भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( ३३५ ) उक्त लोहपर्पटीमें लोहेके स्थानमें तांबेका प्रयोग करनेसे अर्थात् उपरोक्त विधिसे पर्पटीको बनाकर केवल उसमें लोहेके स्थानमें तांबेको डाले तो ताम्रपर्पटी होती है ॥ १५ ॥ पिप्पल्यादि लोह । पिप्पल्यामलकी द्राक्षा कोलास्थि मधु शर्करा । विडङ्गपुष्करैर्युक्तं लौहं हन्ति सुदारुणम् ॥ छर्दिं हिक्कां तथा तृष्णां त्रिरात्रेण न संशयः ॥१६॥ पीपल, आमले, दाख, बेरकी मींगी, मुलैठी, मिश्री, वायविडंग और पोहकरमूल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोह- भस्म आठ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रासे तीन दिन तक सेवन करनेसे वमन, हिचकी और तृषारोग शांत होते हैं । इसको पिप्पल्यादि लोह कहते हैं ॥ १६ ॥ श्वासकुठार रस । टङ्कणं पारदं गन्धं विषं शिला कटुत्रिकम् । निष्पिष्य वटिका कार्या बाणगुञ्जाप्रमाणतः ॥१७॥ उष्णोदकं पिबेच्चानु क्षुद्राक्वाथमथापि वा । कासं पञ्चविधं हन्ति श्वासं श्लेष्मसमुद्भवम् ॥ शिरोरोगं निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥१८॥ सुहागा, शुद्ध पारा, गंधक, विष, मैनाशिल और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि समान लेकर सबको एकत्र पीसकर पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको गर्म जलके साथ; अथवा कटेरीके क्वाथके साथ सेवन करनेसे खाँसी, कफोत्पन्न श्वास और सब प्रकारका शिरो- रोग इसप्रकार नष्ट होते हैं जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका ध्वंस होता है । इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ १७ ॥ १८ ॥

( ३२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्वासकासचिन्तामणि रस । पारदं माक्षिकं स्वर्णं समांशं परिकल्पयेत् । पारदार्द्धं मौक्तिकञ्च सूताद्विगुणगन्धकम् ॥ अभ्रञ्चैव तथा योज्यं व्योम्नो द्विगुणलौहकम् ॥ १९॥ कण्टकारीरसेनैव छागीदुग्धैः पृथक् पृथक् । मधुयष्टिरसेनैव पर्णपत्ररसेन च ॥ २० ॥ भावयेत्सप्तवारञ्च द्विगुञ्जां वटिकां भजेत् । पिप्पलीमधुसंयुक्तां श्वासकासविमर्दिनीम् ॥ २१॥ पारा, सोनामाखीभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मोती आधा भाग, गंधक २ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग और लोहभस्म ४ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कटेरीके रस, बकरीके दूध, मुलैठीके रस और पानोंके रसमें अलग अलग सात २ भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। पीपलके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास दूर होते हैं। इसको श्वासकासचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ १९-२१॥ अन्य श्वासकुठार रस । रसं गन्धं विषं टङ्कं शिलोषणकटुत्रयम् । सर्वं संमर्द्य दातव्यो रसः श्वासकुठारकः ॥ वातश्लेष्मसमुद्भूतं श्वासं कासं क्षयं जयेत् ॥ २२ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, मैनशिल, काली मिरच और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर सेवन करनेसे वात- कफोत्पन्न रोग, श्वास, खाँसी और क्षयरोग नष्ट होते हैं। इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २२ ॥ अन्य श्वासकुठार रस । रसं गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं समनःशिलम् ।

