ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
तुम उनके आनंद के लिए अधिक मात्रा में सोमरस तैयार करो. (१७) यदुषो यासि भानुना सं सूर्येण रोचसे. आ हायमश्विनो रथो वर्तियाति नृपाय्यम्.. (१८) हे उषा! जब तुम अपने प्रकाश के साथ गति करती हो, तब सूर्य के समान दीप्ति वाली लगती हो. उस समय अश्विनीकुमारों का रथ मानवों के यज्ञ में जाता है. (१८) यदापीतासो अंशवो गावो न दुह ऊधभिः. यद्वा वाणीरनूषत प्र देवयन्तो अश्विना.. (१९) हे अश्विनीकुमारो! जिस समय पीले रंग की सोमलता को गाय के थन की तरह निचोड़ा जाता है एवं देवों को चाहने वाले लोग स्तुति करते हैं, उस समय हमारी रक्षा करो. (१९) प्र द्युम्नाय प्र शवसे प्र नृषाह्याय शर्मणे. प्र दक्षाय प्रचेतसा.. (२०) हे उत्तम ज्ञान वाले अश्विनीकुमारो! तुम लोग धन के लिए, बल के लिए, मनुष्यों द्वारा भोगने योग्य सुख के लिए तथा उन्नति के लिए हमारी रक्षा करो. (२०) यन्नूनं धीभिरश्विना पितुर्योना निषीदथः. यद्वा सुम्नेभिरुक्थ्या.. (२१) हे अश्विनीकुमारो! चाहे तुम अपने पिता के समान द्युलोक में बैठे होओ अथवा सुखपूर्वक प्रशंसनीय घर में रहते होओ, दोनों जगहों से हमारे पास आओ. (२१) सूक्त—१० देवता—अश्विनीकुमार यत्स्थो दीर्घप्रसद्मनि यद्वादो रोचने दिवः. यद्वा समुद्रे अध्याकृते गृहेऽत आ यातमश्विना.. (१) हे अश्विनीकुमारो! चाहे तुम प्रशंसनीय यज्ञशालाओं वाले मर्त्यलोक में रहते होओ तथा द्युलोक के दीप्तिशाली भाग में अथवा आकाश में निवास करते हो. तुम इन स्थानों से हमारे पास आओ. (१) यद्वा यज्ञं मनवे संमिमिक्षथुरेवेत्काण्वस्य बोधतम्. बृहस्पतिं विश्वान्देवाँ अहं हुव इन्द्राविष्णू अश्विनावाशुहेषसा.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम लोगों ने जिस प्रकार मनु के लिए यज्ञ को सफल बनाया था, उसी प्रकार कण्व के यज्ञ को भी समझो. मैं बृहस्पति सभी देवों, इंद्र, विष्णु एवं गतिशील अश्वों वाले अश्विनीकुमारों को बुलाता हूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
त्या न्व१श्विना हुवे सुदंससा गृभे कृता. ययोरस्ति प्र णः सख्यं देवेष्वध्याप्यम्.. (३) मैं शोभन कर्म वाले एवं हमारा हविष्य स्वीकार करने के लिए प्रकट होने वाले अश्विनीकुमारों को बुलाता हूं. अश्विनीकुमारों की मित्रता सभी देवों में उत्तम मानी जाती है. (३) ययोरधि प्र यज्ञा असूरे सन्ति सूरयः. ता यज्ञस्याध्वरस्य प्रचेतसा स्वधाभिर्या पिबतः सोम्यं मधु.. (४) यज्ञ जिन अश्विनीकुमारों को वश में रखते हैं एवं बिना स्तोताओं वाले देश में भी जिनकी स्तुति होती है, वे यज्ञ के उत्तम जानकार हैं. वे स्वधा शब्दों के साथ मधुर सोमरस पिएं. (४) यदद्याश्विनावपाग्यत्प्राक्स्थो वाजिनीवसू. यद् द्रुह्यव्यनवि तुर्वशे यदौ हुवे वामथ मा गतम्.. (५) हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! इस समय तुम लोग चाहे पूर्व दिशा में होओ, चाहे पश्चिमी दिशा में, चाहे द्रुह्यु, अनु, तुर्वशु एवं यदु राजा के पास हो, मैं तुम्हें वहीं से बुलाता हूं. तुम मेरे पास आओ. (५) यदन्तरिक्षे पतथः पुरुभुजा यद्वेमे रोदसी अनु. यद्वा स्वधाभिरधितिष्ठथो रथमत्त आ यातमश्विना.. (६) हे अधिक हवि भक्षण करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम चाहे अंतरिक्ष में गमन करते होओ अथवा द्यावा-पृथिवी की ओर जा रहे होओ, अथवा तेजरूपी रथ पर बैठे होओ, इन सभी स्थानों से आओ. (६) सूक्त—११ देवता—अग्नि त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा. त्वं यज्ञेष्वीड्यः.. (१) हे अग्नि देव! तुम मनुष्यों में यज्ञकर्म की रक्षा करने वाले हो एवं यज्ञ में प्रशंसा करने योग्य हो. (१) त्वमसि प्रशस्यो विदथेषु सहन्त्य. अग्ने रथीरध्वराणाम्.. (२) हे शत्रुओं को हराने वाले अग्नि! तुम यज्ञों में प्रशंसा करने योग्य एवं यज्ञों के नेता हो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
स त्वमस्मदप द्विषो युयोधि जातवेदः. अदेवीरणे अरातीः.. (३) हे जातवेद अग्नि! तुम हमारे शत्रुओं को हमसे अलग करो. हे अग्नि! देवों से द्वेष रखने वाले शत्रुसेनाओं को तुम अलग करो. (३) अन्ति चित्सन्तमह यज्ञं मर्तस्य रिपोः. नोप वेषि जातवेदः.. (४) हे जातवेद अग्नि! तुम शत्रु के पास रहकर भी कभी उसके यज्ञ की इच्छा नहीं करते. (४) मर्ता अमर्त्यस्य ते भूरि नाम मनामहे. विप्रासो जातवेदसः.. (५) हम मरणधर्मा ब्राह्मण तुझ मरणरहित अग्नि की विशाल स्तुतियां करेंगे. (५) विप्रं विप्रासोऽवसे देवं मर्तास ऊतये. अग्निं गीर्भिर्हवामहे.. (६) हम मरणधर्मा ब्राह्मण मेधावी अग्नि देव को अपनी रक्षा की दृष्टि से स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं और हव्य द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हैं. (६) आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वांकामया गिरा.. (७) हे अग्नि! वत्सगोत्रीय ऋषि तुम्हारे उत्तम निवास स्थान से तुम्हें बुला लेते हैं. वे अपनी स्तुति द्वारा हमारी कामना करते हैं. (७) पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि विशो विश्वा अनु प्रभुः. समत्सु त्वा हवामहे.. (८) हे अग्नि! तुम बहुत से स्थानों को समानरूप से देखते हो. इसलिए तुम सारी प्रजाओं के मालिक हो. हम तुम्हें युद्ध में बुलाते हैं. (८) समत्स्वग्निमवसे वाजयन्तो हवामहे. वाजेषु चित्रराधसम्.. (९) हम अन्न की अभिलाषा से युद्ध में अपनी रक्षा करने के लिए अग्नि को बुलाते हैं. युद्ध में अग्नि विचित्र धन वाले