रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
विषयानुक्रमणिका । ( ९ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. कफरोगाधिकार । विद्याधराभ्ररस ३८७ श्लेष्मकालानल रस ३६३ बृहद्विद्याधराभ्र ३८८ श्लेष्मशैलेन्द्र रस ३६४ सर्वांगसुन्दररस ३८९ महाश्लेष्मकालानल रस ३६५ शूलवज्रिणीवटिका ३९० महालक्ष्मीविलास रस ३६६ त्रिपुरभैरव रस ३९१ कफकेतुरस ३६८ अग्निसुख, श्रीशूलगजकेसरी रस ३९२ कफचिन्तामणि रस " त्रिगुणाख्यरस ३९३ पित्तरोगचिकित्सा । शूलहरणयोग, शर्करालोह ३९४ गुडूच्यादिलोह, धात्रीलोह ३६९ शंखादि चूर्ण ३९५ पित्तान्तक रस ३७० उदावर्त्तानाहरोगधिकार । महापित्तान्तक ३७१ वैद्यनाथवटी ३९५ वातरोगचिकित्सा । बृहदिच्छाभेदी रस ३९६ लाङ्गल्याद्य लोह ३७१ गुल्मरोगचिकित्सा । वातरक्तान्तक रस ३७२ महानाराच रस ३९७ तालभस्म ३७३ पञ्चानन रस, गुल्मवज्रिणी रस ३९८ महातालेश्वर रस ३७४ गुल्मकालानल रस ३९९ विश्वेश्वर रस " वडवानल रस " ऊरुस्तम्भरोगचिकित्सा । महानाराच रस, विद्याधर रस ४०० गुञ्जाभद्र रस ३७६ महागुल्मकालानल रस ४०१ आमवाताधिकार । अभया वटी " आमवातारी वटिका ३७७ गोपीजल ४०२ अपर आमवातारी वटिका ३७८ काङ्कायन गुटिका ४०३ आमवातेश्वर रस " गुल्मशार्दूल रस ४०४ वृद्धदाराद्य लोह ३७९ प्राणवल्लभ रस " शिवागुग्गुलु ३८० सर्वेश्वररस ४०५ आमवातगजसिंह मोदक ३८१ हृद्रोगाधिकार । शूलरोगचिकित्सा । हृदयार्णव रस ४०६ क्षमामृत लोह, त्रिफला लोह ३८२ नागार्जुनाभ्रक " चतुःसम लोह ३८३ पञ्चानन रस ४०७ पञ्चात्मक रस ३८४ मूत्रकृच्छ्राधिकार । धात्री लोह ३८५ शूलराजलोह ३८६ त्रिनेत्राख्य रस ४०७
( १० ) रसेन्द्रसारसंग्रह- विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. वरुणाद्य लोह ४०८ स्थौल्याधिकार । मूत्रकृच्छ्रान्तक रस ४०९ त्र्यूषणाद्यलोह ४३० मूत्राघाताधिकार । वडवाग्निलोह ” तारकेश्वर रस ४१० वडवाग्निरस ४३१ लघुलोकेश्वर रस ४११ उदररोगाधिकार । अन्ययोग ” गोखरूआदि योग ४१२ त्रैलोक्यसुन्दर रस ४३१ अश्मरीरोगचिकित्सा । वैश्वानरी वटी ४३२ पाषाणवज्र रस ४१२ जलोदरारि रस ४३३ त्रिविक्रमरस ४१३ वह्निरस, त्रैलोक्यडुम्बर रस ४३४ लोह प्रयोग ४१४ महावह्नि रस ४३५ अन्य योग, गंधकादियोग ” इच्छाभेदी रस ४३६ प्रमेहाधिकार । पिप्पलीमूलाद्य लोह ” हरिशंकर रस ४१४ उदरारि रस, वङ्गेश्वर रस ४३७ इन्द्रवटी, वङ्गावलेह ४१५ प्लीहरोगचिकित्सा । प्रमेहसेतु ” लोकनाथ रस ४३८ विडंगाद्य लोह ४१६ बृहल्लोकनाथ रस ४३९ बृहत् हरिशंकर रस ” क्षात्रेश्वरवटी, अग्निकुमारलोह ४४१ आनन्दभैरव रस ४१७ प्राणवल्लभ रस ४४२ विद्यावागीश रस ” यकृदरि लोह ४४३ मेहमुद्गर रस, मेघनादरस ४१८ मृत्युञ्जय रस ४४४ चन्द्रप्रभा वटी ४१९ प्लीहार्णव रस ४४५ इक्षुमेहपर वंगेश्वर रस ४२० प्लीहशार्दूल रस ४४६ बृहद्वङ्गेश्वर रस ” प्लीहारि रस, अपर प्लीहारिरस ४४७ कस्तूरीमोदक ४२२ लोहमृत्युञ्जय रस ४४८ मेहवज्र ४२३ महामृत्युञ्जय रस ” मेहकेशरी, योगेश्वर रस ४२४ बृहद् गुडपिप्पली ४४९ सोमचिकित्सा । ताम्रकल्प ४५० तालकेश्वर रस ४२५ दारुभस्म, वज्रक्षार ४५२ गगनादि लोह, सोमनाथ रस ४२६ उदरामयकुम्भिकेसरी रस ४५३ बृहत्सोमनाथ रस ४२७ वारिशोषण रस ४५४ सोमेश्वर रस ४२८ सर्वतोभद्र रस ४५६
विषयानुक्रमणिका । ( ११ ) विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. शोथरोगचिकित्सा । | अर्केश्वर रस ४८१ त्रिकट्वाद्यलोह, कटुकाद्यलोह ४५७ | महातालेश्वर रस ४८२ त्र्यूषणाद्यलोह, सुवर्चलाद्यलोह ४५८ | विजयभैरव रस ४८३ क्षारगुटिका ,, | कुष्ठारि रस ४८४ बङ्गेश्वर रस ४६० | षडाननगुटिका, कुष्ठनाशनरस ४८५ अर्बुदरोगचिकित्सा । | विजयानन्दरस ४८६ रौद्ररस ४६१ | श्वित्रदद्रुपाटला लेप ४८७ श्लीपदरोगचिकित्सा । | श्वित्रहर लेप ,, नित्यानन्द रस ४६१ | ओष्ठश्वित्रना० लेप, रसमाणिक्य ४८८ कणादि वटी ४६२ | शीतपित्तोद्दर्दकोष्ठाधि० ४९० भगन्दररोगचिकित्सा । | अम्लपित्तरोगचिकित्सा । वारिताण्डव रस ४६३ | अम्लपित्तान्तक