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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

चतुर्थस्तरङ्गः ११५ द्वितीयों निर्माणप्रकारः भागैकं विमलं सिक्थं तैलन्तु शरभागिकम् । पूर्वोद्दिष्टविधानेन पचेद्रसविशारदः ॥ ६२ ॥ जायते नवनीताभं यामं दर्व्या प्रचालितम् । रसज्ञैः कीर्तितमिदं सिक्थतैलं द्वितीयकम् ॥ ६३ ॥ द्वितीयः प्रकारः—सिक्थस्यैको भागः, तिलतैलस्य पञ्च ॥ ६२–६३ ॥ भा. टी.—एक भाग मोम और पाँच भाग तिलतैल लेकर दोनों को कड़ाही में पिघलाकर करछी से चलाते हुए मक्खन के सदृश गाढ़ा कर लें। यह दूसरे प्रकार का सिक्थतैल कहा जाता है ॥ ६२–६३ ॥ अनयोः प्रयोगः आद्यं तु शीतसमये ग्रीष्मर्तौ तु द्वितीयकम् । सिक्थतैलं मलहरप्रयोगेषु नियोजयेत् ॥ ६४ ॥ अत्राद्यं शीतर्तौ योज्यम् । द्वितीयं च ग्रीष्मर्तौ ॥ ६४ ॥ भा. टी.—पहिले ६ भाग तिलतैलवाले सिक्थतैल को शीत ऋतु में बनाये जानेवाले मरहमों में और दूसरे पाँच भाग तिलतैलवाले सिक्थतैल को ग्रीष्म ऋतु में बनाये जानेवाले मरहमों के काम में लाना चाहिए ॥ ६४ ॥ वक्तव्य—एलोपैथी में मरहमों को बनाने के लिये वैसलीन या वैजलीन काम आती है। आयुर्वेद में इनके स्थान पर सिक्थतैल उपयोग में लाये जाते हैं। अथ रसकर्पूरस्य निर्माणप्रकारः [ गीतिका ] पलसंमितं प्रयत्नाद् विमलीकृतं रसेशम् । सपलार्द्धकं पलैकं विमलं च गन्धकाम्लम् ॥ ६५ ॥ चषकोपमे विशुद्धं निदधीत काचपात्रे । विनिधाय काचपात्रं त्वयसस्त्रिपादिकायाम् ॥ ६६ ॥ ज्वलिते सुराप्रदीपे संशोषयेज्जलांशम् । अथ शोषिते तु चूर्णं त्ववतार्य वै प्रदीपात् ॥ ६७ ॥ समभागिकं च दद्याल्लवणं तु सैन्धवाख्यम् । परिमेल्य चूर्णमेतन्निदधीत काचकुप्याम् ॥ ६८ ॥ युगसङ्ख्यकैस्तु यामैः सिकताख्ययन्त्रसंस्थम् । विपचेदतिप्रयत्नात् रसतन्त्रकर्मविज्ञः ॥ ६९ ॥

११६ रसतरङ्गिणी अवबुध्य काचकूपीं स्वत एव शीतलाङ्गीम् । घनसारनामधेयं रसमाहरेद्रसज्ञः ॥ ७० ॥ अथ रहस्यम् जलीयबाष्पे निर्याते पिधानेन पिधापयेत् । कूपीकण्ठस्थितां स्वल्पां सिकताञ्चापसारयेत् ॥ ७१ ॥ अथ रसकर्पूरस्य निर्माणप्रकारः—पारदं पलमात्रम्, सार्द्धपलञ्च निर्मलं गन्धकाम्लं बलिद्रावम्, शुद्धकाचपात्रस्थं सुराप्रदीपे लोहत्रिपादिकायां संस्थाप्य बलिद्रावजलांशं शोषयेत् । चूर्णरूपे सति पारदे तत्समं सैन्धवलवणं प्रक्षिप्य खल्वे मर्दयेत् । वालुकायन्त्रे चतुर्यामं मन्दाग्निना पाकः । घनसारनामधेयो रस इति रसकर्पूरः। अत्र च काचकूप्यामौषधं निधाय पाककालेऽग्नियोगेन लवणस्य जलीयबाष्पनिर्गमनपर्य्यन्तं कूपीमुखरोधो न कार्य्यः, प्रथमत एव मुखरोधे जलानि- र्गमेन रसकर्पूरनिर्माणमेव न स्यात् सम्यक् । कूपीकण्ठस्थसिकतापसारणं रस- कर्पूररक्षार्थम् । अत्रेदमवधेयं यत् भावप्रकाशाद्युक्तरसकर्पूरनिर्माणविधिना रसपुष्पमिश्रितस्यैव रसकर्पूरस्योपलब्धिर्न तु शुद्धस्य, तेन प्रयोगवशात्कोपः, अतः रसपुष्पोपादानरहितं शुद्धं रसकर्पूरं निर्मातुमयं नवीन एव श्रमः ॥ ६५-७१ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया पारद एक पल और डेढ़ पल परिमाण शुद्ध गन्धकाम्ल ( Sulphuric acid ) लेकर दोनों को एक प्याले के सदृश साफ काँच के पात्र में डाल दें । अब इस कांच पात्र को एक लोहे की त्रिपा- दिका रखकर इसके नीचे सुराप्रदीप ( Spirit lamp ) जलाकर गन्धकाम्ल का जलीय भाग सुखा लें । जब प्याले में चूर्ण रह जाय तो इसे उतार कर इसमें समभाग सैन्धा नमक का सूक्ष्म चूर्ण मिलाकर एक कपड़मिट्टी की हुई कांच की शीशी ( बोतल ) में भरकर इसको बालुकायन्त्र में रखकर चार पहर की अग्नि देकर सावधानी से पकावें । चार पहर बाद स्वतःशीत होने पर शीशी के भीतर से रसकर्पूर को निकाल लें ॥ ६५–७० ॥ इस कर्पूर के निर्माणकाल में जब अग्नि ताप से शीशी के मुख से जलीय बाष्प निकल चुके तो डाट लगाना चाहिये । साथ ही डाट लगाते समय शीशी के गले के आस-पास की वालुका को भी हटा देना चाहिये जिससे शीतलता पाकर रसकर्पूर वहाँ पर संचित हो सके ॥ ७१ ॥ वक्तव्य—इस रसकर्पूर को बनाने पर सब द्रव्यों को काचकूपी में भर कर

