रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
३८० रसतरङ्गिणी रस में एक दिन तक अच्छी तरह से घोटकर जल से धोकर साफ कर लें। फिर इस पीठी में दो कर्ष परिमाण शुद्ध गन्धक और एक कर्ष शुद्ध हरताल मिलाकर अच्छी तरह घोटकर चूर्ण करलें। अन्त में इस चूर्णको शरावसम्पुट में रखकर लघुपुट में फूंक दें। इस तरह तीन लघुपुटों में फूँकने से चाँदी की भस्म हो जाती है। इस प्रकार बनी हुई रजतभस्म लाल कमलसदृश सुन्दरवर्ण की होती है ॥ १७-२१ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः रौप्यपत्राणि शुद्धानि समादाय भिषग्वरः । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्मांस्तु कारयेत् ॥ २२ ॥ रौप्यपत्रमितञ्चाथ तालं गन्धञ्च शोधितम् । निक्षिपेच्चाथ सम्पेष्य शरावद्वयसम्पुटे ॥ २३ ॥ निधाय पुटयेद्यत्नात्पुटे कुक्कुटसंज्ञके । एवं पुटत्रयेणैव तारं यात्याशु पञ्चताम् ॥ २४ ॥ भस्म सञ्जायते चैवं कालाञ्जनसमप्रभम् । एवं मृतं चन्द्रलोहं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥ द्वितीयः प्रकारः सुगमः ॥ २२-२५ ॥ भा.टी.-शुद्ध चाँदी के पात्रों को लेकर उनको कैंची से काटकर छोटे- छोटे टुकड़े कर लें। अब रजत के टुकड़ों में चाँदी के बराबर शुद्ध हरताल और शुद्धगन्धक मिलाकर दो छोटे-छोटे सिकोरों में बन्द करके कुक्कुटपुट में फूंक दें। इस प्रकार हरताल और गन्धक के योग से तीन कुक्कुटपुट देने से रजत की भस्म हो जाती है। परन्तु यह भस्म काले सुरमे के सदृश काली चमकीली होती है। इसे निःशंक होकर कार्य में ला सकते हैं ॥ २२-२५ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः पत्तलीकृतपत्राणि राजतानि समाहरेत् । कर्तर्या कर्तयित्वा च कणान सूक्ष्मांस्तु कारयेत् ॥ २६ ॥ तारपत्रसमं सूतं गन्धञ्च विमलं हरेत् । कुमारीस्वरसं दत्त्वा सम्यक् सम्पेषयेद् बुधः ॥ २७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य करीषाग्नौ पुटेद्भिषक् । एवं स्वल्पपुटैरेव रौप्यं याति हि पञ्चताम् ॥ २८ ॥
षोडशस्तरङ्गः ३६१ तृतीयः प्रकारस्तालकच्छेपरहितः प्रायश्चतुर्दशपुटैः साध्यश्चेति ॥ २६-२८ ॥ भा.टी.—चांदी के बहुत पतले-पतले पत्र लेकर उनको कैंची से काटकर बहुत सूक्ष्म कणों के रूप में बनालें। अब इन कणों में चाँदी के बराबर भाग शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक मिला घीकुआर के गूदे में अच्छी तरह मर्दन करके शरावसम्पुट में बन्द करलें। सम्पुट के सूखने पर लघुपुट में (उपलों की अग्नि में) फूँक देवें। इस प्रकार भी थोड़े पुटों में रजत की भस्म हो जाती है ॥२६-२८॥ चतुर्थो मारणप्रकारः पत्रीकृतं शुद्धतारं चतुस्तोलकसंमितम् । द्वितोलकमितं चैव सुमृतं स्वर्णमाक्षिकम् ॥२६॥ सुधादुग्धेन सम्पेष्य पेषयेद्याममात्रकम् । आतपे चाथ संशोष्य श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् ॥३०॥ शरावसम्पुटस्थञ्च पुटेद्वन्योपलैर्भिषक् । एवं स्वल्पपुटैरेव रजतं मृत्तिमाप्नुयात् । ३१॥ द्वितीयादिपुटेष्वत्र रसतन्त्रविचक्षणः । माक्षिकं न प्रयुञ्जीत रहस्यमिति कीर्तितम् ॥३२॥ चतुर्थः प्रकारो माक्षिकभस्मयोगो क्षुधावर्धकः उदरविकारहरश्च विशेषात्॥२६-३२॥ भा.टी.—चार तोला शुद्ध रजत को लेकर उनको कैंची से काटकर छोटे- छोटे टुकड़े करलें, अब इनमें दो तोला स्वर्णमाक्षिकभस्म मिला थोहर के दूध के साथ छः घंटे तक अच्छी तरह रगड़ करके धूप में सुखा लें। धूप में सूखने पर इसका चूर्ण-सा कर लें। अब इस चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके जंगली उपलों की अग्नि में फूँक दें। इस प्रकार थोड़े से पुटों में ही चाँदी की भस्म हो जाती है। इस विधि से रजतभस्म बनाने में पहिले पुट में ही स्वर्ण- माक्षिक डालनी चाहिये। इसके बाद केवल थोहर के दूध में ही घोटकर लघु- पुट देने चाहिये ॥ २६-३२ ॥ वक्तव्य—प्रथम बार मिलायी हुई स्वर्णमाक्षिकभस्म धीरे २ पुट देने में कुछ उड़ जाती है और कुछ दग्ध हो जाती है और कुछ अंश रजतभस्म में भी रह जाती है। इस विधि से बनायी हुई रजतभस्म उदररोगहर और क्षुधा- वर्धक होती है। क्योंकि इसमें थोहर का दूध पर्याप्त मात्रा में पड़ता है। पञ्चमो मारणप्रकारः शुद्धानि तारपत्राणि समादाय भिषग्वरः ।
३६२ रसतरङ्गिणी विशोधितं हिङ्गुलं तु क्षिपेत्तारमितं भिषक् ॥३३॥ तथैव सुमृतं ताप्यं क्षिप्त्वा सम्पेषयेद् बुधः । निम्बूकरसं दत्त्वा शुष्कचूर्णञ्च कारयेत् ॥३४॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटयेत्तु प्रयत्नतः । एवं स्वल्पपुटैरेव रजतं मृतिमाप्नुयात् ॥३५॥ द्वितीयादिपुटेष्वत्र रसतन्त्रविचक्षणः । माक्षिकं न प्रयुञ्जीत रहस्यमिह कीर्तितम् ॥३६॥ पञ्चमः प्रकारः माक्षिकभस्महिङ्गुलयोगजातसिद्धिः सुगमपाठः प्रायः ॥३३-३६॥ भा.टी.--शुद्ध रजत के पत्रों को कैंची से काटकर बहुत बारीक पतले टुकड़े करलें । अब इनमें समभाग शुद्ध हिंगुल और स्वर्णमाक्षिकभस्म मिला निम्बू के स्वरस में अच्छी तरह पाँच-छः घंटे तक घोटकर सुखा के चूर्ण करलें । अब इस शुष्कचूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके लघुपुट की अग्नि में फूँक दें । इस प्रकार थोड़े पुटों में ही चाँदी की भस्म हो जाती है । इस विधि से रजत की भस्म करने पर भी पहिले पुट में ही स्वर्णमाक्षिकभस्म डालनी चाहिये । इसके बाद केवल हिंगुल और निम्बूरस में ही घोटकर पुट देने चाहिये ॥