रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
एकादशस्तरङ्गः २७६ २—गौरखटी (सफेद खड़िया); इनमें से खटी कुछ मैली होती है, किन्तु गौर- खटी सफेद और कोमल होती है ॥ २०६ ॥ खटिकायाः शोधनम् खटीचूर्णं शुद्धपात्रे निधाय बिमले जले । प्रक्षालयेद्विधानज्ञो विशुध्यति न संशयः ॥ २१० ॥ विमलजले शोधनं पाषाणांशनिरासाय सुधाचूर्णांशनिरासद्वारा भक्षण- योग्यतासम्पादनाय च ॥ २१० ॥ भा.टी.—खड़िया के चूर्ण को एक स्वच्छ पात्र में डालकर शुद्ध जल में अच्छी तरह घोलकर उसको वस्त्र से छान लें और धूप में सुखाकर रख लें तो खड़िया शुद्ध हो जाती है ॥ २१० ॥ खटिकाया गुणाः खटिका शिशिरा तिक्ता मधुरा शोथनाशिनी । पित्तप्रशमनी कामं विविधव्रणरोपणी ॥ २११ ॥ कफदाहास्रदोषघ्नी नेत्रामयनिषूदिनी । हरिद्वर्णातिसारघ्नी स्वेदादिस्रावहारिणी ॥ २१२ ॥ हरिद्वर्णातिसारघ्नी बालकेषु प्रायः, मधुरा शतपुष्पा ॥ २११–२१२ ॥ भा.टी.—खटिका, शीत, तिक्त, मीठी, शोथ को दूर करनेवाली, पित्त शामक, अनेक रोगों को दूर करनेवाली, कफ, दाह, रक्त के दोषों को दूर करने वाली, नेत्र रोगों को विनाश करनेवाली, हरे रंग के अतीसार रोग को और पसीना आने को रोकनेवाली है ॥ २११–२१२ ॥ खटिकाया आमयिकः प्रयोगः माषोन्मितं खटीचूर्णं भक्षितं शीतवारिणा । प्रवाहिकाञ्च पित्तास्रं ग्रहणीञ्च विनाशयेत् ॥ २१३ ॥ खटी शुद्धा मधुरिकातोयेन सितयान्विता । शीलिता विनिहन्त्याशु त्वतीसारं सुदारुणम् ॥ २१४ ॥ भा.टी.—एक मासा खड़ियाचूर्ण को शीतल जल से सेवन करने पर प्रवाहिका, रक्तपित्त तथा ग्रहणी रोग में लाभ होता है । शुद्ध खड़िया को मिश्री मिलाकर अर्कसौंफ के साथ खिलाने से शीघ्र ही भयंकर अतीसार शान्त हो जाता है ॥ २१३–२१४ ॥
२८० रसतरङ्गिणी अथ चूर्णस्य नामानि चूर्णं चूर्णकचूर्णान्तु सुधा सौधविलेपनम् । तदेव च समाख्यातं शिलाक्षारं भिषग्वरैः ॥ २१५ ॥ चूर्णं, चूर्णक, सुधा, सौधविलेपन और शिलाक्षार, ये नाम वैद्यों ने चूने के कहे हैं ॥ २१५ ॥ चूर्णोदकस्य निर्माणप्रकारः रक्तिद्वयोन्मितं चूर्णं पञ्चतोलकसंमिते । जले विनििक्षिपेत्प्राज्ञस्त्रियामं स्थापयेद् बुधः ॥ २१६ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेत्काचपात्रके । चूर्णोदकमिति ख्यातं तथैव च सुधोदकम् ॥ २१७ ॥ चूर्णोदकं दृढहरितकाचकुप्यां निधापयेत् । तथातिमंयतेनेह पिधानेन निरोधयेन् ॥ २१८ ॥ अथ चूर्णकम्—तस्य प्रयोगार्थे चूर्णोदकनिर्माणप्रकारः-सारकपत्रं "Filter Paper" इत्याङ्गलभाषायाम्। दृढहरितकाचकुप्यां निधानं सूर्यकिरणसम्पर्का- दौषधगुणक्षयभयात् ॥ २१६-२१८ ॥ भा.टी.—दो रत्ती साफ चूने की डली को पाँच तोले शुद्ध जल में डाल- कर बारह घंटे पड़े रहने दें। इसके बाद इस जलको सारकपत्र (Filter Paper) से काँच के पात्र में छान लें। इस छुने हुए जल को चूर्णोदक सुधोदक (चूने का पानी) कहा जाता है। चूनेके जल को एक दृढ़ हरे रंग की शीशी में रखकर उसमें अच्छी तरह डाट लगा देना चाहिये। वक्तव्य—चूने के पानी को खुला और सफेद शीशी में रखने से सूर्य- किरणों से वह अल्पशक्ति हो जाता है ॥ २१६-२१८ ॥ चूर्णोदकस्य गुणाः चूर्णोदकं कृमिहरमतीसारहरं परम् । अम्लपित्तप्रशमनं विशेषाद्दुग्धपाचनम् ॥ २१६ ॥ शूलं ग्रहणिाकां हान्त खटीवद् गुणकारकम् । द्रावकाशनसम्भूतां निहन्ति च विषक्रियाम ॥ २२० ॥ द्रावकाः गन्धकद्रावादयः, तद्भक्षणजाताम् ॥ २१६-२२० ॥ भा.टी.—चूने का पानी बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में कृमिनाशक और अतिसार- शामक है। अम्लपित्त रोग में लाभ पहुँचाता है। जिन बालकों को दूध नहीं
एकादशस्तरङ्गः २८१ पचता हो उन्हें इसके देने से दूध पचने लगता है। यह उदरशूल और ग्रहणी को नष्ट करता है और खड़िया के समान ही गुणकारक है। गन्धक-द्राव (Sul- phuric acid) के विषैले लक्षणों को यह शान्त कर देता है ॥२१६-२२०॥ चूर्णोदकस्य मात्रा आरभ्य त्रिंशद्बिन्दुभ्यः षष्टिबिन्दुमितं परम् । चूर्णोदकं प्रयुञ्जीत वार्षिकैकस्तनन्धये ॥ २२१ ॥ चूर्णोदकस्य सुखदा तोलकद्वयसंमिता । पूर्णमात्रा समाख्याता रसतन्त्रविशारदैः ॥ २२२ ॥ भा.टी.—एक वर्ष की आयु के बालक को यदि चूने का पानी देना हो तो तीस बूँद से लेकर साठ बूँद तक इसको दे सकते हैं। इसकी पूर्णमात्रा रसशास्त्रज्ञों ने दो तोला निर्धारित की है ॥ २२१-२२२ ॥ चूर्णोदकस्य आमयिकः प्रयोगः यत्नादिह हि वस्त्युक्तविधानेन सुधोदकम् । योजितं विनिहन्त्याशु कृमीन् क्षुद्रान्त्रसंस्थितान् ॥ २२३ ॥ नवसादरसंयुक्तं चूर्णं लिप्तं तु वारिणा । व्यथां वृश्चिकदंशोत्थां नाशयेदविलम्बितम् ॥ २२५ ॥ विषपीते सुधातोयं योजितं त्वविलम्बितम् । मल्ल भक्षणसंभूतां विनिहन्ति विषक्रियाम् ॥ २२४ ॥ सुधोदकं दुग्धयुतं प्रत्यहं परिशीलितम् । अम्लपित्तं निहन्त्याशु विशेषादविलम्बितम् ॥ २२६ ॥ कवलग्रहमार्गेण योजितं तु सुधोदकम् । विनिहन्त्यचिरादेव मुखपाकक्षतादिकम् ॥ २२७ ॥ चूर्णोदकं कर्षमितं काचपात्रे निधापयेत् । तन्मितञ्चातसीतैलं दत्त्वा काचशलाकया ॥ २२८ ॥ क्षणं प्रचाल्य मतिमान् काचकुप्यां तु विन्यसेत् । अग्निदग्धोत्थदाहघ्नं परमेतद्विलेपनात् ॥ २२६ ॥ चूर्णोदकस्य बालकेषु प्रयोगो दन्तोद्भेदजातरोगेषु स्पष्टमन्यत् । २२३-२२६। भा.टी.—यदि सावधानी के साथ बस्तिविधान से चूने के जल को प्रयुक्त किया जाय तो गुदा और क्षुद्रान्त्र के कृमि नष्ट हो जाते हैं। बिच्छू के काटे हुए स्थान पर चूने के जल में नौसादर घोलकर लेप करने से बिच्छू का जहर उतर