षष्ठस्तरङ्गः ११७ वालुकायन्त्र पकाने पर जब जलीय बाष्प निकल जाय तब कूपी में डाट देना चाहिये, पहिले ही डाट देने से कर्पूर नहीं बनेगा। इस प्रकार से बना हुआ रसकर्पूर रसपुष्प के दाहक तत्त्वों से रहित होता है। अतः इस विधि से बने हुए रसकर्पूर को अन्तःप्रयोग के काम लाना चाहिये। रसकर्पूरस्य गुणाः रसकर्पूरकः ख्यातो बहुभूतविषापहः । त्वग्रक्तदोषशमनो ग्राही रुचिविवर्द्धनः ॥ ७२ ॥ अतीसारप्रशमनो विशेषात्कृमिनाशनः । प्रवाहिकाहरः कामं मात्राधिक्ये विषक्रियः ॥ ७३ ॥ स्फोटं कण्डूमपि च चिरजां मण्डलादींश्च कुष्ठान् । सर्वोत्थं वा सहजमपि वा स्पर्शजं वा फिरङ्गम् । शीघ्रं नानाव्रणगणभवां हन्ति पीडां महोग्राम् कर्पूराख्यो जठरदहनोद्दीपनोऽयं रसेशः ॥ ७४ ॥ शीतले षोडशगुणे सलिले विनिपातितः । सर्वथा द्रवतां याति रसः कर्पूरकाभिधः ॥ ७५ ॥ रसकर्पूरस्य गुणाः—अयं सङ्क्रामकजीवाणुविषनाशनः प्रवाहिकाहर इति कफरक्तमिश्रितां प्रवाहिकां हरति । मात्राधिक्ये विषक्रियः मारक इत्यर्थः । अस्य विशेषगुणाः—सर्वोत्थं सन्निपातिकम्, सहजं जन्मना जातम् । जठरदह- नोद्दीपन इति जाठराग्निप्रदीपनः । स्पष्टमन्यत् ॥ ७२–७४ ॥ अयञ्च स्वापेक्षया षोडशगुणे शीतले जले निपातितः सर्वथा द्रवतां याति । एवञ्च जलपरिमाणं न्यूनान्नूनं ज्ञेयम् , अतोऽपि जलन्यूनतायान्तु न सम्यग् द्रावः स्यादौषधस्येति ॥ ७५ ॥ भा. टी.—उक्त रसकर्पूर अनेक प्रकार के कृमिविष को नष्ट करता है। त्वचा तथा रक्त के दोष को शान्त करता है। शरीर व्रणों में से होनेवाले स्रावों को बन्द करने के कारण यह ग्राही कहलाता है। इसके प्रयोग से अन्न में रुचि होती है। यह अतीसार को शान्त करता है और कृमिनाशक है। कफ-रक्त-मिश्रित प्रवाहिका में हितकर होता है। किन्तु अधिक मात्रा में दिये जाने पर शरीर में पारदविष के लक्षण उत्पन्न कर देता है। इसके अतिरिक्त यह स्फोट (फोड़े), पुरानी खुजली, मण्डल आदि कुष्ठ रोग, सन्निपातिक तथा सहज और स्पर्श-जन्य सभी प्रकार के फिरंग-रोग को नष्ट करता है। अनेक-

विध व्रणों में होनेवाली भयंकर पीड़ा को शान्त करता है । और अल्प मात्रा में दिये जाने पर उक्त रोगों को नष्ट करने के साथ-साथ पाचकाग्नि को भी तीव्र कर देता है । यदि इस रसकर्पूर को इससे सोलहगुणा शीतल जल में डाला जाय तो यह उसमें अच्छी तरह घुल जाता है ॥ ७२-७५ ॥ रसकर्पूरस्य मात्रानिरूपणम् आरभ्य रक्तिकायास्तु चतुःषष्ट्यंशतो भिषक् । द्वात्रिंशद्भागपर्यन्तं मात्रामस्य प्रयोजयेत् ॥ ७६ ॥ अथास्य मात्रानिरूपणम्-रक्तिकायाः चतुःषष्ट्यंशत (१/६४) आरभ्य द्वात्रिं- शद्भागपर्यन्तं (१/३२), अस्य मात्रा बलाबलं विज्ञाय दातव्येति ॥ ७६ ॥ भा. टी.—इस रसकर्पूर की मात्रा रत्ती के ६४ चौंसठवें भाग से लेकर बत्तीसवें भाग तक प्रयोग की जाती है ॥ ७६ ॥ रसकर्पूरस्य आभ्यन्तरप्रयोगार्थं मात्रानिर्माणप्रकारः चूल्लिकावणं शुद्धं गुञ्जापञ्चकसंमितम् । समञ्च रसकर्पूरं षष्टितोलकसंमिते ॥ ७७ ॥ जले विनिक्षिपेत्प्राज्ञो मात्रामस्य प्रकल्पयेत् । बिन्दुत्रिंशकतश्चादौ षष्टिबिन्दुमितां पराम् ॥ ७८ ॥ अथास्याभ्यन्तरप्रयोगोपयोगिमात्रानिर्माणप्रकारः—शुद्धं चूल्लिकावणं नवसादरं ५ गुञ्जामितम्, रसकर्पूरञ्च ५ गुञ्जामितम्, षष्टितोलकमिते जले विनिक्षिप्य ३० बिन्दुषतः ६२ बिन्दुपर्यन्तं मात्रां जानीयात् ॥ ७७-७८ ॥ भा.टी.--शुद्ध नौसादर पाँच रत्ती, और रसकर्पूर पाँच रत्ती, इन दोनों को एकत्र पीसकर साठ तोले शीतल जल में घोलकर रख लें । अब इसमें से तीस बूँद से लेकर साठ बूँद तक की मात्रा में प्रयोग करें ॥ ७७-७८ ॥ अस्य आभ्यन्तरप्रयोगार्थं चूर्णरूपेण मात्रानिर्माणप्रकारः श्लक्ष्णं दारुसिताचूर्णं पञ्चमाषकसंमितम् । गुञ्जैकं रसकर्पूरं क्षिपेन्निम्बूव्लमर्दितम् ॥ ७९ ॥ रक्तिकैकमितं चूर्णं मात्रायां विनियोजयेत् । रक्तिकैकमिता पूर्णमात्रास्य परिकीर्तिता ॥ ८० ॥ अथ चूर्णरूपेण मात्रानिर्माणप्रकारः--श्लक्ष्णं मसृणम्, दारुसिता त्वक् ॥ ७६-८० ॥ भा. टी.--पाँच मासे दालचीनीचूर्ण में एक रत्ती रसकपूर (नींबूरस

षष्ठस्तरङ्गः १११९ में मर्दित ) को अच्छी तरह घोटकर मिला लें । अब इस मिश्रित चूर्ण में से एक एक रत्ती की मात्रा बनाकर प्रयोग करें । इस चूर्ण की पूर्ण मात्रा एक रत्ती समझनी चाहिये ॥ ७६-८० ॥ वक्तव्य—यदि रसकर्पूर में निम्बूकाम्ल (Citric acid) मिला दिया जाय तो यह खराब नहीं होने पाता है और न यह अपनी पूर्वावस्था में ही आता है । क्योंकि रसकर्पूर यदि किसी धातु के पात्र में रखा जाय तो उसमें पारा चिपक जाता है। अतः योगों को बनाने के लिये समझदार वैद्य को चाहिये कि इसे सदा कांच की शीशी या पात्र में रखे । रसकर्पूरस्य आमयिकः प्रयोगः रसः कर्पूरसंज्ञोऽयं मात्रया परिशीलितः । प्राभातिकीं भुक्तमात्रोत्थिताञ्चातिस्रुतिं हरेत् ॥ ८१ ॥ कर्पूराख्यो रसो युक्तः सदाहं चिरकालजम् । द्रवपीतमलोपेतमतीसारं विनाशयेत् ॥ ८२ ॥ शीलितो रसकर्पूरो मात्रया सुचिरोत्थिताम् । सरक्तां सकफाञ्चैव विनिहन्ति प्रवाहिकाम् ॥ ८३ ॥ अथ रसकर्पूरस्य रोगेषु प्रयोगः—प्राभातिकीं प्रातःकाले समुत्पन्नां अति- स्रुतिं अतिसारम् । अपि च मिश्रितकफरक्तामेव प्रवाहिकां हन्ति, नतु विभक्तक- फरक्तामित्यवधेयम् ॥ ८१-८३ ॥ भा.टी. -शुद्धरसकर्पूर को यदि मात्रापूर्वक सेवन किया जाय तो इसमें प्रातःकाल में होनेवाले तथा भोजनोत्तर होनेवाले दस्त बन्द हो जाते हैं । इसको सेवन करने से पुरातन, दाह युक्त तथा पतले पीले दस्तों का अतीसार नष्ट हो जाता है । रसकर्पूर को मात्रापूर्वक सेवन करने से कफ-रक्त मिश्रित मलयुक्त प्रवाहिका शान्त हो जाती है ॥ ८१-८३ ॥ रसकर्पूरगुटिका कुंकुमं मरिचं रक्तचन्दनं च लवङ्गकम् । जातिपत्री पृथक् सर्वं माषकप्रमितं हरेत् ॥ ८४ ॥ विशुद्धं रसकर्पूरं रक्तिकैकमितं क्षिपेत् । संमर्च निम्बुनीरेण कुर्यात् गुञ्जोन्मितां वटीम् ॥ ८५ ॥ रसकर्पूरगुटिका नामतः परिकीर्तिता । शीलिता नवनीतेन फिरङ्गं हन्त्यसंशयम् ॥ ८६ ॥