३३-३६॥ षष्ठो मारणप्रकारः समाहरेत्सुविमलं तारपत्रकणाचयम् । निम्बूद्रवसंशुद्धं निरम्लीकृतहिङ्गुलम् ॥३७॥ तारद्विगुणितं दत्त्वा पिष्ट्वा चूर्णञ्च कारयेत् । ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण पचेत्पाकविधानवित् ॥३८॥ भूयो भूयः पचेद्यावद्रजतं मृतिमाप्नुयात् । अधःस्थं सुमृतं तारं कृष्णाभमतिसुन्दरम् ॥३९॥ आहरेदूर्ध्वसंस्थन्तु रसेशञ्चातिनिर्मलम् । एवं मृतं चन्द्रलोहं तत्तद्योगेषु योजयेत् ॥४०॥ षष्ठः प्रकारः-हिङ्गुलसाध्यः प्रयत्नैक्येऽपि कार्यद्वयसाधकः सरलप्रायश्च ॥३७-४०। भा.टी.—शुद्ध किये हुए चाँदी के पत्रों का बुरादा-सा चूर्ण लेकर उसमें द्विगुण भाग निम्बू के रस में अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ हिंगुलचूर्ण डालकर पीस लें और चूर्ण-सा कर लें । अब इस चूर्ण को ऊर्ध्वपातन की निचली हाँडी में रखकर इसके मुख पर एक दूसरी औंधा मुख टिकाकर दोनों की मुखसन्धि को अच्छी तरह कपड़मिट्टी से पोत दें । अब ऊर्ध्वपातन यन्त्र को चूल्हे पर
षोडशस्तरङ्गः ३६३ रखकर इसके नीचे अग्नि देकर पकायें। जब हिंगुल से पारद उड़ने तक की अवधि की अग्नि दे लें तो इसे स्वांगशीत करके खोल कर ऊपर हांडी में लगे हुए पारद को और नीचे हांडी में बनी हुई चाँदी की राख को अलग निकाल लें। इस विधि से तब तक बराबर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में हिंगुल के साथ रजत को पकायें जब तक कि नीचे हांडी में रजत की कृष्णाभ अत्यन्त सुन्दर भस्म न हो जाय। ऊपर की हांडी में शुद्धपारद प्रतिवार ही प्राप्त होगा। इस प्रकार बनायी रजत को तत्तद् योगों में काम लावें॥ ३७-४०॥ सप्तमो मारणप्रकारः राजतानि विशुद्धानि पत्राणीह समाहरेत्। रसेश्वरं समं दत्त्वा पिष्टिकां कारयेत्ततः॥ ४१ ॥ गौरीपाषाणचूर्णञ्च समं निक्षिप्य मर्दयेत्। आतपे चाथ संशोष्य शुष्कचूर्णञ्च कारयेत् ॥४२॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटेन तु। पुटमेकं प्रदायाथ खल्वे सञ्चूर्णयेत्ततः ॥४३॥ हिंगुलं विमलञ्चैव तत्तुल्यं मेलयेद् बुधः। एवं पुटद्वयं दद्याद्रसतन्त्रविचक्षणः ॥४४॥ एवं पुटत्रयेणैव रजतं मृतिमाप्नुयात्। एवं मृतन्तु रजतं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ४५ ॥ सप्तमः प्रकारः—शङ्खविषप्रयोगसाध्यः निर्माणसुगमश्चेति। अत्र भस्मावस्थायां शङ्खविषं नावशिष्यते इति समाधानीयम् ॥ ४१-४५ ॥ भा.टी.—शुद्धरजत के पत्रों का बुरादा और शुद्धपारद दोनों समभाग लेकर खरल में घोंटकर इसकी पिष्टी बना लें। पिष्टी बनाते समय ही इसमें समभाग गौरीपाषाणचूर्ण (संखिया) भी मिला दें। अब इसे धूप में अच्छी तरह सुखाकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण को एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूंक दें। एक गजपुट की अग्नि देने पर सम्पुट में से द्रव्य को निकाल खरल में डालकर उसमें रजतसमभाग शुद्धहिंगुल मिला सम्पुट में बन्द करके पुनः गजपुट में फूँक दें। इसी प्रकार फिर तीसरी बार भी गजपुट में फूँक दें। इस तरह तीन पुटों ही में चाँदी की भस्म हो जाती है॥ ४१-४५॥ वक्तव्य—इस विधि में यद्यपि संखिया का मिश्रण किया गया है, परन्तु वह तीन गजपुटों की अग्नि देने पर उड़ जाता है। परन्तु संखिया के योग से
३६४ रसतरङ्गिणी
बनी हुई रजतभस्म बहुत तीव्र होती है जो वातकफविकारों के लिये अत्यन्त उपयोगी होती है । मृतरजतस्य गुणाः तारं मृतं सुशिशिरं तुवरञ्च रुच्यं स्निग्धं विपाकमधुरं परमञ्च मेध्यम् । वश्यं परं पवनहारि कफप्रणाशि त्वम्लं सरं परमलेखनकञ्च वृष्यम् ॥४६॥ सुमृतं चन्द्रलोहन्तु वयःस्थापनमुत्तमं । बल्यं परं दाहहरं स्मृतिकान्तिविवर्द्धनम् ॥ ४७ ॥ तृष्णाशोषप्रशमनं परमञ्च रसायनम् । भ्रमहारि विशेषेण गर्भाशयविशोधनम् ॥ ४८ ॥ पित्तामयप्रशमनं प्रमेहाद्यामयापहम् । आयुष्यञ्च विशेषेण विष्टब्धाजीर्णनाशनम् ॥ ४९ ॥ मदात्ययात्ययकरं वह्निमान्द्यप्रणाशनम् । विषघ्नं ज्वरहृच्चैव प्लीहोदरविनाशनम् ॥५०॥ क्षयक्षयकरं नाडीशूलापस्मृतिनुत् परम् । हृद्यं खलु विशेषेण जाठरामयनाशनम् ॥ ५१ ॥ अथ मृतरजतगुणाः—सामान्यतः प्राचीनतन्त्रेष्वपि निर्दिष्टप्राया विस्तरेणा- चार्यैरुदाहृताः ॥ ४६-५१ ॥ भा.टी.—रजतभस्म अत्यन्त शीत, कषायरस, स्निग्ध, रुचिकारक, विपाक में मधुर और उत्तम मेधावर्धक होती है । इसके सेवन से त्वचा का वर्ण निखर आता है, अतः यह त्वच्य होती है । यह भस्म वातहर और कफप्रकोपनाशक है। यह भस्म कषायरस के अतिरिक्त अम्लरस, सर तथा उत्तम लेखन होती है। चाँदी की भस्म उत्तम वयःस्थापक और सब शरीर में बल प्रदान करती है । यह शीत होने से पित्तप्रकोपजन्य दाह में लाभ करती है । मस्तिष्क की पोषक होने से स्मरणशक्ति को बढ़ाती है और शरीर में ओजशक्ति की पुष्टि करने से कान्तिवर्धक है । इसके सेवन से तृष्णा तथा मुखशोष शान्त होता है । यह सब शरीर की पोषक होने से रसायन मानी जाती है । शिरोविकार के कारण होनेवाले चक्करों में विशेष लाभ करती है । गर्भाशयशोधन में बहुत उत्तम
