भारतकोश
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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । (२८१) साथ सेवन करे और ऊपरसे गूलर और घीका अनुपान करे । इसके सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २३-२४ ॥ नीलोत्पलसिताक्षौद्रसंयुक्तं पद्मकेसरम् । तण्डुलोदकपानेन रक्तपित्तं नियच्छति ॥ २५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे रक्तपित्तचिकित्सा । नीलकमल अथवा नीलोत्पल ( नीलोफर ), मिश्री, शहद और कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके चावलोंके जलके साथ सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २५ ॥ इति रक्तपित्तचिकित्सा । अथ यक्ष्माधिकार । रास्नादि लौह । रास्नाश्वगन्धाकर्पूरभेकपर्णीशिलाह्वयैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैर्लोहं यक्ष्मान्तकृन्मतम् ॥ १ ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तमपि वैद्यविवर्जितम् । हन्ति कासं स्वराघातं राजयक्ष्म क्षतक्षयम् ॥ बलवर्णाग्निपुष्टीनां वर्द्धनं दोषनाशनम् ॥ २ ॥ रास्ना, असगंध, कपूर, मण्डूकपर्णी, शिलाजीत, हरड़, बहेडा, आमला, सोंठ, मरिच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे समस्त उपद्रव युक्त, वैद्य करके छोडा हुआ राजयक्ष्म- रोगी अवश्य आरोग्य होजाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी, स्वरभेद, राजयक्ष्मा, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं; बल, वर्ण अग्नि और पुष्टिकी वृद्धि होती है तथा त्रिदोषको नष्ट करता है । इसको रास्नादि लौह कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥

( २८३ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । राजमृगांक रस । रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् । मृततारस्य भागैकं शिलागन्धकतालकम् ॥ ३ ॥ प्रतिभागद्वयं शुद्धमेकीकृत्य विचूर्णयेत् । वराटिका तेन पूर्या चाजाक्षीरेण टङ्कणम् ॥ ४ ॥ पिष्ट्वा तेन मुखं रुद्ध्वा मृद्भाण्डे तां निरोधयेत् । शुष्कं गजपुटे पाच्यं चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् ॥ ५ ॥ दशपिप्पलिकैः क्षौद्रैर्मरिचैर्वा घृतान्वितैः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य क्षयरोगप्रशान्तये ॥ ६ ॥ सघृतैर्दापयेद्वाथ वातश्लेष्मभवे क्षये । रसो राजमृगाङ्कोऽयं नानारोगनिषूदनः ॥ ७ ॥ पाराभस्म, या रससिन्दूर ३ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, चांदीकी भस्म १ भाग, मैनशिल २ भाग, गंधक २ भाग और हरितालभस्म २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कौडीमें भर देवे । पश्चात् बकरीके दूधमें सुहागेको पीसकर उससे कौडीके मुखको बंद कर देवे, फिर उस कौडीको मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । शीतल होने- पर चूर्ण करके दश पीपल और सहतके द्वारा अथवा १० कालीमिरच और घृतके द्वारा इसको चार रत्ती परिमाण क्षयरोगको नष्ट करनेके लिये सेवन करे । वातश्लेष्मज क्षयरोगमें घृतके साथ भक्षण करे । इससे अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ३-७ ॥ मृगाङ्क रस । स्याद्रसेन समं हेम·मौक्तिकं द्विगुणं भवेत् । गन्धकञ्च समं तेन रसतुल्यन्तु टंकणम् ॥ तत्सर्वं गोलकं कृत्वा काञ्जिकेन च पेषयेत् । भाण्डे लवणपूर्णेऽथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ८ ॥

भाषाटीकासहित । ( २८३ ) मृगाङ्कसंज्ञको ज्ञेयो राजयक्ष्मनिकृन्तनः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य मरिचैः सह भक्षयेत् ॥ ९ ॥ पिप्पलीदशकैर्वापि मधुना सह लेहयेत् । पथ्यन्तु लघुभिर्मांसैः प्रयोगेऽस्मिन्प्रयोजयेत् ॥१०॥ व्यञ्जनैर्घृतपक्वैश्च संस्कृतैर्ह्यविदाहिभिः ॥ वृन्ताकबिल्वतैलानि कारवेल्लं च वर्जयेत् ॥ स्त्रियं परिहरेद्दूरं कोपञ्चापि विवर्जयेत् ॥ ११ ॥ पारा १ भाग, सोनाभस्म १ भाग, मोती २ भाग, गंधक ३ भाग और सुहागा १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र कांजीमें पीसकर गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर नमकसे भरी हुई हाँडीमें उस मूषाको रखकर चार प्रहर तक पकावे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर काली मिरचोंके चूर्णके साथ; अथवा दश पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेव- नके अंतमें लघु ( हलके ) मांसको घृतके द्वारा संस्कार किये हुए और परिपक्व हुए व्यञ्जन और अविदाही पदार्थ पथ्य देवे । बैंगन, बेल, तैल और करेलेको नहीं खाये । तथा स्त्रीप्रसंग और क्रोधका त्याग कर देवे । इसके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको मृगांक रस कहते हैं ॥ ८-११ ॥ रत्नगर्भपोट्टली रस । रसं वज्रं हेम तारं नागं लौहञ्च ताम्रकम् । तुल्यांशं मरिचं देयं मुक्ताविद्रुममाक्षिकम् ॥ १२ ॥ शंखं तुत्थञ्च तुल्यांशं सप्ताहं चित्रकद्रवैः । मर्दयित्वा विचूर्ण्याथ तेन पूर्या वराटिका ॥ १३ ॥

