भारतकोश
संग्रह पर लौटें

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

२५० झाँसी की रानी [ ४८ ] फरवरी में एक दुर्घटना हो गई। वारकपूर की १६ नम्बर पलटन को कारतूस प्रयोग करने के लिये दिये गये । सिपाहियो ने प्रयोग करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया । बङ्गाल में उस समय कोई गोरी पलटन न थी । इसलिये जनरल ने तुरन्त वरमा से एक गोरी पलटन मंगवाकर १६ नम्बर पलटन से हथियार रखवा लेने और सिपाहियो को वरखास्त कर देने का निश्चय कर लिया । सिपाहियो को मालूम हो गया । उनमें से कुछ ने चुपचाप हथियार रख देने की अपेक्षा तुरन्त क्रांति कर डालने , का संकल्प किया । उनके हिन्दुस्थानी अफ़सरो ने ३१ मई तक सब्र करने की सलाह दी । परन्तु उस पलटन का एक सिपाही मङ्गल पांडे आपे से बाहर हो गया । उसने कुछ अफ़सर मार डाले । उसको फासी देदी गई । इस घटना की सूचना बहुत शीघ्र उत्तर-भारत मे फैल गई । नाना साहव और अजीमुल्ला मार्च के महीने में तीर्थ यात्रा के लिये निकल पड़े । दिल्ली में गुप्त मन्त्रणाये हुई । फिर अम्बाला गये । इसके उपरान्त मध्य अप्रैल में लखनऊ पहुँचे । वहा नाना साहब का समारोह के साथ जलूस निकला । नाना अङ्गरेजों से प्रत्येक स्थान पर मिलता था, जिसमें वे लोग निश्चिन्त बने रहे । लखनऊ के बाद कालपी और झाँसी आये । योजना का कार्य-क्रम निश्चित करके चले गये । उत्तर हिन्द की लगभग समस्त छावनियो में होते हुये नाना और अजीमुल्ला बिठूर आ गये । स्थान-स्थान और प्रदेश प्रदेश में प्रभाव वाले व्यक्ति प्रचार के कार्य में जुट गये । अभी तक अङ्गरेजो को क्रांति के सामूहिक रूप का बिलकुल पता न था । गरमी आ गई । सरोवरों में कमल खिल उठे । फसल भी कट कर घरो में आने लगी । स्वाधीनता-युद्ध के दो चिह्न प्रकट हुये । एक कमल, दूसरा रोटी । असंख्य कमल के फूल भारतवर्ष भर की छावनियो में फैल गये ।

लक्ष्मीबाई २५१ कमल फूलो का राजा । सरस्वती की महानता, लक्ष्मी की विशालता उसके पराग और केशर में कही अदृष्ट रूप से निहित है । वह विष्णु की नाभि से निकला और अनन्त समय के उपरान्त वही वापिस जायगा । वह हिन्दुस्थान की प्रकृति का, सस्कृति का, मृदुल, मजुल. मांगलिक और पावन प्रतीक है । उसका रग हलका लाल है । वह बिलकुल रक्त नही है । हिन्दुस्थान में होने वाली क्रान्ति खूनी जरूर थी, परन्तु उस खूनी क्रांति के गर्भ में मंजुलता और पावनता गढी हुई थी । इसीलिये सन् ५७ की क्रांति का यह प्रतिबिम्ब चुना गया । क्रांति करेंगे—मानवीयता की रक्षा के लिये, क्रांति होगी—मानवीयता लिये हुये ! कमल के साथ रोटी भी चलती थी । एक गाव से दूसरे गाव एक रोटी भेजी जाती थी । दूसरे गाव में फिर ताजी रोटी बनी और तीसरे गाव भेज दी गई । हिन्दुस्थान की वह क्रांति हिन्दुस्तानियो की रोटी की रक्षा के लिये हुई थी । रोटी उस रक्षा के प्रयत्न का प्रतीक थी । जिसने सोचा उसने कल्पना का कमाल कर दिया । यह उपज हिन्दुओं और मुसलमानो, दोनो की थी । कमल और रोटी का दौरा समाप्त नही हुआ था कि छ मई को मेरठ में विस्फोट हो गया । मेरठ में बडी छावनी थी । कई हिन्दुस्थानी और अङ्गरेजी पलटनें थी । एक हिन्दुस्थानी पलटन के नब्बे सिपाहियो को कारतूस दिये गये । सिपा- हियों को विश्वास था कि कारतूस अस्पृश्य चर्बी वाले हैं । अङ्गरेजो ने उन्हे आश्वासन दिया, कि नही हैं। पचासी सिपाहियो ने कारतूसो को छूने से इनकार कर दिया । उनका कोर्टमार्शल हुआ । आज्ञा न मानने के अपराध में उनको दस दस वरस के कठोर कारावास का दंड मिला । नौ मई के दिन इन सिपाहियों को गोरी फौज और तोपखाने के सामने लाकर खडा किया गया । वरदियाँ उतरवा ली गईं और हथकडी वेडियां डाल दी गईं । छावनी के बाकी हिन्दुस्थानी सिपाही भी इस दृश्य को देखने के लिये बुला लिये गये थे ।