हैं. (९) प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि. स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व.. (१०) हे अग्नि! तुम यज्ञ में पूज्य, प्राचीन, बहुत समय से हवन करने वाले, स्तुति के योग्य एवं यज्ञ में स्थित रहने वाले हो. तुम अपना शरीर हवि से प्रसन्न करो और हमें सौभाग्य दो. (१०) सूक्त—१२ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति. येना हंसि न्य१त्रिणं तमीमहे.. (१) हे सोमरस पीने वालों में श्रेष्ठ एवं अतिशय बलशाली इंद्र! तुम प्रसन्न होकर अपने कर्त्तव्य जानते हो. हम तुम्हारी उस प्रसन्नता की याचना करते हैं, जिसके कारण तुम राक्षसों को मारते हो. (१) येना दशग्वमधिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्. येना समुद्रमाविथा तमीमहे.. (२) हे इंद्र! हम तुमसे उसी मदपूर्ण स्थिति में आने की याचना करते हैं, जिसके कारण तुमने अंगिरागोत्रीय, अंधकार नाश करने वाले सूर्य एवं समुद्र की रक्षा की थी. (२) येन सिन्धुं महीरपो रथाँ इव प्रचोदयः. पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे.. (३) हे इंद्र! जिस मद के कारण तुम विशाल जलों का रथ के समान सागर की ओर भेजते हो, हम यज्ञ के मार्ग पर चलने के लिए तुमसे उसी मद की दशा में होने की याचना करते हैं. (३) इमं स्तोममभिष्टये घृतं न पूतमद्रिवः. येना नु सद्य ओजसा ववक्षिथ.. (४) हे वज्रधारी इंद्र! हमें मनचाहा फल देने के लिए घृत के समान पवित्र हमारे उस स्तोत्र को जानो, जिसे सुनकर तुम तुरंत अपने बल से हमारी अभिलाषा पूरी करते हो. (४) इमं जुषस्व गिर्वणः समुद्र इव पिन्वते. इन्द्र विश्वाभिरूतिभिर्ववक्षिथ.. (५) हे स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! हमारे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. यह चंद्रोदय के समय बढ़ने वाले सागर के समान बढ़ता है. तुम उसी स्तोत्र के कारण हमें समस्त रक्षासाधनों द्वारा कल्याण देते हो. (५) यो नो देवः परावतः सखित्वनाय मामहे. दिवो न वृष्टिं प्रथयन्ववक्षिथ.. (६) हे इंद्र देव! तुमने दूर देश से आकर हमारी मैत्रीभावना बढ़ाने के लिए हमें धन दिया है. तुम हमारा धन अंतरिक्ष से होने वाली वर्षा के समान बढ़ाओ एवं हमें कल्याण देने की इच्छा करो. (६) ववक्षुरस्य केतव उत वज्रो गभस्त्योः यत्सूर्यो न रोदसी अवर्धयत्.. (७) इंद्र जब सूर्य के समान द्यावा-पृथिवी को वर्षा द्वारा बढ़ाते हैं, तब इंद्र के रथ पर लगे झंडे एवं उनका वज्र हमें अनेक कल्याण देते हैं. (७) यदि प्रवृद्ध सत्पते सहस्रं महिषाँ अधः. आदित्त इन्द्रियं महि प्र वावृधे.. (८) हे अतिशय महान् एवं सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने हजारों महान् राक्षसों ebook converter DEMO Watermarks*
को मारा था, उसके बाद ही तुम्हारा बल महान् रूप से बढ़ा था. (८) इन्द्रः सूर्यस्य रश्मिभिर्न्यर्शानमोषति. अग्निर्वनेव सासहिः प्र वावृधे.. (९) जिस प्रकार अग्नि वनों को जलाते हैं, उसी प्रकार इंद्र सूर्य की किरणों द्वारा बाधक राक्षसों को ठीक से जलाते हैं एवं शत्रुओं को पराजित करते हुए बढ़ते हैं. (९) इयं त ऋत्वियावती धीतिरेति नवीयसी. सपर्यन्ती पुरुप्रिया मिमीतः इत्.. (१०) हे इंद्र! विभिन्न ऋतुओं में होने वाले यज्ञकर्मों से युक्त, अतिशय नवीन, आदर करती हुई एवं अधिक प्रसन्नताकारक यह स्तुति तुम्हारे पास जाती है. (१०) गर्भो यज्ञस्य देवयुः क्रतुं पुनीत आनुषक्. स्तोमैरिन्द्रस्य वावृधे मिमीतः इत्.. (११) यज्ञ करने वाला स्तोता इंद्र को दयालु करने की अभिलाषा से दशापवित्र द्वारा इंद्र के पान हेतु सोमरस को पुनीत करता है, स्तोत्रों द्वारा इंद्र को बढ़ाता है एवं स्तोत्रों द्वारा इंद्र के गुणों को सीमित करता है. (११) सनिर्मित्रस्य पप्रथ इन्द्रः सोमस्य पीतये. प्राची वाशीव सुन्वते मिमीतः इत्.. (१२) मित्र स्तोता को धन देने वाले इंद्र ने सोमरस पीने के लिए अपना शरीर उसी प्रकार बढ़ा लिया है, जिस प्रकार सोमरस निचोड़ने वाला यजमान अपने स्तुतिवचन का विस्तार करता है एवं इंद्र के गुणों की सीमा बांधता है. (१२) यं विप्रा उक्थवाहसोऽभिप्रमन्दुरायवः घृतं न पिप्य आसन्मृतस्य यत्.. (१३) मेधावी एवं स्तोत्र वहन करने वाले मनुष्य जिन इंद्र को भली प्रकार प्रमुदित करते हैं, उन्हीं इंद्र के मुख में मैं घृत के समान हव्य डालूंगा. (१३) उत स्वराजे अदितिः स्तोममिन्द्राय जीजनत्. पुरुप्रशस्तमूतय ऋतस्य यत्.. (१४) अदिति ने अपनी रक्षा के विचार से स्वयं प्रदीप्त के लिए बहुतों द्वारा प्रशंसित एवं यज्ञ संबंधी स्तोत्र उत्पन्न किया था. (१४) अधि वह्नय ऊतयेऽनूषत प्रशस्तये. न देव विव्रता हरी ऋतस्य यत्.. (१५) ऋत्विज् रक्षा एवं प्रशंसा पाने के लिए इंद्र की स्तुति करते हैं. हे इंद्र देव! इस समय विविध कर्म करने वाले घोड़े तुम्हें यज्ञ के लिए ढोते हैं. (१५) यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये. यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः.. (१६) हे इंद्र! यद्यपि तुम विष्णु के आने पर सोमरस पीते हो अथवा जलपुत्र त्रित राजर्षि के ebook converter DEMO Watermarks*
