रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
समीक्षा भाग ४५ घनानन्द प्यारे सुजान सुनो, इत एक ते दूसरो आँख नही । तुम कौन धौ पाटी पढे हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नही ।' कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम-वाटिका मे बोधा के भावो को ग्रहण नही किया गया । प्रेम-वाटिका मे प्रेम का दार्शनिक निरूपण है, बोधा मे इस दृष्टि का अभाव है । अत. इस दृष्टि से भो बोधा का काव्य प्रेम-वाटिकाकार का उपजीव्य-काव्य नही हो सकता । डॉ० याज्ञिक के शब्दो मे - 'प्रेम-वाटिका की रचना रसखान द्वारा सवत् १६७१ मे ही हुई' इस तथ्य पर संदेह करना असगत है । जो पुस्तक पहली बार सवत् १६४८ के आस-पास और दूसरी बार संवत् १६६३-६४ मे प्रकाशित हुई, उसकी रचना सवत् १६७१ मे कैसे मानी जा सकती है ? जिस पुस्तक की खडित प्रति भारतेन्दु के पास थी और जिसके आधार पर सवत् १६३० मे 'प्रेम-सरोवर' की रचना हुई । उसकी रचना संवत् १६२२ मे जन्म लेने वाले गोस्वामी जी कैसे कर सकते थे ? सार की बात यह है कि प्रेमवाटिका की रचना रसखान द्वारा सवत् १६७१ मे हुई थी । इस ग्रन्थ के ५३ दोहो मे से लगभग १० मे रसखान छाप की श्लिष्ट अथवा स्पष्ट कवि नाम रूप मे है । प्रेमवाटिका की प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई कारण हमे दिखाई नही पडता ।' प्रेमवाटिका का प्रतिपाद्य प्रेम है । इसे रूपकत्व प्रदान करने के लिए राधा और कृष्ण को मालिन-माली का जोडा माना गया है । इसमे रसखान जी ने प्रेम के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया है । इनका मत है कि सच्चा प्रेम अकारण होता है, उसमे किसी आकर्षक साधन की आवश्यकता नही । इसीलिए माता, पिता, पुत्र, स्त्री आदि के प्रति जो प्रेम किया जाता है वह विशुद्ध नही है । विशुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए बताया गया है कि यह अनुपम, अमित और सागर के समान होता है । जो व्यक्ति एक बार इस प्रेम को प्राप्त कर लेता है, वह फिर इसे नही छोड़ पाता । श्रुति, पुराण, आगम- स्मृति आदि सभी प्रेम के मार है । प्रेम ही साधना का आधार है, क्योकि हृदय, कम और उपासना ये सब अहकार के मूल है । जब तक हृदय मे प्रेम का अंकुर अंकुरिन नही होता, तब तक ज्ञान आदि व्यर्थ है और ये साधना मे किसी प्रकार भी सहायक नही हो सकते । प्रेम ही भगवान् का स्वरूप है । जिस प्रकार भगवान् के स्वरूप का वर्णन नही किया जा सकता, उसी प्रकार
४६ रसखान-ग्रन्थावली प्रेम भी अवर्णनीय है। जो व्यक्ति प्रेम-पाश मे बँधकर मर जाता है, वह अमर हो जाता है। प्रेम के विविध रूप हैं। इसीलिए कोई इसे फाँसी कहता है, कोई तलवार, कोई नेजा, कोई भाला, कोई तीर और कोई प्राणरक्षक अनोखी ढाल। इसीलिए प्रेम को सब प्रकार की युक्तियो मे श्रेष्ठ माना गया है। इसी प्रेम के नियमो से ही ससार का चक्र चल रहा है। प्रेम मे इतनी शक्ति होती है कि स्वयं भगवान् भी इसके आधीन रहते है। रसखान ने गोपियो के प्रेम को आदर्श प्रेम माना है। कहने का भाव यह है कि प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट सत्ता है और यही जड-चेतन समस्त पृथ्वी का नियामक है। दानलीला दानलीला के ११ छंद प्राप्त है। डॉ० याज्ञिक इसे संदिग्ध रचना मानते है। अपनी मान्यता का आधार वे इन शब्दो मे प्रस्तुत करते हैं— १. स्व-रचित छंदो मे अपना कवि-नाम देने की प्रवृत्ति रसखान मे विशेष रूप से पाई जाती है। रसखान के छाप-रहित सवैया संख्या मे नगण्य ही है, किन्तु दानलीला के ११ छंदो मे केवल एक ही छंद मे 'रसखान' शब्द आया है। 'प्रेमवाटिका' के ५३ दोहो मे भी १० वार श्लिष्ट अथवा स्पष्ट नाम मे कवि की छाप मिलती है। २. इस छंद मे 'रसखानि' शब्द का प्रयोग कृष्ण की उक्ति में राधा को संबोधन करते हुए किया है। रसखान कवि ने अपने मुक्तको मे 'रसखानि' शब्द का श्लिष्ट प्रयोग जहाँ कही किया है, कृष्ण के अर्थ मे किया है, राधा के लिए नही। ३. रसखान कवि मुख्यतः सवैयाकार है। घनाक्षरी का उपयोग तो बहुत थोडा किया गया है। यह प्रवृत्ति दानलीला मे नही देखी जाती, उसमे घना- क्षरी का उपयोग तो सवैया से भी अधिक हुआ है। ४ रसखान के मुक्तक छंदो मे कृष्ण ने राधा अथवा अन्य गोपियो को सम्बो धित करते हुए एक शब्द भी नही कहा है। रसखान की गोपियो के प्रति कृष्ण सदैव मौन ही रहे है, परन्तु दानलीला के कृष्ण मुखर है। यह बात रसखान की प्रवृत्ति के अनुकूल नही है। ५. रसखान के मुक्तको मे दानलीला-सम्बन्धी कुछ उत्कृष्ट और लोकप्रिय छंद मिलते हैं। ये छंद राधा अथवा गोपियो की कृष्ण के प्रति उक्तियां है जो
