर्भर था । शक परम्परा कहती है । उक्त आक्रमण के १००० वर्ष पूर्व शकों में राजा हुए थे । उनके गणतन्त्र शासन प्रणाली प्रचलित थी । सख्यात अथवा सर्वभान उनके गणतन्त्र का नाम था । शकों के सामाजिक जीवन में स्त्रियो का प्रमुख स्थान होता था । युद्ध में पति के दिवंगत होने पर वे विधवा होकर बैठती नहीं थीं । स्वयं सेना का संचालन करती थीं । शक जाति का मुख्य भोजन मास तथा दूध था । वे युद्ध भूमि में शत्रु का रक्त पीते थे । वे अपने शत्रु की खोपड़ी का कटोरा बनाते थे । कापालिक की तरह उसे पान तथा भिक्षा पात्र की तरह प्रयोग करते थे । शकों की स्त्रियों में बहुपति प्रथा प्रचलित थी । दाको में बहु पत्नी प्रथा प्रचलित थी । इसका
परिशिष्ट ज ६५ उसका मत है कि भारत में जहाँ शक निवास करते थे यह प्रथा प्रचलित थी । शकों के भारत में आबाद होने पर शक तथा भारतीयों मे परस्पर विवाह होने लगा था । दक्षिण भारत में भानजो के साथ विवाह करना शक प्रभाव ही प्रतीत होता है । कनिघम का मत है कि ओक्सस नदी से चलकर शक किपिन अर्थात् कपिशा में आये । वहाँ से वे देश के अनेक भागों में और सिन्ध में फैल गये । (कनिंघम = क्वाइन्स आफ इण्डोसीथियन ४ : २२९) इसका समर्थन हिरोडोट्स के लेखों से भी होता है । पाण्डवों की तरह अनेक भाइयों की एक पत्नी द्रोपदी तुल्य होती थी । यूथ विवाह अर्थात् स्त्री, पुरुषों के एक वृन्द किंवा समूह का विवाह दूसरे वृन्द किंवा समूह अथवा यूथ से हो जाता था । जाति के नेता अथवा राजा की मृत्यु होने पर, उसकी एक पत्नी उसके साथ कब्र में जीवित गाड़ दी जाती थी । भारत में पति के साथ मरने की प्रथा दूसरे प्रकार की थी । राजा की अनेक रानियों में ज्येष्ठा, उसके अभाव में अन्य रानी पति के साथ सती होती थी । पाण्डु की मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठा रानी युधिष्ठिर की माता कुन्ती नहीं सती हुई । नकुल तथा सहदेव की माता माद्री अर्थात् कनिष्ठा रानी पति पाण्डु के साथ सती हुई थी । नेपाल में राणाओं तथा राजाओ के साथ एक स्त्री के सती होने का उल्लेख उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक मिलता है । उदयपुर में दिवंगत राणाओं की छतरियाँ बनी हैं । सती प्रथा के काल तक रानियां सती होती थी । छतरियो में एकलिंग के समान मूर्तियां स्थापित है। उसके समीप ही दूसरी प्रतिमा एक चौखूंटा लिंगाकार शिला की होती है । उस- पर राणाओं के साथ जितनी रानियां सती होती थीं उतनी स्त्री प्रतिमा उत्खनित कर दी गयी है । इससे पता चलता है । किस राणा के साथ कितनी रानियां सती हुई थी । आर्यों में श्राद्ध प्रथा प्रचलित थी । महापात्र को दिवंगत आत्मा की शान्ति तथा सुख के लिए एका- दशाहु के दिन दिवंगत द्वारा प्रयुक्त वस्तुएँ तथा प्रसाधन, धन, वाहन सभी कुछ दिया जाता था । मुझे स्मरण है कि हमारे पिता के नाना श्री हरनारायणसिंह काशी में मरे । मै छोटा था । वे अफीम खाते थे । महा- पात्र की विदाई के दिन उसे अफीम खिलाया गया था । शको में यह प्रथा कुछ दूसरे प्रकार से प्रचलित थी । कब्रों में दिवंगत आत्मा की प्रिय तथा उपयोग की सब सामग्री उसके शव के साथ गाड़ देते थे । शको की यह प्रथा मिश्र के फरोहा अर्थात् फरमून लोगों में कुछ भिन्नता के साथ प्रचलित थी । फरोहा के पिरामिडों में उनके शव के साथ जीवनोपयोगी अथवा दिवंगत आत्मा की सभी प्रिय वस्तुओं को एकत्रित कर दिया जाता था । मिश्र के राजा आजीवन अपने कब्र में रखने योग्य सामानों का संचय करते रहते थे । इस प्रकार की कब्रें काकेशस के उत्तर में प्राप्त हुई हैं । अनुमान किया जाता है । भारतीय उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती पर्वतीय खश जाति शक जाति की एक शाखा से सम्बन्धित थी । उनकी कब्रें लद्दाख से कमायूँ जिलों तक पाई गयी हैं । उनमें जीवनोपयोगी अर्थात् खान- पान तथा अन्य सामग्रियां गडी मिली है । शको में मृतको को समाधि देने अथवा गाड़ने के साथ ही काय शव को वृक्षों पर टांग देने की भी प्रथा थी । पक्षियों के मांसादि खा जाने पर जब केवल अस्थि पंजर शेष रह जाता था तो अस्थि चयन किया जाता था । अस्थियों को एकत्रित कर तत्कालीन संस्कार विधि के साथ उन्हें गाड़ देते थे । हिन्दुओं में यह प्रथा भिन्न प्रकार से प्रचलित है । दाह करने के पश्चात् अस्थियों का चयन किया जाता है । यदि नदी समीप हुई तो उसका प्रवाह किया जाता है । अन्यथा उन्हें ताम्र अथवा मृत्तिका पात्र में प्रवाह के लिए रख देते है । प्रवाह न करने के अभाव में उन्हें गाड़ दिया जाता है । पारसी लोग शव का संस्कार इसी प्रकार करते हैं यद्यपि इसमें कुछ सुधार हो गया है । पारसी ९
६६ राजतरंगिणी शव को रख देते हैं। पक्षियों मांसादि खा जाती है। दीप अस्थि का नयन किया जाता है। उन्हे गाड़ अथवा कूप में डाल दिया जाता है। पारसी जाति ईरान निवासी थी। पह्लव गण मुस्लिवान से ईरान तक फैले थे। शकों की यह प्रथा पारसियों में उनके सम्पर्क से आयी थी अथवा शकों ने ही पारसियों की प्रथा को स्वी- कार किया था। पडोसी जाति होने के कारण एक दूसरे पर सामाजिक, धार्मिक आदि रीतियों का पड़ना स्वाभाविक था। महाभारत में उल्लेख मिलता है। पाण्डवों ने अपना अस्त्र-शस्त्र एक वृक्ष पर रखा था। शस्त्र की रक्षा निमित्त उसी पर एक शव भी टांग दिया गया था। लोग अस्त्र-शस्त्र का पता न पा सकें। समझें कि, शव संस्कार निमित्त वृक्ष पर रखा गया था। यदि यह प्रथा किसी अंश में किसी जाति में प्रचलित न होती तो वृक्ष पर शव टाँगने में कोई हेतु दिखाई नहीं पड़ता। इससे प्रकट होता है। यह प्रथा आर्यों, पार- सियों तथा शकों में किसी न किसी रूप में प्रचलित थी। हिन्दू आर्यों के समान स्त्रियाँ पति के शव के साथ सती होती थी। यह प्रथा रूम में रोमियों के ईसाई होने के पूर्व तक प्रचलित थी। शक लोग दाहक्रिया भी करते थे। उनमें गाड़ने, जलाने तथा पक्षियों को खिलाने की तीनो प्रथाएँ प्रचलित थी। आर्यों में प्रचलित चौथी प्रथा जल समाधि भी उनमें प्रचलित थी या नहीं कहना कठिन है। शकों की नाक लम्बी होती थी। उनके बाल भूरे होते थे। शक नारियाँ रूपवती होती थी। प्राचीन भारतीय शरीर वैज्ञानिको ने शक नारियों के सुन्दर होने का कारण उनका प्याज खाना लिखा है। वाग्भट्ट के 'अष्टांग हृदय' में उल्लेख मिलता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में शकों के निश्चीकरण सम्बन्ध में कहा गया है कि उनका रंग श्वेत चित्रित करना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि शक लोग मध्य एशिया के लोगों के समान उज्ज्वल वर्ण होते थे। अल्ताई स्थित शकों के सम्बन्ध में रूस पुरातत्त्ववेत्ताओं ने खोज तथा खनन कार्य किया है। पाजी- रिक घाटी में एक पुरुष तथा स्त्री का मसाला से सुरक्षित शव प्राप्त हुआ है। पुरुष की छाती तथा कन्ध्यो पर गोदना गुदा है। पुरुष का रंग श्याम तथा स्त्री