१२० रस्तरङ्गिणी अथ रसकर्पूरगुटिका—कुंकुमं काश्मीरम् । कुंकुमादिपञ्चद्रव्याणामेको माषकः प्रत्येकम्, रसकर्पूरस्यैका गुञ्जा । निम्बूनीरेण सम्मर्च्य कृता रक्तिमिता बटी नवनीतमध्ये निधाय भक्षिता फिरङ्गरोगशमनी । रसकर्पूरगुटिका नामतः ॥ भा.टी.—काश्मीरी केशर, कालीमिर्च, लालचन्दन, लौंग, जावित्री, इनको पृथक् एक-एक मासे लेकर इसमें एक रत्ती रसकर्पूर मिलाकर सबको एकत्र निम्बूरस से मर्दन करके एक-एक रत्ती की गोली बना लें । इसको रस- कर्पूर वटी कहते हैं । इस वटी को नवनीत ( मक्खन ) के साथ सेवन करने से फिरङ्ग रोग नष्ट हो जाता है ॥ ८४–८६ ॥ बाह्यप्रयोगार्थं भूतघ्नचक्रिका रसं कर्पूरनामानं गुणपर्वतभागिकम् । निम्बूकाम्लञ्च विशदं वसुपावकसंमितम् ॥ ८७ ॥ समाधाय विधानज्ञो मेलयेदतियत्नतः । चक्रिकाः कारयेद्वैद्यो गुञ्जाषट्कमिताः पृथक् ॥ ८८ ॥ रसज्ञैस्तु समाख्याता नाम्ना भूतघ्नचक्रिका । न जातु विकृतिं याति भूतसंघविषापहा ॥ ८६ ॥ भूतघ्नचक्रिकायां रसकर्पूरस्य त्रिसप्तति ( ७३ ) भागाः । गुणास्त्रयः, सत्त्वरजस्तमांसीति । पर्वताश्च सप्त 'सप्तैते कुलपर्वताः' इत्युक्तेः । तथा च “अङ्कानां वामतो गतिः” इति न्यायात् सप्तांकोत्तरं त्रिकाङ्कलाभात् त्रिसप्ततिरिति (७३) प्राचां परिभाषा । एवमग्रेऽपि ज्ञेयम् । विशदं निर्मलम् । निम्बूकाम्लं वक्ष्यमाणप्रकारम्, वसुपावकसंमितं अष्टत्रिंशद् ( ३८ ) भागमितम् । उभयं समादाय अतियत्नेन सावधानतया सम्यङ् मिश्रयित्वा वर्तुलचिपेटाः चक्राकाराः चक्रिकाः कार्याः । केवलं रसकर्पूर एव जले द्रावितो विश्लिष्टपारदो बहुदिनानि स्थातुमयोग्यश्च स्यादतो निम्बूकाम्लमेलनमत्र योग्यम् ॥ ८७–८६ ॥ शुद्ध रसकपूर तिहत्तर ७३ भाग निम्बूकाम्ल अड़तीस भाग देकर दोनों को एकत्र मिलाकर पीस लें और इसकी छः रत्ती की चक्रिका ( टिकिया Tablets ) बना लें । इन टिकियाओं को क्रिमिघ्नचक्रिका कहा जाता है । यह कभी भी खराब नहीं होने पाती है और अनेक प्रकार के कृमि दोषों को नष्ट करती है ॥ ८७–८६ ॥ वक्तव्य—रसकर्पूर में निम्बूकाम्ल मिला कर रखने का अभिप्राय स्पष्ट है कि चिरकाल तक रखने पर भी रसकपूर खराब नहीं होता है। यदि केवल

षष्ठस्तरङ्गः १२१ रसकपूरत को जल में घोलकर रखा जाय तो वह कुछ दिनों में जल तथा पारद के रूप में पृथक् हो जाता है जिससे उसमें कृमिनाशक शक्ति पूर्णरूप से नहीं रहती है । प्रसङ्गान्निम्बूकाम्लस्य निर्माणप्रकारः निम्बूकलुङ्गकादीनां निर्मलं रसमाहरेत् । काचलिप्ते तु मृत्पात्रे हसन्त्यां क्वाथयेद्भिषक् ॥६०॥ क्वथितञ्च समालोक्य मृत्पात्रमवतारयेत् । कठिनीचूर्णकं दद्यात् यावद्बाष्पोद्गमो भवेत् ॥६१॥ अनन्तरं गन्धकाम्लं क्षिपेत्तावच्छनैः शनैः । चूर्णं कुन्देन्दुसङ्काशं यावद्याति तलस्थताम् ॥६२॥ तलस्थं तं सुविज्ञाय सारयेत्पृथुवाससा । अवशिष्टञ्च वसने पदार्थं सन्त्यजेत् बुधः ॥६३॥ पानीयं सारितं काचपात्रे संस्थाप्य शोषयेत् । जायते शशिसङ्काशं चूर्णं पात्रतलस्थितम् ॥६४॥ अयमेव भिषग्वर्यैर्निम्बूकाम्ल इति स्मृतिः । स्वजातिप्रभवा ह्यस्य गुणाः सर्वे भवन्ति हि ॥६५॥ निम्बूकाम्लनिर्माणे—आदिपदेन तज्जातीनां जम्बीरबीजपूरप्रभृतीनां ग्रहणम् । एषां रसं सारकपत्रगालितम्, काचलिप्तमृत्पात्रग्रहणं रसनैमल्यरक्षार्थम् । हसन्त्यां अङ्गारधानिकायाम् । यत्किञ्चिन्मलापसारणपर्यन्तं क्वाथः तलस्थं सुधा- गन्धकं भवति । उपरिस्थं निर्मलं जलं घनवस्त्रेण सारयेत्, वस्त्रावशिष्टं त्यजेत् पृथक्कुर्यादिति । तच्च सारितं जलं काचपात्रस्थमग्नौ पुनः शोषयेत् । तच्छुष्कं निम्बूकाम्लं भवति, स चायं स्वजातिगुणः निम्बुजम्बीरादिकारणगुण इत्यर्थः ॥ ६०-६५ ॥ भा.टी.—कागजी या बिजौरा नीम्बू का रस निचोड़कर उसे छानकर साफ कर लें। अब इस रस को एक मिट्टी के पात्र में (जिसमें भीतर काँच का मसाला लगाया गया हो) डालकर अँगाठी में रखकर मैल निकालने के लिये पकायें। जब रस साफ हो जाय तो उसे नीचे उतारकर उसमें उसी समय बाष्प निकलने तक थोड़ा-थोड़ा करके खरिया मिट्टी का चूर्ण छोड़ते जायँ। जब बाष्प निकलना बन्द हो जाय तब उसमें थोड़ा-थोड़ा करके गन्धकाम्ल डालें जब तक कि श्वेत वर्ण का चूर्ण तलस्थ न हो जाय। जब तलस्थ होना बंद हो जाय तो इसे एक मोटे कपड़े से छान लें और कपड़े में बचे हुए पदार्थ को फेंक दें। फिर छाने

