झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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लक्ष्मीबाई ७ [ २ ] रघुनाथराव के उपरान्त राज्य के लिये चार मुख्य दावेदार खड़े हुये- गङ्गाधरराव ( भाई ) कृष्णराव ( रामचन्द्रराव का कथित दत्तक पुत्र ) अलीबहादुर और रघुनाथराव की विधवा रानी । कृष्णराव की पीठ पर सखूबाई थी । बन्दीगृह के जीवन ने सखूबाई का दमन नही कर पाया था, प्रत्युत वह अधिक सतर्क, सतेज, और सन- कीली हो गई थी । रघुनाथराव की अन्त्येष्टि क्रियायें भी साङ्गोपाङ्ग न हो पाई थी कि सखूबाई ने किले पर अधिकार कर लिया, खज़ाने पर अपने सन्त्री बिठला दिये, तोपो पर अपने तोपचियो को और सिलहखाने पर अपने सिलेदारो को नियुक्त कर दिया । गङ्गाधरराव शहर वाले महल में थे । उनको ऐसा लगता था जैसे अपने ही घर में कैद हो । सखूबाई को कैद करने का निर्णय जिन लोगो ने दिया था उनमें गङ्गाधरराव भी थे । सखूबाई की प्रतिहिंसा के भय से, और साधन-हीन होने के कारण गङ्गाधरराव झांसी से भागे और अङ्गरेजो के पास सीधे कानपूर पहुंचे । उस समय कानपूर अङ्गरेजो की बढ़ी हुई शक्ति का काफी बड़ा अड्डा था । अलीबहादुर ने करेरा के दुर्ग में शरण ली और वह वहा से सैन्य संग्रह करने लगे । उस समय मध्य भारत के लिये गवर्नर जनरल का एजेन्ट साइमन फ्रेज़र था—सन् १८५७ के विप्लवकाल में यह आगरे का लैफ्टि- नेंट गवर्नर हो गया था । इस गडबड की ख़बर पाकर फ्रेज़र झांसी आया । कम्पनी सरकार के प्रबल सगठन और बल के आतंक ने उसके कर्मचारियो को उद्धत बना दिया था । वह दो एक चोबदारो को लेकर सखूबाई के पास क़िले में पहुचा और उसने सखू को धमकाया ।
८ झाँसी की रानी सखू ने कोई परवाह नही की । मधुमास का महीना था । होली हो चुकी थी । जनता अपने रंग में मस्त थी । सखूबाई के इशारे पर फ्रेज़र की किले से बाहर निकलते ही बहुत दुर्गति हुई । फ्रेज़र सेना और तोपखाना लेकर लौटा । सखूबाई किला छोड़ कर भाग गई । अलीबहादुर करेरा त्याग कर कम्पनी की शरण में आगये, और उनको ५००) मासिक पेन्शन देना तै हो गया । झाँसी राज्य का मामला तै करने के लिये एक कमीशन बैठा । कमीशन ने उत्तराधिकार का निश्चय गङ्गाधरराव के हक में किया । गङ्गाधरराव कानपुर से झाँसी आ गये । धूमधाम के साथ उनका अभिषेक हुआ । परन्तु झाँसी राज्य पर कुप्रबन्ध और ऋण का इतना बोझ बढ गया था कि फिर कोर्ट हो गया । बात सन् १८३६ की है । गङ्गाधरराव साहित्य और ललित-कलाओ के पूरे रसिक थे । सुखलाल काछी उनका चित्रकार था । पढा लिखा कम, परन्तु कमल और कूची की सही विधि, कोमलता और हथौटी का आचार्य । गायक, वादक, खास कर ध्रुपद, वीणा और पखावज के उस्ताद और रीतिकाल तथा भक्ति- रस की ओट वाले कवि गङ्गाधरराव की महफिल को आबाद करने लगे । उन्होने दूर दूर से नाना-प्रकार के हस्त-लिखित ग्रन्थ इकट्ठे करवाये और विशाल पुस्तक भाण्डार से अपने पुस्तकालय को भर दिया । वेद, उपनि, षद्, दर्शन, पुरान, तन्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, काव्य इत्यादि के इतने ग्रन्थ उनके पुस्तकालय में थे कि लोग दूर दूर से उनकी प्रतिलिपि के लिये आने लगे । नाटको का उन्हे विशेष शौक था । वे संस्कृत नाटको का अनुवाद हिन्दी और मराठी में करवाया करते थे और उनका अभिनय भी करवाते थे । शहर के महल के ठीक पीछे पश्चिमी दिशा में नाटकशाला थी ।* *अब यह खंडहर है । गिरजाघर के उत्तर में केवल सडक बीच में है ।