रस ४९१ भगन्दरहर रस ४६४ | लीलाविलास रस ,, उपदंशचिकित्सा ४६४ | पानीयभक्तवटिका ,, कुष्ठरोगचिकित्सा । | क्षुधावती गुटिका ४९२ गलत्कुष्ठारि रस ४६५ | अविपत्तिकर चूर्ण ४९७ उदयभास्कर ४६६ | विसर्प-विस्फोट-तन्तुरोग० तालकेश्वर रस, ब्रह्म रस ,, | कालाग्निरुद्ररस ४९८ चन्द्रानन रस ४६७ | मसूरिकाचिकित्सा । कुष्ठकालानल रस ,, | पापरोगान्तक रस ५०० वज्रवटी, चन्द्रकान्त रस ४६८ | क्षुद्ररोगचिकित्सा । ५०० सङ्कोच रस ४६९ | मुखरोगचिकित्सा । अमृतांकुर लोह ४७० | चतुर्मुख रस ५०० माणिक्यरस ४७१ | पार्वती रस, मुखरोगहरी ५०१ कुष्ठकुठार रस ४७३ | कर्णरोगाधिकार । रसतालेश्वर रस, राजतालेश्वर ४७४ | कफकेतु रस ५०३ कुष्ठहरितालेश्वर रस ४७६ | नासारोगाधिकार । राजराजेश्वर रस ४७७ | पञ्चामृत रस ५०४ पारिभद्र रस, सिध्महर लेप ४७८ | नेत्ररोगचिकित्सा । चक्रमर्दादि लेप, लङ्केश्वर रस ४७९ | नेत्राशनि रस ५०५ भूतभैरव रस | नयनामृत लोह ५०६
१. प्रथम अध्याय: रस-शोधन, भस्म-निर्माण, यन्त्र-परिभाषा एवं परिभाषा-प्रकरण
( १२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह-वि०क्र० । विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. क्षतशुक्लहर गुग्गुल ५०७ | भीमरुद्र रस ५२६ शिरोरोगाधिकार । | वाजीकरणाधिकार । रसचन्द्रिका वटी ५०७ | रसायनके लक्षण, श्रीमन्मथ रस ५२७ शिरोवज्र रस ५०८ | महेश्वर रस ५२८ चन्द्रकान्त रस ५०९ | पूर्णचन्द्र रस ५२९ महालक्ष्मीविलास ” | कार्श्यहर लौह, लक्ष्मीविलास रस ५३० प्रदररोगचिकित्सा । | श्रीकामदेव रस ५३२ प्रदरान्तक लोह ५१० | अनंगसुन्दर रस, हेमसुन्दर रस ५३४ प्रदरान्तक रस ५११ | अमृतार्णव रस ५३५ पुष्कर लेह ५१२ | बृहत्पूर्णचन्द्र रस ” योनिव्यापच्चिकित्सा ५१३ | चन्द्रोदय रस ५३८ सूतिकारोगचिकित्सा । | मकरध्वज, वसन्ततिलक रस ५४० सूतिकारि रस ५१४ | वसन्तकुसुमाकर रस ५४१ सूतिकाविनोद रस ” | नीलकण्ठ रस ५४२ गर्भचिन्तामणि रस ” | महानीलकण्ठ रस ५४३ बृहत्सूतिकाविनोद रस ५१५ | बृहच्छृङ्गाराम्र ५४५ सूतिकारि रस ” | परिशिष्टभाग । सूतिकाघ्न रस, सूतिकान्तक रस ५१६ | पुटके गुण ५४७ गर्भचिन्तामणि रस ” | १-महा पुट, २-गजपुट ५४८ दूसरा गर्भचिन्तामणि रस ५१७ | ३-वाराहपुट, ४-कुक्कुट पुट ५४९ बृहत् गर्भचिन्तामणि रस ५१८ | ५-कपोत पुट ” गर्भविनोद रस ” | ६-गोवर पुट ७-भाण्ड पुट ५५० मतिकाहर रस, मद्यघ्न वटी ५१९ | ८-वालुका पुट ” रसशार्दूल रस, महाशार्दूल रस ५२१ | ९-भूधर पुट, १०-लावपुट ५५१ बृहद्शार्दूल रस ५२२ | उपलोंके पर्याय नाम ५५२ अष्टधातु ५२३ | अञ्जनविधान । बालरोगचिकित्सा । | ज्वरनाशक नस्य ५५४ बालरस ५२३ | अर्द्धाङ्गज्बरनाशक लेप ” अपर बालरस ५२४ | सर्वज्वरनाशक धूलन ” विषाधिकार । | तीव्रज्वरनाशकधूलन ५५५ विषवज्रपात रस ५२५ | ज्वरनाशक धूप ” इति विषयानुक्रमणिका समाप्त ।
रसेन्द्रसारसंग्रह । भाषाटीकासहित । मङ्गलाचरण । रसेन्द्रमिव निःशेष-जरा-व्याधि-विनाशनम् । प्रणमामि गुरु भक्त्या शङ्करं योगसाधनम् ॥ १ ॥ टीकाकारोक्त मङ्गल । प्रणम्य श्रीशिवं भक्त्या यत्र तत्र शिवप्रदम् । करोम्यहं नृवाण्यां वै रसेन्द्रसारसंग्रहम् ॥ १ ॥ क्व चास्ति रससंसिद्धिः क्व चायुर्वेदसागरः । क्व वै रामप्रसादोऽहं भिषक्कीर्त्यभिलाषुकः ॥ २ ॥ यथा तथा गमिष्यामि मन्थानं गुरुदर्शितम् । चक्षुर्युक्तैः सहाऽन्धोपि सुमार्गे गच्छति ध्रुवम् ॥ ३ ॥ दोहा—सर्वत्र हि कल्याणप्रद, गिरिजा सहित महेश । करि प्रणाम उस देवको, सगरे टरत कलेश ॥ १ ॥ रससंग्रह इस ग्रंथको, हिन्दीमें अनुवाद । यथा तथा कछु करत हौं, जडमति रामप्रसाद ॥ २ ॥ कहँ सिद्धी रसराजकी, अरु आयुर्वेद अपार । कहँ चाहत यश महतको, रामप्रसाद सुधार ॥ ३ ॥ अथवा गुरुदर्शितपथा, गमिहौं हौं मतिमन्द । शुभ मग सहजहि जात है, नेत्रवान सँग अन्ध ॥ ४ ॥