१२२ रस्तरङ्गिण्यां हुए जल को एक काँच के पात्र में रखकर सुराप्रदीप की अग्नि से तपायें। जब तृतीय भाग शुष्क होकर नीचे पात्रतल में श्वेत वर्ण का चूर्ण रह जाय तो इसे उतार कर रख लें। इसी को वैद्य लोग निम्बूकाम्ल नाम से कहते हैं। इसमें अपनी जाति अर्थात् निम्बू, बिजौरा नींबू, कागजी नींबू आदि के अपने- अपने सब गुण रहते हैं ॥ ६०-६५ ॥ रसकर्पूरद्रवस्य निर्माणप्रकारः भूतघ्नचक्रिकामेकां शततोलकसंमिते । जले क्षिपेद् विद्रुतायां द्रवं तु विनियोजयेत् ॥ ६६ ॥ रसकर्पूरमानात्तु द्विसहस्रगुणाम्भसा । द्रवोऽयमेवं निर्दिष्टो यथा योगं प्रयोजयेत् ॥ ६७ ॥ अथ रसकर्पूरद्रवनिर्माणप्रकारः-१०० तोलकमित निर्मले जले भूतघ्नचक्रि- कामेकां द्रावयेत् । अत्रच गणनया रसकर्पूरमानाज्जलं द्विसहस्रगुणम् । रस- कर्पूरद्रवनिर्माणे काचपात्रस्यैव प्रयोगः ॥ ६६-६७ ॥ भा.टो.—पूर्वोक्त भूतघ्न चक्रिका को पीसकर एक सौ तोले शुद्ध जल में डालकर घोल लें । और इस जल को प्रयोग में लायें । इस प्रकार के रसकर्पूर द्रव में रसकर्पूर का भाग १, और जल दो हजार गुना अधिक होता है॥६६-६७॥ प्रकारान्तरेण रसकर्पूरद्रवस्य निर्माणप्रकारः द्वात्रिंशद्गुञ्जकमितं रसं कर्पूरसंज्ञकम् । सार्द्धद्वितोलकमिते सारे कोहलपूर्वके ॥ ६८ ॥ द्रावयेद्रसतन्त्रज्ञः कुप्यांमथ निधापयेत् । द्रवस्यास्य समादाय त्वष्टमांशमितं द्रवम् ॥ ६६ ॥ मेलयेत्सलिले शुद्धे शततोलकसंमिते । द्रवोऽयमपि संवृत्तो द्विसहस्रगुणाम्भसा ॥ १०० ॥ अथ प्रकारान्तरम्--रसकर्पूरस्य द्वात्रिंशद्गुञ्जाः, कोहलो यवकृता सुरा “अलकोहल” इति आङ्ग्लभाषायाम् , तस्य सारः जलांशोज्झितं भागं सार्धद्वि- तोलकमानेनादाय द्रावो विधेयः, अस्याष्टमोंऽशः शततोलकमिते जले क्षेप्यः । एवञ्च द्रवोऽयमपि रसकर्पूरापेक्षया द्विसहस्रगुणजलं जातः । आंग्लमानेन-- रसकर्पूरं १ ड्राम परिमितं १ औन्सपरिमित कोहलसारे सन्द्राव्यास्य द्रवस्य षष्ठिबिन्दून् (१ ड्रामम्) २ पाइण्टपरिमित (सपादसेरकमित) जलं विनिक्षिपेत् । एवञ्चास्मिन् रसकर्पूरद्रवे रसकर्पूरमानाद् द्विसहस्रगुणं जलं भवति ॥९८-१००॥

षष्ठस्तरङ्गः १२३ भा.टी.—रसकर्पूर ३२ बत्तीस तोले को ढाई तोला मद्यसार (अलकोहल) में डालकर घोल लें और इस घोल को जब प्रयोग में लाना हो तब इस घोल में से अष्टमांश घोल लेकर सौ तोले शुद्ध जल में मिला लें और काम में लायें । इस प्रकार से बनाये हुए द्रव में भी रसकर्पूर की अपेक्षा जल दो हजार गुणा अधिक होता है ॥ ९८-१०० ॥ वक्तव्य—उक्तरसकर्पूर द्रव आवश्यकतानुसार अनेक शक्ति के प्रयोग में लाये जाते हैं । अर्थात् कहीं पर एक प्रतिशत और कहीं हजार में एक भाग और कहीं दो हजार में एक और कहीं इससे कम भाग का कर्पूर द्रव बना- कर काम आता है । रसकर्पूरद्रवस्य गुणाः फिरङ्गस्फोटविषहृत् सपूयव्रणशोधनः । हस्तपादस्मरागारगेहादिगतभूतनुत् ॥ १०१ ॥ संक्रामकगदोत्थानभूतघ्नस्तु विशेषतः । रसज्ञैस्तु समाख्यातो रसकर्पूरजो द्रवः ॥ १०२ ॥ अथ रसकर्पूरद्रवस्य गुणाः—अयं प्रक्षालनद्वारा फिरंगस्फोटविषं हरति पूययुक्तान् व्रणान् शोधयति च । तथा हस्तपादयोनिस्थानगृहभित्त्यादिगत- जीवाणुनाशकश्च । विशेषतश्च संक्रामकरोगनिदानजीवाणुहन्ता रसायनज्ञै- रुदाहृतः ॥ १०१-१०२ ॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से बनाया हुआ रसकर्पूर द्रव बाह्यप्रयोग में फिरंग व्रण के विष को नष्ट करता है और पूययुक्त व्रणों को शुद्ध करता है अथवा इनको धोने के काम आता है । हाथ, पैर, गुप्तेन्द्रिय, तथा गुदा आदि स्थानों में पाये जानेवाले या संक्रामक विषैले जीवाणुओं को नष्ट करता है। इसी तरह संक्रामक रोगजन्य विष को नष्ट करने में इस द्रव को विशेष रूप से काम में लाया जाता है ॥ १०१-१०२ ॥ वक्तव्य—संक्रामक-रोगपीड़ित रोगी के वस्त्रों को धोने या उसके थूक मूत्र तथा मल के पात्रों को धोने और परिचारक को अपने हाथों को धोने के लिये अथवा नेत्र आदि कोमलांगों के विषव्रणों को धोने के लिये उक्त रसकर्पूर द्रव जल बहुधा काम में आता है । परन्तु आवश्यकतानुसार इसको हलका अथवा तेज शक्ति का बनाया जाता है ।

१२४ रसतरङ्गिणी रसकर्पूरद्रवस्य प्रयोगः फिरङ्गजानां स्फोटानां व्रणानां विविधात्मनाम् । क्षालनार्थं विशेषेण सहस्रगुणिताम्भसा ॥ १०३ ॥ व्रणेषु तु चिरोत्थेषु द्विसहस्रगुणाम्भसा । कृतं द्रवं प्रयुञ्जीत शल्यतन्त्ररहस्यवित् ॥ १०४ ॥ हस्तपादादिकाङ्गानां गेहादीनाञ्च धावने । कृतं द्रवं प्रयुञ्जीत सहस्रगुणिताम्भसा ॥ १०५ ॥ योन्यादिकोमलाइ्गानां क्षालनार्थं प्रयोजयेत् । सहस्रपञ्चकगुणनीरनिष्पादितं द्रवम् ॥ १०६ ॥ अथास्य प्रयोगक्रमः—फिरङ्गजस्फोटानां तथा नानाकृतीनां नवीनदुष्टव्रणानां क्षालनाय सहस्रगुणजलद्रवयोगः पुरातनव्रणक्षालनाय च दशसहस्रगुणजल- द्रवः । हस्तपादादिशरीराङ्गानां तथा जीवाणुजुष्टवस्त्रादीनां क्षालने सहस्रगुण- जलद्रवः । योन्यादिकोमलांगक्षालनाय पञ्चसहस्रगुणजलद्रवः । उपलक्षणञ्चैतद् योग्यतावोधाय ॥ १०३-१०६ ॥ फिरंग व्रण तथा अनेक प्रकार के नवीन दुष्टव्रणों को साफ करने के लिये विशेष रूप से एक और हजार के अनुगत का द्रव काम आता है। शल्यतन्त्र- वेत्ता वैद्य को चिरकालीन व्रणों के लिये एक और दो हजार की शक्ति का रसकर्पूर द्रव प्रयोग करना चाहिये । हाथ पैर आदि अंगों तथा घर धोने के लिये एक और एक हजार शक्ति का द्रव उपयोग में लाना चाहिये । योनि, गर्भाशय, नेत्र आदि कोमल अंगों के धोने के लिये इसको पाँच हजार गुणा जल मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ॥ १०३-१०६ ॥ अथ कज्जलिकायाः स्वरूपम् अर्द्धसमानद्विगुणमिताद्या गन्धकचूर्णात् पारदकस्य । मर्द्दनजन्या मसृणकाया कज्जलरूपा कज्जलिका सा ॥१०७॥ कज्जलिकायाः प्रयोगेषु विधानम् योगेषु यत्र निर्दिष्टौ समौ गन्धकपार्दौ । तन्मानां कज्जलीं यत्र योजयेद्भिषजां वरः ॥ १०८ ॥ उक्ते पारदमात्रे तु प्रयोगेषु सुनिश्चितम् । योजयेद्रससिन्दूरं रसतन्त्रविशारदः ॥ १०९ ॥