हैं । इसके प्रयोग से पित्तप्रकोपजन्य रोग तथा प्रमेह आदि रोग दूर हो जाते हैं । शरीर में से वातप्रकोप को दूर करने के कारण वातिक संस्थान को स्वस्थ सबल और क्षोभ रहित करने के कारण यह आयुष्य कही जाती है । आँतों में वातप्रकोपजन्य विष्टब्धजीर्ण में यह विशेष लाभदायक है । मदात्यय के कारण होनेवाले सभी विकारों को दूर कर और अग्निमान्द्य को हटाती है । शरीरगत अनेक प्रकार के विषों को नष्ट करती है । ज्वर-विशेषतः पुरातन ज्वरों और प्लीहोदर रोग को शान्त करती है । क्षयरोग के लिये यह स्वर्ण समान ही क्षयनाशक है । नाड़ीशूल और अपस्मार के लिये बहुत उत्तम द्रव्य है । स्वर्ण के समान ही यह भी हृद्य है और उदररोगों को नष्ट करती है ॥ ४६-५१ ॥ वक्तव्य—जब किसी रोग के उपद्रव स्वरूप अथवा मधुमेह, प्रमेह सुजाक में उपद्रव स्वरूप शरीर के कीटाणु (घटक) शनैः शनैः घुलने लगे हों और दूषित अवयवों में दाह हो, शूल के साथ स्थानिक त्वचा काली पड़ गयी हो और कभी-कभी ज्वर भी हो जाया करता हो तो इस प्रकार के वातिक या वातपैत्तिक- दुष्टिजन्य कोथ (Gangren) में रजतभस्म का प्रयोग लाभकारी होता है । सुजाक, फिरंग के पश्चात् होनेवाली वातवाहिनियों के संकोच से होनेवाली नपुंसकता में भी रजतभस्म का अच्छा प्रभाव होता है । अम्लपित्त में भी रजत- भस्म का सेवन लाभकारी सिद्ध हुआ है । रजतनिष्क्रमण—रजत का निष्क्रमण मल (टट्टी द्वारा रजतगन्धी) (Silver Sulphide) के रूप में होता है जिससे मल का वर्ण काला भूरा- सा हो जाता है । इसके अतिरिक्त रजत आन्त्रस्राव तथा पित्त के द्वारा भी बाहर निकलता है और इसका कुछ अंश यकृत् तथा वृक्कों में सञ्चित पाया जाता है । विशिष्टा गुणाः मृतन्तु तारं शमयेन्नितान्तं प्रकोष्ठगं वातमतिप्रवृद्धम् । शाखाश्रयं पित्तमलं विवृद्धं जत्रूर्ध्वसंस्थञ्च कफं मलाख्यम् ॥५२॥ प्रक्षीणबुद्धिस्मृतिसाहसानां शिरोभ्रमेणातिविमोहितानाम् । अध्यापनादौ सुचिरं रतानां यूनां शिशूनाञ्च परं प्रशस्तम् ॥५३॥ विशेषगुणास्तु पूर्वाचार्यैरनुक्ता अपि अनुभूतचराः शिष्यमतिवैशद्याय प्रकटी- क्रियन्ते मृतन्तु तारमिति । निगद्व्याख्यातमन्यत् ॥ ५२, ५३ ॥ भा.टी.—रजतभस्म कोष्ठगत वायु की वृद्धि को अवश्य ही शान्त करता है और रस-रक्तादि धातुओं में सञ्चित पित्त तथा जत्रु (हँसली) से ऊपर के
३६६ रसतरङ्गिणी भाग गला, कण्ठ, नासिका मुख आदि भाग में प्रकुपित कफ को शान्त करता है । बुद्धि, स्मृति तथा साहसहीन मनुष्यों के लिये, शिर में चक्कर आने से दुःखी मनुष्यों के लिये यह उत्तम औषधि है। निरन्तर अध्ययन-अध्यापन कार्य करने- वाले युवापुरुषों तथा बालकों के लिये रजतभस्म अत्यन्त उपयोगी औषधि है ॥ ५२, ५३ ॥ मृतरजतस्य मात्रानिरूपणम् रक्तिकायास्तुरीयांशाद्रक्तिकैकमितं परम् । मृतं तारं नियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५४ ॥ मात्रानिरूपणं बलकालापेक्षया योग्यमेव ॥ ५४ ॥ भा.टी.—चौथाई गुञ्जा से लेकर १ गुञ्जा तक बल, काल के अनुसार रजत भस्म की मात्रा बतायी गयी है ॥ ५४ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः यवानिकादेवपुष्पचूर्णेन रजतं मृतम् । शीलितं नाशयत्याशु कोष्ठवातं चिरोत्थितम् ॥५५॥ एलाचूर्णयुतं तारं सततं परिशीलितम् । अजीर्णरोगजनितं हृदयस्पन्दनं हरेत् ॥ ५६ ॥ एलासितोपलाचूर्णयुतं तारं तु शोलितम् । सूर्यापवर्तञ्च तथा निहन्त्यर्धावभेदकम् ॥ ५७ ॥ रससिन्दूरलोहाढ्यं सशिलाजतुताप्यकम् । शीलितं चन्द्रलोहं तु वरावार। विशेषतः ॥ ५८ ॥ वामडिम्बाशयोद्भूततीव्रवेदनयान्वितम् । गर्भाशयच्युतिं घोरां नाशयत्यविलम्बितम् ॥५६॥ द्वङ्गाभ्ररससिन्दूरसंयुक्तं चन्द्रलोहकम् । युक्तं बलावराक्वाथैस्तीव्ररुव्यथयान्वितम् ॥६०॥ वामडिम्बाशयोद्भूतव्यथया ह्युपलक्षितम् । विजिहन्ति विशेषेण त्वण्डाधारभवामयम् ॥ ६१ ॥ रससिन्दूर सौभाग्यसंयुक्तं चन्द्रलोहकम् । शीलितं रजनीवारा सप्ताहद्वितयोन्मितम् ॥६२॥ क्षतान्वितं चातिमात्रं पूनिस्रावसमायुतम् । गर्भाशयस्य संकोचं नाशयत्यविकल्पतः ॥ ६३ ॥ तारं सलोहं माक्षीकरससिन्दूरसंयुक्तम् ।
षोडशस्तरङ्गः ३६७ यवानीचित्रकक्वाथयुतं तु परिशीलितम् ॥ ६४ ॥ गृध्रसीं चैव विश्वाचीं तथैव त्रिकवेदनाम् । विविधस्थानसम्भूतं नाडीशूलं व्यपोहति ॥ ६५ ॥ पर्पटोशीरधान्यादिपित्तघ्नक्वाथसंयुतम् । चन्द्रलोहं निहन्त्याशु पित्तं शाखासमाश्रितम् ॥ ६६ ॥ राजावर्तेसमायुक्तं रजतं परिशीलितम् । मदात्ययात्ययकरं समाख्यातं विशेषतः ॥ ६७ ॥ चोपचीनीसमायुक्तं रजतं परिशीलितम् । आध्मानं चिरसञ्जातं नाशयत्याशु निश्चितम् ॥ ६८ ॥ सितोपलायुतं रौप्यं यत्नतः परिशीलितम् । सत्वरं नाशयत्येव दाहं शाखाश्रितं ध्रुवम् ॥ ६९ ॥ सिताघृततैलासंयुक्तं रजतन्तु निषेवितम् । उन्मादं नाशयत्येव ह्यचिरादेव दारुणम् ॥ ७० ॥ त्रिजातकसमायुक्तं रजतं परिशीलितम् । प्रमेहादिकरोगांश्च द्रुतमेव निवारयेत् ॥ ७१ ॥ क्षीरकाकोलिकोपेतं चोपचीनीसमन्वितम् । रससिन्दूरसंयुक्तं रजतं परिशीलितम् ॥ ७२ ॥ गर्भाशयाज्जायमानं सशूलं कुसुमोद्गमम् । श्लैष्मिकन्तु कलास्रावं द्रुतमेव विनाशयेत् ॥ ७३ ॥ स्थिरात्मगुप्ताशतमूलिकाभिनिषेवितं वै खलु चन्द्रलोहम् । मासद्वयेनैव निहन्ति कार्श्यं बल्यञ्च वृष्यञ्च परं प्रदिष्टम् ॥७४॥ कृमिघ्नभल्लातकविश्वयुक्तै र्यत्नेन तारं परिशीलितन्तु । मासैकयोगेन हि सुन्दरीणां सौन्दर्यवृद्धिं जनयेन्नितान्तम् ॥७५॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—वरावारा त्रिफलाजलेन, डिम्बाशयो बीजाधारः “Ovary” इत्याङ्ग्लभाषायाम्, तस्मिन्नुद्भूता या तीव्रा वेदना तया युक्ता गर्भाशयस्य स्वस्थात् च्युतिं हरतीति । अत्र वामडिम्बाशय इत्युपलक्षणम्, तेन दक्षिणडिम्बाशयोद्भूतवेदनान्वितां गर्भाशयच्युतिमपि नाशयति इति ज्ञेयम्। अण्डधारभवामयः—“रमणातिशयाच्छैत्यादभिघाताद्विपादपि । अण्डधारगदः कृच्छ्रो जायते चाहिताशनात् ॥ उदरोरुव्यथा तीव्रा मूत्रस्याल्पत्वरक्तते। ज्वरारो- चकहृल्लासा अरतिर्बलसंक्षयः ॥ धमनी वेगिनी क्षुद्रा जिह्वा रक्तोत्पला तथा।
