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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

२६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हस्तक्षेप न होने तथा ईस्ट इंडिया कंपनी-द्वारा की गई संधियां बहाल रहने, प्रजा के स्वत्व, इज्जत, ओहदे तथा धर्म को अपने धर्म के समान ही मानने आदि का उल्लेख है¹ । महारावत दलपतसिंह-द्वारा सिपाही विद्रोह के समय पूर्ण सहायता दी गई थी, जिसकी सरकारी अफ़सरों ने भी पूर्ण सराहना की। फिर ग़दर समाप्त हो जाने पर अंग्रेज़ सरकार ने उसके लिए दो हज़ार रुपये के मूल्य की खिलअत भेजना तज़वीज़ किया और वॉइसरॉय लॉर्ड कैनिङ्ग तथा एजेंट गवर्नर जेनरल के महारावत के नाम के खरीते भी मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट मेजर टेलर-द्वारा भेजे गये² तथा उपर्युक्त खिलअत भी उसको यथा- समय प्राप्त हुई। सिपाही विद्रोह के समय महारावत की आज्ञानुसार उसके मन्त्री निहालचंद खासगीवाले, शाह भोजराज और जोधकरण पाडलिया ने अच्छी सेवा बजाई और उन्होंने प्रतापगढ़ क़स्बे की रक्षा का, जो मंदसोर के निकट है, अच्छा प्रबन्ध रखा एवं प्रतापगढ़ के इलाक़े में बाग़ियों-द्वारा कोई हानि न पहुंचने दी, जिसकी महारावत को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उन लोगों की क़द्र की। अपुत्रावस्था में राज्य ज़ब्त करने की लॉर्ड डलहौज़ी की नीति को विग्रहकारी समझ ग़दर समाप्त होने के पीछे अंग्रेज़ सरकार ने भारत के [गोदनशीनी की सनद मिलना] देशी राजाओं का दत्तक पुत्र रखने का अधिकार वाजिब समझा। तदनुसार महारानी विक्टोरिया की आज्ञानुसार समस्त देशी राज्यों के पास लॉर्ड कैनिङ्ग के हस्ताक्षर-सहित सनदें भेजी गईं। तदनुसार अंग्रेज़ सरकार की ओर से प्रतापगढ़ राज्य में भी ई० स० १८६२ ता० ११ मार्च (वि० सं० १९१८ फाल्गुन सुदि १०) (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १६८०-८८। मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ७८६ । (२) मेजर टेलर, पोलिटिकल एजेंट, मेवाड़ का महारावत दलपतसिंह के नाम का वि० सं० १९१७ आषाढ वदि १ ई० स० १८६० (ता० ४ जून) का पत्र।

महारावत दलपतसिंह २६५ की लिखित वाइसरॉय लॉर्ड कैनिङ्ग के हस्ताक्षर-सहित यह सनद् पहुंची, जो नीचे लिखे अनुसार है— “श्रीमती महाराणी विक्टोरिया की यह इच्छा है कि भारत के राजाओं तथा सरदारों का अपने-अपने राज्यों पर अधिकार तथा उनके वंश की जो प्रतिष्ठा एवं मान-मर्यादा है, वह हमेशा बनी रहे; इसलिए उक्त इच्छा की पूर्ति के लिए मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि वास्तविक उत्तरा- धिकारी के अभाव में यदि आप या आपके राज्य के भावी शासक हिंदू धर्मशास्त्र और अपनी वंश-प्रथा के अनुसार दत्तक लेंगे तो वह जायज़ समझा जायगा । “आप यह निश्चय जानें कि जब तक आपका घराना सरकार का खैरख्वाह रहेगा और उन अहदनामों, सनदों तथा इक़रारनामों का पालन करता रहेगा, जिनमें अंग्रेज़ सरकार के प्रति उसके कर्त्तव्य दर्ज हैं, तब तक आपके साथ के इस इक़रार में कोई बात बाधक न होगी” । ˙ महारावत दलपतसिंह का वि० सं० १६२० चैत्र वदि ७ ( ई० स० १८६४ ता० ३० मार्च ) को परलोकवास हुआ । उसके चार राणियां थीं [पार्श्व टिप्पणी: महारावत का परलोकवास और राणियां आदि] जिनके नाम प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में नामली ( रतलाम राज्य ) के सोनिगरा ठाकुर फ़तहसिंह की कुंवरी दौलतकुंवरी, कुशलगढ़ (बांस- वाड़ा राज्य ) के राठोड़ राव ज़ालिमसिंह की पुत्री मोतीकुंवरी एवं उसी ज़ालिमसिंह की पौत्री और हम्मीरसिंह की पुत्री केसरकुंवरी तथा वांसणा ( गुजरात ) ठिकाने के केरणा गांव के राठोड़ ठाकुर दौलतसिंह की पुत्री कल्याणकुंवरी दिये हैं²। उसके केवल एक ही पुत्र महाराजकुमार ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२ तथा पृ० ३५ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ११ । प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त एक ख्यात में उक्त महारावत के चार ही राणियां लिखी हैं; परन्तु उनके नामों में अन्तर है । वहां उसकी दूसरी राणी कुशलगढ़वाली का नाम केसरकुंवरी और उसका राव