लक्ष्मीबाई ६ गङ्गाधरराव स्वयं अभिनय करते थे। पुरुष के अभिनय से सन्तोष नही होता था, इसलिये स्त्री की भूमिका में भी आ जाते थे। स्त्रियो का अभिनय करने के लिये उन्होने बहुत सुन्दर नाचने-गाने वाली नियुक्त कर रक्खी थी। इनमें मोतीबाई बहुत प्रसिद्ध थी। ❊ उसका सौन्दर्य अप्सरा सा था। फूलो जैसी कोमलाङ्गी। स्वरलहरी सी मोहक और चंचल। परन्तु वेश्यापुत्री होने पर भी वह कुमारी थी और नाटकशाला के बाहर पर्दे में रहती थी। बहुत कुशल अभिनेत्री थी, परन्तु इसको भी गङ्गाधरराव अपने उदाहरण से यथावत् अभिनय सिखलाते थे। गंगाधरराव की नाटकशाला में मोतीबाई छोटी उम्र में आगई थी। जो लोग गंगाधरराव की कृपा से नाटकशाला में खेल देखने जाया करते थे वे बाहर आकर उसके रूप की, नृत्य और संगीत की, उसके हाव-भाव तथा अभिनय की प्रशंसा करते नही अघाते थे। ❊ झाँसी के खेवट में वह मोतीबाई नाटकशाला वाली के नाम से विख्यात है।
१० . झाँसी की रानी [ ३ ] झाँसी की गद्दी पर राजा गंगाधरराव को बैठे और झाँसी-राज्य के शासन को अगरेजो द्वारा चलते सात-आठ साल हो गये। नगर का शासन गंगाधरराव के हाथ में था और बाकी राज्य का कम्पनी के कर्मचारियो के हाथ मे । चैत लग गया था। वसन्त ने पत्थरो और ककडो तक पर फुल- वाडियाँ पसार दी। टेसू के फूलो ने क्षितिज को सजा दिया और धरती पर रग-बिरंगे चौक पूर दिये। समीर और प्रभञ्जन में भी महक समा गई। रात और दिन संगीत से पुलकित हो उठे। उस रात नाटकशाला में 'रत्नावली' का अभिनय था। हिन्दी अनुवाद द्वारा । मोतीबाई को रत्नावली का रूपक करना था। निर्देशन स्वय राजा का । गायन-वादन और नृत्य बडे उस्तादो के दिग्दर्शन मे तैयार हुये थे। दर्शक सब निमन्त्रण पर आये थे। राजा गंगाधरराव सबसे आगे बैठे थे। उनकी आयु इस समय जीवन के लगभग बीचोबीच थी। सुन्दर, स्वस्थ और राजसी। पीछे, परन्तु पास ही उनके सगी खुदाबख्श, दीवान रघुनाथसिंह, राव दूल्हाजू, दीवान जवाहरसिंह इत्यादि दायें-बाये बैठे हुये थे। सब नौजवान । स्वास्थ्य और यौवन की उमगो में भरे हुये । मोतीबाई के छलकते मदमाते यौवन और सौन्दर्य को देखने के लिये आतुर । पर्दा खुला। सूत्रधार का मगल-गान हुआ। कुछ समय बाद रत्नावली की भूमिका में मोतीबाई इठलाती हुई रगमञ्च पर आई। खुदाबख्श के मुँह से यकायक 'वाह !' निकल पडा । मोतीबाई ने खुदा- बख्श को देखा । खुदाबख्श ने आँखे गडाई । जब-जब मोतीबाई रंगमञ्च पर जिस-जिस दृश्य मे आई उसने दर्शको पर से दृष्टि को समेट कर खुदाबख्श पर केन्द्रित किया । मोतीबाई ने नृत्य भी बहुत मोहक किया। नृत्य के समय चितवन की कोरो को मस्ती से भरने का प्रयत्न किया। और, पलको को अनेक
लक्ष्मीबाई ११ बार अर्द्ध मुकुलित झपकियाँ दीं। खुदाबख्श के मुँह से फिर 'वाह!' निकली। राजा को अच्छा नही लगा। बोले, 'तुम मूर्ख हो। जिस रत्नावली का विवाह राजा के साथ होने वाली है उसको क्या वेश्याओ जैसा नयन मटकौयल करना चाहिये ?' दर्शको की सम्मति थी कि सारा नाटक सफल अभिनय और मनोहर गायन-वादन तथा नृत्य के साथ समाप्त हुआ है। दर्शक नाटकशाला के बाहर गये। राजा गङ्गाधरराव रंगमञ्च के शृङ्गार-कक्ष मे पहुँचे। मोतीबाई ने नत-मस्तक प्रणाम किया। उसको विश्वास था कि आज सब कार्य कलाके सर्वाङ्ग सहित पूरा किया है। प्रफुल्लता के मारे उसका चेहरा दमक रहा था। राजा के मुह से प्रशसा के दो शब्द सुनने की ललक थी। राजा ने कहा, 'आज क्या शराब पीकर आई थी ?' मोतीबाई सन्नाटे में आ गई। चेहरा उतर गया। जैसे एक दम कुम्हला गई हो। धीमे, कोमल, मधुर स्वर मे बोली, 'श्रीमन्त सरकार, मैने शराब तो कभी भी नही पी है। आज क्या पीती ?' 