( २८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । टङ्कणं रविदुग्धेन मुखं लिप्त्वा निरोधयेत् । मृद्भाण्डे तां निरुध्याथ सम्यग्गजपुटे पचेत् ॥१४॥ आदाय चूर्णयेत्सर्वं निर्गुण्ड्या सप्त भावयेत् । आर्द्रकस्य रसैः सप्त चित्रकस्य च विंशतिः ॥१५॥ द्रवैर्भाव्यं ततश्चास्य देयं गुञ्जाचतुष्टयम् । क्षयरोगं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः॥१६॥ योजयेत्पिप्पलीक्षौद्रैः सघृतैर्मरिचैस्तथा । महारोगाष्टके कासे श्वासे चैवातिसारके ॥ पोटलीरत्नगर्भोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ १७ ॥ पारा, हीरा, सोना, चांदी, सीसा, लोहा, तांबा इन सबकी भस्म, काली मिरच, मोती, मूँगाभस्म, सोनामाखीभस्म, शंखकी भस्म और शुद्ध तूतिया इन सब औषधियोंको सम भाग लेकर और एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें सात दिन तक खरल करे। फिर इसको कौड़ीमें भरकर उसके मुखको आकके दूधमें पिसे हुए सुहागेसे बन्द कर देवे। फिर मिट्टीके सिकोरेमें रखकर ऊपरसे एक दूसरा सिकोरा ढक देवे और उसकी मूषा बनाकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर इसका चूर्ण कर ले । फिर सम्हालूके पत्तोंके रसकी सात भावना देवे, अदरखके रसकी सात भावना देवे और चित्रककी जड़के रसकी २० भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य क्षयरोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह औषधि आठ प्रकारके महारोग, खांसी, श्वास और अतिसारमें पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । अथवा कालीमिरचोंका चूर्ण और घृतके साथ प्रयोग करे । यह औषधि सर्वरोगनाशक है । इसको रत्नगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ १२-१७ ॥

भाषाटीकासहित । ( २८५ ) लोकेश्वरपोट्टली रस । भस्म सूताच्चतुर्थांशं मृतस्वर्णं प्रदापयेत् । द्विगुणं गन्धकं दत्त्वा मर्दयेच्चित्रकाम्बुना ॥ १८ ॥ पूर्या वराटिका तेन टङ्कणेन निरुध्य च । भाण्डे चूर्णप्रलिप्तेऽथ क्षिप्त्वा रुद्ध्वा च मृन्मये ॥१९॥ शोषयित्वा गजपुटे पुटेत्तु चापराह्निके । स्वांगशीतं समुद्धृत्य चूर्णयित्वा तु विन्यसेत् । एष लोकेश्वरो नाम वीर्यपुष्टिविवर्द्धनः ॥२०॥ गुंजाचतुष्टयञ्चास्य पिप्पलीमधुसंयुतम् । मारिचघृतयुक्तैश्च भक्षयेद्दिवसत्रयम् । अङ्गकार्श्येऽग्निमान्द्ये च कासे पित्ते क्षयेपि च ॥२१॥ पारदभस्म या रससिन्दूर ४ भाग; सोनेकी भस्म १ भाग और गन्धक २ भाग लेवे । इन सबको चित्रककी जड़के रसमें खरल करके कौड़ीमें भर देवे और उसका मुख सुहागेसे बन्द कर देवे । पश्चात् एक सिकोरेमें चूनेका लेप करके पश्चात् उसमें कौड़ीको रखकर फिर एक दूसरे सिकोरेसे ढक देवे । फिर उसकी अच्छे प्रकारसे कपड़मट्टी करके सुखा लेवे । पश्चात् इसको दोपहरके बाद गजपुटमें रखकर फूंक देवे । शीतल होनेपर कौड़ीको पीसकर चूर्ण कर ले । यह लोकेश्वर- पोटली रस वीर्य और पुष्टीकी वृद्धि करनेवाला है, इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर शहद पीपलके चूर्णके साथ सेवन करे । शरी- रकी कृशता, मन्दाग्नि, खाँसी, पित्तरोग और क्षय रोगमें काली मिर- चोंके चूर्ण और घृतके साथ तीन दिन तक सेवन करे ॥ १८-२१ ॥ लवणं वर्जयेत्तत्र साज्यं दधि च भोजयेत् ॥२२॥ एकविंशदिनं यावत्सघृतं मरिचं पिबेत् ।