२६६ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उदयसिंह था, जिसका जन्म कुशलगढ़वाली राणी के उदर से हुआ था¹ । महारावत दलपतसिंह, प्रतापगढ़ राज्य में नीतिकुशल राजा हुआ है। उसमें राज्य प्रबंध की अच्छी योग्यता थी, अतएव उसने डूंगर- पुर और प्रतापगढ़ राज्य का प्रबंध कुशलतापूर्वक महारावत का व्यक्तित्व | किया । वह मित्रता का निबाहनेवाला राजा था। सिपाही-विद्रोह में स्वयं उसने अपनी सेना के साथ भाग लिया था। वह गुणवानों का सम्मान कर उन्हें पुरस्कृत करता और अपने कार्यकर्त्ता मंत्रियों आदि को पुरस्कार, जागीर आदि देकर सदा उत्साहित करता था। उसकी अपनी प्रजा के साथ गहरी सहानुभूति थी । उसके समय में राज्य-कोप परिपूर्ण था। प्रतापगढ़ राज्य में जो वैभव है, उसका अधिकांश श्रेय उसी को है। उसने देवलिया में सोनेलाव तालाव बनवाकर दलपत- निवास नामक महल बनवाया था। उसकी प्रतिष्ठा के अवसर पर उसने बारहठ चारण लखमणदान को दो गांव और हाथी तथा महाराजकुमार उदयसिंह के जन्म के अवसर पर पांच हाथी, दो सौ घोड़े और पांचसौ सिरोपाव दिये थे एवं उसी अवसर पर उसने लाख पसाव में उपर्युक्त लखमणदान को एक गांव, हाथी, घोड़ा, वस्त्राभूषण और दस सहस्र रुपये देकर उसको अपना कविराज बनाया था। सरदारों आदि के साथ उसका व्यवहार सदा अच्छा रहा। उसके मन्त्री शाह जड़ावचन्द, शाह निहालचंद (खासगीवाला), जोधकरण पाडलिया आदि कार्यनिपुण व्यक्ति थे, जिससे उक्त महारावत के समय प्रजा की आबादी बढ़ी और राज्यश्री में भी वृद्धि हुई। नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को डूंगरपुर के हमीरसिंह की पुत्री होना दिया है तथा उसी के उदर से कुंवर उदयसिंह का जन्म होना बतलाया है। इसी प्रकार तीसरी राणी कठाणा के पंवार बख़्तावरसिंह की पुत्री भवान- कुंवरी और चतुर्थ राणी भी कुशलगढ़ के राव हमीरसिंह की पुत्री लालकुंवरी लिखी है। इन दोनों राणियों का तो बड़वे की ख्यात में कुछ भी उल्लेख नहीं है। एक स्थान पर उसके छः राणियें भी लिखी हैं और दो विवाह डूंगरपुर में रहते हुए होने का उल्लेख है। (१) प्रतापगढ़ राज्य की एक प्राचीन ख्यात; पृ० १४।

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महारावत उदयसिंह

महारावत उदयसिंह २६७ महारावल जसवन्तसिंह (दूसरा) के दत्तक रखने के सम्बन्ध में वहां बखेड़ा होकर हिम्मतसिंह क़ैद किया गया। उसके प्रति भी महारावत ने अपने शासन-काल में सौजन्य दिखलाकर उसको मुक्तकर उसकी जागीर पीछी उसे दे दी, जो उसकी उदार नीति का परिचय देती है। उसकी एक राणी लालकुंवरी ने वृन्दावन में राधावल्लभ का मन्दिर बनवाया था। उदयसिंह महारावत उदयसिंह का जन्म वि० सं० १९०५ आषाढ वदि १३ (ई० स० १८४८ ता० २६ जून) को हुआ था और वह वि० सं० १९२० चैत्र वदि ७ (ई० स० १८६४ ता० ३० मार्च) को जन्म, गद्दीनशीनी और अपने पिता के पीछे प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी पुत्र-जन्म हुआ। उस (उदयसिंह) का प्रथम विवाह भूतपूर्व महारावत दलपतसिंह की विद्यमानता में नामली (रतलाम राज्य) के ठाकुर तख़्तसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी से हुआ था, जिसके उदर से कुछ समय बाद ही वि० सं० १९२२ ज्येष्ठ सुदि ५ (ई०स० १८६५ ता० २६ मई) सोमवार को उसके महाराजकुमार हम्मीरसिंह का जन्म हुआ, परंतु पांच वर्ष का होकर उक्त राजकुमार वि० सं० १९२६ (ई० स० १८६६) में काल-कवलित हो गया। राज्यारोहण के समय महारावत की आयु केवल सोलह वर्ष की थी, इसलिए मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल ईडन ने राजपूताना के एजेंट गवर्नर जेनरल की स्वीकृति से भूतपूर्व महा- शासन-कार्य चलाने के संबंध में महारावत के नाम पोलिटि- कल एजेंट का खरीता जाना रावत दलपतसिंह की इच्छा के अनुसार शाह जोधकरण पाडलिया और पंडित आपा की सलाह से शासन-कार्य चलाने के लिए महारावत के नाम खरीता भेजा और उन दोनों को भी वि० सं० १९२१ आषाढ सुदि ४ (ई० स० १८६४ ता० ६ जुलाई) को पत्र भेज इसकी सूचना दी¹। (१) कर्नल ईडन का शाह जोधकरण और पंडित आपा के नाम का वि० सं० १९२१ आषाढ सुदि ४ (ई० स० १८६४ ता० ६ जुलाई) का पत्र। ३८