२८२ रस्तरङ्गिणी जाता है । यदि संखिया विष खाने पर शीघ्र ही चूने का पानी पिला दिया जाय तो शीघ्र ही विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है । चूने के पानी को दूध में मिलाकर पिलाने से शीघ्र अम्लपित्त रोग शान्त हो जाता है । मुखपाक, क्षत, आदि कष्टों में चूने के जल का कुल्ला करने से शीघ्र आराम आ जाता है । चूने के एक तोला पानी को काँच के पात्र में डालकर उसमें उतना ही अलसी का तैल मिला एक काँच की सलाई से थोड़ी देर तक चलाकर जब वह गाढ़ा सफेद लेप सा बन जाय तो एक काँच की शीशी में रख लें । अब इसे अग्निदग्ध स्थान में लगायें तो दाह शान्त हो जाता है ॥ २२३-२२६ ॥ अथ दुग्धपाषाणस्य नामानि दुग्धपाषाणको दुग्धी दुग्धपाषाणिका तथा । दुग्धा दुग्धशिला चैव क्षीरी क्षीरत्तवश्च सः ॥ २३० ॥ वज्राभो दीप्तिकश्चापि सौधो गोमेदसन्निभः । दुग्धोपलो दुग्धदृषद् भिषग्भिः परिकीर्तितः ॥ २३१ ॥ दुग्धपाषाण, दुग्धी, दुग्धपाषाणिका, दुग्धा, दुग्धशिला, क्षीरतत्व, वज्राभ, दीप्तिक, सौध, गोमेदसन्निभ, दुग्धोपल, दुग्धदृषद, ये सब नाम दुग्धपाषाण ( शंखजराहत ) के हैं ॥ २३०-२३१ ॥ दुग्धपाषाणस्य गुणाः दुग्धोपलस्तु मधुरस्त्वीदुष्णो ज्वरापहः । पित्तप्रशमनः कामं त्वग्दाहाध्माननाशनः ॥ २३२ ॥ हृदामयहरो रुच्यः पित्तशूलविनाशनः । कासश्वासहरश्चैव समाख्यातो भिषग्वरैः ॥ २३३ ॥ भा.टी.-दुग्धपाषाण रस में मधुर और गुण में कुछ गरम होता है । यह ज्वरनाशक और पित्तशामक, त्वचा के दाह और उदराध्मान को दूर करता है । हृदयरोगों में लाभदायक, रुचिकारक, पित्तप्रकोपजन्य शूल तथा कास-श्वास रोगों में आराम देता है ॥२३२-२३३ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः दुग्धपाषाणिका शुभ्रा यवक्षारसमन्विता । प्रलेपिता तु सततं कुष्ठं सिध्माभिधं हरेत् ॥ २३४ ॥ दुग्धपाषाणजं चूर्णं शीलितं गुञ्जसंमितम् । हन्ति ज्वरं मन्दवेगं सायंकालसमुत्थितम् ॥ २३५ ॥
एकादशस्तरङ्गः २८३ दुग्धपाषाणजं चूर्णं यत्नतस्त्ववचूर्णितम् । रक्तस्रावं निहन्त्याशु त्वभिघातव्रणोद्भवम् ॥ २३६ ॥ दुग्धपाषाणकः ईषदूष्णः नात्यन्तं शीतः । स्पष्टमन्यत् ॥ २३४-२३६ ॥ भा.टी.—स्वच्छ दुग्धपाषाणचूर्ण को यवक्षार के साथ जल में मिला कुछ दिन तक निरन्तर लेप करने से सिध्मकुष्ठ नष्ट हो जाता है । एक रत्ती दुग्धपाषाण- चूर्ण को कुछ दिन दूध या जल के साथ सेवन करने पर सायंकाल को होने वाला मन्दवेगज्वर दूर हो जाता है । दुग्धपाषाण का बारीक चूर्ण करके अभि- घात ( चोट ) तथा व्रणों में छिड़कने से उनमें से रक्तस्राव बन्द हो जाता है । इसके अतिरिक्त यह शरीर के भीतर होनेवाले रक्तस्राव, रक्तातिसार, रक्ताशं, प्रदर आदि रोगों में बहुत लाभ करता है ॥ २३४-२३६ ॥ अथ गोदन्तस्य नामानि गोदन्तिका च गोदन्ता गोदन्तं कथ्यते बुधैः । तत्तु पाषाणजातीयं सौम्यं तालसमं न तत् ॥ २३७ ॥ अथ गोदन्तम्—नेदं तालकजातीयं अपितु तस्मान्नितान्तं भिन्नमिति द्योत- यितुं स्फुटं लौकिकभ्रमं निरस्यति—"तत्तु पाषाणजातीयं सौम्यं तालसमं न तत्" इति ॥ २३७ ॥ भा.टी.—गोदन्तिका, गोदन्ता, गोदन्त ये नाम श्वेता या गोदन्ती के कहे जाते हैं । यह गोदन्त, पाषाणजातीय खनिज द्रव्य है जो सौम्य ( शीतगुण ) होता है, किन्तु हरताल के साथ कोई सादृश्य नहीं रखता है ॥ २३७ ॥ वक्तव्य—गोदन्ती को हरताल या विष मानना अत्यन्त भूल है। यह चूना और गन्धक का यौगिक है। इसको दो मासा से अधिक देने पर भी कोई भी विषैले लक्षण पैदा नहीं होते हैं । प्रकृति में पीतवर्ण गन्धक अधिकांश में श्वेत- गन्धक अर्थात् गोदन्ती से ही रासायनिक क्रिया द्वारा तैयार किया जाता है। आज- कल अनेक समालोचनात्मक दृष्टि से विचार करने पर यह निःसन्देह स्थिर किया गया है कि प्राचीन रसशास्त्रों में जो श्वेत खटिका रूप चौथा गन्धक है वह यही गोदन्ती है । गोदन्ती प्रकृति से तीन चार प्रकार की पायी जाती है। १—कणारूप गोदन्त, २—तालाकृति गोदन्त, ३—पिण्डाकृति गोदन्त, ४—कौशेयाकृति गोदन्त । इनमें से तालाकृति गोदन्त पतले-पतले अनेक पत्र संयोग से बने हुए पिण्ड या हरितालाकृति दिखाई देता है। सम्भवतः इसीके स्वरूप को देखकर इसे हरताल में लिया गया है । परन्तु वास्तव में यह किसी प्रकार भी हरताल नहीं हो सकता है।