२४२ झाँसी की रानी इसके बाद वे लोग जेलखाने भेज दिये गये । उनके साथी सिपाही क्षुब्ध हो गये, परन्तु उनको ३१ मई तक रुके रहनेकी आज्ञा थी, इसलिये वे गुस्सा पी गये । घटना सुबह की थी । सन्ध्या समय हिन्दुस्थानी सिपाही बाजार में गये । सबसे पहले कुछ वेश्याओ ने आवाजें कसी । ‘आहा ! आपकी मूछें देखिये ! कैसी भाजी हैं !! भाइयो को जेल- खाने भेजकर मुए किसी पोखरे में न डूब मरे !!!’ फिर गृहस्थ स्त्रियो ने । पुरुषो ने भी ताने कसे । सिपाही वारको को लौट आये । धैर्य ने साथ छोड दिया । स्त्रियो के शब्द कलेजे में बिध गये । रात को गुप्त मन्त्रणा हुई । निश्चय हुआ कि ३१ मई तक नही ठहरेंगे । उसी रात उन लोगो ने दिल्ली खबर भेजी कि कल परसो तक दिल्ली पहुँचते हैं, सब लोग तैयार रहे । दस मई को मेरठ में तलवार बन्दूक चल गई । अङ्गरेजो को मारमूर कर सिपाही दूसरे दिन दिल्ली पहुच गये । वहा की हिन्दुस्थानी सेना उनसे मिल गई । दिल्ली निवासियो ने उनका साथ दिया । चारो ओर ‘दीन दीन,’ ‘अल्ला हो अकबर’ और ‘हर हर महादेव’ की पुकारें एक दूसरे में होकर गूंज गई । दिल्ली की अंग्रेजी फौज मुहासिरे में पड गई । मेरठ और दिल्ली की सम्मिलित हिन्दुस्थानी फौज ने दिल्ली के लाल किले पर अधिकार कर लिया । वादशाह बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित किया और २१ तोपो की सलामी दी । वादशाह ने क्रांति का नेतृत्व स्वीकार किया और उसने सबसे पहला जो काम किया, वह था गो-वध का क़तई बन्द कर देना । मई के महीने में लगभग सारे उत्तर हिन्द में क्रांति की आग भड़क उठी—किसी दिन कही, और किसी दिन कही ।

लक्ष्मीबाई २५३ कानपूर में चौथी जून की रात को यकायक आधी रात के समय तीन फायर हुये । हिन्दुस्थानी सेना ने कानपूर में क्रांति का आरम्भ कर दिया । सवेरे खजाना और शस्त्रागार क्रांतकारियो के हाथ में आ गये और नाना को राजा घोषित कर दिया गया ।

२४४ झाँसी की रानी [ ४६ [ स्कीन, गार्डन डनलप इत्यादि को झाँसी में मई की खबरे मिल गई और रानी को उनसे पहले ही ! रानी ने एक विशेष समय तक के लिये, लगभग सब आने-जाने वालो का महल आना बन्द कर दिया । जो थोडे से लोग आते-जाते थे, उनमें एक मोतीबाई थी । उसी के द्वारा रानी सब महत्वपूर्ण समाचार लेती और देती थी । मोतीवाई, खुदाबख्श और रघुनाथसिंह के सम्पर्क में थी । वह इन लोगो को सब बाते भुगता देती थी—स्वाभाविक था । ये दोनो दूसरे लोगो के सम्पर्क में थे । इस प्रकार काम जारी था । मोतीबाई ने खुदाबख्श को महल में आगन्तुको वाले निषेध का वास्तविक कारण बतलाया । खुदाबख्श ने पीरअली को सुनाया और पीरअली ने नवाव अलीबहादुर को । ३१ मई के दिन और समय वाली बात भी उन अङ्ग्रेज अफसरों को मालूम हो गई । परन्तु मेरठ और दिल्ली इत्यादि स्थानों में इसके काफी पहले ही काण्ड हो चुके थे इसलिये उन लोगो ने ३१ मई सम्बन्धी सावधानी पर ध्यान नही दिया । स्कीन ने जो चिट्ठिया मई के महीने में लैफ्टिनेंट गवर्नर के पास आगरे भेजी उनमें साफ लिखा कि झासी में विद्रोह का कोई भी चिन्ह नही है और सिपाहियो का पूरा विश्वास किया जा सकता है । पहली जून की चिट्ठी में उसने सबमे पहले कुछ झंझट की सूचना दी । 'रात को मुझे खबर मिली कि कुछ ठाकुर लोग कोच पर धावा करने वाले हैं । मैंने तुरन्त डनलप को सूचित किया । सबेरे ही कुछ फौज गाव की रक्षा के लिये भेज दी । फौज के पहुंचते ही ठाकुरो का विचार बदल गया । इधर-उधर भले ही विद्रोह फैला हो, परन्तु यहा के लोग हमसे कभी नही बिगडेंगे ।' असल में रानी की दृढ सावधानी के कारण, झाँसी में असमय विस्फोट नही हो पाया । महल में आगन्तुको के निषेध की बात सुनकर, इन लोगो को और भी विश्वास हो गया कि रानी को आन्दोलन से