का गौर वर्ण था। शक यदि आर्यों की शाखा थे तो उनके वर्ण तथा रूप में परिवर्तन किस प्रकार आ गया? शव के रूप वर्णन से यह शंका उठ सकती है। कारण सरल है। बोधगम्य है। शकों के निवास-स्थान के पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वीय दिशा में मंगोल जाति रहती थी। उनमें उनका सम्पर्क होना सम्भव था। विवाहादि परस्पर होना असम्भव नहीं था अतएव आर्य रंग रूप में सम मिश्रण के कारण अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है। भारत में सम मिश्रण के कारण रंगरूप में अन्तर अधिक हो गया है। आज कहना कठिन है। किसका मूल पुरुष कौन था। जाति क्या थी। महाभारत में शकद्वीप के लोगों का वर्ण श्याम कहा गया है। यह वर्णन चीनी लेखकों तथा प्राप्त शव के श्याम वर्ण से मिलता है। श्याम वर्ण का अर्थ सर्वथा काला रंग से नहीं लगाना चाहिए। (महा- भारत में उल्लेख मिलता है।) उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिरिः । यतः श्यामत्वमापन्नाः प्रजा जनपदश्वर ॥ ६ : ११ : १९ उत्तर के लोगो का वर्ण चीनी लेखको के अनुसार श्याम मालूम होता है। चीनियो ने उत्तर के रहने वाले शकों के क्षेत्र का नाम एतदर्थ श्याम रख दिया था। आज भी श्याम 'वगलर' तथा श्याम 'उप्रि-
यन' का अर्थ उत्तरीय तथा उत्तरी 'उग्रियन' जाति के लिए प्रयुक्त होता है। महाभारत में (६ : ११ : २६) में शक के लिए श्याम शब्द का प्रयोग किया गया है। महाभारत में शकों के धर्म के विषय में उल्लेख है। महाभारत (६ · १२ : २६) से प्रकट होता है कि शंकर की पूजा शकद्वीप में होती थी। महाभारत में शंकर शब्द भास्कर के लिए प्रयोग किया गया है। जिसका अर्थ सूर्य होता है। शकों में सूर्य पूजा प्रचलित थी। स्लेव जाति में सूर्य महादेव माना जाता था। इसकी पूजा में लालरोटी मक्खन के साथ अर्थात् पूड़ी खाते थे। यही कारण है कि साम्ब को शक द्वीप से सूर्य पूजक लाने को कहा गया था। सिकन्दर के अभियान काल में यूनानी लेखकों ने शकों का चरित्र चित्रण किया है। तथा स्वरूप दिया है। वह शको के आवरण एवं रूप से मिलता है। उनकी आँखें नीली होती थी। उनका बाल लाल होता था। ये खाल पहनते थे। कच्चा मांस खाते थे। मनुष्य का रक्त पीते थे। खेमे में निवास करते थे। अत्यन्त शक्तिशाली थे। संख्या में बहुत थे। भगवान की आपदा तुल्य थे। शव समाधि स्थान में नमदा पर समृद्धि देवी का रंगीन चित्र बना है। उसके करकमलों में जीवन तरु है। उनके सम्मुख श्यामरंग अश्व पर घुंघराले केशों वाला युवक अश्वारोही है। नमदा के समीप मखमल की एक कालीन मिली है। इस पर अश्वरोही, सिंह, हिरन, श्येन अर्थात् वाज पक्षी तथा अन्य विचित्र पशुओं के चित्र बने हैं। अश्वरोही का रूप प्राचीन ईरानी राजाओं के वेशभूषा तथा रूप से मिलता है। ईरानी राजाओं की मुद्राओं, चित्रों आदि पर अंकित वेशभूषा के तुल्य है। यह काल ईसा पूर्व ४०० या ५०० वर्ष माना जाता है। यहीं पर एक चीनी का बना दर्पण मिला है। शव समाधि स्थान के पार्श्व में १४ अश्व अपनी पूर्ण रण सज्जा के साथ समाधिस्थ मिले हैं। अश्वों पर जीन है। जीन की लकड़ी पर नक्काशी की गयी है। उस पर सुवर्ण पत्तर लगे हैं। घोड़ों के लबादे तथा चीनी रेशम द्वारा निर्मित ओहार अर्थात् चादर भी मिला है। यह शव लेनिनग्राड के एर्मीताज संग्रहालय में रखा है। इससे स्पष्ट है। मिस्र तुल्य शक भी मृतक के साथ उसके उपयोग तथा काम की वस्तुएं गाड़ देते थे। मसगित (महाशक), सक्रोका (शकयान), दाह, खस, कुरुन, पूर्वी, शक जातियों की मुख्य आबादियों का उल्लेख रूसी विद्वानों ने किया है। खश को गिलगित त्रिताल में कसकर, कश्मीर में खस, कासगर में खशगिर तथा कश्मीर तथा नेपाल के मध्य खश कहते हैं। हूणों द्वारा उद्वासित किये जाने पर शक दक्षिण की ओर चले। आमू अर्थात् वक्षु उपत्यका होते हुए, उन्होंने पार्थिया (पल्हव) तथा बैक्ट्रिया (बाल्हीक) पर आक्रमण किया। शक उन्हें पराजित कर आगे बढ़ते गये। भारत की सीमा बोलन दर्रा तक पहुँच गये। किपिन अर्थात् पंजाब तथा कश्मीर के भागों पर जिसे प्राचीन गान्धार कहा जा सकता है। शकों ने अधिकार कर लिया। कालान्तर में ये तक्षशिला तथा मथुरा में अपनी सत्ता स्थापित करने में समर्थ हुए। एक मत है। भारत में शक ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में आबाद हो गये थे। चाहे उनकी संख्या कम ही क्यो न रही हो। उनकी यह आबादी धुर उत्तर पश्चिम भारत अर्थात् अफगानिस्तान, सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तरी पश्चिम पाकि- स्तानी पंजाब तथा दक्षिणी कश्मीर था। प्रोलिमी का उल्लेख है कि शक कश्मीर के वालतिस्तान तक फैले थे। एक मत है कि कश्मीर मार्ग से ये ईसा पूर्व ५७ वर्ष में तथा पूर्वी ईरान से प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व
६८ राजतरंगिणी भारत में आये थे। शकों का भारत में विस्तार यूनानियों को हटाकर हुआ था। जहां यूनानी थे वहां शकों का प्रभुत्व हो गया। प्रारम्भिक शक यूनानी भाषा भी बोलते थे। वे बाह्लीक भाषा अधिक बोलते थे। यह ईरानी भाषा की एक शाखा थी। कालान्तर में उन्होंने संस्कृत भाषा को अपना लिया। उनकी वही एक प्रकार से राजभाषा हो गयी थी। भारतीय प्रभाव काशगर तक फैल गया था। शक मध्य एशिया को एक मन से कहते थे। विष्णु पुराण शकों के भारतीयकरण के विषय में प्रकाश डालता है (२ : ४ : ६९) निस्सन्देह शक विदेशी सभ्यता और संस्कृति भारत में लाये थे। भारतीय तथा शक दोनों सभ्यताएं एवं संस्कृतियों ने एक दूसरे को प्रभावित किया था। शकों की एक शाखा ने महाराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा मालवा पर अधिकार कर लिया। शकजातीय राज्य- पालों को क्षत्रप नाम से सम्बोधित किया जाता था। उत्तरी तथा पश्चिमी दो प्रकार के क्षत्रपों का उल्लेख मिलता है। तक्षशिला तथा मथुरा के क्षत्रपों को उत्तरीय तथा महाराष्ट्र, उज्जैन, गुजरात, सिन्धादि के क्षत्रपों को पश्चिमीय क्षत्रप कहते थे। तक्षशिला में अनेक शकराजाओं के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। प्रथम शक राजा माउज अथवा कोनो था। वह पश्चिमी पंजाब का राजा था। उनकी मुद्राएं पूर्वीय ईरान तथा काबुल उपत्यका तक मिली हैं। उसकी राजधानी तक्षशिला थी। उसका राज्यकाल १३५-१४५ ई० पू० कहा जाता है। उसे राजाओं का राजा कहा गया है। कोनो का उत्तराधिकारी अजेस अथवा अजेज प्रथम था। यह शब्द पारसी शब्द अजोज का अपभ्रंश हो सकता है। कुछ विद्वानों का मत है कि माउज के राज्य में कश्मीर राज्य का दक्षिणी अंचल था। सीस्तान अर्थात् शकस्थान का राजा स्पिलिसेस था। दोनों राजाओं की संयुक्त मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। अजोज की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अजिलिसेस राजा हुआ। उसके पश्चात् उसका पुत्र अजोज द्वितीय राजा हुआ। तक्षशिला के शक राजाओं में चार राजाओं का