गन्धः स्यादधिकः सूताद्यावान् योगेषु मानतः । गन्धं तावन्तमेवेह विधानज्ञो विनिक्षिपेत् ॥ ११० ॥ रेसोऽधिको भवेद्यत्र गन्धकस्य प्रमाणतः । आदावेव विदध्यात्तु तन्मानात्तत्र कज्जलीम् ॥१११॥ अथ कज्जलिका परिचयः—समासतस्त्रिविधा कज्जली गन्धकमानभेदात् । तत्र पारदापेक्षया अर्धगन्धका यथा-गण्डमालाखण्डनरसे— “कर्षं सूतं शुद्धमस्य गन्धकन्त्वर्धमुत्तमम्” इति । समानगन्धा यथा—स्वच्छन्दभैरवे-“शुद्धं सूतं यथा गन्धं....तुल्यांशम्मर्दयेत्” इत्यादि । द्विगुणगन्धा अर्शःकुठारे-“भागः शुद्धरसस्य भागयुगलं गन्धस्य” इत्यादि । उपलक्षणञ्चैतत्—त्रिगुणचतुर्गुणगन्धनिर्मिता- दीनामप्युपलम्भात् । यथा त्रिगुणगन्धा ज्वरघ्नीगुटिकायाम्-“भागैकं स्याद्रसा- च्छुद्धाद् द्वौ पिप्पल्यास्ततस्त्रयः ! आकारकरभाद् गन्धाद्” इति । चतुर्गु णं यथा- गुञ्जागर्भर्से-“निष्कत्रयं शुद्धसूतं निष्कद्वादशगन्धकम्” इति । क्वचित्तु पारदा- चतुर्थांशगन्धयुतापि यथा-आमवातविध्वंसनरसे-“प्रक्षिप्य गन्धं रसपादभागम्” इति । क्वचित् तृतीयांशगन्धकयुतापि यथा-हेमगर्भपोट्टल्याम्-“शुद्धसूतं त्रिभागं स्यात् तन्मानं शुल्वभस्म च । भागैकं गन्धकं दद्यात्” इति । क्वचित् “पलानि चत्वारि रसस्य गन्धस्य” इति त्रैलोक्यनाथरस इति । मसृणकाया कोमला, कज्जलरूपा पारदचाकचक्यरहिताऽतीव कृष्णा ॥ १०७-१११ ॥ भा.टी.—शुद्ध पारद में समभाग गन्धक, अथवा द्विगुणभाग या त्रिगु- णभाग, अथवा अर्धभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर खरल में खूब मर्दन करके इसका काला चमकीला रूप बना लेना कज्जलिका कहा जाता है ॥ १०७ ॥ जिन योगों में पारद और गन्धक समभाग प्रयोग लिखा हो वहाँ पर इनकी समभाग में बनायी हुई कज्जली डाल सकते हैं। और यदि कहीं योगों में केवल पारद का ही उल्लेख किया हो तो पारद न डाल कर उसके स्थान पर रससिन्दूर का प्रयोग करना चाहिये । जिन प्रयोगों में पारद कः अपेक्षा जितना अधिक गन्धक लिखा हो वहाँ पर कज्जली के अतिरिक्त अधिक गन्धक डाल कर कज्जली बना प्रयोग करना चाहिये । इसके विपरीत जिन योगों में गन्धक की अपेक्षा पारद का भाग अधिक हो वहाँ पर पहिले ही उस पारद गन्धक को कज्जली अच्छी तरह बना लेनी चाहिये ॥ १०८-१११ ॥

**वक्तव्य—**कज्जली को बनाकर उसकी अच्छी तरह परीक्षा करनी चाहिये। यदि कज्जली ठीक होगी तो उसमें पारद की चमक नहीं दीखेगी और वह कोमल तथा चिकनी सी होगी। इसके अतिरिक्त इसकी परीक्षा के लिये बनी हुई कज्जली को थोड़ी सी मात्रा में लेकर हथेली पर रखें और दो एक बूँद जल को डालकर अँगुली से मर्दन करें और जल को सुखा लें, अब देखें यदि हथेली पर पारद के बहुत सूक्ष्म कण नजर आयें तो वह ठीक नहीं, अन्यथा ठीक समझनी चाहिये। कज्जलिकाया गुणाः सहपानानुपानानां वैशिष्ट्यादिह कज्जली । सर्वामयहरा वृष्या मता दोषत्रयापहा ॥ ११२ ॥ कज्जलिकाया गुणाः—सहपानं यत्रौषधं मिश्रयित्वा खाद्यते, अनुपानं नाम औषधिभक्षणात् पश्चात् सेवनीयम् इत्यनयोर्भेदः ॥ ११२ ॥ भा.टी.—सहपान (जिसके साथ औषधि मिलाकर खाई जाती है) और अनुपान (औषधि खाने के बाद सेवनीय) की विशेषतानुसार कज्जली सब रोगों को दूर करती है। उसके सेवन से पुंस्त्व-शक्ति की वृद्धि तथा तीनों दोषों की शांति होती है ॥ ११२ ॥ अस्या आमयिकः प्रयोगः कज्जली समसुगन्धनिर्मिता द्राविडीमरिचचन्द्रतोयदैः । देवपुष्पबदरास्थिसंयुतैश्चूर्णितैश्च मधुना वमिं हरेत् ॥ ११३ ॥ कज्जली द्विगुणगन्धनिर्मिता चन्द्रबालकमरीचशैलजैः । चूर्णितैस्तु ससितैश्च भक्षिता दारुणामपि तृषां वमिं हरेत् ॥११४॥ वरुणादिकषायेण कज्जली परिशीलिता । बाह्यान्तर्विद्रधिं घोरां विनिवारयति द्रुतम् ॥ ११५ ॥ द्विभागगन्धककृता कज्जली खलु भक्षिता । कारबेल्लीदलरसैर्वीसर्पं दारुणं हरेत् ॥ ११६ ॥ द्विगुणितबलियोगा कज्जली श्लक्ष्णचूर्णा सततमिह हि लीढा शिग्रुजत्वग्रसेन । मधुजमधुसमेता विद्रधिं हन्ति बाह्यां व्यपनयति तथान्तर्विद्रधिञ्चातिघोराम् ॥ ११७ ॥