२८४ रसतरङ्गिणी गोदन्तस्य स्वरूपम् पत्राचितं सुमस्तृणं शरदिन्दुसुनिर्मलम् । दीप्तप्रभं तु गोदन्तं ग्राह्यमत्र प्रकीर्तितम् ॥२३८॥ भा.टी.—यह गोदन्त आपस में मिले हुए अनेक पतले-पतले पत्रों से बना हुआ बाहर से चिकना, देखने में शरत्कालीन चन्द्रमा के समान श्वेत चमकीला होता है । यही रसशास्त्र में ग्राह्य समझना चाहिये ॥ २३८ ॥ गोदन्तस्य शोधनम् गोदन्तं निम्बुनीरेण द्रोणपुष्पीरसेन वा । यामार्द्धेनैव सुस्विन्नं विशुद्धयति न संशयः ॥२३६॥ भा.टी.—गोदन्त को नीम्बूस्वरस में अथवा द्रोणपुष्पीस्वरस में डेढ़ घण्टे उबाल लेने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ २३६ ॥ गोदन्तस्य मारणम् शरावसम्पुटान्तःस्थं गोदन्तं सुविशोधितम् । म्रियते पुटितं भस्म जायते शशिसुन्दरम् ॥२४०॥ भा.टी.—शुद्ध गोदन्त को छोटे-छोटे टुकड़े करके शरावसम्पुट में बन्द करके साधारण पुट देने से इसकी श्वेतभस्म बन जाती है ॥ २४० ॥ गोदन्तस्य गुणाः गोदन्तं सुमृतं शीतं पित्तज्वरनिषूदनम् । जीर्णज्वरहरं बल्यं दीपनं श्वासकासनुत् ॥२४१॥ गोदन्तं सुमृतं शीतमित्यस्य गुणाः, अपि च पित्तातिसारहरं रक्तपित्तहरञ्च । इदं रक्तप्रदरं प्रवाहिकाञ्च विनिहन्ति ॥ २४१ ॥ भा.टी.—गोदन्त ( श्वेता ) भस्म शीतगुण होने से पित्तज्वर को शान्त करती है । विभिन्न अनुपान के साथ प्रयोग करने पर जीर्णज्वर, श्वास, कास को दूर करती है । यह शरीर में बल बढ़ाती है और अग्नि को दीप्त भी करती है ॥ २४१ ॥ गोदन्तस्य मात्रा गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जात्रयमितं परम् । गादन्तं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥२४२॥ प्रवाहिकादिशान्त्यै त्रिगुञ्जा मात्रास्य दातव्येति स्पष्टमन्यत् ॥ २४२ ॥ इति तालकादिविज्ञानीयो नाम एकादशस्तरङ्गः
द्वादशस्तरङ्गः २८५ भा.टी.—बल, काल आदि के अनुसार गोदन्तभस्म की मात्रा एक रत्ती से लेकर तीन रत्ती तक दी जा सकती है ॥ २४२ ॥ यह तालकादिविज्ञानीय नाम एकादशतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ शंखादिविज्ञानीयो नाम द्वादशस्तरङ्गः । अथ शंखस्य नामानि शंखस्तु शंखकः कम्बुस्त्रिरेखश्च समुद्रजः । सुनादो दीर्घनादश्च कम्बोजश्च प्रकीर्तितः ॥१॥ भा.टी. -शंख, शंखक, कम्बु, त्रिरेख, समुद्रज, सुनाद, दीर्घनाद, कंबोज ये सब नाम शंख के समझने चाहिये ॥ १ ॥ ग्राह्यशंखस्य स्वरूपम् वृत्तः स्निग्धः सूक्ष्ममुखो निर्मलश्चेन्दुसुन्दरः । दीर्घकायो गुरुश्चापि शङ्खः श्रेष्ठः प्रकीर्तितः ॥२॥ भा.टी.—गोलाकार, चिकना स्पर्श, सूक्ष्म मुख, स्वच्छ चन्द्रमा सदृश सुन्दर, बृहत् आकार और गुरुभार शंख औषधिकर्म में ग्राह्य समझना चाहिये ॥ २ ॥ शंखस्य द्वौ भेदौ शङ्खस्तु द्विविधः प्रोक्तो रसतन्त्रविचक्षणैः । प्रथमो दक्षिणावर्तो वामावर्तोऽपरो मतः ॥३॥ दक्षिणावर्तशङ्खस्तु प्रशस्तो देवपूजने । त्रिदोषघ्नो निधिश्वापि स्मृतो दारिद्र्यनाशनः ॥४॥ वामावर्ताभिधः शङ्खः सर्वत्र सुलभो मतः । अतः स एव वैद्यैस्तु मारणार्थं प्रयुज्यते ॥५॥ शंखस्य नामस्वरूपभेदोपयोगाः स्पष्टप्रायाः ॥ ३-५ ॥ भा.टी.—रसशास्त्रज्ञों ने शंख के दो भेद माने हैं । १—दक्षिणावर्तशंख, २—वामावर्तशंख । इनमें से दक्षिणावर्तशंख देवताओं की पूजा में काम आता है । यह त्रिदोषनाशक और दरिद्रता को दूर करनेवाली एक निधि (विशेष बहुमूल्य पदार्थ) मानी जाती है । वामावर्तशंख प्रायः सर्वत्र सुलभ होता है । अतः इसी को ही वैद्य लोग भस्म करने के काम में लाते हैं ॥ ३–५ ॥ अथ शंखस्य प्रथमः शोधनप्रकारः शङ्खन्तु खण्डशः कृत्वा पोट्टल्यां स्थापयेद्भिषक् । दोलायन्त्रे चतुर्यामं पचेज्जम्बीरवारिणा ॥६॥
२८६ रसतरङ्गिणी प्रक्षालयेच्छङ्खखण्डान् प्रतप्तेनाम्भसा ततः । इत्थं नातिचिरादेवं शङ्खः शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥७॥ भा.टी.—शंख के टुकड़े करके एक कपड़े में बांधकर पोटली बना लें, अब इसको दोलायन्त्र में जम्भीरी नींबू का रस डालकर चार पहर तक पकावें । इसके बाद पोटली को खोलकर शंख के टुकड़ों को गरम जल से साफ कर लें। इस विधि से शीघ्र ही शंख शुद्ध हो जाता है ॥ ६-७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः जयन्त्याः स्वरसेनैव शंखं दोलागतं पचेत् । यामैकं पाचनादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥८॥ भा.टी.—जयन्ती (अरणी) के स्वरस को दोलायन्त्र में डालकर इसमें शंख को एक पहर तक पोटली में बांधकर पकाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥८॥ तृतीयः शोधनप्रकारः ताण्डुलीयद्रवेणेह शंखं दोलागतं पचेत् । यामैकं पाचनादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥६॥ भा.टी.