३६८ रसतरङ्गिणी अण्डाधारगदस्यैताः प्रोक्ता आकृतयो बुधैः ॥” इत्युक्तः । गर्भाशयाज्जायमानमि- त्यादिना तु “Membraneus Dysmenorrhœa” इत्याख्यस्य रोगस्योप- वर्णनं विनाशयत्ययं योगः । कृमिघ्नो विडङ्गः । रक्तं कुङ्कुमम् ॥५५-७५॥ भा.टी.-पुरातन कोष्ठगत वायुप्रकोप में रजतभस्म को अजवाइन और लौँगचूर्ण के साथ कुछ दिन सेवन करने से लाभ होता है । पुरातन अजीर्ण से होनेवाले हृदयकंपन में रजतभस्म को इलायचीचूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से लाभ होता है। सूर्यावर्त तथा अर्धावभेदक (आधासीसी) रोग में रजतभस्म को इलायचीबीजचूर्ण और मिश्री के साथ प्रयोग कराया जाता है। रजतभस्म को रससिन्दूर, लोहभस्म, शिलाजीत और स्वर्णमाक्षिकभस्म में मिलाकर कुछ काल सेवन करने से वामडिम्बाशय (ovary) में उत्पन्न तीव्र वेदना के साथ गर्भाशयभ्रंश में शीघ्र ही आराम आता है। इसका अनुपान त्रिफलाक्वाथ होना चाहिये । टंकणपुष्प, अभ्रकभस्म तथा रससिन्दूर के साथ रजतभस्म को खरैंटी और त्रिफलाक्वाथ से सेवन करने पर वामडिम्बाशय में उत्पन्न होनेवाली तीव्र पीड़ायुक्त डिम्बग्रन्थि रोग में विशेष रूप से लाभ होता है। अत्यन्त क्षतयुक्त दुर्गन्धित स्राववाले गर्भाशयसंकोच में रजतभस्म को रससिन्दूर और सुहागे में मिलाकर हरिद्रास्वरस से दो सप्ताह निरन्तर सेवन करने से निश्चित लाभ होता है । रजतभस्म में लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म और रससिन्दूर मिलाकर अजवाइन और चित्रकमूल क्वाथ के साथ सेवन से गृध्रसी (Sytica), विश्वाची, त्रिकवे- दना और शरीर के विभिन्न स्थानों में होनेवाले नाड़ीशूल में आराम आता है । शाखा-(रसरक्तादि धातु) गत पित्तप्रकोप को शान्त करने के लिए रजतभस्म को पित्तपापड़ा, खस, धनियाँ आदि पित्तनाशक औषधियों के क्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है। मदात्यय रोग को नष्ट करने के लिए विशेषतः उसके वातिकलक्षणों को दूर करने के लिये रजतभस्म को लाजवर्तभस्म के साथ सेवन कराने से आराम आता है । पेट में होनेवाले पुराने आध्मानरोग को शांत करने के लिए रजतभस्म को चोपचीनीचूर्ण या कपाय के साथ प्रयोग करने से लाभ होता है। हाथ पैरों में होनेवाले दाह अथवा शाखागत दाह रोग में रजतभस्म को मिश्री में मिलाकर सेवन करना चाहिये । रजतभस्म को मिश्री, घृत तथा इलायचीचूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र ही भयंकर उदररोग में आराम आता है। त्रिजातक (दालचीनी, तेजपत्र, छोटी इलायची) चूर्ण के साथ रजतभस्म का प्रयोग करने से प्रमेह आदि रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ।
षोडशस्तरङ्गः ३६६ क्षीरकाकोली तथा चोपचीनीचूर्णं और रससिन्दूर के साथ रजतभस्म सेवन कराने से ऋतुकाल में या किसी समय होनेवाले गर्भाशय के श्लैष्मिक कला- स्राव में जिसमें मासिकस्राव बड़ी कठिनाई के साथ होता हो तो, शीघ्र आराम आता है। शालपर्णी, कौंच के बीज, शतावर के चूर्ण के साथ रजतभस्म को दो मास तक निरन्तर सेवन करने से शरीर की कृशता नष्ट हो जाती है और शरीर बलवान् हो जाता है। वायविडंग, शुद्ध भिलावाफल, सोंठ तथा केशर- चूर्ण के साथ रजतभस्म को मिलाकर एक मास तक निरन्तर सेवन कराने से स्त्रियों के शरीर का सौन्दर्य बढ़ जाता है ॥ ५५-७५ ॥ वक्तव्य- टंकण अभ्रकभस्म तथा रससिन्दूरयुक्त रजतभस्म का प्रयोग गर्भाशयजन्य सब प्रकार की विकृतियों में लाभदायक है। इसके साथ यदि त्रिफलाक्वाथ की योनिवस्ति दी जाय तो यह और भी अधिक गुणकारी होता है। यह योग केवल वामडिम्बाशयजन्य पीड़ा और गर्भाशयभ्रंश में लाभदायक है। किन्तु दक्षिणडिम्बाशयजन्य वेदना सहित गर्भाशयच्युति में भी लाभदायक होता है। डिम्बाशयरोग के लक्षण अन्यत्र इस प्रकार पाये जाते हैं। "रमणा- तिशयाच्छैत्यादभिघाताद्विषादपि । अण्डाधारगदः कृच्छ्रो जायते चाहिताश- नात् ॥ उदरोरुव्यथा तीव्रा मूत्रस्याल्पत्वरक्तते । ज्वरारोचकहृल्लासा अरतिर्बल- संक्षयः॥ धमनी वेगिनि क्षुद्रा जिह्वा रक्तोत्पला तथा। अण्डाधारगदस्यैताः प्रोक्ता आकृतयो बुधैः ॥" अथ सोरकाम्लीयरजतस्य निर्माणप्रकारः सूचीवेध्यानि पत्राणि रजतस्य समाहरेत् । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्माँस्तु राजतान् ॥ ७६ ॥ निधाय काचचषके विशुद्धं सोरकाम्लकम् । बिन्दुशो निक्षिपेत्तारं यावन्न द्रुतिमाप्नुयात् ॥ ७७ ॥ सोरकद्रावसम्पाते धूमोऽत्युग्रोऽभिजायते । अतो द्रावं क्षिपन् वक्त्रमन्यतः परिवर्तयेत् ॥ ७८ ॥ सताम्रं चेद्द्रवेत्तारं तदा नीलो भवेद् द्रवः । निर्मलं चेद्द्रवेत्तारं द्रवः शुक्लस्तदा भवेत् ॥ ७९ ॥ द्रवेऽस्मिन्नथ वै तीक्ष्णं लवणद्रावकं क्षिपेत् । यावत्तत्र किलाटाभं तारं विनिपतत्यधः ॥ ८० ॥