समीक्षा भाग ४७ संवादात्मक कथोपकथन के रूप मे है। यदि दानलीला वास्तव मे रसखान रचित है तो ये छंद उसमे क्यों नही स्थान पा सके ? जिस दानलीला मे रस- खान के तद्विषयक लोकप्रिय उत्कृष्ट छंदो मे से एक भी न हो, उसे रसखान रचित मानने मे संकोच होना स्वाभाविक है। इस प्रकार के छंदो के प्रतीक निम्नलिखित है— (१) दानी भये नये माँगत दान सुनै जु तै कस तो बाँधे न जैहौ। रोकत हो बन मे रसखान पसारत हाथ महा दुख पैहौ। टूटै घरा बछरादिक गोधन जो धन है सु सबै धरि दैहौ। जै है अभूषन काहु सखी को तो मोल छला के लला न बिकैहौ ॥ (२) छीर जो चाहत चीर गहे ए जु लेहु न केतिक छीर अँचैहौ। चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैहौ। जानति हौ जिय की रसखान सु काहे को एतिक बात बढ़ैहौ। गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्ह जु नेकु न पैहौ ॥ (३) नागर छैल है गोकुल मे पग सेकत सग सखा ठिग तै हैं। जाहि न ताहि दिखावत आँख सुकैन गई अब तोसो करै है। हाँसी मे हार हर्यो रसखान जु जो कहूँ नेकु तगा टुटि जै है एक ही मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहिं हाट बिकै है ॥ ६ म्युनिसिपल म्यूजियम, प्रयाग की प्रति मे 'दानलीला' के वास्तविक रचियता विषयक कोई सकेत नही है। सभा की खोज के विवरणकार ने इसे रसखान रचित माना है, किन्तु यह मान्यता निराकार जान पडती है। सार यह है कि जब तक कोई पुष्ट प्रमाण प्राप्त न हो, इस दानलीला को रसखान-रचित मानना ठीक नही कहा जा सकता। डॉ० याज्ञिक के ये तर्क काफी सबल है। प्रस्तुत दानलीला की भाषा को देखते हुए भी ऐसा ही लगता है कि ये छंद रसखान द्वारा रचित नही हो सकते। 'पर यहाँ पर एक समस्या और उत्पन्न हो जाती है। सुजान-रसखान मे अब तक
४८ रसखान-ग्रन्थावली जितने छंदो का सग्रह किया गया है, वे छंद इस बात के साक्षी हे कि रसखान कृष्ण भक्ति-विषयक धारा के पूर्णतया अनुसरणकर्ता है। दानलीला इस धारा का प्रमुख प्रतिपाद्य है । सूरदास ने इस लीला का वर्णन बहुत ही विस्तार से किया है। उसके कुछ पद यहाँ उद्धृत करना आवश्यक जान पड़ता है— ग्वालिनि यह भली नहिं करति । दूध दधि घृत [नितहिं बेचति, दान देत डरति । प्रात ही लै जाति गोरस, बेचि आवति राति । कहौ कैसे जानियै तुम, दान मारे जाति । कालिंदी-तट स्याम बैठे, हमहि दियो पठाइ । यह कह्यौ हरि दान मागहु, जाति नितहि चुराइ । तुम सुता ब्रजभानु की, वै बडे नंद-कुमार । सूर प्रभु को नाहिं जानति, दान हाट वाजार । × × × यह सुनि हँसी सकल ब्रजनारि । आइ सुनी री बात नई इक, सिखए हैं महतारि । दधि माखन खैबे कौं चाहत, मागि लेहु हम पास । सूधै बात कहौ सुख पावै, बांधन कहत प्रकास । अब समझी हम बात तुम्हारी, पढे एक चटसार । सुनहु सूर यह बात कहौ जानि, जानती नंदकुमार ॥ × × × दान दिये बिनु जान न पैहौ । जब दैहौ ढराइ सब गोरस, तबहिं दान तुम दैहौ । तुमसो बहुत लेन है मोंकौं, पहिलै ताति सुनाऊँ । चोरी आवति बेचि जाति हौ, पुनि गोरस कहँ पाऊँ । मांगति छाय कहा दिखराऊँ, को दही हमकौं जानत । सूर स्याम तब कयौ ग्वालि सा, तुम मोकौं नहिं मानत ॥ × × ×
समीक्षा भाग ४६ कहा हमहिं रिस करत कन्हाई । यह रिस जाइ करौ मथुरा पर, जहँ है कंस कन्हाई । ‘ अब हम कहां जाइ गुहरावैं, बसति तिहारै गाउँ । ऐसे हाल करत लोगनि के, कौन रहै इहि ठाउँ । अपने घर के तुम राजा हो, सब का राजा कंस । सूर स्याम हम देखत बाढे, अब सीखे ये गंस । ✕ ✕ ✕ मौसौ बात सुनहु ब्रज-नारी । इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसो कहौ उघारी । कबहूँ बालक मुँह न दीजिये, मुँह न दीजिये नारी । जोइ मन करै सोइ करि डारै, मूँड़ चढ़त है भारी । बात कहत अठिलाति जाति सब, हँसति देत कर तारी । सूर कहा ये हमकौ जानै, छाँछहि बेचनहारी ॥ ✕ ✕ ✕ यह जानति तुम नंद-महर-सुत । धेनु दुहत तुमकौ हम देखति, जबहिं जाति खरिकहि उत । चोरी करत यहौ पुनि जानति, घर घर ढूँढत भाँडे । मारग रोकि भए अब दानी, वे ढँग कब तैं छांड़े । और सुनो जसुमति जब बाँधे, तब हम कियौ सहाइ । सूरदासप्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥ कृष्ण-भक्तो की भाँति स्वच्छंद काव्यधारा के कवियो ने भी इस लीला का वर्णन किया है। घनानद ने ‘दानघटा’ शीर्षक के अर्न्तगत इस विषय के १६ छंद लिखे हैं। ‘दानघटा’ और रसखान की ‘दानलीला’ मे बहुत अधिक साम्य है, अतः यहाँ ‘दानघटा’ के समस्त छंदो को उद्धृत करना आवश्यक प्रतीत होता है। ये छंद इस प्रकार हैं— सवैया गोपी— छैल नए नित रोकत गैल सु फैलत कापै अरैल भए हो । लै लकुटी हँसि नैन नचावत चैन रचावत मैन-तए हो ।