( २ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जिस प्रकार संस्कारविशेषसे शुद्ध, बद्ध और मृत अर्थात् भस्म किये गये पारदके यथाविधि सेवनसे शरीरस्थ जरा ( बुढापा ) और व्याधि- योंका निःशेष ( समूल ) नाश होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जरा व्याधियोंके नाश करनेवाले योगसाधन ( योगगम्य ) जगद्गुरु शंकर अर्थात् समस्त संसारका कल्याण करनेवाले महादेवको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥ नत्वा गुरुपदद्वन्द्वं दृष्ट्वा तन्त्राण्यनेकंशः । श्रिया गोपालकृष्णेन क्रियते रससंग्रहः ॥ २ ॥ अपने गुरुजीके दोनों चरणोंको प्रणाम करके अनेक तन्त्रोंको देखकर मैं श्रीगोपालकृष्णभट्ट इस रसेन्द्रसारसंग्रह नामक ग्रन्थको बनाता हूं ॥ २ ॥ सिद्धयोगाश्च ये केचित् कृतिसाध्या भवन्ति हि । एकीकृत्य तु ते सर्वे लिख्यन्ते यत्नतो मया ॥ ३ ॥ जो सिद्ध अर्थात् प्रत्यक्ष फल देनेवाले योग मनुष्योंसे बन सकते हैं या मनुष्य जिन सिद्ध योगोंको बना सकते हैं उनको अनेक तंत्रोसे यत्नपूर्वक इकट्ठे करके मैं इस ग्रन्थमें लिखता हूं ॥ ३ ॥ रसकी प्रधानता । अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसङ्गतः । क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥ ४ ॥ पारदकी बहुत थोड़ी मात्रा ( खुराक ) होती है, और उस अल्प मात्रासे ही बहुत गुण होजाता है, एवं इसके सेवनमें अरुचिभी नहीं होती तथा शीघ्रही आरोग्यता ( तंदुरुस्ती ) प्राप्त होती है, इस लिये सम्पूर्ण औषधिमात्रमें पारद सबसे श्रेष्ठ कहा है ॥ ४ ॥ साध्येषु भेषजं सर्वमीरितं तत्त्ववेदिना । असाध्येष्वपि दातव्यो रसोऽतः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ५ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३ ) आयुर्वेदके ज्ञाताओंने संपूर्ण औषधियें साध्य रोगोंके लियेही कही हैं । परंतु पारद् असाध्य रोगोंकोभी दूर करता है इस लिये यह सब ओषधियोंसे श्रेष्ठ माना है ॥ ५ ॥ हतो हन्ति जरां व्याधिं मूर्च्छितो व्याधिघातकः । बद्धः खेचरतां धत्ते कोऽन्यः सूतात्कृपाकरः ॥ ६ ॥ पारेकी भस्म-बुढापा और सम्पूर्ण वलीपलित आदि रोगोंको दूर करती है । मूर्च्छित पारद् ( रससिंदूर, मकरध्वज आदि ) संपूर्ण व्याधि- योंको नष्ट करता है । और “ जलौका बद्ध ” या “ खेचरी गुटिका” हो जानेपर आकाशमें गमन करनेकी शक्ति देता है। अत एव पारदसे बढकर और कौन ऐसी कृपा करनेवाला हो सकता है ॥ ६ ॥ रसके पर्यायवाचक शब्द । रसेन्द्रः पारदः सूतः सूतराजश्च सूतकः । शिवतेजो रसः सप्त नामान्येवं रसस्य तु ॥·७॥ रसेंद्र, पारद, सूत, सूतराज, सूतक, शिवतेज, रस ये सात नाम पारदके हैं ॥ ७ ॥ शिवबीजो रसः सूतः पारदश्च रसेन्द्रकः । एतानि रसनामानि तथान्यानि यथा शिवे ॥ ८ ॥ अथवा शिवबीज, रस, सूत, पारद, रसेंद्र और जितने नाम शिवके हैं वह सब पारदके जानने ॥ ८ ॥ उत्तम पारदकी परीक्षा । अन्तः सुनीलो बहिरुज्ज्वलो यो मध्याह्नसूर्यप्रतिमप्रकाशः । शस्तोऽथ धूम्रः परिपाण्डुरश्च चित्रो न योज्यो रसकर्मसिद्धौ ॥ ९ ॥ जो पारद् भीतरसे नीलवर्ण हो, बाहरसे उज्ज्वल वर्ण और मध्या-
( ४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ह्के सूर्यकी समान प्रकाशवाला हो वह पारद् रसकर्ममें उत्तम माना गया है । जो पारद् धूम्रवर्ण हो या सर्वतः पाण्डुवर्ण हो अथवा चित्रित वर्णवाला हो वह रसकर्मके योग्य नहीं होता है ॥ ९ ॥ पारदमें स्वाभाविक दोष । नागो वङ्गो मलो वह्निश्चाञ्चल्यञ्च विषं गिरिः । असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥ १० ॥ व्रणं कुष्ठं तथा जाड्यं दाहं वीर्यस्य नाशनम् । मरणं जडतां स्फोटं कुर्वन्त्येते क्रमान्नृणाम् ॥ ११ ॥ नाग ( सीसा ) वंग ( कलई ), मल, वह्नि, चांचल्य, विष, गिरि और असह्याग्नि यह आठ महादोष पारदमें स्वभावसे स्थित रहते हैं । यदि इन दोषोंसे युक्त पारदको भक्षण किया जाय तो यह क्रमसे व्रण, कुष्ठ, बुद्धिकी जडता, दाह, वीर्यका नाश, मृत्यु, शरीरका जकड जाना और शरीरमें फोडे होना इन आठ प्रकारकी महाव्याधि- योंको करता है ॥ १० ॥ ११ ॥ शोधनकी आवश्यकता । तस्माद्रसस्य संशुद्धिं विदध्याद्भिषजां वरः । शुद्धोऽयममृतः साक्षाद्दोषयुक्तो रसो विषम् ॥ १२ ॥ इस लिये वैद्यको चाहिये पहिले क्रमसे रस ( पारद् ) की शुद्धिको करे अर्थात् उपरोक्त सम्पूर्ण दोषोंको निकालकर पारदको शुद्ध करले क्योंकि शुद्ध किया हुआ पारद् साक्षात् अमृतके समान गुणकारी होता है । और अशुद्ध पारद विषके समान शरीरको कर डालता है ॥ १२ ॥ शुद्धाशुद्धके गुणदोष । दोषहीनो यदा सूतस्तदा मृत्युजरापहः । शुद्धोऽयममृतं साक्षाद्दोषयुक्तो रसो विषम् ॥ १३ ॥