निवृत्ते तु किलाटाभं वस्तुपाते तु निश्चितम्। न क्षिपेल्लवणद्रावं रसायनविधानवित् ॥ ८१ ॥ अल्पकालावसानेऽथ जलीयांशं तदूर्ध्वगम्। निपातयेत्प्रयत्नेन किलाटीभपदार्थतः ॥ ८२ ॥ पीताश्वध्नसुमाकारप्रणाल्यां सारकं दलम्। विन्यस्य चेदं रजतं क्षालयेद्विमलाम्भसा ॥ ८३ ॥ जलं सारकपत्रान्तर्निर्यातं तलपात्रगम्। परीक्षेत प्रयत्नेन रसायनविधानवित् ॥ ८४ ॥ आदायैतज्जलं प्राज्ञः शरावे स्वल्पमात्रकम्। नृसारबाष्पसंयुक्तं द्रवं किञ्चिद्विनिक्षिपेत् ॥ ८५ ॥ नृसारबाष्पसंयुक्तं द्रवक्षेपेण चेदिदम्। जलं नीलत्वमायाति तदा धौतं तु रौप्यकम् ॥ ८६ ॥ सताम्रमधुनापीति व्यवस्येद्रसकोविदः । तारं प्रक्षालयेद्यावन्न जहाति हि नीलताम् ॥ ८७ ॥ ताम्रांशरहितं रौप्यं काचपात्रे ततो न्यसेत् । जलेनाप्लाव्य स्वल्पं तु लवणद्रावकं क्षिपेत् ॥ ८८ ॥ यशदस्य च पत्राणि स्वल्पानीह क्षिपेत्तथा। अल्पकालावसानेऽथ रौप्यं ताम्रादिवर्जितम् ॥ ८९ ॥ भस्मप्रभं काचपात्रतलगं जायते ध्रुवम्। ततः खलु व्यतिक्रान्ते सप्ताहे वा दिनाष्टके ॥ ९० ॥ रौप्यं रक्षन् जलीयांशं प्रयत्नेनापसारयेत् । ततः सारकपत्रेण रौप्यं भस्मप्रभं पुनः ॥ ९१ ॥ वार्षिकेणाम्भसा विज्ञः क्षालयेदविलम्बितम् । ततः सारकपत्रान्तर्निर्यातं सलिलं पुनः ॥ ९२ ॥ प्रयत्नेन परीक्षेत रसायनविशारदः । आदायैतज्जलं स्वल्पं काचपात्रे तु विन्यसेत् ॥ ९३ ॥ नृसारबाष्पसंयुक्तं जलं किञ्चिद्विनिक्षिपेत् । नृसारबाष्पसंयुक्तजलक्षेपेण चेदिदम् ॥ ९४ ॥ जलं शुक्लत्वमायाति तदा तारन्तु निश्चितम् । सद्रावमधुनापीति व्यवस्येद्रसकोविदः ॥ ९५ ॥
१६ षोडशस्तरङ्गः ४०१ तावत्प्रक्षालयेद्यावत्तन्न त्यजति शुक्लताम् । द्रावकां शोज्झितं तारं ततः काचशरावके ॥६६॥ न्यस्याथ सोरकद्रावं दत्त्वा सन्द्रावयेत्सुधीः । ततः सुराप्रदीपाग्नौ पचेद्यत्नेन कोविदः ॥६७॥ यथा नोत्प्लवते तोयं तथा संशोषयेद् द्रवम् । क्षीणे जले भवेच्छुक्ल शलाकाकारचूर्णकम् ॥६८॥ सोरकाम्लीयरजतमेतदुक्तं भिषग्वरैः । ततो निधापयेन्नीलकाचकुप्यां विधानवित् ॥६९॥ इदं विनिहितं शुक्लकाचकुप्यामिनांशुभिः । स्पृष्टं कृष्णत्वमायाति तस्मात्संरक्षयेत्तथा ॥१००॥ अथ नवीनपरिभाषितः सोरकाम्लीयरजतनिर्माणप्रकारः-पीताश्वघ्नसुमं पीत- वर्णकरवीरपुष्पम् , तदाकारायां काचप्रणाल्याम् 'Funnel' इत्याङ्ग्लभाषा- प्रसिद्धायाम् । सारकं दलं "Filter Paper" इति प्रसिद्धम् । सूत्रीबन्ध्यानीत्या- रम्य तन्न त्यजति शुक्लतामिति पर्यन्तं रजतशोधनम् । ततः प्रक्षालनाद्विशुद्धस्य सोरकद्रावकक्षेपपूर्वकं सुराप्रदीपे पाकः, ततः शलाकाकारचूर्णतेति क्रमोऽनु- सन्धेयः । इनांशुभिः सूर्यकिरणैः व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ७७-१०० ॥ भा.टी.-एक काँच के पात्र में चाँदी के पत्रों का बुरादा डाल दें । अब इस रजतपत्रचूर्ण युक्त काँच पात्र में थोड़ा-थोड़ा करके शुद्ध सोरकाम्ल (Nitric acid ) डालें जब तक कि सम्पूर्ण रजतचूर्ण इसमें घुल न जाय सोरकाम्ल डालते समय पात्र में से सफेदवर्ण का अत्यन्त तेज धुँआँ निकलता है । अतः सोरकाम्ल डालते समय अपने मुख को धुएँ से बचाकर दूसरी तरफ फेर लेना चाहिये । जब सम्पूर्ण रजत घुल जाय तो उस द्रव को देखें यदि रजत में कुछ ताँबा मिला होगा तो वह द्रव नीले वर्ण का होगा; अन्यथा शुद्ध रजत होने पर श्वेतवर्ण का होगा । अब इस द्रव में तीव्र (Strong) लवणद्राव धीरे-धीरे डालते रहें जब तक कि चाँदी गाढ़े छुने हुए दही के सदृश्य नीचे पात्रतल में बैठ न जाय । जब रजत का निक्षेप होना बन्द हो जाय तो लवणद्राव डालना बन्द कर दें । अब इस लवणद्रावयुक्त रजतकिलाट को उस पात्र में ही थोड़ी देर रहने दें । जब जलीयांश रजत के ऊपर आ जाय तो, पीले कनेर के फूलके आकार की एक काँच की नली (Funnel) में सारकपत्र (Filter Paper) रखकर इस द्रव का छानकर पृथक कर दें और रजत को स्वच्छ जल से धो
४०२ रसतरङ्गिणी डालें। अब इस सारकपत्र से छुने हुए द्रव की परीक्षा करे। इसकी परीक्षा के लिए पहिले एक सकोरे या काँच के पात्र में इस छुने हुए द्रव को लेकर उसमें थोड़ा-सा नौसादरवाष्पद्रव मिलायें। यदि नृसारवाष्पद्रव के योग से यह द्रव नीलवर्ण का हो जाय तो समझना चाहिये कि उक्त धौत (जल से धुला हुआ) रजत में अब भी कुछ ताँबे का अंश बाकी है। अतः उक्त रजत को तब तक जल से अच्छी तरह धोयें जब तक कि उसमें ताम्र का अंश न रह जाय। अब ताम्रांश रहित रजत को एक काँच के प्याले में डाल इसमें बहुत थोड़ा जस्ता (यशद) का चूर्ण डाल दें। और थोड़ी देर एकान्त में पड़ा रहने दें। इस तरह थोड़ी देर में रजत ताम्रादि धातुओं से रहित होकर काँचपात्र के तल प्रदेश में राख की तरह पड़ा हुआ मिलेगा; परन्तु इस रजतयुक्त पात्र को सात या आठ दिन तक इसी तरह रखे रहें। अब आठवें या नौवें दिन सारकपत्र से जल को छान कर पृथक् कर दें और राख के सदृश दिखाई देनेवाली चाँदी को उसी समय वर्षा जल अथवा प्रमृत