५० रसखान-ग्रन्थावली लाज अँचे बिन काज खगो तिनही सी पगो जिन रग रए हौ । ऐंड सबै निकसैगी अबै घनआनंद आनि कहा उनए हौ ॥ १ ॥ सवैया श्रीकृष्ण — है उनए सु नए न कछू उघटै कित ऐंड घमंड अयानी । बैन बड़े बड़े नैनन के बल बोलति है क्यों इती इतरानी । दान दिये बिन जान न पाइ है आइ है जो भलि खोरि विरानी । आगे अछूती गई सो गई घनआनंद आज भई मनमानी ॥ २ ॥ सवैया गोपी — जाइ करो उहि माय पै लाड़ बढ़ाय बढ़ाय किये इतने जिन । भीत की दौरनि खोरनि है मठता हठ ओरनि सो समझे बिन । दान न कान सुन्यो कवहूँ कहूँ काहे को कौनै दयौ सु लयो किन । तौड़िक लै घनआनंद डाटत काटत क्यो नही दीनता सो दिन ॥ ३ ॥ सवैया श्रीकृष्ण — देहिगी दान जो ऐहै इतै नही पैहै अबै सु किये को सबै फल । बावा दुहाई सुहाई करो जिय जानि कै मानि छुटै न कियें छल । एक ही ओल दै जाहु चली झगरो सगरो मिटि बात परैं सल । नांव पर्यो अबला घनआनद ऐंठति ण्ठति माँहु किते बल ॥ ४ ॥ सवैया गोपी— जीभ सम्हा रे न बोलति हो मुँह चाहत क्यों अब खायां थपेरे । ज्यों उगी करी कछु कानि-कनौड त्यों मूढ चढे बढे आवत नेरै । खाय कहा फल माय जने जिम देखी विचारि पिता-तन हेरै । कज-कनेरहि फेर बडो घनआनद न्यारे [रहो कतौ टेरै ॥ ५ ॥ सवैया श्रीकृष्ण— लेहु भया गहि सीसन ते दधि की मटुकी अब करनि करो कित । जैसे सो तैसे भए ही बनै घनआनद घाम घरो जित की तित ।
समीक्षा भाग ५१ एकहि एक बराबरि जाहु करौ अपने अपने चित को हित । फोरि कै क्यौ दुहूँ हाथ सकेदियै जौ बिधना घर बैठे दयो बित ॥ ६ ॥ सवैया गोपी— गोद भरै बित घाम कै जाय घरौ गहि गोद सो माय के आगै । पेट परे को लखै फल ज्यौं निपजै हौ सपूत सु भागनि जागै । बाँटिहै बोलि वधाई कमाई की जाति मैं जाते महा पति पागै । वास दिये को यहै गुन है घनआनंद जो छिन दोप न लागै ॥ ७ ॥ सवैथा मधुमंगल— नंद लला रससागर सों ललिता रिस की सलिला न बढैयै । नागरि आगरि हौ सबु भाँति तुम्हें अब कौन सी बात पढैयै । चोखन तोष नहि उपजै घनआनद क्यौ गुन दोष कहैयै । नेकु ढरे सुधरै सब काज अकाज इतो अपलोक चढ़ैयै ॥ ८ ॥ सवैया ललिता— सुनि रे मधुमंगल । दान-कथा सु जथारुचि होत वृथा हठ है । कर ओड़ि दिखाय दया मृदु है चलियै बहु भाँति बिनै करि नै । घनआनंद ऐंठ अमैठ किये कहा पैयत है रिझवारन पै । गुन गाय रिझयावहु देहि अबै बृषभानलली की निछावर कै ॥ ६ ॥ सवैया सखा— स्याम सुजान सबै गुनखानि बजावत बैन महा सुर साँचनि । अंग त्रिभंग अनंग-भरे दृग भौह नचाय नचावत नाँचनि । कीरतिदा कुलमंडन जौ निरखै भरि नैन बढै सुख-माँचनि । दान हँसे चुकि है घनआनंद रीझ नही सकि है हित-आँचनि ॥ १० ॥ सवैया सखी— आयो सखी चलि कुंज मै बैठि लखै घनआनद की सुघराई ।
५२ रसखान-ग्रन्थावली पाठन देहिं न एक सखै अकिले इन्हें छेकि करै मनभाई । भावती टेक रही बहु भाँति किये न बनै अति ही कठिनाई । लेता हौं राधे बलाय कठ्यौ करि आज मनौ इतनी हम पाई ॥ ११ ॥ राजदुलार भरी इकसार सुभाय मथे मन डारति पी को । कु ज चली सुखपुंज अली सग भाल विराजत लाज को टीको । लोचनि-कोरनि घोरनि छुवै मुसिकानि मैं व्हैं दरसै हित ही को । बोलनि बापुरी डारियै वारि लखै घनआनंद रूप लली को ॥ १२ ॥ रंग रह्यौ सुन जात कह्यौ उनह्वौ सुखसागर कुंज मैं आएँ । फैलि पर्यो रस को फगरो अति ही अगरो निबटै न चुकाएँ । काहूँ संभार रही न पटू तन कौ तन मै घनआनंद छाएँ । प्रेम-पगे रिझवारन की तहँ रीझ कै रीझ ही लेत बलाएँ ॥ दोहा दानघटा मिलि छवि-छटा, रसधारनि सरसाय । जियत पियत और न छियत, रसिक-पपीहा पाय ॥ १४ ॥ दानघटा-रसपान के, चातक रसिक सुजान । चखनि लखत चसके चखत, रखत तृषित ही कान ॥ १५ ॥ दानघटा सीचत सदा, मधुर केलि नव वेलि । आलवाल पचि रचि सुमन, लेत रसिक रस केलि ॥ १६ ॥ इन उद्धरणो को उद्धृत करने से हमारा तात्पर्य केवल यह दिखाना है कि कृष्ण-काव्य के रचयिताओ मे दानलीला का वर्णन करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परम्परा थी । रसखान ने भी इस परम्परा का निश्चय ही पालन किया होगा । इनके नाम से जो दानलीला मिलती है, यद्यपि कुछ बातो को देखते हुए वह रसखान की प्रवृत्ति के अनुकूल नही जान पडती, तथापि यह कहने मे सकोच नही होता कि अनेक बातो मे यह परम्परा की प्रवृत्तियो का अनुसरण करती है, जैसा कि उपर्युक्त सूरदास और घनानन्द के छंदो से प्रकट होता है । इसे रसखान द्वारा विरचित न मानने के दो ही कारण प्रबल है— १ इसकी भाषा रसखान की भाषा से मेल नही खाती । २. सुजान-रसखान मे अनेक पद ऐसे है जो दानलीला से सम्बधित है और उनका इसमे समावेश नही किया गया ।