( २८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पथ्यं मृगांकवद्देयं शयीतोत्तानपादतः ॥ २३ ॥ ये शुष्का विषमाशनैः क्षयरुजा व्याप्ताश्च येऽष्ठी- लया, पाण्डुत्वेन हताश्च वैद्यविधिना ये त्याजिता दुर्भागाः । ये तप्ता विविधैर्ज्वरैः श्रममदोन्मादैः प्रमादं गता,–स्ते सर्वे विगतामया हतरुजः स्युः पोट्टलीसेवनात् ॥ २४ ॥ इस औषधिके सेवन करनेपर लवणका भक्षण करना त्याग देवे । घृत और दधि अवश्य भक्षण करना चाहिये । इसको २१ दिन तक खाये और घी तथा मरिचोंके चूर्णका सेवन करे । मृगाङ्कके समान पथ्य देवे और ऊपरको पैर करके अर्थात् चित्त शयन करे । जो मनुष्य विषम भोजन करनेसे शुष्क हो गये हैं, जिनके क्षय रोग, अष्ठीला और पांडु रोग है, जिनको अत्यंत दारुण रोगोंसे पीड़ित होनेके कारण वैद्योंने त्याग दिया है, जो अनेक प्रकारके ज्वरोंसे संतप्त हैं, तथा जो श्रम और उन्मादरोगसे पीडित हैं उनको यह औषधि अवश्य सेवन करानी चाहिये । इससे शीघ्र ही उपरोक्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ २२–२४ ॥ कनकसुन्दर रस । रसस्य तुर्यभागेन हेमभस्म प्रयोजयेत् । मनःशिला गन्धकञ्च तुत्थं माक्षिकतालकम् ॥२५॥ विषं टङ्कणं सर्वं रसतुल्यं प्रदापयेत् । मर्दयेत्सर्वमेकत्र खल्लपात्रे च निर्मले ॥ २६ ॥ जयन्तीभृंगराजोत्थैः पाठाया वासकस्य च । अगस्तिलांगलाग्नीनां स्वरसैश्च पृथक् पृथक् ॥२७॥ भावयित्वा विशोष्याथ पुनश्चार्द्रकवारिणा । सप्तधा भावयित्वा च रसः कनकसुन्दरः ॥२८॥

भाषाटीकासहित । (२८७) गुञ्जाद्वयं त्रयं वास्य राजयक्ष्मप्रशान्तये । मधुना पिप्पलीभिर्वा मरिचैर्वा घृतान्वितम्॥२९ ॥ सन्निपाते प्रदातव्यमार्द्रकस्य रसेन वै । जयपालरजोभिर्वा गुल्मिने शूलरोगिणे ॥ ३० ॥ अम्लवर्जं चरेत्पथ्यं बल्यं हृद्यं रसायनम् । वर्ज्जयेल्लवणं हिंगु तक्रं दधि विदाहि यत् ॥ ३१ ॥ पारा ४ भाग, सोनाभस्म १ भाग और मैनशिल, गंधक, तूतिया, सोनामाखी भस्म, हरिताल भस्म, विष और सुहागा यह प्रत्येक औषधि चार चार भाग लेवे। इन सब औषधियोंको अच्छे प्रकारसे खरल करके जयंती, भांगरा, पाठ, अडूसा, अगस्तियाके पत्ते, कलि- हारी, चीतेकी जड़ और अदरख इन प्रत्येकके रसके द्वारा अलग अलग सात भावना देकर धूपमें सुखा लेवे, इसमेंसे दो रत्ती परिमाण अथवा तीन रत्ती परिमाण औषधि लेकर राजयक्ष्माको शांत करनेके लिये पीपलके चूर्ण और सहतके साथ अथवा कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ; सन्निपात ज्वरमें अदरखके रसके साथ और गुल्म तथा शूल रोगमें जमालगोटेके चूर्णके साथ प्रयोग करे । इसके सेवन करनेपर अम्ल रसवाले पदार्थ, लवण, हींग, तक्र, दही और दाह- कारक पदार्थोंका त्याग कर देवे । तथा बलकारक, हृदयको हितकारी और शरीरमें रसको बढ़ानेवाले पदार्थोंका सेवन करे । इसको कनक- सुन्दर रस कहते हैं ॥ २५-३१ ॥ हेमगर्भपोट्टली रस । रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् । मृतताम्रस्य भागैकं भागैकं गन्धकस्य च ॥ ३२ ॥ मर्दयेच्चित्रकद्रावैर्द्वियामान्ते समुद्धरेत् ।

