भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

विंशस्तरङ्गः ४६५ पाचितं शोषितं वेदभागान्निमतं सेचनीयं त्वयः पञ्चभागोन्मितम् ॥ १६ ॥ अत्र परिभाषापानम्-त्रिफलायाः १६ भागाः, पाकार्थं जलम् १२८ भागि- कम्, चतुर्थांशशेषभागेन सेचनीयलोहम् ५ भागिकम् इत्युक्तम् । प्राञ्चोऽप्याहुः “वरा चतुर्गुणं लोहात् ततो वारि चतुर्गुणम् । दत्त्वा निष्क्वाथयेत्तावत् यावत् पादस्थितं भवेत् ॥” इति । “त्रिफलाष्टगुणे तोये त्रिफलाषोडशं पलम् । तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ कृत्वा पात्राणि तप्तानि सप्तवारं निषेचयेत् । एवं प्रलीयते दोषो गिरिजो लोहसम्भवः ॥” इति च ॥१६॥ भा.टी.—समभाग में लिये हुए हरड़ बहेड़ा और आँवलों का मिश्रित यव- कुटचूर्ण सोलह भाग लें । इसका कषाय बनाने के लिये एक सौ अट्ठाईस भाग जल लें । अब इसको पकाकर चतुर्थांश शेष अर्थात् बत्तीस भाग रखें । इस बत्तीस भाग अवशिष्ट कषाय में सेचन करने के लिये (गरम कर बुझाने के लिये) पाँच भाग लोहचूर्ण लेना चाहिये ॥१६॥ वक्तव्य—अन्यत्र भी इसी प्रकार क्वाथ, जल और निषेच्य (लोह) का परिमाण लिखा हुआ है—“त्रिफलाष्टगुणे तोये त्रिफलाषोडशं पलम् । तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ कृत्वा पत्राणि तप्तानि सप्तवारं निषेचयेत् ॥” लोहचूर्ण को गरम करके त्रिफलाकषाय में बुझाने के लिये प्रति वार नवीन क्वाथ काम में लाना चाहिए; न कि पहिली बार का बुझाया हुआ त्रिफलाकषाय काम में लाना चाहिए । प्रत्येक वार के लिए लोह समान भाग बनाया हुआ कषाय लेना चाहिये । द्वितीयः शोधनप्रकारः अतिसूक्ष्मरजस्त्वयसा ज्वलने परितप्तमलं मुनिवारमिह । कदलीनवमूलजले नियतं विमलत्वमुपैति निषेचनतः ॥ १७ ॥ अपरः प्रकारः—कदलीमूलजलेन सप्तधा सेचनात् सम्पाद्यः । उक्तं हि— “तप्तानि सर्वलोहानि कदलीमूलवारिणि । सप्तधामिनिषिक्तानि शुद्धिमायान्त्य- नुत्तमाम् ॥” इति ॥१७॥ भा.टी.—लोह के सूक्ष्मचूर्ण करछी में रख तीव्र अग्नि में गरम करके सात बार केले के नवीन कन्द के जल से बुझा देने से लोह की शुद्धि हो जाती है ॥१७॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वराकषायसंयुते समे गवान्तु मूत्रके । निषेचितं तु सप्तधा त्वयो विशुद्धिमाप्नुयात् ॥ १८ ॥

४६६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—लोह चूर्ण को करछी में रखकर अति तीव्र अग्नि में तपाकर समभाग त्रिफलाक्वाथ और गोमूत्र को एकत्र मिला उसमें सात बार बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥१८॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः शशासृजा प्रलेपितं त्वयोऽर्कदुग्धतोऽपि वा । वराजले निषेचनाद् विशुद्धिमेत्यनुत्तमाम् ॥ १६ ॥ चतुर्थः शशरुधिरेण लेपनादर्कदुग्धलेपनाद्वा साध्यः । एतच्च कान्तलोहस्य प्रायः । उक्तं हि—“शशरक्तेन संलिप्तं किम्बार्कपयसायसम् । दलं हुताशने तप्तं सिक्तं त्रैफलवारिणि ॥ त्रिंशः कान्तस्य संशुद्धिरित्येवं परमा भवेत्” इति । यद्वा “तप्तं क्षाराम्लसंयुक्तं शशरक्तेन भावितम् । कान्तलोहं भवेच्छुद्धं सर्वदोषवि- वर्जितम् ॥” इत्याहुः । अपि च “तत्तद्व्याध्युपयुक्तानामौषधानां जलेऽयसः । प्रक्षेपं प्राह तत्त्वज्ञः सिद्धो नागार्जुनः पुरा ॥” इति रसमाधवे ॥१६॥ भा.टी.—तीक्ष्णलौह के बारीक पत्रों को लेकर उन पर खरगोश के रक्त का अथवा अर्कदुग्ध का लेप करके सुखा लें । अब इन पत्रों को अग्नि में तपा- कर त्रिफलाक्वाथ में सात बार बुझा देने से लोह शुद्ध हो जाता है ॥१६॥ अथ लौहशुद्ध्यनन्तरं तत्पाकक्रमः प्रथमं भानुपाकेन स्थालीपाकात्ततः परम् । पुटपाकेन पक्वञ्च लौहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥ २० ॥ भा.टी.—लोहचूर्ण को शुद्ध करने पर पहिले उसका भानुपाक करना चाहिये । भानुपाक के बाद स्थालीपाक और इसके बाद लोह का पुटपाक करने से लोह उत्तम रूप से भस्म हो जाता है ॥२०॥ तत्रादौ भानुपाकलक्षणम् वराक्वाथयुतं लौहं भानोः प्रखरभानुभिः । शुष्यन् विपच्यते यस्माद् भानुपाकस्ततः स्मृतः ॥ २१ ॥ भा.टी.—त्रिफला के क्वाथ के साथ लौहचूर्ण को तीव्र धूप में सुखा लेते हैं, इसलिए इसे भानुपाक कहते हैं ॥२१॥ अथ भानुपाकविधानम् विमलं खलु लौहन्तु सलिलक्षालितं भिषक् । त्रिफलाक्वाथसंयुक्तं ततः खल्वे निधापयेत् ॥ २२ ॥ निदाघे तु निधायाथ भानोः प्रखरभानुभिः ।