षष्ठस्तरङ्गः १२७ कज्जली द्विगुणगन्धनिर्मिता यष्टिकावृषकणाभयाक्षकैः । बर्बरीस्वरसभाविता भृशं श्वासकासतमकामयापहा ॥११८॥ समानगन्धनिर्मिता सनिम्बुकाम्लनागरा । कणान्विता तु कज्जली हरेदजीर्णमुद्धतम् ॥११९॥ एलाहिफेनकर्पूरजातीफललवङ्गकैः । समैः सुचूर्णिता ख्याता कज्जली स्वप्नमेहनुत् ॥१२०॥ शिंशपासारतैलेन नवनीतेन वाऽनिशम् । लिप्ता कज्जलिका शीघ्रं जीर्णं चर्मदलं हरेत् ॥ १२१ ॥ द्विभागधूर्तपत्राढ्या कज्जली मन्थजान्विता । चित्रकद्रव्यसंपिष्टा कण्डूपामादिकं हरेत् ॥१२२॥ कज्जली सैन्धवोपेत। रविदुग्धेन पेषिता । गण्डेषु लेपनादेव नाशयेद् गण्डमालिकाम् ॥१२३॥ वराकौशिकचूर्णेन समुपैता तु कज्जली । वातारितैलसंयुक्ता सर्वामयविनाशिनी ॥१२४॥ कज्जली द्विगुणगन्धनिर्मिता गव्यमन्थजयुता निषेविता । नाशयेत्तु ह्युपदंशमुद्धतं पथ्यमत्र लवणोज्झितं मतम् ॥१२५॥ समगन्धकयोगेन कृता कज्जलिका खलु । लेपनान्नवनीतेन गजचर्महरा मता ॥१२६॥ कज्जली सितयोपेता धात्रीस्वरससंयुता । शीलिता नाशयत्याशु सर्वानैव मदात्ययान् ॥१२७॥ धत्तरबीजस्वरसपेषिता खलु कजली । सव्योषा नस्ययोगेन सन्निपातं निपातयेत् ॥१२८॥ आमयिक प्रयोगे — द्राविडी एला, चन्द्रः कर्पूरः, तोयदो मुस्ता । वरुणा- दिकृषायः सुश्रुतनिर्दिष्टः । मधुश्चैत्राख्यो मासस्तज्जातेन मधुना क्षौद्रेण समेते- ऽर्थः । अथवा मधुर्वसन्तः तत्र जातेन निष्कासितेन इति यावत् । वासन्तिकेन मधुना समेता इति योज्यम् । अभया हरीतकी, अक्षकः विभीतकः, बर्बरी वन- तुलसी, अहिफेनादीनां ग्राहित्वात् स्वप्नमेहन्यपोहः । शिंशपासारः तदीयं तत्समुत्थं तैलम् । मन्थजं नवनीतम् । वरा त्रिफला, कौशिकं गुग्गुलुः । गज- चर्म कुष्ठविशेषः ॥ ११३-१२८ ॥ भा.टी.—पारद गन्धक की समभाग कजली को छोटी इलायची, काली मिर्च, कपूर, नागरमोथा, लौंग और बेर की मींगी के चूर्ण के साथ मिला मधु से सेवन करने पर वमन बन्द हो जाती है । पारद से द्विगुण गन्धक

१२८ रसतरङ्गिणी लेकर बनायी हुई कजली को कपूर, सुगन्धवाला, मरिच और छारछबीला तथा खाँड़ के चूर्ण के साथ मिलाकर जलानुपान से सेवन करने पर भयंकर तृषा तथा वमन बन्द हो जाती है । वरुणादिगण के कषाय के साथ यदि कुछ दिन तक कजली का सेवन कराया जाय तो बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकार की विद्रधि शान्त हो जाती है । द्विगुण गन्धक की कजली को करेले के पत्ररस के साथ सेवन करने से भयंकर वीसर्प रोग शांत हो जाता है । द्विगुण गन्धक की कजली को सहंजने के स्वरस तथा मधु के साथ कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से बाह्य-आभ्यन्तर दोनों प्रकार की विद्रधि शांत हो जाती है । द्विगुण गन्धक की कजली को बनतुलसी के स्वरस की भावना देकर, मुलैठी, अडूसा, पिप्पली, हरड़ तथा बहेड़े के चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से श्वास, कास तथा तमक श्वास रोग शांत होते हैं। सम गंधक कजली को, नीम्बूकारस सोंठ तथा पिप्पली चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण रोग नष्ट हो जाता है । इलायची बीज, अहिफेन, कपूर, जायफल और लौंग तथा कज्जली प्रत्येक समभाग में लेकर ४ रत्ती मात्रा में सेवन करने से स्वप्नमेह में आराम आता है । सीसम की लकड़ी के तैल अथवा मक्खन में मिलाकर कजली को कुछ दिन तक निरन्तर लेप करने पर पुराना चर्मदल रोग नष्ट हो जाता है । एक भाग कज्जली दो भाग धतूरे के पत्ते लेकर दोनों को खरल में चित्रकस्वरस से पीसकर मक्खन मिला लेप करने से कण्डू पामा आदि रोग नष्ट होते हैं । कज्जली में समभाग सैन्धानमक मिला आक के दूध में पीसकर लेप करने से गण्डमाला में आराम आता है । त्रिफलाचूर्ण, शुद्ध गुग्गुल को कज्जली में मिलाकर एरण्ड तैल के साथ खूब मर्दन कर पतला कल्क-सा बनाकर गरम जल या दूध से सेवन करने पर सब रोग विशेषतः वात-रोग नष्ट होते हैं । द्विगुण गन्धक की कज्जली को गाय के मक्खन के साथ मिलाकर सेवन करने से उपदंश रोग नष्ट हो जाता है; परंतु इसके सेवनकाल में लवण का त्याग कर देना चाहिए । समभाग कज्जली को मक्खन में मिलाकर लेप करने से गजचर्म (चम्बल) रोग नष्ट हो जाता है । कज्जली में समभाग खाँड मिला आँवलों के स्वरस के साथ कुछ दिन सेवन करने से सब प्रकार के मदात्यय रोग नष्ट हो जाते हैं । कज्जली को धतूरे के बीजों के रस में अच्छी तरह घोंटकर इसमें त्रिकटुचूर्ण मिला नस्य लेने से सन्निपात में लाभ होता है ॥ ११३-११८ ॥

६ षष्ठस्तरङ्गः १२६ अथ कज्जलिकोदयमलहरः वस्वब्धितोलकमितं सिक्थतैलं तु निर्मलम् । श्लक्ष्णपिष्टा कज्जलिका तोलकद्वयसंमिता ॥१२९॥ शुद्धं मृद्दारशृङ्गं तु युगतोलकसमितम् । कम्पिल्लकञ्च विमलं वसुतोलकसंमितम् ॥१३०॥ माषत्रयोन्मितं चैव तुत्थकं निर्मलीकृतम् । आदाय खल्वे विन्यस्य पेषयेदतियत्नतः ॥१३१॥ ततो विशालवक्त्रायां काचकुप्यां तु विन्यसेत् । मतो मलहरोऽयं तु नाम्ना कज्जलिकोदयः ॥१३२॥ शोधनो रोपणश्चायं व्रणानां तु विशेषतः । नाडीव्रणहरश्चापि विविधव्रणनाशनः ॥१३३॥ व्रणा ये न प्रशाम्यन्ति भेषजानां शतैरपि । अचिरादेव शाम्यन्ति भृशमस्य प्रयोगतः ॥१३४॥ वस्वब्धितोलकं ४८ तोलकाः । मृद्दारशृङ्गशुद्धिर्जलपेषणाद् वक्ष्यते ॥ १२६-१३४ ॥ भा.टी.—शुद्ध सिक्थ तैल ४८ तोला, पारद गन्धक की समभाग कज्जली २ तोला, शुद्ध मुरदासंग चार तोला, स्वच्छ कबीला आठ तोला, शुद्ध तूतिया तीन माशे लेकर, इन सब्रको एकत्र खरल में डाल अच्छी तरह पीसकर मिला लें। मरहम तैय्यार होने पर इसे चौड़े मुख की शीशी में भरकर रख लें । इस मरहम को कज्जलिकोदय-मलहर कहते हैं । यह मरहम व्रणों का शोधन तथा रोपण ( भरना ) करती है । इसके प्रयोग से नाडीव्रण तथा अन्यान्य व्रण अच्छे होते हैं । जो व्रण हजारों प्रकार के मरहमों से अच्छे नहीं होते हैं उनको यह मलहर शीघ्र ही अच्छा कर देता है ॥ १२६-१३४ ॥ अथ रसपर्पटिकाया निर्माणप्रकारः सूतं हिङ्गुलसम्भवं हतमलं मोटो रुबूकार्द्रकैः दैत्येन्द्रं कचराङ्कनोद्भवजलैः प्राक् सप्तधा भावितम् । अङ्कोल ककोकिलोज्ज्वलशिखे सम्यग्विलाप्य द्रुतं भृङ्गोत्थे सलिले निषिच्य विमलं तुल्यं ततः पेषयेत् ॥१३५॥ युक्त्या कज्जलिकां विधाय विबुधस्तां लोहदर्व्यां क्षिपेत् निर्दिष्टैः खलु कोकिलैश्च दहनं प्रज्वाल्य दर्व्वी न्यसेत् । सूतं पङ्कसमं विलाप्य रुचिरं पाकक्रियाकोविदः