( २८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पूर्या वराटिका तेन टंकणेन विलेपयेत् ॥ ३३ ॥ वराटीं पूरयेद्भाण्डे रुद्धां गजपुटे पचेत् । विचूर्णयेत्स्वांगशीते पोट्टलीं हेमगर्भिकाम् । मृगांकवच्चतुर्गुञ्जामक्षणाद्राजयक्ष्मनुत् ॥ ३४ ॥ पारेकी भस्म ३ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, तांबा भस्म १ भाग, गंधक १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्रकर चित्रकके रसमें दो प्रहर तक खरल करके एक कौड़ीमें भर देवे और उस कौड़ीके मुखको सुहा- गेसे बंद कर देवे, फिर उस कौड़ीको मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे, शीतल होनेपर कौड़ीको पीसकर चूर्ण कर ले । फिर इसको चार रत्ती परिमाण मृगांकके समान सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको हेमगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ ३२-३४ ॥ सर्वांगसुन्दर रस । रसं गन्धञ्च तुल्यांशं द्वौ भागौ टंकणस्य च । मौक्तिकं विद्रुमं शंखभस्म देयं समांशकम् ॥ ३५॥ हेमभस्मार्धभागञ्च सर्वं खल्ले विमर्दयेत् । निम्बुद्रवेण संपिष्य पिडिकां कारयेत्ततः ॥ ३६ ॥ पश्चाद्गजपुटं दत्त्वा सुशीतञ्च समुद्धरेत् । हेमभस्मसमं तीक्ष्णं तीक्ष्णार्धं दरदं मतम् ॥ एकीकृत्य समस्तानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ॥३७॥ पारा १भाग, गन्धक १ भाग, सुहागा २ भाग तथा मोती, मूंगा और शंखकी भस्म यह सब एक २ भाग और स्वर्णभस्म आधा भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर कागजी नींबूके रसमें खरल करके पिण्डा- कार बनाकर मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर मूषा- मस औषधिको निकालकर पश्चात् उसमें आधा भाग तीक्ष्ण लोहभस्म और लोहेसे आधा भाग सिंग्रफ मिलाकर बारीक पीस लेवे ॥ ३५-३७॥

भाषाटीकासहित । ( ३८९ ) ततः पूजां प्रकुर्वीत रसस्य दिवसे शुभे । सर्वांगसुन्दरो ह्येष राजयक्ष्मनिकृन्तनः ॥ ३८ ॥ वातपित्तज्वरे घोरे सन्निपाते सुदारुणे । अर्शांसि ग्रहणीदोषे मेहे गुल्मे भगन्दरे ॥ ३९ ॥ निहन्तिवातजान्रोगाञ्छ्लैष्मिकांश्च विशेषतः । पिप्पलीमधुसंयुक्तं घृतयुक्तमथापि वा । भक्षयेत्पर्णखण्डेन सितया चार्द्रकेण वा ॥ ४० ॥ फिर किसी उत्तम दिनमें पारेकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, घोरतर वातपित्तज्वर, दारुण सन्निपातज्वर, बवासीर, संग्रहणी, प्रमेह, गुल्म,भगन्दर, समस्त वातज रोग और कफज रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको पीपलके चूर्ण, सहत अथवा घृत किंवा पान या मिश्री या अदरखके रसके साथ सेवन करे । इसको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं ॥ ३८-४० ॥ लोकेश्वर रस । पलं कपर्दचूर्णस्य पलं पारदगन्धयोः । माषञ्च टंकणस्यैव जम्बीराद्भिर्विमर्दयेत् ॥ ४१ ॥ पुटेल्लोकेश्वरो नाम्ना लोकनाथरसोत्तमः । ऋते कुष्ठं रक्तपित्तमन्यान् रोगान्बलाज्जयेत् ॥ ४२ ॥ पुष्टिवीर्यप्रसादौजः कान्तिलावण्यदः परः । कोऽस्ति लोकेश्वरादन्यो नृणां शम्भुमुखोद्भूतः ॥४३॥ पथ्यं शाल्योदनं सर्पिर्दधि शाकं सहिंगुकम् । नित्यं यामद्वयादूर्ध्वं कार्यं वारत्रयं दिवा ॥४४॥

( ३९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्र्यहाद्रुचौ वा वान्ते वा लग्नः सूतो न चेत्पुनः । अष्टमेऽह्नि प्रदातव्यः पूर्ववत्कार्यसिद्धये ॥ ४५ ॥ कौडीकी भस्म १ पल, पारा और गंधक प्रत्येक दो दो तोले और सुहागा १ मासा लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके मूशामें रखकर पुटपाककी विधिसे पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठके अतिरिक्त रक्तपित्तके अन्यान्य समस्त रोग नष्ट होकर शरीर पुष्ट, वीर्यकी वृद्धि, प्रसाद, ओज, कांति और लावण्यताकी वृद्धि होती है । इस औषधिको स्वयं महादेवजीने कहा है । संसारमें इसके समान अन्य कोई भी औषधि गुणकारक नहीं है । इस औषधिके सेवन करनेपर शालि चावलोंका भात, घी, दही, शाक और हींग भक्षण करे । इस औषधिका नित्य दो दो प्रहरमें तीन वार सेवन करे । इसके सेवन करनेसे अरुचि अथवा वमन हो जाये तो तीन दिन तक सेवन कराकर पश्चात् रोक देवे, फिर आठ दिनके पश्चात् औषधि सेवन करे ॥ ४१-४५ ॥ प्रथमे सप्तमे देया लावशूरणमुद्गकाः । द्वितीये माषगोधूमं भक्ष्यं पूर्वोदितञ्च यत् ॥ ४६ ॥ देयानि मत्स्यमांसानि तृतीये मर्दनादिकम् । तैलबिल्वारनालानि कोपस्त्रीस्वप्रजागरान् ॥ ४७ ॥ त्यजेत्कादीनि द्रव्याणि हृद्यं स्वादु च शीलयेत् । वायौ सेव्यं पयः कोष्णं पित्ते तु ससितं हितम्॥४८॥ अत्यग्नौ चोरबीजानि तिलेक्षुकदलीफलम् । खर्जूरं मांसमृद्वीका सितादि सकलं भजेत् ॥ वीर्यच्युतौ नारिकेलजलतालफलानि च ॥ ४९ ॥ इस औषधिके सेवन करते समय पहिले सप्ताहमें लवा पक्षीके मांसके साथ, जमीकंद और मूंगका यूष । दूसरे सप्ताहमें उडद, गेहूं,