'फिर आंखो को आज इतना ढाल क्यो दिया ?' राजा ने प्रश्न किया। एक छोटी-सी आह को भीतर ही दबाकर मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'मै भूल गई।' राजा कुछ शान्त हुये। बोले, 'जिस भूमिका का अभिनय करना हो उसके चरित्र को कभी न भूलो। अभिनय सफल तभी कहावेगा जब पात्र अपने को तो विलकुल भूल जावे परन्तु अपनी भूमिका की एक-एक रेखा को अच्छी तरह स्मरण रक्खे। उसमे तन्मय हो जावे। मैने पहले भी बतलाया है। समझी ?' मोतीबाई के मन में एक प्रतिवाद उठा, परन्तु उसने अपने को पूरी तौर से सयत करके विनय की, 'हाँ सरकार। आगे कभी भूल न होगी।' राजा ने कहा, 'अब की बार कालिदास का अभिज्ञान शाकुन्तल होगा। तुमको शकुन्तला का अभिनय करना है।'
१२ झांसी की रानी मोतीबाई की उदासी चली गई। बालकों जैसी सरल प्रफुल्लता के साथ उसने कहा, 'महाराज मैं भरसक प्रयत्न करूंगी। सरकार के दिग्दर्शन का अपमान न होगा।' राजा प्रसन्न होकर चले गये। पात्रो और पात्रियो ने जय-जयकार किया, 'श्रीमन्त सरकार महाराजा गङ्गाधरराव बहादुर की जय।' नियुक्त तिथि और समय पर शकुन्तला नाटक का अभिनय हुआ। लगभग वे ही सब दर्शक उपस्थित हुये। आभूषण विहीन परन्तु पुष्पो से लदी हुई मोतीबाई तपोवन की सहेलियो के साथ बेलो और लताओ को सीचते ही दर्शको के मन को मद सा वितरित करने लगी। परन्तु खुदाबख्श उस रात की रत्नावली की प्रमत्त आँख की झलक देखने के लिये व्याकुल था। होते-होते नाटक के अन्तिम दृश्यो की बारी आई। सुरासुर संग्राम में इन्द्र की सहायता करने के उपरांत दुष्यन्त लौटा। आश्रम मे सिंह के बच्चो के साथ खेलता हुआ लडका मिला। स्नेह उमड़ा बालक के हाथ से गडा खिसक गया। दुष्यन्त ने उठा लिया। गडा साँप के आकार में परिवर्तित नही हुआ। इस व्यापार को देखने वाली शकुन्तला की एक सहेली को विस्मय हुआ। दुष्यन्त को उस बालक की माता का नाम मालूम हो गया। मलिन वेशधारिणी शकुन्तला भी बाल बिखेरे आश्रम से बाहर निकल आई। दुष्यन्त ने पहिचान लिया। उसको परिताप हुआ। शकुन्तला ने अपनी विपत्ति का कारण अपने दुर्भाग्य को बतलाया। परन्तु उससे दुष्यन्त को संतोष नही हुआ। क्षमा प्राप्ति और प्रायश्चित करने के लिये दुष्यन्त शकुन्तला के पैरो पर गिर पडा। दुष्यन्त के पैरो पर गिरते ही मोतीबाई की दृष्टि एक क्षण के लिये खुदाबख्श पर गई। उसकी आँखें तरल थी और अनेक दर्शक भी अपने आँसुओ से, मानो स्त्रियो के साथ किये गये दुर्व्यवहारो का प्रायश्चित कर रहे थे। मोतीबाई की आँखो में बड़े-बडे आँसू आ गये।
लक्ष्मीबाई १३ गङ्गाधरराव ने खुदाबख्श की ओर गर्दन मोड़ी। कहा, 'क्यो रे कैसा रहा ?' मोतीबाई के आंखो के आसुओ की ओर जरा सी निगाह फिर डाल कर खुदाबख्श ने रुद्ध स्वर मे कहा, 'महाराज बहुत अच्छा 'पर आज 'वाह' 'वाह नही निकली ?' राजा ने पूछा। खुदाबख्श ज़रा झेपा। झेप को दबाने के लिये मुस्कराकर बोला, 'हुजूर उसके लिये कोई जगह नही पाई।' राजा इस बात को पीकर रह गये। खेल की समाप्ति पर दर्शक नाटक शाला के बाहर हुये और गङ्गाधरराव शृंगार कक्ष में। मोतीबाई अब भी मलिन वेश में थी। अभिनय के विषय में सम्मति सुनने के लिये प्रणाम करती हुई राजा के सम्मुख आई । उन्होने उसकी पीठ पर थपकी देकर