वृत्तान्त ज्ञात है। अनेक शक राजाओं का और पता चलता है। उनका पारस्परिक किस वंशानुगत सम्बन्ध क्या था, कहना कठिन है। मथुरा का प्रथम शक राजा राजुल था। उसकी उपाधि महा क्षत्रप थी। राजुल के पश्चात् उसका पुत्र सोडस राजा हुआ। मथुरा के शिलालेख में उसे महाक्षत्रप कहा गया है। सोडस के पश्चात् उसकी बहन का पुत्र खराम्त राजा हुआ। मथुरा के शकों में एक राजा पतिक भी हुआ है। पतिक और राजुल का क्या सम्बन्ध था अनुसन्धान का विषय है। कतिपय विद्वान् उत्तरी क्षत्रपों को पर्थियन (पल्हव) मानते हैं। किन्तु अधिक झुकाव उन्हें शक मानने की तरफ है। मथुरा के सिंहस्तम्भ पर शकस्थान किंवा सीस्तान शब्द अंकित है। एक मत है कि सिंहस्तम्भ की कला पर ईरानियन कला का प्रभाव है। राजुल क्षत्रप तथा उसका पुत्र सोडास का समय लगभग ७२ तथा ७८ सन् ईस्वी कहा जाता है। एक मत है। स्तम्भ सोडास के अभिलेख से प्राचीन है। मौरसेनिक मथुरा क्षेत्र के निवासी थे। वात्सायन ने (तृतीय शताब्दी) उनकी निन्दा की है। महाराष्ट्र के सातवाहन राजाओं को शकवंशीय क्षत्रपों ने पराजित कर शक राज्य स्थापित किया। इस वंश का प्रसिद्ध राजा नहपान था। उसका शासन काल ११६-१२४ ई० तक था। उपवदत्त उसका जामाता था। उपवदत्त को ऋषभदत्त कुछ विद्वान् मानते हैं। उपवदत्त के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि महाराष्ट्र, उत्तरी कोंकण, उज्जैन तथा अजमेर पर नहपान का राज्य था। नासिक अभिलेख इस पर
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७० राजतरंगिणी थे। कन्या का विवाह सातवाहनवंशीय राजा वशिष्ट पुत्र शातकर्णी (पुळयोमी-१ सन् १०७-१३१ ई०) के साथ हुआ था। शिलालेखों के आधार पर साधिकार कहा जा सकता है कि दूसरी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य का उदयकाल आरंभ होता है। इस समय उज्जैन पर शक वंश का राज्य था। उनका विस्तृत विवरण तथा क्रमानुसार राजाओं का निश्चय करना कठिन है। सन् ३४० ई० में रुद्रसेन तृतीय के समय शकों का उत्थान होने लगा था। परन्तु गुप्त साम्राज्य के उत्थान के कारण उनकी उन्नति आकस्मिक प्रमाणित हुई। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने मालवा तथा सौराष्ट्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उदयगिरि के शिलालेख तथा हर्ष चरित्र से यह घटना सत्य प्रमाणित होती है। शक संवत् का व्यापक प्रचार था। मुख्य कारण था। दक्षिण में शक राज्य स्थापित हो गया था। लगभग २०० वर्षों तक वहाँ शक सत्ता स्थापित रही। इस लम्बे काल में शक राजाओं ने शक संवत् का प्रयोग आरम्भ किया था। प्राचीन तथा मध्ययुग में काशी तथा उज्जैन ज्योतिष के मुख्य केन्द्र थे। पंचांग तथा पत्र यहीं तैयार होता था। उनका प्रचार समस्त भारत में होता था। उत्तर भारत में शक संवत् शक राज्य सत्ता के अभाव के कारण प्रचलित न हो सका। किन्तु दक्षिण तथा मध्यभारत में शकराज्य तथा उसका प्रभाव के कारण शक संवत् पूर्णतया प्रचलित था। प्राचीन विक्रमीय संवत् का प्रचलन कम हो गया था। पुराणों के काल तथा उनकी मान्यता के विवाद में न केवल यह कहना अलम् होगा कि पुराणों में शक जाति, उनके आचरण, व्यवहार तथा व्यवस्था का विशद वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण में शकों को चार वर्गों में विभाजित किया गया है। तत्र पुण्या जनपदाश्चतुर्वर्णसमन्विताः । मगाश्च मगगाश्चैव गानगा मन्दगास्तथा ॥ मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मगगाः क्षत्रियाः स्मृताः । वैश्यास्तु गानगा ज्ञेयाः शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः ॥ भविष्य पुराण १ : १३९ ब्रह्म पुराण में शकद्वीप निवासियो को चार वर्णों में विभाजित किया गया है : मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा गमधाः क्षत्रियास्तु ते । वैश्यास्तु मानसास्तेषां शूद्रा ज्ञेयास्तु मन्दगाः ॥ शाकद्वीपे स्थिते विष्णु सर्परूपधरो हरिः । यथोनैरिज्यते सम्यक् कर्मोभिर्निपधात्मभिः ॥ ब्रह्म पुराण २० : ७१-७३ शकद्वीप के ब्राह्मण - मग थे। क्षत्रिय - मगगा थे। वैश्य - मगा तथा शूद्र - मन्दगा थे। मग शब्द ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त किया गया है। शकद्वीप के ब्राह्मण किसी समय बहुत उत्तम कहे गये थे। उत्तर प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर शाकद्वीपी ब्राह्मणों की काफी आबादी है। उन्हें शाकलदीपी ब्राह्मण कहते हैं। भारत में शाकद्वीपी ब्राह्मण भगवान श्री कृष्ण के यशस्वी पुत्र श्री शाम्ब द्वारा सूर्य पूजा निमित्त बुलाए गये थे। इसका उल्लेख शाम्ब पुराण में मिलता है। एक मत है कि मग शकों के पुरोहित थे। ब्राह्मणों
[Header] परिशिष्ट ज ७१ में श्रेष्ठ थे । मग ब्राह्मण दक्षिण भारत तक पहुँच गये थे । कूर्म पुराण (४८:३६) तथा महाभारत (६:२) के अनुसार शकद्वीप के ब्राह्मण मग कहे जाते थे । सदुक्ति कर्णामृत (सन् १२०१ ई०) छह मग ब्राह्मण कवियों का उल्लेख किया गया है । साम्बः सूर्यप्रतिष्ठां च कारयामास तत्त्ववित् । उदयाचले च संधित्य यमुनायाश्च दक्षिणे ॥ मध्ये कालप्रियं देवं मध्याह्ने स्थाप्य चोत्तमम् । मूलस्थानं ततः पश्चाद् अस्तमानाचले रविम् ॥ स्थाप्य त्रिमूर्ति साम्बस्तु प्रातर्मध्यापराह्निकम् ॥ -साम्ब पुराण २०:३०-३१ कथा है कि साम्ब ने चन्द्रभागा अर्थात् चेनाव के तट पर एक सूर्य मन्दिर स्थापित किया था । नदी के तट पर उसका आश्रम था । मन्दिर बनकर तैयार हो गया । साम्ब ने भगवान् नारद से मन्दिर के पुरो- हित किंवा पुजारी के विषय में सलाह ली । किसे पूजा का भार सौंपा जाय । नारद ने कहा । जम्बूद्वीप के ब्राह्मणों में श्रेष्ठता पूर्व जैसी नही रह गयी है । शकद्वीप से पूजा निमित्त ब्राह्मण बुलाए जाँए । गर्हितं मानवं शास्त्रं प्रशंसन्ति ते द्विजाः । साम्ब पुराण २६:२० न योगं परिचर्यायां जम्बूद्वीपे यमानथ । मम पूजाकर गत्वा शाकद्वीपादिहानय ॥ -भविष्य पुराण १.१३९ नीलमत पुराण में शक जाति का उल्लेख मिलता है । कश्मीर निवासी शक जाति से परिचित थे । यथा : दार्याभिसारगान्धारजुहुण्डुरशकान् खसान् । तङ्गणान् माण्डवान् मद्रानन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ ८० = २२२-२२१ × × × दार्वीभिसारगान्धारजुहुण्डुरशकाः खसाः । तङ्गणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ १३९ - १८२ × × × इतिहासज्ञ तर्न का सुझाव है कि कुछ समय तक कश्मीर के दक्षिणी भाग पर देमित्रियस राज्य करता था । (तर्न : ग्रीक्स इन बेक्ट्रिया एण्ड इण्डिया: १५५) मिनान्दर अर्थात् मिलिन्द के विषय में भी कतिपय विद्वानों ने उल्लेख किया है कि कश्मीर मिलिन्द के राज्य में था । मिलिन्द पञ्ह का संवाद राजा मिलिन्द तथा नागार्जुन में केवल कश्मीर से बोस योजन दूर पर हुआ था । कश्मीर के इतिहास के ग्रीक तथा मिलिन्द के कश्मीर भूमि के राज्य करने का कहीं उल्लेख नहीं मिलता । प्रसिद्ध राजा तूरमाण शक था । असुर देश अर्थात् असीरिया के सन् ८४३ वर्ष ई० पू० के एक आलेख में 'माद' जाति का उल्लेख मिलता है । उनका पार्स जाति के साथ उल्लेख किया गया है । मग ईरानी पुरोहित वाचक शब्द मगुश का अपभ्रंश है । आगे चलकर यह शब्द अपभ्रंश होकर 'मोवज' रूप से प्रयुक्त होने लगा । मगपति अर्थात् प्रधान पुरोहित