२६८ -प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इसके थोड़े समय बाद ही वि० सं० १६२२ पौष वदि १४ (ई० स० १८६५ ता० १७ दिसंबर) को राजपूताना के एजेंट गवर्नर जेनरल कर्नल एजेंट गवर्नर-जेनरल का गद्दी- ईडन ने मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल निक्सन नशीनी की ख़िलअत लेकर के साथ प्रतापगढ़ जाकर अंग्रेज़ सरकार की ओर जाना से महारावत को गद्दीनशीनी की खिलअत दी और उसी अवसर पर सरकारी तौर से राज्या- धिकार सौंपने की रस्म भी अदा की गई१ । महारावत ने राज्यासीन होते ही शासन-कार्य लगन के साथ करना आरंभ किया। सर्वप्रथम उसने भील, मीणों आदि का दमन करने का निश्चय किया, जो लूट-खसोट कर जनता को कष्ट भील और मीणों को दंड पहुंचाते थे२ । महारावत जहां कहीं अपने राज्य में देना लूट-खसोट का समाचार सुनता, तत्काल घोड़े पर सवार होकर अपने राजपूत सवारों से पहले वहां जा पहुंचता३ और उनसे मुक़ाबला कर उनको ऐसा दंड देता कि वे फिर कभी ऐसा कार्य करने का साहस न करते। उसकी इस तत्परता को देख प्रतापगढ़ राज्य के भील, मीणे आदि उसके नाम से कांपने लगे और अधिकांश ने लूट-खसोट करना बन्द कर दिया, जिससे राज्य में चारों तरफ़ शांति स्थापित हो गई और राज्य की आबादी तथा आय बढ़ने लगी। व्यापार एवं गमनागमन की कठिनाइयों को मिटाने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने मालवा की ओर रेल्वे लाइन निकालने का विचार किया और उस समय प्रतापगढ़ राज्य की कोई भूमि यदि रेल्वे निकालने के संबंध में रेल्वे के लिए आवश्यक हो तो देने के लिए महा- अंग्रेज़ सरकार की महारावत रावत से प्रस्ताव किया। इसपर वि० सं० १६२२ से बातचीत (ई० स० १८६५) में महारावत ने कुछ शर्तों के (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० २५६ । (२) वही; जि० १, पृ० ५६० । (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६६-७ ।

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प्रतापगढ़ का नवीन राजभवन

महारावत उदयसिंह २६६ साथ अपने राज्य की भूमि बिना मूल्य रेल्वे लाइन निकालने के लिए अंग्रेज़ सरकार को देना स्वीकार किया; परंतु फिर प्रतापगढ़ राज्य में होकर अंग्रेज़ सरकार ने रेल्वे लाइन निकालने का विचार स्थगित कर दिया, इसलिए अंतिम लिखा-पढ़ी नहीं हुई' । इसके दूसरे वर्ष वि० सं० १६२३ (नवंबर ई० स० १८६६) में भारत के तत्कालीन वाइसरॉय और गवर्नर-जेनरल, लॉर्ड लॉरेंस का आगरे में आगमन हुआ। उस अवसर पर महारावत उदय- सिंह भी उक्त वाइसरॉय से मुलाक़ात करने के लिए आगरे गया², जहां वाइसरॉय ने महारावत से मिलकर प्रसन्नता प्रकट की। इस सफ़र से उस(महारावत) को अंग्रेज़ी अमलदारी में होनेवाली उन्नति का हाल ज्ञात हुआ। आगरा से लौटने के बाद युवक महारावत ने भी अपने राज्य में लाभदायक काम करने चाहे; परंतु कई बाधाएं उपस्थित हो गईं, जिससे उसके विचार कार्यरूप में परिणत न हो सके । देवलिया का जलवायु अस्वास्थ्यकर होने से महारावत ने प्रताप- गढ़ क़स्बे की, जो स्वास्थ्य-प्रद है, उन्नति करने का विचार कर आबादी से एक मील दूर पूर्व की तरफ़ खुले मैदान में वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) में अंग्रेज़ी तर्ज़ का बंगला बनवाकर वहां रहना आरंभ किया, जिससे देवलिया की आबादी घटने लगी और वि० सं० १६३२ (ई० स० १८७५) में वहां के कई महल खाली हो गये । फलस्वरूप उसके समय से ही प्रतापगढ़ इस राज्य की राजधानी हुई और भूतपूर्व महारावत रघुनाथ- सिंह, महाराजकुमार मानसिंह और वर्तमान महाराजकुमार सर रामसिंहजी ने वहां कई इमारतें बनवाकर उसकी बहुत कुछ उन्नति की है ।


(१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स ऐंड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४३ (पांचवां संस्करण)। (२) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० ३, पृ० ५५६।