समीक्षा भाग ५३
इन कारणों का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है— १. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, किसी भी लोकप्रिय कार्य की भाषा का वही रूप नही मिलता, जो उसने अपनाया है। उनकी भाषा को उनके प्रशंसकों ने अपने अनुसार मोड दे दिये है। उदाहरण के लिए मीरा को लिया जा सकता है। मीरा की भाषा तो अपने मूल स्वरूप को ही छोड़ गई है। उदा- हरण के लिए ये पद देखिए— 'म्हाँ गिरधर रग राती, सैया म्हाँ ।। टेक ।। पचरग चोला पहर्या सखी म्हाँ, झिरमिट खेलण जाती। याँ झिरमिट माँ मिल्यो साँवरो, देख्यां लग मण राती। जिणरो पिया परदेश बस्याँरी, लिख-लिख भेज्याँ पाती। म्हारा पियां म्हारे हीयडे बसताँ, णा आवाँ णा जाती। मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर, मग जोवाँ दिण राती ॥ × × × × 'मैं गिरधर रंगराती, सैयाँ मैं ।। टेक ।। पचरंग चोला पहर सखी मैं झिरमिट खेलन जाती। ओह झिरमिट माँ मिल्यो सांवरो खोल मिली तन गाती। जिनका पिया परदेश बसत है, लिख-लिख भेजे पाती। मेरा पिया मेरे हीय बसत है, का कहूँ आती जाती ॥' एक ही पद की इन दोनों भाषाओ मे आकाश-पाताल का अन्तर है। इसी प्रकार रसखान की भाषा के विषय मे भी कहा जा सकता है कि दानलीला के पदो की भाषा और प्रवृत्ति मे इतना परिवर्तन होना असभव नही है। श्रुति-पथ से चलनेवाली भाषा का एक रूप रहता भी नही है। २ जहाँ तक दूसरे कारण का सम्बन्ध है, इसके विषय में यह कहा जा सकता है कि रसखान ने स्वयं किसी संकलन की योजना नही की। इनके भक्तो ने ही इनके छंदो का सकलन किया है। पहले दानलीला से सम्बन्धित कुछ ही पद मिले होगे जिन्हे सुजान-रसखान मे संग्रहीत कर दिया गया होगा और बाद मे मिलने वाले और पदो को 'दानलीला' शीर्षक के अन्तर्गत रख दिया गया होगा।
५४ रसखान-ग्रन्थावली
इस दृष्टि से विचार करने पर यह निष्कर्ष निकालना कठिन नही कि प्रस्तुत दानलीला मे निहित भाव रसखान के ही है ओर भाषा का परिवर्तन इनके भक्तो की देन है । दानलीला में राधा और कृष्ण का संवाद है, ठीक वैसा ही जैसा सूरदास ओर घनानन्द मे मिलता है । राधा दधि मॉगने पर कृष्ण की भर्त्सना करती है ओर कृष्ण भी उस भर्त्सना का वैसे ही शब्दो मे उत्तर देते है । स्फुट पद— स्फुट पदो के अन्तर्गत पाँच पद संग्रहीत है । प्रथम पद मे कृष्ण ओर गोपी का संवाद है । मार्ग मे जाती हुई किसी गोपी को कृष्ण छेड़ देते है । इस पर वह चिढ जाती है ओर कृष्ण को भला-बुरा कहने लगती है । इसी बात पर दोनो मे वाद-विवाद प्रारभ हो जाता है । यह वाद-विवाद इस प्रकार है— कृष्ण—यदि तू अपने मन मे इतनी होशियार बनती तो इस रास्ते से निक- लती ही क्यो है ? गोपी—यह रास्ता तेरे बाबा का नही है । और न पहले-पहल ही इस रास्ते से जा रही हूँ । पहले भी इस रास्ते से गई थी, तब किसी ने कुछ नही कहा । यह रास्ता तो सभी के चलने के लिए है । अतः तुम हमारा रास्ता क्यो रोकते हो ? हमे छोडकर या तो सीधे-सीधे यहाँ से चले जाओ, अन्यथा हम तुम्हारी शिकायत तुम्हारे पिता नन्द मिहिर से कर देगी । दूसरे पद मे भी गोपी द्वारा कृष्ण की भर्त्सना का वर्णन है । गोपी की फटकारे सुनकर कृष्ण को क्रोध आ जाता है ओर वे उसके सिर से दही की मटकी उतार कर पृथ्वी पर फेक देते है । मटकी फूट जाती है, दही नालियो मे बहने लगती है । तब विवश होकर गोपी उनसे दूसरे दिन मिलने का वचन देती है । तीसरे पद मे फाग का वर्णन है । कोई गोपी अपनी सखी को कृष्ण के साथ फाग खेलने के लिए प्रेरित करती है । चौथे पद मे भी फाग का वर्णन है । कोई गोपी कृष्ण को फाग खेलने के लिए घर से बाहर निकलने के लिए ललकारती है और जब कृष्ण बाहर आ जाते है तो उनसे बिजली की तरह लिपट जाती है ।