लक्ष्मीबाई २५५ सरोकार नही है कोच पर इकतीस मई को 'कुछ ठाकुरो' का पहुच जाना, जिसका समाचार स्कीन को पहली जून की रात को मिला, काफी अर्थ रखता था। परन्तु जान पडता है कि उन ठाकुरो को यह नही मालूम था कि ३१ मार्च के आगे के लिये कार्यक्रम स्थगित हो गया है। और फिर दूसरे ही दिन कुछ हिन्दुस्थानी फौज का डनलप के साथ कोच पहुच जाना ठाकुरो के हतोत्साहक होने का कारण हो गया। चौथी जून को कानपुर में और उसी दिन झासी में क्रान्ति के लक्षण प्रकट हुये। गुरबख्शसिंह नाम का हवलदार कुछ सैनिको को लेकर कम्पनी निर्मित छोटे से किले में, जो पुराने किले से एक मील शहर बाहर है, और जिसे अङ्गरेज लोग उसकी बनावट के कारण 'स्टार फोर्ट' (तारा-गढ) कहते थे, घुस पडा और लडाई का सब सामान और रुपया-पैसा उठवाकर ले आया। डनलप बची-बचाई सेना लेकर मुकाबिले के लिये आया। स्टार फोर्ट में कोई भी सामान न पाकर वह लोट गया। कमिश्नर को सूचना मिली। उसकी सलाह पर छावनी के सब अङ्गरेज अपने बाल-बच्चे लेकर किले में जाने को तैयार हुये। डनलप ने नौगाव छावनी, सहायता पाने के लिये, पत्र लिखा। अब इन लोगो को रानी की, रानी के शौर्य की, उनकी योग्यता की और उनकी तेजस्विता की याद आई। गार्डन कई अङ्गरेजो को लेकर रानी के महल पर पहुचा। गार्डन ने कहलवाया, 'अभी हमको भरोसा है कि फौज में जो थोड़ी सी गडवड हुई है उसको दवा लेंगे, परन्तु यदि कोई बडी विपद आवे तो आप हमारी सहायता करियेगा। रानी ने उत्तर दिलवाया, 'इस समय हमारे पास न तो काफी शस्त्र हैं और न लडने वाले आदमी। देश में उपद्रव फैल रहा है। यदि अनुमति मिल जाय तो मे अपनी और जनता की रक्षा के लिये एक अच्छी सेना भर्ती करलूँ।' डनलप सहमत होकर चला आया।

२५६ झाँसी की रानी दूसरे दिन छावनी में स्कीन, गार्डन और डनलप की बैठक हुई। उन लोगो को अब भी विश्वास था कि हिन्दुस्थानी का व्यक्तिगत रूप से अपमान करना किसी भी नुकसान का कारण नही बनता । वे समझते थे कि सारी फौज में कुछ व्यक्ति नाराज हो सकते हैं, सब नही । इसी भरोसे डनलप एक और अङ्गरेज को साथ लेकर पलटन में पहुचा । सिपाहियो ने, जिनमें रिसालदार कालेखां सबसे आगे था, तुरन्त गोली से मार दिया । अङ्गरेजो में भगदड मच गई । गार्डन अकेला रानी के पास दौड़ा गया । मुन्दर द्वारा बातचीत हुई । गार्डन —'हम लोग पुरुष हैं । हमको अपनी चिन्ता नही । हमारी स्त्रियो और बच्चो को अपने महल में आश्रय दे दीजिये ।' मुन्दर ने रानी को आगा-पीछा सुझाया, 'सरकार, इस आफत से दूर रहिये । फौज के लोग हमारे महल पर टूट पड़ेंगे । रानी ने धीमे, परन्तु दृढ स्वर में मुन्दर से कहा, 'हमारी लड़ाई अङ्गरेज पुरुषो मे है, उनके बाल-बच्चो से नही । यदि मैंने सिपाहियो का नियन्त्रण न कर पाया तो उनका नेतृत्व क्या करुँगी ? कह दो गार्डन से कि स्त्रियो और बालको को तुरन्त महल में भेज दे ।' मुन्दर ने सम्वाद दे दिया । गार्डन तुरन्त स्त्रियो और बच्चो को छावनी से निकाल कर शहर ले आया और उनको महल में दाखिल कर दिया । रानी ने उनको भोजन करवाया और ढांढस दिया । परन्तु स्कीन ने हठ किया, इसलिये वे सब महल से हटा लिये गये और किले में भेज दिये गये । इस बीच में सिपाही छावनी के तहस-नहस में उलझे थे । फारिग होकर वे किले पर धावा करने के लिये बढे । गार्डन इत्यादि ने सब