शाबाशी दी। कहा, 'तुम्हारा आज का अभिनय बहुत अच्छा और स्वाभाविक रहा। कालिदास महान हैं। उन्होने उस समय शकुन्तला के हृदय को जो आँसू दिये थे, तेरे नेत्रो ने ब्याज के साथ लौटा दिये।' मोतीबाई प्रसन्नता के मारे फूल गई। बिना पुष्पो के ही पुष्पो से लदी जान पडी । राजा ने उसको एक बडा बाग जागीर में लगा दिया। ❊ दूसरे दिन राजा गङ्गाधरराव ने खुदाबख्श को राजदरबार से अलग कर दिया और घोषणा करवाई कि यदि खुदाबख्श फिर कभी झाँसी शहर में दिखलाई पडा तो उसके नगे शरीर पर कोडे लगाये जायँगे। लोगो को इस आज्ञा पर आश्चर्य था। परन्तु लोग राजा के सुलभकोपी स्वभाव को जानते थे, इसलिये किसी खास कारण को जानने की लालसा जनता के मन मे नही हुई। ❊यह बाग ओरछे दरवाजे के भीतर, दरवाजे से लगा हुआ था। आजकल इसके एक सिरे पर सडक के किनारे मसजिद है। बाकी में अब साग भाजी की खेती होती है।
१४ झाँसी की रानी दीवान रघुनाथसिंह और राव दूल्हाजू के मन में असली कारण के विषय में जो शका थी, उन्होने किसी पर प्रकट नही की। उन्होने सोचा कि इस नाटकशाला से दूर ही रहना चाहिये, परन्तु राजा के निमन्त्रण की अवज्ञा भी कैसे कर सकते थे ? मोतीबाई सावधानी और लगन के साथ नाटकशाला में काम करती रही। परन्तु दर्शको में खुदाबख्श को उसने फिर कभी नही देखा । और न कभी गङ्गाधरराव ने मोतीबाई को किसी विशेष दर्शक पर आँख को केन्द्रित करते पाया । इच्छा रखते हुये भी मीतीवाई रगमच पर फिर कभी बडे वडे आँसू नही निकाल सकी । इन दिनो नाटकशाला मे जुही नाम की एक अल्पवयस्का नर्तकी और आई । परन्तु उसको अपने घर पर नाचने गाने की और अधिक तालीम पाने की अनुमति मिल गई थी। जुही उनाव दरवाजे भीतर मेवातीपुरा के सिरे पर रहती थी। इसका भवन माधवराव भिडे के बाग से लगा हुआ था। उसने अभी अल्हडपन से बाहर कदम नही रक्खा था । रंगमच पर इसका नृत्य और गायन अधिक होता था, अभिनय कम ।
१. मनु का बाल्यकाल, बिठूर में अस्त्र-शस्त्र शिक्षा एवं झाँसी विवाह
उदय [ १ ] बर्षा का अन्त हो गया । कुवाँर उतर रहा था । कभी कभी झीनी झीनी बदली हो जाती थी । परन्तु उस सन्ध्या के समय आकाश बिलकुल स्वच्छ था । सूर्यास्त होने में थोडा सा विलम्ब था । बिठूर के बाहर गगा के किनारे तीन अश्वारोही तेजी के साथ चले जा रहे थे । तीनो बाल्यावस्था मे । एक बालिका, दो बालक । एक बालक की आयु १६, १७ वर्ष, दूसरे की १४ से कुछ ऊपर । बालिका की तेरह से कम । बडा बालक कुछ आगे निकला था कि बालिका ने अपने घोडे को एड लगाई । बोली, 'देखूँ कैसे आगे निकलते हो।' और वह आगे हो गई । बालक ने बढने का प्रयास किया तो उसका घोडा ठोकर खा गया, और बालक घडाम से नीचे जा गिरा । सूखी लकडी के टुकडे से उसका सिर भिड गया । खून बहने लगा । घोडा लौटकर घर की ओर भाग गया बालक चिल्लाया, 'मनू मे मरा।' बालिका ने तुरन्त अपने घोडे को रोक लिया । मोड़ा, और उस बालक के पास पहुंची । एक क्षण में तड़ाक से कूदी और एक हाथ से घोडे की लगाम पकडे हुये झुक कर घायल बालक को ध्यान पूर्वक देखने लगी ।