७२ राजतरंगिणी के लिए 'मोगजन' 'मोगज' शब्द अभिहित हुआ। निष्कर्ष निकलता है। मग जाति पुराण वर्णित मग ब्राह्मण अर्थात् शाकद्वीपी ब्राह्मण है। 'मगम', जाति शाकद्वीपी क्षत्रिय है। उन्हें महाभारत में 'मेमक' कहा गया है। गामग जाति वैश्यों के निकटवर्ती जाति थी। गोग तथा मगोग शब्द का पुरातन बाइबिल में प्रयोग किया गया है। बाइबिल के गोग के देश को मगोग कहा गया है। ( इजकील ३८ : २-९) बाइबिल में उन्हें आक्रामक जाति रूप में चित्रित किया गया है। उनके सर्वनाश की भविष्यवाणी की गयी है। अलकसुनदर अर्थात् सिकन्दर के अभियान काल के वर्णनों में भी गोग तथा मगोग जातियों का उल्लेख मिलता है। उन्हें उत्तर-पूर्व के बारह राज्यों तथा एक दूसरे स्थान पर वाईस राज्यो में से एक राज्य माना गया है। 'गोग' तथा 'मगोग' सम्भवत हिब्रू द्वन्द्व है। उसका अर्थ सीमान्त स्थित बर्बर जाति है। उन्हें मध्ययुग में 'चित' 'मचिन' कहने लगे थे। उनका पूर्व एशिया में आवाद होना माना गया है। शक को बाइ- बोलीने में गिमरो कहते थे। इसका अर्थ घूमन्तू जाति होता है। उन्हें कालान्तर में सोथियन अर्थात् शक कहा जाने लगा था। पाणिनि काल अर्थात् पाँचवी अथवा चौथी शताब्दी ईसा पूर्व चीन ईरान आदि देशों की ओर से शकों पर आक्रमण होने लगे। आक्रमणों द्वारा त्रस्त होकर रक्षा निमित्त शक भारत की ओर बढे। ईरान में शक जाति एचमोनियन साम्राज्य स्थापन के समय ख्याति प्राप्त कर चुकी थी। यूनानी लेखकों ने स्काइस, नक किंवा शाह शब्द का प्रयोग इन घूमन्तू जातियों के लिए किया है। वे चीन की सीमान्त जातियां थी। हिरोडोट्स (४८४-४३१ वर्ष ईसा पूर्व) ने शकों की मुख्य शाखा को राजकीय शक कहा है। वे मिरोम के दूसरी तरफ पूर्व और अजोव सागर तथा क्रीमिया के दक्षिण बसे हुए थे। हिरोडोट्स के अनुसार राजकीय शब्द तीन मुख्य वर्गों में विभक्त थे। उनके राजा स्कोपसिस इदन्थाइसस और तक्षासिस थे। हिरो- डोट्स ने शकों मे चार वर्ण अथवा वर्ग का वर्णन किया है। मगम राजकीय शक थे। उनके अतिरिक्त और का उल्लेख किया है। गामग उनमें कृषक थे। मण्डीस शूद्र अर्थात् दास थे। भारतीय पुराणों तथा महाभारत में वर्णित शको के चार वर्ण इस प्रकार हिरोडोटस के वर्णन से मिल जाते हैं। अर्थात् मग ब्राह्मण थे। राज- कीय शकों में क्षत्रिय, कृषक, शिल्पी, वैश्य तथा शूद्र थे। लगभग सन् १५० ईसा पूर्व सरमेटिन जाति ने शको को पराजित किया था। यह जाति ईरानी थी। शकों से उनकी वेशभूषा तथा भाषा मिलती थी। इस जाति के लोग चतुर अश्वारोही थे। उनके अश्वों की जोन में पातु के पदाधान अर्थात् रकाब थे। अश्वारोही आक्रामक रण कौशल तथा चातुरी के कारण शकों पर हावी हो गये थे। उनकी स्त्रियों का स्थान घर तथा कुटुम्ब के साथ ही साथ युद्धस्थल भी था। सोम- रियन जाति की कन्या का विवाह तब तक नही हो सकता था, जब तक कि वह अपने किसी शत्रु की हत्या नहीं करती थी। सम्भव है कि इसी जाति की स्त्रियों की शक्ति के कारण स्त्री राज्य अथवा अमजोन्स की कल्पना की गयी थी। कल्हण ने राजतरंगिणी में राजा ललितादित्य के दिग्विजय के प्रसंग में स्त्रीराज्य का वर्णन किया है। दोनो-अञ्चल में इसी प्रकार के स्त्री सैनिक की एक समाधि मिली है। यह स्थान निकालेंस से १० मोल दूर होगा। जहाँ वह उनके शस्त्र तथा वेशभूषा का सम्बन्ध हूँ कुशान जाति से मिलता है। उन्होंने रणनीति में एक प्रकार से आमूल परिवर्तन किया था। धनुष के स्थान पर बर्छा, लम्बी कृपाण तथा चक्र
परिशिष्ट ञ ७३ तुल्य आयुध बाण धारी थे। इस प्रकार के शस्त्र भारत में कनिष्क तथा विमकद फिसेस की मूर्तियों पर बने मिलते हैं। अनुमान लगाया जा सकता है। भारतीय कुशान, यू-ची, यू-शून-अलान तथा सरमेतीयास एक ही ईरानी जाति थी। कालान्तर में स्थान भेद के कारण उन्हे अन्य संज्ञाएँ दे दी गयी थी। यू ची शक जाति का एक नाम था। शक जाति प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व में काब्दास प्रदेश तथा कीमिया के मध्य में घूमती रहती थी। शकों की राजकीय समाधि जिसे स्थानीय भाषा में कुरगन कहते हैं पजिरिक कतन्द, शैव, साइबेरिया के करतोब से लेकर मैकोप, कलरमिस, कुब ओव, सेमी वृत्तनी प्रसकाकेशिया, दारतोम्लाहक मलशुनोव वोरोनेझ आदि रूस तक एक सूत्र में मिलती है। प्टालेमी मध्य एशिया के सिनीरिया को सीथिया कहता है। उन्हें अश्वभोजी मानता है। (हयमेघ- अश्वमेध)। शक जाति सरल स्वभाव की थी। उनके जीवनोपयोगी सामान हल्के होते थे। वे चतुर अश्वारोही होते थे। उनका निशाना अचूक बैठता था। वे विलक्षण आक्रामक होते थे। अलकसुन्दर (सिकन्दर) ने उत्तरी शकों पर डैन्यूब नदी पार कर आक्रमण किया था। अपना सशस्त्र अभियान सीर दरिया पर एक दुर्ग बनाकर समाप्त किया था। निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। गोग तथा मगाग जाति का आक्रमण रोकने के लिये उसने लोहे तथा पीतल का द्वार निर्माण कराया था। सिकन्दर की यह योजना उसी प्रकार विदेशी आक्रमण रोकने की थी जिस प्रकार चीन ने अपनी विशाल दीवाल का निर्माण विदेशी आक्रमण को रोकने के लिए किया था। भविष्य पुराण वर्णित गणग तथा गग शब्दों का इन्ही गोग तथा मगाग जातियों के लिए प्रयोग किया गया है। शकद्वीप के तीन जातियो मग अथवा मक, मगग अर्थात् महाभारत के मशक, गणग अर्थात् भार- तीय गणक का वर्णन किया जा चुका है। शको की चौथी जाति मंडग है। इसे ननदक, मदक, मनक कहते है। यह ईरानी जाति 'मद' है। बैबलोन के अतिरिक्त अन्य मध्य एशिया के साहित्य में इसे मंड नाम की संज्ञा दी गयी है। हिताइत संहिता धारा ५४ में 'उमान मण्ड' शब्द का उल्लेख आया है। उरमियह झील के दक्षिण-पूर्व के भूखण्ड को 'मन' कहते थे। इसी मूल शब्द से किंवा अपभ्रंश रूप यूनानी शब्द मानियेनी किंवा मीर्तनी है। 'मद' अथवा 'मीड्स' जाति को सीरिया किंवा अपसीरिया (असुर) के लोगों ने महान् शक्तिशाली, पूर्वीय दूर देशीय जाति कहा है। कालान्तर में हृयदान, निहवन्द, इशफहान, राय तथा अजरवैजान भूखण्डों का नाम मीड्स देश और साम्राज्य का नाम मीडियन साम्राज्य पड़ गया। भारतीय पुरा साहित्य में शकद्वीप के चार वर्णों का वर्णन किया गया है। यह ऐतिहासिक तथ्य है। उक्त उदाहरणों से प्रमाणित हुआ है। वे शक जाति की और उपजातिया थी। मार्कोपोलो ने शीर वान (शीरवान) का उल्लेख किया है। आधुनिक अन्वेषणों से सिद्ध होता है कि शीरवान शब्द काश्यिपयन सी अर्थात् कश्यप सागर के लिए प्रयुक्त किया गया है। मुस्लिम भौगोलिक विद्वान् हुदूद-अल-आतये ने कैश्यिपयन सागर के पश्चिमोय तटीय क्षेत्र का नाम शीरवान दिया है। हमदुल्लाह कम विनी कहता है। कुरु से देकन्द का भूभाग शीरवान में सम्मिलित था। दस्तखरी कहता है—वर्ध से सड़क शीरवान तथा शमाखिया से देकन्द जाती है। कुर्दिस्तान की एक नदी का नाम शीरवान है। ईरान की एक नदी का नाम शीरोन है। वह बस्ररंग पहाड़ी से निकल कर फुज रुक जिला १०