लक्ष्मीबाई २४७ फाटक बन्द कर लिए । लेकिन सिपाही बहुत थे । उनके पास तोपखाना था और किले में तोप न थी—युद्ध सामग्री भी थोडी, खाने के लिए करीब करीब कुछ नहीं । नवाब अलीबहादुर ने उसी समय पीरअली को भेजा और कहलवाया कि हुक्म हो तो ओर्छा और दतिया से सेना बुलवा ली जावे ।* अङ्गरेज इतने भयभीत हो गये थे या इतनी हेकडी में थे कि उन्होंने जवाब दिया, 'कोई जरूरत नही है । छोटा सा बलवा है । दबा लेंगे ।' पीरअली ने नवाब साहव को वह उत्तर भुगता दिया । खुदाबख्श मिल गया । उसको भी सुनाया । खुदाबख्श ने मोतीबाई को रानी के पास भेजा और स्वयं रघुनाथसिंह के पास चला गया । मोतीबाई ने कहा, 'सरकार अब समय आगया है ।' और खुदाबख्श की कही बात सुनाई । रानी बोली, 'नियुक्त तारीख पर आरभ न होने के कारण कार्यक्रम का रूप बदल गया है । तो भी, अपनी सेना तुरन्त तैयार करने का प्रयत्न इसी समय किया जाना चाहिये । रघुनाथसिंह को समाचार दो कि कटीली से दीवान जवाहरसिंह को बुलाले और जितनी विश्वनीय सेना इकट्ठी हो सके आठ मील पर, रकसा के निकट, जमा करे । घुडसवार अधिक हो । जब तक मेरी आज्ञा न मिले झासी की ओर न आवे ।' मोतीबाई ने दीवान रघुनाथसिंह को आज्ञा सुना दी । वह खुदाबख्श को लेकर चला गया । उस दिन सिपाही किले पर बराबर आक्रमण करते रहे । परन्तु अङ्गरेज उनको गोलियो की बौछार से पीछे हटाते रहे । दूसरे दिन भी लडाई चलती रही । दोपहर के उपरान्त अङ्गरेजो के पास खाने के लिये एक दाना भी न रहा । किले वाला महल दुवारा-तिवारा *नवाब अलीबहादुर का बयान जो उन्होने सन् १८५६ में दिया था और जिसकी नकल नर्वाव वन्ने के पास है ।

२५८ झाँसी की रानी छाना कि कहीं कुछ रक्खा हो । वहा कुछ भी न मिला । शाम के बाद लडाई कुछ ढीली हुई । अङ्गरेजो ने किसी प्रकार रानी के पास अपनी भूख का समाचार भेजा । रानी ने दो मन रोटिया तत्काल बनवाईं । काशीबाई से कहा, 'तू इन रोटियो को किसी प्रकार अङ्गरेजो के पास पहुँचा । तुझको सारे गुप्त मार्ग मालूम हैं, सुन्दर और मुन्दर को साथ लेजा, और कोई न जावे। जहां मशाल की अटक पढे जला लेना ।' सहेलिया रानी की दया को जानती थी, परन्तु उसकी सीमा को नही देखा था । काशी ने विनम्र शांत स्वर में कहा, 'सरकार, यदि हम लोग इस परिस्थिति में पढे होते तो क्या अङ्गरेज़ लोग हमको दाना-पानी देते ?' रानी मे उत्तर दिया, 'अङ्गरेजो जैसे बनकर हम अपने और उनके बीच के अन्तर को क्यो मिटाएँ ? और फिर इन लोगो को भूखा मारकर आगे बढना अनुष्ठान को कलुषित करना है ।' रानी मुस्कराई । काशी का हृदय आभासमय हो गया ।' परन्तु फिर भी उसने सवाल किया, कब तक आप इनको इस प्रकार खिलायेंगी ?' 'जब तक मेरी निज की सेना तैयार नही हो गई,'रानी ने कहा 'जब सेना तैयार हो जावेगी, मैं उन लोगो के हथियार रखवालूँगी और कही सुरक्षित स्थान में क़ैद कर दूँगी ।' उन तीनो सहेलियो ने रोटियो के गट्ठर पीठ पर लादे और गुप्त मार्ग में होकर किले में ले गई । गार्डन इत्यादि ने उन लोगो को प्रणाम किया । उनमें एक व्यक्ति मार्टिन नाम का था । मार्टिन ने सुरंग का रास्ता देख लिया । दूमरे दिन फिर ये तीनो किले में दो मन रोटिया दे आई । मार्टिन चुप चाप पीछे पीछे आया और गुप्त मार्ग से बाहर निकल कर आगरा चला गया । सहेलियो को या किसी को भी नही मालूम पड़ा ।

लक्ष्मीबाई २५९ उस दिन घोर युद्ध हुआ । गार्डन उत्तरी फाटक के ऊपर की खिडकी में से ताक ताक कर बन्दूक का निशाना लगा रहा था और सिपाही उसके मारे हैरान हो रहे थे । उनको शहर का एक पुराना तीरन्दाज मिल गया । उस तीरन्दाज ने एक पत्थर की ओट लेकर गार्डन पर तीर छोडा । तीर गार्डन की गर्दन को फोडकर पार हो गया । गार्डन के मरते ही समस्त अङ्गरेजो में उदासी और निराशा छा गई । उधर रिसालदार कालेखा ने किले के उत्तर-पश्चिमी कोने पर, जिसे शंकर-किला कहते हैं, भयानक दाब बोली और अपनी सेना की एक टुकडी सहित किले में घुस गया । अङ्गरेजो ने देखा कि अब कोई बचत नहीं, इसलिये उन्होने सुलह की चर्चा छेडी । सिपहियो ने रक्षा का आश्वासन दिया । स्कीन ने ८ जून के सबेरे किले का सदर फाटक, जो दक्षिण की ओर है, खोला और कहा कि हमको सागर चले जाने दो । सिपाहियो ने उन लोगो को कैद कर लिया । सिपाहियो का मुखिया रिसालदार कालेखा छावनी चला गया । थोडी देर में वहा जेल-दरोगा बख्शिशअली आया । उसकी आंखे लाल थी, और मुँह झुलसा हुआ । उसने अङ्गरेजो की ओर देखा । सिपहियो से बोला, 'रिसालदार साहब रास्ते मे मुझे मिले थे । हुकुम दे गये हैं कि इन सब को झोखनबाग ले चलो ।' सिपाही अङ्गरेजो को झोखनबाग ले आये । वहा एक सिपाही घोडे पर सवार आया । बख्शिशअली ने उसके कान में कुछ कहा । सवार हिचका । बख्शिशअली बोला, 'भाइयो, यह जो स्कीन कमिश्नर खडा है, इसने मुझको जूतों की ठोलो से पीटा था, अब क्या देखते हो ?' सिपाही एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बख्शिशअली—'और इसने जूते की ठोल से मुझको इतना मारा था कि मैं गिर पड़ा था । मारने के पहले इसने मुझको सुअर की गाली दी थी ।'