३२ विंशस्तरङ्गः ४६७ शोषयेद्भिषजां वर्यः कुर्यादेवं तु सप्तधा ॥ २३ ॥ भानुपाके लौहतुल्या त्रिफला द्विगुणं जलम् । पादावशेषितक्वाथं वराक्वाथं प्रयोजयेत् ॥ २४ ॥ सोऽयं भानुपाकप्रक्रियाभेदो नागार्जुनादिसंमतः साम्प्रतमप्रचलितोऽपि गुणबहुलतयाऽऽदृत आचार्यैः ॥ २२-२४ ॥ भा.टी.—शुद्धलोहचूर्णं को लेकर पहिले उसे जल से अच्छी तरह धो लें। अब इस लोहचूर्णं में त्रिफलाकषाय मिलाकर किसी खरल में डालकर धूप में रख दें। जब त्रिफलाकषाय धूप से सूख जाय तो उसमें पुनः त्रिफलाकषाय डाल दें। इस विधि को सात बार दुहराने से लौह का भानुपाक हो जाता है। भानुपाक करने के लिये त्रिफलाकषाय बनाना हो तो लौह के समभाग त्रिफला लेकर उसमें द्विगुण जल डालकर पकायें, जब चतुर्थांश जल शेष रह जाय तो उसे छानकर लोह में डालकर धूप में रख दें ॥ २२–२४ ॥ स्थालीपाकस्य लक्षणम् त्रिफलाक्वथितोपेतं लौहं स्थाल्यां खराग्निना । शुष्यन् विपच्यते यस्मात् स्थालीपाकस्ततः स्मृतः ॥ २५ ॥ भा.टी.—लौहचूर्णं का उक्त विधान से सात बार भानुपाक करने पर उसे फिर त्रिफलाकषाय के साथ एक स्थाली (पतेली, लोहे की कड़ाही) में अतितीव्र अग्नि से पकाते हुए जल को सुखा लेने को स्थालीपाक कहा जाता है ॥२५॥ वक्तव्य—उक्त विधि से अच्छी तरह लौह का भानुपाक करके उसे जल से खूब अच्छी तरह धोकर साफ करलें। अब इस लोह को एक (लोहे के) पात्र में डालकर इसमें त्रिफलाक्वाथ मिलाकर चूल्हे पर अति तीव्र अग्नि से पकायें। जब त्रिफलाजल सूख जाय तो पुनः उसमें त्रिफलाजल डालकर पकायें। इस विधि से जितने त्रिफलाकषाय में उसे पकाना हो पका लें। स्थालीपाक करने के लिए त्रिफलाकषाय बनाना हो तो लोहचूर्णं से त्रिगुण त्रिफलाचूर्णं लें और इसमें त्रिफलाचूर्णं से सोलहगुना जल डालकर पकायें। जब आठवां भाग जल अवशेष रह जाय तो उसे उतारकर छान लें। इस क्वाथ में लोहचूर्णं डालकर स्थालीपाक करना चाहिए। स्थालीपाकविधानम् भानुपाकविपक्वन्तु लोहं प्रक्षालयेदलम् । ततः स्थाल्यां तु विन्यस्य चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ २६ ॥

४६८ रसतरङ्गिणी वराक्वाथेन सुपचेदतिवेलं खराग्निना । शोषयेत्सलिलं यत्नात् लौहकर्मविचक्षणः ॥ २७ ॥ स्थालीपाके त्रिगुणिता वरा, षोडशिकं जलम् । अष्टभागावशिष्टञ्च क्वाथमानं विधीयते ॥ २८ ॥ शतमूलीभृङ्गराजहस्तिकर्णशिफोत्थितैः । रसैः समैर्वापि भिषक् स्थालीपाकं समाचरेत् ॥ २९ ॥ यथादोषौषधेनापि स्वरसं वा कषायकम् । आदाय क्वाथमानज्ञः स्थालीपाकं समाचरेत ॥ ३० ॥ भा.टी.—त्रिफलाकषाय के अतिरिक्त लौहचूर्ण को शताबार, भृंगराज, हस्तिकर्ण, पलास की मूल के स्वरस लौहचूर्ण के बराबर भाग में लेकर इनके साथ भी स्यालोपाक किया जाता है। इसके अतिरिक्त जिस दोष, (वात, पित्त अथवा कफ ) को विशेष रूप से शान्त करने के अभिप्राय से लोहभस्म बनानी हो उस दोष की शामक औषधि के स्वरस अथवा कषाय के साथ भी लोह का स्थालीपाक किया जा सकता है ॥ २६–३० ॥ पुटपाकस्य स्वरूपम् रसादिभिर्भेषजानां खल्वे लौहं विमर्दितम् । पुटस्थं पच्यते यस्मात् पुटपाकस्ततः स्मृतः ॥ ३१ ॥ भा.टी.—स्थालीपाक करने के उपरान्त लोहचूर्ण को (लोहे के) खरल में डालकर उसमें विभिन्न औषधियों का स्वरस, कपाय मिलाकर खूब मर्दन करके सुखा लें और एक सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देने को पुटपाक विधान कहते हैं ॥ ३१ ॥ पुटपाकविधानम् स्थालीपाकविपक्वन्तु लोहं प्रक्षालयेत्ततः । यथादोषौषधोत्थेन रसेन क्वथितेन वा ॥ ३२ ॥ लोहखल्वे सुसम्पेष्य चक्रिकाः कारयेत्ततः । आतपे खलु संशोष्य मृच्छरावे तु विन्यसेत् ॥ ३३ ॥ शरावेण विधायथ दृढसन्धि प्रलेपयेत् । वनानीतैः करीषैर्वा ह्युत्पलैर्हस्तपिण्डदैः ॥ ३४ ॥ पुटेद् गजपुटेनेह पुटपाकक्रियापटुः । स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा सम्पुटन्तु समाहरेत् ॥ ३५ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४६६ पुनः पूर्ववदेवेह दत्त्वा क्वाथोदकं पुनः । सम्पेष्य सम्पुटे कृत्वा पुटेत्पुटविधानवित् ॥३६॥ सहस्रधाशथवा शतवारमथापि वा । षष्टिवारं पुटेद्वापि लौहं गुणविवृद्धये ॥३७॥ गुणोदयो भवत्येवं पुटनादुत्तरोत्तरम् । एवं पुटविपक्वन्तु लोहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥३८॥ पुटपाकविधानन्तु स्थालीपाकप्रक्रियोत्तरं सहस्रधा षष्टिधा वा सम्पाद- नीयम् । प्रतिपुटं गुणतारतम्यसम्पत्त्यै । उक्तं हि—"पुटाद्दोषविनाशः स्यात् पुटादेव गुणोदयः । म्रियते च पुटाल्लोहं पुटांस्तस्मात्समाचरेत् ॥” अपि च “यथा यथा प्रदीयन्ते पुटाश्च बहवोऽयसि । तथा तथा प्रवर्धन्ते गुणाः शतसहस्रशः” इति । तदेतदभिप्रेत्याह—यथा यथा पुटान्‍यत्र दीयन्ते सुविधानत इत्यादि ॥ ३२-३८ ॥ भा.टी.—स्थालीपाक विधि से पकाये हुए लोहचूर्ण को पहिले अच्छी तरह जल से धो लेवें । अब इस चूर्ण को खरल में डालकर तत्तद्-दोषहर औषधियों के स्वरस अथवा कषाय के साथ खूब घोंटकर टिकिया बना लें । इन टिकियाओं को धूप में सुखा एक हाँडी में भर हाँडी के मुख में एक मिट्टी के पात्र (शराव) का ढक्कन रखकर उसकी अच्छी तरह सन्धि लेप कर दें और सुखा लें । अब गजपुट में जंगली अथवा हाथ के बनाये हुए सूखे उपले भर उसके बीच में उक्त लोहचूर्ण की हाँडी को रख दें और अग्नि जलाकर पुटपाक करें । जब गजपुट स्वांगशीतल हो जाय तो उसमें से लोहचूर्ण की हाँडी को निकाल फिर उस चूर्ण को खरल में डालें और उस औषधि का कषाय या स्वरस मिलाकर पहिले की भाँति ही मर्दन कर टिकिया बना लें । अब इन टिकियाओं को एक शराव- सम्पुट में बन्द करके पुनः गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार भिन्न-भिन्न औष- धियों के स्वरस अथवा कषाय के साथ पीसकर लोह को एक हजार या एक सौ बार अथवा साठ बार गजपुट में फूँक देवें । इस तरह अनेक पुट देने से लौह- भस्म में अधिकाधिक गुणोदय होने लगता है अर्थात् साठ पुटों की अपेक्षा सौ पुटों में और सौ पुटों की अपेक्षा हजार पुट देने में उत्तरोत्तर गुणवृद्धि होती जाती है । इस विधि से पुटपक्व लोह अच्छी तरह भस्मे हो जाती है ॥३२–३८॥ वक्तव्य—लौहचूर्ण को सौ बार अथवा हजार बार औषधि कषाय या स्वरस से पीस कर सम्पुट देने से लोहचूर्ण में दो क्रियायें होती हैं । १–औषधियों