७४ राजतरंगिणी में अर्जंजन के दक्षिण-पूर्व बहती है । इस में एक नदी का नाम मोलांग्य है । मोलांग्यो स्त्री भाषा में दूध को कहते हैं । पूर्व मुस्लिम काल में यहां के राजाओं की उपाधि शोरयान शाह थी । सोलहवी शताब्दी के पूर्व वक्षु अर्थात् आमू दरया कैस्पियन सागर में मिलती थी । प्राकृतिक कारणों से धारा बदल गयी । इस समय यह अरल सागर में गिरती है । कैस्पियन सागर तथा अरल सागर पूर्व काल में मिले थे । इस समय दोनो सागरो के बीच विस्तृत भूखण्ड है । कैस्पियन सागर का वर्तमान रूप पूर्व रूप से भिन्न है । कैस्पियन सागर शताब्दियो पहले पूर्व दिशा में बहुत दूर तक फैला था । आज यहां सूखा भूभाग है । उत्तर में इसी प्रकार बहुत दूर तक चला गया था । अरल सागर कैस्पियन सागर का एक भाग है । कैस्पियन सागर तथा अरल सागर के मध्य का भूखण्ड कैस्पियन सागर में जलमग्न था । अतएव आमू ( वक्षु ) तथा सीर दरया दोनो कैस्पियन सागर में मिलती थी । अरसीद तथा सहसनीट काल में आर्यों तथा पारसियों का गाथाकालीन मूलस्थान आमू तथा सीर दरया के अन्तर्वेदी ( दोआब ) में था । उसे स्वर्णयुग का देश कहते थे । कालान्तर में जेंगा वेन्दोदद से प्रतीत होता है यम शीत तथा प्राकृतिक उपद्रवो से बचने और आबादी अधिक होने के कारण दक्षिण दिशा की ओर जनता को ले गया । यह स्थान आर्यों के पूर्व उस समय था । आर्यों का ज्ञातव्य जगत् महा जाता था । आर्यों के देश त्याग देने पर अनार्य जातिया वहा बस गयी । तूर्य शब्द अनार्य जातियों के लिए अभिहित किया गया है । अतएव पारसी ग्रन्थो में शको का उल्लेख होना अनिवार्य प्रतीत होता है । उसका कारण है । शको द्वारा आबाद भूभाग के साथ पारसी जाति के धर्म तथा इतिहास का निकट सम्बन्ध हो जाता है । पारसियों के ग्रन्थो में आर्य, तूर्य, शरिम, सैन तथा दाह जाति का उल्लेख मिलता है । पश्चिमीय विद्वानों का मत है तूर्य तथा सरीमा शब्द शको के लिए आया है । ईरानी गाथा पुस्तकों में सरोया, तूर्य तथा आर्य ध्रोतोना के तीन पुत्र कहे गये है । कालान्तर में ध्रीतोना का रूप अचमीनिअन काल में यह क्षेत्र शक तथा शकतिग्रखोदा जातियो द्वारा आबाद था । कुछ समय पश्चात् शको ने इस क्षेत्र को त्याग दिया । सीस्तान में चरभूमि तथा कालक्षेप की सुविधाओ के कारण आकर बस गये । एक मत है कि पामीर के गलचा तथा शाल्ती जाति पूर्वकालीन शक वंशज हैं । यह दोनो जातिया इस समय पाकिस्तान द्वारा अधि- कृत कश्मीर में है । उनका नाम फरीदून शब्द में बदल गया है । उस समय आर्य, तूर्य, तुर्क तथा सरिय एक ही थे । फिरदौसी की गाथा में फरोदून के पुत्रो का नाम सम, जल, तथा रुदवाह मिलता है । कालान्तर में तूर्य सज्ञा शक जाति के लिए दी जाने लगी । तोखनि, कुशान, खिषोनाइट, सकरोसाह, तथा तुर्क जाति की मूल जाति तूर्य हैं । ऋग्वेद में तुर्वसु का उल्लेख है । भागवत पुराण के अनुसार जनमेजय के पुरोहित तुर्कावशेय तुर्वसु जाति के वंशज थे । म्लेच्छ तथा यवन तुर्वसु की सन्तान माने जाते हैं । ( वायु पुराण ९९ : ३; भागवत १० : २२, २५, २७ ) स्वर शब्द का अर्थ शीघ्रगामी अथवा जल्दी होता है । तुर्ग शब्द अश्व का भी वाचक है । तूर्य अथवा शक लोग अश्वारोही थे । शीघ्रगामो थे । तूर्य शब्द वैदिक शब्द तुर्ववसु अथवा स्वर का अपभ्रंश हो सकता है । फिरदौसी तूरान क्षेत्र को तूर, तुर्क तथा चीनियो का निवास स्थान मानता है । आमू दरया को
तूरान तथा ईरान की मध्यवर्ती सीमा लिखता है। पारसी लोग आमू दरया के पारवर्ती देश के निवासी थे । उसे मर्ज-ए-तूरान कहते थे । अरब भौगोलिक तुर्कों का मूलस्थान सीर दरया के पूर्वोय क्षेत्र को मानते हैं । वोल्गा नदी को रूस में एक समय नहर तूरान कहते थे। वोल्गा तक का क्षेत्र रूसियों की दृष्टि में तुर्कों का निवास-स्थान था। तूरान, राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी अर्क-ढघ थी। इसे यूराल पर्वत कहा जाता है। तूरान देश को कैस्पियन सागर, ईरान अधित्यका, सीर दरया का उद्गम स्थान तथा उसकी पर्वतमाला, इरतिश एवं अकमोलित्स की अधित्यका के मध्यवर्ती क्षेत्र को शकदेश मानते हैं। इस प्रकार निष्कर्ष निकलता है कि ईरानी तूर अर्थात् जिसे शक कहते थे, वे कैस्पियन सागर के चारों तरफ सीर तथा आमू दरया से लेकर कैस्पियन सागर और वल्गा तथा डान नदी तक फैले थे । प्रश्न उपस्थित होता है। उक्त नदियों का वर्तमान नाम क्या है। उन्हें कैसे पहचाना जा सकता है । यदि उक्त नदियां शकद्वीप में मिल जांय तो शकद्वीप के मानचित्र का वास्तविक पता महाभारत के अनुसार प्राप्त हो सकता है। साथ ही महाभारत वर्णित शक देश की सत्यता सिद्ध हो जाती है। शकद्वीप स्थान क्षेत्र निर्विवाद हो जाता है । सीता नदी चीनी सीतो नदी है। उसे इस समय सीर दरया कहते हैं। इश्क, कुलसर, थटनशाह के दक्षिणी अधित्यका से निकलती है। यह पश्चिम बहती है। मणिनला नदी वर्तमान जरफशा नदी है । जरफशाम का अर्थ होता है जर अर्थात् सोना फैलाने वाली । वह नदी जबल अलबुत्तम पर्वतमाला से निकलती है। पर्वतमाला की ढाल पर सोना, चांदी, लोहा, ताम्बा, आदि की खानें हैं। यह नदी एक जप अथवा जनसर से निकलती है। पजोकंथ, समरकन्द, बोखारा बहती ह्वारिजम के समीप पश्चिमोय मरुभूमि के उथली दलदलीय सर में गिरती है । यह महाभारत वर्णित नदी मणिनल है । क्योंकि इसके जल में स्वर्ण, रजतादि के साथ मणि मिलते हैं। इसीलिए इसका नाम मणिनल रखना पडा है। इसके दक्षिण में वक्षु अथवा आमू दरया है। इस नदी की अनेक शाखा नदियां हैं। वकक्षाव इसकी एक शाखा नदी है। यह पामीर पर्वत से निकलती है। यह हजारो मील की यात्रा करती पूर्वकाल में कैस्पियन सागर तथा इस समय अरल सागर में गिरती है। चीनी भाषा में इसे पोत्सू तथा अलइदडीसी इसे बकक्षाव कहता है। वक्षु नदी के दक्षिण सघानियन जिला है। यह वर्तमान शर-एर- अशया है। सघानियन नदी के ऊर्ध्व भाग पर यह आबाद था। यह आमू की एक शाखा नदी है। इसे नहर जमील कहते हैं। कैस्पियन सागर में पश्चिम तथा उत्तर से गिरने वाली नदियों में वोल्गा है। प्टोलमी ने 'र' नदी कहा है। ईरानियन इसे 'रन्हा' कहते हैं। यूनानी अरस्तू इसे 'अर्स' या 'अरक्ष' कहते हैं। हिरो- डोट्स ने इसके लिए 'अर्जैस' शब्द का प्रयोग किया है। मूल शक शब्दावली में 'अरस' या 'अर्स' का अर्थ महान् होता है। अरब भौगोलिक विद्वानों ने वोल्गा को 'इत्तिल' कहा है। बलगार जाति इसके तट पर आबाद हो गयी। अतएव इसे वोल्गा कहा जाने लगा। पश्चिमी विद्वानों का मत है। वोल्गा का अर्थ आर्य स्लेवोनिक भाषा में महान् अथवा बड़ा होता है। एक ओर मत है। वोल्गा शब्द संस्कृत दन्द द्रकू का अप- भ्रंश है। रूसी लोग इसे वोल्गा न कहकर वोल्फा कहते हैं। 'व्रक' किंवा 'वृक' का अर्थ भेड़िया होता है। इसकी मुख्य शाखा नदी 'कम' है। अनुमान लगाया गया है। कम तथा 'र' मिलाकर इसका नाम कुमारो रखा गया था । कुमारी नदी का सप्त नदियों में उल्लेख है। शक भाषा के शब्द 'अर' का अर्थ कुमारी होता है। 'अर' का अपभ्रंश किंवा समानार्थक शब्द 'अर्स' अथवा 'अरक्ष' है। यह वोल्गा का प्राचीन नाम कहा जाता है ।