३६० झाँसी की रानी स्कीन भयभीत खडा था । परन्तु इस आरोप ने उसको जगा दिया । बोला, 'मैंने गाली कभी नही दी । मारा शायद हो, मगर याद नही आता । काम में गफलत करने पर तो कभी कभी मारना भी पडता है।' वह जो सवार आया था, उसकी ओर बख्शिशअली ने भयानक दृष्टि से देखा । सवार ने कडकती हुई आवाज मे कहा, 'रिसालदार साहब ने इन सबके कतल का फरमान किया है।' बख्शिशअली ने सबसे पहले स्कीन को मारा, और फिर सब काट दिये गये । उस समय वहा सिवाय उन सिपाहियो के और कोई न था । उसी समय रिसालदार कालेखा आ गया । खून में रगी तलवारो को देखकर क्रुद्ध स्वर में बोला, 'यह क्या किया !' बख्शिशअली ने कहा, 'और क्या करते ?' रिसालदार ने अपने स्वर को सयत करके पूछा, किसके हुकुम से ? क्या रानी साहब ने हुकुम दिया था ?' बख्शिशअली के पास ही वह सवार खडा था । उसने उत्तर दिया, 'रानी साहब को कुछ नही मालूम । वे तो हम लोगो से कुछ कटी कटी सी जान पडती हैं।' 'तब किसके हुकुम से ?' रिसालदार ने और भी सयत स्वर में पूछा । बख्शिशअली ने जवाब दिया, 'आपके नाम पर मेरे हुकुम से !' 'ओफ !', रिसालदार ने धीरे से कहा, 'हमारे बडे मुखिया जब सुनेंगे क्या कहेगे ? मगर...मगर...' रिसालदार थोडी देर चुप रहा । सूर्य की किरणो में जलन बढती चली जा रही थी । रिसालदार ने मुँह पर हाथ फेरा । माथा दबाया । थोडी देर खामोश रहा । बोला, 'जो हुआ सो हुआ । आगे बिना हुकुम के कोई काम न करना । रानी साहब के महल पर चलो ।' वैसी ही तलवारे लिये सिपाही महल की ओर चल पडे ।

लक्ष्मीबाई २६१ [ ५० ] सिपाहियो मे अनुशासन न था । घिन और गुस्सा मनको घेरे थे । अपनी विजय पर उनको पागलो जैसा हर्ष था । रानी के महल पर वे पीछे पहुँचे, उनका शोरगुल पहले पहुँच गया । पहरेदार ने फाटक बन्द कर लिये । सेना के कुछ सिपाही शहर को लूटने की बातचीत करने लगे । कवायद परेड सीखे हुये वे सिपाही अच्छे नेता की कमी के कारण महज हुल्लड और भम्भड की भूमिका भरने लगे । कोई किसी की नही सुन रहा था । हर एक आदमी अपना अपना गुबार निकालने की धुन में था । इतने में कालेखा चिल्लाया, 'खलक खुदा का, मुलक वादशाह का, राज महारानी लक्ष्मीबाई का ।' सब सिपाहियो ने यही नारा लगाया । सिपाहियो की विचारधारा इसी नारे की ओर मुड गई–उस नारे ने अनुशासन की कमी को कुछ पूरा किया । खिडकी की झरप हटी । हाथ जोडे हुये लक्ष्मीबाई दिखलाई दी । पीछे सशस्त्र सहेलिया । बिलकुल गौर-वदन । गले मे हीरो का कण्ठा । होठ एक दूसरे से सटे हुये । सिपाहियो ने फिर नारा लगाया । रानी ने नमस्कार किया । हाथ उठाकर चुप रहने का सकेत किया । भीड में सन्नाटा छा गया । रिसालदार आगे बढा । रानी ने तीव्र स्वर में पूछा, 'क्या है ? तुम रिसालदार कालेखा हो ?' स्वर में तीव्रता होते हुये भी कठ का प्राकृतिक सुरीलापन था । कालेखा ने सैनिक-प्रणाम किया । बोला, 'हुजूर का तावेदार कालेखा रिसालदार में ही हूँ ।' रानी की अनिमेष दृष्टि से कालेखा ने अपनी आख मिलाई । कालेखां की आख झरप गई । नीची हो गई । रानी ने कहा, 'इन तलवारो में रक्त कैसे लगा ?' कालेखा ने बतलाया ।