५०० रसतरङ्गिणी का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंग लोह के साथ मिश्रित होकर उसमें रासायनिक परिवर्तन करता है। २-हर बार औषधि के कषाय आदि में लोहचूर्ण को खूब मर्दन किया जाता है जिससे लोह सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में विभक्त होकर इस रूप में आ जाता है। उसे अन्तःप्रयोग करने में आमाशय आदि अंगों को आत्मसात् करने में देर नहीं लगती है और शीघ्र ही शरीर में लाभ होने लगता है । इसके अतिरिक्त लोहभस्म में औषधियों के क्षारीय भाग रह जाते हैं जो यकृत् तथा आँतों से स्राव अधिक उत्पन्न करते हैं और लोह के ग्राही प्रभाव को कम कर देते हैं । पुटपाके भेषजानां परिमाणम् पुटपाके वरादीन यथादोषौषधानि तु । लोहतुल्यानि गृह्णीयात् पुटपाककलापटुः ॥३६॥ यथा यथा पुटान्‍‍यत्र दीयन्ते सुविधानतः । भवेत्तथा तथावश्यमतिवेलं गुणोदयः ॥४०॥ न चैवं जनयत्येतल्लोहजं कोष्ठबद्धताम् । खरविट्कत्वमपि वा सुचिरं त्वस्य सेवनात् ॥४१॥ भा.टी.-पुटपाक के लिए काम में आनेवाली त्रिफला अथवा दोषानुसार विदार्यादिगण, किरातादिगण अथवा शट्यादिगण, दशमूल आदि औषधियाँ लोहचूर्ण के समभाग लेनी चाहिए । उक्त त्रिफला आदि औषधियों के साथ जितने अधिक पुट लोह को दिये जायेंगे उतना ही इसमें अधिक गुणोदय होता रहेगा । अधिक पुट देने से लोहभस्म में मलबन्ध करने का दोष भी बहुत ही कम रह जाता है । यदि उक्त विधि से अनेक पुट देकर लोहभस्म बनायी गयी हो तो उसे चिरकाल तक सेवन करने से भी सूखा पाखाना नहीं होने पाता है ॥ ३६-४१ ॥ लौहमारको गणः त्रिफला शतमूली च सिंहिका तालमूलिका । नीलोत्पलञ्च ह्रीवेरं दशमूलं पुनर्नवा ॥४२॥ वृद्धदारकमूलञ्च भृङ्गं विश्वं विडङ्गकम् । करञ्जशिग्रुनिर्गुण्डीमुस्तैरण्डमूलकम् ॥४३॥ हस्तिकर्णपलाशश्च पर्पटश्चन्दनं तथा । समाख्यातो गणोऽयन्तु लोहमारकसंज्ञकः ॥४४॥ भा.टी.—हरड़, बहेड़ा, आँवला, शतावर, अडूसा, मूसली, नीलकमल (निलोफर) सुगन्धबाला, दशमूल (बेल, अरलु, गाम्भारी, पाडल और अरणी

की छाल, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, छोटी कटैली, बड़ी कटैली और गोखरू) पुनर्नवा, विधारे की मूल, भांगरा, सोंठ, वायविडङ्ग, करञ्ज, सहजना, सम्भालू, तुलसी और एरण्डमूलत्वक्, हस्तिकर्णपलाश (बड़े चौड़े पत्तोंवाला ढाक), पित्तपापड़ा, चन्दन, इन औषधियों के समुदाय को लोहमारकगण कहा जाता है। अर्थात् इन औषधियों के योग से लोहभस्म अपेक्षाकृत शीघ्र और अधिक गुणकारी होती है ॥ ४२–४४ ॥ अथ वातहरो गणः एरण्डमूलं रास्नाथ दशमूलं प्रसारणी । मुद्गपर्णी माषपर्णी शतमूलो पुनर्नवा ॥ ४५ ॥ अश्वगन्धामृता मांसी बला नागबला तथा । गणो वातहरोऽयन्तु वातामयहरः परम् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—एरण्ड की त्वचा, रास्ना, दशमूल, प्रसारणी, माषपर्णी, शतावर, पुनर्नवा, असगन्ध, गिलोय, जटामांसी, बला (खरेटी), नागबला (सहदेई), इन औषधियों को वातहरगण के नाम से कहा जाता है। क्योंकि इनके सेवन से वायुप्रकोपजन्य रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ४५, ४६ ॥ पित्तनाशको गणः उशीरनीरसिंहिकाकिरातभूरिपुत्रिकाः । पटोलचन्दनामृतासरोजतालमूलिकाः ॥ ४७ ॥ सुतिक्तशाल्मलीशिखासितामहीरुहामयाः । गणस्तु पित्तनाशको ह्ययं तु पित्तरोगहृत् ॥ ४८ ॥ पित्तनाशकगणः नीरं बालकम्, भूरिपुत्रिका शतावरी, सुतिक्तः, पर्पटः, महीरुहामयो लाक्षा ॥ ४७, ४८ ॥ भा.टी. – खश, सुगन्धबाला, अडूसा, चिरायता, पटोलपत्र, चन्दन, गिलोय, नील कमल, मुसली, पित्तपापड़ा, सेमर की मूसली, मिश्री और लाख, ये औषधियाँ पित्त के रोगों को नष्ट करती हैं। अतः इन औषधियों के इस समुदाय को पित्तनाशकगण नाम से कहा गया है ॥ ४७, ४८ ॥ कफनाशको गणः रास्न मरिच चविका नागिनी विश्वभेषजम् । एरण्ड. पिप्पलीमूलं तुलसी शृङ्गवेरकम् ॥ ४६ ॥ भार्गी रञ्जाककुसुमं मूर्वा शिग्रु बिभीतकम् ।

५०२ रसतरङ्गिणी परं बलासगदजित् गणोऽय कफनाशकः ॥ ५० ॥ कफघ्नगणः—नागिनी ताम्बूलम् । बलासगदजित् कफरोगघ्न इत्यर्था । अत्र व्याधिभेदेन मारकभेषजभेदो लोहसर्वस्वादावनुसन्धेयो विस्तरभयान्न नोक्तः । त्रिफलापुटनन्तु सर्वत्र प्रशस्तमेवेति ॥ ४६, ५० ॥ भा.टी.—रास्ना, कालीमिर्च, चव्य, पान, सोंठ, एरण्डमूल, पिप्पलीमूल, तुलसी, अदरक, भारंगी, लाल आक के फूल, मूर्वा, संहजना की छाल, बहेड़ा, ये सब औषधियाँ कफप्रकोप को शान्त करती हैं, अतः इनको कफना- शकगण नाम से कहा गया है ॥ ४६-५० ॥ अथ लौहमारकगणे विशेषवक्तव्यम् तत्तद्रोगघ्नभैषज्यैस्तत्तद्रोगापनुत्तये । यथालाभं पुटेत्कामं प्राणाचार्यो विचक्षणः ॥ ५१ ॥ पुटितस्यायसोऽभावे तत्तद्रोगघ्नभेषजैः । त्रिफलापुटितं लोहं सर्वत्र विनियोजयेत् ॥५२॥ भा.टी.—लोहभस्म को जिस-जिस रोग को नष्ट करने के लिए, उपयुक्त भस्म बनाना हो, उस-उस रोग को नष्ट करनेवाली औषधियाँ जहाँ तक मिल सकती हों लेकर उनके साथ लोह भस्म को घोटकर पुटपाक करना चाहिए । यदि कहीं तत्तद्-रोगनाशक औषधियाँ न मिल सकें तो केवल त्रिफलाकषाय में सौ अथवा हजार पुट दी हुई लोहभस्म ही सर्वत्र काम में ला सकते हैं । ५१, ५२॥ अथ लौहस्य द्वितीयो मारणप्रकारः निर्मलं त्वायसं तत्समं हिंगुलं कन्यकावारिणा निर्भरं पेषयेत् । घर्मसंशोधितञ्चाथ चूर्णीकृतं वारणाख्ये पुते सम्पुटस्थं पुटेत् ॥५३॥ स्वांगशीते पुनः खाब्धिसंख्यांशकं हिंगुलं मेलयेत् त्रैफलेनाम्भसा । भृङ्गवाराशथवा पेषयेदायसं पूर्ववद्वै पुटेत् वृत्तसंचक्रिकम् ॥ ५४॥ इत्थमेवायसं खान्धिसंख्यैः पुटैर्निश्चितं जायके रक्तपद्मप्रभम् । तीक्ष्णं कान्तकञ्चापि लोहद्वयं यात्यवश्यं मृतिं त्वाशु चात्युत्तमाम् ५५॥ अपरः प्रकारः हिङ्गुलकन्यकावारिभ्यां निर्वाणीयः तत्र प्रथमं लोहसमानं दरदं परतश्च विंशांशकमिति कृत्वा चत्वारिंशत्पुटानि सन्ति देयानि । क्वचित्तु “प्रक्षिपेद् द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णकम् । मर्दयेत्कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत् ॥ एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लोहचूर्णमवाप्नुयात्” इत्युक्तम् । परमयं प्रकारो नाति समीचीनः ॥ ५३-५५