भाषाटीकासहित । ( ५ ) जैसे कहा है-जब यह पारद दोषरहित होजाता है तो जरा और मृत्युके हरनेवाला होता है । शुद्ध पारद साक्षात् अमृत ही हो जाता है । परन्तु दोषयुक्त पारद साक्षात् विष समझना चाहिये ॥ १३ ॥ रसशोधनप्रकार । अथातः संप्रवक्ष्यामि पारदस्य विशोधनम् ॥ रसो ग्राह्यः सुनक्षत्रे पलानां शतमात्रकम् ॥ १४ ॥ पञ्चाशत्पञ्चविंशद्वा दश पञ्चैकमेव वा । पलाद्धीनं न कर्त्तव्यं रससंस्कारमुत्तमम् ॥ १५ ॥ अब हम पारद शोधनकी विधिको कहते हैं-प्रथम किसी शुभ नक्षत्र मुहूर्तमें १०० सौ पल पारद लेवे अथवा पचास ५० पल लेवे या २५ पल लेवे, अथवा १० पल या ५ पल अथवा १ पल लेवे । १ पलसे कम पारदका संस्कार नहीं करना चाहिये ॥१४॥१५॥ शतं पञ्चाशतं वापि पञ्चविंशद्दशैव च । पञ्चैकं वा पलञ्चैव पलार्द्धं कर्षमेव वा ॥ १६ ॥ कर्षान्न्यूनो न कर्तव्यो रससंस्कार उत्तमः । प्रयोगेषु च सर्वेषु यथालाभं प्रकल्पयेत् ॥ १७ ॥ किसीके मतमें-सौ १०० पल, या ५० पल, अथवा २५ पल, या १० पल, वा ५ पल, या १ पल या आधा पल, अथवा १ कर्ष पारद् लेकर संस्कार करे, एक कर्षसे कम पारदका उत्तम संस्कार होही नहीं सकता. इसलिये बहुत थोडे पारदका संस्कार आरंभ न करे ! जितना अधिक मिलसके उतना लेकर सब प्रकारके शोधन प्रयोगोंको करे । ( ग्रंथांतरमें लिखा है, पारदकी शुद्धि दो प्रकारकी होती है । एक रसायनके लिये, दूसरी व्याधिनाशनाथं । जो व्याधि हरनेके लिये शुद्धि है वह रसायनमें काम नहीं आसकती । परन्तु रसायन कर्मकी रोगनाशक होसकती है ) ॥ १६ ॥ १७ ॥
( ६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुभेऽह्नि विष्णुं परिचिन्त्य कुर्यात् सम्यक्कुमारीवटुकार्च्चनं च । सुलोहपाषाणसमुद्भवेऽस्मिन् दृढे च वेदांगुलिगर्भमात्रे ॥ १८ ॥ सुतप्तखल्ले निजमन्त्रयुक्तां विधाय रक्षां स्थिरसारबुद्धिः । अनन्यचित्तः शिवभक्तियुक्तः समाचरेत्कर्म रसस्य तज्ज्ञः ॥ १९ ॥ शुभ दिन मुहूर्त्तमें विष्णु नारायणका स्मरण करके विधिवत् कुमारी और वटुकका पूजन करके चार अंगुल गहरा किसी उत्तम लोह या पत्थरका उत्तम खल्व लेकर उसमें पारद् डालकर “ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते ऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः” इस मन्त्रको जपता हुआ शिवभक्तियुक्त हो स्थिर और टिकी हुई बुद्धिसे पारदकी रक्षा करता हुआ तप्त खल्वमें पारदका मर्दन करे, परन्तु खल्वमें । इतना पारद् डाले जितना डालनेसे खल्वका चार चार अंगुल किनारा चारों ओर ऊपरसे खाली रहे, ऐसा करनेसे पारद् मर्दन भी अच्छा होता है और बाहर भी नहीं गिरता ॥ १८ ॥ १९ ॥ तप्त खल्व विधान । अजांशकृत्तुषाग्निं च भूगर्ते त्रितयं क्षिपेत् । तस्योपरि स्थितं खल्लं तप्तखल्लमिति स्मृतम् ॥२०॥ पृथ्वीमें एक गढा खोदकर उसमें धानोंके तुष बकरीकी मेंगनी और अग्नि इन तीनोंको डालके उसके ऊपर खल्वको रक्खे इस खल्वमें पारदका मर्दन होता है, इसका नाम “ तप्तखल्व ” है ॥ २० ॥