५५ समीक्षा भाग पाँचवे पद मे उस विरहिणी गोपी का वर्णन है जिसे सास और ननद ने कृष्ण से फाग खेलने की अनुमति नही दी। संदिग्ध पद इस शीर्षक के अन्तर्गत १० छंद है। डा० याज्ञिक ने अनेक प्रमाणो द्वारा यह सिद्ध किया है कि ये छंद रसखान-रचित नही है। पहला पद है— हेरत कुंज भुजा धरे स्याम सौ नेक तबै हँसती न लुगाई। लाज न कानि हुती जिय माँझ सुभेटत जो मग मांहि कन्हाई। हेरै परै न गुपाल सखी इन जोबन आनि कुमात चलाई। होत कहा अब के पछताए जो हाथ ते छूटि गई लरिकाई॥' यह सवैया किसी रामगोपाल कवि का रचा हुआ है। प्रबोध रस सुधा- सागर मे इसे राजगोपाल के नाम से ही सगृहीत किया गया है। नवीन ने भी इसे राजगोपाल के नाम से ही दो बार उद्धृत किया है। एक बार परकीया के वर्णन मे और दूसरी बार व्रजकेलि के वर्णन मे। सरदार कवि के श्रृंगार- संग्रह मे भी यह छंद रामगोपाल के नाम से ही मिलता है। इस सवैया की तीसरी पंक्ति के पूर्वाद्ध मे रायगोपाल (गुपाल) की छाप भी अंकित है। दूसरा पद है— 'मीरा की चटक और लटक नव कुंडल की, भौंह की मटक मोहि आँखिन दिखाउ रे। मोहन सुजान गुन रूप के निधान कान्ह, बाँसुरी बजाय तन तपन सिराउ रे। ए हो बनवारी बलिहारी जाऊँ तेरी आज, मेरी कुज आय नेक मीठी तान गाउ रे। नंद के किसोर चितचोर मोरपंख बारे, बंसीवारे साँवरे पियारे इत आउ रे॥' 'शिवसिंह-सरोजकार' ने इस कवित्त को आदिल कवि द्वारा रचित माना है। इसीलिए उसने 'मोहन सुजान' के स्थान पर 'आदिल सुजान' पाठ दिया है।
५६ रसखान-ग्रन्थावली तीसरा छंद है— 'तट की न घट परै मग की न पग धरै, घर की न कछु करै बैठी भरै सांसु री । एकै सुनि लोट गई एकै लोट पोट भई, एकनि के दृगनि निकसि आए आंसु री । कहै रसखान सो सबै ब्रज वनिता वधि, वधिक कहाय हाय भई कुल हांसु री । करिये उपाय बांस डारियै कटाय, नाहिं उपजैगो बांस नाहिं बाजै फेरि बांसुरी ॥' 'शिवसिंह-सरोजकार' ने इसे रसनायक कृत माना है और 'कहै रसखान' के स्थान पर 'कहै रसनायक' पाठ दिया है । चौथा पद है— 'भिक्षुक तिहारो कहाँ बलि मखशाला जहाँ, सर्पन को संगी कहाँ व्है है छीरनिधि मे । ऐ री बहुरंगी बैलवारो कहाँ नाचत है, कीने तिरभंगा कही व्है है ग्वालगन मे । चाउर चवैया कहाँ होय है सुदामा पास, विष को अहारी कहाँ पूतना के घर मे । सिन्धु सुता आन मिली तर्क सो तरक करी, गिरजा मुसकाति जाति झारी लिए कर मे ॥ केवल प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा सम्पादित 'रसखान पदावली' मे यह कवित्त रसखान के नाम से मिलता है। यह कवित्त संस्कृत-कवियो की प्रवृत्ति के अधिक निकट है । अतः निश्चय ही यह संस्कृत के किसी श्लोक का अनुवाद है । पाँचवा पद है— 'खेलिए फाग निसंक व्है आज मयंकमुखी कहै भाग हमारो । लैहु गुलाल दुऔ कर मे पिचकारिक रंग हिये महं डारो । भावै सु मोहि करो रसखान जू पांव परो जनि घूंघट टारो । बीर की सौंह हौं देखिहौं कैसे अबीर तो आँख बचाय के डारो ॥'
५७ समीक्षा भाग
'स्वतंत्र भारत' ५ मार्च सन् १६२८ के होली विशेषांक मे श्री पूत्तूलाल शर्मा ने यह सवैया रसखान के नाम से उद्धृत किया है । शर्मा जी को यह सवैया कहाँ से मिला, इसकी ओर कोई संकेत नहीं किया गया है । नवीन कवि इसे रसखान- कृत न मानकर किसी अन्य अज्ञात कवि द्वारा रचित मानते हैं । इस सवैये के अंश 'भावै सुमोहि करो रसखान' के स्थान पर 'भावै तुम्हे सु करो मुहि लालन' पाठ भी मिलता है । नवीन ने वसंत ऋतु के अन्तर्गत फाग-प्रसंग मे इस सवैये को उद्धृत किया है । छठा छंद है — 'नन्द महर के बगर तनु, अब मेरे को जाय । नाहक कहुँ गढि जायगो, हित काँटो मन पाय ॥' यह दोहा रसनिधि-कृत 'रतन हजारा' का है । हिन्दी शब्द-सागरकार ने भूल से इसे रसखान का मान लिया है । सातवाँ छंद है— 'सुरतर लतनि चार फल है ललित कैधौं, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधौं चिन्तामनिन की माल उर सोभित, बिसाल कठ मे धरे है जोति झलकावनी । प्रभु की कहानी ते गुसाई की मधुर बानी, मुक्ति सुखदानी रसखानि मन भावनी । खाँड की खिजावनी सी कंद की कुढावनी सी, सिता को सतावनी सी सुधा सकुचावनी ॥' (वर्ष ५, खंड १, श्रावण १६८७ वि० मे) 'कल्याण' मासिक पत्रिका मे यह कवित्त प्रकाशित किया गया था । इसे रसखान-कृत मान लेने का भ्रम सम्भवतः 'मुक्ति सुखदानी रसखानि मनभावनी' के कारण हुआ है । इसे रसखान-कृत मान लेने का अभी तक कोई दृढ प्रमाण उपलब्ध नही हुआ है ।