विंशस्तरङ्गः ५०३ भा.टी.—उक्त भानुपाक और स्थालीपाक युक्त स्वच्छ लोहचूर्ण को समभाग शुद्धहिंगुल के साथ घीकुआर के रस में अच्छी तरह घोटकर धूप में सुखाकर चूर्ण करके एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूंक देवें। स्वांगशीत होने पर सम्पुट में से लोहचूर्ण निकाल उसमें लोहचूर्ण से बीसवाँ भाग शुद्ध हिंगुल मिला त्रिफलाक्वाथ अथवा भांगरे के स्वरस के साथ खूब अच्छी तरह घोटें और इसकी टिकिया-सी बनाकर सुखा लें। अब इनको पूर्ववत् सम्पुट में रखकर फिर गजपुट में फूंक देवें। इस प्रकार बीसवाँ भाग हिंगुल के साथ चालीस गजपुट देने से अवश्य ही लाल कमल के समान रक्तवर्ण की लोहभस्म हो जाती है। इस विधि से तीक्ष्णलोह अथवा कान्तलोह की भस्म की जा सकती है ॥ ५३-५५ ॥ वक्तव्य—कहीं पर बारहवां भाग हिंगुल डाल सात पुट देने से लोहभस्म बनाने को लिखा है। परन्तु इतने अल्प पुटों से लोहभस्म में उत्तम गुणोदय न होने से चालीस पुट देना ही अच्छा है। तृतीयो मारणप्रकारः [ गीतिका ] विमलीकृतन्तु लौहं खलु सेटकेकमानम् । विनिधाय खल्वमध्ये सममिङ्गुलीयचूर्णम् ॥ ५६ ॥ अथ निम्बूकोत्थवारा खलु पेषयेद् द्विघस्रम् । अथ पिष्टतां प्रयातं कृतचक्रिकञ्च लौहम् ॥ ५७ ॥ परिशोषयेन्निदाघे रसतन्त्रक्रमविज्ञः । विधिना त्रिवारमेवं पुटयेत्तु सम्पुटस्थम् ॥ ५८ ॥ अथ निम्बूकोत्थवारा खलु केवलेन पिष्टम् । पुटयेत्तु तावदेवं समुपैति पद्मकान्तिम् ॥ ५६ ॥ अचिरेण लौहमेवं मृतिमेति निर्विशेषम् । एवं मृतन्तु लौहं युञ्जीत निर्विशङ्कः ॥ ६० ॥ भा.टी.—एक सेर परिमाण में शुद्ध लोहचूर्ण लेकर उसको खरल में डालें और उसमें लोहचूर्ण के बराबर भाग शुद्ध हिंगुलचूर्ण भी डाल दें। अब इनको नींबू के स्वरस से दो दिन तक अच्छी तरह मर्दन करें। जब इसकी पीठी-सी बन जाय तो इसकी टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब इन लोह टिकियाओं को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूंक देवें। इस प्रकार तीन गजपुट देवें।

५०४ रसतरङ्गिणी इसके बाद केवल नींबू के रस से उक्त लोहभस्म को टिकिया बना गजपुट में तब तक पुट देते रहें जब तक कि वह उत्तम कमलपत्रवत् लालवर्ण की न हो जाय । इस तरह कुछ ही पुटों में लोह की उत्तम भस्म बन जाती है ॥ ५६-६० ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विमलं लौहचूर्णन्तु निम्बूकोत्थेन वारिणा । भृशं सम्पेष्य यत्नेन चक्रिकाः कारयेत्ततः ॥ ६१ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटेन तु । पञ्चाशद्भिः पुटैरेवं लौहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥ ६२ ॥ भस्म सञ्जायते चैवं रक्तोत्पलसमप्रभम् । एवं मृतं त्वायसन्तु सर्वत्र विनियोजयेत् ॥ ६३ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्धलोहचूर्ण को खरल में डाल नींबूरस के साथ दृढ़ मर्दन करके उसकी टिकियाएँ बना लें। अब इनको धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार पचास पुट देने से लोह की उत्तम भस्म बन जाती है। यह भस्म देखने में लाल कमल के सदृश वर्णवाली होती है। इसको सर्व कार्य में प्रयोग कर सकते हैं ॥ ६१-६३ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः [ गीतिका ] विमलन्तु लौहचूर्णं खलु सेटैकमानकम् । खरलोहखल्वमध्ये निदधीत वैद्यवर्यः ॥ ६४ ॥ अथ लौहभानतुल्यां दत्त्वा शिलां विशुद्धाम् । शालिञ्च मूलसलिलैः परिपेषयेन्त्रिकामम् ॥ ६५ ॥ प्रविधाय शुष्कचूर्णं त्वथ वै पुटेद् गजाख्ये । पुटयेत् मृच्छ्ररावद्वयमध्यगं ततोऽग्नौ ॥ ६६ ॥ समशुद्धनागजिह्वायुतमायसं त्रिधैवम् । पुटितं ततः प्रयाति त्वरितसूक्ष्मचूर्णभावम् ॥ ६७ ॥ परिपेष्य चाथ यत्नाद् विदधीत वस्त्रपूतम् । स्थूलावशिष्टलौहंशिलया पुनः पुटेद्वै ॥ ६८ ॥ त्रिफलार्द्रकाग्निभृङ्गद्वयहस्तिकर्णाकानाम् । कुलिशस्य सूरणस्य स्वरसेन चाग्निमुख्याः ॥ ६६ ॥