७६ राजतरंगिणी कैस्पियन सागर में गिरने वाली कुम एक और नदी है। सम्भवतः यह नदी कुमारी है। महाभारत में सुकुमारी तथा कुमारी नाम आता है। सभी लोग वोल्गा को प्रगविन सी कहते हैं, जिसका अर्थ सुकु- मारी होता है। पश्चिम से काश्यप सागर में मिलने वाली नदी 'कुर' है। महानदी वर्तमान नदी 'डान' है। इसका ईरानी नाम दन है। दन नाम ही दोन है। 'दन' तथा 'दोन' का अर्थ जल होता है। 'दन' का अर्थ नदी है। यह विशाल नदी है। अतएव उसे महानदीकी संज्ञा दी गयी है। 'अजोव' सागर में गिरती है। ईरानी घूमन्तू जातियां यथा सेमोरियन, गोथियन, सरमोनियन आदि प्राचीन काल में इस नदी की उपत्यका में रहती चली आई हैं। हिरोडोटस् डान नदी को शक द्वीप की पूर्वीय सीमा मानता है। शकद्वीप में सात वर्ष हैं। शकद्वीप के वर्णित सात वर्षों में गुरुमार तथा कुमार किंवा सुकुमारी तथा कुमारी अर्थात् वोल्गा तथा कुम नदी की उपत्यकाएं हैं। मणितोत्थन, मणिनजा नदी की उपत्यका है। मोदाको ऐतिहासिक मोडिया का क्षेत्र है। कुमुदोत्तर, यूनानी लेखको का कोमोडोई प्रदेश है। यह प्रदेश आमूदरया तक विस्तृत है। 'महाकास' किंवा 'महाकोष' 'अरवस' अर्थात् 'गोथिया' है। 'महापुरुष' शब्द लम्बे-चौड़े डील-डौल वाले लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है। शकद्वीप का प्रारम्भिक भारतीय ब्राह्मण तथा बौद्ध ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इस काल में पृथ्वी चार भागो में विभाजित की गयी थी। मौर्य तथा कुशान काल में जम्बूद्वीप के अन्तर्गत भारतवर्ष का बोध होने लगा। जम्बूद्वीप बृहत्तर भारतवर्ष के लिए प्रयुक्त किया जाता था। जम्बूद्वीप में उत्तर कुरु अर्थात् तरिम उपत्यका तथा तुर्किस्तान सम्मिलित था। कालान्तर में पृथ्वी सात वर्षों में विभाजित की गयी। कर्नल टाड का मत है कि शक जाति तक्षक थी। वे अस्ररमा अर्थात् शकद्वीप में शासन करते थे। (टाड एनाल्स एण्ड एण्डिक्वेरी आफ राजस्थान ४५) श्री वी० बी० आयर का मत है कि शक द्वीप आक्स नदी के मूल, जक्सर्टीज तथा वक्षु जलीय सिंचित क्षेत्र, ओर सिन्धु नदी में पानी जिन क्षेत्रो से बह- कर उत्तर-पश्चिम भारत में आता है वही शक देश है। शक तथा कुश द्वीपो का अस्तित्व भिन्न है। कुशद्वीप का उल्लेख लेखो में मिलता है। कुश अथवा कुशिया शब्द परशियन के बहुत से लेखों में मिलता है। हमदान लेख में (सम्राट् दारयूह ईसापूर्व ५१२- ४८६ वर्ष) राज्य का विस्तार दिया गया है। युमारा क्षेत्र वक्षु तथा सीर दरया के मध्य था। कुछ विद्वान् कुशद्वीप को मध्य मिश्र और कुछ अबोसीनिया मानते हैं। मुद्य नाम मिश्र का था। मुद्य तथा कुश परसियन सम्राटों के क्षत्रपोके क्षेत्र में वर्णित किये गये हैं। मिश्र कुशद्वीप नहीं हो सकता। कुशद्वीप का अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम होना सम्भव प्रतीत होता है। मिश्र के परे और भारत के पश्चिमी समुद्र के ठीक पश्चिमोय छोर पर अबीसीनिया इस समय भी स्थित है। इसका कुशद्वीप होना सम्भव है। शकद्वीप का शाब्दिक अर्थ समुद्र या नदियों से घिरा भूखण्ड है। सात द्वीपों से वसुमती अर्थात् पृथ्वी बनी है। सप्त द्वीपों में—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रोंच, शक, तथा पुष्कर द्वीप हैं। शकद्वीप का नाम शाकद्वीप भी है। शक लोग शकद्वीप में रहते थे। यूनानियों ने इनका नाम सीथियन रखा है। पश्चिमा विद्वानो ने यही नाम शकों के लिए दिया है। प्राचीन पारसी लेखो में शको के तीन निवास- स्थानों का उल्लेख मिलता है।
परिशिष्ट ञ ७७ कुछ विद्वानों का कथन है कि शक लोग ईरान के पूर्वीय भाग हेलमण्ड अंचल में रहते थे । शकों का पुराना तथा नवीन सभी स्थान सीथिया नाम से सम्बोधित होता है । पूर्वी ईरान को शकस्तान कहते थे । वर्तमान नाम सीस्तान है । मध्यकालीन समय में इसे सिजिस्तान ईरानी तथा भारतीय शकद्वीप कहते थे । भारतवर्ष की आजादी के पश्चात् भारतीय ऐतिहासिकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है । नवीन अन्वेषणों अनुसन्धानों से भारतीय इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ रहा है। रूसी विद्वानों के मध्यएशिया की खोज करने, खनन कार्यों तथा प्राप्त अभिलेखों आदि के कारण भारतीय इतिहास की अनेक गुत्थियाँ जो अभी तक उलझी पड़ी है, उनके सुलझने की आशा हो गयी है । मध्यएशिया, अफगानिस्तान में अभी बहुत कुछ खोज तथा खनन कार्य करना बाकी पड़ा है। उनमें जितनी शीघ्रता से प्रगति होगी उतनी ही शीघ्रता पूर्वक भारतीय इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा । भारतीय संस्कृति के विकास तथा उसके इतिहास पर भी मध्य- एशिया मुख्यतः शकों के इतिहास का वास्तविक ज्ञान होने पर नवीन दृष्टि से विवेकात्मक नवीन इतिहास रचना की आशा अनेक विद्वानों को होने लगी है । ०
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परिशिष्ट झ ७९ छान्दोग्योपनिषद् में उद्दालक आरुणि ने सद्गुरुवाले शिष्य को अपने अंतिम लक्ष्य पर पहुँचने के उदा- हरण के सम्बन्ध में गान्धार का उल्लेख किया है। शतपथ ब्राह्मण के (११ : ४ : १) तथा अनुवर्ती वाक्यों में उद्दालक आरुणि का उदीच्यों किंवा उत्तरी देश गंधार ) के निवासियों से सम्बन्ध बताया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् (६:१४) में गान्धार का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसका उल्लेख उपनिषद् तथा ब्राह्मण काल के पश्चात् सूत्र काल तक किया गया है। बौधायन श्रौत सूत्र में गान्धार का उल्लेख मिलता है। (२१:१३) आपस्तम्ब श्रौत सूत्र (२२ : ६ : १८) में तथा हिरण्यकेशी श्रौत सूत्र (१७:६) में गान्धार का स्पष्ट उल्लेख है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में गान्धार शब्द का उल्लेख एक जन के सम्बन्ध में किया गया है। वहाँ के निवासियों को गांधारी कहा गया है। (ऋ० १:१२६ : १८) छान्दोग्योपनिषद् (६ : १४ : १२) तथा वैदिक साहित्य के अनुसार भारत के उत्तर-पश्चिम गान्धार एक जनपद था। राजा भाव्य अथवा भव्य द्वयय की स्त्री लोमसा ने गान्धार के वस्त्रों की बहुत प्रशंसा की है। भाव्य सिन्धु तटीय देश पर राज्य करता था। ऋग्वेद में गान्धार के भेंडो के ऊन की प्रशंसा की गयी है। (ऋग्वेद १:१२६ : १८) अथर्ववेद में अंगों तथा मगधों के साथ मूजबन्त तक गन्धार लोगों का उल्लेख