२६२ झाँसी की रानी रानी बोली, 'इन्ही कर्मों से स्वराज्य और बादशाही स्थापित करोगे ? तुम लोगो ने घोर दुष्कर्म किया है। क्या तुम यह समझते हो कि संसार से सब नियम सयम उठ गये ?' कालेखा—'हुज़ूर .....' रानी—'और अभी तुम लोगो में से कुछ झासी नगर को लूटने की भी चर्चा कर रहे थे। तुम अपने को इतना भूल गये ! क्या तुम लोगो को यही सिखलाया गया है ?' कालेखा—'हुजूर के हुकुम के खिलाफ अगर अब कुछ हो तो हम सबको तोप से उडा दिया जाय। जो आज्ञा हो उसका हम लोग पालन करेंगे।' रानी--'तो मैं यह कहती हू कि छावनी को लौट जाओ। सोच विचार कर सन्ध्या तक आज्ञा दूँगी कि आगे तुम्हे क्या करना है।' कालेखा सिपाहियों से बातचीत करने लगा। कुछ ने कहा, 'छावनी चलो।' कुछ बोले, 'दिल्ली चलो। वहा मज़ा रहेगा।' कुछ ने सलाह दी, 'कुछ रुपया तो पहले गाँठ में कर लो।' अन्त में सिपाहियो ने निश्चय किया 'रानी साहब से रुपया लो और दिल्ली चल दो। रानी साहब रुपया न दें तो जितना शहर से वसूल करते बने वसूल कर के, झासी को रानी के हवाले करो और आगे बढो।' कालेखा ने सिपाहियो का निर्णय रानी को सुना दिया कहा। कहा, 'सरकार, सिपाही भूखे हैं।' रानी परस्थिति को समझ गईं। उन्होने दूरदर्शिता से काम लिया। बोली, 'अङ्गरेज़ो ने मेरे पास रुपया नही छोड़ा। राज्य अङ्गरेजो के अधीन रहा है। मैं कहा से रुपया लाऊँ ?' कालेखा ने कहा, 'हम लोग मजबूर हैं। आप मालिक हैं। आपसे कुछ नही कह सकते। यदि यहां से रुपया नही मिलता है तो हम लोग शहर से उगावेंगे।'

लक्ष्मीबाई २६३ रानी समझ गईं कि शहर लुटने वाला है। उन्होंने गले से हीरों का कंठा उतारा और कालेखां की अञ्जलि में डाल दिया। बोली, 'इससे तुम्हारी सारी अटके पूरी हो जायगी। मनुष्यों की तरह यहा से जाओ। कही लूटमार बिलकुल न करना, अदब कायदे के साथ दिल्ली पहुँचे। हिन्दुओं को गंगा की ओर मुसलमानों को कुरान की सौगन्ध है।' कुछ सिपाहियों ने रानी की नौकरी करनी चाही। परन्तु बहुमत दिल्ली जाने के पक्ष में था। इसलिये लगभग सब दिल्ली चले गये — केवल थोड़े से रह गये। उनमें से एक लालता तोपची था। सिपाहियों के चले जाने पर रानी ने रकसा से दीवान जवाहरसिंह इत्यादि को तुर त ससैन्य बुलवाया। सिपाही फ़ौजी सामान तोपें इत्यादि अपने साथ ले गये।

२६४ झाँसी की रानी [ ५१ ] रात में दीवान जवाहरसिंह ससैन्य आ गया । रानी ने आदेश भेजा कि नगर और किले का प्रबन्ध करो और कल दिन में मिलो । दूसरे दिन महल में बहुत लोग उपस्थित हुये । सेना और शासन से सम्बन्ध रखने वाले सरदार, कर्मचारी, जागीरदार, जनता के साहूकार मुखिया और पञ्च । रानी पर्दे के पीछे बैठी । रानी ने कहा, 'कल कठिनाई के साथ मैंने नगर को लुटने से बचा पाया । विद्रोही तो यहाँ से चले गये, परन्तु अव्यवस्था छोड़ गये हैं। डकैती और लूटमार बढ़ने का बहुत भय है । मै चाहती हूँ जनता त्रस्त न होने पावे । इसलिये मैने झासी राज्य के पुराने जागीरदार और सरदारों को कुछ सेना लेकर बुलवाया है, जिसमें अव्यवस्था न रहने पावे । आप लोगों को और जनता के मुखिया पञ्चों को सम्मति के लिये बुलाया है । बतलाइये अब क्या करना चाहिये ?' गार्डन के सरिश्तेदार ने कहा, 'मै तो यह सलाह दूँगा कि सागर के डिप्टी कमिश्नर को बलवे की सूचना दी जावे और जबलपुर के कमिश्नर को लिखा जावे कि आपने अङ्गरेजों की ओर से शासन की बागडोर हाथ में ले ली है ।' माल के सरिश्तेदार ने समर्थन किया । कोरियों का सरपञ्च पूरन बोला, 'मुसकिल से तो कम्पनी को राज हटपाओ है अब उन्हे जा खबर काये दई जाय कै हम तुमाये लानें अपनो मूँड सँजो रये, आओ, और फिर किड बिड़ करके झाँसी के प्रान खाओ ?' दोनो सरिश्तेदारों ने आँखें तरेरी । काछियों के मुखिया ने कहा, 'हमें नई चाउने काऊ और को राज झाँसी में । करै राज तो हमाई बाई साब, न करै तो हमाई बाई साब !' तेलियों के पञ्च ने मत प्रकट किया, हमें तो अपनों पुरानों राज लौटाउने, चाए पृथी इतै की उतै हो जाय ।'