विंशस्तरङ्गः ५०५ स्वरसैः पुनर्नवायाः पुटयेच्च भूरिवारम् । पुटितन्तु लोहमेवं मृतिमेति निर्विशेषांम् ॥ ७० ॥ विधिना त्वनेन यत्नाद् विहिता तु लौहभूतिः । गुदाजामयप्रणुत्यै कथिता त्वतिप्रशस्ता ॥ ७१ ॥ पञ्चमः प्रकारः—नागजिह्वः मनःशिला, कुलिशः स्नुही, अग्निमुखो भल्ला- तकः । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ६४-७१ ॥ भा.टी.—एक सेर विशुद्ध चूर्ण को लोहे के खरल में डालकर उसमें लोहचूर्ण के बराबर भाग शुद्ध मैनसिल मिला दें । अब इसको शालिमूलस्व- रस से अच्छी तरह रगड़ कर शुष्क चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार समभाग मैनसिल मिलाकर तीन गजपुट देने से लोहका अतिसूक्ष्म चूर्ण हो जाता है । इस चूर्ण को खरल में अच्छी तरह पीस कर कपड़े से छान लें । छानने में जो लोहचूर्ण के मोटे कण रह जायें उनको फिर समभाग शुद्ध मैनसिल से घोटकर गजपुट में फूँककर कपड़छान करके सूक्ष्म चूर्ण बना लें । अब इस कपड़छान किये हुए लोहचूर्ण को त्रिफ- लाक्वाथ, अदरखरस, चित्रकक्वाथ, भांगरास्वरस, हस्तिकर्णपलाशस्वरस, थूहर दुग्ध, जिमिकन्दस्वरस, भल्लातकस्वरस (क्वाथ) तथा पुर्ननवा के स्वरस में पृथक्-पृथक् घोटकर अनेक बार पुट देवें । इस प्रकार पुट देने से लोह की उत्तम भस्म हो जाती है । इस पञ्चम-प्रकारोक्त लोह-मारण विधि से बनायी हुई लोह- भस्म अर्शरोग को दूर करने के लिये विशेष गुणकारी मानी जाती है ॥६४-७१॥ षष्ठो मारणप्रकारः विमलं कान्तलोहं तु पलपञ्चकसंमितम् । पादिकं मृतमाक्षीकं दत्त्वा निम्बू कवारिणा ॥ ७२ ॥ सम्पेषयेत्प्रयत्नेन शुष्कचूर्णञ्च कारयेत् । सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटे ततः ॥ ७३ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा वस्त्रपूतञ्च कारयेत् । एवं पुटत्रयं दद्याद्रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ७४ ॥ माक्षिकञ्च प्रतिपुटमवश्यं दापयेत्ततः । स्थूलावशिष्टलोहञ्च पुटेदेवं प्रयत्नतः ॥ ७५ ॥ रक्तपित्तघ्नभैषज्यैर्यथालाभमथापि वा । धात्रीरसेन पुटयेद्यावन्मृतिमवाप्नुयात् ॥ ७६ ॥

५०६ रसतरङ्गिणी एतत्तु माक्षिकहतं कान्तलोहं भिषग्वरः । तत्तद्विशिष्टयोगेषु प्रयुञ्जीत विधानतः ॥ ७७ ॥ तत्तद्विशिष्टयोगेषु इति यत्र यत्राचार्यैर्लोहस्य माक्षिकहतस्य योग उक्तस्तत्र तत्रेति ॥ ७२-७७ ॥ भा.टी.- पाँच पल शुद्ध कान्तलोह लेकर खरल में डालें और इसमें सवा पल परिमाण स्वर्णमाक्षिकभस्म मिलाकर निम्बू के स्वरस से दृढ़ मर्दन करके सुखाकर चूर्ण कर लें । अब इस चूर्ण को शरावसम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । जब सम्पुट स्वांगशीत हो जाय तो लोह को निकाल पीसकर कपड़े में छानलें । पुनः चतुर्थांश स्वर्णमाक्षिकभस्म मिला निम्बूस्वरस से मर्दन कर गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ तीन गजपुट देवें । कपड़े से छानने से जो लौह के मोटे कण रह जायं उनको भी समभाग स्वर्णमाक्षिकभस्म के साथ पुनः पुट देकर भस्म कर लें । तीन पुट देने के बाद लोहभस्म में पूर्वोक्त पित्तनाशकगण की औषधियों का यथासम्भव स्वरस, कषाय से पृथक्-पृथक् पुट देवें अथवा केवल आमलों के स्वरस में घोटकर तब तक पुट देवें जब तक लोह की उत्तम भस्म न बन जाय । इस प्रकार स्वर्ण- माक्षिकभस्म-सहयोग से बनायी हुई लोहभस्म को तत्तद् विशेष योगों में विधा- नानुसार प्रयोग करें ॥ ७२-७७ ॥ सप्तमो मारणप्रकारः विशोधितं कान्तलोहं धात्रीस्वरसपेषितम् । पुटेद् गजपुटेनैव शतधा कृतचक्रिकम् ॥ ७८ ॥ शतधा पुटितं कान्तं यात्येवं मृतिमुत्तमाम् । रसायनं परमिदं तथायुष्करमुत्तमम् ॥ ७६ ॥ भा.टी. - उत्तम कान्तलोह को खरल में डाल आँवलों के स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके टिकियाँ बनाकर सुखा लें । अब इनको सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार आँवलों के स्वरस में घोटकर सौ बार गजपुट देने से कान्तलौह की उत्तम भस्म हो जाती है । इस प्रकार बनायी हुई कान्तलौहभस्म रसायनगुणसम्पन्न और उत्तम आयुवर्धक होती है ॥ ७८, ७६ ॥ अथ लौहनिरुत्थीकरणम् मृतं लौहं गव्यमाज्यं तथा शुद्धञ्च गन्धकम् ।

विंशस्तरङ्गः ५०७ दत्त्वा कन्याम्भसा पिष्ट्वा शुष्कचूर्णांश्च कारयेत् ॥ ८० ॥ सम्पुटेऽस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटे भृशम् । इत्थमेकपुटेनैव भवेल्लोहं निरुत्थितम् ॥ ८१ ॥ भा.टी.--उक्त विधियों में से किसी विधि द्वारा बनायी लोहभस्म में गोघृत और शुद्ध गन्धक समभाग मिला कन्यास्वरस से अच्छी तरह घोंटकर शुष्क चूर्ण बना लें । अब चूर्ण को एक शरावसम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार एक ही गजपुट देने से लोहभस्म निरुत्थित हो जाती है ॥८०, ८१॥ निरुत्थीकृतलौहस्य परीक्षणम् विविधांविहितं वै त्वायसं तीक्ष्णकान्तं घृतमधुपुरगुञ्जाटङ्कणक्षोदयुक्तम् । सुपुटितमनलस्थं चेन्नयत्यात्मभावं भवति सुमृतमेतत्सर्वयोगोपयुक्तम् ॥ ८२ ॥ भा.टी.-उक्त लौहमारण विधियों में से किसी विधि द्वारा बनायी लौह- भस्म ( तीक्ष्णभस्म या कान्तभस्म ) को घृत, मधु, गुग्गुलु, गुञ्जा ( रत्ती ) और टंकणचूर्ण में मिलाकर सम्पुट में बन्द कर पुट में फूँक देवें । यदि इस प्रकार मित्रपञ्चक के साथ पुट देने से वह ज्यों की त्यों भस्म रूप में ही बनी रहे तो समझना चाहिये कि यह लौहभस्म निरुत्थ है और सर्व योगों में काम आ सकती है । और यदि पुट देने पर लोहभस्म का लोहखण्ड या पिण्ड-सा बन जाय तो उसे अशुद्ध या अमृत लौहभस्म समझना चाहिये ॥ ८२ ॥ अथ मृतलौहस्य गुणाः लौहं रूक्षं सुमधुरमलं पाकतश्चाथ तिक्त. वीर्ये शीतं गुरु च तुवरं लेखनञ्चातिनेत्र्यम् । बल्यं वृष्यं जठरगदनुत् श्लेष्मपित्तामयघ्नं वय्यं मेध्यं खलु किमधिकं हन्ति नानामयौघम् ॥ ८३॥ मृतलौहगुणाः-रूक्षं रूक्षणोपयोगि मेदोहरत्वादित्यर्थः, सुमधुरं विपाके, तिक्तं तुवरं कषायमिति च रसे ॥ ८३ ॥ भा.टी.-लौहभस्म रूक्ष ( मेद और कफविकारों में चर्बी और कफ को खुश्क करनेवाली ) मधुर विपाक तिक्तकषाय रस है । वीर्य में शीत, गुणों में गुरु और लेखन होती है। यह नेत्रज्योति के लिये उत्तम, शारीरिक तथा उत्पादक अंगों के लिये बल्य, उदररोगनाशक, कफपित्तप्रकोपनाशक, त्वग्रोगहर और