भाषाटीकासहित । ( ३२७ ) एतानि समभागानि मरिचं तच्चतुर्गुणम् ॥ २३ ॥ त्रिभागं त्र्यूषणं ज्ञेयं खल्ले सर्वं विचूर्णयेत् । रसः श्वासकुठारोऽयं द्विगुञ्जः श्वासकासजित् ॥२४॥ गता संज्ञा यदा पुंसां तदा नस्यं प्रदापयेत् । घ्रापयेन्नासिकारन्ध्रे संज्ञाजननमुत्तमम् ॥ २५ ॥ प्रतिश्यायं क्षयक्षीणमेकादशविधं क्षयम् । हृद्रोगं श्वासशूलञ्च स्वरभेदं सुदारुणम् ॥ सन्निपातं तथा घोरं तन्द्रामोहान्वितं जयेत् ॥ २६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे हिक्काश्वासाधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, विष, सुहागा और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, कालीमिरच ४ भाग और त्रिकुटा ३ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करनेसे श्वास और खांसी दूर होती है । जिस मनुष्यकी संज्ञा नष्ट होजाय उसको यह गोली जलमें पीसकर नासिकाके छिद्रमें नस्य देवे । अथवा नासिकाके छिद्रद्वारा इस औषधिकी गंध देवे, इसके सेवन करनेसे प्रतिश्याय, क्षयक्षीण, एकादश प्रकारका क्षय, हृदयरोग, श्वास, शूल, स्वरभेद, मोह और तन्द्रायुक्त सन्निपात ज्वर दूर होते हैं । इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २३-२६ ॥ इति हिक्काश्वासाधिकार समाप्त । अथ स्वरभेदचिकित्सा । भैरव रस । रसं गन्धं विषं टङ्कं मरिचं चव्यचित्रकम् । आर्द्रकस्य रसेनैव संमर्द्य वटिकां ततः ॥ १ ॥

( ३३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गुञ्जात्रयप्रमाणेन खादेत्तोयानुपानतः । स्वरभेदं निहन्त्याशु श्वासं कासं सुदुस्तरम् ॥ २ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, कालीमिरच, चव्य और चित्रककी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना जलके साथ सेवन करनेसे स्वरभेद, श्वास और कास रोग नष्ट होते हैं । इसको भैरव रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ चव्यादि चूर्ण । चव्याम्लवेतसकटुत्रयतिन्तिडीकतालीशजीरक- तुगादहनैः समांशैः । चूर्णं गुडप्रमृदितं त्रिसुग- न्धियुक्तं वैस्वर्यपीनसकफारुचिषु प्रशस्तम् ॥ ३ ॥ चव्य, अम्लवेत, त्रिकुटा, तिन्तिडीक, तालीशपत्र, जीरा, वंश- लोचन, चित्रककी जड़, दारचीनी, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गुड़ सबकी बराबर लेवे । सबको एकत्र मिलाकर स्वरभेद, पीनस, कफ और अरुचि रोगमें प्रयोग करे । इसको चव्यादि चूर्ण कहते हैं ॥ ३ ॥ अनेनैवानुपानेन भस्मसूतं प्रयोजयेत् । योगवाहिरसञ्चापि योजयन्ति भिषग्वराः ॥ ४ ॥ सशर्करं शुण्ठिचूर्णं क्षौद्रेण सह योजितम् । कोकिलस्वर एव स्याद्गुटिकाभुक्तमात्रतः ॥ ५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे स्वरभेदाधिकारः । इसी उपरोक्त चव्यादि चूर्णके साथ रससिन्दूर और योगवाही अन्यान्य समस्त औषधियोंका प्रयोग करे । मिश्री, सोंठका चूर्ण और सहद इनको एकत्र मिलाकर गोली बनाकर सेवन करनेसे स्वर कोकि- लके समान हो जाता है ॥ ४॥५॥ इति स्वरभेदाधिकार समास ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३९ ) अथारोचकचिकित्सा । सुधानिधि रस । रसगन्धौ समौ शुद्धौ दन्तीक्वाथेन भावयेत् । जम्बीरस्य रसेनैव आर्द्रकस्य रसेन च ॥ १ ॥ मातुलुङ्गस्य तोयेन तस्य मज्जारसेन च । पश्चाद्विशोष्य सर्वांस्तान् टंकणञ्चोपचारयेत् ॥ २ ॥ देवपुष्पं बाणमितं रसपादं मृतामृतम् । माषमात्रञ्च तत्सर्वं नागरेण गुडेन वा ॥ ३ ॥ सर्वारोचकशूलार्तिसामवातं सुदारुणम् । विषूचीञ्चाग्निमान्द्यं च भक्तद्वेषञ्च दारुणम् ॥ रसोऽयं वारयत्याशु केसरी करिणं यथा ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा १ भाग, गंधक १ भाग इन दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर जम्भीरी नींबूका रस, अदरखका रस, बिजौरे नींबूका रस और बिजौरे नींबूकी मज्जाके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर पश्चात् इसमें सुहागा ५ भाग, लौंग ५ भाग और पारेसे चौथाई भाग शुद्ध विष मिला लेवे । इसमेंसे एक मासा औषधि लेकर सोंठके चूर्णके साथ अथवा गुड़के साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी अरुचि, शूल, आमवात, विषूचिका, मंदाग्नि प्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसको सुधानिधि रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ सुलोचनाभ्र । पलं सुजीर्णं गगनं तु वज्रकं तेजोवती कोलमुशीर- दाडिमम् । धात्र्यम्लरोलीरुचकं पृथग्दशपलो- न्मतं मर्दितमेव सेवितम् ॥ ५ ॥ अरोचकं

