ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
स्तोता लोग शत्रुओं का धन देखकर पक्षपात प्राप्त करने के लिए इंद्र को बुलाते हैं. इंद्र जिनका पक्षपात करते हैं, वे विजयी होते हैं. (५) तमिच्च्यौत्नैरार्यन्ति तं कृतेभिश्चर्षणयः. एष इन्द्रो वरिवस्कृत्.. (६) मनुष्य शक्तिशाली स्तोत्रों एवं यज्ञकर्मों द्वारा उन्हीं इंद्र को स्वामी बनाते हैं. इंद्र ही स्तोताओं को धन देने वाले हैं. (६) इन्द्रो ब्रह्मेन्द्र ऋषिरिन्द्रः पुरू पुरुहूतः. महान्महीभिः शचीभिः.. (७) इंद्र सर्वाधिक महान्, ऋषि, अनेक द्वारा कई बार बुलाए हुए एवं वृत्र वधादि महान् कार्यों के कारण महान् हैं. (७) स स्तोम्यः स हव्यः सत्यः सत्वा तुविकूर्मिः. एकश्चित्सन्नभिभूतिः.. (८) इंद्र स्तुति करने योग्य, बुलाने योग्य, सत्यस्वभाव, शत्रुनाशक, अनेक कर्म करने वाले एवं अकेले होने पर भी शत्रुपराजयकारी हैं. (८) तमर्केभिस्तं सामभिस्तं गायत्रैश्चर्षणयः. इन्द्रं वर्धन्ति क्षितयः.. (९) मंत्रद्रष्टा लोग एवं साधारण जन उन इंद्र को यजुर्वेद के पूजोपयोगी मंत्रों, सामवेद के गाने योग्य मंत्रों एवं गायत्री छंद में लिखित स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. (९) प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्तारं ज्योतिः समत्सु. सासह्वांसं युधामित्रान्..(१०) इंद्र अभिमुख होकर प्रशंसनीय धन देने वाले, युद्धों में जयरूपी प्रकाश करने वाले एवं युद्ध के द्वारा शत्रुओं को हराने वाले हैं. (१०) स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः. इन्द्रो विश्वा अति द्विषः.. (११) पूर्ण करने वाले एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र हमें नाव के द्वारा सभी शत्रुओं से कुशलपूर्वक पार करें. (११) स त्वं न इन्द्र वाजेभिर्दशस्या च गातुया च. अच्छा च नः सुम्नं नेषि.. (१२) हे इंद्र! तुम अपनी शक्ति द्वारा हमें धन एवं मार्ग प्रदान करो. तुम सुख को हमारे सामने लाओ. (१२) सूक्त—१७ देवता—इंद्र आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! आओ तुम्हारे लिए हम सोमरस निचोड़ते हैं. तुम इस सोम को पिओ एवं हमारे द्वारा बिछाए गए इन कुशों पर बैठो. (१) आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (२) हे इंद्र! मंत्र के कारण रथ में जुड़ने वाले एवं केशों से युक्त घोड़े तुम्हें यहां लावें. इस यज्ञ में आकर तुम हमारी स्तुतियां सुनो. (२) ब्रह्माणस्तवा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (३) हे इंद्र! सोमरस से युक्त व सोमरस निचोड़ने वाले हम स्तोता योग्य स्तुतियों द्वारा तुम सोमपान करने वाले को बुलाते हैं. (३) आ नो याहि सुतावतोऽस्माकं सुष्टुतीरुप. पिबा सु शिपिन्नन्धसः.. (४) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम लोगों के सामने आओ एवं हमारी स्तुतियां सुनो. हे शोभन शिरस्त्राण वाले इंद्र! सोमरूप हव्य का भोग करो. (४) आ ते सिञ्चामि कुक्ष्योरनु गात्रा वि धावतु. गृभाय जिह्वया मधु.