भाषाटीकासहित । (२९१) लवाका मांस, जमीकंद और मूंगका यूष । तीसरे सप्ताहमें मछली और मांसको भक्षण करे तथा शरीरपर तेलका मर्दन करे । तेल, बेल, कांजी, क्रोध, स्त्रीसंग, दिनमें सोना, रात्रिमें जागना और ककारादि नामवाले पदार्थोंका त्याग कर देवे । इसपर हृदयको हितकारी और स्वादु पदार्थ सेवन करने चाहिये । वात रोगमें इस औषधिका सेवन कराकर ऊपरसे गरम दूध और पित्त रोगमें मिश्रीके साथ गरम दूध पान करना चाहिये । तीक्ष्णाग्नि रोगमें काला कचूर, तिल, ईख, केलेकी फली, खजूर, मांस, दाख और मिश्री आदि भक्षण करे। वीर्य- स्तम्भके लिये नारियलका जल और ताड़के फल सेवन करे ॥४६-४९॥ आनाहारुचिमूर्च्छार्तिधूमोद्गारविषूचिकाः । एतेषु लघुशाल्यन्नं केवलं सघृतं हितम् ॥ ५० ॥ अतिवान्तौ पिबेच्छिन्नारसं क्षौद्रेण संयुतम् । सक्षौद्रं वासकं रक्तपित्तेऽरुचिविपर्यये ॥ ५१ ॥ भृष्टधान्यं सितायुक्तमथवा क्षौद्रसंयुतम् । यवान्नं मधुसंयुक्तं पिबेद्वा माहिषं दधि ॥ ५२ ॥ घृतान्नं भक्षयेन्नित्यं सुखोष्णेन च वारिणा । च्छिन्नाम्बुसहितं देयं दाहेऽजीर्णे सुधाजलम् ॥५३॥ आर्द्रकं सर्षपं रम्भाफलं भृष्टं कफोल्बणे । अन्येऽप्युपद्रवा ये स्युस्तत्तच्छान्त्यै यथौषधम्॥५४॥ द्वात्रिंशदिवसे कार्यं स्नानमामलकैस्तिलैः । युक्तं सेव्यं बले जाते शनैरग्निबलादनु ॥ ५५ ॥ आनाह, अरुचि, मूर्च्छा, वेदना, धूमोद्गार और विषूचिका इन रोगोंमें घी मिलाकर शालि चावलोंका भात खाये । वमन रोगमें सहत मिलाकर गिलोय सेवन करे । रक्तपित्तमें सहतमें अडूसेका स्वरस मिला-

( ३९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कर, अरुचिमें मिश्रीयुक्त भूनाधनियां अथवा मध मिला भैंसका दही, अथवा मधुके साथ यवोंका सत्तू पीवे । अथवा घृत और भात सेवन करे तथा उष्ण जल पान करे । दाह और अजीर्ण रोगमें गिलो- यका रस और हरड़का रस पान करे । कफाधिक्य रोगमें अदरक, सरसों, केलेकी फली और दालचीनी भक्षण करे । अन्यान्य उपद्रवोंको नष्ट करनेके लिये यथोक्त औषधियोंका सेवन करके बत्तीस दिनतक तिल और आंमलोंके रसके द्वारा स्नान करावे । शरीरमें बल आजानेपर यथायोग्य अनुपानके साथ भोजन करे और जो बल अल्प हो तो अल्पपरिमाण भोजन करे । इसको लोकेश्वर रस कहते हैं ॥५०-५५॥ स्वल्पमृगांक । रसभस्म हेमभस्म तुल्यं गुञ्जाद्वयं भजेत् । दोषं बुद्ध्वाऽनुपानेन मृगाङ्कोऽयं क्षयापहः ॥ ५६ ॥ रससिन्दूर १ भाग और सोनेकी भस्म १ भाग इन दोनोंको एकत्र करके यथोक्त अनुपानके साथ २ रत्ती प्रमाण सेवन करनेसे क्षय रोग नष्ट होता है । इसको स्वल्पमृगांक कहते हैं ॥ ५६ ॥ काञ्चनाभ्रक । काञ्चनं रससिन्दूरं मौक्तिकं लौहमभ्रकम् । विद्रुमञ्चाभया तारं कस्तूरी च मनःशिला ॥ ५७ ॥ प्रत्येकं बिन्दुमात्रन्तु सर्वं संमर्द्य यत्नतः । वारिणा वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः ॥ ५८ ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं यथादोषानुसारतः । क्षयं हन्ति तथा कासं श्लेष्मपित्तसमुद्भवम् ॥ ५९ ॥ प्रमेहं विविधञ्चैव दोषत्रयसमुत्थितम् । कफजान्वातजान् रोगान्नाशयेत्सद्य एव हि ॥ ६० ॥