( ३३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातकफत्रिदोषजं पित्तोद्भवं गन्धसमुद्भवं नृणाम् । कासं स्वराघातमुरुग्रहं रुजं श्वासं वलासं यकृतं भगन्दरम् ॥६॥ प्लीहाग्निमान्द्यं श्वयथुं समीरणं मेहं भृशं कुष्ठमसृग्दरं क्रिमिम् । शूलाम्लपित्त- क्षयरोगमुद्धतं सरक्तपित्तं वमिदाहमश्मरीम् । निहन्ति चार्शांसि सुलोचनाभ्रकं बलप्रदं वृष्यतमं रसायनम् ॥ ७ ॥ वज्राभ्रकभस्म १ पल, चव्य, बेर, खस, अनार, आमले, अम्लनो- निया और सेंधानमक इन सब औषधियोंको १०-१० पल लेकर एकत्र खरल करके सेवन करनेसे वातज, कफज, त्रिदोषज, पित्तज और दुर्गन्धजनित अरुचि रोग, खाँसी, स्वरभेद, ऊरुस्तम्भ, यंत्रणा, श्वास, कफ, यकृत्, भगन्दर, प्लीहा, मंदाग्नि, शोथ, वायु, प्रमेह, कुष्ठ, प्रदर, क्रिमि, शूल, अम्लपित्त, क्षयरोग, रक्तपित्त, वमन, दाह, अश्मरी और अर्शरोग प्रभृति नष्ट होते हैं । यह बलको बढ़ानेवाला, वीर्यवर्द्धक और रसायन है ॥ ६-७ ॥ अरुचिघ्न रस । ससूतमरुचिघ्नं स्यात्तिंतिडीकगुडोषणम् । मृद्धीका जीरकं कृष्णा मातुलुङ्गाम्लवेतसम् ॥ ८ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहेऽरोचकाधिकारः । रससिन्दूर, पक्क इमली, गुड़, काली मिरच, दाख, जीरा, पीपल, बिजौरानींबू और अमलवेत यह सब औषधियां समान भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे अरुचि रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ इति अरोचकाधिकार समाप्त ।

भाषाटीकासहित । ( ३३१ ) अथ छर्दिरोगचिकित्सा । अजाजीधान्यपथ्याभिः सक्षुद्राभिः कटुत्रिकैः । एभिः सार्द्धं भस्मसूतः सेव्यो वान्तिप्रशान्तये ॥१॥ ( हिक्काधिकारोक्तपिप्पल्यादिलौहमत्र विधेयम् ) इति छर्दिरोगचिकित्सा । जीरा, धनिया, हरड़, कटेरी, सोंठ, मिर्च, पीपल समानभाग लेकर पारा भस्म या रससिन्दूर सबसे व्योढ़ा सेवन करनेसे वमनरोग शांत होता है । ( वमनरोगमें हिक्काधिकारोक्त पिप्पल्यादि लोह व्यवहार करना चाहिये ) । [ इस योगमें पारदभस्म अधिक है अतः सब समान भाग लें तो ठीक होगा ] ॥ १ ॥ इति छर्द्यधिकार समाप्त । अथ तृष्णारोगचिकित्सा । महोदधि रस । ताम्रं चक्रिकया वङ्गं सूतं तालं सतुत्थकम् । वटांकुररसैर्भाव्यं तृष्णाहृद्वल्लमात्रतः ॥ १ ॥ सक्षौद्रमाम्रजम्बूत्थं पिबेत्क्वाथं पलोन्मितम् । सकृष्णमधुना कुर्याद्गण्डूषं शीतले स्थितः ॥ २ ॥ तांबाभस्म, वंगभस्म, पारा, हरतालभस्म और शुद्ध तूतिया यह सब औषधि समान भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर वड़के अंकुरके रसमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियां बनाकर सेवन करनेसे तृषा रोग शांत होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् आम और जामुनकी छालके क्वाथमें सहत डालकर एक पल परिमाण सेवन करे । और जो इस रोगमें शीत अधिक हो अथवा शीत स्थानमें हो तो इसमें पीपलका चूर्ण और सहतके गण्डूष धारण करे ॥ १ ॥ २ ॥