जल से अच्छी तरह धो डालें। अब फिर भी सारकपत्र द्वारा छुने हुए जल की पुनः परीक्षा करें। परीक्षा के लिए इस जल को एक काँचपात्र में लेकर उसमें थोड़ा-सा नृसारवाष्पसंयुक्त जल डालकर देखें, यदि वह जल अब भी श्वेतवर्ण का हो तो चाँदी में एसिड का अंश समझकर उसे पुनः तब तक धोयें जब तक कि धोया हुआ जल परीक्षा में सफेद न निकले। अब एसिड अंश रहित रजत को एक काँच के प्याले में डालकर उसमें फिर सोरकाद्राव डालें और चाँदी को घोल लें। अब घुली हुई चाँदी को काँचपात्र में रख कर सुराप्रदीप की अग्नि पर पकायें, परन्तु इतनी तीव्र अग्नि न दें जिससे द्रव खौलने लगे। मन्द-मन्द रूप से पकाते हुए जब जलीयांश सूख जाय तो पात्र को नीचे उतार लें। इस विधि से शलाकाकार (लंबे पतले) चूर्ण के रूप में सोरकाम्लीय रजत (Silver Nitrate) प्राप्त होता है। अब इस सोरकाम्लीय रजत को एक नीलवर्ण की काँच की शीशी में अच्छी तरह डाट लगा कर रख लें। इसको श्वेत काँच की शीशी में रखने अथवा खुली रखने से सूर्यकिरणों के स्पर्श से यह काला पड़ जाता है। अतः इसे सदा सूर्य- किरणों के स्पर्श से बचा कर रखना उचित है ॥७६-१००॥ प्रसन्नान्नवसादरवाष्पद्रवस्य निर्माणप्रकारः सुदग्धं चूर्णपाषाणं वारि निर्वापितं भृशम् । द्विभागिक शुष्कचूर्णं भागिक नवसादरम् ॥ १०१ ॥
षोडशस्तरङ्गः ४०३ चूर्णीकृतं प्रयत्नेन काचकूप्यां तु विन्यसेत् । त्रिपादिकायां विन्यस्य कूपीं कूपीमुखे ततः ॥१०२॥ मेलयेत्काचनलिकामुखमेकं प्रयत्नतः । अपरं च मुखं त्वस्या विन्यसेज्जलपूरिते ॥१०३॥ अन्यस्मिन्काचकूपे तु तोयमज्जनपूर्वकम् । ततस्त्रिपादिकाधस्तात्सुरादीपं प्रदीपयेत् ॥१०४॥ रसायनविधानज्ञस्तावन्मन्दाग्निना पचेत् । नृसारबाष्पं द्रवतां याति यावज्जले भृशम् ॥१०५॥ संजायते स्वच्छजलप्रकाशो द्रवः सुतीव्रः खलु चातिरम्यः । समीरितोऽयं भिषजां वरेण्यैर्नृसारबाष्पद्रवनामधेयः ॥१०६॥ प्रसङ्गान्नवसादरबाष्पद्रवस्य निर्माणप्रकारः—वारा जलेन । स्पष्टप्रायमन्यत् । काचनलिकामुखमन्यस्यां जलपूर्णायां काचकूप्यां जलनिमग्नं विधेयम् । एवं सति बाष्पं जललीनमेव भवतीति । सुतीव्रः आघ्राणादिना परिचेयः । अतिरम्यः स्वच्छत्वात् ॥१०१-१०६॥ भा. टी.—अच्छे चूने के पत्थर को आग में खूब पकाकर जब वह पककर फटने लगे तो उसे जल में बुझा दें और इसका चूर्ण खुश्क करके दो भाग ले लें । अब इस चूने के चूर्ण में एक भाग नौसादर का सूक्ष्म चूर्ण मिला एक काँच की शीशी में भर दें । अब इस शीशी को त्रिपादिका पर रखकर इस शीशी के मुख में एक काचनल्लिका का मुख अच्छी तरह जोड़ दें । इस नली के दूसरे मुख को एक दूसरी जल से भरी हुई और जल में ही रखी हुई काँच की शीशी के मुख से अच्छी तरह जोड़ दें । अब त्रिपादिका के नीचे सुराप्रदीप जलाकर मन्द-मन्द अग्नि जलायें, जिससे नौसादर की वाष्प उड़कर दूसरी कूपी के जल में मिल जाय । इस प्रकार नौसादर बाष्प उड़कर प्राप्त होनेवाला द्रव स्वच्छजल के सदृश सुन्दर और सूँघने में तीव्र होता है । इसी को वैद्य लोग नृसारवाष्पद्रव नाम से कहते हैं ॥१०१-१०६॥ नवसादरबाष्पद्रवस्य गुणाः नवसादरबाष्पोत्थद्रवोऽयमतिशोभनः । वरटीवृश्चिकादीनां विशेषाद्विषनाशनः ॥१०७॥ संमेल्य प्रचुरं तोयं रसायनपरीक्षणे । द्रवोऽयं विनियोक्तव्यो रसायनविशारदैः ॥१०८॥
४०४ रसतरङ्गिणी भा. टी.—उक्त प्रकार से प्राप्त नवसादरवाष्पद्रव बाह्यलेप से ततय्या, बर्रें, हड्डा (बिरनी), बिच्छू आदि के विष को नाश करता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में जल मिलाकर रख लें। इसके द्वारा रसायन परीक्षा अर्थात् शुद्ध अशुद्ध धातुओं की परीक्षा में अत्यन्त सुभीता रहता है। इसको अँग्रेजी में Liq. Ammonia कहते हैं ॥१०७-१०८॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सजलोऽयं द्रवो युक्त्या भृशमाघ्रापितो द्रुतम् । विनाशयति मूर्च्छायां तत्तदुत्थानसम्भवम् ॥१०६॥ अथैतस्य गुणाः प्रयोगप्रकारश्च व्याख्यासमपाठः। मूर्छामित्युपलक्षणम् । कफजातां शिरोव्यथामपीति सोऽयममोनियाद्रव (Liq. Ammonia) इति नाम्ना नवीनैर्व्यवहृत इति ॥१०६॥ भा. टी.—उक्त नवसादरवाष्पद्रव में मिलाकर सुँघाने से अनेक कारणों से उत्पन्न होनेवाली मूर्च्छा, शिरोव्यथा, शिर का भारीपन आदि दूर होकर रोगी को होश आ जाती है ॥१०६॥ वक्तव्य—अमोनिया जल जिस स्थान पर मला जाता है वह लाल हो जाता है अर्थात् उस स्थान पर अधिक रक्त आ जाता है जिससे उसके नीचे होनेवाले शोथ-शूल में आराम आ जाता है। अमोनियाद्रव अथवा अमोनिया- द्रवकार्बोनित (Ammonia carbonate) सुँघाने से नासा की अंतःकला वेग से क्षुब्ध होती है और श्वास की वातनाड़ियाँ भी सहसा क्षुब्ध हो जाती हैं, जिससे शरीर के सारे नाड़ीमण्डल में एक क्षणिक उत्तेजना आ जाती है। यदि ऐसी अवस्था में रोगी अचेत हो तो चेतना हो जाती है। आमाशय में पहुँचकर अमोनिया या अमोनिया कार्बोनित् आदि आमाशय की वातनाड़ियों को सहसा उत्तेजित करते हैं। इनकी सहसा उत्तेजना से सारे शरीर की वातनाड़ियाँ उत्तेजित हो जाती हैं और रोगी को कुछ बल मालूम होता है। अमोनिया आमाशय के लिये उद्दीपक तथा उत्तेजक होने के कारण इसके योग अग्निदीपक होते हैं। अमोनिया सर्वांग उत्तेजक है, अतः श्वाससंस्थान के लिये उत्तेजक है। अतः श्वास में इसका शीघ्र और उत्तम प्रभाव होता है। निष्क्रमण—अमानिया शरीर से श्वास, श्लेष्मा और मूत्र के द्वारा बाहर निकलता है, अतः उक्त स्थान के रोगों पर इसका मुख्य रूप से प्रभाव होता है।