किया गया है। अथर्ववेद का काल ऋग्वेद से बहुत पश्चात् का है। उस काल में भी जगत् को गान्धारों का यथेष्ट ज्ञान था (अथर्ववेद ५:२२:१४)। अथर्ववेद में गंधारियों किंवा गान्धारों का उल्लेख मूजवंतो के साथ किया गया है। उनकी गणना अवमानित जातियों में की गयी है। श्रौत सूत्रों में गान्धार जनपद तथा वहाँ के निवासियों का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वानों का मत है। गान्धार निवासी कुभा अर्थात् काबुल नदी के तट, सिन्धु कुभा संगम, तथा सिन्धु के पूर्वीय तट पर कुछ दूर तक आबाद थे। कालान्तर में वे पारसी राज्य के अंग हो गये थे। पारसी राज फर्कसीज ने गान्धारों की सेना के साथ यूनान पर आक्रमण किया था। गान्धारराज नग्नजित का नाम वैदिक साहित्य सोम के स्थान पर अन्य वस्तु के उपयोग का मत दिया था। (शतपथ ब्राह्मण ८: १:४:१०; ऐतरेय ब्राह्मण ७:३४)। शतपथ ब्राह्मण (११ : ४ : १) में उद्दालक आरुणि का उदीच्यों अथवा उत्तरी देश गंधार के निवासियों के साथ संबन्ध बताया गया है। पुराणों में गान्धार का उल्लेख प्रचुर रूप से मिलता है। गान्धार का एक चन्द्र पौरववंशीय राजा था। उसके पिता का नाम आरद्वान किंवा अनुरुद्ध था। द्रुह्यु की चौथी पीढ़ी में हुआ था। उसने उत्तर- पश्चिम में गान्धार देश आबाद किया था। (वायु पुराण ९९:७:१० तथा विष्णु पुराण ४:१७:१)। गान्धार के नरेश को वायु तथा मत्स्य पुराणों ने द्रुह्युवंशी बताया है। (मत्स्य ४८:६; वायु ९९:९७) ब्रह्माण्ड पुराण के मत से गान्धार की चौथी पीढ़ी में प्रचेतस के एक शत पुत्र हुए थे। उन सबको म्लेच्छाधिप कहा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७४ : ११)। मत्स्य तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में गान्धार का उल्लेख यवन, सिन्धु, सौवीर के साथ किया गया है। मत्स्य, वायु तथा विष्णु पुराणों में वर्णन है। द्रुह्यु के वंश में एक गान्धार उत्पन्न हुए थे। द्रुह्यु राजा ययाति के पुत्र थे। उन्हीं के नाम पर गान्धार देश का नामकरण किया गया था। (मत्स्य पुराण ४८; वायु पुराण; विष्णु पुराण ४ : १७) भागवत तथा ब्रह्म पुराण के अनुसार गान्धार द्रुह्यु की चौथी पीढ़ी में हुआ था। गान्धार के चार पुत्र धर्म, धृति, दुर्गम तथा प्रचेता थे। भागवत (९-२३-१५) ब्रह्म (१३) मत्स्य पुराण के अनुसार गान्धार को केवल धर्म, विदुध तथा प्रचेता तीन ही पुत्र थे। विष्णु पुराण तथा वाराह मिहिर के
८२ राजतरंगिणी धर्म स्थान खण्डहर हो गये थे । उसके अनुसार उत्तर दिशा में गान्धार का विस्तार १००० ली पूर्व में सिन्धु नदी तक था । राजधानी पुरुषपुर अर्थात् पेशावर ४० ली के क्षेत्र में फैला था । गान्धार राजवंश का लोप हो गया । कपिशा राज्य के अन्तर्गत उसका शासन होता था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे । परन्तु देश धनधान्य पूर्ण था । उपज खूब होती थी । भूमि उर्वरा थी । अनेक प्रकार के अन्न, फल तथा फूल होते थे । लोग लज्जालु तथा कोमल हृदय थे । लोगों में साहित्य के प्रति रुचि थी । कुछ ही बौद्ध धर्मानुयायी बच गये थे । शेष मूर्तिपूजक तथा धर्म भ्रष्ट हो गये थे । पाणिनि का गान्धार प्रदेश में जन्म हुआ था । गान्धार की राजधानी पुष्कलावती किंवा पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व की ओर थी । गान्धार पहले सिन्धु के दोनो ओर फैला था किन्तु कालान्तर में सिन्धु नदी के पश्चिम ओर ही रह गया । पुष्करावती नगर को नींव भरत के पुत्र पुष्कर ने डाली थी । (विष्णु पुराण ४ . ५) । आठवीं तथा नवी शताब्दी में मुसलमानों के उत्कर्ष के साथ ही साथ यह देश शनैःशनैः उनके राज- नीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया । सन् ८७० ई० में अरब सरदार याकूब ने अफगानिस्तान पर आंशिक विजय प्राप्त की थी । अलप्तगीन तथा सुबुक्तगीन के आक्रमणों का वहाँ के हिन्दू नरेशों ने सामना किया था। सन् ९९० में लम्पक (लमगान) का दुर्ग हिन्दुओं के हाथो से निकल गया । काफिरिस्तान के अतिरिक्त समस्त अफगानिस्तान को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा । ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में हिन्दू शाही वंशजों के हाथ में गान्धार प्रदेश का शासन-सूत्र आ गया था । सन् १०२१ ई० में सुलतान महमूद गजनो ने गान्धारराज त्रिलोचन पाल पर आक्रमण किया । राजा तोंसी तट पर पराजित हो गया । गान्धार के हिन्दू धर्म तथा स्वतंत्रता दोनों का ही लोप हो गया । तत्पश्चात् केवल ५ वर्ष के लिए उसके पुत्र भीमपाल ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की । परन्तु मुस्लिम शक्ति के सम्मुख गान्धार मुस्लिम धर्म तथा संस्कृति में लोप हो गया । मुस्लिम इतिहासकारों ने गान्धार की राज- धानी तक्षशिला का वर्णन नही किया है। तक्षशिला अपना पूर्व गौरव खो चुका था। खंडहरो का ढेर मात्र रह गया था । मुस्लिम इतिहासकारों ने उसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण नही समझा । इम वैदिक काल से अठारहवीं शताब्दी तक गान्धार भारतीय राज्य का अंग होता और निकलता रहा है। उसका इतिहास भारतीय इतिहास में गुंथा है। उसे अलग रखना कठिन है। वहा भारतीय संस्कृति फली-फूली । यहाँ से बाहर गयी । ललित कलाएं विकसित हुईं । गान्धार का पुराना नाम, धर्मादि का लोप हो गया । उत्तर-पश्चिमीय सीमान्त प्रदेश के रूप में उसका अधिक क्षेत्र पाकिस्तान बनने के पूर्व भारत का अंग था । तक्षशिला का वर्णन करते हुए प्लिनी लिखता है कि नगर पर्वत मूल के उस स्थान पर आबाद था, जहाँ पर्वत भूमि में मिल जाता था । नगर समतल भूमि में बसा था । यह नगर की बड़ी प्रशंसा करता है कनिघम ने तक्षशिला में ५५ स्तूप, २८ विहार तथा ९ मन्दिरो का ध्वंसावशेष देखा था । नागार्जुनी कोन्डा के वीरपुरुष दत्त के अभिलेख में गान्धारका उल्लेख आया है। गान्धार में १००० से अधिक बौद्ध विहार थे । युवान्च्वाग के समय में उनको बुरी अवस्था थी । अनेक स्तूपों के शिखर खंडहर थे । लगभग १०० देव मन्दिर गान्धार में थे । पुष्करावती गान्धार को राजधानी थी । उसकी राजधानियां विभिन्न समयों में बदलती रही है । पुष्करावती किंवा पुष्कलावती तथा कभी तक्षशिला हो