५८ रसखान-ग्रन्थावली आठवाँ पद है - 'अंग भभूत लगाये महा सुख है कोउ ऐसो सो प्रेमहु पागै । नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे । जोग लिए हरि प्यारो मिलै तो पै कान कटाये कहा दुख लागै । मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहौ मिलि गोरख जागै ॥' यह सवैया किसका रचा हुआ है, यह बताना असम्भव है । नवीन ने इसे किसी नाथ कवि का माना है । यह भ्रम नाथ शब्द के कारण हुआ है । यह शब्द नाथपंथियो के लिए प्रयुक्त हुआ है । नवाँ पद है- 'कैसा है यह देश निगोरा । जग होरी ब्रज होरा । मै जल जमुना भरन जात रही, देखि बदन मेरा गोरा । मोसो कहै चलो कुजन मे, तनक-तनक से छोरा । परे आँखिन मे डोरा ॥ जियरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा । का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा । न काहू सो काहू को जोरा । मन मेरो हर्यो नन्द के ने सखि, चलत लगावत चोरा । कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अंग टटोरा । न मानत करत निहोरा ॥' इस पद को श्री अखिलेश मिश्र ने १८ सितम्बर १६६० के 'स्वतत्र भारत' मे रसखान का मानकर उद्धृत किया है । इस भ्रम का कारण 'कहै रसखान' वाक्यांश है । यहाँ रसखान का अर्थ कृष्ण है । दसवाँ पद है- 'परम चतुर पुनि रसिक वर, कैसो हू नर होय । बिना प्रेम रूखो लगै, बादि चतुरई सोय ॥' गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित 'प्रेमयोग' नामक पुस्तक मे यह दोहा रसखान के नाम से दिया गया है । अन्यथा कोई प्रमाण उपलब्ध नही होता ।
: ४ : रसखान का प्रेम-दर्शन प्रेम शब्द 'प्रिय' का भाववाचक रूप है । 'प्रिय' शब्द का अर्थ है तृप्ति प्रदान करने वाला—प्रीणातीति प्रिय. । अतः प्रेम उस प्रभाव को कह सकते है जो हृदय को आनन्द देकर तृप्त करने वाला हो । प्रेम-भाव की महत्ता असदिग्ध है । इसीलिए भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य दोनो मे इसके स्वरूप का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है । भारतीय आचार्यों के एतद्विषयक प्रमुख मत निम्नलिखित है— १ चित्त रूपी समुद्र मे जब सत्त्व गुण का जल भर जाता है तो उसमें दृष्टि, परिचय, हार्द्र तथा प्रेम नाम की चार प्रकार की तरंगे उठा करती है । प्रेम का मूलोपादान आत्मा का सत्त्व गुण है । विषय तो केवल निमित्त कारण है । वह उद्दीपन है और भाव की जिस स्थिति को प्रेम कहते हैं, वह अनुभूति की चरम कोटि है । उसमे पूर्व तीन विकास-क्रम दृष्टि परिचय और हार्द्र समाप्त हो लेते है । इनमे दृष्टि चित्त की वह वृत्ति है जिसमे चंचल चित्त विषय की ओर हठात् प्रवृत्त होता है । परिचय से विषय के विविध संस्कार मन मे उत्पन्न होते है । दोषो पर ध्यान न देना हार्द्र है । जीव मे आत्मा का ही रूप जो रस है वह जिस उपाधि का आश्रय लेकर श्रृं गार बनता है, वह उपाधि प्रेम है; अर्थात् प्रेम रसमय आत्मा के बहिर्विकास का साधन है, उसी का अंभूगत तत्त्व है । —प्रेमरसायनकार विश्वनाथ २. अंत करण की वृत्ति जिससे वस्तु के संयोगकाल मे भी वियोग-सा बना रहता है, प्रेम है । —शांडिल्य ३ चित्त की द्रवावस्था को प्रेम कहते है । —आचार्य भरत
८. उन्माद —उन्माद का अर्थ है पागलपन । प्रेमी में जब अपने प्रिय के प्रति इतना ममत्व आ जाता है कि वह उसके बिना पागल-सा बन जाता है तो उसकी यह दशा उन्माद कहलाती है । उन्माद गुण के उदय होने पर महाभाव की दशा आती है । इस दशा मे सयोग के कल्प निमेष की भाँति और वियोग के निमेष कल्प की भाँति प्रतीत होते हैं । प्रेम के गुणों पर दृष्टिपात करने के उपरात अब यह जान लेना आवश्यक है कि प्रेम के कितने भेद होते हैं । इस वर्गीकरण के तीन आधार हो सकते हैं— १. प्रेम की मात्रा का आधार । २. प्रेम के आलम्बन का आधार । ३. प्रेम के स्वरूप का आधार । प्रेम की मात्रा के आधार पर प्रेम के तीन भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम । प्रेम के आलम्बन के आधार पर प्रेम के अपार भेद हो सकते हैं । यथा—देश-प्रेम, जाति-प्रेम, मानव-प्रेम, पशु-प्रेम, पक्षी-प्रेम, पुस्तक-प्रेम, दुग्ध-प्रेम, आदि । प्रेम के स्वरूप के आधार पर प्रेम के दो भेद है—पार्थिव प्रेम और अपार्थिव प्रेम । पार्थिव प्रेम के भी दो भेद होते हैं—प्राकृत प्रेम और सात्विक प्रेम । इन्हे पाश्चात्य आचार्यों ने क्रमशः 'नैच्यूरल लव' (Natural Love) और 'प्लेटोनिक लव (Platonic Love) कहा है । सहज मानव-प्रेम ही को प्रकृत प्रेम कहा