३०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उस समय तक प्रतापगढ़ राज्य की अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से सलामी की तोपों की संख्या नियत न थी। दि० अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से सं० १९२४ (ई० स० १८६७) में अंग्रेज़ सरकार ने प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी की इस राज्य की सलामी की पन्द्रह तोपें स्थायी रूप सलामी की तोपें नियत होना से नियत कीं१। वि० सं० १९२५ (ई० स० १८६८) में राजपूताना में भयंकर अकाल पड़ा, जिससे प्रतापगढ़ राज्य भी बचा न रहा। थोड़ी वर्षा होने के कारण वहां उस साल नाज तथा घास कम पैदा हुई और वि० सं० १९२५ के अकाल फिर मारवाड़ आदि अन्य स्थानों से हज़ारों मनुष्य में महारावत की उदारता भूख-प्यास से व्याकुल हो अपने पशुधन को लेकर मालवा में चले गये। प्रतापगढ़ राज्य मालवा के निकट होने से वहां भी अकाल-पीड़ित व्यक्तियों के झुंड के झुंड जाने लगे। उस अवसर पर महारावत ने अपने राज्य की प्रजा और पशुओं की रक्षा करने के अतिरिक्त बाहर से आये हुए मनुष्यों एवं पशुओं की रक्षा करना भी अपना कर्त्तव्य समझा। इस कार्य के लिए बाहर से गल्ला मंगवाकर सस्ते भाव से बेचने की व्यवस्था की गई; ग़रीबों के लिए ख़ैरातखाने खोले गये, कई स्थानों पर सहायक कार्य जारी कर जागीरदारों को भी अकाल-पीड़ित व्यक्तियों को काम में लगाने के लिए आज्ञाएं जारी की गईं, बाहर से आनेवाले गल्ले आदि सामान पर सायर का महसूल माफ़ किया गया तथा ता० १३ दिसंबर ई० स० १८६८ (वि० सं० १९२५ पौष वदि ३०) को इस सम्बन्ध में नीचे लिखा इश्तिहार जारी किया गया— “वर्षा न होने से मारवाड़ तथा अन्य स्थानों में घास और नाज उत्पन्न नहीं हुआ है। इस वास्ते वहां के लोग पशुओं को बड़ी संख्या में लेकर मालवा में आये हैं। वहां अनाज तथा घास-पानी का अभाव होना स्पष्ट है। ईश्वर उनकी रक्षा करे। अकाल वर्ष के आरंभ से ही है और आगामी वर्ष की फ़सल शुरू होने तक रहेगा। अतएव आवश्यकता है कि (१) एचिसन; ट्रीटीज़ एंगेजमेंट्स एंड सनदज़; जि० ३, पृ० ४५३।

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

महारावत उदयसिंह ३०१ इस मुल्क के लिए प्रचुर अनाज मंगवाने का प्रयत्न किया जावे । यह आज्ञा दी जाती है कि तमाम जांगीरदार, अहलकार, पटेल, पटवारी आदि निम्नलिखित बातों की तामील करें तथा जब तक ज़माना ठीक न हो, यहां के निवासियों और बाहर के मनुष्यों को कष्ट न पहुंचावें— ( १ ) श्रावण सुदि १५ तक अनाज की निकासी तथा रवानगी पर महसूल माफ़ किया जाता है । ( २ ) जो परदेशी परिश्रम कर सकते हों वे इमारती कार्य में लगाये जावें, जैसे कुएं खुदवाना, तालाब बनवाना आदि ताकि मुसीबत के समय वे अपना निर्वाह कर सकें । ( ३ ) प्रतापगढ़ में राज्य का एक और साहूकारों के कई सदाव्रत हैं । उनके कार्य-कर्ताओं को सूचित किया जाता है कि मारवाड़ी तथा अन्य लोग जो खैरात मांगें, उनको पूरे तौर से अर्थात् प्रत्येक आदमी को सेर भर आटे से कम न दें । ( ४ ) अनाज को राज्य में लाकर एकत्रित करने की रोक नहीं है, तथापि इश्तिहार जारी किया जाता है कि अनाज के व्यापार पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न होगा । इस मुल्क के समस्त व्यापारी अनाज अपने तौर पर ख़रीद कर बेचें । यही नहीं, उनको राज्य से सहायता भी दी जायगी । यदि कोई परदेशी सौदागर प्रतापगढ़ इलाक़े में ग़ल्ला लाना चाहे और रक्षा के लिए पहरा चाहे तो राज्य में सूचना करने पर पहरा मिल जावेगा । मार्ग रक्षित नहीं है, जिससे इस अकाल के समय सावधानी और निगरानी की आवश्यकता है । ( ५ ) जो पशु मारवाड़ तथा अन्य स्थानों से आये हुए हैं, वे पहाड़ के नज़दीक कटे हुए घास के बीड़ में बिना महसूल चरेंगे । यदि कोई शिकायत आवेगी कि किसी ने उनसे महसूल लिया है, तो महसूल लेने- वालों को सज़ा दी जावेगी । ( ६ ) रियासत के अहलकारों, जागीरदारों और मुत्सद्दियों को ज़रूरी है कि इस विषय में एजेंट गवर्नर-जनरल, राजपूताना ने जो इश्तिहार भेजा