यज्ञ में सोमरस पीते हो अथवा मरुतों के आने पर सोमरस पीते हो, फिर भी तुम हमारा सोम पीकर ही प्रसन्न बनो. (१६) यद्वा शक्र परावति समुद्र अधि मन्दसे. अस्माकमित्सुते रणा समिन्दुभिः.. (१७) हे शक्तिशाली इंद्र! यद्यपि तुम दूरवर्ती सोमरस से प्रसन्न होते हो, तथापि हमारा सोमरस निचुड़ जाने पर उसके द्वारा प्रसन्न बनो. (१७) यद्वासि सुन्वतो वृधो यजमानस्य सत्पते. उक्थे वा यस्य रण्यसि समिन्दुभिः.. (१८) हे सज्जनों के पालक इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले जिस यजमान को बढ़ाते हो एवं मंत्रों से प्रसन्न होते हो, उसका सोमरस पीकर प्रमुदित बनो. (१८) देवंदेवं वोऽवस इन्द्रमिन्द्रं गृणीषणि. अधा यज्ञाय तुर्वणे व्यानशुः.. (१९) हे यजमान! तुम्हारी रक्षा के लिए मैं जिन इंद्र की स्तुतियां करना चाहता हूं, मेरी स्तुतियां शीघ्र सेवा एवं यज्ञ के लिए उसी इंद्र को व्याप्त करें. (१९) यज्ञेभिर्यज्ञवाहसं सोमेभिः सोमपातमम्. होत्राभिरिन्द्रं वावृधुर्व्यानशुः.. (२०) स्तोतागण यज्ञों द्वारा यजमान को फल देने वाले एवं सोमरस पीने वालों में श्रेष्ठ इंद्र को सोम एवं स्तुतियों द्वारा बढ़ाते एवं व्याप्त करते हैं. (२०) महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः. विश्वा वसूनि दाशुषे व्यानशुः.. (२१) इंद्र का धनदान महान् एवं यश विस्तृत है. इंद्र हव्यदाता यजमान को देने के लिए सभी धन व्याप्त करते हैं. (२१) इन्द्रं वृत्राय हन्तवे देवासो दधिरे पुरः. इन्द्रं वाणीरनूषता समोजसे.. (२२) देवों ने वृत्र को मारने के लिए इंद्र को अपने अग्रभाग में स्वामी बनाकर रखा था. वाणियां उचित बल पाने के लिए इंद्र की ठीक से स्तुति करती हैं. (२२) महान्तं महिना वयं स्तोमेभिर्हवनश्रुतम्. अर्कैरभि प्र णोनुमः समोजसे.. (२३) हम सर्वाधिक महान् एवं पुकार सुनने वाले इंद्र को उचित बल की प्राप्ति के लिए स्तोत्रों तथा मंत्रों द्वारा स्तुत करते हैं. (२३) न यं विविक्ततो रोदसी नान्तरिक्षाणि वज्रिणम्. अमादिदस्य तित्विषे समोजसः.. (२४) द्यावा-पृथिवी और आकाश जिस वज्रधारी इंद्र को अपने से अलग नहीं कर सकते, ebook converter DEMO Watermarks*
उन्हीं इंद्र की शक्ति से शक्ति पाने हेतु सारा संसार दीप्त होता है. (२४) यदिन्द्र पृतनाज्ये देवास्त्वा दधिरे पुरः. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२५) हे इंद्र! जब देवों ने तुम्हें संग्राम में स्वामी के रूप में आगे किया था, उसी समय सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२५) यदा वृत्रं नदीवृतं शवसा वज्रिन्नवधीः. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२६) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने जल को रोकने वाले वृत्र को जिस समय मारा था, उसी समय तुम्हारे सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२६) यदा ते विष्णुरोजसा त्रीणि पदा विचक्रमे. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२७) हे इंद्र! तुम्हारे छोटे भाई विष्णु ने जिस समय अपने बल से तीन लोकों को अपने तीन कदमों से नापा था, उसी समय तुम्हारे सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२७) यदा ते हर्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (२८) हे इंद्र! तुम्हारे सुंदर घोड़े जब प्रतिदिन बढ़े थे, उसी के बाद तुमने सारे संसार को नियम में बांधा था. (२८) यदा ते मारुतीर्विशस्तुभ्यमिन्द्र नियेमिरे. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (२९) हे इंद्र! जब तुम्हारी मरुद्गणरूपी प्रजा तुम्हारे लिए सब प्राणियों को नियम में बांधती हैं, उसी के बाद तुम सारे विश्व को नियमित करते हो. (२९) यदा सूर्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (३०) हे इंद्र! तुम उज्ज्वल प्रकाश वाले सूर्य को जिस समय द्युलोक में धारण करते हो, उसी समय सारे संसार को नियमों में बांधते हो. (३०) इमां त इन्द्र सुष्टुतिं विप्र इयर्ति धीतिभिः. जामिं पदेव पिप्रतीं प्राध्वरे.. (३१) हे इंद्र! बुद्धिमान् स्तोता यज्ञ में प्रसन्नता देने वाली शोभन स्तुति अपने सेवाकार्यों द्वारा इस प्रकार तुम्हारे पास भेजता है जिस प्रकार लोग अपने बंधु उत्तम स्थान में भेजते हैं. (३१) यदस्य धामनि प्रिय समीचीनासो अस्वरन्. नाभा यज्ञस्य दोहना प्राध्वरे.. (३२) हे इंद्र! यज्ञ में तुम्हारे तेज को प्रसन्न करने के लिए स्तोता एकत्र होकर जब ऊंचे स्वर से स्तुति बोलते हैं, उस समय तुम धरती की नाभिरूप यज्ञ की वेदी पर धन दो. (३२) सुवीर्यं स्वश्व्यं सुगव्यमिन्द्र दद्धि नः. होतेव पूर्वचित्तये प्राध्वरे.. (३३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३ देवता—इंद्र
हे इंद्र! मुझे शोभन शक्ति, सुंदर घोड़े एवं अच्छी गाएं दो. मैंने ज्ञान पाने के लिए यज्ञ में होता के समान पहले ही स्तुति की थी. (३३) सूक्त—१३ देवता—इंद्र इन्द्रः सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीत उक्थ्यम्. विदे वृधस्य दक्षसो महान्हि षः.. (१) इंद्र सोमरस निचूड़ जाने पर यज्ञ करने वाले एवं स्तोता को पवित्र करते हैं एवं बढ़े हुए बल के लाभ के लिए महान् हुए हैं. (१) स प्रथमे व्योमनि देवानां सदने वृधः. सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्.. (२) वे इंद्र विस्तृत व्योमरूप देवस्थान में देवों को बढ़ाते हैं. इंद्र यज्ञकर्म पूरा करने वाले, शोभन यश वाले एवं जल पीने के लिए वृत्र के विजेता हैं. (२) तमह्वे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्. भवा नः सुम्ने अन्तमः सखा वृधे.. (३) मैं अन्नप्राप्ति के हेतु होने वाले संग्राम में सहायता के लिए शक्तिशाली इंद्र को बुलाता हूं. हे इंद्र! तुम हमारा इच्छित धन बढ़ाने के लिए हमारे मित्र बनो. (३) इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (४) हे स्तुतियों द्वारा सेवा करने योग्य इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की यह आहुति तुम्हें प्राप्त होती है. तुम प्रसन्न होकर इस यज्ञ में