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी दोनों कोखों को मैं सोमरस से पूर्ण करता हूं. सोमरस तुम्हारे शरीर के सभी भोगों को व्याप्त करे. तुम जीभ द्वारा मधुर सोमरस स्वीकार करो. (५) स्वादुष्टे अस्तु संसुदे मधुमान्तन्वे३तव. सोमः शमस्तु ते हृदे.. (६) हे इंद्र! यह माधुर्यपूर्ण सोम तुम्हारे शोभनदान वाले शरीर के लिए अत्यंत स्वाद वाला हो. यह सोम तुम्हारे हृदय के लिए सुखकारक हो. (६) अयमु त्वा विचर्षणे जनीरिवाभि संवृतः. प्र सोम इन्द्र सर्पतु.. (७) हे विशेष द्रष्टा इंद्र! यह सोम स्त्री के समान ढका हुआ बनकर तुम्हारे समीप जाए. (७) तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे. इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते.. (८) विस्तीर्ण ग्रीवा वाले, बड़े पेट वाले एवं शोभन भुजाओं से युक्त इंद्र सोमरूप हव्य से प्रमत्त होकर शत्रुओं का नाश करते हैं. (८) इन्द्र प्रेहि पुरस्त्वं विश्वस्येशान ओजसा. वृत्राणि वृत्रहञ्जहि.. (९) हे इंद्र! तुम अपने बल से सारे जगत् के स्वामी बनकर हमारे सामने आओ. हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम शत्रुओं को मारो. (९) दीर्घस्ते अस्त्वङ्कुशो येना वसु प्रयच्छसि. यजमानाय सुन्वते.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम्हारा वह अंकुश बड़ा हो, जिससे तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन देते हो. (१०) अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (११) हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए वेदी पर बिछे हुए कुशों पर विशेषरूप से शुद्ध किया गया है. तुम यहां आओ एवं इसे शीघ्र पिओ. (११) शाचिगो शाचिपूजनायं रणाय ते सुतः. आखण्डल प्र हूयसे.. (१२) हे शक्तिशाली, गायों के स्वामी एवं प्रसिद्ध पूजन वाले इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यह सोमरस निचोड़ा गया है. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम स्तुतियों द्वारा बुलाए जाते हो. (१२) यस्ते शृङ्गवृषो नपात् प्रणपात्कुण्डपाय्यः. न्यस्मिन्दध्न आ मनः.. (१३) हे शृंगवृष ऋषि के पुत्र इंद्र! कुण्डपाट्य नामक यज्ञ तुम्हारा स्थापक है. ऋषियों ने उस यज्ञ में मन लगाया है. (१३) वास्तोष्पते ध्रुवा स्थूणांसत्रं सोम्यानाम्. द्रप्सो भेत्ता पुरो शश्वतीनामिन्द्रो मुनीनां सखा.. (१४) हे गृह के स्वामी इंद्र! घर की छत रोकने वाले लकड़ी के खंभे स्थिर हों. हम सोमरस निचोड़ने वालों के शरीर में रक्षायोग्य बल दो. तरल सोम वाले एवं शत्रु नगरियों का नाश करने वाले इंद्र ऋषियों के सखा हों. (१४) पृदाकुसानुर्यजतो गवेषण एकः सन्नभि भूयसः. भूर्णिमश्वं नयत्तुजा पूरां गृभेन्द्रं सोमस्य पीतये.. (१५) सांप के समान ऊंचे सिर वाले, यज्ञ के पात्र एवं गायों को देने वाले इंद्र अकेले होने पर भी बहुत से शत्रुओं को पराजित करते हैं. स्तोता भरण करने वाले एवं व्यापक इंद्र को सोमरस पीने के लिए हमारे सामने लाते हैं. (१५) सूक्त—१८ देवता—आदित्य आदि इदं ह नूनमेषां सुम्नं भिक्षेत मर्त्यः. आदित्यानामपूर्व्वं सवीमनि.. (१) इस समय अदितिपुत्र देवों की प्रेरणा से स्तोता अभिनव सुख की याचना करें. (१) अनर्वाणो ह्येशां पन्था आदित्यानाम्. अदब्धाः सन्ति पायवः सुगेवृधः.. (२) इन अदितिपुत्रों के मार्ग दूसरों के गमन से रहित एवं हिंसाशून्य हैं. वे मार्ग पालन करने ebook converter DEMO Watermarks*