३०२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास है, उसका पूरा लिहाज़ रखें १ ।" उन दिनों महारावत की प्रवृत्ति कुछ ऐयाशी की ओर बढ़ने लगी थी, जिससे शासन-प्रबंध में अव्यवस्था होने लगी। इसपर पोलिटिकल शासन-व्यवस्था में गड़बड़ी होना | एजेंट मेवाड़ ने प्रतापगढ़ के वकील को, जो उसके पास नियत था, महारावत को समझाने के लिए भेजा, जिसका महारावत पर अच्छा प्रभाव पड़ा और उसने फिर रियासत के कार्य में ध्यान देना आरंभ किया तथा फिर रतलाम से कामदार के पद पर ओंकारलाल व्यास को बुलाकर नियत किया २ । तदनन्तर महारावत ने अपने राज्य की न्याय-व्यवस्था ठीक करने के लिए दीवानी तथा फ़ौजदारी अदालतें स्थापित कीं, परंतु अपराधियों के अंग्रेज़ सरकार से अपराधियों के देन-लेन का इक़रारनामा होना | देन-लेन के विषय में क़ौल-क़रार न होने से उनकी गिरफ़्तारी में बाधाएं उपस्थित होती थीं। अतएव वि० सं० १९२५ (ई० स० १८६८) में महारावत और अंग्रेज़ सरकार के बीच कर्नल हचिन्सन, पोलिटिकल एजेंट, मेवाड़ के द्वारा नीचे लिखा अहदनामा हुआ— अपराधियों को एक दूसरे को सौंपने के सम्बन्ध में अंग्रेज़ सरकार तथा देवलिया प्रतापगढ़ के राजा हिज़ हाइनेस उदयसिंह, उनके बाल-बच्चों, वारिसों तथा और उत्तराधिकारियों के बीच का अहदनामा, जिसको एक तरफ़ लेफ़्टेनेंट-कर्नल अलेक्ज़ेंडर रॉस इलियट हचिन्सन, स्थानापन्न पोलि- टिकल एजेन्ट, मेवाड़ ने लेफ़्टेनेंट कर्नल रिचर्ड हार्ट कीटिङ्ग, सी० एस० आई० तथा वी० सी० एजेंट गवर्नर-जेनरल राजपूताना के आदेश से, जिसे हिंदुस्तान के वाइसरॉय और गवर्नर-जेनरल दि राइट आनुरेवल सर जॉन लॉर्ड मेयर लारेंस वैरोनेट, जी० सी० वी० एवं जी० सी० एस० आई० से तत्सम्बन्धी पूर्ण अधिकार प्राप्त हुए थे और दूसरी तरफ़ राजा उदयसिंह ने तैयार किया— ( १ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६०-१ । ( २ ) वही; जि० १, पृ० ५४६ ।

महारावत उदयसिंह ३०३ शर्त पहली—कोई व्यक्ति चाहे वह अंग्रेज़ी इलाक़े की प्रजा हो, या किसी और की, अंग्रेज़ी इलाक़े में कोई संगीन जुर्म करे और प्रतापगढ़ राज्य की सीमा के भीतर पनाह ले तो प्रतापगढ़ राज्य उसको गिरफ़्तार करेगा और तलब किये जाने पर साधारण नियम के अनुसार अंग्रेज़ सरकार को सौंप देगा। शर्त दूसरी—कोई व्यक्ति जो प्रतापगढ़ की प्रजा हो, प्रतापगढ़ राज्य की सीमा के भीतर कोई भारी अपराध कर अंग्रेज़ी इलाक़े में शरण ले तो अंग्रेज़ सरकार उसको गिरफ़्तार करेगी और तलब करने पर रीति के अनुसार प्रतापगढ़ राज्य को सौंप देगी। शर्त तीसरी—कोई आदमी, जो प्रतापगढ़ की प्रजा न हो, प्रतापगढ़ राज्य की सीमा के भीतर कोई बड़ा अपराध कर अंग्रेज़ी इलाक़े में आश्रय ले तो वह गिरफ़्तार किया जायगा और उसके मुक़दमे का फ़ैसला वह अदालत करेगी, जिसको अंग्रेज़ सरकार आज्ञा दे। साधारण नियम के अनुसार ऐसे मुक़दमों का निर्णय उस पोलिटिकल एजेंट के इजलास में होगा, जिसके साथ प्रतापगढ़ राज्य का सम्बन्ध हो। शर्त चौथी—किसी भी अवस्था में कोई सरकार किसी व्यक्ति को, जिसपर किसी बड़े अपराध का अभियोग लगाया गया हो, तब तक सौंपने की पाबन्द न होगी, जब तक कि वह सरकार, जिसके इलाक़े में अपराध हुआ हो, अभियुक्त को क़ायदे के अनुसार तलब न करे और जुर्म की ऐसी शहादत पेश न हो, जिसके द्वारा जिस इलाक़े में वह (अपराधी) पाया जाय, उसके क़ानून के अनुसार उसकी गिरफ़्तारी वाजिब समझी जाय और यदि वही अपराध उस इलाक़े में किया जाता तो वहां भी अभियुक्त अपराधी ठहराया जाता। शर्त पांचवीं—नीचे लिखे हुए अपराध संगीन अपराध समझे जायेंगे— ( १ ) मनुष्य वध ( ४ ) ठगी ( २ ) मनुष्य वध करने का प्रयत्न ( ५ ) विष-प्रयोग ( ३ ) उत्तेजना की दशा में किया ( ६ ) बलात्कार हुआ दंडनीय मनुष्य वध ( ७ ) सख्त चोट पहुंचाना