—चौलाई के स्वरस को दोलायन्त्र में डाल कर इसमें शंख की पोटली को एक पहर पकाने से भी शंख शुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः काञ्जिकेन पचेच्छंखं दोलायन्त्रे भिषग्वरः । क्षालयेच्चोष्णतोयेन शंखः शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥१०॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में काञ्जी भर कर उसमें शंखकी पोटली को एक पहर तक पका करके पश्चात् उसे गरम जल से धो लेने पर वह शुद्ध हो जाता है ॥१०॥ पञ्चमः शोधन प्रकारः निम्बूकाम्लसमायुक्तवारा दोलाख्ययन्त्रके । यामार्द्धं पाचितः शंखः शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥११॥ शंखशोधनस्य बहवः प्रकाराः शोधकसौकर्यार्थम्। निम्बूकाम्लं प्रागुक्तम् ।११। भा.टी.—पूर्वोक्त नींबूकाम्ल में जल मिला इसको दोलायन्त्र में डालकर इसमें डेढ़ घंटे तक शंख की पोटली को पकाने से शंख शुद्ध हो जाता है ॥११॥ विशुद्धशंखस्य प्रयोगाः त्रिरेखवर्तिका माषकप्रमित। कृष्णा मरिचं माषकद्वयम् ।
द्वादशस्तरङ्गः २८७ शिला मरीचद्विगुणा शंखो माषाष्टकोन्मितः ॥१२॥ सम्पेष्य वर्तिकां कृत्वा लोचने विधिनाञ्जयेत् । तिमिरं नाशयेद्वारा मस्तुना चार्बुदं हरेत् ॥१३॥ पिच्चटं मधुना हन्यान्नारीस्तन्येन चार्जुनम् । त्रिरेखवर्तिका ह्येषा नेत्रामयनिषूदनी ॥१४॥ शुद्धशङ्खस्य बाह्यप्रयोगों नेत्रहितकारी—कृष्णा पिप्पली, शिला मनःशिला, वारा जलेन। पिच्चटं नेत्ररोगविशेषम्। अर्जुनं तदाख्यनेत्रव्याधिम् ॥ १२-१४ ॥ भा. टी.—पिप्पलीचूर्ण एक मासे, कालीमिर्चचूर्ण दो मासे, शुद्ध मैन- सिल चार मासे, शुद्ध शंखचूर्ण आठ मासे लेकर, इन सब को एकत्र खरल में जल से पीसकर बत्ती बनालें। इन बत्तियों को आँखों में आञ्जने से अर्थात् जल में घिस कर आँखों में लगाने से तिमिर (मोतियाबिन्द) रोग नष्ट होता है। दही के जल में घिसकर आंजन से नेत्रार्जुन (नाखूना) रोग दूर होता है। यह नेत्ररोगों को नष्ट करने वाली त्रिरेखवर्तिका कही जाती है ॥१२-१४ ॥ अर्जुनहरशङ्खचूर्णम् विशोधितं शङ्खचूर्णं क्षौद्रेण तु समन्वितम् । अर्जुनं नाशयत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥१५॥ भा.टी.—शुद्ध शंख चूर्ण को मधु के साथ आँख में लगाने से—जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है उसी प्रकार इस अञ्जन से रोग नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥ शंखवर्तिः शङ्खसैन्धवडिण्डीरैः शिग्रुबीजैश्च निर्मिता । वर्तिर्नेत्रेऽञ्जनादेव शुक्रादीन्नाशयत्यलम् ॥ १६ ॥ भा.टी.—शुद्धशंखचूर्ण, सेंधानमक, समुद्रफेन और सहंजन के बीज-चूर्ण को एकत्र जल से घोट कर वर्ति बना लें। इस वर्ति को आँखों में आँजन से नेत्र का फूला आदि नष्ट हो जाता है ॥ १६ ॥ अथ शंखस्य मारणम् शुद्धशङ्खस्य खण्डानि शरावे स्थापयेत्सुधीः । शरावेण पिधायाथ यत्नत्सन्धिं प्रलेपयेत् ॥ १७ ॥ आतपे त्वथ संशोष्य पुटेद् गजपुटे भिषक् ।
२८८ रसतरङ्गिणी स्वतःशीतं समुद्धृत्य खल्वे सञ्चूर्णयेद्भिषक् ॥ १८ ॥ चूर्णितञ्चाथ विज्ञाय सम्पुटस्थं ततः पुटेत् । एवं पुटद्वयेनैव शङ्खो मृतिमाप्नुयात् ॥ १६ ॥ भा. टी.—शुद्ध किये हुए शंख के टुकड़ों को एक प्याले या सिकोरे में रख कर उस पर दूसरा प्याला या सिकोरा औंधा रखकर इनको सन्धिलेप कर दें और धूप में सुखा दें। अब इस सम्पुट को गजपुट में रख कर फूँक दें। स्वांगशीतल होने पर सम्पुट में से शंख के अर्धदग्ध टुकड़ों को निकाल खरल में चूर्ण करके पुनः गजपुट में रख कर फूक दें। इस प्रकार दो बार गजपुट में फूकने से शंख की भस्म हो जाती है ॥ १७–१६ ॥ अथ मृतशंखस्य गुणाः, मात्रा च शङ्खः सुशीतलः क्षारस्वम्लपित्तविनाशनः । अग्निमान्द्यहरो बल्यो ग्राही ग्रह्णिीकाहरः ॥ २० ॥ परिणामोत्थशूलघ्नस्तारुण्यपिडिकापहः । विषदोषहरो वर्ण्यो मात्रा गुञ्जाद्वयोन्मिता ॥ २१ ॥ अथास्य गुणाः—क्षारः आस्वादतः कर्मतश्च ॥ २०–२१ ॥ भा. टी.—शङ्ख स्पर्श में शीतल, क्षारीय प्रकृति और अम्लपित्तनाशक है। यह बलवर्धक तथा ग्राही है, ग्रहणी रोग और परिणामशूल आदि रोगों को नष्ट करती है। युवावस्था में निकलनेवाली फुंसियों (मुँहासे) को मिटाती है। शंखभस्म ग्राही अर्थात् स्तम्भन होने से अतिसार विशेषतः पक्वातिसार में अत्यन्त उपयोगी है। शंखभस्म की मात्रा दो रत्ती समझनी चाहिये ॥ २०–२१ ॥ मृतशंखस्य आमयिकः प्रयोगः निम्बूकरस्वरसेनेह मृतशंखस्तु शीलितः । अतिसारं हरेत्तूर्णं ग्रहणीञ्चातिदारुणाम् ॥ २२ ॥ सत्र्यूषणो मृतः शंखस्त्वग्निमान्द्यं व्यपोहति । धात्रीचूर्णेन संयुक्तस्त्वम्लपित्तं विनाशयेत् ॥ २३ ॥ यवक्षारत्रिकटुना गुल्मरोगहरः परम् । शूलं त्रिदोषजं हन्याद् व्योषसैन्धवह्विङ्गुना ॥ २४ ॥ पुरातनगुड़ोपेतस्त्वथवा व्योषसंयुतः । सपञ्चलवणः शंखः परिणामोत्थशूलनुत् ॥ २५ ॥