भाषाटीकासहित । ( २९३ ) बलवृद्धिं वीर्यवृद्धिं लिंगदाढर्यं करोति च । श्रीकरः पुष्टिजननो नानारोगनिषूदनः ॥ गहनानन्दनाथोक्तो रसोऽयं काञ्चनाभ्रकः ॥ ६१ ॥ सोना भस्म, रससिन्दूर, मोती, लोहा भस्म, अभ्रक भस्म, मूंगा भस्म, हरड, चांदी भस्म, कस्तूरी और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके दोषनाशक अनुपानके साथ सेवन करनेसे क्षयरोग, पित्तकफज कास, विविध प्रकारका प्रमेह, त्रिदोषज रोग, कफज रोग और वातज रोगसमूह नष्ट होते हैं । इससे बल और वीर्यकी वृद्धि होती है, लिंगमें दृढता उत्पन्न होती है और लक्ष्मी तथा पुष्टिकी वृद्धि होती है, नाना प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इस काञ्चनाभ्रकको श्रीमद्ग- हनानन्दनाथने कहा है ॥ ५७-६१ ॥ बृहत्काञ्चनाभ्र रस । काञ्चनं रससिन्दूरं मौक्तिकं लौहमभ्रकम् । विद्रुमं मृतवैक्रान्तं तारं ताम्रञ्च वंगकम् ॥ ६२ ॥ कस्तूरिका लवंगञ्च जातीकोषैलवालुकम् । प्रत्येकं बिन्दुमात्रञ्च सर्वं मर्द्यं प्रयत्नतः ॥ ६३ ॥ कन्यानीरेण संमर्द्य केशराजरसेन च । अजाक्षीरेण संभाव्यं प्रत्येकं दिवसत्रयम् ॥ ६४ ॥ चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । अनुपानं प्रयोक्तव्यं यथादोषानुसारतः ॥ ६५ ॥ क्षयं हन्ति तथा कासं यक्ष्माणं श्वासमेव च । प्रमेहान्विंशतिञ्चैव दोषत्रयसमुद्भवान् ॥ सर्वरोगं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ६६ ॥

( २९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सोनाभस्म, रससिन्दूर, मोती, लोहा, अभ्रक, मूंगा, हीरा, चांदी, तांबा, वंग इनकी भस्म; कस्तूरी, लौंग, जावित्री और एलुआ यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेकर घीक्वार और कुकुरभांगरेके रसकी, बकरीके दूधकी अलग २ तीन २ भावना देकर चार २ रत्तीकी गोलियां बना लेवे । यथादोषानुसार योग्य अनुपानके साथ इसका प्रयोगकरे । इससे क्षयरोग, खाँसी, राजयक्ष्मा, श्वास और २० प्रकारके प्रमेह, त्रिदोषज रोग और इसके अतिरिक्त अन्यान्य समस्त रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयके होनेसे अंधकारका समूह नष्ट होता है । इसको वृहत्काञ्चनाभ्र कहते हैं ॥ ६२-६६ ॥ शिलाजत्वादि लोह । शिलाजतु मधुव्योषताप्यं लौहरजस्तथा । क्षीरेण लोहितस्याशु क्षयं क्षयमवाप्नुयात् ॥ ६७ ॥ शिलाजीत, मुलैठी, सोंठ, पीपल, कालीमिरच और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्मका चूर्ण सबके बराबर लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथो- चित मात्रा दूधके साथ लेनेसे क्षय रोग नष्ट होता है । इसको शिला- जत्वादि लोह कहते हैं ॥ ६७ ॥ कुमुदेश्वर रस । हेमभस्म रसभस्म गन्धकं मौक्तिकन्तु रसटंकणं तथा । तारकं गरुडसर्वतुल्यकं काञ्जिकेन परिमर्द्य गोलकम् ॥ ६८ ॥ मृत्स्नया च परिवेष्टय शोषितं भाण्डके लवणगेऽथ पाचयेत् । एकरात्रमृदुसंपुटेन वा सिद्धिमेति कुमुदेश्वरो रसः ॥ वल्लुमस्य मरिचै- र्घृतप्लुतै राजयक्ष्मपरिशान्तये पिबेत् ॥ ६९ ॥

भाषाटीकासहित । ( २९६ ) सोनाभस्म, रससिन्दूर या पारद् भस्म, गन्धक, मोती, शुद्ध पारा, सुहागा, चांदी भस्म और सोनामाखीभस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर कांजीमें पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर इस पिंडको मिट्टीमें लपेटकर धूपमें सुखाकर नमकसे भरी हुई हांडीमें रखकर एक दिन तक मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब शीतल होजाये तब इसमेंसे औषधिको निकालकर चूर्ण कर ले । दो रत्ती परिमाण इस औषधिको कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करे तो राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको कुमुदे-श्वर रस कहते हैं ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ यक्ष्मकेसरी रस । त्रिकटुत्रिफलैलाभिर्जातीफललवङ्गकैः । नवभागोन्मितैस्तुल्यं लौहपारदसिन्दुरम् ॥ मधुना क्षयरोगाँश्च हन्त्ययं यक्ष्मकेसरी ॥ ७० ॥ हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, इलायची, जायफल और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्म ९ भाग, रससिन्दूर नव भाग और स्वर्णसिन्दूर ९ भाग लेवे, इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर सहतमें मिलाकर सेवन करे तो क्षयरोग नष्ट होता है । इसको यक्ष्मकेसरी रस कहते हैं ॥ ७० ॥ बृहच्चन्द्रामृत रस । रसगन्धकयोर्ग्राह्यं कर्षमेकं सुशोधितम् । अभ्रं निश्चन्द्रकं दद्यात्पलार्द्धञ्च विचक्षणः ॥ ७१ ॥ कर्पूरं शाणकं दद्यात्स्वर्णं तोलकसंमितम् । ताम्रञ्च तोलकं दद्याद्विशुद्धं मारितं भिषक् ॥ ७२॥ लौहं कर्षं क्षिपेत्तत्र वृद्धदारकजीरकम् । विदारी शतमूली च क्षुरकञ्च बला तथा ॥ ७३ ॥