१६ झाँसी की रानी माथे पर गहरी चोट आई थी और खून बह रहा था । बालिका मिठास के साथ बोली, 'घबराओ मत, चोट बहुत गहरी नही है । लोहू बहने का कोई डर नही ।' मझला बालक भी पास आ गया । उतर पडा और विह्वल होकर अपने साथी की चोट को देखने लगा । 'नाना तुमको तो बहुत लग गई है ।' उस बालक ने कहा । 'नही, बहुत नही है' बालिका मुस्कराकर बोली, 'अभी लिये चलती हूँ । कोठी पर मरहम पट्टी हो जायगी और बहुत शीघ्र चंगे हो जायगे ।' 'कैसे ले चलोगी मनू ? बडे लडके ने कातर स्वर में कराहते हुये पूछा । मनू ने उत्तर दिया, 'तुम उठो । मेरे घोडे पर बैठो । मै उसकी लगाम पकडे तुम्हे अभी घर लिये चलती हू ।' 'मेरा घोडा कहाँ है ?' घायल ने उसी स्वर में प्रश्न किया । मनू ने कहा, 'भाग गया । चिन्ता मत करो । बहुत घोडे हैं । मेरे पर बैठो । जल्दी । नाना, जल्दी ।' नाना बोला, 'मनू में सध नही सकू गा ।' मनू ने कहा, 'में साध लू गी । उठो ।' नाना उठा । मनू एक हाथ से घोडे की लगाम थामे रही, दूसरे से उसने खून मे तर नाना को बिठलाया और बडी फुर्ती के साथ उचट कर स्वय पीछे जा बैठी । एक हाथ से घोडे की लगाम सभाली । दूसरे से नाना को थामा और गाव की ओर चल दी । पीछे पीछे मझला बालक भी चिन्तित, व्याकुल, चला । जब ये गाव के पास आगये तब कई सिपाही घोडो पर सवार इन बालको के पास आ पहुँचे । 'लगी तो नही ?' 'ओफ बहुत खून निकल आया है ।'
लक्ष्मीबाई १७ 'आओ मै लिये चलता हूँ।' 'घर पर घोडे के पहुँचते ही हम समझ गये थे कि कोई दुर्घटना हो गई है।' इत्यादि उद्गार इन आगन्तुको के मुँह से निकले। इन लोगो के अनुरोध करने पर भी मनू नाना को अपने ही घोड़े पर सँभाले हुये ले आई। पहुँचते ही कोठी के फाटक पर एक उतरती अवस्था के और दूसरे अधेड वय के पुरुष मिले। दोनो त्रिपुण्ड लगाये थे। उतरती अवस्था वाला रेशमी वस्त्र पहिने था और गले में मोतियो का कठा। अधेड सूती वस्त्र पहिने था। उतरती अवस्था वाले को कुछ कम दिखता था। उसने अपने अधेड साथी से पूछा, 'क्या ये सब आ गये मोरोपन्त?' 'हा महाराज।' मोरोपन्त ने उत्तर दिया। जब वे बालक और निकट आ गये तब मोरोपन्त नामक व्यक्ति ने कहा, 'अरे यह क्या? मनू और नाना साहब दोनो लोहूलुहान हैं।' जिनको मोरोपन्त ने 'महाराज' कहकर सम्बोधन किया था, वह पेशवा बाजीराव द्वितीय थे। उन्होने भी दोनो बच्चो को रक्त मे सना हुआ देख लिया। घबरा गये। सिपहियो ने झटपट नाना को मनू के घोडे पर से उतारा। मनू भी कूद पडी। मोरोपन्त ने उसको चिपटा लिया। उतावले होकर पूछा, 'मनू कहा लगी है बेटी?' 'मुझको तो बिलकुल नही लगी काका', मनू ने जरा मुस्कराकर कहा, 'नाना को अवश्य चोट आई है, परन्तु बहुत नही है।' 'कैसे लगी मनू?' बाजीराव ने प्रश्न किया। कोठी मे प्रवेश करते करते मनू ने उत्तर दिया, उँह साधारण-सी बात थी। घोडे ने ठोकर खाई। वह सँभल नही सके। जा गिरे। घोडा भाग गया। घोड़ा ऐसा भागा, ऐसा भागा कि मुझको तो हँसी आने को हुई।' मोरोपन्त ने मनू के इस अल्हडपन पर ध्यान नही दिया। नाना को मनू अपने घोडे पर ले आई, वे इस बात पर मन ही मन प्रसन्न थे।
१८ झांसी की रानी बाजीराव को सुनाते हुये मोरोपन्त ने पूछा, 'तू नाना साहब को कैसे उठा लाई ?' मनू ने उत्तर दिया, 'कैसे भी नही । वह बैठ गये । मै पीछे से सवार हो गई । एक हाथ में लगाम पकड ली, दूसरे से नाना को थाम लिया । बस ।' नाना को मुलायम बिछौनो में लिटा दिया गया । तुरन्त घाव को धोकर मरहम पट्टी कर दी गई । घाव गम्भीर न होने पर भी लम्बा और ज़रा गहरा था । वाजीराव बहुत चिंतित थे । उन्होने रो तक दिया । मोरोपन्त को विश्वास था कि चोट भयप्रद नही है तो भी वह सहानुभूति के कारण वाजीराव के साथ चिन्ताकुल हो रहे थे । जब मनूबाई और मोरोपन्त उसी कोठी के एक भाग मे, जहां उनका निवास था अकेले हुये, मनू ने कहा, 'इतनी जरा सी चोट पर ऐसी घबरा- हट और रोना पीटना ।' 