षोडशस्तरङ्गः ४०५ सन्धियों की गहरी शोथ और शूल में, सन्धियों पर, कास, श्वास, ज्वर में श्वासनलियों और फेफड़ों की शोथ को हटाने के लिये छाती के आगे पीछे अमोनिया के लेप मले जाते हैं। श्वास, कास, कासज्वर में श्वासनलियों में सञ्चित कफ को निकालने के लिये अमोनियाकार्बोनित दिया जाता है। अथ सोरकाम्लीयरजतस्य गुणाः सोरकाम्लीयरजतं द्रवशक्तिप्रभेदतः । अभिष्यन्दहरं कामं पोथक्यादिविकारनुत् । ११०॥ विसर्पस्फोटशमनं व्रणमेहक्षतापहम् । तथैव च समाख्यातं श्वेतप्रदरनाशनम् ॥१११॥ सोरकाम्लीयरजतगुणा—बाह्यप्रयोगतः - पोथक्यादिविकारनुत् । पोथकी— “स्राविण्यः कण्डुरा गुर्व्यो रक्तसर्षपसन्निभाः । रुजावत्यश्च पिडकाः पोथक्य इति कीर्तिताः ॥” इत्युक्तलक्षणो नेत्रवर्त्मरोगविशेषः, लोके प्रायः 'कुकुरे' शब्दवाच्यः, “Trachoma” इत्यांग्लभाषायाम् ॥११०, १११॥ भा. टी.—सोरकाम्लीयरजत (Silver Nitrate) विभिन्न प्रतिशतक शक्ति के हिसाब से एक प्रतिशतक दो-प्रतिशतकादि शक्ति भेद से अभिष्यन्द (नेत्र दुखना) रोग तथा पोथकी (कुकुरे Trachoma) आदि विकारनाशक होता है। वीसर्पस्फोटशामक, व्रणमेह (सुजाक) तथा क्षतनाशक है। इसी तरह इसका प्रयोग श्वेतप्रदर के लिये भी किया जाता है ॥११०, १११॥ वक्तव्य—सोरकाम्लीयरजत शारीरिक अवयवों पर लगाने से दाहक और ग्राही है। यह जिस स्थान पर लगाया जाता है उसके स्रावों को भी हटा देता है और साथ ही जीवाणुहर भी है। अन्त:प्रयोग में रजतभस्म के समान ही वातनाड़ियों के लिए बल्य है। बहि:प्रयोग में पुराने और कठोर व्रणों के वात- नाड़ियों के लिए बल्य है। बहिःप्रयोग में पुराने और कठोर व्रणों के अङ्कुरों को जलाने के लिए एक औंस शुद्ध जल में ३० या ६० ग्रेन की शक्ति का द्राव लगाया जाता है। पिडिकान्नों तथा वीसर्प की शोथ के चारों तरफ एक औंस (२॥ तोला) जल में एक से दो ड्राम की शक्ति का द्राव लगाने से शोथ या पिडिकाएँ आगे नहीं बढ़ने पाती हैं। इसी तरह पामा-शोथ के चारों तरफ एक औंस जल में ४ या १० ग्रेन (पाँच रत्ती) की शक्ति के द्राव लगाये जाते हैं। मुखव्रण तथा गले में शोथ होने पर एक औंस जल में १० से २० ग्रेन की
४०६ रसतरङ्गिणी शक्ति का द्राव लगाने से शोथ शान्त हो जाता है। जब प्रवाहिका रोग में गुदा तथा बड़ी आँत का अन्तिम भाग भीतर से शोथयुक्त हो जाता है तो उसके लिये एक औंस जल में ३ ग्रेन की शक्ति के द्राव की दो चार औंस की गुदबस्ति दी जाती है। इस बस्ति के जल में चावलों का मैदा भी मिला देते हैं। व्रणमेह में मूत्रमार्ग की शोथ को हटाने के लिए एक औंस जल में या दो ग्रेन की शक्ति के द्राव की एक या दो औंस मात्रा में उत्तरबस्ति के रूप में दिया जाता है। सोरकाम्लीयरजतद्रवस्य निर्माणप्रकारः परिस्रुतं तु सलिलं हरेत्सार्द्धपलद्वयम् । विमले काचचषके विन्यसेद्रसकोविदः ॥११२॥ सोरकाम्लीयरजतं गुञ्जाष्टकमितं क्षिपेत् । द्रवीभूतं ततो नीलकाचकुप्यां निधापयेत् ॥११३॥ सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं भाषितो बुधैः । विशेषतो ह्यभिष्यन्दपोथक्याद्यक्षिरोगनुत् ॥११४॥ सोरकाम्लीयरजतद्रवस्य त्रिविधस्य निर्माणप्रकारः त्रिविधरोगप्रयोगयोग्य- प्रकारभेदभिन्नमात्रश्चेति । बिन्दुक्षेपकयन्त्रं "Dropper" इति । नीलकाच- कुप्यान्तु सर्वस्यापि निधानं भेषजरक्षार्थमेवेति ॥११२-११४॥ भा. टी.—सोरकाम्लीय रजतद्रव बनाने के लिये वैद्य को चाहिये कि एक काँच के प्याले में ढाई पल शुद्ध परिस्रुत जल डालकर उसमें आठ रत्ती परि- माण सोरकाम्लीयरजत भी डाल दें। जब यह अच्छी तरह घुल जाय तो इस द्रव को एक काँच की नीली शीशी में भरकर रख लें। इसी को सोरकाम्लीय- रजतद्रव कहते हैं। यह द्रव विशेष रूप से अभिष्यन्द पोथकी आदि नेत्ररोगों के लिये लाभदायक होता है ॥११२-११४॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सोरकाम्लीयरजतद्रवस्यास्य निरन्तरम् । अक्ष्णोः सुविस्फारितयोर्नरस्योत्तानशायिनः ॥११५॥ बिन्दुक्षेपकयन्त्रेण द्वित्रिबिन्दुप्रयोगतः । पोथक्यभिष्यन्दभवां बाधां शीघ्रं प्रशाम्यति ॥११६॥ भा.टी.—पोथकी और आभिष्यन्द रोग में जब इसका प्रयोग करना होतो रोगी मनुष्य को सीधा लिटाकर उसके नेत्रपलक को अच्छी तरह खोलकर उनमें