२० द्वादशस्तरङ्गः ३०५ अस्य गुणा मात्रा च समुद्रफेनः शिशिरो लेखनः पाचनः सरः । चक्षुष्यो दीपनश्चैव श्रुतिस्रावहरः परम् ॥११३॥ विषदोषप्रशमनः कषायः कफनाशनः । कुष्ठरोगहरोऽत्यर्थं मात्रा रक्तिकद्वयोन्मिता ॥११४॥ शिशिरो वीर्ये, लेखनो दोषाणाम्, पाचनं आमस्य । मात्रा रक्तिकद्वयोन्मिता भक्षणाय ॥११३, ११४॥ भा.टी.—समुद्रफेन शीतवीर्य, लेखन (दोषों को पतला कर निकालने- वाला), पाचक, आंतों की गति को बढ़ानेवाला, नेत्र रोग में लाभदायक, अग्नि-दीपक, कान से बहनेवाले स्राव (पीप जल आदि) को सुखानेवाला, विषदोषशामक, कषायरस, कफनाशक और कुष्ठरोगहर है। इसकी साधारण मात्रा दो रत्ती की होती है ॥११३, ११४॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः समुद्रफेनचूर्णान्तु सितया श्लक्ष्णपिष्टया । नेत्रशुक्रं निहन्त्याशु चिरजातमपि ध्रुवम् ॥११५॥ शंखसैन्धवसंयुक्तः सुफेनोऽर्कशलाकया । नेत्रयोरञ्जनादाशु शुक्रादीन् शस्त्रवल्लिखेत् ॥११६॥ पिप्पलीसैन्धवोपेतः फेनको मधुनाञ्जनात् । विनाशयेच्छुक्रदोषं दृशोश्चिरसमुत्थितम् ॥११७॥ तुत्थषड्गुणितः फेनः पथ्यया तुत्थतुल्यया । वर्तिः कृताञ्जनद्वारा पोथक्यादिर्विनाशिनी ॥११८॥ रालसैन्धवरसाञ्जनान्वितः फेनकस्तु वटकीकृतोऽञ्जनात् । क्लिन्नवर्त्मविनिवारणः परं पद्मरोहणकरश्च कीर्तितः ॥११९॥ चूर्णितं त्वब्धिफेनं तु प्रध्मातं श्रुतिसम्पुटे । विनाशयेत् श्रुतिस्रावं चिरजातमपि द्रुतम् ॥१२०॥ सूतगन्धकसंयुक्तस्त्वथवा हिङ्गुलान्वितः । समुद्रफेनस्त्वशनात्कफपित्तज्वरापहः ॥१२१॥ मृदारशृङ्गसंयुक्तं त्वब्धिफेनं सुचूर्णितम् । मधुना व्रणसंलेपादुत्तमं व्रणरोपणम् ॥१२२॥ कोकिलाक्षककालेयकटुफलोशीरकेचुकैः । शृतैर्वा चूर्णितैर्लीढो डिण्डीरः शुक्रशोधनः ॥१२३॥
३०६ रसतरङ्गिणी वारा जलेन अञ्जनात् इति अन्वयः । कालेयकः पीतचन्दनम् । उत्पत्ति- वर्णनं फेनत्वेन भ्रमवारणाय । स्पष्टमन्यत् ॥११५-१२३॥ भा.टी.—समुद्रफेनचूर्णं को समभाग सफेद खाँड़ के साथ बारीक पीसकर आँखों में आँजने से पुराना फूला (Opecity) मिट जाता है । समुद्रफेन को शंखचूर्ण और सैन्धानमक के साथ बारीक पीस कर ताँवे की सलाई से आँखों में लगाने से नेत्र फूला आदि शस्त्रसाध्य व्याधियों को शस्त्र की भाँति ही काट कर साफ कर देता है । पिप्पलीचूर्ण और सैन्धानमकचूर्ण के साथ समुद्रफेन को बारीक कर मधु में मिला आँखों में अंजन करने पर पुराना नेत्रफूला कट जाता है । पोथकी (कुकरे) के लिये, समुद्रफेन एक भाग, शुद्धतूतिया ३/८ भाग, हरीतकीचूर्ण ३/८ भाग लेकर इनको जल से पीस कर वर्ति बना इसको आँखों में अंजन के रूप में लगाया जाता है । राल, सैन्धानमक, रसौत और समुद्रफेन, प्रत्येक समभाग लेकर जल से पीस गोली बना लें । इन गोलियों को जल में घिस कर आँखों में अञ्जन करने से क्लिन्नवर्त्म रोग दूर होकर पलकों में बाल उगने लगते हैं । समुद्रफेन को बारीकचूर्ण कर एक नली से कान में फूँक देने से पुराना कान का बहना शीघ्र बन्द हो जाता है । पारदगन्धक की सम- भाग कजली अथवा शुद्ध हिंगुल के साथ समभाग समुद्रफेन मिलाकर अन्तः- प्रयोग करने से कफपित्तज्वर नष्ट होता है । व्रणों को भरने के लिए मुरदासंख और समुद्रफेन को समभाग में लेकर एकत्र चूर्ण कर लें, इसको शहद में मिला कर व्रणों पर लगाना चाहिये । शुक्र धातु की शुद्धि के लिए समुद्रफेनचूर्ण को तालमखाना, सफेदचन्दन, कायफल, खस और गन्ने की जड़ के कषाय के साथ अथवा इनके चूर्णके साथ सेवन कराया जाता है ॥ ११५-१२३ ॥ अब्धिफेनस्य उत्पत्तिस्थानम् समुद्रे वर्तुलः क्षुद्रो दशहस्तसमन्वितः । मीनजातिसमुत्पन्नो जन्तुरेको विलक्षणः ॥१२४॥ भीषणाक्षः कूर्मपृष्ठः स यदा विजहात्यसून् । तत्पृष्ठास्थि विशुष्कन्तु सुनाभं दृश्यते तदा ॥१२५॥ अब्धिमध्ये तरत्येतत्तरङ्गैराहतं मुहुः । यतोऽब्धौ फेनवत्तारि त्वब्धिफेनं ततः स्मृतम् ॥१२६॥ इति शङ्खादिविज्ञानीयो नाम द्वादशस्तरङ्गः
त्रयोदशस्तरङ्गः ३०१ भा.टी.-समुद्रफेन की उत्पत्ति के विषय में यह कहा जाता है कि समुद्र में एक मछली की जाति का प्राणी होता है जो दस हाथ लम्बा, गोल शरीर, क्षुद्र प्रकृति, विलक्षण प्रकार का होता है । इसकी आँखें भयानक होती हैं और पीठ कछुए की भाँति कठिन चर्म की बनी हुई होती है । जब यह प्राणी मर जाता है तो इसके पीठ की अस्थि सूख कर झाग की तरह दिखाई देने लगती है और यह अस्थि समुद्र की तरंगों से ताड़ित होकर धीरे-धीरे समुद्र के किनारे पर तैरने लगती है जैसे समुद्र की झाग । अतः इसे समुद्रफेन नाम से कहा जाता है ॥ १२४-१२६ ॥ यह शंख-आदिविज्ञानीय नामक द्वादशतरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ क्षारत्रिकविज्ञानीयस्त्रयोदशस्तरङ्गः । अथ यवक्षारस्य नामानि यवक्षारो यवापत्यं यवजो यवशूकजः । यव्यो यवाग्रजश्चैव यवाह्वो यवनालजः ॥ १ ॥ यवशूको यावशूकः शूकजो यावशूकजः । याव्यस्तथैव पाक्यश्च समाख्यातो भिषग्वरैः ॥२॥ यवक्षारः समाख्यातो भिषग्वरैरिति तत्तद्ग्रन्थेषु एतन्नाम्ना व्यवहृतः ॥१,२॥ भा.टी.-यवक्षार, यवापत्य, यवज, यवशूकज, यव्य, यवाग्रज, यवाह्व, यवनालज, यवशूक, यावशूक, शूकज, यावशूकज, याव्य तथा पाक्य, ये सब नाम जवाखार के कहे जाते हैं ॥ १-२ ॥ यवक्षारस्य निर्माणप्रकारः यवशूकभवं भस्म समादाय भिषग्वरः । सलिलेऽष्टगुणे क्षिप्त्वा विमले भाजने ततः ॥३॥ सप्तवारं प्रयत्नेन स्रावयेत्पृथुवाससा । स्रावितं सलिलञ्चाथ चुल्ल्यां तीव्राग्निना पचेत् ॥४॥ निःशेषं सलिलं ज्ञात्वा पाकपात्रतलस्थितम् । यवक्षारं प्रयत्नेन गृह्णीयात्पाण्डुरप्रभम् ॥ ५ ॥ सप्तवारं स्रावणमत्यन्तनिर्मलतासम्पादनाय । अथवा सारकपत्रेण सकृदेव स्रावणं कर्तव्यम् ॥ ३-५ ॥ भा. टी.—जौ के पञ्चांग अथवा डंडी को जलाकर उसकी भस्म करलें ।