( ३३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुमुदेश्वर रस । मृतताम्रस्य भागौ द्वौ भागैकं वङ्गभस्मकम् । यष्टीमधुरसैर्भाव्यं शुष्कं माषार्द्धकं शुभम् ॥ ३ ॥ सेव्यं चैवानुपानेन वक्ष्यमाणेन बुद्धिमान् । चन्दनं शारिवा मुस्तं क्षुद्रैलानागकेशरम् ॥ ४ ॥ सर्वतुल्या तथा लाजा पचेत्षोडशिकैर्जलैः । अर्धशेषं हरेत्क्वाथं सिताक्षौद्रयुतं तु तत् ॥ छर्दिं तृष्णां निहन्त्याशु रसोऽयं कुमुदेश्वरः ॥ ५ ॥ इति तृष्णाधिकारः । तांबेकी भस्म २ भाग, वंगकी भस्म १ भाग इन दोनोंको एकत्र पीसकर मुलैठीके क्वाथकी सात भावना देवे । पश्चात् आधे आधे मासेकी गोली बनाकर सेवन करे और ऊपरसे चन्दन, अनन्तमूल, नागरमोथा, छोटी इलायची और नागकेशर यह सब समान भाग और सबकी बराबर खीलें लेवे, सबको एकत्र करके सोलह गुने जलमें पकावे । जब पकते पकते जल आधा भाग बाकी रह जाय तब उतार लेवे, फिर उसको शीतल करके मिश्री और सहत डालकर पान करे । यह कुमुदेश्वर रस वमन और तृषाको शांत करता है ॥ ३-५ ॥ इति तृष्णाधिकार समाप्त । अथ मूर्च्छारोगचिकित्सा । सुधानिधि रस । कणामधुयुतं सूतं मूर्च्छायामनुशीलयेत् । शीतसेकावगाहादि सर्वं वा शीतलं भजेत् । सुधानिधिरसो नाम मदमूर्च्छाविनाशनः ॥ १ ॥ इति मूर्च्छाधिकारः ।

भाषाटीकासहित । ( ३३३ ) मूर्च्छा रोगमें पीपलके चूर्ण और रससिन्दूरको सहतमें मिलाकर सेवन करे । इस रोगपर शीतल जलका परिषेक (सेचन), शीतल जलमें अवगाहन और अन्यान्य समस्त शीतल वस्तुओंका सेवन करे । इसको सुधानिधि रस कहते हैं । यह औषधि मूर्च्छा रोगको नष्ट करती है ॥१॥ इति मूर्च्छारोगाधिकार समाप्त । अथ मदात्ययरोगचिकित्सा । सचव्यं हिंगुरुचकं धान्याकं विश्वदीप्यकम् । चूर्णं ससूतं मद्येन पीतं पानात्ययं जयेत् ॥ १ ॥ चव्य, हींग, काला नमक, धनिया, सोंठ, अजवायन और रस- सिन्दूर यह सब औषधि समान भाग लेकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इसको मदिराके साथ सेवन करनेसे मदात्यय रोग नष्ट होता है ॥१॥ अष्टाङ्गलवण । सौवर्चलमजाज्यश्च वृक्षाम्लं साम्लवेतसम् । त्वगेला मरिचार्धांशं शर्करामधुयोजितम् ॥ २ ॥ हितं लवणमष्टांगमग्निसन्दीपनं परम् । मदात्यये कफप्राये दद्यात्स्रोतोविशोधनम् ॥ ३ ॥ इति मदात्ययाधिकारः । काला नमक, जीरा, चूका, अमलवेत, दालचीनी, इलायची और काली मिरच यह सब औषधि समान भाग लेकर मिश्री और सहत आधा आधा भाग मिलाकर सेवन करनेसे कफजनित मदात्यय रोग नष्ट होता है । इसको अष्टाङ्गलवण कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे रोग नष्ट होकर अग्नि संदीप्त होती है और रुधिरके स्रोत शुद्ध होते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ इति मदात्ययरोगचिकित्सा ॥ १२

( ३३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ दाहचिकित्सा । सूतात्पञ्चार्कतश्चैकं कृत्वा पिण्डं सुशोधनम् । जम्बीरस्वरसैर्मर्द्यं सूततुल्यञ्च गन्धकम् ॥ १ ॥ नागवल्लीदलैः पिष्ट्वा ताम्रपत्रीं प्रलेपयेत् । प्रपुटेद्भूधरे यन्त्रे यावद्भस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २ ॥ द्विगुञ्जामाईकद्रावैरूषणेन च योजयेत् । निहन्ति दाहसन्तापं मूर्च्छा पित्तसमुद्भवाम् ॥ ३ ॥ इति दाहाधिकारः । पारा ५ भाग और तांबाभस्म १ भाग इन दोनों औषधियोंको जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करे; फिर इसमें पांच भाग गन्धक मिला लेवे और इसको पानोंके रसमें भावना देकर कल्क बनाकर उस कल्कसे तांबेके पत्रमें लेप कर देवे; फिर इसको भूधर यंत्रमें भस्म कर लेवे । दो रत्ती परिमाण इस औषधिको अदरखके रस और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे दाहजनित सन्ताप और पित्तजनित मूर्च्छा दूर होती है ॥ १-३ ॥ इति दाहचिकित्सा । अथ उन्मादरोगचिकित्सा । उन्मादगजांकुश रस । त्रिदिनं कनकद्रावैर्महाराष्ट्रीद्रवैः पुनः । विषमुष्टिजलैः सूतं समुत्थाप्यार्कचक्रिकाम् ॥ १ ॥ कृत्वा तप्तां सगन्धां तां युक्त्या बन्धनमाचरेत् । तत्समं कानकं बीजमभ्रकं गन्धकं विषम् ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३५ ) मर्दयेत्रिदिनं सर्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् । दोषोन्मादं द्रुतं हन्ति भूतोन्मादविशेषतः ॥ ३ ॥ शुद्ध पारा और शुद्ध ताम्रको समानभाग लेकर तीन दिन तक धतू- रेके पत्तोंके रसमें, तीन दिन तक ब्रह्मदण्डीके रसमें और तीन तक कुचिलेके रसमें भावना देकर चक्रिका बना लेवे । फिर पारेकी बरा- बर गन्धक लेकर चक्रिकाको गंधकके बीचमें रखकर लघुपुट दे जिससे गंधक जल जाय और पारा न उडे ऐसे ५-७ वार करनेसे ताम्र और पारेका बन्धन होजायगा । इसतरह बन्धन करनेके पश्चात् धतूरेके बीज, अभ्रक, गन्धक और विष यह प्रत्येक उसके समान भाग लेकर एकत्र तीन दिनतक खरल करे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधिसे दोषजनित और भूतजनित उन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादगजां- कुश रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ भूतांकुश रस । सूतायस्ताम्रमभ्रञ्च मुक्ता चापि समं समम् । सूतपादोत्तमं वज्रं शिलागन्धकतालकम् ॥ ४ ॥ तुत्थं रसाञ्जनं शुद्धमहिफेनं शिलाञ्जनम् । पञ्चानां लवणानाञ्च प्रतिभागं रसोन्मितम् ॥ ५ ॥ भृङ्गराजचित्रवज्रीदुग्धेनापि विमर्दयेत् । दिनान्ते पिण्डिकां कृत्वा रुद्धा गजपुटे पचेत् ॥६॥ भूतांकुशो रसो नाम नित्यं गुञ्जाद्वयं लिहेत् । आर्द्रकस्य रसेनापि भूतोन्मादनिवारणम् ॥ ७ ॥ पिप्पल्याक्तं पिबेच्चानु दशमूलकषायकम् । स्वेदयेत्कटुतुम्ब्या च तीक्ष्णं रूक्षञ्च वर्जयेत् ॥ ८ ॥ माहिषञ्च घृतं क्षीरं गुर्वन्नमपि भक्षयेत् । अभ्यङ्गः कटुतैलेन हितो भूतांकुशे रसे ॥ ९ ॥

( ३३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, लोहभस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म और मोतीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, हीराभस्म पारेसे चौथाई भाग, मैन- शिल, गन्धक, हरितालभस्म, शुद्ध तूतिया, रसौत, समुद्रफेन, काला सुर्म्मा और पांचों लवण यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब औषधियोंको भांगरेके रसमें, चित्रककी जड़के रसमें और थूह- रके दूधमें एक २ दिन तक खरल करके पिंडाकार बनाकर मूषामें रख- कर गजपुटमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करके पश्चात् ऊपरसे पीपलका चूर्ण दशमूलके क्वाथमें डालकर पान करे । तथा इसके ऊपर रोगीको कड़वी तोम्बीसे स्वेद देवे । इसपर तीक्ष्ण और रूक्ष पदार्थोंको त्याग देवे । तथा भैंसका घी, दूध और भारी पदार्थ भक्षण करे। तथा कड़वे तेलका शरीरमें मर्दन करे। इससे भूतोन्माद दूर होता है। इसको भूतांकुश रस कहते हैं ४-

भाषाटीकासहित । ( ३३७ ) बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे । इस औषधिको प्रातः- काल, संध्याके समय और रात्रिके समय नेत्रोंमें लगावे । दिनमें सह- तके साथ और रात्रिमें जलके द्वारा अंजन लगावे । इससे चातुर्थिक ज्वर, अपस्मार और उन्माद ज्वर नष्ट होते हैं । इसको उन्मादभञ्जिनी वटिका कहते हैं ॥ १०-१३ ॥ त्रिकत्रयाद्य लोह । त्रिकत्रयसमायुक्तं जीवनीययुतं त्वयः । हन्त्यपस्मारमुन्मादं वातव्याधिं सुदुस्तरम् ॥ १४ ॥ हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा, वायविडंग, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती और मुलैठी यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहा भस्म १८ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे उन्माद रोग, अपस्मार और वातव्याधि रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकत्रयाद्य लोह कहते हैं ॥ १४ ॥ उन्मादभञ्जन रस । त्रिकटु त्रिफला चैव गजपिप्पलिका तथा । देवदारु विडङ्गं च किरातं कटुकी तथा ॥ १५ ॥ कण्टकारी च यष्टीन्द्रयवं चित्रकमेव च । बला च पिप्पलीमूलं मूलं च वीरणस्य च ॥ १६ ॥ शोभाञ्जनस्य बीजानि त्रिवृता चेन्द्रवारुणी । वङ्गं रूप्यकमभ्रं च प्रवालं समभागिकम् ॥ १७ ॥ सर्वचूर्णसमं लौहं सलिलेन विमर्दयेत् । उन्मादमपि भूतोत्थमुन्मादं वातजं तथा ॥ १८ ॥