'बेटी, चोट जरा सी नही है । कितना रक्त बह गया है ।' 'आप लोग हमको जो पुराना इतिहास सुनाते है उसमे युद्ध क्या रेशम की डोरो और कपास की पौनियो से हुआ करते थे ?' 'नही मनू । पर यह तो बालक है ।' 'बालक है ! मुझसे वडा है । मलखम्ब और कुश्ती करता है । वाला गुरू उसको शाबाशी देते हैं। अभिमन्यु क्या इससे वडा था ?' 'मनू, श्रव वह समय नही रहा ।' 'क्यो नही रहा काका ? वही आकाश है, वही पृथ्वी । वही सूर्य- चन्द्रमा और नक्षत्र । सब वही है ।' 'तू बहुत हठ करती है ।' 'जब मैं सवाल करती हू तो आप इस प्रकार मेरा मुंह बन्द करने लगते हैं। मैं ऐसे तो नही मानती । मुझको समझाइये, अब क्या हो गया है !' 'श्रव इस देश का भाग्य लौट गया है । अङ्गरेजो के भाग्य का सूर्यो- दय हुआ है । उन लोगो के प्रताप के सामने यहाँ के सब जन निस्तेज हो गये हैं।'
लक्ष्मीबाई १६ 'एक का भाग्य दूसरे ने नही पढ़ा है। यह सब मन-गढ़न्त है। डर- पोको का ढकोसला।' 'तू जब और बड़ी होगी तब संसार का अनुभव तुझको यह सब स्पष्ट कर देगा।' 'मै डरपोक कभी नही हो सकती। आप कहा करते हैं—मनू तू ताराबाई बनना, जीजाबाई और सीता होना। यह सब भुलावा क्यो? अथवा क्या ये सब डरपोक थी?' 'बेटी, ये सब सती और वीर थी, परन्तु समय बदलता रहता है। बदल गया है।' 'यह तो हेरफेर कर वही सब मनमाना तर्क है।' 'फिर कभी बतलाऊँगा।' 'मै ऐसी गलत-सलत बात कभी नही सुनने की।' 'तो सोवेगी या रात भर सवाल करती रहेगी!' अन्त मे खीझ कर, परन्तु मिठास के साथ मोरोपन्त ने कहा। मनू खिलखिलाकर हँस पडी। बोली, 'काका आपने तो टाल दिया। मैं इस प्रसग पर फिर बात करूँगी। अभी अवश्य करवट लेते ही सोई, यह सोई।' फिर एक क्षण उपरांत मनू ने अनुरोध किया, 'काका देख आइये नाना सो गया या नही। आपको नीद आ रही हो तो मै दौड़कर देख आऊँ।' मोरोपन्त ने मनू को नही जाने दिया। स्वयं गये। देख आये। बोले, 'नाना साहब सो गये हैं।' मनू सो गई। मोरोपन्त जागते रहे। उन्होने सोचा, 'मनू की बुद्धि उसकी अवस्था के बहुत आगे निकल चुकी है। अभी तक कोई योग्य वर हाथ नही लगा। दक्षिण जाकर देखना पडेगा।' इसी विचार के लोटफेर में मोरोपन्त का बहुत समय निकल गया। कठिनाई से अन्तिम पहर में नींद आई।
२० $\qquad$ झांसी की रानी [ २ ] मनूबाई सवेरे नाना को देखने पहुँच गई। वह जग उठा था, पर लेटा हुआ था। मनू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। स्निग्ध स्वर में पूछा, 'नीद कैसी आई ?' 'सोया तो हूँ, पर नीद आई-गई बनी रही। कुछ दर्द है।' नाना ने उत्तर दिया। मनू—'वह दोपहर तक ठीक हो जायगा। तीसरे पहर घूमने चलोगे न ? सध्या से पहले ही लौट आयेंगे।' नाना—'सवारी की धमक से पीडा बढने का डर है।' मनू—'प्रारम्भ में कदाचित थोडी सी पीडा हो, परन्तु शीघ्र उसको दाव लोगे और जब लौटोगे याद नही रहेगा कि कभी चोट लगी थी।' नाना—'यदि पीडा बढ गई तो ?' मनू—'तो सह लेना, फिर कभी गिरोगे तो चोट कम आवेगी।' नाना—'और यदि आज ही फिर फिसल पड़ा तो ?' मनू—'तो मैं तुमको फिर उठा लाऊँगी। चिन्ता मत करो।' नाना—'और जो तुम खुद गिर पडी तो ?' मनू—'तब मै फिर सवार हो जाऊँगी। किसी की सहायता नही लेनी पडेगी और घर आ जाऊँगी।' नाना—'मेरे बस का नही।' मनू—'लड्डू खाओगे ?' नाना—'इच्छा नही।' मनू—'तब क्या इच्छा है ?' नाना—'मुझे चुपचाप पडा रहने दो !' मनू—'कब तक ?' नाना—'तीन चार दिन लग जायेंगे।' मनू—'किसने कहा ?'