५०८ रसतरङ्गिणीं बुद्धिवर्धकं होती है । लोहभस्म के गुणों के विषय में कहाँ तक कहा जाय यह अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करती है ॥ ८३ ॥ अपि च— लौहं दीपनमुत्तमं क्षयहरं कुष्ठामयध्वंसकं गुल्मप्लीहविधूननं क्रिमिहरं पाण्ड्वामयघ्नं परम् । मेदोमेहनिबर्हणं गदहरं दुर्नामरोगान्तकृत् छर्दिश्वासहरं त्वलं बहुगिरा योगेन नानार्तिनुत् ॥ ८४ ॥ अपि च प्रकारभेदेन गुणसमुच्चयः—लौहं दीपनमिति । दुर्नामरोगः अर्शांसि योगेनेति युक्त्या प्रयुक्तमित्यर्थः ॥ ८४ ॥ भा. टी.—लोहभस्म उत्तमदीपन क्षयरोग, गुल्म, प्लीहा, उदरकृमि रोग- नाशक और उत्तम पांण्डुरोगनाशक है । इसके प्रयोग से मेदोविकार तथा प्रमेह रोग दूर होते हैं । गरविष तथा बवासीर, छर्दि, श्वास रोगों को नष्ट करती है । लोहभस्म के विषय में बहुत क्या कहें विभिन्न द्रव्यों के योग से यह नाना प्रकार के रोगों को नष्ट करती है ॥ ८४ ॥ अपि च— विसर्पकरिकेशरी प्रबलशूलनिर्मूलनः क्षयक्षयकरः परं चिरजशोथ ह्लोचनः । यकृद्गदविधूननो गुदमहागदेभाङ्कुशः परं विजयतेतरां विधिहतस्तु लौहो ह्ययम् ॥ ८५ ॥ भा.टी.—लौहभस्म विसर्परूपी हाथी के लिये सिंह के समान घातक, भयं- कर शूलनाशक, क्षयरोग को क्षीण करनेवाली, चिरकालीन सर्वांगीण शोथ को मिटानेवाली है । इसके सेवन से यकृत् के रोग, गुदा के रोग (बवासीर) दूर होते हैं ॥ ८५ ॥ अपि च— श्वासं नाशयति क्रिमीन् कृशयति क्षैण्यं क्षिणोति द्रुतं शोषं शोषयति श्रमं त्वपहरेच्छूलं समुन्मूलयेत् । कासं ह्रासयति क्षयं क्षपयति भ्रान्तिं निहन्त्यन्ततः स्थौल्यं विह्वलयत्यलं दलयति श्लेष्मामयान् सर्वथा ॥ ८६ ॥ भा.टी.—उत्तम लोहभस्म श्वास रोग को मिटाती है और उदर कृमियों को मारती है । शरीर में होनेवाली क्षीणता को मिटाती है । शोष रोग (यक्ष्मा)

विंशस्तरङ्गः ५०६ को सुखा देती है। भ्रमरोग को शान्त करती है और शूल रोग को समूल नष्ट करती है। तथा नवीन कास को मिटाती, क्षय रोग को क्षीण करती और मान- सिक भ्रान्ति (चंचलता) को नष्ट करती है। इसके सेवन से शरीर की स्थू- लता तथा कफप्रकोपजन्य रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ८६ ॥ अथापरे गुणाः पुरातनमतीसारं गण्डमालां नवोत्थिताम् । रजरोधं वृक्कशोथं हृद्रोगं विषमज्वरम् ॥८७॥ फिरङ्गजं पाण्डुरोगं कामलाञ्च हलीमकम् । योषापस्मारकञ्चैव श्वेतप्रदरजां रुजम् ॥८८' मधुमेहं मांसतानं सभेदं शोषमुल्बणम् । तथैव ताण्डवगदं सूतिकाज्वरमेव च ॥८६॥ गलक्षतञ्चामवातं यकृद्रोगं भगन्दरम् । पीनसञ्चाम्लपित्तञ्च त्वाश्ववश्यं विनाशयेत् ॥६०॥ सामान्यतः श्रुतिपुटनासागर्भाशयादितः । अल्पां रक्तस्रुतिं प्रायोभाविनीमाशु नाशयेत् ॥६१॥ यौवनाम्भकालीनयोषित्पाण्ड्वामयं तथा । आमपक्वाशयगतक्षतजञ्चाऽस्रक्स्रुतिं जयेत् ॥६२॥ नाडीशूलमनिद्राञ्च पाण्ड्वामयसमुत्थिताम् । आमवातभवामस्थिविकृतिञ्चापि नाशयेत् ॥६३॥ शारीरीकरुजञ्चाति माननामवषणताम् । रजःक्षयसमुद्भूतं वार्द्धक्यं नाशयेद् ध्रुवम् ॥६४॥ वातसंस्थानदौर्बल्यं बहूत्थानसमुत्थतम् । अचिरादेव नियतं मृतं लोहं विनाशयेत् ॥६५॥ आरोग्यान्मुखकाले तु यः कस्यामयस्य वै । मृतं लौहं प्रशंसन्ति विशेषाद्वलवृद्धये ॥६६॥ अथापरेऽपि लौहगुणाः प्राचीनतन्त्रानुक्ता अपि अनुभूतप्राया आविष्क्रियन्ते पुरातनमतीसारमिति । फिरङ्गजं पाण्डुरोगमिति विशेषतः तथाविधनिदानजात- पाण्डुग्रहणम् । मांसतानम्—"प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण । स मांसतानः कथितोऽवलम्बी प्राणप्रणुत् सर्वकृतो विकारः ॥” इत्युक्तम् । सभेदं शोषं जराशोषादिसर्वविधशोषम् । ताण्डवगदम्—‘वामबाहुं समारभ्य प्राय