विराजो. (४) नूनं तदिन्द्र दद्धि नो यत्त्वा सुन्वन्त ईमहे. रयिं नश्चित्रामा भरा स्वर्विदम्.. (५) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम जिस धन की अभिलाषा करते हैं, वह हमें दो. तुम हमें स्वर्ग देने वाला विचित्र धन दो. (५) स्तोता यत्ते विचर्षणििरति प्रशर्धयद्गिरः. वया इवानु रोहते जुषन्त यत्.. (६) हे इंद्र! विशेषरूप से देखने वाले स्तोता जिस समय तुम्हारे प्रति शत्रुओं को हराने में समर्थ स्तुतियां करते हैं एवं उनके द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं, उस समय तुम में सभी गुण इस प्रकार आ जाते हैं जैसे एक वृक्ष में बहुत सी शाखाएं होती हैं. (६) प्रत्नवज्जनया गिरः शृणुधी जरितुह्र्वम्. मदेमदे ववक्षिथा सुकृत्वने.. (७) हे इंद्र! तुम पहले के समान स्तोताओं द्वारा स्तुतियां उत्पन्न कराओ एवं स्तोताओं की पुकार सुनो. तुम सोमरस द्वारा प्रसन्नता प्राप्त करके शोभन कर्म करने वाले यजमान को मनचाहा फल देते हो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
क्रीळन्त्यस्य सूनृता आपो न प्रवता यतीः. अया धिया य उच्यते पतिर्दिवः.. (८) इंद्र की सच्ची बातें नीचे की ओर बहने वाली जलधारा के समान विहार करती हैं. हमारी इस स्तुति द्वारा स्वर्ग के स्वामी की प्रशंसा होती है. (८) उतो पतिर्य उच्यते कृष्टीनामेक इद्वशी. नमोवृधैरवस्युभिः सुते रण.. (९) वश में करने वाले एकमात्र इंद्र ही मनुष्यों का पालन करने वाले कहे गए हैं. हे इंद्र! तुम स्तुतियों द्वारा बढ़ने वालों एवं रक्षा के इच्छुक लोगों के साथ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (९) स्तुहि श्रुतं विपश्चितं हरी यस्य प्रसक्षिणा. गन्तारा दाशुषो गृहं नमस्विनः.. (१०) हे स्तोता! विद्वान् एवं प्रसिद्ध इंद्र की स्तुति करो. उनके दोनों शत्रुविजयी घोड़े हव्यदाता यजमान के घर जाने वाले हैं. (१०) तूतुजानो महेमतेऽश्वेभिः पृषितप्सुभिः. आ याहि यज्ञमाशुभिः शमिद्धि ते.. (११) हे महाफल देने वाली बुद्धि से युक्त इंद्र! तुम शीघ्र चलने वाले एवं चिकने घोड़े के साथ यज्ञ में आओ. उस यज्ञ में तुम्हें सुख मिलता है. (११) इन्द्र शविष्ठ सत्पते रयिं गृणत्सु धारय. श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनम्.. (१२) हे शक्तिशालियों में श्रेष्ठ एवं सज्जनों के पालक इंद्र! हम स्तुति करने वालों को धन दो एवं स्तोताओं को मरणरहित तथा व्यापक यश दो. (१२) हवे त्वा सूर उदिते हवे मध्यन्दिने दिवः. जुषाण इन्द्र सप्तिभिर्न आ गहि.. (१३) हे इंद्र! मैं तुम्हें सूर्य निकलने पर एवं दोपहर के समय बुलाता हूं. तुम प्रसन्न होकर अपने तेज चलने वाले घोड़ों के द्वारा आओ. (१३) आ तू गहि प्र तु द्रव मत्स्वा सुतस्य गोमतः. तन्तुं तनुष्व पूर्व्य यथा विदे.. (१४) हे इंद्र! शीघ्र आओ एवं यज्ञ में जाओ. वहां गाय के दूध से मिले हुए सोमरस से प्रसन्न बनो. तुम पूर्वजों द्वारा किए हुए यज्ञ को उसी प्रकार बढ़ाओ, जिस प्रकार मैं जानता हूं. (१४) यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन्. यद्वा समुद्रे अन्धसोऽवितेदसि.. (१५) हे शक्तिशाली एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम चाहे दूरवर्ती स्थान में होओ, चाहे समीपवर्ती स्थान में होओ, चाहे सागर में होओ, सब स्थानों से आओ एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (१५) इन्द्रं वर्धन्तु नो गिर इन्द्रं सुतास इन्दवः. इन्द्रे हविष्मतीर्विशो अराणिषुः.. (१६) हमारी स्तुतियां एवं निचोड़े हुए सोमरस इंद्र को बढ़ावें. हव्य धारण करने वाली प्रजाएं ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र के प्रति श्रद्धा रखती हैं. (१६) तमिद्धिप्रा अवस्यवः प्रवत्वतीभिरूतिभिः. इन्द्रं क्षोणीरवर्धयन्वया इव.. (१७) बुद्धिमान् एवं रक्षा चाहने वाले स्तोता इंद्र को तृप्त करने वाली स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. सब लोक वृक्ष की शाखाओं के समान इंद्र के अधीन होकर उन्हें बढ़ाते हैं. (१७) त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः सदावृधम्.. (१८) देवों ने त्रिकद्रुक नाम के यज्ञ में चैतन्य करने वाले इंद्र को यज्ञ के योग्य बनाया था. सदा बढ़ने वाले इंद्र को हमारी स्तुतियां बढ़ावें. (१८) स्तोता यत्ते अनुव्रत उक्थान्यृतुथा दधे. शुचिः पावक उच्यते सो अद्भुत:.. (१९) हे इंद्र! तुम्हारा स्तोता प्रत्येक ऋतु के अनुसार अनुकूल कर्म करता हुआ उक्थों को बोलता है. शुद्ध, पवित्र करने वाले एवं आश्चर्यजनक तुम स्तुति का विषय बनते हो. (१९) तदिद्रुद्रस्य चेतति यह्वं प्रत्नेषु धामसु. मनो यत्रा वि तद्दधुर्विचेतसः.. (२०) वे ही रुद्रपुत्र मरुत् अपने पुराने स्थानों में वर्तमान हैं, जिनकी स्तुति विशेष ज्ञान वाले स्तोता करते हैं. (२०) यदि मे सख्यामावर इमस्य पाह्यन्धसः. येन विश्वा अति द्विषो अतारिम.. (२१) हे इंद्र! यदि तुम मुझे अपनी मित्रता दो एवं इस सोमरस को पिओ, मैं सभी शत्रुओं को हरा सकता हूं. (२१) कदा त इन्द्र गिर्वणः स्तोता भवाति शन्तमः. कदा नो गव्ये अश्व्ये वसौ दधः.. (२२) हे स्तुतियां स्वीकार करने वाले इंद्र! तुम्हारा स्तोता कब अतिशय सुखी होगा? तुम हमें कब गायों एवं अश्वों वाले घर में रखोगे. (२२) उत ते सुष्टुता हरी वृषणा वहतो रथम्. अजुर्यस्य मदिन्तमं यमीमहे.. (२३) हे जरारहित इंद्र! तुम्हारे भली प्रकार स्तुत एवं अभिलाषापूरक घोड़े तुम्हारे रथ को यहां लावें. हे अतिशय प्रसन्न इंद्र! हम तुमसे याचना करते हैं. (२३) तमीमहे पुरुष्टुतं यह्वं प्रत्नाभिरूतिभिः. नि बर्हिषि प्रिये सददध द्विता.. (२४) महान् एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र से हम प्राचीन सोमाहुतियों द्वारा याचना करते हैं. वे प्रिय कुश पर बैठें एवं दो प्रकार का हव्य स्वीकार करें. (२४) वर्धस्वा सु पुरुष्टुत ऋषिष्टुताभिरूतिभिः. धुक्षस्व पिप्युषीमिषमवा च नः.