( २९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मर्कट्यतिबला चैव जातीकोषफले तथा । लवङ्गं विजयाबीजं श्वेतस्वर्जरसं तथा ॥ ७४ ॥ शाणभागं समादाय चैकीकृत्य प्रयत्नतः । मधुना मर्दयेत्तावद्यावदेकत्वमागतम् ॥ ७५ ॥ चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कुरु यत्नतः । भक्षयेद्वटिकामेकां पिप्पल्या मधुना सह ॥ ७६ ॥ पारा १ कर्ष, गन्धक १ कर्ष, अभ्रकभस्म आधा पल, कपूर ४ मासे, सोनाभस्म १ तोला परिमाण लेवे, तांबाभस्म १ तोला, लोहेकी भस्म १ तोला तथा विधारेके बीज, जीरा, विदारीकंद, शतावर, ताल- मखाना, खिरेंटी, कौंचके बीज, कंघी, जायफल, जावित्री, लौंग, भांगके बीज और सफेद राल यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सहतमें खूब खरल करे, फिर चार चार रत्तीकी गोली बनाकर पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करावे । इससे क्षयरोग नष्ट होता है ॥ ७१–७६ ॥ महामृगांक । निरुत्थभस्म सौवर्णं द्विगुणं भस्म सूतकम् । त्रिगुणं भस्म मुक्तोत्थं शुकपुच्छं चतुर्गुणम् ॥७७॥ मृतताप्यञ्च पञ्चांशं तारभस्म चतुर्गुणम् । सप्तभागं प्रवालञ्च रसतुल्यञ्च टंकणम् ॥ ७८ ॥ सर्वमेकत्र संमर्द्य त्रिदिनं लुङ्गवारिणा । ततश्च गोलकं कृत्वा शोषयित्वा खरातपे ॥ ७९ ॥ लवणैः पात्रमापूर्य तन्मध्ये गोलकं क्षिपेत् । तन्मुखन्तु मृदा रुद्ध्वा पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ८० ॥

भाषाटीकासहित । ( २९७ ) आकृष्य चूर्णयेच्छुद्धं चतुःषष्टिविभागतः । वज्रं वा तदभावे तु वैक्रान्तं षोडशांशिकम् ॥ ८१ ॥ सोनेकी भस्म एक तोला, रससिन्दूर या पारदभस्म दो तोले, मोतीकी भस्म ३ तोले, गंधक ४ तोले, सोनामाखी भस्म ५ तोले, चांदीकी भस्म ४ तोले, मूंगेकी भस्म ७ तोले और सुहागा २ तोले, इन सब औषधियोंको बिजौरे नींबूके रसमें तीन दिन तक खरल करके गोला बना धूपमें सुखा लेवे । पश्चात् इस गोलेको नमकसे भरी हुई हांडीमें रखकर और उसका मुख अच्छे प्रकारसे बंद करके चार प्रहर तक मंद मंद अग्निके द्वारा पकावे । शीतल होनेपर समस्त औषधिका चौसठवां भाग हीरेकी भस्म अथवा जो हीरा न मिले तो वैक्रान्तकी भस्म सोलहवाँ भाग मिलावे ॥ ७९–८१ ॥ महामृगांकः खलु सिद्ध एष श्रीनन्दिनाथप्रकटी- कृतोऽयम् । वल्लोऽस्य सेव्यो मरिचाज्ययुक्तः सेव्योऽथवा पिप्पलिकासमेतः ॥ ८२ ॥ अत्रो- पचाराः कर्त्तव्याः सर्वे क्षयगदोदिताः । बल्यं वृष्यञ्च भोक्तव्यं त्यजेत्सूतविरोधि यत् ॥ ८३ ॥ यक्ष्माणं बहुरूपिणं ज्वरगदं गुल्मं तथा विद्रधिं, मन्दाग्निं स्व- रभेदकासमरुचिं वान्तिञ्च मूर्च्छां भ्रमिम् । अष्टावेव महागदान्नरगदान्पाण्ड्वामयान्कामलान्, पित्तो- त्थांश्च समग्रकान्बहुविधानन्यांस्तथा नाशयेत् ८४ यह सिद्ध महामृगाङ्क श्रीनन्दिनाथका प्रगट किया हुआ है । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके द्वारा अथवा पीपलके चूर्णके द्वारा सेवन कराकर क्षयरोगोक्त