१३० रसतरङ्गिणी शीघ्रं गोमयसंस्थिते तु कदलीपत्रे ततो निक्षिपेत् ॥१३६॥ निक्षिप्तमात्रं कदलीपलाशैराच्छादयेद्वै सुचिरं रसज्ञः । यस्मादियं पर्पटकतुल्यरूपा तस्मान्मता पर्पटिकाभिधेया ॥१३७॥ अथ रसपर्पटिका—मोटा जयन्ती, उरुबूक एरण्डः, दैत्येन्द्रो गन्धकः, कच- रञ्जनं भृङ्गराजः । कोलककोकिलाः बदराङ्गाराः ॥ १३५-१३७ ॥ भा.टी.—पहिले हिंगुलोत्थपारद को अरणी, एरण्डमूल तथा अदरखरस के साथ तीन दिन मर्दन करके धोकर साफ कर लें । फिर शुद्ध गन्धक को भांगरे के रस की सात भावना देकर सुखा लें, फिर इसे एक लोहपात्र या करछी में रखकर बेर के कोयले की अग्नि में पिघलाकर भांगरे के स्वरस में बुझा लें । इस प्रकार शुद्ध गन्धक, और पूर्वोक्त प्रकार से शुद्ध पारद दोनों को समभाग लेकर दोनों की अच्छी तरह कज्जली बना लें । अब इस कज्जली को एक लोहे की चम्मच में डाल कर इसे ( चम्मच ) कोयलों की अग्नि पर रखकर पिघलायें । जब यह कज्जली पिघलकर कीचड़ की भाँति गीली हो जाय तब इसे गोबर के ऊपर बिछे हुए केले के पत्ते पर डाल दें और डालते ही एक दूसरे कदलीपत्र से इसे दबाते हुए ढँक दें और अच्छी तरह शीतल होने तक इसी तरह रहने दें । इस प्रकार कदलीपत्र से दबाने पर यह पपड़ी सी बन जाती है । अतः इसे पर्पटी नाम से कहा जाता है ॥ १३५-१३७ ॥ वक्तव्य—कज्जली को लोहे की चम्मच में डालने से पूर्व चम्मच में थोड़ा सा घी लगा लेना चाहिये जिससे द्रव्य उसमें चिपका न रह जाय और अग्नि से गन्धक जल न जाय । पर्पटिकापाकस्य त्रैविध्यम् मृदुर्मध्यः खरश्चेति पाकोऽत्र त्रिविधः स्मृतः । आद्यौ प्रयोजयेद्वैद्यः खरन्तु विषवत्त्यजेत् ॥१३८॥ त्रिविधपाकानां स्वरूपाणि मृदुपाके न भंगः स्यात्तत्सारल्यञ्च मध्यमे । द्वयोः सचन्द्रिकं काष्ण्यं खरे चूर्णञ्च लोहितम् ॥१३६॥ खरपाकस्य त्यागो गन्धकदाहात् ॥ १३८-१३६ ॥ भा.टी.—मृदु, मध्य तथा खर भेद से पर्पटी का त्रिविध पाक होता है । इनमें से मृदु तथा मध्य पाक युक्त पर्पटी का औषधि रूप में प्रयोग करना चाहिये, किन्तु खरपाक युक्त पर्पटी को विष के समान त्याग देना चाहिये ॥१३८॥

षष्ठस्तरङ्गः १३१ मृदुपाक युक्त पर्पटी तोड़ने पर कुछ मुड़कर टूट जाती है, मध्यपाक में वह बड़ी आसानी से टूटनेवाली हो जाती है, किन्तु खरपाक में पपड़ी न बन- कर वह कुछ लाल वर्ण का सा चूर्ण हो जाता है ॥ १३६ ॥ पर्पटिकाया गुणाः ग्रहणीगजमर्दनदक्षतरा क्षयकासजलोदरगुल्महरा । अतिसारमतिभ्रमदाहहरा ज्वरशोथहरा रसपर्पटिका ॥१४०॥ अर्शोंरोगं हरति सुतरां कामलां शूलकोपं । पाण्डुव्याधिं श्वयथुसहितं भस्मकञ्चातिभीष्मम् । कुष्ठान्यष्टादश श्वयथुमथोत्सेधकं सर्वरूपं प्लीहानञ्च प्रविततरुजं त्वामवातानशेषान् ॥ १४१ ॥ अम्लपित्तशमनी हरणीया वृद्धदोषदमनी रमणीया । कामशुक्रजननी मदनीया पर्पटी क्व न भवेत्कमनीया ॥१४२॥ उत्सेधकं शोथम् । मदनीया हर्षकरी ॥ १४०-१४२ ॥ भा.टी.—पर्पटी, ग्रहणी रोगरूपी हाथी के मर्दन में अत्यन्त उपयोगी होती है । इसके अतिरिक्त क्षय, कास, जलोदर, गुल्म, पुरातन अतीसार, बुद्धिभ्रम, दाह, ज्वर तथा शोथ को नष्ट करती है। इसके प्रयोग से अर्शरोग, कामला, शूल ( उदर-रोग ), पाण्डुरोग ( शोथ युक्त ), अतिभीषण भस्मक रोग आदि नष्ट हो जाते हैं । यह अठारह प्रकार के कुष्ठ तथा त्वक् रोगों और अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा तथा सब प्रकार के आमवात को भी नष्ट करती है। यह पर्पटी अम्लपित्त को शमन करती है । वृद्धावस्थाजन्य दौर्बल्य को दूर करती है, कामशक्ति को बढ़ाती तथा शुक्र की उत्पत्ति आदि कार्य करने से हर प्रकार से उत्तम औषधि है ॥ १४०-१४२ ॥ पर्पटीमात्रा गुञ्जाद्वितयमेवादौ मात्रामस्य प्रकल्पयेत् । क्रमवृद्धया च वितरेद् गुञ्जादशकमन्ततः ॥ १४३ ॥ पर्पटी कल्प या सेवन कराने से प्रारम्भ में दो रत्ती की मात्रा ही देनी चाहिये । फिर क्रमशः बढ़ाते हुए दस रत्ती तक इसकी मात्रा कर देनी चाहिये ॥ १४३ ॥ रसपर्पटिकाया आमयिकः प्रयोगः नाकुलीमूलरजसा गुञ्जाष्टकमिता सिता ।