लक्ष्मीबाई २६५ प्रमुख साहूकार मगन गन्धी बोला, 'वाट जोहते जोहते आंखें पथरा गईं । आज कितनी मानताओं के बाद यह दिन देखने को मिला । हम लोग तो अपना राज्य चाहते हैं ।' सरिश्तेदारो ने फिर आंखे तरेरी । चमारों के मुखिया ने कहा, 'एल्लो, उसई आंखे नटेर रये ! राज बाई साव को और फिर बाई साब की और हम सब बाई साब के ।' माल का सरिश्तेदार बोला, 'नवाब अलीबहादुर साहब को भी बुला लीजिये । वे दुनिया देखे हुये हैं । ठीक सलाह दे दें । इन बेपढो की सलाह पर अमल करना गलत होगा ।' 'हो, ते है वडो मौलबी पडित,' अहीरो के नायक ने रुष्ट होकर कहा, 'हमें परदेसियन की हकूमत नई चावने । जो उनकी पिच्छदारी करें तीको करिया मो हो जाय !' मोरोपन्त ने जन-मत का समर्थन किया । एक लक्ष्मणराव वाडे नामका, चतुर काइया भी उस सभा में था । बोला, 'सरिश्तेदार साहब अगरेजी और अगरेज़ को जानते हैं । वे वास्तव में यह चाहते हैं कि बाईसाहब दो चार रोज़ यह मुफ्त का झमेला अपने सिर लिये रहे और सागर के डिप्टी कमिश्नर को बुला कर उनको पेशकारी दिलवादे ताकि कसकर रोजगार चले ।' अब सरिश्तेदारो का कोई कुछ कहने लगा और कोई कुछ । वृद्ध नाना भोपटकर ने, जो अब भी काफी स्वस्थ था, कहा, 'हमलोग सरिश्तेदार साहब की सलाह पर भी विचार करेंगे । इस समय इतना तो अवश्य तै कर लेना चाहिये कि राज्य का सर्वांगीन शासन बाईसाहब के हाथ में रहे और सब लोग अपने को उनकी प्रजा मानकर दृढ़तापूर्वक अपने जीवन का निर्वाह करे ।' उपस्थित जनता ने हर्ष और उत्साह के साथ इस मत को स्वीकार किया ।

२६६ झांसी की रानी वे दोनो सरिश्तेदार दरबार से हटा दिये गये । रानी बोली, 'आप लोग जो भार मुझे दे रहे हैं, उसको मै अपना गौरव मानती हूँ और परमात्मा की कृपा से उसको निभाऊँगी ।' लोगो ने जय-जयकार किया । गुलाम गौसखा तोपची हाथ बाधकर खडा हो गया । उसने कहा, 'श्रीमन्त सरकार, मुझको मेरी पुरानी नौकरी मिलनी चाहिये ।' रानी उसको पहिचानती थी । बोली, 'तुम सदर तोपची नियुक्त किये जाते हो सब तोपो को संभालो । जो तोपे खराब कर दी गई हैं उनको ठीक करो ।' 'जो आज्ञा', गुलाम गौसखा ने गद्गड़ होकर कहा, --'एक विनय और है, साढे तीन साल से ऊपर हुये एलिस किले वाले महल में आया और हम लोगो के मनमें आशा बँधी कि झांसी के राज्य को लौटाने की चिट्ठी लाया होगा, तब मैने तोपो मे बारूद डाल ली थी—सलामी दागने के लिये । आज मुझको अपने मन की करने का हुक्म दिया जाय ।' रानी ने सुरीले मधुर स्वर मे कहा, 'अभी ऐसा क्या हो गया है ?' गुलाम गौस—'हो गया है सरकार । हमारे दिलो में हो गया है । दिलो के बाहर हो गया है ।' मोरोपन्त—'हो गया है ।' लक्ष्मणराव—'हो गया है ।' नाना भोपटकर—'हो गया है ।' उपस्थित जनता ने उसी को दुहराया और जय-जयकार की । रानी ने अनुमति दे दी । गुलाम गौस ने थोडी देर में तोपो को सभाला । जो चलाने लायक थी, उसने सलामी दाग दी । जब भीड छट गई, रानी ने एकान्त में अपने सरदारो से विचार- विमर्श किया ।

लक्ष्मीबाई २६७ नाना भोपटकर—'अभी लक्षणो से ऐसा प्रतीत नही होता कि अङ्गरेजी राज्य उठ गया। इसलिये एक चिट्ठी जबलपुर के कमिश्नर के पास इस विषय की भेज दी जावे कि वाईसाहब झासी में अङ्गरेजो की ओर से राज्य कर रही हैं, जिससे डकैती, वटमारी और अव्यवस्था जनता को त्रस्त न कर सकें। यदि अङ्गरेज देश से निकाल दिये गये तो झासी हाथ से कही गई नही और यदि अङ्गरेज झासी वापिस आ गये तो बाईसाहब का कोई नुकसान नही हो पावेगा।' मोरोपन्त—'मै इस मत को अनुचित समझता हू। नाना साहव और दिल्ली, लखनऊ इत्यादि के अपने सहयोगी सुनेंगे तो क्या कहेगे ?' रघुनाथसिंह- 'नाना साहव इत्यादि हम लोगो को अच्छी तरह जानते हैं। उनके मन मँजे हुये हैं। भ्रम नही हो सकता। मेरे पास रानी विक्टोरिया की दी हुई सनद और तलवार है। सनद को परवाने का काम करने दीजिये और तलवार को देश की स्वाधीनता का।' दीवान दूल्हाजू—'मैं अपने शरीर के टुकडे टुकडे करने कराने को तैयार हूँ। खूब डट कर राज्य हो और कसकर लडाई। मै तो आज हर्ष के मारे बेकाबू हुआ जा रहा हू।' जवाहरसिंह—'दीवान साहव समय पडने पर सब देखा जायगा।' दूल्हाजू—'कैसे दीवान साहव ?' जवाहरसिंह—'आप तो रुष्ट होने लगे। लडना मरना सबको आता है। यह समय शान्ति के साथ सलाह करने का है, मेरे निवेदन का इतना ही अर्थ है।' भाऊबख्शी—'मेरी समझ में नाना भोपटकर जो कह रहे हैं, वह ध्यान देने योग्य है।' मोरोपन्त—'मैं इस सलाह के विरुद्ध नही हूं। परन्तु झंडे का सवाल उठता है। जगह जगह वादशाह का हरा झंडा फहराया जा रहा है।'