५१० रसतरङ्गिणी आदौ नतोऽपरम्। ततः पादौ ततोऽङ्गानि चालयेत्ताण्डवामयी ॥ मुष्टिना किमपि द्रव्यं सम्यग्धारयितुं क्षमः। समर्पयितुमास्ये वाप्यदनीयं न ताण्डवी ॥” इति लक्षितं। आशु अवश्यमिति नियतानुभवज्ञापनं। प्रायोभाविनीं बहुधा जायमानाम्। पांडुरोगोपद्रवा- मनिद्रामिति संबन्धः। अवघूर्णतां विषादम्। वातसंस्थानं नाडिकाजातं। बहूत्थान- समुत्थितं बहुहेतुजनितम्। विशेषतस्तु पित्तनाशकं भवति लौहमिति ॥८७-९६॥ भा.टी.—लोह पुरातन अतीसार, नवीन कण्ठमाला रोग, स्त्रियों के मासिक अवरोध, वृक्कशोथ, हृदयरोग, विषमज्वर, फिरंगरोगजन्य पाण्डुरोग, कामला, हली मकरोग, योषपस्मार, श्वेतप्रदर, मधुमेह, मांसतान (खुनाक डिप्थेरिया), भयंकर त्रिविध प्रकार के क्षय, ताण्डवरोग, सूतिकाज्वर, गले में होनेवाले क्षतव्रण, आम- वात, यकृत् के रोग, भगन्दर, पीनस (जुकाम) और अम्लपित्त रोग को निश्चित ही नष्ट करती है। कान, नासिका तथा गर्भाशय आदि से प्रायः निकलनेवाले सामान्य रक्तस्राव को रोकती है। यौवन आरम्भ के समय होनेवाले स्त्रीपाण्डुरोग (हलीमक) आमाशय तथा पक्वाशयगत क्षतव्रणों के रक्तस्राव को रोकती है। इसके सेवन से नाड़ीशूल तथा पाण्डु (रक्ताल्पता) के कारण निद्रानाश और आमवात के कारण होनेवाली अस्थिविकृति दूर हो जाती है। इसके सेवन से वृद्धावस्था में रजःक्षय के कारण होनेवाली शरीरिक पीड़ा व मानसिक शिथिलता दूर हो जाती है। लोहभस्म के सेवन से विभिन्न कारणों से उत्पन्न वातसंस्थान की दुर्बलता शीघ्र ही दूर हो जाती है। किसी रोग की शान्ति के बाद होनेवाली दुर्बलता को दूर करने के लिए लोहभस्म विशेष लाभदायक होती है ॥८७-९६॥ वक्तव्य—मांसतान के लक्षण इस प्रकार लिखे हैं “प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण। स मांसतानः कथितोऽवलम्बी प्राण- प्रणुत् सर्वकृतो विकारः ॥”। ताण्डवरोग में रोगी अपने हाथ-पैरों को इस तरह हिलाता हुआ नजर आता है जैसे कि एक विशेष प्रकार से नाच रहा हो। यदि उससे किसी चीज को हाथ में लेकर मुँह में डालने को कहें तो वह मुँह में चीज को नहीं रख सकता है—“वामबाहुं समारभ्य प्राय आदौ ततोऽपरम्। ततः पादौ ततोऽङ्गानि चालयेत्ताण्डवामयी। मुष्टिना किमपि द्रव्यं सम्यग् धार- यितुं क्षमः। समर्पयितुमास्ये वाप्यदनीयं न ताण्डवी ॥”। लोह भस्म का प्रभाव—लोह या लोह के सभी समास (योग) आँतो में पहुँच कर लोहगन्धिद् (Iron sulphide) के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। अत-

विंशस्तरङ्गः ५११ एवं लौह सेवन करनेवाले मनुष्य का मल प्रायः कालेरंग का हो जाता है। लोह और लोह के योग आँतों में पहुँचकर कुछ मलबन्ध भी करते हैं। यद्यपि लोहभस्म विशेष मलबन्ध नहीं करती है, क्योंकि इसके शोधन-मारण में पित्त- विरेचक द्रव्य त्रिफला के द्वारा विशेष काम लिया जाता है और भस्म सेवन- काल में प्रायः पित्तविरेचक द्रव्यों के साथ लोहभस्म का सेवन कराया जाता है। जिस तरह लोहभस्म आँतों के लिये मलबन्धक है उसी तरह यह शरीर में से होनेवाले अन्य स्रावों के लिए ग्राही भी है। अतः लोहभस्म को रक्तपित्त, रक्तप्रदर, रक्तस्राव और श्लेष्मस्राव आदि में दिया जाता है। लौह आंतों की अन्तःकला द्वारा रक्त में प्रवेश करता है और यहाँ से यकृत् में पहुँच जाता जाता है। यकृत् में इस लोह के कुछ ऐसे ऐन्द्रियिक समास बनते हैं जो शरीर मे लग सकते हैं। यह समास रक्त के रञ्जकद्रव—(Himo globin) से बहुत कुछ मिलते-जुलते होते हैं और बहुत संभव है कि वह समास हिमांग्लोबिन में बदल जाते हों। इसी लिए पाण्डुरोग में लोह के देने से रक्त में रक्ताणु तथा रञ्जकद्रव्य दोनों ही बढ़ जाते हैं। अतः लोहभस्म उत्तम रञ्जक और रक्तवर्धक है। रक्त में रक्ताणु तथा रञ्जकद्रव्य के बढ़ जाने से शरीर के सब ही अवयवों में ओषजन अधिक मात्रा में पहुँचने लगती है जिससे शारीरिक अवयवों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। अतः लोह सर्वाङ्गबल्य होता है। उत्तम लोहभस्म, शाखाश्रित अथवा कोष्ठसमाश्रित मूलभूत बढ़े हुए पित्तको शमन करती है। अथास्य विशिष्टा गुणाः शाखाश्रितं कोष्ठसमाश्रितं वा पित्तं विवृद्धन्तु मलाभिधेयम् । मृतन्तु लौहं शमयेन्नितान्तं यथा समीरः खलु मेघवृन्दम् ॥ ६७ ॥ भा.टी.—हाथ पैर एवं आँतों में रहनेवाला पित्त-विकार लोहभस्म खाने से शीघ्र नष्ट होता है जैसे वायु मेघसमूह को नष्ट करता है ॥ ६७ ॥ अस्य मात्रानिरूपणम् आरभ्य गुञ्जापादांशात् गुञ्जाद्वितयसंमितम् । मृतं लौहं प्रयुञ्जीत प्राणाचार्यः प्रयत्नतः ॥ ६८ ॥ मात्रानिरूपणं देशकालापेक्षमुचितमेव । प्राचीनैस्तु “गुञ्जामेकां समारभ्य यावत् स्युर्नवरक्तिकाः । तावल्लोहं समश्नीयात्” इत्युक्तं यद्यपि, तथापि यथादो- षबलं द्विगुञ्जैवमात्राऽधुना युक्तमिति ॥ ६८ ॥

५१२ रसतङ्गिणी भा.टी.—लोहभस्म को चौथाई रत्ती में लेकर आवश्यकतानुसार दो रत्ती की मात्रा तक सेवन किया जाता है ॥६८॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः लौहं चतुर्जातयुतं सितया च समन्वितम् । शीलितं मात्रया तूर्णं रक्तपित्तं व्यपोहति ॥ ६६ । वासाद्राक्षाकणाचूर्णयुक्तं लौहं निषेवितम् । विशेषात् खलु कासानां पञ्चानां पञ्चतां नयेत् ॥ १०० ॥ भार्गीव्योषसमायुक्तं मृतं लौहं निषेवितम् । श्वासवेगं निहन्त्याशु मेघवृन्दं यथानिलः ॥ १०१ ॥ कज्जलीपिप्पलीक्षौद्रयुतं लौहं तु शीलितम् । विनिहन्त्यचिरादेव विशेषान श्लैष्मिकामयान् ॥ १०२ ॥ शुण्ठीचूर्णयुतं लौहं वातबाधां व्यपोहति । रससिन्दूरसितया लौहं पित्तामयान हरेत ॥ १०३ ॥ फलत्रिकसमायुक्त मृतं लौह निषेवितम् । संवत्सरप्रयोगेण वलीपलितनाशनम् ॥ १०४ ॥ ताम्बूलबीटिकोपेतं लौहन्तु परिशीलितम् । रससिन्दूरसंयुक्तं वृष्यं त्र्यर्यञ्च कीर्तितम् ॥ १०५ ॥ हिंगुव्याघ्रघृतोपेतं मृतं लौहं निषेवितम् । शूलमुन्मूलयत्याशु मेघवृन्दं यथानिलः ॥ १०६ ॥ धात्रीकणाचूर्णयुतं तुल्यया सितया सह । लौहं विनाशयेद्रक्तपित्तञ्चैवाम्लपित्तकम् ॥ १०७ ॥ विडङ्गत्रिफलामुस्तशिखगन्धा ञ्रिसंयुतम् । लौहं विनाशयत्याशु भस्मकाख्यं महागदम् ॥ १०८ ॥ गिरिजातुसमुपेतं शीलितं लौहचूर्णं त्वभिनवकुशकाशक्वाथसंयोगतो वा । प्रतनुकदिवसमात्रेण नात्यल्पहेतुं व्यपनयात विशेषाद्दारुणं मूत्रकृच्छ्रम् ॥ १०६ ॥ पुनर्नवाद्यं सुमृतन्तु लौहं प्रभूतगोक्षीररसानुपीतम् । मासत्रयेणैव जराकशानां पुनर्नवत्वं प्रददाति नूनम् ॥ ११० ॥