षोडशस्तरङ्गः ४०७ बिन्दुक्षेपक यन्त्र (Dropper) से दो अथवा तीन बिन्दु डालने से शीघ्र ही अभिष्यन्द और पोथकीरोग का कष्ट मिट जाता है ॥ ११५, ११६ ॥ द्वितीयः सोरकाम्लीयरजतद्रवः सोरकाम्लीयरजतं द्वात्रिंशद्गुञ्जसंमितम् । सार्द्धद्वितोलकमिते परिस्रुतजले क्षिपेत् ॥ ११७ ॥ विज्ञाय विद्रुतं नीलकाचकुप्यां न्यसेद् द्रुतम् । सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं स्फोटकादिनुत् ॥११८॥ भा.टी.—बत्तीस रत्ती सोरकाम्लीयरजत को एक शुद्ध काँच के प्याले में डालकर उसमें ढाई तोला शुद्ध परिस्रुतजल मिला दें । जब यह अच्छी तरह घुल जाय तो इसे एक नीली काँच की शीशी में भरकर रख लें । यह सोरका- म्लीयरजतद्रव पिडिका आदि की शोथ को शान्त करता है ॥ ११७, ११८ ॥ अस्य प्रयोगविधिः विसर्पशोथं परितो द्रवोऽयं खलु लेपितः । विनिहन्त्यचिरादेव विसर्पस्य विसर्पिताम् ॥ ११९ ॥ अनेनैव प्रकारेण विस्फोटश्वयथौ भृशम् । लिप्तो द्रवोऽयं हन्त्याशु विस्फोटस्य विसर्पिताम् ॥१२०॥ भा.टी. - उक्त द्वितीय प्रकार के सोरकाम्लीय रजतद्रव को विसर्पशोथ के चारों तरफ लेप करने ( लगाने ) से वीसर्प का फैलना शीघ्र ही बन्द हो जाता है । इसी तरह विस्फोटशोथ के चारों तरफ इसके लगाने से उसका बढ़ना भी बन्द हो जाता है ॥ ११९-१२० ॥ तृतीयः सोरकाम्लीयरजतद्रवः परिस्रुते तु सलिले पञ्चतोलकसम्मिते । सोरकाम्लीयरजतं गुञ्जैकं वा तदर्धकम् ॥१२१॥ क्षिप्त्वाथ विद्रुतं नीलकाचकुप्यां तु विन्यसेत् । सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं प्रदरादिनुत् ॥१२२॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में पाँच तोला शुद्ध परिस्रुतजल डालकर उसमें एक अथवा आधी रत्ती मात्रा में सोरकाम्लीयरजत मिला दें । जब वह अच्छी तरह घुल जाय तो इस द्रव को एक नीली काँच की शीशी में भरकर रख लें । यह द्रव प्रदर आदि रोगों में बहिःप्रयोग में व्यवहृत होता है ॥१२१, १२२॥
४०८ रसतरङ्गिणी अस्य प्रयोगविधिः उत्तराह्वयवस्त्युक्तरीत्या युक्तस्स्वयं द्रवः। निहन्ति व्रणमेहञ्च श्वेतप्रदरजां रुजम् ॥१२३॥ इति रजतविज्ञानीयो नाम षोडशस्तरङ्गः भा.टी.-उक्त तृतीय प्रकार का सोरकाम्लीय रजतद्रव उत्तरवस्ति की विधि से प्रयोग करने पर व्रणमेह तथा श्वेतप्रदर रोग में लाभ पहुँचाता है ॥१२३॥ यह रजतविज्ञानीयनाम षोडशतरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ ताम्रविज्ञानीयः सप्तदशस्तरङ्गः ताम्रस्य नामानि ताम्रं शुल्वं रक्तकं म्लेच्छवक्त्रं नेपालीय व्यम्बकं सूर्यलोहम् । त्वाष्ट्रं त्वर्कं सूर्यपर्यायसंज्ञं द्विष्ठं द्वयष्ठं त्वम्बकं कीर्तितं तत् ॥१॥ उदुम्बरञ्चारविन्दं सूर्याङ्गं लोहितायसम् । रविप्रियं भास्करं च ताम्रकं च प्रकीर्तितम् ॥२॥ ताम्रनामानि यावदुपलब्धग्रन्थव्यवहृतानि ॥१, २॥ भा.टी.—ताम्र, शुल्व, रक्तक, म्लेच्छवक्त्र, नेपालीय, त्र्यम्बक, सूर्यलोह, त्वाष्ट्र, अर्क, सूर्य के नामवाला अर्थात् भानु, रवि, उष्णांशु, सहस्रांशु आदि द्विष्ठ, द्वयष्ठ, अम्बक, उदुम्बर, अरविन्द, सूर्याङ्ग, लोहितायस, रविप्रिय, भास्कर तथा ताम्रक, ये सब नाम ताँबे के कहे जाते हैं ॥१, २॥ वक्तव्य—ताम्रधातु प्रकृति मे स्वतन्त्र रूप से मिलता है । परन्तु यह कहीं भी शुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं होता है, किन्तु सोमल, गन्धक, लौह, कज्जल और उष्मजन आदि से संयुक्तावस्था में पाया जाता है । इसी तरह भूनाग (केंचुआ), मयूरपिच्छ तथा त्रिफला आदि द्रव्यों में ताम्र पाया जाता है । इनसे सत्त्वपातनविधि से ताम्र को पृथक् किया जाता है। यह प्रकृति में स्वर्णमाक्षिक, तूतिया और सोमलिक स्वर्णमाक्षिक आदि रूप में हमें मिलता है । ग्राह्यताम्रस्य स्वरूपम् घनघातसहं सुचिक्कणं विमलञ्चाथ जपासुमप्रभम् । मृदु चैव सदाकरोद्भवं रविलोहं खलु कीर्तितं परम् ॥३॥ ग्राह्यताम्रं घनघातसहादिगुणं सदाकरोद्भवं इति योग्यतानिर्णायकं वचनम्, सदाकरजातं हि उक्तगुणं भवतीति ॥३॥
सप्तदशस्तरङ्गः ४०६ भा.टी.-जो ताँबा हथौड़े की चोट से फटता न हो किन्तु चपटा हो जाता हो, देखने तथा स्पर्श करने में चिकना, साफ और अड़हुल फूल के सदृश लाल रंग का और कोमल हो तो समझना चाहिये यह अच्छी खान का उत्तम ताम्र है॥३॥ प्रकारान्तरेण जात्यताम्रस्य स्वरूपम् स्निग्धं मृदु घनं स्वच्छं जपाकुसुमप्रभम् । लोहनागादिरहितं जात्यं ताम्रं प्रकीर्तितम् ॥४॥ प्रकारान्तरेण निर्देशः स्फुटार्थः । स्वच्छं निर्मलम् ॥४॥ भा.टी.-चिकना, मृदु, कठोर, साफ देवीपुष्प की तरह और लौह सीस इत्यादि दोष से रहित ताम्र अच्छा होता है ॥ ४ ॥ त्याज्यताम्रस्य स्वरूपम् सदलं पाण्डुरञ्चैव कठिनं लघु भंगुरम् । समलं त्वरविन्दन्तु वर्जयेद्रसकर्मणि ॥५॥ घनघातासहं कृष्णं श्वेतं लाहादिसङ्गतम् । अतिस्तब्धञ्च रूक्षञ्च ताम्रं त्याज्यं निगद्यते ॥६॥ त्याज्यताम्रस्वरूपं निगदव्याख्यातम् । उक्तञ्च—"कृष्णं रूक्षमतिस्तब्धं श्वेतं चापि घनासहम् । लोहनागयुतं शुल्बं म्लेच्छं दुष्टं मृतौ त्यजेत् ।।" इति । अत्र च व्यस्तैः समस्तैरपि लक्षणैर्भवति त्याज्यमित्यवधेयम् ॥५, ६॥ भा.टी.—पत्रयुक्त, पाण्डुर (पीला सफेद लाल) वर्ण, बहुत कठिन (सख्त), लघुभार, शीघ्र टूटनेवाला, लोह आदि धातु मलयुक्त ताम्र को शोधन-मारण कार्य में नहीं लाना चाहिये । अथवा हथौड़े की चोट से फटनेवाला, कृष्णवर्ण या श्वेतवर्ण, लौहादि-धातु-मिश्रित तथा अत्यन्त कठोर ताम्र शोधनमारण-कार्य में नहीं लाना चाहिये ॥५, ६॥ ताम्रस्य द्वैविध्यम् नेपालं म्लेच्छकं चेति ताम्रं द्विविधमुच्यते । नेपालं जात्यमाख्यातं म्लेच्छकं त्ववरं स्मृतम् ॥७॥ एवञ्च ताम्रं नेपालं म्लेच्छकमिति द्विविधं प्राचीनैः देशभेदोत्पत्तिगुणरूप- विशेषादुक्तम् ॥७॥ भा.टी.-ताम्र के दो भेद होते हैं । १-नेपालताम्र, २-म्लेच्छताम्र । इनमें से नेपाल संज्ञक ताम्र जात्य ( उत्तम ) हौता है और म्लेच्छ संज्ञक ताम्र अधम ( निकम्मा ) होता है ॥७॥