परिशिष्ट ख ८३ जाती थी । पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व ओर आबाद थी । अभिधर्म कोष शास्त्र - एवं सुमंगल विलासिनी का रचयिता बसुबन्धु पुष्करावती का निवासी था । गान्धार जातक में गान्धार कश्मीर का उल्लेख मिलता है । दरायुह के बेहिस्तुन अभिलेख ( ईसा पूर्व पाँच सो बाईस से चार सो छियासी वर्ष ) गान्धार का उल्लेख है। दरायुह ( दारियस ) के सूसा प्रासाद के भग्नावशेष के एक अभिलेख में गान्धार का उल्लेख मिला है । जम्बूद्वीप की सीमा वर्णन में उत्तर-पश्चिम गान्धार तथा कश्मीर का उल्लेख किया गया है । सोलह जनपदों में कम्बोज तथा गान्धार को उत्तरापथ में सम्मिलित किया गया है । खुद्दक निकाय के उत्तरखण्ड चुल्ल निद्देस में गान्धार जनपद के स्थान पर भोन अर्थात् भवन जनपद का उल्लेख किया गया है । मज्झिम निकाय की अट्ठ कथा तथा पपंचसूदनी में गान्धार राष्ट्र सीमान्त पर स्थित जनपद बताया गया है । यहाँ पर कश्मीर गान्धार का नाम साथ-साथ लिया गया है । ( जातक भाग २ : ३६५ ) । अनेक विद्वानों ने इसके आधार पर कश्मीर को गान्धार के अन्तर्गत बताया है । यह अप्रमाणित है । ठीक नहीं है । मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, मत्स्य तथा वामन पुराणों में 'गान्धारा यवनाश्चैव' का उल्लेख मिलता है । गान्धार, यवन शब्द एक साथ प्रयुक्त किया गया । उनसे यवन देश तथा गान्धार का समीप होना प्रतीत होता है । सिन्धु अर्थात् आधुनिक सिन्ध प्रदेश सिन्धु नदी के पश्चिम तथा पूर्व में सिन्धु नदी के अधोभाग के पूर्व था । सोवीर क्षेत्र झेलम-चनाव संगम से ५० मील अधोभाग में था । भद्र देश वर्तमान सियालकोट तथा उसका समीपवर्ती क्षेत्र है । कुणिन्द लोगों के विषय में कहा जाता है कि कुलू अंचल के आधुनिक कुलेतस हैं । प्राचीन काल में यह अंचल सहारनपुर तथा अम्बाला जिले तक विस्तृत था । इस क्षेत्र से तत्कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं । पारद लोग खुराशान क्षेत्र के निवासी थे । यवन अफगानिस्तान में थे । यूनानी जाति अफगानिस्तान में आबाद हो गयी थी । राज्य वही स्थापित कर लिया था । कुहून शब्द काबुल नदी जिसका प्राचीन नाम कुभा किंवा कुहू था उसकी उपत्यका के निवासियो के लिए आया है। 'गान्धारान् वरयान् हुन्दान्,' 'गान्धारान् ओरसान् कुहून्,' 'गान्धारान् रुरसान् (ओरसान्) कुहून्' आदि उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मार्कण्डेय पुराणों में मिलते हैं । इससे निष्कर्ष निकलता है । गान्धार कुभा अर्थात् काबुल नदी की उपत्यका तक विस्तृत था । 'शिवपौरान् इन्द्रहार्यान्', 'शिवपौरान् इन्द्रभरून्' का उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराणों में मिलता है । शिव पौरान् से अर्थ शिव नगर के पौरगण से है । शिवपुर अर्थात् वर्तमान शोरकोट जिला पश्चिमी पाकिस्तान के लिए व्यवहृत किया गया है । संम्मोह तन्त्र की तालिका ( २ : ४ ) में गान्धार देश का उल्लेख किया गया है । 'हूण कौरव गान्धार' अर्थात् हूणों के समीप देश की ओर संकेत किया गया है । गान्धार का दूसरा नाम दिहन्दास दिया गया है । दोनों शब्द समानार्थक माने गये हैं । दिहन्दास वास्तव में उदभाण्डपुर प्रतीत होता है । गान्धार को कन्धार में मिलाने का प्रयास किया गया है परन्तु यह खींचातानी तर्कसम्मत नहीं मालूम होती । गान्धार की जो स्थिति तथा सीमा बतायी गयी है उसमे वर्तमान कन्धार का मेल नहीं खाता । सम्भव है । गान्धार के नाम पर अफगानिस्तान के दक्षिण में गान्धार नगर बसाया गया होगा ! हो सकता है गान्धार का अपभ्रंश वर्तमान कन्धार हो गया । भारत में काशी नाम के कितने ही स्थान हैं । परन्तु वाराणसी को ही काशी वास्तविक काशी राज्य रही । अन्यथा, दक्षिण काशी, उत्तर काशी अनेक स्थान काशी के नाम पर है ।
८२ राजतरंगिणी धर्म स्थान खण्डहर हो गये थे। उसके अनुसार उत्तर दिशा में गान्धार का विस्तार १००० ली पूर्व में सिन्धु नदी तक था । राजधानी पुरुषपुर अर्थात् पेशावर ४० ली के क्षेत्र में फैला था । गान्धार राजवंश का लोप हो गया । कपिशा राज्य के अन्तर्गत उसका शासन होता था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे। परन्तु देश धनधान्य पूर्ण था। उपज खूब होती थी । भूमि उर्वरा थी । अनेक प्रकार के अन्न, फल तथा फूल होते थे । लोग लज्जालु तथा कोमल हृदय थे । लोगों में गान्धर्व के प्रति रुचि थी । कुछ ही बौद्ध धर्मानुयायी बच गये थे । शेष मूर्तिपूजक तथा धर्म भ्रष्ट हो गये थे । पाणिनि का गान्धार प्रदेश में जन्म हुआ था । गान्धार की राजधानी पुष्कलावती किंवा पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व की ओर था । गान्धार पहले सिन्धु के दोनों ओर फैला था किन्तु कालान्तर में सिन्धु नदी के पश्चिम ओर ही रह गया । पुष्करावती नगर की नींव भरत के पुत्र पुष्कर ने डाली थी । ( विष्णु पुराण ४ . ५ ) । आठवीं तथा नवी शताब्दी में मुसलमानों के उत्कर्ष के साथ ही साथ यह देश शनैः-शनैः उनके राज- नीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया । सन् ८७० ई० में अरब सरदार याकूब ने अफगानिस्तान पर आंशिक विजय प्राप्त की थी । अलप्तगीन तथा सुबुक्तगीन के आक्रमणों का यहाँ के हिन्दू नरेशों ने सामना किया था । सन् ९९० में लम्पक ( लमगान ) का दुर्ग हिन्दुओं के हाथों से निकल गया । काफिरिस्तान के अतिरिक्त समस्त अफगानिस्तान को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा । ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में हिंदू शाही वंशजो के हाथ में गान्धार प्रदेश का शासन-सूत्र आ गया था । सन् १०२१ ई० में सुलतान महमूद गजनी ने गान्धारराज त्रिलोचन पाल पर आक्रमण किया । राजा तोसी तट पर पराजित हो गया । गान्धार के हिन्दू धर्म तथा स्वतंत्रता दोनों का ही लोप हो गया । तत्पश्चात् केवल ५ वर्ष के लिए उसके पुत्र भीमपाल ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की । परन्तु मुस्लिम शक्ति के सम्मुख गान्धार मुस्लिम धर्म तथा संस्कृति में लीन हो गया । मुस्लिम इतिहासकारों ने गान्धार की राज- धानी तक्षशिला का वर्णन नहीं किया है । तक्षशिला अपना पूर्व गौरव खो चुका था । खंडहरों का ढेर मात्र रह गया था । मुस्लिम इतिहासकारों ने उसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण नहीं समझा । इस वैदिक काल से अठारहवीं शताब्दी तक गान्धार भारतीय राज्य का अंग होता और निकलता रहा है । उसका इतिहास भारतीय इतिहास से गुंथा है। उसे अलग रखना कठिन है। वहां भारतीय संस्कृति फली-फूली । वहाँ से बाहर गयी । ललित कलाएँ विकसित हुई । गान्धार का पुराना नाम, धर्मादि का लोप हो गया । उत्तर-पश्चिमीय सीमान्त प्रदेश के रूप में उसका अधिक क्षेत्र पाकिस्तान बनने के पूर्व भारत का अंग था । तक्षशिला का वर्णन करते हुए प्लिनी लिखता है कि नगर पर्वत मूल के उस स्थान पर आबाद था, जहाँ पर्वत भूमि में मिल जाता था । नगर समतल भूमि में बसा था । वह नगर की बड़ी प्रशंसा करता है कनिघम ने तक्षशिला मे ५५ स्तूप, २८ विहार तथा ९ मन्दिरों का ध्वंसावशेष देखा था । नागार्जुनो कोण्डा के वीरपुरुष दत्त के अभिलेख में गान्धारका उल्लेख आया है। गान्धार में १००० से अधिक बौद्ध विहार थे । युवान्चुवाग के समय में उनकी बुरी अवस्था थी । अनेक स्तूपों के शिखर खंडहर थे । लगभग १०० देव मन्दिर गान्धार में थे । पुष्करावती गान्धार की राजधानी थी । उसकी राजधानियाँ विभिन्न समयों में बदलती रही है । पुष्करावती किंवा पुष्कलावती तथा कभी तक्षशिला ही