३०८ रसतरङ्गिणी अब इस ( राख ) को एक स्वच्छ पात्र में डालकर उसमें राख से आठ गुना जल डालकर हाथ से अच्छी तरह मसलें और एक मोटे गाढ़े कपड़े से इस पानी को छानकर पृथक् करलें । अब सात बार छाने हुए इस स्वच्छ जल को एक स्वच्छ पात्र में डालकर अग्नि में पकायें, जब पानी जल जायगा तो पात्र के तल में लगे हुए पाण्डुरप्रभं (कुछ पीला सफेद) यवक्षार को खुरचकर निकाल लें ॥३-५॥ यवक्षारस्य गुणाः यवक्षारो लघुः स्निग्धो दीपनः पाचनः परम् । गुल्मप्लीहामयहरः कफहा वातनाशनः ॥ ६ ॥ शूलानाहोदराध्मानमूत्रकृच्छ्रप्रणाशनः । कण्ठामयहरो हृद्यश्चाम्लपित्तहरः सरः ॥ ७ ॥ औपसर्गिकमेहोत्थफलशोथ निवारणः । स्वेदप्रवर्त्तकश्चैव भिषग्भिर्मूत्रलो मतः ॥८॥ अथ गुणाः-लघुः पाकतः, स्निग्धः स्नेहद्रव्यगुणयोगी । पूयमेहे जातमण्ड- शोथं विनाशयति ॥ ६-८ ॥ भा.टी.—यवक्षार शीघ्र पच जाने से लघु और स्निग्ध, दीपन और पाचन होता है । यह गुल्म प्लीहा को नष्ट करता है, कफ को पतला निकालता है और कोष्ठ में वातप्रकोप (अवरोध) को शान्त करता है । इसके अतिरिक्त उदर- शूल, अफरा, मूत्रकृच्छ्र, गले के रोग ( कण्ठशुण्डी, गलग्रन्थिशोथ आदि ) में लाभदायक, हृद्य, अम्लपित्त में पित्त को उदासीन कर उसको शांत करनेवाला और आन्त्रगतिप्रेरक ( सर ) है । सुजाकरोग के कारण अण्डकोषों में होने वाली सूजन को मिटाता है । स्वेदवाहिनियों को उत्तेजित कर अधिक पसीना लानेवाला और वृक्कों को उत्तेजित कर अधिक मूत्र लानेवाला है ॥ ६-८ ॥ यवक्षारस्य मात्रा आरभ्य रक्तिन्त्रितयाद् दशरक्तिकसंमितम् । यवक्षारं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥६॥ ३ गुञ्जातः १० गुञ्जापर्यन्तं मात्रास्य ॥ ६ ॥ भा.टी.--तीन रत्ती से लेकर दस रत्ती तक बल, काल, देश आदि को देखकर यवक्षार की मात्रा निर्धारित करनी चाहिये ॥ ६ ॥ यवक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः चूर्णितो यवजक्षारो निपीतस्तूष्णवारिणा ।
त्रयोदशस्तरङ्गः ३०६
सर्पिषा वा समाख्यातो मक्कलाभिधशूलनुत् ॥ १० ॥ जरणत्रयूषणोपेतो यवक्षारस्तु शीलितः । भोजनादौ तदन्ते च दीपनः पाचनः स्मृतः ॥ ११ ॥ रोहीतकक्षोद्युतस्त्वथवा शरपुंखया । शीलितस्तु यवक्षारो गुल्मप्लीहनिकृन्तनः ॥ १२ ॥ मरिचनागरोपेतो यवजस्तूष्णवारिणा । द्वित्रिवारप्रयोगेण वातशूलं हरेद् भृशम् ॥ १३ ॥ एलासितोपलोपेतः शीलितो यवशूकजः । मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्याशु दाहशोथादिसंयुतम् ॥ १४ ॥ गोक्षुरक्वाथसंयुक्तो यवक्षारस्तु शीलितः । शकृद्विघातजं शीघ्रं मूत्रकृच्छ्रं विनाशयेत् ॥ १५ ॥ तक्रेण तु यथाकामं यवक्षारस्तु शोलितः । अश्मरीं नाशयत्याशु मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् ॥ १६ ॥ शर्करासंयुतो यव्यः कूष्माण्डस्वरसेन वै । निपीतो नाशयत्याशु मूत्रकृच्छ्रादिकान् गदान् ॥ १७ ॥ अजमोदात्रिकटुककणोपेतो यवोद्भवः । क्षारस्तु भक्षणादाशु वातोत्थोदररोगनुत् ॥ १८ ॥ हिङ्गुत्रिकटुकोपेतः सकुष्ठश्च ससैन्धवः । बीजपूररसैः पीतः प्लीहशूलहरः परम् ॥ १९ ॥ यवक्षारस्तु निम्बूकरसेन परिशीलितः । मूत्रलः स्वेदजनकः स्मृतश्च ज्वरनाशनः ॥ २० ॥ शंखभस्मयुतो यव्यः सव्योषश्च ससैन्धवः । उष्णोदकेन सम्पीतो हन्ति शूलं त्रिदोषजम् ॥ २१ ॥ वासकस्वरसोपेतो यवशूकसमुद्भवः । क्षारस्तु शीलितोऽत्यर्थं बहुमूत्रं निवारयेत् ॥ २२ ॥ बब्बूलस्वरसेनापि तन्निर्यासेन वाशितः । यवजः स्वल्पकालेन त्वौपसर्गिकमेहनुत् ॥ २३ ॥ शिग्रुक्वाथयुतः पीतः सक्षौद्रो यवशूकजः । पार्श्वशूलं बस्तिशूलं हृच्छूलञ्चैव नाशयेत् ॥ २४ ॥ यवक्षारस्तु सततं कटुतैलेन लेपितः ।