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम ऋषियों द्वारा प्रशंसित अपने रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ एवं हमें उन्नतिशील अन्न दो. (२५) इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः. ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम्.. (२६) हे वज्रधारणकर्त्ता इंद्र! तुम सब प्रकार स्तोता की रक्षा करते हो. तुम्हारे सच्चे स्तोत्र के द्वारा मैं तुम्हारी दया प्राप्त करता हूं. (२६) इह त्या सधमाद्या युजानः सोमपीतये. हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभि स्वर.. (२७) हे इंद्र! तुम अपने प्रसिद्ध, सम्मिलित रूप से प्रसन्न एवं विस्तृत धन वाले घोड़ों को रथ में जोड़ कर इस यज्ञ में सोमरस पीने के लिए आओ. (२७) अभि स्वरन्तु ये तव रुद्रासः सक्षत श्रियम्. उतो मरुत्वतीर्विशो अभि प्रयः..(२८) हे इंद्र! तुम्हारे अनुचर रुद्रपुत्र मरुद्गण इस आश्रययोग्य यज्ञ में प्राप्त हों एवं मरुतों से युक्त प्रजाएं भी हमारे हव्य को प्राप्त करें. (२८) इमा अस्य प्रतूर्तयः पदं जुषन्त यद्दिवि. नाभा यज्ञस्य सं दधुर्यथा विदे.. (२९) इंद्र की ये मरुत्रूपी प्रजाएं शत्रुओं का नाश करती हुई अपने आश्रयस्थल स्वर्गलोक की सेवा करती हैं एवं यज्ञ की नाभिरूपिणी उत्तरवेदी पर इस प्रकार स्थित रहती हैं कि हम धन पा सकें. (२९) अयं दीर्घाय चक्षसे प्राचि प्रयत्यध्वरे. मिमीते यज्ञमानुषग्विचक्ष्य.. (३०) इंद्र प्राचीन यज्ञशाला में यज्ञ आरंभ होने पर उसे पूर्वापररूप से देखकर इस प्रकार पूर्ण करते हैं, जिससे देखने योग्य फल मिल सके. (३०) वृषायमिन्द्र ते रथ उतो ते वृषणा हरी. वृषा त्वं शतक्रतो वृषा हवः.. (३१) हे इंद्र! तुम्हारा यह रथ अभिलाषापूरक है तथा तुम्हारे घोड़े की कामना पूरी करने वाले हैं. हे शतक्रतु इंद्र! तुम एवं तुम्हारे आह्वान दोनों ही अभिलाषापूरक हों. (३१) वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः. वृषा यज्ञो यमिन्वसि वृषा हवः.. (३२) हे इंद्र! सोमलता कूटने वाले पत्थर, सोमरस का नशा व निचोड़ा हुआ सोम अभिलाषापूरक हैं. जिस यज्ञ में तुम प्राप्त होते हो, वह कामना पूरी करने वाला है. तुम्हारा आह्वान इच्छापूरक है. (३२) वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः. वावन्थ हि प्रतिष्टुतिं वृषा हवः.. (३३)
सूक्त—१४ देवता—इंद्र
हे वज्रधारी एवं अभिलाषापूरक इंद्र! हवि सेचन करने वाला मैं विचित्र स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाता हूं. तुम अपनी स्तुतियां स्वीकार करो. तुम्हारा आह्वान अभिलाषापूरक है. (३३) सूक्त—१४ देवता—इंद्र यदिन्द्रा॒हं यथा॒ त्वमीशी॑य॒ वस्व॒ एक॒ इत्. स्तो॒ता मे॑ गो॒सखा॑ स्यात्.. (१) हे इंद्र! जिस प्रकार तुम एकमात्र धनस्वामी हो, उसी प्रकार यदि मैं भी ऐश्वर्य वाला बन जाऊं तो मेरा स्तोता भी गाय वाला बन जाएगा. (१) शिक्षे॑यमस्मै॒ दित्से॑यं शचीपते मनी॒षिणे॑. यद॒हं गो॑प॒तिः स्याम्.. (२) हे शक्तिशाली इंद्र! यदि तुम्हारी कृपा से मैं गायों का स्वामी बन जाऊं तो इस स्तोता को देने की इच्छा करूंगा एवं इसके द्वारा मांगी हुई संपत्ति दूंगा. (२) धे॒नुष्ट॒ इन्द्र॑ सू॒नृता॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते. गामश्वं॑ पि॒प्युषी॑ दुहे.. (३) हे इंद्र! तुम्हारी सच्ची एवं उन्नति करने वाली स्तुति दुधारू गाय बनकर सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को गाएं और घोड़े देती है. (३) न ते॑ व॒र्त्तास्ति॒ राध॑स॒ इन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्य॑:. यदि॑त्ससि स्तु॒तो म॒घम्.. (४) हे इंद्र! तुम स्तुति सुनकर स्तोताओं को जो धन देना चाहते हो, उसे रोकने वाला न कोई देवता है एवं न मनुष्य. (४) य॒ज्ञ इन्द्र॑मवर्धय॒द्यद्भूमिं॒ व्यव॑र्तयत्. च॒क्राण ओ॒पशं॑ दि॒वि.. (५) यज्ञ ने इंद्र को बढ़ाया था, क्योंकि इंद्र ने द्युलोक में जाकर मेघ को सुलाते हुए धरती को स्थिर किया था. (५) वा॒वृ॒धा॒नस्य॑ ते व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युष॑:. ऊ॒तिमिन्द्रा॑ वृणीमहे.. (६) हे वर्धमान एवं शत्रुओं के सभी धन जीतने वाले इंद्र! हम तुम्हारी रक्षा को प्राप्त करते हैं. (६) व्य॑न्तरि॑क्षमतिरन्म॒दे सोम॑स्य रोच॒ना. इन्द्रो॒ यदभि॑नद्व॒लम्.. (७) इंद्र ने सोमरस के नशे में तेजस्वी अंतरिक्ष को बढ़ाया है एवं शक्तिशाली मेघ का नाश किया है. (७) उद्गा आ॒जदङ्गिरो॑भ्य आवि॒ष्कृण्वन्गुहा॑ स॒तीः. अ॒र्वाञ्चं॑ नुनुदे व॒लम्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र ने गुहा में छिपी हुई गायों को बाहर निकालकर अंगिरागोत्रीय ऋषियों को दिया था एवं गायों को चुराने वाले बल को औंधा कर दिया था. (८) इन्द्रेण रोचना दिवो दृळ्हानि दृंहितानि च. स्थिराणि न पराणुदे.. (९) इंद्र ने दीप्तिशाली नक्षत्रों को शक्तिशाली एवं दृढ़ किया था. उन स्थिर नक्षत्रों को कोई नीचे नहीं गिरा सकता. (९) अपामूर्मिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते. वि ते मदा अराजीषुः.. (१०) हे इंद्र! एक-दूसरे के ऊपर चलने वाली सागर की तरंगों के समान तुम्हारी स्तुतियां शीघ्रता से गति करती हैं. तुम्हारे मद विशेष रूप से दीप्तिशाली