लक्ष्मीबाई २१ नाना—'काका कहते थे। वैद्य ने भी कहा था।' मनू—'वैद्य तो लोभवश कहता होगा, पर दादा क्यों कहते थे ?' नाना—'उनसे ही पूछ लेना। मेरा सिर मत खाओ।' मनू हँस पड़ी। फिर दाईं ओर का होठ थोडा सा—बिलकुल जरा सा—दबाकर बोली, 'तुम कहते थे—बाजी प्रभु देशपांडे की कीर्ति से बढ कर कीर्ति कमाऊंगा, तानाजी मालसुरे को पछाडूंगा, स्वर्ग निवासी छत्रपति शिवाजी को अपने कृत्यो से फड़का दू गा, श्रीमन्त पन्तप्रधान प्रथम बाजीराव की बराबरी करूंगा,......' इतने में वहा बाजीराव आ गये। मनू इतनी तीक्ष्णता के साथ बोल रही थी कि बाजीराव ने उसका अन्तिम वाक्य सुन लिया। बोले, 'तेरी चपलता न जाने कब कम होगी ? यह सब क्या बके जा रही है ?' मनू रञ्चमात्र भी नही दबी। बोली, 'इसको दादा आप बकना कहते हैं ? आप ही हम लोगो को यह सब छुटपन से सुनाते आये हैं। मैं उसी को दुहरा रही हूँ। अब इसे आप बकवास समझने लगे हैं ! यह क्यो दादा ?' बाजीराव ने कहा, 'बेटी क्या आज उन बातो के स्मरण से जीवन को चलाने का समय रहा है ? महाभारत की कथायें सुनो और अपने पुरखो की बाते सुनो। अच्छी भली बनो। मन बहलाओ और जीवन को पवित्र सुख से सुखी बनाओ। नाना को चिढ़ाओ मत।' मनू ने मुस्कराकर ओठ जरा सा दबाया, थोडी सी त्योरी संकुचित की और बाजीराव के बिलकुल पास आकर बोली, 'क्या हम लोगो को अब सोकर, खाकर ही जीवन बिताना सिखलाइयेगा दादा ?' बाजीराव को हँसी आई। कुछ कहना ही चाहते थे कि मोरोपन्त कहते हुये आ गये, 'नाना साहब को हाथी पर बिठला कर थोडा सा घूम आने दीजिये। बाहर तैयार खडा है।' बाजीराव ने प्रश्न किया, 'हाथी की सवारी में चोट को धमक तो नही लगेगी ?'
२२ झांसी की रानी मोरोपन्त ने उत्तर दिया, 'नही, पलकिया में बहुत मुलायम गद्दी तकिये लगा दिये गये हैं और हाथी बहुत धीमे चलाया जावेगा।' मनू हाथी को देखने बाहर दौड गई। नाना निस्तार इत्यादि के लिये उठ गया। मनू ने हाथी पहले भी देखे थे, फिर भी वह इस हाथी को बार बार चारो ओर से घूम घूमकर देख रही थी। और उसके डील-डौल पर कभी मुस्करा रही थी, कभी हँस रही थी। थोडी देर बाद बाजीराव नाना को लिये बाहर आये। साथ में छोटा लडका भी था, मोरोपन्त पीछे पीछे। हाथी पर पहले नाना को बिठला दिया गया। फिर छोटे को। महावत ने हाथी को अंकुश छुलाई। हाथी उठा। मनू ने मोरोपन्त से कहा, 'काका मै भी हाथी पर बैठूँगी।' बाजीराव के घुटनो से लिपट कर बोली, 'दादा मैं बैठूँगी।' नाना हौदे में महावत के पास बैठा था। उसने महावत को अविलम्ब चलने का आदेश किया। मनू की ओर देखा भी नही। बाजीराव ने नाना से कहा, 'लिये जाओ न मनू को।' नाना ने मुँह फेर लिया । तब बाजीराव ने दूसरे बालक से कहा, 'रावसाहब मनू को ले लेते तो अच्छा होता।' महावत कुछ ठमका तो नाना ने उसकी पसलियो में उँगली चुभोकर बढने की आज्ञा दी। वह नाना साहब और रावसाहब—दोनो लडको—को लेकर चल दिया। मनू की आँखो में क्षोभ उतर आया। मोरोपन्त का हाथ पकडकर बोली, 'हाथी लौटाओ काका। मै हाथी पर अवश्य बैठूँगी।' बाजीराव कोठी में चले गये। मोरोपन्त को भी क्षोभ हुआ, परन्तु उन्होने उसको नियंत्रित करके कहा, 'वह चला गया बेटी।' मनू मोरोपन्त का हाथ पकड कर खीचने लगी, 'महावत को पुकारिये, वह रुक जायगा। मैं बिना बैठे नही मानूँगी।'