१३२ रसतरङ्गिणी रसपर्पटिका साज्यमुन्मादमिह नाशयेत् ॥१४४॥ ब्राह्मीरससमायुक्ता गुञ्जाष्टकमिताशिता । रसपर्पटिका काममपस्मारं निवारयेत् ॥१४५॥ रामठेनार्धगुञ्जेन सगुञ्जाष्टकजीरका । रसपर्पटिका भुक्ता ग्रहणीं हन्ति दारुणाम् ॥१४६॥ व्योषनिम्बुदलोपेता भक्षिता रसपर्पटी । सप्ताहद्वितयेनैव त्वपस्मारं विनाशयेत् ॥ १४७ ॥ वर्धमानकबीजोत्थतैलेन परिशीलिता । शूलं गुग्गुलुना पाण्डुशोफं हन्यात्तु पर्पटी ॥१४८। धूर्त्तबीजसमायुक्ता रसपर्पटिकाशिता । गुञ्जापञ्चकमात्रन्तु हन्त्युन्मादं विशेषतः ॥१४६॥ गोमूत्रेण समायुक्ता रसपर्पटिकाशिता । मासमात्रप्रयोगेण नाशयेद् गुदजामयम् ॥ १५० ॥ निम्बपञ्चकभल्लातवाकुचीभृङ्गसंयुता । निहन्ति सर्वकुष्ठानि रसपर्पटिकाशिता ॥१५१॥ दशमूलकषायेण शीलिता रसपर्पटी । विनाशयेद्विशेषेण दारुणं वातिकं ज्वरम् ॥ १५२ ॥ त्र्यूषणक्षोदसंयुक्ता रसपर्पटिकाशिता । विनिहन्त्यचिरादेव कासं खलु कफोत्थितम् ॥१५३॥ नाकुली रास्ना, रामठं हिङ्गु,वर्धमानक एरन्डः, निम्बपञ्चकं निम्बपञ्चाङ्गम॥ भा.टी.-पर्पटी को उन्माद रोग के लिये आठ रत्ती मात्रा तक लेकर रास्ना- मूलचूर्ण के साथ गोघृत में मिलाकर सेवन करना चाहिये । दो से आठ रत्ती मात्रा तक ब्राह्मीरस के साथ सेवन कराने से अपस्मार रोग को नष्ट करती है । आधी रत्ती हींग, आठ रत्ती रसपर्पटी, आठ रत्ती श्वेतजीरकचूर्ण मिलाकर कुछ दिन सेवन करने से दुःसाध्य संग्रहणी रोग नष्ट हो जाता है । त्रिकटु- चूर्ण और पर्पटी को मिला नींबू के पत्रकल्क के साथ सेवन करने से दो सप्ताह में अपस्मार ( मृगी ) रोग नष्ट हो जाता है । उदरशूल में इसको एरन्डबीज- तैल के साथ सेवन कराना चाहिये और शोथ युक्त पाण्डु रोग में इसको गुग्गु- लुचूर्ण में मिलाकर सेवन कराना चाहिये । पाँच रत्ती मात्रा तक पर्पटी को लेकर धत्तूरबीजचूर्ण के साथ सेवन कराने से उन्माद रोग को नष्ट करती है।

षष्ठस्तरङ्गः १३३ अर्शोग में रसपर्पटी को एक मास तक गोमूत्र के साथ सेवन कराने से अर्श- रोग नष्ट हो जाता है। निम्ब पञ्चांग, शुद्ध भिलावा, बाकुची तथा भांगराचूर्ण के साथ पर्पटी-सेवन से सब कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते हैं। दशमूलकषाय के साथ पर्पटी सेवन करने से भयंकर वातज्वर शान्त हो जाता है। त्रिकटुचूर्ण मिलाकर रसपर्पटी का सेवन कराने से कफजन्य कास शीघ्र ही शान्त हो जाता है। वक्तव्य—संग्रहणी, पुरातन अतीसार में पर्पटी का सेवन कराने पर दूध, मठा, अथवा फलों का ही सेवन कराने से शीघ्र और स्थायी लाभ होता है। अतः भयानक अवस्थावाले उक्त रोगी को पर्पटी सेवन के साथ अन्न तथा गुरु पदार्थ भोजन के लिये नहीं देने चाहिये ॥ १४४-१५३ ॥ पर्पटिकाभक्षणसमनन्तरं जलपाननिषेधः रसबलिपर्पटिकाया भक्षणसमकालमेव दोषज्ञैः । नादेयं वा कौपं पानीयं नैव पानीयम् ॥१५४॥ पर्पटिकायाः पथ्यानि काकाह्वा च पटोलकं सुविशदं पूगीफलञ्चार्द्रकं वास्तूकं कदलीप्रसूनममलं कृष्णाञ्च वार्तिङ्गनम् ! सूक्ष्माश्चाथ पुरातनाः कृमिगणैर्हीनास्तथा शालयः पानं गोपयसः सशर्करमलं पथ्यं बुधैः कीर्तितम् ॥१५५॥ जलपाननिषेधो विकारहेतुत्वात् । कौपं कूपभवम्, नादेयं नदीजातम् । काकाह्वा काकमाची, वार्तिङ्गनं वृन्ताकम् ॥ १५४-१५५ ॥ भा.टी.—पारद गन्धक की पर्पटी सेवन करने के तत्काल बाद तृषा लगने पर भी कुआँ अथवा नदी का जल नहीं पीना चाहिये। इससे रोगोत्पत्ति अथवा रोगवृद्धि का डर रहता है ॥ १५४ ॥ पर्पटी सेवन काल में मकोय, परवल, सुपारी, अदरख, बथुआ, केले के फूल, काला और कोमल बीज रहित बैगन, बिना घुन लगे बारीक पुराने बासमती आदि चावल, खांड या मिश्री युक्त गो दूध; ये वस्तुयें पथ्य मानी जाती हैं॥१५५॥ प्रकारान्तरेण पथ्यानि पुराणाः शालयः शाके वृन्ताकं वा पटोलकम् । गवां दुग्धन्तु सततं पथ्यमेतच्चतुष्टयम् ॥१५६॥ प्रथमायामवस्थायां दुग्धं सात्म्यं न चेद्भवेत् । अतीसारप्रवृत्तिः स्यात्तदा तन्नैव योजयेत् ॥१५७॥

१३४ रसतरङ्गिणी लावतित्तिरिकादीनां रसं तत्र नियोजयेत् । अतीसारनिरोधे तु दुग्धमेव प्रदापयेत् ॥१५८॥ शोथे विशेषतो हेयं पानीयं लवणन्तथा । तृषायां वितरेदल्पं नारिकेलोदकं भिषक् ॥१५९॥ उष्णप्रधानदेशे तु रोगिमङ्गलकाम्यया । सशोथेऽपि भिषङ् नीरं जातु नैव विवर्जयेत् ॥१६०॥ अतीसारनिरोधे अतीसारे निवृत्ते सति ॥ १५६-१६० ॥ भा.टी.—अन्नों में पुराने चावल, शाकों में परवल, तथा कोमल बैंगन, गोदूध, ये चार चीजें पर्पटी सेवन में निरन्तर पथ्य समझनी चाहिये । यदि पर्पटी सेवन करने पर प्रारम्भ अवस्था में दूध अनुकूल न पड़े और दूध पीने से दस्त अधिक होने लगें तो इसे छोड़ देना चाहिये । इसके स्थान पर रोगी की बलवृद्धि के लिये लावा और तीतर आदि पक्षियों के लघुमांस रस का प्रयोग करना चाहिये । यदि पर्पटी सेवन करनेवाले रोगी के शरीर में शोथ हो तो उसे जल तथा नमक नहीं देना चाहिये । यदि उसे तृषा लगती हो तो पीने के लिये थोड़ा थोड़ा नारियलजल देते रहना चाहिये । किन्तु अधिक गरम देशों में रोगी के हित की दृष्टि से शोथ होने पर तृषा में जल का निषेध नहीं करना चाहिये; अन्यथा रोगी को मूर्च्छा आदि विकार होने की आशंका रहती है ॥ १५६–१६० ॥ रसपर्पटिकाया अपथ्यानि नाम्लं स्नानं शिशिरसलिलैर्नापि वातादिसेवां कोपं चिन्तामहिममतुलं नैव सेवेत चोष्णम् । तिक्तं निम्बादिकमिह गुडानूपमांसादिकञ्च स्त्रीणां सम्भाषणमपि बुधैर्नैव कार्यं कदाचित् ॥१६१॥ भा. टी.—रसपर्पटी सेवनकाल में रोगी को अम्ल द्रव्यों का सेवन, शीत जल से स्नान, शीत वायु में रहना या घूमना, क्रोध करना, चिन्ता करना, तथा उष्ण द्रव्यों का सेवन सर्वथात्याग देना चाहिये । इसके अतिरिक्त नीम आदि कड़वी चीजों का सेवन गुड़, अनूपदेशीय जन्तुओं का मांस आदि तथा स्त्रियों के साथ एकान्त में हास्य और शृंगार सम्बन्धी बातचीत कदापि नहीं करनी चाहिये ॥ १६१ ॥