२६८ झांसी की रानी रानी—'झासी पर केवल भगवा झंडा उडाया जावे।' नाना भोपटकर—'मेरी भी यही राय है।' रानी—'नीति का काम नाना भोपटकर जी को सौपा जाय वे जैसा ठीक समझे करें। मैं स्वयं रणनीति और राजनीति के समीकरण में विश्वास करती हू। एक का पलडा भारी हुआ कि दूसरा झमेले में पड़ा।' नाना भोपटकर—'मै स्वयं चिट्ठी नहीं लिखूंगा। गार्डन के सरिश्तेदार से लिखवा कर भेजूंगा। वह यहा से खिसिया कर गया है। मना लूंगा।' इस बात के तै होने पर राजकार्य का विभाग किया गया और पदाधिकारी नियुक्त किए। लक्ष्मणराव प्रधान मन्त्री, बख्शी और तोपे ढालने वाला भाऊ, प्रधान सेनापति दीवान जवाहरसिंह, पैदल सेना के तीन कर्नल—एक दीवान रघुनाथसिंह दूसरा मुहम्मद जमाखा तीसरा खुदाबख्श। घुड सवारो की प्रधान स्वयं रानी। कर्नल-सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई। तोपखाने का प्रधान गुलाम गौसखा, नायब दीवान दूल्हाजू। न्यायाधीश नाना-भोपटकर। मोरोपन्त कमठाने के प्रधान। जासूसी विभाग मोतीबाई के हाथ मे, नायब जूही। पुलिस, माल विभाग, दानधर्म विभाग इत्यादि के भी कर्मचारी नियुक्त कर दिये गये। तहसीलो के तहसीलदार भी। मऊ का परगना काशीनाथ भैया नामक एक महाराष्ट्र और आनन्दराय के हाथ में दिया गया। उस दिन खूब लू चली। काफी गरमी पडी। परन्तु किसी ने यह न जाना कि दिन कैसे निकल गया। जब सब काम अच्छी तरह से निबटा लिया तब रानी ने सभा विसर्जित की।

लक्ष्मीबाई २६६ [ ५२ ] सब कर्मचारियो को अपने अपने विभागो को दृढता और सावधानी के साथ सभालने और चलाने का आदेश रानी ने कर दिया ! सबेरे से ही रिसाले और पैदल पलटनो की कवायद और निशाने- बाजी शुरू हो गई । समय पर बिगुल बजा और ठीक समय पर सब काम हुआ और होता रहा । सेना में लगभग सब पुराने सिपाही आ गये । नई भर्ती भी बहुत हुई । सब जातियो और वर्गों के आदमी लिये गये । रानी की हिदायत थी कि सेना को सारे राज्य की जनता अपना समझे और यह तभी हो सकता था जब सेना में सब जातियो के लोग रखे जाते । झांसी का राज्य लेने पर अङ्गरेज़ो ने लगभग सब पुरानी तोपो को कीले ठोककर, बेकार कर दिया था । तोपो के ढालने के कारखानो को चालू करने का कार्य तुरन्त शुरू कर दिया गया । गोले गोलिया बनाने का, तलवारे-बन्दूके, पिस्तौले इत्यादि तैयार करने का भी काम जारी हो गया । परन्तु नये हथियारो का कारखानो से बनकर निकलना शीघ्र सम्पादित नही हो सकता था । इसलिये रानी ने, जहा मिले, पुराने हथियार इकट्ठे किये । जनता ने जी खोलकर रुपया दिया । गुलाम गौसखा ने दो दिन में तोपो को ठीक कर लिया । कुछ तोपें गडी हुई पडी थी । उनको भी सभाल लिया । यह अच्छा हुआ क्योकि राज्य को हाथ में लेने के ठीक पाच दिन बाद (१३ जून की रात को) रानी को मोतीबाई ने खबर दी कि करेरा के किले पर सदाशिवराव नेवालकर ने हमला किया है और काफी सेना इकट्ठी करली है । सदाशिवराव झांसी की गद्दी का दावेदार था । झांसी में ही रहता था । ३१ मई की हलचल की उसको खबर थी । वह अपनी लुडिया मारने के लिये झांसी से निकल गया । गांव में लोग क्रान्ति के लिये तैयार थे ही, बहुत से मनचले नौजवान हथियार बाधकर सदाशिव के साथ हो गये ।