भाषाटीकासहित । ( ७ ) रक्षामन्त्र या अघोरमन्त्र । अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते ऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ २१ ॥ रसनिगड ! स्नुह्यर्कसम्भवं क्षीरं ब्रह्मबीजञ्च गुग्गुलुः । सैन्धवं द्विगुणं मर्द्यं निगडोऽयं महोत्तमः ॥ २२ ॥ थूहरका दूध, आकका दूध, ढाकके बीज, गूगल, सेंधानमक इन सब मिली हुई औषधियोंको पारेसे दो गुणी लेकर पारेमें मिलाकर खरल करे यह योग तप्तखल्वमें पारद मर्दन करनेका परम उत्तम निगड कहा है ॥ २२ ॥ पारदकी साधारणशुद्धि । षोडशांशैर्भिषक् चूर्णैरेकत्र मर्दयेद्रसम् । प्रत्येकं प्रत्यहं दत्त्वा सप्तवारं विमर्दयेत् ॥ २३ ॥ आगे कही हुई औषधियोंमेंसे प्रत्येक औषधिका चूर्ण पारेसे सोल- हवाँ भाग मिलाकर एक दिनमें मर्दन करे इसी प्रकार प्रत्येक औष- धिके चूर्णसे सात २ वार मर्दन करे ॥ २३ ॥ विशेष शुद्धि ( दोष हरण ) । सोर्णोर्निशेष्टका-धूम-जम्बीरा-ऽम्बुभिरादिनम् । मर्दितः काञ्जिकैधौं तो नागदोषं रसस्त्यजेत् ॥ २४ ॥ विशालाङ्कोठचूर्णेन वंगदोषं विमुञ्चति । राजवृक्षो मलं हन्ति चित्रको वह्निदूषणम् ॥ २५ ॥ चाञ्चल्यं कृष्णधूस्तूरः त्रिफला विषनाशिनी । कटुत्रयं गिरिं हन्ति असह्याग्निं त्रिकण्टकः ॥ २६ ॥ प्रतिदोषं कलांशेन तत्तच्चूर्णं सकन्यकम् ।
( ८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उद्धृत्योष्णारनालेन मृत्पात्रे क्षालयेत्सुधीः । एवं संशोधितः सूतः सप्तकंचुकवर्जितः ॥ २७ ॥ ऊन ( भेडके बाल ), हल्दी, ईंटका चूर्ण, गृहधूम, जंभीरीका रस, घीकुमारीका रस इन सबमें प्रत्येकको पारेसे सोलहवां भाग लेकर पारदमें मिलां एक दिन ( सात दिनतक ऐसा वृद्धोपदेश है ) खरल करे फिर गरम कांजीसे माटीके पात्रमें धोडाले इसी प्रकार सात दिन- तक खरल करनेसे पारा नाग दोषको त्याग देता है १॥ ऐसे ही इन्द्रायणकी जड और अंकोठ ( ढेश वृक्ष ) के चूर्णको पारेसे सोलहवां भाग लेकर घीकुमारके रसमें रगड़ कर गर्म कांजीसे धोडाले तो वंग- दोषको त्याग देता है २॥ ऐसेही पारेको अमलतासके गूदेमें सात दिन मर्दन कर गर्म कांजीसे धोता रहे तो पारेका मलदोष दूर होता है ३॥ इसी प्रकार चीतेकी जडकी छालके चूर्णमें मर्दन करनेसे वह्निदोष दूर होता है ४॥ काले धतूरेके रसमें या बीजोंके चूर्णमें उप- रोक्त विधिसे पारेका मर्दन करनेसे पारेका चांचल्य दोष दूर होता है ५॥ त्रिफलेके चूर्णमें उपरोक्त विधिसे रगडे तो पारेका विषदोष नष्ट होता है ६॥ ऐसेही त्रिकुटेके चूर्णमें मर्दन करनेसे पारेका गिरि दोष दूर होता है ७॥ एवं गोखरूके चूर्णमें मर्दन करनेसे पारेका असह्याग्नि दोष दूर होता है ८॥ हरेक दोषके दूरकरनेके लिये उस २ द्रव्यके सोलहवें भाग चूर्णमें घीकुमारका रस डालकर उसमें पारेको मर्दन करे फिर मिट्टीके पात्रमें डाल राईकी गर्म की हुई कांजीसे धोडाले । इस प्रकार शोधन किया हुआ पारा सात कंचुकी रहित हा जाता है ॥ २४–२७ ॥ अन्य प्रकारसे शोधन । श्रीखण्डं देवकाष्ठञ्च काकजंघा-जया-द्रवैः । कर्कटी-मूषली-कन्या-द्रवं दत्त्वा विमर्दयेत् । दिनैकं पातयेत्पश्चात् शुद्धं विनियोजयेत् ॥ २८ ॥
भाषाटीकासहित । ( ९ ) श्वेत चन्दन, देवदारु, काकजंघा, जया ( जयन्ती या भांग ) का रस, कर्कटी, ( दन्दाल डोडा ) मूसली ( काली मूसली और घीकुंवारका रस इन सब द्रव्योंमें पारेको एक दिन मर्दन करके ऊर्ध्व पातनयंत्रमें उडाले फिर निकाल कर कांजीसे धोकर सब कार्यमें इस पारेको लेवे यह शुद्ध पारद् है ॥ २८ ॥ ० कुमार्या च निशाचूर्णैर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । पातयेत्पातनायन्त्रे सम्यक् शुद्धो भवेद्रसः ॥ २९ ॥ अथवा-हलदीके चूर्ण और घीकुमारके रसमें पारेको खरल करके ऊर्ध्व पातन ( डमरु ) यंत्रद्वारा उडा लेवे तो यह पारद शुद्ध होजा- यगा इसको सब औषधियोंमें डाले ॥ २९ ॥ रसस्य द्वादशांशेन गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् । जम्बीरोत्थैर्द्रवैर्यामं पाच्यं पातनयन्त्रके । पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारं विधानतः ॥ ३० ॥ अथवा-पारेमें पारेसे बारहवें भाग शुद्ध आमलासार गंधक मिलाकर जंबीरी नींबूके रसमें एक पहर मर्दन करे फिर ऊर्ध्वपातन यंत्र ( डमरुयंत्र ) द्वारा पारेको उडाले फिर इस पारेमें बारहवां भाग शुद्ध गंधक और मिलाकर जंबीरीके रसमें मर्दन कर ऊर्ध्वपातन यंत्रमें उडावे ऐसे ७ वार उडानेसे पारा शुद्ध होजाता है ॥ ३० ॥ जयन्त्या वर्द्धमानस्य चार्द्रकस्य रसेन च । वायस्याश्चानुपूर्व्येण मर्दनं रसशोधनम् ॥ ३१ ॥ एषां प्रत्येकशस्तावन्मर्दयेत्स्वरसेन च । यावच्च शुष्कतां याति सप्तवारं क्रमेण च ॥ ३२ ॥ उद्धृत्योष्णारनालेन मृद्भाण्डे क्षालयेत्सुधीः । सर्वदोषविनिर्मुक्तः सप्तकंचुकवर्जितः । जायते शुद्धसूतोऽयं युज्यते सर्वकर्मसु ॥ ३३ ॥