३०४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ( ८ ) बालक चुराना ( १६ ) जाली सिक्के बनाना तथा खोटे ( ६. ) औरतों को बेचना सिक्के चलाना ( १० ) डाका डालना ( १७ ) दंडनीय विश्वासघात ( ११ ) लूट करना ( १८ ) माल-अस्बाब राखन ( हजम ) ( १२ ) सेंध लगाना करना, जो जुर्म समझा जाय ( १३ ) पशुओं की चोरी ( १६ ) ऊपर लिखे हुए अपराधों में ( १४ ) मकान जलाना सहायता देना ( १५ ) जालसाज़ी शर्त छठी—ऊपर लिखी हुई शर्तों के अनुसार किसी अपराधी को गिरफ़्तार करने, रोक रखने या सुपुर्द करने में जो व्यय पड़ेगा, वह उस सरकार को देना पड़ेगा, जो उसको तलब करेगी । शर्त सातवीं—ऊपर लिखा हुआ अहदनामा तब तक क़ायम रहेगा, जब तक अहदनामा करनेवाले दोनों पक्षों में से कोई उसको तोड़ने की अपनी इच्छा दूसरे को न बतलावे । शर्त आठवीं—इस अहदनामे में जो शर्तें दी गई हैं, उनमें से किसी का भी असर ऐसे किसी अहदनामे पर न होगा, जो दोनों पक्षों के बीच पहले हुआ है, सिवाय किसी अहदनामे के उस अंश के जो इसके विरुद्ध हो । आज २२वीं दिसंबर ई० स० १८६८ (वि० सं० १६२५ पौष सुदि ८) को प्रतापगढ़ में तय हुआ । ( दस्तख़त ) ए० आर० ई० हर्चिसन् | मुहर | लेफ़्टेनेंट-कर्नल, स्थानापन्न पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ । | मुहर | प्रतापगढ़ देवलिया के राजा की मुहर तथा दस्तख़त । ( दस्तख़त ) मेयो, भारत का वाइसरॉय और गवर्नर-जेनरल ।

महारावत उदयसिंह ३०५ ई० स० १८६६ ता० १६ फ़रवरी (वि० सं० १६२५ फाल्गुन सुदि ८) को फ़ोर्ट विलियम (कलकत्ता) में भारत के वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल ने इस अहदनामे की तस्दीक़ की१। (दस्तख़त) डब्लयू० एस० सेटनकर, सेक्रेटरी, भारत गवर्नमेंट, वैदेशिक विभाग। अठारह वर्ष बाद इस अहदनामे की एक शर्त में परिवर्त्तन हुआ, जो नीचे लिखे अनुसार है— ई० स० १८६६ ता० १६ फ़रवरी को अपराधियों के सौंपने के संबंध में अंग्रेज़ सरकार एवं प्रतापगढ़ राज्य के बीच जो अहदनामा हुआ था, उसमें अंग्रेज़ी इलाक़े से भागकर प्रतापगढ़ राज्य में शरण लेनेवाले अपराधियों को सौंप देने के लिए जो तजवीज़ हुई थी, वह अनुभव से ब्रिटिश भारत में प्रच- लित क़ानूनी अमल से कम आसान और कम कारगर पाई गई। इसलिए इस इक़रारनामे के द्वारा अंग्रेज़-सरकार तथा प्रतापगढ़ राज्य के बीच स्थिर हुआ है कि भविष्य में अहदनामे की शर्तें, जिनमें अभियुक्तों की सुपुर्दगी की बाबत तजवीज़ हुई है, वह ब्रिटिश भारत से भागकर प्रतापगढ़ राज्य में आश्रय लेनेवाले अपराधियों की सुपुर्दगी के विषय में लागू न होंगी और इस समय ऐसे प्रत्येक मामले में अपराधियों को सौंपने के संबंध में ब्रिटिश भारत में जो क़ानूनी अमल जारी है, उसकी पाबंदी करनी होगी। ई० स० १८८७ ता० २६ अगस्त (वि० सं० १६४४ भाद्रपद सुदि ११) को प्रतापगढ़ में दस्तख़त हुए। (दस्तख़त, हिन्दी भाषा में) [मुहर] महारावत प्रतापगढ़। (दस्तख़त) ए० एफ० पिन्हे, लेफ़्टेनेन्ट, [मुहर] असिस्टेन्ट पोलिटिकल एजेंट, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़। ई० स० १८८८ ता० २८ मार्च (वि० सं० १६४५ द्वितीय चैत्र वदि १) (१) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६३-५। ३६