३३ विंशस्तरङ्गः ५१३ मृतसूतयुतं लौहं कटुकीद्रवभावितम् । मासद्वयप्रयोगेण सर्वाङ्गैकाङ्गवातहृत् ॥ १११ ॥ घृतमधुविनियुक्तं वा हरिद्रारसाढ्यं त्वशितमिह हि लौहं वापि कट्वीशिवाभ्याम् । अपहरति विशेषान्मासमात्रप्रयोगात् सुचिरजमपि पाण्डुं कामलाञ्चातिघोराम् ॥ ११२ ॥ विमलवलिसमेतं क्षौद्रगव्याज्ययुक्तं कलितरुफलपथ्याधात्रिकोद्भूतवारा । कृतसमुचितपथ्यो वर्षमात्रप्रयोगात् जनयति युवभावं ज्यायसाञ्चापि पुंसाम् ॥ ११३ ॥ लौहं गोक्षुरक्षुद्रैलाचूर्णेन परिशीलितम् । विनिहन्त्यचिरादेव मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् ॥ ११४ ॥ खदिरासनसाराभ्यां सप्तधा परिभावितम् । लौहं निषेवितं हन्ति कुष्ठादीन् विविधान् गदान् ॥ ११५ ॥ गन्धमारितताम्राढ्यं लौहं तु परिशीलितम् । बलात्मगुप्ताक्वाथेन सर्वाङ्गैकाङ्गवातनुत् ॥ ११६ ॥ धात्रीरसहतं कान्तलौहं त्रिफलयान्वितम् । सेवितं वर्षमात्रं तु परमायुष्करं मतम् ॥ ११७ ॥ रोगयोग्यः प्रयोगो लोहस्य—कासानां पञ्चानां पञ्चविधान् कासान् इति भावः । पञ्चतां विनाशमित्यर्थः । शिखरीबीजं अपामार्गबीजम् । गिरिजतु शिलाजतु, अभिनवं यत्कुशकाशमूलं तत्क्वाथसंगतो वा, इतिशब्दः समुच्चये । नात्यल्पहेतुं प्रबलनिदानमित्यर्थः । दारुणं प्रभूतपीडाकरत्वात् । रसो मांसरसः, कट्वी कटुकी, शिवा हरीतकी । कलितरुफलं विभीतकम् । ज्यायसां वृद्धानाम् ॥ ६६—११७ ॥ भा.टी.—लोहभस्म की उचित मात्रा लेकर उसमें दालचीनी, इलायची- बीज, तेजपत्र तथा नागकेशरचूर्ण और खाँड मिलाकर वासास्वरस अनुपान से सेवन करने पर रक्तपित्त में आराम आता है । लोहभस्म में वासा, द्राक्षा तथा पिप्पलीचूर्ण मिलाकर सेवन करने से पाँचों प्रकार के कास में लाभ होता है । भारंगी, सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण के साथ लोहमस्म का सेवन करने से श्वास का वेग शीघ्र शान्त हो जाता है । कफप्रकोपजन्य रोगों में लोहभस्म को

५१४ रसतरङ्गिणी

पारदगन्धक की कज्जली तथा पिप्पलीचूर्ण मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से शीघ्र आराम आता है। लोहभस्म को सोंठ के चूर्ण के साथ सेवन करने से वायुपीड़ा शान्त होती है। पित्तप्रकोपजन्य रोगों को शान्त करने के लिए लोहभस्म को रससिन्दूर तथा खाँड के साथ सेवन करना चाहिए। लोह- भस्म को त्रिफलाचूर्ण के साथ एक वर्ष तक निरन्तर सेवन करने से शरीर में झुर्रियाँ पड़ना तथा बालों का सफेद होना आदि वृद्धावस्था के लक्षण दूर हो जाते हैं। लोहभस्म को रससिन्दूर के साथ मिला पान के बीड़े में रखकर खाने से कामोत्तेजना होती है और शरीर का रंग निखर आता है। लोहभस्म को हींग, सौंठ, मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण में मिला घी के साथ चाटने से शीघ्र ही शूल में आराम आता है। लोहभस्म में आँवलाचूर्ण, पिप्पलीचूर्ण और समभाग खाँड मिलाकर वासास्वरस-अनुपान से सेवन करने पर रक्तपित्त तथा अम्ल- पित्तरोग में आराम आता है। भस्मकरोग ( बहुत अधिक भूख लगना जिसमें रोगी चार-पाँच बार अन्न रोज खाता हो) में लोहभस्म को विडंग, त्रिफला, मोथा तथा अपामार्गबीजचूर्ण के साथ मिलाकर खिलाने से शीघ्र आराम आता है। लोहभस्म में समभाग शिलाजीत मिलाकर अथवा नूतनकुश कषाय के साथ सेवन करने से कुछ ही दिनों में अति तीव्र कारणों से उत्पन्न भयंकर मूत्रकृ- च्छ्र रोग शान्त हो जाता है। बुढ़ापा के कारण कृशता को प्राप्त हुए मनुष्यों के लिए लोहभस्म में पुनर्नवाचूर्ण मिलाकर पर्याप्त गोदुग्धानुपान के साथ सेवन करने से तीन मास में पूर्ण लाभ होता है। लोहभस्म में पारदभस्म या रससिन्दूर मिला इसको कुटकीकषाय की सात भावना देकर चूर्ण कर लें। इसमें से उचित मात्रा लेकर निरन्तर दो मास तक सेवन करने से सर्वांग तथा एकांग में वात- प्रकोप शान्त होता है। लोहभस्म में घी तथा मधु मिलाकर अथवा हरिद्रारस मिलाकर, अथवा कटुकी और हरीतकीचूर्ण मिलाकर एक मास तक निरन्तर सेवन करने से पुरातन पांडु रोग तथा भयंकर कामला रोग में आराम आता है। यदि लोहभस्म में समभाग शुद्धगन्धक चूर्ण मिला, शहत और गोघृत के साथ प्रतिदिन चटायें और बहेड़ा, हरड़ तथा आँवला इसका कषाय अनुपान के रूप में पिलायें, इस प्रकार एक वर्ष तक निरन्तर किया जाय तो वृद्ध मनुष्यों में युवावस्था आ जाती है। मूत्रकृच्छ्र के लिये लोहभस्म को गोखुरु तथा छोटी इलायचीबीजचूर्ण में मिलाकर सेवन कराया जाता है। कुष्ठ आदि नाना प्रकार के त्वग्रोग तथा रक्तविकृति रोगों में लोहभस्म को खदिरसार और विजयसारकषाय की सात-सात भावना देकर प्रयोग किया जाता है। लोह-