( ३९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आहार और व्यवहारादि प्रयोग करे । बल और वीर्यवर्द्धक समस्त पदार्थ भक्षण करे और रसविरोधी सकल पदार्थोंको त्याग देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक उपद्रव युक्त राजयक्ष्मा, ज्वर, गुल्म, विद्रधि, मन्दाग्नि, स्वरभेद, खाँसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, भ्रम, आठ प्रकारके महारोग, विषरोग, पांडुरोग, कामला, पित्तजन्य अनेक प्रकारके रोग और इसके अतिरिक्त अन्यान्य अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं । इसको महामृगांक कहते हैं ॥ ८२–८४ ॥ क्षयकेसरी । मृतमभ्रं मृतं सूतं मृतं लौहञ्च ताम्रकम् । मृतं नागं च कांस्यं च मण्डूरं विमलं मृतम् ॥ ८५ ॥ वङ्गं खर्परकं तालं शंखटंकणमाक्षिकम् । मृतं स्वर्णं मृतं कान्तं वैक्रान्तं विद्रुमौक्तिकम् ॥ ८६ ॥ वराटिका च माणिक्यं राजपट्टञ्च गन्धकम् । [

भाषाटीकासहित । (२९९) मातुलुंगवरावह्निस्वम्लवेतसमार्कवम् । हयमाराद्र्करसैः पाचितो लघुवह्निना ॥ ८९ ॥ वातपित्तकफोत्क्लेशान् ज्वरान् संमर्दितानपि । सन्निपातं निहन्त्याशु सर्वाङ्गैकाङ्गमारुतान् ॥ ९० ॥ सेवितश्च सितायुक्तो मागधीरजसा युतः । मधुकाद्र्कसंयुक्तस्तद्व्याधिहरणौषधैः ॥ ९१ ॥ सेवितो हन्ति रोगान्हि व्याधिवारणकेसरी । क्षयमेकादशविधं शोषं पाण्डुं क्रिमिं जयेत् ॥ ९२ ॥ कासं पञ्चविधं श्वासं मेहमेदोमहोदरम् । अश्मरीं शर्करां शूलं प्लीहगुल्महलीमकम् ॥ सर्वव्याधिहरो बल्यो वृष्यो मेध्यो रसायनः ॥ ९३ ॥ पश्चात् इसको लोहेके पात्रमें डालकर बिजौरे नींबू, त्रिफला, चीता, अमलवेत, भांगरा, कनेर और अदरखके रसमें मन्द मन्द अग्निसे पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातपित्त, कफोत्क्लेश, ज्वर, सन्निपात, सर्वांगव्याप्त वातरोग और एकांगाश्रित वातरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको मिश्री और पीपलके चूर्णके साथ, मुलेठी और अदरखके रसके साथ, अथवा व्याधिनाशक अन्यान्य औषधियोंके साथ सेवन करनेसे ग्यारह प्रकारका क्षय, शोष, पांडु, क्रिमि, पांच प्रकारकी खाँसी, श्वास, प्रमेह, मेद, उदररोग, अश्मरी, शर्करा, शूल, प्लीहा, गुल्म और हलीमक प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । तथा बल, वीर्य, मेधा और रसकी वृद्धि होती है ॥ ८९-९३ ॥

( ३०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । यक्ष्मारोगपर योगत्रय । चन्दनं मधुकं क्षीरं पीतं रुधिरवान्तिजित् । भृङ्गराजस्य पत्रन्तु चूर्णितं मधुना सह ॥ ९४ ॥ गोलकं धारयेदास्ये कासारिष्टप्रशान्तये । पिबेद्वान्तिप्रशान्त्यर्थं क्षौद्रैश्छिन्नरुहारसम् ॥ ९५ ॥ लाल चन्दन और मुलहठीके चूर्णको दूधके साथ सेवन करनेसे रुधिरकी वमन दूर होती है । भांगरेके पत्तोंके चूर्णको सहतमें खरल करके गोलीसी बनाकर मुखमें धारण करनेसे कासजनित अरिष्टके लक्षण दूर होते हैं । गिलोयके रसको सहतके साथ सेवन करनेसे वमन शांत होती है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥ रजतादि लोह । भस्मीभूतं रजतममलं तत्समं व्योमचूर्णं, सर्वैस्तुल्यं त्रिकटु सवरं लोहमाज्येन युक्तम् । लीढं प्रातः क्षपयतितरां यक्ष्मपाण्डूदराशः, श्वासं कासं नयनजरुजः पित्तरोगानशेषान् ॥९६॥ इति श्रीरसेन्द्रसारसंग्रहे राजयक्ष्माधिकारः । स्वच्छ रूपेकी भस्म १ भाग, अभ्रकभस्म १ भाग, त्रिकुटा ३ भाग, त्रिफला ३ भाग और लोहाभस्म ३ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके प्रातःकाल घृतमें मिलाकर चाटनेसे राज- यक्ष्मा, पांडु, उदररोग, बवासीर, श्वास, खाँसी, नेत्रजनित पीड़ा और अनेक प्रकारके पित्तजनित रोग नष्ट होते हैं । इसको रज- तादि लोह कहते हैं ॥ ९६ ॥ इति राजयक्ष्मचिकित्सा समाप्त ।