( १० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथवा-जयन्ती, एरण्ड, अदरख और काकमाची ( मकोय ) इन चारोंके स्वरसमें क्रमपूर्वक एक एकके स्वरसमें सात सात वार मर्दन कर सुखाता जावे और सूखनेपर मट्टीके पात्रमें डालकर राईकी गर्म की हुई कांजीसे धो डाले ऐसे ही जयंती आदि चारोंके स्वरसमें पृथक् पृथक् मर्दन कर कांजीसे धो डाले तो पारा शुद्ध और सर्व दोष रहित सप्तकंचुकी वर्जित होजाता है । यह पारा सब प्रयोगोंमें काममें लाने योग्य होजाता है ॥ ३१-३३ ॥ निशेष्टकाधूमरजोऽम्लपिष्टो विकंचुकः स्याद्धि ततश्च सोर्णः । वरा-ऽऽरनाला-ऽनल-कन्यकाभिः सत्र्यूषणाभिर्मृदितस्तु सूतः ॥ ३४ ॥ अथवा-हल्दी, ईंटका चूर्ण, गृहधूम और अम्लवर्ग इसमें पारेको मर्दन कर सुखावे, कांजीसे धो डाले फिर इसमें ऊन, त्रिफलेका चूर्ण, त्रिकुटेका चूर्ण, चित्रक, घीकुमार और कांजी मिलाकर मर्दन करे, सूखनेपर गर्म की हुई कांजीसे धोकर पारद निकाल ले तो पारद सप्तकंचुकी रहित और शुद्ध होजाता है ॥ ३४ ॥ दिनैकं मर्दयेत्सूतं कुमारीसम्भवैर्द्रवैः । तथा चित्रकजैः क्वाथैर्मर्दयेदेकवासरम् । काकमाचीरसैः सार्द्धं दिनमेकन्तु मर्दयेत् ॥ ३५ ॥ अथवा-पारेको घीकुमारके रसमें एक दिन खरल करे फिर सुखा- कर गर्म की हुई कांजीसे धो डाले । ऐसे ही एक दिन चित्रकके रसमें खरल करे । और इसी प्रकार काकमाची ( मकोय ) के रसमें खरल- करे फिर मट्टीके पात्रमें डालकर गर्म कांजीसे धो डाले तो पारद शुद्ध होजाता है ॥ ३५ ॥
भाषाटीकासहित । (११) रसोनस्वरसैः सूतो नागवल्लीदलोत्थितैः । त्रिफलायास्तथा क्वाथै रसो मर्द्यः प्रयत्नतः ॥३६॥ ततस्तेभ्यः पृथक् कृत्वा सूतं प्रक्षाल्य काञ्जिकैः । सर्वदोषविनिर्मुक्तं योजयेद्रसकर्मसु ॥ ३७ ॥ अथवा-पारेको रसोन ( लहसुन ) के स्वरसमें खरल करे फिर नागर- वेलके पानके रसमें खरल करे, तदनंतर त्रिफलेके क्वाथमें यत्नपूर्वक खरल करे । फिर इनसे पारेको अलग कर कांजीसे धो डाले तो पारा सर्व दोषरहित और सब काममें लाने योग्य होजाता है ॥३६॥ ३७ ॥ अथोर्ध्वपातनसंस्कार । भागास्त्रयो रसस्यार्कभागमेकं विमर्दयेत् । जंबीरद्रवयोगेन यावदायाति पिण्डताम् ॥ ३८ ॥ तत्पिण्डं तलभाण्डस्थमूर्ध्वभाण्डे जलं क्षिपेत् । कृत्वालवालं केनापि ततः सूतं समुद्धरेत् ॥ ऊर्ध्वपातनमित्युक्तं भिषग्भिः सूतशोधने ॥ ३९ ॥ पारा ३ भाग, शुद्ध ताम्रके छोटे बारीक पत्र १ भाग इन दोनोंको जंबीरी नींबूके रसमें तबतक खरल करे जबतक पारे और तांबेका पिंडसा न बन जावे । जब पिण्डसा बन जाय तो उसको एक मिट्टीके घट ( चाटीके ) अन्दर टिकियासी बनाकर रख दे, दूसरा उतना ही बडा घट लेकर उस पात्रके मुखपर अधो- मुख रखकर दोनों घटोंका मुख गजनी ( मुलतानी ) मट्टी और कपडेसे विधिवत् संधान कर देवे फिर इसको चूल्हेपर चढाकर नीचे क्रमसे अग्नि जलावे । ऊपरके अधोमुख घटके ऊपर चिकनी मट्टीसे घेरासा बनाकर उसमें शीतल जलसे भिगोकर कपडा रखता रहे जिससे अधोमुख घटका तलभाग ( थल्ला ) गरम न होने पावे इसको दो पहरकी अग्नि देकर फिर शीतल होनेपर उतार कर