बनते हैं. (१०) त्वं हि स्तोमवर्धन इन्द्रास्युक्थवर्धनः. स्तोतॄणामुत भद्रकृत्.. (११) हे इंद्र! तुम स्तुतियों एवं उक्थों द्वारा बढ़ने वाले हो एवं स्तोताओं का कल्याण करते हो. (११) इन्द्रमित्केशिना हरी सोमपेयाय वक्षतः. उप यज्ञं सुराधसम्.. (१२) केश धारण करने वाले दो घोड़े शोभनधन वाले इंद्र को यज्ञ के समीप ले जाते हैं. (१२) अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः. विश्वा यदजयः स्पृधः.. (१३) हे इंद्र! जब तुमने विरोध करने वाली सभी असुर-सेनाओं को हराया था, उसी समय वज्र पर जलों का फेन लपेटकर तुमने नमुचि का सिर काटा था. (१३) मायाभिरुत्सिसृप्सत इन्द्र द्यामारुरुक्षतः. इव दस्यूँरधूनुथाः.. (१४) हे इंद्र! तुमने मायाओं के द्वारा विस्तार पाने के इच्छुक एवं स्वर्ग पर चढ़ने के अभिलाषी शत्रु राक्षसों को औंधा कर दिया था. (१४) असुन्वामिन्द्र संसदं विषूचीं व्यनाशयः. सोमपा उत्तरो भवन्.. (१५) हे सोमपानकर्त्ता इंद्र! तुमने अत्यंत उत्कृष्ट होकर सोमरस न निचोड़ने वाले लोगों को परस्पर विरोध द्वारा निर्बल बनाकर समाप्त किया. (१५) सूक्त—१५ देवता—इंद्र तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (१) उन्हीं इंद्र की स्तुति करो, जिन्हें बहुतों ने बुलाया है और बहुतों ने जिनकी स्तुति की है. ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुतिवचनों द्वारा महान् इंद्र की सेवा करो. (१) यस्य द्विबर्हसो बृहत्सहो दाधार रोदसी. गिरीँर्रज्राँ अपः स्वर्वृषत्वना.. (२) द्यावा-पृथिवी दोनों स्थानों में पूज्य इंद्र की महती शक्ति द्यावा-पृथिवी को धारण करती है. इंद्र अपनी शक्ति द्वारा शीघ्रगामी बादलों एवं बहने वाले जलों को धारण करते हैं. (२) स राजसि पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे. (३) हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम दीप्तिशाली बनते हो. तुम जीतने-योग्य धनों एवं सुनने योग्य यशों को नियंत्रित करने के लिए अकेले ही शत्रुओं का वध करते हो. (३) तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृत्सु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्.. (४) हे वज्रधारी इंद्र! हम तुम्हारे अभिलाषापूरक, युद्धों में शत्रुओं को हराने वाले, स्थान बनाने वाले एवं हरि नामक घोड़ों द्वारा सेवायोग्य साहस की प्रशंसा करते हैं. (४) येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिश. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (५) हे इंद्र! तुमने जिस मद के कारण आयु एवं मनु के हेतु प्रकाशपिंडों को दीप्त किया था, उसी मद से प्रसन्न होकर तुम इस विशाल यज्ञ के कर्त्ता के रूप में सुशोभित हो. (५) तदद्या चित्त उक्थिनोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा. वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे.. (६) हे इंद्र! स्तोता पहले के समान आज भी तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम उस जल को प्रतिदिन स्वायत्त करो, जिसके स्वामी बादल हैं. (६) तव त्यदिन्द्रियं बृहत्तव शुष्ममुत क्रतुम्. वज्रं शिशाति धिषणा वरेण्यम्.. (७) हे इंद्र! यह स्तुति तुम्हारे बल को विस्तृत करती है. तुम्हारा बल तुम्हारे कर्मों एवं वज्र को तेज करता है. (७) तव द्यौरिन्द्र पौंस्यं पृथिवी वर्धति श्रवः. त्वामापः पर्वतासश्च हिन्विरे.. (८) हे इंद्र! स्वर्गलोक तुम्हारी शक्ति और धरती तुम्हारा यश बढ़ाती है. पर्वत एवं अंतरिक्ष तुम्हें प्रसन्न करते हैं. (८) त्वां विष्णुर्बृहन् क्षयो मित्रो गृणाति वरुणः. त्वां शर्धो मदत्यनु मारुतम्.. (९) हे इंद्र! महान् व निवासस्थान देने वाले विष्णु, मित्र एवं वरुण तुम्हारी स्तुति करते हैं. मरुतों की शक्ति तुम्हारे मद के पश्चात् मत्त होती है. (९) त्वं वृषा जनानां मंहिष्ठ इन्द्र जज्ञिषे. सत्रा विश्वा स्वपत्यानि दधिषे.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम अभिलाषापूरक एवं मानव में अतिशय महान् बनकर जन्म लेते हो. तुम शोभन संतान के साथ समस्त धन दान हेतु धारण करते हो. (१०) सत्रा त्वं पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि तोशसे. नान्य इन्द्रात् करणं भूय इन्वति.. (११) हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम अकेले ही महान् शत्रुओं को नष्ट करते हो. इंद्र के अतिरिक्त कोई भी वध आदि नहीं कर सकता. (११) यदिन्द्र मन्मशास्तवा नाना हवन्त ऊतये. अस्माकेभिर्नृभिरत्रा स्वर्ज्य.. (१२) हे इंद्र! जिस युद्ध में रक्षा के लिए अनेक प्रकार से तुम्हारी स्तुति की जाती है, हमारे स्तोताओं द्वारा उस युद्ध में बुलाए जाने पर शत्रुओं को जीतो. (१२) अरं क्षयाय नो महे विश्वा रूपाण्याविशन्. इन्द्रं जैत्राय हर्षया शचीपतिम्.. (१३) हे स्तोता! हमारे विशाल घर के लिए इंद्र के व्याप्त रूप की स्तुति करो एवं विजयप्रद धन पाने के लिए शक्तिशाली इंद्र की प्रशंसा करो. (१३) सूक्त—१६ देवता—इंद्र प्र सम्राजं चर्षणीनामिन्द्रं स्तोता नव्यं गीर्भिः. नरं नृषाहं मंहिष्ठम्.. (१) हे स्तोताओ! स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय, नेता, शत्रु पराजयकारी, सर्वाधिक दाता एवं मानव सम्राट् इंद्र की स्तुति करो. (१) यस्मिन्नुक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या. अपामवो न समुद्रे.. (२) इंद्र के प्रति उक्थ एवं सभी प्रशंसनीय हव्यान्न उसी प्रकार शोभा पाते हैं, जिस प्रकार जल की तरंगें सागर में सुशोभित होती हैं. (२) तं सुष्टुत्या विवासे ज्येष्ठराजं भरे कृत्नम्. महो वाजिनं सनिभ्यः.. (३) मैं धन पाने के लिए प्रशंसनीयों में दीप्तिशाली, संग्रामों में महान् विक्रम प्रदर्शित करने वाले व शक्तिशाली इंद्र की शोभन स्तुतियों द्वारा सेवा करता हूं. (३) यस्यानूना गभीरा मदा उरवस्तरुत्राः. हर्षुमन्तः शूरसातौ.. (४) इंद्र का सोमपान का नशा पर्याप्त, गंभीर, विस्तीर्ण, शत्रुनाशक एवं युद्ध में प्रसन्नता देने वाला है. (४) तमिद्धनेषु हितेष्वधिवाकाय हवन्ते. येषामिन्द्रस्ते जयन्ति.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