( ३३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अपस्मारं तथा कार्श्य रक्तपित्तं सुदारुणम् । नाशयेद्विकल्पेन रसश्चोन्मादभञ्जनः ॥ १९ ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, गजपीपल, वायविडंग, देवदारु, चिरायता, कुटकी, कटेरी, मुलैठी, इन्द्रजौ, चित्रककी जड़, खिरैंटी, पीपलामूल, खस, सहिजनेके बीज, निसोध, इन्द्रायन, वंग भस्म, चांदी भस्म, अभ्रक भस्म और मूंगा भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबकी बराबर लोहा इन सबको एकत्र करके जलमें पीसकर सेवन करनेसे भूतोन्माद, वातोन्माद, अपस्मार, शरीरकी कृशता और रक्तपित्त रोग नष्ट होते हैं । इसको उन्मादभञ्जन रस कहते हैं ॥ १५-१९ ॥ चतुर्भुज रस । मृतसूतस्य भागौ द्वौ भागैकं हेमभस्मकम् । शिला कस्तूरिका तालं प्रत्येकं हेमतुल्यकम् ॥२०॥ — सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा कन्यया मर्दयेद्दिनम् । एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यगर्भे दिनत्रयम् ॥ २१ ॥ संस्थाप्य च तदुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् । एतद्रसायनवरं त्रिफलामधुमर्दितम् ॥ २२ ॥ तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् । अपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्दानले क्षये ॥ २३ ॥ हस्तकम्पे शिरःकम्पे गात्रकम्पे विशेषतः । वातपित्तसमुत्थांश्च कफजान्नाशयेद्ध्रुवम् ॥ २४ ॥ सर्वौषधिप्रयोगैर्ये व्याधयो न प्रसाधिताः । कर्मभिः पञ्चभिश्चैव मन्त्रौषधिप्रयोगतः ॥ २५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३३९ ) सर्वांस्तान्नाशयत्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । चतुर्भुजरसो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ २६ ॥ रससिन्दूर २ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, मैनशिल १ भाग, कस्तूरी १ भाग और हरिताल १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके घीक्वारके रसमें एक दिनतक खरल करे, फिर इसका गोलासा बनाकर एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर धानोंके ढेरमें रख देवे; पश्चात् तीन दिनके उपरान्त निकालकर सब रोगोंमें प्रयोग करे । यह उत्तम औषधि यथोचितमात्रानुसार त्रिफलेके काथ और सहतके साथ सेवन करनेसे वलीपलित, अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, हस्तकम्प, शिरःकम्प और शरीरकम्पप्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसका वातज, पित्तज और सम्पूर्ण कफके रोगोंमें प्रयोग करे । सर्व प्रकारकी वमन विरेचन और मन्त्रौषधिके द्वारा जो रोग शमन नहीं होते वे रोग इस औषधिके भक्षण करनेसे वज्राहत वृक्षके समान अवश्य नष्ट हो जाते हैं । यह चतुर्भुजरस स्वयं महादेवने कहा है ॥ २०-२६ ॥ उन्मादपर्पटी रस । कृष्णधुस्तूरजैर्बीजैः पञ्चभिः पर्पटीरसः । सम्प्रयोज्यः प्रशान्त्यर्थमुन्मादं भूतसम्भवम् ॥२७॥ इत्युन्मादाधिकारः । काले धतूरेके पांच बीजोंको पित्तपापड़ेके रसमें पीसकर सेवन करनेसे भूतोन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादपर्पटी रस कहते हैं ॥ २७ ॥ इत्युन्मादाधिकारः ।