( १२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ऊपरके घटमें उडकर लगे हुए पारदको निकाल ले । इसको वैद्योंने ऊर्ध्वपातन यंत्र ( डमरुयन्त्र ) कहा है । यह पारेके शोधनमें ऊर्ध्वपातन संस्कार है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ अधःपातनसंस्कार । नवनीताह्वयं सूतं घृष्ट्वा जम्भाम्भसा दिनम् । वानरी-शिग्रु-शिखिभिः सैन्धवा-ऽऽसुरिसंयुतैः॥४०॥ नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाण्डके । ऊर्ध्वभाण्डोदरं लिप्त्वाऽधोभाण्डं जलसंयुतम् ॥४१॥ सन्धिलेपं द्वयोः कृत्वा तद्यन्त्रं भुवि पूरयेत् । उपरिष्टात्पुटे दत्ते जले पतति पारदः । अधःपातनमित्युक्तं सिद्धाद्यैः सूतकर्मणि ॥ ४२ ॥ शुद्ध आमलासार गंधक और पारेको एक दिन जम्बीरीरसमें खरल कर कजली बना ले, इस कजलीमें कौंचके बीज, सहँजनेके बीज, अपामार्ग (औंगा, चिरचिटा ) के बीज, सेंधानमक और राई मिलाकर जम्बीरीके रसमें घोटे । जब सब मिलकर पीठीसी बन जावे तो इस पीठीको ऊपरके घटमें लेप करदे, नीचेके पात्रमें पानी भरकर ऊपरका लेपवाला पात्र पानीवाले पात्रके मुखपर अधोमुख रख- कर दोनोंके मुखको कपडमिट्टीसे बंद करदे फिर पानीवाले पात्रको मुखपर्य्यंत पृथ्वीमें गाड दे, ऊपरवाले अधोमुख पात्रके सब ओर आरने उपले लगा कर अग्नि देवे तो सब पारा नीचे पानीमें चला जावेगा । पारेके संस्कारोंमें सिद्धादिकोंने इसको अधःपातन संस्कार कहा है ॥ ४०–४२ ॥ तिर्यक्पातनसंस्कार । घटे रसं विनिक्षिप्य सजलं घटमन्यकम् । तिर्यङ्मुखं द्वयोः कृत्वा तन्मुखं रोधयेत्सुधीः ॥ ४३ ॥
भाषाटीकासहित । ( १३ ) रसाधो ज्वालयेदग्निं यावत्सूतों जलं विशेत् । तिर्यक्पातनमित्युक्तं सिद्धैर्नागार्जुनादिभिः ॥ ४४ ॥ एक बडे अच्छे घडेमें पारा डाल दे और दूसरे वैसेही घडेमें पानी डाले फिर दोनों घटोंको तिरछे करके विधिवत् दोनोंके मुख जोड देवे। फिर पारेवाले घटके नीचे अग्नि जलावे तो पारा उडकर पानीमें चला जायगा । इस पारदके संस्कारको नागार्जुन आदि सिद्धोंने तिर्यक्- पातन संस्कार कहा है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ बोधनसंस्कार । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढत्वमधिगच्छति । तन्मुक्तयेऽस्य क्रियते बोधनं कथ्यते हि तत् ॥ ४५ ॥ इस प्रकार मर्दन और पातन आदि करनेसे कंचुकी आदि दोष तो दूर हो जाते हैं परंतु पारेमें षण्ढत्व ( नपुंसकता ) आजाती है । उस षण्ढत्वके दूर करनेको हम बोधन संस्कार कहते हैं ॥ ४५ ॥ विश्वामित्रकपाले वा काचकूप्यामथापि वा । सूतं विनिक्षिप्य जलं तत्र तन्मज्जनावधि ॥ ४६ ॥ पूरयेत्रिदिनं भूम्यां गजहस्तप्रमाणतः । अनेन सूतराजोऽयं षण्ढभावं विमुञ्चति ॥ ४७ ॥ नारियलमें या काचकी शीशीमें पारा डालकर उसमें इतना पानी डाले जिसमें पारा डूबजावे फिर इसका मुख बंद करके डेढगज गहरे गढेमें दबादे चौथे दिन निकाल ले तो पारेका षण्ढत्व दूर होजाता है। कोई इस पारेको नारिकेल या शीशीमें डालकर इसमें नमकका पानी डाल पृथ्वीमें गाडे ऐसा मानते हैं । कहीं “ सूतं विनिक्षिप्य जलं ” इस पाठकी जगह “ सृष्ट्यंबुजं विनिक्षिप्य ” ऐसा पाठ लिखकर सोलह वर्षकी स्त्रीका मासिक रज डालना ऐसा मानते हैं ॥४६॥४७॥ २
( १४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हिंगुलसे पारा निकालनेकी विधि । अथवा हिंगुलात्सूतं ग्राहयेत्तन्निगद्यते । जम्बीरनिम्बुनीरेण मर्दितो हिंगुलो दिनम् ॥ ४८ ॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण ग्राह्यः स्यान्निर्मलो रसः । कंचुकैर्नागवङ्गाद्यैर्निर्मुक्तो रसकर्मणि । विना कर्माष्टकेनैव सूतोऽयं सर्वकर्मकृत् ॥ ४९ ॥ जहांपर संस्कारशुद्ध पारद् न मिल सके तो सिंगरफसे निकाला हुआ पारा लेना चाहिये सो सिंगरफसे पारा निकालनेकी विधि कहते हैं- सिंगरफको एक दिन नींबूके रसमें मर्दन करके ऊर्ध्वपातन यंत्रद्वारा पारा निकाल ले । यह पारा मलरहित सप्तकंचुकी और नाग वंगादि दोष रहित होता है यह हिंगुलसे निकाला हुआ पारा अष्ट संस्कारके विनाही सब कर्ममें लेने योग्य होता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ पारदके अष्ट संस्कार । स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापनं तथा । पातनं बोधनञ्चैव नियामनमतः परम् । दीपनञ्चेति संस्काराः सूतस्याष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ ५० ॥ स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियामन और दीपन यह पारेके आठ संस्कार कथन किये हैं । वह इस प्रकार हैं- ( १ ) त्रिफला, त्रिकुटा, चित्रक, घीकुमार और कांजी इन सबको एक घडेमें डालकर चूल्हेपर रक्खे, इस घडेमें किसी अच्छे गाढे वस्त्रको चौलड ( चार तह ) करके उसमें पारेको बांधकर दोलायंत्रके विधानसे लटकावे नीचे आग जलावे इस प्रकार घडेके कांजीवाले पानीमें तीन दिन पकानेको स्वेदन संस्कार कहते हैं । अथवा त्रिकुटा, नमक, राई, मूलीके बीज, त्रिफला, अदरख, महाबला, नागबला, चौलाई, पुनर्नवा, मेढासिंगी, चित्रक और नौसादर इनको धान्याम्ल ( धान्योंकी कांजी ) में रगड़कर एक गाढे वस्त्रपर एक अंगुल मोटा
भाषाटीकासहित । ( १५ ) लेप करे उसमें पारा बांधकर धान्याम्लमें तीन दिन दोलायंत्रमें पकावे यह स्वेदन संस्कार है ॥ ( २ ) घरका धूम, ईंटका चूर्ण, कालाजीरा, जली हुई ऊन, गुड, सेंधानमक और राई यह पारेसे सोलहवें सोलहवें भाग लेकर सबका चूर्णकर पारेमें मिला कांजी डालकर तीन दिन रगडे इसको मर्दन संस्कार कहते हैं ॥ ( ३ ) त्रिफलेका चूर्ण घीकुमार और चित्रक इन तीनोंमें खरल करके सूखनेपर कांजीसे धोडाले इस प्रकार सात बार इन्हीं द्रव्योंमें रगडनेको मूर्च्छन संस्कार कहते हैं ॥ अथवा पहले जो सप्तकंचुकी हरण विधि कह आये हैं उसको मूर्च्छन संस्कार कहते हैं ॥ ( ४ ) घीकुमारके रसमें चौथाई भाग हलदीका चूर्ण मिलाकर घोटकर डमरुयंत्रमें उडाले इसको उत्थापन संस्कार कहते हैं । अथवा नींबूके रसमें खरल कर धूपमें सुखाकर पारा निकाल ले बाकी रहे पारेको उडाकर निकालले यह उत्थापन संस्कार है ॥ ( ५ ) उर्ध्वपातन और तिर्यक्पातन करनेको पातन संस्कार कहते हैं ॥ ( ६ ) ४६ । ४७ के श्लोकमें जो षण्ढत्वनाशन विधि कही है उसको बोधन संस्कार कहते हैं ॥ ( ७ ) नाकुलीकंद, चिंचिका ( इमली या रक्तक ), वांझककौडेका कंद, भांगरा, नागरमोथे और धतूरेके पत्रोंका स्वरस इनमें तीन दिन रगडनेसे पारा स्थिर होजाता है इसको नियामन संस्कार कहते हैं ॥ ( ८ ) कसीस, पांचों लवण, राई, मिर्च, सुहांजनेके बीज और सुहागा इन सबका चूर्ण धान्याम्लजलमें घोलकर इस पानीमें दोला- यंत्रद्वारा पारेको तीन दिन पकानेसे पारेका दीपन संस्कार होता है॥ यद्यपि पारेके १८ संस्कार होते हैं जो वृहद् रसग्रंथोंमें लिखे हैं । यहांपर केवल ८ संस्कार लिखदिये हैं, अठारह संस्कार यहां ग्रंथ बढ-
( १६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नेके भयसे नहीं लिखे और इस ग्रंथकारने केवल पारेके संक्षेपसे ४ संस्कार लिखे हैं जैसे-शोधन, मूर्च्छन, बंधन और मारण सो यथा- क्रम ग्रंथकारने लिखे हैं ॥ ५० ॥ सिंगरकसे पारा निकालनेमें अन्यमत । दरदं तण्डुलस्थूलं कृत्वा मृत्पात्रके त्रिदिनम् । भाव्यं जंबीररसैश्चांगेय्र्या वा रसैर्बहुधा ॥ ५१ ॥ ततश्च जंबीरवारिणा चांगेर्या रसेन वा परिप्लुतम् । कृत्वा स्थालीमध्ये निधाय तदुपरि कठिनीघृष्टमुत्तानम् ॥ चारु शरावं तत्र त्रिंशद्वारं जलं देयम् । उष्णे देयं तथैव तदूर्ध्वपातनेन निर्मलः शिवजः ॥ ५३ ॥ सिंगरफके छोटे छोटे चावलोंके बराबर टुकडे कर उनमें नींबूका रस डालके सुखावे अथवा चांगेरी ( चौपतिया शाक ) के रसकी अनेक ( सात ) भावना देवे फिर मट्टीके बडे पात्रमें डालकर उसमें इतना नींबूका रस और चांगेरीका रस डाले जिसमें सिंगरफका सब चूरा डूब जावे फिर उस पात्रके मुखपर खडियासे लिपा हुआ एक तौल्ला ( बडाभारी शराव ) सीधा रखकर मिट्टी और कपडेसे खूब संधिलेप करदे इस पात्रको चूल्हेपर रख नीचे नीचे तीन प्रहर अग्नि जलावे और ऊपरवाले पात्रमें जब जल गरम हो तो निकालकर शीतल जल डाले ऐसे तीस बार जल बदले जिससे ऊपरका पात्र गरम न होने पावे । तीन पहरके अनंतर आग निकालकर बुझादे जब यह यन्त्र सर्वांग शीतल हो जाय तो ऊपरके पात्रमें लगे शुद्ध पारेको खडिया सहित निकाल ले, फिर कपड छानकर कांजी और पानीसे धोकर साफकर ले यह शुद्ध पारद है ॥ ५१-५३ ॥ पारिभद्ररसैः पेष्यं हिंगुलं याममात्रकम् । जम्बीराणां रसैर्वाथ पचेत्पातनयन्त्रके ॥ ५४ ॥