लक्ष्मीबाई २३ मोरोपन्त का क्षोभ भडका। उन्होंने उसका फिर दमन किया। मनू ने फिर हाथी पर बैठने का हठ किया। मोरोपन्त ने क्रुद्ध स्वर में मनू को डाटा, 'तेरे भाग्य मे हाथी नही लिखा है। क्यो व्यर्थ हठ करती है?' मनू तिनक कर सीधी खडी हो गई। तमक कर कुछ कहना चाहती थी। एक क्षण होठ नही खुल सके। मोरोपन्त ने शात करने के प्रयोजन से, भरसक धीमे स्वर में, परन्तु क्रोध के सिलसिले में कहा, 'सैकडो बार कहा कि समय को देखकर चलना चाहिये। हम लोग न तो क्षत्रधारी हैं और न सामत—सरदार। साधारण गृहस्थो की तरह संसार मे रहन-सहन रखना है।.पढी लिखी होने पर भी न जाने सुनती-समझती क्यो नही है। कह दिया कि भाग्य में हाथी नही लिखा है। हठ मत किया कर।' मनू के होठ सिकुडे। चुनौती सी देती हुई बोली, 'मेरे भाग्य मैं एक नहीं दस हाथी लिखे हैं।' मोरोपन्त का क्रोध-क्षोभ भीतर सरक गया। हँस पडे। मनूबाई को पेट से चिपका लिया। कहा, 'अब चल कोई शास्त्र पुराण पढ। तब तक वे दोनो लौट आते हैं।' मनू मचली। बोली, 'मै अपने घोडे पर बैठकर सैर को जाऊगी और उस हाथी को तङ्ग करूगी।' मोरोपन्त सीधे शब्दो में वर्जित करना चाहते थे, परन्तु इस उपकरण में सफलता के चिन्ह न पाकर उन्होने तुरन्त बहाना बनाया, 'घोडे से यदि हाथी चिढ् गया तो तू भले ही बचकर निकल आवे, पर नाना साहब, रावसाहब तथा महावत मारे जावेगे।' वह मान गई। 'तब तक कुछ और करूंगी' मनूबाई ने कहा, 'पुस्तके तो नही पढूगी। बन्दूक से निशानावाज़ी करूंगी।'
२४ झाँसी की रानी [ ३ ] थोडी देर में घण्टा बजाता हुआ हाथी लौट आया । मनू दौड कर बाहर आई । एक क्षण ठहरी और आह खींच कर भीतर चली गई । नाना और राव, दोनो बालक, अपनी जगह चले गये । वाजीराव ने नाना को पुचकार कर पूछा, 'दर्द बढा तो नही ?' 'नही बढा' नाना ने उत्तर दिया, 'अच्छा लग रहा है। मनू कहाँ गई ?' वाजीराव ने कहा, 'भीतर होगी ।' रावसाहब—'उसे बुरा लगा होगा । नाना ने साथ नही लिया, मैने तो कहा था ।' नाना—'वह मुझको सवेरे से ही चिढा रही थी ।' बाजीराव—'क्या ? कैसे ?' नाना—'उसका स्वभाव है ।' कुछ क्षण उपरात मनू वहा आ गई । नाना ने हँसते हुये कहा, 'छवीली, तुम क्या कोई ग्रंथ पढ रही थी ?' मनू जल उठी । बोली, 'मुझमे छवीली मत कहा करो ।' नाना ने और भी हँसकर कहा, 'क्यो नही कहा करू ँ ? यह तो तुम्हारा छुटपन का नाम है ।' मनू की आँख लाल हो गई । बोली, 'मुझको इस नाम से घृणा है ।' नाना गभीर हो गया । बोला, 'मुझको तो यही नाम सुहावना लगता है । छवीली, छवीली ।' 'इस नाम को कभी नही सुनूँगी ।' कहकर मनू वहाँ से जाने को हुई । वाजीराव ने उसको पकड लिया । मनू ने भागना चाहा । न भाग सकी । तब नाना ने भी पकड लिया । 'क्या मनू बुरा मान गई ?' नाना ने स्नेह के साथ पूछा । मनू होठ सिकोडकर, रुखाई के साथ बोली, 'अवश्य । आगे इस नाम से मेरा सम्वोधन कभी मत करना ।'
झाँसी की रानी २५ इसी समय पहरे वाले ने बाजीराव को सूचना दी, 'झाँसी से एक सज्जन आये हैं । नाम तात्या दीक्षित बतलाते हैं ।' नाना बोला, 'मनू एक से दो तात्या हुये ।' मनू का क्षोभ घुला । बाजीराव ने प्रहरी से झासी के आगन्तुक को बिठलाने के लिये कह दिया । मनू ने कहा, 'झासी वाला तात्या कुश्ती लडता होगा ?' रावसाहब—'झाँसी में कोई वाला गुरू होगे तो कुश्ती का भी चलन होगा । वह तो राज्य ठहरा ।' नाना—'बडा राज्य है ?' बाजीराव—'बडा तो नही है, पर खासा है । हमारे पुरखो का ़ प्रदान किया है, जानते होगे ।' रावसाहब—'अपने को फिर नही मिल सकता है ?' मनू—'दान किया हुआ फिर कैसे वापिस होगा ?' बाजीराव—'हां वापिस नही हो सकता । झासी के राजा हमारे सूबेदार थे । इस समय अपना बस होता तो झासी में हम लोगो का काफी मान होता । परन्तु झासी तो बहुत दिनो से अङ्गरेजो की मातहती में है ।' मनू—'ग्वालियर, इन्दोर, बरोदा, नागपुर, सतारा इत्यादि के होते हुये भी थोडे से अङ्गरेज़ो ने आप सब को दाब लिया !' बाजीराव—'यह मानना पडेगा कि वे लोग हमसे ज्यादा चालाक हैं । हथियार उनके पास अधिक अच्छे हैं । शूरवीर भी हैं और भाग्य उनके साथ है और आपसी फूट हमारे साथ · ' मनू—'दादा क्या भाग्य में शूरवीर होना लिखा रहता है ? यदि ऐसा है तो अनेक सिंह स्यार होते होगे और अनेक स्यार सिंह ।' बाजीराव—'जब स्यार पागल हो जाता है तब सिंह भी उससे डरने लगता है ।'