( ३४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथापस्माररोगचिकित्सा । भूतभैरव रस । मृतसूतार्कलौहानां शिलागन्धकतालकम् । रसाञ्जनं च तुल्यांशं नरमूत्रेण मर्दयेत् ॥ १ ॥ तद्गोलं द्विगुणं गन्धं लौहपात्रे क्षणं पचेत् । पञ्चगुञ्जामितं खादेदपस्मारहरं परम् ॥ २ ॥ हिंगु सौवर्चलं व्योषं नरमूत्रेण सर्पिषा । कर्षमात्रं पिबेच्चानु रसोऽयं भूतभैरवः ॥ ३ ॥ रससिन्दूर, तांबा, लोहा, मैनशिल, गंधक, हरिताल और रसोत इन सब औषधियोंको एकत्र मनुष्यके मूत्रमें पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर सब औषधिसे दुगुना गंधक मिलाकर लोहेके पात्रमें क्षणभर पकावे । इस औषधिमेंसे पांच रत्ती परिमाण सेवन करनेसे अपस्मार रोग दूर होता है । और ऊपरसे हींग, काला नमक, त्रिकुटा, इनको नरमूत्र और घृत इनमें पीसकर भक्षण करे । इसको भूतभैरव रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ सूतभस्म प्रयोग । शङ्खपुष्पी वचा ब्राह्मी कुष्ठमेलारसैः सह । सूतभस्मप्रयोगोऽयं रक्तिकाद्वयमानतः ॥ सर्वापस्मारनाशाय महादेवेन भाषितः ॥ ४ ॥ शंखाहुली, वच, ब्राह्मी, कूठ और इलायचीके रसके साथ दो रत्ती परिमाण रससिन्दूरके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका अपस्मार नष्ट होता है ॥ ४ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी । मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं तारं ताप्यं विषं समम् । पद्मकेशरसंयुक्तं दिनैकं मर्दयेद्द्रवैः ॥ ५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३४१ ) स्नुह्यग्निविजयेरण्डवचानिष्पावशूरणैः । निर्गुण्ड्याश्च द्रवैर्मर्द्यं तद्गोलं पाचयेत्पुनः ॥ ६ ॥ कङ्गनीसर्षपोत्थेन तैलेन गन्धसंयुक्तम् । ततः पक्त्वा समुद्धृत्य चणमात्रा वटी कृता ॥ ७ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी नाम भक्षयेदार्द्रकद्रवैः । दशमूलकषायञ्च कणायुक्तं पिबेदनु ॥ अपस्मारं जयत्याशु यथा सूर्योदये तमः ॥ ८ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, रूपाभस्म, सोनामाखी भस्म, विष और कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूध, चीतेकी जड़के रस, भांगके पत्तोंके रस, एरण्डीकी जड़का रस, वचका रस, सेमका रस, जमीकंदका रस और सम्हालूके पत्तोंका रस इन सबमें एक एक दिन तक खरल करके पिंडाकार बनाकर पुटपाक करे । फिर उसमें १भाग गंधक मिलाकर कंगुनीके तेल और सरसोंके तेलमें पीसकर दुबारा पुटपाक करे । पश्चात् चनेकी बराबर गोली बनाकर अदरखके रसके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवनके अन्तमें पीपलका चूर्ण दशमूलके क्वाथमें डालकर पान करे । जिसप्रकार सूर्यके उदय होनेसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे अपस्माररोग नष्ट होता है ॥ ६-८ ॥ वातकुलान्तक रस । मृगनाभिशिवा नागकेशरं कलिवृक्षजम् । पारदं गन्धकं जातीफलमेलालवङ्गकम् ॥ ९ ॥ प्रत्येकं कार्षिकञ्चैव श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् । जलेन मर्दयित्वा तु वटीं कुर्याद्विरक्तिकाम् ॥ १०॥ यथाव्याध्यनुपानेन योजयेच्च चिकित्सकः । अपस्मारे महाघोरे मूर्च्छारोगे च शस्यते ॥ ११ ॥

( ३४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातजान् सर्वरोगांश्च हन्यादचिरसेवनात् । नातः परतरं श्रेष्ठमपस्मारेषु वर्त्तते ॥ ब्रह्मणा निर्मितः पूर्व्वं नाम्ना वातकुलान्तकः ॥ १२॥ कस्तूरी, हरड़, नागकेशर, बहेड़ा, पारा,गंधक, जायफल, इलायची और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेकर जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे अपस्मार और मूर्च्छारोग नष्ट होते हैं। इस औषधिको थोड़ेही दिन सेवन करनेसे सर्व प्रकारका वातरोग नष्ट होता है। अपस्मारको दूर करनेवाली इसकी समान अन्य औषधि नही है। इस वातकुलान्तक रसको स्वयं ब्रह्मदेवने कहा है ॥ ९-१२ ॥ पाषाणवज्र रस । रसं वज्रं हेम तारं मौक्तिकं तालमेव च । गन्धकं रसभस्मैव खर्परं च मनःशिला ॥ १३ ॥ मृताभ्रकं कान्तभस्म रुधिरं नागभस्मकम् । एतेषां तोलकैर्भागैः पुटं दद्याद्गजाव्हके ॥ १४ ॥ पाषाणे विमले पात्रे घर्षयेच्च प्रयत्नतः । ब्राह्मी जयन्ती निर्गुण्डी नागवल्ल्या रसैस्तथा॥१५॥ दिनमणिकरजालैः शोषयेच्च पुनः पुनः । ततश्च गोलकं कृत्वा स्थापयेत्कदलीदले ॥ १६ ॥ समुद्धृत्यापि गुटिकां नीहारे सूर्य्यसंकुले । एकद्वित्रिचतुर्थं वा स्थापनीयं यथाविधि ॥ १७ ॥ मर्दयित्वा वटी कार्या द्विगुञ्जाफलसंमिता । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वरोगकुलान्तकृत् ॥ १८ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३४३ ) बहुदोषान्वितं वातं कामजं चित्तविभ्रमम् । पित्तकृतञ्च यद्दोषं दग्धञ्च दृष्टिमागतम् ॥ शस्यते सर्वरोगेषु सर्वापस्मारेकेषु च ॥ १९ ॥ इति अपस्माररोगचिकित्सा । पारा, हीरा, सोना, चांदी, मोती, हरिताल, गंधक, रससिन्दूर, खपरिया, मैनशिल, अभ्रक, कान्तलोह, सिंग्रफ और सीसेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर पत्थरके पात्रमें डालकर ब्राह्मीके रसमें, जयंतीके रसमें, सम्हालूके रसमें और पानोंके रसमें अलग २ सात सात भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसको घोटकर गोलासा बनाकर केलेकी जड़में रखकर एक दिन, दो दिन, तीन दिन अथवा चार दिन पीछे निकालकर उसे रातमें ओस और दिनमें सूर्यकी धूपमें रखे । पश्चात् इसको पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको प्रातःकाल सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इससे अनेक दोषयुक्त वातरोग, कामजव्याधि, चित्तभ्रम, पित्तजव्याधि, दग्धदृष्टि और सर्व प्रकारके अपस्मार रोग नष्ट होते हैं । इसको पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १३–१९ ॥ इति अपस्माररोगचिकित्सा । अथ वातव्याधिचिकित्सा । द्विगुणाख्य रस । गन्धकाद्विगुणं सूतं शुद्धं मृद्वग्निना क्षणम् । पक्त्वाऽवतार्य संचूर्ण्य तुल्याभयसमन्वितम् ॥ १ ॥ सप्तगुंजामितं खादेद्वर्द्धयेच्च दिने दिने । गुञ्जैकैकक्रमेणैव यावत्स्यादेकविंशतिः ॥ २ ॥

( ३४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । क्षीराज्यशर्कराभिश्च शाल्यन्नं पथ्यमाचरेत् । कम्पवातप्रशान्त्यर्थं निर्वीते निवसेत्सदा ॥ द्विगुणाख्यरसो नाम त्रिपक्षात्कम्पवातजित् ॥ ३ ॥ गंधक १ भाग और पारा २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे, फिर थोड़ी देरतक मंद मंद अग्निसे पकाकर चूर्ण कर लेवे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंके बराबर हरड़का चूर्ण मिला- कर सात रत्ती परिमाण भक्षण करे । यह सात रत्तीकी पहिले दिनकी मात्रा है । दूसरे दिन आठ रत्ती, तीसरे दिन नौ रत्ती इसी क्रमसे प्रति- दिन एक एक रत्ती बढ़ाकर इसका सेवन करे । जब बढ़कर २१ रत्ती परिमाण हो जाय तब फिर आगेको नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें दूध, घी और मिश्री मिलाकर शालि चावलोंका भात खाय । कम्पवातको दूर करनेके लिये रोगीको सदैव वायुरहित स्थानमें निवास करावे । इसके सेवन करनेसे तीन पक्षमें कम्पवात रोग नष्ट होता है । इसको द्विगुणाख्यरस कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातगजाङ्कुश । मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् । पथ्या भृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थञ्च टङ्कणम् ॥ ४ ॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ५ ॥ कणाचूर्णयुतञ्चैव जिंगीक्वाथं पिबेदनु । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६॥ सप्ताहाद्गृध्रसीं हन्ति दारुणं सन्निपातिकम् । क्रोष्टुशीर्षकवातञ्चाप्यपबाहुकसंज्ञकम् ॥ ७ ॥