जाता है । पार्थिव आलम्बन के प्रति पार्थिव आश्रय की सहज वासनात्मक प्रणयाभिव्यक्तियाँ इसी प्रेम के अन्तर्गत आती हैं । दूसरे शब्दो मे कह सकते हैं कि नर-नारी की सहज प्रीति ही प्रकृत प्रेम है । ऐसे प्रेम का आलम्बन पार्थिव होता है, अत शरीर-सुख की उत्कट इच्छा से प्रेरित होकर जिस प्रेम का निवेदन किया जाता है, वह स्व- भावत ही वासनात्मक होता है। रीतिकालौन काव्य मे ऐसे ही वासनात्मक प्रेम की अभिव्यक्ति है । सात्विक प्रेम इस प्रेम से भिन्न होता है । प्लेटो ने आत्मा की प्रीति का वर्णन किया है । उसने पार्थिव आलम्बन के प्रति अशरीरी अकांक्षा अथवा वासनायुक्त शुद्ध प्रीति और शुद्ध राग को ही सात्विक प्रेम की संज्ञा दी है ।
समीक्षा भाग ६३ सहज ऐन्द्रिय सुख से ऊपर का प्रेम ही आत्मा की प्रीति है। ऐसे प्रेम मे वस्तुतः वासना का परिष्कार एवं उन्नयन हो जाता है और वह वासना त्याग तथा सयम का प्रतिरूप बन जाती है। जिस प्रेम का आलम्बन अपार्थिव हो, उसे अपार्थिव प्रेम कहते हैं। अपा- र्थिव प्रेम को चार भागो मे विभक्त किया जा सकता है— १ अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की वासनामूलक प्रणया- भिव्यक्ति । २. सगुण साकार अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की दाम्पत्य प्रणयाभिव्यक्ति । ३. सगुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की रीति-भावना । ४. निर्गुण निराकार के प्रति मानव आत्मा की ज्ञानमूलक आनंदबद्ध प्रणयाभिव्यक्ति । अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की वासनामूलक प्रणया- भिव्यक्ति सगुण साकार के प्रति ही सम्भव है। अतः सगुण और साकार अपा- र्थिव आलम्बन आश्रय की भावना के लिए नितांत आवश्यक है। पार्वती-शिव, राधा-कृष्ण, सीता-राम का शक्ति और परम पुरुष के रूप मे वर्णन अपार्थिव प्रणयमूलक प्रेम है। सगुण साकार अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की दाम्पत्य प्रणयाभिव्यक्ति मे पार्थिव आश्रय सगुण और साकार अपार्थिव आश्रय मे वासना का आरोप कर लेता है। फलत. ऐसे प्रेम मे ऐन्द्रिय भावना का समावेश हो जाता है, किन्तु आलम्बन की अपार्थिवता के कारण ऐन्द्रिय भावना उदात्त रूप मे ही व्यक्त होती है। सगुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की रीति-भावना मे पार्थिव आश्रय का रति-भाव साकार के प्रति ही सम्भव है, निराकार के प्रति नहीं। इसका कारण यह है कि निराकार ब्रह्म प्रेम का आश्रय नही हो सकता। प्रेम के लिए प्रतिपादन, प्रतिक्रिया आवश्यक है जो सगुण द्वारा ही सम्भव है, निर्गुण द्वारा नही। अतः साहित्य मे कई स्थानो पर अपा- र्थिव आलम्बन को सगुण निराकार-रूप मे चित्रित करके आत्मा का उसमे रति-भाव आरोपित किया है। सूफी कवियों की प्रेममयी तथा सन्त-कवियो की रहस्यमयी भक्ति ऐसी ही है। निर्गुण और निराकार के प्रति रति-भाव का प्रद-
६४ रसखान-ग्रन्थावली
र्शन नही हो सकता, अतः निर्गुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की ज्ञानबद्ध प्रणयाभिव्यक्ति में प्रेम को आनंदमग्नता की संज्ञा दी जाती है। ज्ञानमूलक होने के कारण इस प्रेम के क्षेत्र से बाहर की वस्तु माना जा सकता है, किन्तु तथ्य यह नही है । इस अपार्थिव सम्बन्ध मे भावना की मग्नता है, इसीलिए इसे प्रेम ही कहा जायेगा । उपनिषदो मे आत्मा के इसी आनंद की व्याख्या की गई है। रसखान का प्रेम-दर्शन रसखान ने अपार्थिव प्रेम का निरूपण किया है। इन्होंने स्पष्ट कहा है कि राधा और कृष्ण ये दोनो ही प्रेम के आलम्बन है, प्रेम वाटिका के मालिन और माली है। प्रेम-तत्त्व सुबोध और सर्वगम्य नही है । अतः इस तत्त्व को सभी मनुष्य नही जान सकते । पर विडम्बना यह है कि प्रेम के ज्ञाता होने का सभी दावा करते है। जो व्यक्ति प्रेम-तत्त्व को जान जाता है, वह ससार के सभी दुखों एवं क्लेशो से मुक्त हो जाता है। प्रेम अगम, अनुपम, अमित और सागर के समान गंभीर होता है, जो इस प्रेम-सागर के समीप आ जाता है वह फिर यहां से लौट कर वापिस नही जाता । प्रेम कमल-नाल से भी पतला होता है, तलवार की धार पर चलने की भाँति दुष्कर होता है। इसका मार्ग सीधा भी है और टेढा भी । इस प्रकार प्रेम-तत्त्व अनुपम और विलक्षण है। ज्ञान की शोभा भी प्रेम से ही है। कोई व्यक्ति चाहे जितना गुणवान बन जाय, पर यदि उसमे प्रेम-तत्त्व नही है तो उसका ज्ञान