स्तोता लोग शत्रुओं का धन देखकर पक्षपात प्राप्त करने के लिए इंद्र को बुलाते हैं. इंद्र जिनका पक्षपात करते हैं, वे विजयी होते हैं. (५) तमिच्च्यौत्नैरार्यन्ति तं कृतेभिश्चर्षणयः. एष इन्द्रो वरिवस्कृत्.. (६) मनुष्य शक्तिशाली स्तोत्रों एवं यज्ञकर्मों द्वारा उन्हीं इंद्र को स्वामी बनाते हैं. इंद्र ही स्तोताओं को धन देने वाले हैं. (६) इन्द्रो ब्रह्मेन्द्र ऋषिरिन्द्रः पुरू पुरुहूतः. महान्महीभिः शचीभिः.. (७) इंद्र सर्वाधिक महान्, ऋषि, अनेक द्वारा कई बार बुलाए हुए एवं वृत्र वधादि महान् कार्यों के कारण महान् हैं. (७) स स्तोम्यः स हव्यः सत्यः सत्वा तुविकूर्मिः. एकश्चित्सन्नभिभूतिः.. (८) इंद्र स्तुति करने योग्य, बुलाने योग्य, सत्यस्वभाव, शत्रुनाशक, अनेक कर्म करने वाले एवं अकेले होने पर भी शत्रुपराजयकारी हैं. (८) तमर्केभिस्तं सामभिस्तं गायत्रैश्चर्षणयः. इन्द्रं वर्धन्ति क्षितयः.. (९) मंत्रद्रष्टा लोग एवं साधारण जन उन इंद्र को यजुर्वेद के पूजोपयोगी मंत्रों, सामवेद के गाने योग्य मंत्रों एवं गायत्री छंद में लिखित स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. (९) प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्तारं ज्योतिः समत्सु. सासह्वांसं युधामित्रान्..(१०) इंद्र अभिमुख होकर प्रशंसनीय धन देने वाले, युद्धों में जयरूपी प्रकाश करने वाले एवं युद्ध के द्वारा शत्रुओं को हराने वाले हैं. (१०) स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः. इन्द्रो विश्वा अति द्विषः.. (११) पूर्ण करने वाले एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र हमें नाव के द्वारा सभी शत्रुओं से कुशलपूर्वक पार करें. (११) स त्वं न इन्द्र वाजेभिर्दशस्या च गातुया च. अच्छा च नः सुम्नं नेषि.. (१२) हे इंद्र! तुम अपनी शक्ति द्वारा हमें धन एवं मार्ग प्रदान करो. तुम सुख को हमारे सामने लाओ. (१२) सूक्त—१७ देवता—इंद्र आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! आओ तुम्हारे लिए हम सोमरस निचोड़ते हैं. तुम इस सोम को पिओ एवं हमारे द्वारा बिछाए गए इन कुशों पर बैठो. (१) आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (२) हे इंद्र! मंत्र के कारण रथ में जुड़ने वाले एवं केशों से युक्त घोड़े तुम्हें यहां लावें. इस यज्ञ में आकर तुम हमारी स्तुतियां सुनो. (२) ब्रह्माणस्तवा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (३) हे इंद्र! सोमरस से युक्त व सोमरस निचोड़ने वाले हम स्तोता योग्य स्तुतियों द्वारा तुम सोमपान करने वाले को बुलाते हैं. (३) आ नो याहि सुतावतोऽस्माकं सुष्टुतीरुप. पिबा सु शिपिन्नन्धसः.. (४) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम लोगों के सामने आओ एवं हमारी स्तुतियां सुनो. हे शोभन शिरस्त्राण वाले इंद्र! सोमरूप हव्य का भोग करो. (४) आ ते सिञ्चामि कुक्ष्योरनु गात्रा वि धावतु. गृभाय जिह्वया मधु.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी दोनों कोखों को मैं सोमरस से पूर्ण करता हूं. सोमरस तुम्हारे शरीर के सभी भोगों को व्याप्त करे. तुम जीभ द्वारा मधुर सोमरस स्वीकार करो. (५) स्वादुष्टे अस्तु संसुदे मधुमान्तन्वे३तव. सोमः शमस्तु ते हृदे.. (६) हे इंद्र! यह माधुर्यपूर्ण सोम तुम्हारे शोभनदान वाले शरीर के लिए अत्यंत स्वाद वाला हो. यह सोम तुम्हारे हृदय के लिए सुखकारक हो. (६) अयमु त्वा विचर्षणे जनीरिवाभि संवृतः. प्र सोम इन्द्र सर्पतु.. (७) हे विशेष द्रष्टा इंद्र! यह सोम स्त्री के समान ढका हुआ बनकर तुम्हारे समीप जाए. (७) तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे. इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते.. (८) विस्तीर्ण ग्रीवा वाले, बड़े पेट वाले एवं शोभन भुजाओं से युक्त इंद्र सोमरूप हव्य से प्रमत्त होकर शत्रुओं का नाश करते हैं. (८) इन्द्र प्रेहि पुरस्त्वं विश्वस्येशान ओजसा. वृत्राणि वृत्रहञ्जहि.. (९) हे इंद्र! तुम अपने बल से सारे जगत् के स्वामी बनकर हमारे सामने आओ. हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम शत्रुओं को मारो. (९) दीर्घस्ते अस्त्वङ्कुशो येना वसु प्रयच्छसि. यजमानाय सुन्वते.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम्हारा वह अंकुश बड़ा हो, जिससे तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन देते हो. (१०) अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (११) हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए वेदी पर बिछे हुए कुशों पर विशेषरूप से शुद्ध किया गया है. तुम यहां आओ एवं इसे शीघ्र पिओ. (११) शाचिगो शाचिपूजनायं रणाय ते सुतः. आखण्डल प्र हूयसे.. (१२) हे शक्तिशाली, गायों के स्वामी एवं प्रसिद्ध पूजन वाले इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यह सोमरस निचोड़ा गया है. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम स्तुतियों द्वारा बुलाए जाते हो. (१२) यस्ते शृङ्गवृषो नपात् प्रणपात्कुण्डपाय्यः. न्यस्मिन्दध्न आ मनः.. (१३) हे शृंगवृष ऋषि के पुत्र इंद्र! कुण्डपाट्य नामक यज्ञ तुम्हारा स्थापक है. ऋषियों ने उस यज्ञ में मन लगाया है. (१३) वास्तोष्पते ध्रुवा स्थूणांसत्रं सोम्यानाम्. द्रप्सो भेत्ता पुरो शश्वतीनामिन्द्रो मुनीनां सखा.. (१४) हे गृह के स्वामी इंद्र! घर की छत रोकने वाले लकड़ी के खंभे स्थिर हों. हम सोमरस निचोड़ने वालों के शरीर में रक्षायोग्य बल दो. तरल सोम वाले एवं शत्रु नगरियों का नाश करने वाले इंद्र ऋषियों के सखा हों. (१४) पृदाकुसानुर्यजतो गवेषण एकः सन्नभि भूयसः. भूर्णिमश्वं नयत्तुजा पूरां गृभेन्द्रं सोमस्य पीतये.. (१५) सांप के समान ऊंचे सिर वाले, यज्ञ के पात्र एवं गायों को देने वाले इंद्र अकेले होने पर भी बहुत से शत्रुओं को पराजित करते हैं. स्तोता भरण करने वाले एवं व्यापक इंद्र को सोमरस पीने के लिए हमारे सामने लाते हैं. (१५) सूक्त—१८ देवता—आदित्य आदि इदं ह नूनमेषां सुम्नं भिक्षेत मर्त्यः. आदित्यानामपूर्व्वं सवीमनि.. (१) इस समय अदितिपुत्र देवों की प्रेरणा से स्तोता अभिनव सुख की याचना करें. (१) अनर्वाणो ह्येशां पन्था आदित्यानाम्. अदब्धाः सन्ति पायवः सुगेवृधः.. (२) इन अदितिपुत्रों के मार्ग दूसरों के गमन से रहित एवं हिंसाशून्य हैं. वे मार्ग पालन करने ebook converter DEMO Watermarks*
वाले और सुखवर्धक हैं. (२) तत्सु नः सविता भगो वरुणो मित्रो अर्यमा. शर्म यच्छन्तु सप्रथो यदीमहे.. (३) हम जिस विस्तृत सुख की याचना करते हैं, वही हमें सविता, भग, वरुण, मित्र एवं अर्यमा दें. (३) देवेभिर्देव्यदितेऽरिष्टभर्मन्ना गहि. स्मत्सूरिभिः पुरुप्रिय सुशर्मभिः.. (४) हे देवि अदिति! तुम जिसका भरण करती हो, उसकी कोई हिंसा नहीं कर सकता. तुम बहुतों को प्रिय हो. तुम शोभन सुख वाले एवं बुद्धिमान् देवों के साथ भली प्रकार आओ. (४) ते हि पुत्रासो अदितेर्विदुर्द्वेषांसि योतवे. अंहोश्चिदुरुरुचक्रयोऽनेहसः.. (५) अदिति के वे पुत्र द्वेषी राक्षसों को अलग करना जानते हैं. बड़े-बड़े कामों को करने वाले एवं रक्षक देव हमें पाप से अलग करना चाहते हैं. (५) अदितिनो दिवा पशुमदितिर्नक्त मद्धयाः. अदितिः पात्वंहसः सदावृधा. (६) अदिति दिन में हमारे पशुओं की रक्षा करें. बाहर एवं भीतर से समान रहने वाली अदिति रात में हमारे पशुओं की रक्षा करें. वे हमें सदा बढ़ने वाले पाप से बचावें. (६) उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्या गमत्. सा शन्ताति मयस्करदप सिध्रः.. (७) स्तुति के योग्य वे अदिति अपने रक्षासाधनों द्वारा दिन में हमारे पास आवें, हमें शांतिदाता सुख दें एवं हमारे बाधकों को दूर करें. (७) उत त्या दैव्या भिषजा शं नः करतो अश्विना. युयुयातामितो रपो अप सिध्रः.. (८) देवों के प्रसिद्ध वैद्य अश्विनीकुमार हमें सुख दें, हमसे पाप को हटावें एवं शत्रुओं को दूर भगावें. (८) शमग्निरग्निभिः करच्छं नस्तपतु सूर्यः. शं वातो वात्वरपा अप सिध्रः.. (९) अग्नि देव गार्हपत्यादि विविध अग्नियों द्वारा हमें आरोग्य का सुख दें. सूर्य हमारे लिए सुखदाता बनकर तपें. पापरहित वायु सुख देने के लिए बहे एवं शत्रुओं को हमसे दूर रखें. (९) अपामीवामप स्रिधमप सेधत दुर्मतिम्. आदित्यासो युयोतना नो अंहसः.. (१०) हे आदित्यो! हमसे रोगों को दूर करो, शत्रुओं को अलग हटाओ एवं हमसे दुष्टबुद्धि को दूर रखो. आदित्यगण हमें पापों से अलग करें. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
युयोता शरुमस्मदाँ आदित्यास उतामतिम्. ऋधग् द्वेषः कृणुत विश्ववेदसः.. (११) हे आदित्यो! हिंसक शत्रु एवं दुष्ट-बुद्धि को हमसे दूर करो. हे सर्वज्ञ आदित्यो! शत्रुओं को हमसे अलग करो. (११) तत्सु नः शर्म यच्छतादित्या यन्मुमोचति. एनस्वन्तं चिदेनसः सुदानवः.. (१२) हे शोभनदान वाले आदित्यो! तुम्हारा जो सुख पापी स्तोता को भी पाप से छुड़ाता है, उसे हमें दो. (१२) यो नः कश्चिद्रिरिक्षति रक्षस्त्वेन मर्त्यः. स्वैः ष एवै रिरिषीष्ट युर्जनः.. (१३) जो मनुष्य हमें राक्षस बनकर नष्ट करना चाहता है, वह अपने ही पापों से नष्ट हो जावे तथा अपने आप दूर चला जावे. (१३) समित्तमघमश्ववद्दुःशंसं मर्त्यं रिपुम्. यो अस्मत्रा दुर्हणावाँ उप द्वयुः.. (१४) उस अपकीर्ति वाले शत्रु-मनुष्य को पाप व्याप्त करे जो दुष्टतापूर्वक हमें मारना चाहता है एवं हमारे आगेपीछे दो प्रकार का व्यवहार करता है. (१४) पाकत्रा स्थन देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम्. उप द्वयुं चाद्वयुं च वसवः.. (१५) हे निवासस्थानदाता आदित्य देवो! तुम परिपक्व ज्ञान वाले हो. तुम अपने मन में कपटी और कपटहीन—दोनों प्रकार के लोगों को जानते हो. (१५) आ शर्म पर्वतानामोतापां वृणीमहे. द्यावाक्षामारे अस्मद्रपस्कृतम्.. (१६) हम अभिमुख होकर पर्वतसंबंधी एवं जलसंबंधी सुखों का वरण करते हैं. द्यावा-पृथिवी पाप को हमसे दूर ले जावें. (१६) ते नो भद्रेण शर्मणा युष्माकं नावा वसवः. अति विश्वानि दुरिता पिपर्तन.. (१७) हे निवासदाता आदित्यो! अपनी कल्याणकारी एवं सुखद नाव के द्वारा हमें सब पापों के पार पहुंचाओ. (१७) तुचे तनाय तत्सु नो द्राघीय आयुर्जीवसे. आदित्यासः सुमहसः कृणोतन.. (१८) हे शोभन-तेज वाले आदित्यो! हमारे पुत्रों और पौत्रों को एवं हमारे जीवन को बहुत लंबी आयु दो. (१८) यज्ञो हीळो वो अन्तर आदित्या अस्ति मृळत. युष्मे इद्धो अपि ष्मसि सजात्ये.. (१९) हे आदित्यो! हमारा यज्ञ तुम्हारे समीप ही वर्तमान है. तुम हमें सुखी करो. तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*