३१० रसतरङ्गिणी कुष्ठं सिध्माभिधं हन्ति मासमात्रप्रयोगतः ॥ २५ ॥ यवजः श्वेतवर्षाभूस्वरसेन निषेवितः । उरस्तोयाख्यहृद्रोगजनितां हन्ति वै रुजम् ॥ २६ ॥ यवजो निम्बुकद्रावैस्तिलचारयुतोऽशितः । बस्तिशूलं निहन्त्याशु मूत्ररोधञ्च नाशयेत् ॥ २७ ॥ शुण्ठीगोक्षुरवरुणाक्वाथनिपीतो यवक्षारः । सगुडन्नेपं त्वचिरात्नियतं वाताश्मरीं जयति ॥ २८ ॥ कूष्माण्डस्वरसोपेतं सगुडं यवशूकजम् । शीलितं नाशयेन्मूत्राघातं शुक्राश्मरीं तथा ॥ २९ ॥ पाषाणभेदवरुणगोक्षुरक्वाथसंयुक्तम् । शीलितं यवजं हन्ति बस्तिशूलं तथाश्मरीम् ॥ ३० ॥ सारिवाक्वाथसंयुक्तो यवक्षारस्तु शीलितः । औपसर्गिकमेहोत्थां बाधमाशु विनाशयेत् ॥ ३१ ॥ दशमूलकषायेण यवक्षारः ससैन्धवः गुल्मं शूलं च हृद्रोगं कासं श्वासञ्च नाशयेत् ॥ ३२ ॥ यवक्षारस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—मक्कलशूलनाशाय सुश्रुतोक्तपिप्पल्यादिगण- क्वाथेन सह यवक्षारो बहुधा दीयत इत्यवधेयम् । जरणं जीरकम् । शीतलेन जलेन त्रिवारमेकवासरे दत्तो यवक्षारोऽण्डशोथमपि पूयमेहजं हन्ति ॥१०-३२॥ भा.टी.—मक्कलशूल (प्रसव के अनन्तर गर्भाशय में रक्त रुक जाने से उत्पन्न होनेवाले शूल को मक्कल कहते हैं) में जवाखार को केवल गरम जल से अथवा घी के साथ देने से आराम आता है । जीरा और त्रिकटुचूर्ण में मिलाकर यवक्षार को भोजन के पहिले और भोजन के अन्त में प्रयोग करने से अग्निवृद्धि और पाचन क्रिया बढ़ती है । रोहिड़ाचूर्ण अथवा सर्पोखाचूर्ण मिला- कर यवक्षार को गुल्म तथा प्लीहा रोग में देने से लाभ होता है । बस्तिशूल में यवक्षार को कालीमिर्च और सोंठचूर्ण के साथ दो-तीन बार गरम पानी से देने पर आराम आ जाता है । छोटी इलायचीबीजचूर्ण और खाँड़ के साथ यवक्षार को देने से दाह शोथ आदि लक्षणयुक्त मूत्रकृच्छ्र में आराम आता है । मल- अवरोधजन्य मूत्रकृच्छ्र में यवक्षार को गोखुरकषाय के साथ दिया जाता है । साधारणतः मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी की आशंका या प्रथमावस्था में यवक्षार को तक्र के साथ प्रयोग करने से लाभ होता है । मूत्रकृच्छ्र आदि रोगों में यवक्षार
त्रयोदशस्तरङ्गः ३११ में खाँड़ मिला पेठे के स्वरस के साथ दिया जाता है। वातप्रकोपजन्य उदररोग में यवक्षार को अजवाइन, त्रिकटु और पिप्पलीचूर्ण के साथ प्रयोग करने से शीघ्र आराम आता है। प्लीहावृद्धि शूल में यवक्षार को हिंगु और त्रिकटुचूर्ण कूठचूर्ण और सैन्धानमकचूर्ण के साथ मिलाकर बिजौरानींबू के स्वरस से सेवन कराया जाता है। यवक्षार को केवल नींबू स्वरस के साथ प्रयोग करने से मूत्र तथा पसीना अधिक आता है और ज्वर उतर जाता है। त्रिदोषप्रकोपजन्य उदरशूल में यवक्षार को शंखभस्म, त्रिकटुचूर्ण और सैन्धानमकचूर्ण में मिला कर गरम पानी के साथ देना चाहिये। बहुमूत्र (अधिक मूत्र आना) में यव- क्षार को वासास्वरस के साथ प्रयोग करने से आराम आता है। यवक्षार को कुछ दिन तक बबूल के स्वरस अथवा उसके गोंद के साथ सेवन करने से सुजाक में शीघ्र ही आराम आता है। पार्श्वशूल (पसली का दर्द), बस्तिशूल (मसाने का दर्द) तथा हृदयशूल में यवक्षार को सहिजने के कषाय और मधु के साथ सेवन किया जाता है। यवक्षार को कुछ दिन लगातार कडुवे तेल के साथ लेप करने से सिध्मकुष्ठ शान्त हो जाता है। जलयुक्त उरस्तोय (प्लूरिसी) के कारण होनेवाली हृदयपीड़ा में यवक्षार को सफेद फूलवाली पुनर्नवास्वरस के साथ सेवन करने से शीघ्र आराम आता है। यवक्षार में तिलक्षार मिलाकर नींबू के साथ सेवन करने से बस्तिशूल और मूत्ररोध (पेशाब रुकना) दूर हो जाता है। वाताश्मरी में यवक्षार को सोंठ, गोखरू, वरनाकषाय में गुड़ डाल कर इस अनुपान से सेवन कराने पर शीघ्र लाभ होता है। मूत्राघात (पेशाब रुक कर आना) तथा शुक्राश्मरी के लिए यवक्षार को पेठे के स्वरस में गुड़ मिला इस अनुपान से सेवन कराया जाता है। बस्तिशूल तथा अश्मरी के लिए यवक्षार को, पाषाणभेद, वरना तथा गोखरूकषाय के साथ प्रयोग किया जाता है। यवक्षार को सारिवा (अनन्तमूल) क्वाथ के साथ सेवन करने से सुजाक में होनेवाले कष्टों को आराम आता है। यवक्षार में सैन्धानमक मिला इसको दशमूलकषाय से सेवन करने पर गुल्म, शूल, हृदयरोग, कास तथा श्वास रोगों में आराम आता है ॥ १०-३२ ॥ अथ निम्बूकाम्लीययवजस्य नामानि निम्बूकाम्लीययवजो निम्बूकाम्लीयशूकजः । निम्ब्वम्लीययवक्षारः स एव परिकीर्तितः ॥ ३३ ॥ भा.टी.-निम्बूकाम्लीय यवज, निम्बूकाम्लीय शूकज, निम्ब्वम्लीय यवक्षार, ये सब नाम निम्बूकाम्ल तथा जवाखार के योग से बनाये गये खार के हैं॥३३॥
३१२ रसतरङ्गिणी अस्य निर्माणप्रकारः काचपात्रे यवक्षारं चतुर्विंशतिभागिकम् । द्रावयेच्छीतसलिले रसज्ञः समभागिके ॥ ३४ ॥ निम्बूकाम्लं सुविमलं त्वथ विंशतिभागिकम् । द्रावयेदन्यपात्रस्थं जले तु समभागिके ॥ ३५ ॥ पात्रे काचादिलिप्ते तु मेलयेदनयोर्द्रवम् । चुल्ल्यां निधायाथ पचेत्तोयांशं परिशोषयेत् ॥ ३६ ॥ घनसारप्रभं चूर्णं रसविज्ञः समाहरेत् । विबुधैः कीर्तितोऽयं तु निम्बूकाम्लीयशूकजः ॥ ३७ ॥ अथ निम्बूकाम्लीययवजो नवीनपरिभाषितो बहुलगुणश्च—निर्माणप्रकारो व्याख्यातप्रायः । निम्बूकाम्लं प्रागुक्तम् । काचादिलिप्त इति आदिशब्दाद्वङ्गादिलिप्ते पित्तल- पात्रेऽपीति ज्ञेयम् । घनसारप्रभं अत्यच्छत्वात् कर्पूरकान्ति ॥ ३४-३७ ॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में चौबीस भाग जवाखार डाल कर उसमें समभाग ठंडा जल मिलाकर घोल लें । अब एक दूसरे काँच पात्र में बीस भाग निम्बूकाम्ल ( Citric acid ) डाल उसको समभाग जल में घोल लें । अब इन दोनों घोलों ( द्रव ) की एक काँच के कलई किये हुए पात्र में मिला दें और चूल्हे पर रख कर अग्निताप से जलीय भाग को उड़ा दें । जलीयांश उड़ने पर पात्रतल में कपूर के सदृश वर्ण का चूर्ण रह जायेगा इसी चूर्ण को विद्वान् लोग निम्बूकाम्लीयशूकज कहते हैं ॥ ३४-३७ ॥ अस्य गुणाः निम्बूकाम्लीययवजो मूत्रलः श्लेष्मभेदनः । ज्वरघ्नः स्वेदजनको जलोदरहरः परम् ॥ ३८ ॥ वृक्कशोथप्रशमनो विशेषाद् वृक्कशूलनुत् । मूत्ररोधहरः कामं तथा श्लैष्मिककासनुत् ॥ ३६ ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्लीय यवज, मूत्र अधिक लानेवाला, कफ को पतला कर निकालनेवाला, ज्वरनाशक, स्वेदजनक, जलोदर-रोगहर है । यह वृक्कों में होनेवाली सूजन को विशेषतः वृक्कशूल को शान्त करता है और मूत्र के अव- रोध तथा कफकास को दूर करता है ॥ ३८-३६ ॥
त्रयोदशस्तरङ्गः ३१३ निम्बूकाम्लीययवजस्य मात्रा आरभ्य पञ्चगुञ्जातो दशगुञ्जोन्मितं परम् । निम्बूकाम्लीययवजं प्राणाचार्यैः प्रयोजयेत् ॥ ४० ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्लीय यवज की मात्रा पाँच रत्ती से लेकर दस रत्ती तक प्रयुक्त की जाती है ॥ ४० ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः तत्तद्रोगविशेषेषु सलिलाद्यनुपानतः । निम्बूकाम्लीययवजं योजयेन्मात्रया भिषक् ॥ ४१ ॥ अस्य गुणाः—विशेषाद् वृक्करोगापनयनक्षमः । मात्रा १० गुञ्जापर्यन्तम् । अयं सलिले सन्द्राव्य प्रायशः प्रयुज्यते ॥ ४१ ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्लीय यवक्षार को भिन्न-भिन्न रोगों में जल आदि द्रवों के अनुपान से आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाता है ॥ ४१ ॥ अथ सर्जिक्षारस्य नामानि स्वर्जिकः स्वर्जिका स्वर्जिः स्वर्जः स्वर्जी सुवर्चिका । स्वर्जका स्वर्जिकाक्षारः सर्जिः सर्जी च सर्जिका ॥ ४२ ॥ सुवर्चकः सुवर्चिश्च सुवर्चोऽथ सुवर्चिकः । सुखोर्जिकः कपोतश्च सुखवर्चः सुखार्जिकः ॥ ४३ ॥ रुचकं स्वर्जिकाक्षारः सर्जिक्षारस्तथैव च । सौवर्चलं सुवर्चों च समाख्यातो भिषग्वरैः ॥ ४४ ॥ सर्जिक्षारनामानि तानि-तानि तन्त्रेषु व्यवहृतानि ॥ ४२-४४ ॥ भा.टी.—स्वर्जिक, स्वर्जिका, स्वर्जि, स्वर्जा, सुवर्चिका, स्वर्जका, स्वर्जि- काक्षार, सर्जि, सर्जी, सर्जिका, सुवर्चक, सुवर्चि, सुवर्च, सुवर्चिक, सुखोर्जिक, कपोत, सुखवर्च, सुखार्जिक, रुचक, स्वर्जिकाक्षार, सर्जिक्षार, सौवर्चल, सुवर्चि, ये सब नाम सज्जीखार के कहे जाते हैं ॥ ४२-४४ ॥ सर्जिक्षारस्य निर्माणप्रकारः उष्ट्रप्रियाक्षुपं दग्ध्वा यत्नात् क्षारं समाहरेत् । तोयेऽष्टगुणिते क्षिप्त्वा भाजने विमले ततः ॥ ४५ ॥ सप्तकृत्वः प्रयत्नेन स्रावयेत्पृथुवाससा । स्रावितं सलिलञ्चाथ पचेद् गाढं भिषग्वरः ॥ ४६ ॥
३१४ रसतरङ्गिणी निःशेषे सलिले तत्र स्थालिकातलसंस्थितम् । हिमकुन्देन्दुसङ्काशं सर्जिक्षारं समाहरेत् ॥ ४७ ॥ उष्ट्रप्रिया क्षुद्रदुरालभा, सा हि मरुप्रदेशे विशेषेण जायते । पञ्चनददेशे “लाना” इति नाम्ना प्रसिद्धा । “अन्या क्षुद्रदुरालम्भा मरुस्था मरुसम्भवा । विशारदाजभक्षा स्यादजादन्युष्ट्रभक्षिका ।” इति राजनिघण्टुः ॥ ४५–४७ ॥ भा.टी.—उष्ट्रप्रिया (छोटी दुरालभा) पञ्चांग को लेकर धूप में सुखाकर इसकी सफेद (राख) बना लें । एक स्वच्छ बड़े पात्र में इस राख को डाल कर उसमें राख से आठ गुना जल डाल कर अच्छी तरह मसलें और एक मोटे गाढ़े वस्त्र से इसको सात बार छान लें । अब छने हुए जल को एक साफ कढ़ाई में डाल कर जल भाग उड़ने तक पकायें । जलीयांश उड़ने पर पात्र के तल में स्वच्छ तथा सफेदवर्ण का सज्जीखार रह जायगा । इससे खुरच कर निकाल लें ॥ ४५–४७ ॥ सर्जिक्षारस्य गुणाः सर्जिक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णः कटुरुष्णश्च पाचनः । समीरणहरः कामं कासश्वासनिवारणः ॥ ४८ ॥ अग्निदीप्तिकरश्चैव गुल्माध्मानविनाशनः । व्रणोदरामयहरः कृमिघ्नश्च प्रकीर्तितः ॥ ४९ ॥ भा.टी.—सज्जीखार तीक्ष्ण, कटु, उष्ण, पाचन, वायुप्रकोप (आध्मानादि) नाशक तथा श्वास-कास-शामक है । इसके प्रयोग से क्षुधा बढ़ने लगती है, गुल्म तथा आध्मान रोग नष्ट होते हैं । बाह्य प्रयोग में व्रणों के लिये लाभ- दायक होता है और उदर रोग तथा कृमिनाशक होता है ॥ ४८–४९ ॥ सर्जिक्षारस्य मात्रा आरभ्य रक्तित्रितयाद् रविरक्तिकसंमितम् । सर्जिक्षारं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५० ॥ मात्रास्य द्वादशगुञ्जापर्य्यन्तम् ॥ ५० ॥ भा.टी.—सज्ज़ीखार को तीन रत्ती से लेकर बारह रत्ती तक की मात्रा में रोगी और रोग का बल, देश, काल आदि देख कर प्रयुक्त किया जा सकता है ॥ ५० ॥ सर्जिक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः कणोजरणचूर्णेन सज्जिका परिशीलिता । रक्तित्रयमितात्यर्थं दीपनी पाचनी मता ॥ ५१ ॥