३०६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को फ़ोर्ट विलियम में हिन्दुस्तान के वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल ने इस अहदनामे को मंजूर कर इसकी तसदीक़ की १ । ( दस्तखत ) एच० एम्० ड्युरंड, सेक्रेटरी, भारत गवर्नमेंट, फ़ॉरेन विभाग। प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा राज्य की सीमाएं मिली हुई होने से कभी- कभी इन दोनों राज्यों के बीच सीमा संबंधी झगड़े और उपद्रव होकर [बांसवाड़ा राज्य के साथ सीमा] विरोध हो जाया करता था। उन दिनों (बांसवाड़ा के [संबंधी झगड़ा होना] महारावल लक्ष्मणसिंह के राज्य समय ) बांसवाड़ा- वालों ने प्रतापगढ़ राज्य के रायपुर ठिकाने के बोरी, रींछड़ी आदि गांवों का नवीन झगड़ा उठाया, जो प्रतापगढ़ राज्य के अधिकार में बहुत वर्षों से चले आते थे। इस झगड़े ने बड़ा भीषण रूप धारण किया और वि० सं० १६२३ आश्विन सुदि ६ ( ई०स० १८६६ ता० १४ अक्टूबर ) को रात्रि के समय बांसवाड़ावालों ने एक बड़ी सेना के साथ जाकर रायपुर के ठाकुर पर, जो उस समय वहां के थाने पर सीमा की रक्षा के लिए प्रतापगढ़ की तरफ़ से नियत था, आक्रमण कर दिया। रायपुर के ठाकुर और उसके साथी ( प्रतापगढ़ के सरदार ) उस समय असावधान थे, इसलिए बांसवाड़ावालों का आक्रमण वे सह न सके और उनके आदमियों में से आंधीरामा के ठाकुर का पुत्र केसरीसिंह, रायपुर का अजीतसिंह, हिम्मतसिंह, चौहान लक्ष्मणसिंह, हम्मीरसिंह आदि ३५ व्यक्ति मारे गये और ५६ घायल हुए तथा बांसवाड़ावाले वहां से कई हज़ार रुपयों का माल भी लूट ले गये। इस झगड़े में बांसवाड़ा राज्य के दो आदमी मारे गये और चार घायल हुए। फिर पोलिटिकल अफ़सरों- द्वारा इस मुक़द्दमे की तहक़ीक़ात होने पर बांसवाड़ा राज्य की ज़्यादती प्रमाणित हुई और बांसवाड़ा राज्य के कामदार कोठारी चिमनलाल पर एक हज़ार रुपये जुरमाना होकर वह दस वर्ष के लिए बांसवाड़ा राज्य से निर्वासित कर दिया गया एवं पांच दूसरे अह्लकार, जो इस झगड़े में ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६२ ।

महारावत उदयसिंह ३०७ शामिल थे, पांच-पांच वर्ष के लिए क़ैद कर उदयपुर के जेलखाने में रखे गये। अंत में मेवाड़ भील कोर के कमांडैंट मेजर गनिंग ने मौक़े पर जाकर वि० सं० १६३१ (ई० स० १८७५) में उचित फ़ैसला कर दोनों राज्यों की सीमा पर मीनारे खड़े करवा दिये'। इस फ़ैसले से तनाज़े की ३६ वर्ग मील भूमि पर प्रतापगढ़ राज्य का अधिकार बहाल रहा और इस मुक़दमे में प्रतापगढ़ राज्य के कामदार ओंकारलाल व्यास, मोतमिद अमृतराव दक्षिणी तथा बड़ा सेलारपुरा के ठाकुर विशनसिंह की कारगुज़ारी अच्छी रही, जिसकी मेजर गनिंग ने महारावत के पास प्रशंसा लिख भेजी। इसी प्रकार एक दूसरा झगड़ा प्रतापगढ़ राज्य के सांडनी गांव के नील के पठार नामक खेतों के सम्बन्ध में बांसवाड़ा राज्य के सेमलिया पट्टे के सूरजपुरा गांव के बीच वि० सं० १९२६ (ई० स० १८७२) में उत्पन्न हुआ। उसमें भी बांसवाड़ावालों ने अपनी सेना भिजवाकर प्रतापगढ़ राज्य के दो आदमियों को मार डाला। उसका फ़ैसला ई० स० १८७४ ता० १६ सितम्बर (वि० सं० १६३१ भाद्रपद सुदि ५) को मेवाड़ के असिस्टेन्ट पोलि- टिकल एजेंट पारसी फ़्रामजी सीकाजी ने, जो बांसवाड़ा में नियत था, किया। उसके अनुसार नील के पठार के क्षेत्रों का अधिकार प्रतापगढ़ राज्य का स्वीकार किया गया और सांडनी तथा सूरजपुरा गांव की सीमाएं निर्धारित कर मीनारे खड़े करवा दिये गये। इस मुक़दमें में महारावत के कामदार ओंकारलाल व्यास, मोतमिद शाह जोधकरण और अर्जुनसिंह की कार- गुज़ारी अच्छी रही। बांसवाड़ा राज्य ने प्रतापगढ़ राज्य के अजंदा गांव को वि० सं० १६१७ (ई० स० १८६०) में बलपूर्वक दबा लिया था, जिसका मुक़दमा महारावत दलपतसिंह के समय से ही चल रहा था। उसका भी उन्हीं दिनों (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५२८ तथा ५४७ । उक्त पुस्तक में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से इस झगड़े में मारे जानेवाले व्यक्ति की संख्या २६ और घायलों की ५४ दी है। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०३६) में बांसवाड़ा के कामदार चिमनलाल कोठारी पर दस हज़ार रुपये जुरमाना होने का उल्लेख है।