फीका और निस्सार है। वेद, पुराण, आगम, स्तुति सभी का सार प्रेम है। बिना प्रेम के हृदय मे भगवद्-भक्ति का अंकुर प्रस्फुटित नही होता। प्रेम के विना किसी भी प्रकार के आनन्द का अनुभव नही हो सकता । प्रेम ज्ञान, कर्म आदि सभी उपलब्धियो से श्रेष्ठ है, क्योकि ज्ञान, कर्म, उपासना ये सब अहंकार के कारण है। जब तक हृदय में प्रेमो- उत्पत्ति नही होती, तब तक किसी भी साधना अथवा कर्म के प्रति मनुष्य में दृढ निश्चय की भावना नही आती । जो प्रेम संसारिक आकर्षणो से उत्पन्न हुआ करता है, वह पार्थिव प्रेम है। इसे सच्चा प्रेम नही कहा जा सकता । सच्चे प्रेम मे, अपार्थिव प्रेम में, गुण, यौवन, रूप, धन स्वार्थ और कामना आदि कारण नही होते ; अर्थात् यह सबसे रहित मानस का सहज भाव होता है। प्रेम भगवान् की भाँति सर्व-
समीक्षा भाग ६५ व्यापक तत्त्व है। इसीलिए इस ससार मे अन्य सभी वस्तुओ को देखा जा सकता है, उनका वर्णन किया जा सकता है, पर प्रेम और भगवान् ये दो तत्त्व ऐसे है जिन्हे न तो देखा जा सकता है और न जिनका वर्णन किया जा सकता है। प्रेम ऐसा ज्ञान है जिसे प्राप्त कर लेने के पश्चात् अन्य किसी ज्ञान को प्राप्त करने की आवश्यकता नही रह जाती। मित्र, स्त्री, वन्धु, पुत्र, आदि के प्रति मनुष्य के मन मे यद्यपि स्वाभाविक प्रेम होता है, पर इसे सच्चा प्रेम नही कहा जा सकता। सच्चा प्रेम किसी भी प्रकार के कारण की अपेक्षा नही रखता। वह सदैव समान रहता है और सदैव प्रिय की हित-कामनाओ से परिपूर्ण होता है। इस ससार मे अपने तन की ममता सर्वाधिक मानी जाती है, पर सच्चा प्रेम इससे भी अधिक प्यारा होता है। इस प्रेम को प्राप्त कर लेने के पश्चात् प्रभु- प्राप्ति की भी इच्छा नही रह जाती। ऐसा ही प्रेम अलौकिक शुद्ध, शुभ और सरस कहलाता है। इस प्रेम के अनेक नाम तथा रूप हैं। कोई इसे फाँसी कहता है कोई तलवार कहता है, कोई नेजा कहता है, कोई भाला कहता है, कोई बरछी कहता है, कोई तीर कहता है और कोई अनोखी रक्षा करनेवाली ढाल बताता है। इस प्रेम की मार इतनी सरस होती है कि जिसको यह मार पड जाये, वह इसके आनन्द मे सब कुछ भूल जाता है। इस प्रेम मे द्वैत भावना नही रहती, वरन् दोनो प्रेमी मिलकर एकाकार हो जाते हैं। जहाँ द्वैत-भावना बनी रहेगी, वहाँ सच्चे प्रेम का अभाव होगा। इसीलिए इस प्रेम को सब प्रकार की मुक्तियो से श्रेष्ठ माना गया है। प्रेम का अभाव नाश का कारण है। प्रेम से ही ससार की स्थिति हे। भगवान भी प्रेम के आधीन होते हैं। जो प्रेम आनन्दपूर्ण, स्वाभाविक, निस्वार्थ, अचल, महान् और एकरस होता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। शुद्ध प्रेम स्वय ही अंकुर है, स्वय ही बीज है, स्वय ही सिंचन है और स्वय ही डाल, पात, फल तथा फूल है। यही स्वय कारण और कार्य है, कर्त्ता, कर्म, क्रिया और करण भी यही स्वयं है। कहने का भाव यह है कि अलौकिक प्रेम की महत्ता, और उसका स्वरूप वैविध्यपूर्ण है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ईश्वर नाना रूपधारी एवं नामधारी है। रसखान का यह प्रेम-दर्शन भारतीय पद्धति पर आधृत है। निम्नलिपि
६६ रसखान-ग्रन्थावली
कतिपय तुलनात्मक उद्धरणो से यह मान्यता सिद्ध होती है— १. 'लोक वेद मरजाद सब, लाज काज संदेह । देत बहाये प्रेम करि, विधि-निषेध को नेह ॥' —रसखान 'सर्वमेव तदा सिद्धं, कर्त्तव्यं ना विशिष्यते ।' —बोधसार २ 'बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि । शुद्ध कामना तें रहित, प्रेम सकल रसखानि ॥' —रसखान 'गुणरहित, कामनारहितं प्रतिक्षण वर्धमानमविच्छन्न सूक्ष्मतरमनुभव- रूपम् ।' —नारद-भक्तिसूत्र ३ 'जिहि पाए वैकुण्ठ अरु, हरिहू की नहि चाहि । सोइ अलौकिक शुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि ॥' —रसखान 'यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति, शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साहो भवति ।' —नारद-भक्तिसूत्र ४. 'दो मन इक होते सुन्यो, पै वह प्रेम न आहि । होय जबहिं द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि ॥' — रसखान 'प्रेमानन्दप्रकारेण द्वैत विस्मरण गतम् । —बोधसार ५. 'याही तें सब मुक्ति ते, लही बडाई प्रेम । प्रेम भए नसि जाहि सब, बँधे जगत के नेम ॥' —रसखान 'सालोक्य साष्टि सामीप्य सारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' — भागवत