३०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास फ़ैसला हुआ, जिसमें उक्त गांव पर प्रतापगढ़ राज्य का अधिकार कराया गया और बांसवाड़ा राज्य की ओर से सुंबूत में जो पत्र आदि पेश किये गये वे जाली माने गये । इस घटना से अंग्रेज़ सरकार का बांसवाड़ा के महारावल लछमणसिंह के प्रति बिलकुल विश्वास उठ गया और उसकी बहुत बदनामी हुई । फलस्वरूप अंग्रेज़ सरकार ने छः वर्ष तक के लिए उसकी सलामी की चार तोपें घटा दीं१, जो पीछे ई० स० १८७६ (वि० सं० १९३६) तक न बढ़ीं । वि० सं० १९३२ (ई० स० १८७५ नवंबर) में भारत का वाइसरॉय और गवर्नर जनरल लॉर्ड नॉर्थब्रुक बम्बई से मालवे की तरफ़ होकर उदय- [महारावत का नीमच जाकर] पुर गया । उस समय नीमच के मुक़ाम पर महा- [वाइसरॉय लॉर्ड नॉर्थब्रुक से] रावत उदयसिंह ने जाकर उक्त वाइसरॉय से मुला- [मुलाक़ात करना] क़ात की२ और फ़रवरी ई० स० १८७६ (वि० सं० १९३२) में उसने राजपूताना के एजेंट गवर्नर-जनरल सर ए० सी० लॉयल से भी नीमच जाकर मुलाक़ात की३ । मेवाड़ तथा टोंक राज्य के नींवाहेड़ा परगने में बसनेवाले मोधिये बड़े जरायम पेशा थे । उन दिनों वे अवसर पाकर प्रतापगढ़ राज्य में [मोधियों को महारावत का] जा घुसे और वहां आबाद होने का विचार कर [अपने राज्य में न ठहरने] कुछ चौकीदारों में नौकर हो गये । इसकी इत्तला [देना] महारावत को मिलने पर उसने ऐसे जरायम पेशा लोगों को अपने राज्य में आबाद करने में हानि समझ, वहां उनको न ठहरने दिया४, जिससे उसके राज्य में चोरी-धाड़ों का भय कम हो गया । (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० २४०। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०३६ । अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् बांसवाड़ा स्टेट; पृ० १६५। एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२-६। (२) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । (३) वही; जि० १, पृ० ५६४ । (४) वही; जि० १, पृ० ५६३-४ ।

महारावत उदयसिंह ३०६

महारावत का कामदार ओंकारलाल व्यास कारगुज़ार व्यक्ति था । वि० सं० १६३२ ( ई० स० १८७५ ) में उसको एक बदमाश सिपाही ने तल- [कामदार ओंकारलाल व्यास की मृत्यु] वार का प्रहार कर घायल कर दिया, जिससे वह कुछ दिनों पीछे मर गया । घातक उसी समय मार डाला गया और उसके शामिल रहनेवाले व्यक्तियों को क़ैद की सज़ा दी गई। महारावत ने उस ( ओंकारलाल ) के पुत्र कोम- लराम के प्रति सहानुभूति प्रकट कर उसको अपने यहां ही रक्खा और उससे राज्य का काम लेने लगे, किन्तु वस्तुतः राज्य का सब कार्य महारावत की आज्ञानुसार ही होता था¹ । प्रतापगढ़ राज्य की अधिकांश ज़मीन पैदावार के लिए बहुत ही उपयोगी है । वहां पहले अफ़ीम की काश्त अधिकता से होती थी, जो [महारावत का अपने राज्य की आबादी बढ़ाना] अच्छी ज़ात की होती थी एवं अनाज की पैदा- वारी भी अच्छी थी । महारावत के उदार विचार और प्रयत्न से वहां के ऊजड़ गांव फिर बस गये और काश्तकारों को रियायतें और तसल्ली देने से वहां की तमाम ज़मीन में खेती होने लगी तथा कृषि-योग्य भूमि में से कुछ भी खाली न बची । केवल एक गांव बांसवाड़ा के भीलों की ज़्यादती से वीरान था । बांस- वाड़ा के भील प्रतापगढ़ की प्रजा से चौथ लेने का दावा करते थे । ई० स० १८७३ ( वि० सं० १६३१ ) में मेवाड़ राज्य के धरियावद पट्टे की तरफ़ के गांगा की पाल के मीणों ने कप्तान चार्ल्स स्ट्रेटन पर हमला भी किया²; किंतु महारावत के अच्छे प्रबन्ध से प्रतापगढ़ राज्य के निवासी भील-मीणे

( १ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६०, ५६२-४ । ओंकार- लाल व्यास जाति का औदीच्य ब्राह्मण था । उसने कई वर्षों तक रतलाम राज्य में काम किया था, जिससे उसको अच्छा अनुभव हो गया था । वि० सं० १६३२ वैशाख बदि ३ ( ई० स० १८७५ ता० २३ अप्रेल ) को महारावत ने उसको बांसलाही गांव प्रदान किया, जो अद्यावधि उसके वंशजों के पास विद्यमान है । ( २ ) वही; जि० १, पृ० ५६४ ।