वाले और सुखवर्धक हैं. (२) तत्सु नः सविता भगो वरुणो मित्रो अर्यमा. शर्म यच्छन्तु सप्रथो यदीमहे.. (३) हम जिस विस्तृत सुख की याचना करते हैं, वही हमें सविता, भग, वरुण, मित्र एवं अर्यमा दें. (३) देवेभिर्देव्यदितेऽरिष्टभर्मन्ना गहि. स्मत्सूरिभिः पुरुप्रिय सुशर्मभिः.. (४) हे देवि अदिति! तुम जिसका भरण करती हो, उसकी कोई हिंसा नहीं कर सकता. तुम बहुतों को प्रिय हो. तुम शोभन सुख वाले एवं बुद्धिमान् देवों के साथ भली प्रकार आओ. (४) ते हि पुत्रासो अदितेर्विदुर्द्वेषांसि योतवे. अंहोश्चिदुरुरुचक्रयोऽनेहसः.. (५) अदिति के वे पुत्र द्वेषी राक्षसों को अलग करना जानते हैं. बड़े-बड़े कामों को करने वाले एवं रक्षक देव हमें पाप से अलग करना चाहते हैं. (५) अदितिनो दिवा पशुमदितिर्नक्त मद्धयाः. अदितिः पात्वंहसः सदावृधा. (६) अदिति दिन में हमारे पशुओं की रक्षा करें. बाहर एवं भीतर से समान रहने वाली अदिति रात में हमारे पशुओं की रक्षा करें. वे हमें सदा बढ़ने वाले पाप से बचावें. (६) उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्या गमत्. सा शन्ताति मयस्करदप सिध्रः.. (७) स्तुति के योग्य वे अदिति अपने रक्षासाधनों द्वारा दिन में हमारे पास आवें, हमें शांतिदाता सुख दें एवं हमारे बाधकों को दूर करें. (७) उत त्या दैव्या भिषजा शं नः करतो अश्विना. युयुयातामितो रपो अप सिध्रः.. (८) देवों के प्रसिद्ध वैद्य अश्विनीकुमार हमें सुख दें, हमसे पाप को हटावें एवं शत्रुओं को दूर भगावें. (८) शमग्निरग्निभिः करच्छं नस्तपतु सूर्यः. शं वातो वात्वरपा अप सिध्रः.. (९) अग्नि देव गार्हपत्यादि विविध अग्नियों द्वारा हमें आरोग्य का सुख दें. सूर्य हमारे लिए सुखदाता बनकर तपें. पापरहित वायु सुख देने के लिए बहे एवं शत्रुओं को हमसे दूर रखें. (९) अपामीवामप स्रिधमप सेधत दुर्मतिम्. आदित्यासो युयोतना नो अंहसः.. (१०) हे आदित्यो! हमसे रोगों को दूर करो, शत्रुओं को अलग हटाओ एवं हमसे दुष्टबुद्धि को दूर रखो. आदित्यगण हमें पापों से अलग करें. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
युयोता शरुमस्मदाँ आदित्यास उतामतिम्. ऋधग् द्वेषः कृणुत विश्ववेदसः.. (११) हे आदित्यो! हिंसक शत्रु एवं दुष्ट-बुद्धि को हमसे दूर करो. हे सर्वज्ञ आदित्यो! शत्रुओं को हमसे अलग करो. (११) तत्सु नः शर्म यच्छतादित्या यन्मुमोचति. एनस्वन्तं चिदेनसः सुदानवः.. (१२) हे शोभनदान वाले आदित्यो! तुम्हारा जो सुख पापी स्तोता को भी पाप से छुड़ाता है, उसे हमें दो. (१२) यो नः कश्चिद्रिरिक्षति रक्षस्त्वेन मर्त्यः. स्वैः ष एवै रिरिषीष्ट युर्जनः.. (१३) जो मनुष्य हमें राक्षस बनकर नष्ट करना चाहता है, वह अपने ही पापों से नष्ट हो जावे तथा अपने आप दूर चला जावे. (१३) समित्तमघमश्ववद्दुःशंसं मर्त्यं रिपुम्. यो अस्मत्रा दुर्हणावाँ उप द्वयुः.. (१४) उस अपकीर्ति वाले शत्रु-मनुष्य को पाप व्याप्त करे जो दुष्टतापूर्वक हमें मारना चाहता है एवं हमारे आगेपीछे दो प्रकार का व्यवहार करता है. (१४) पाकत्रा स्थन देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम्. उप द्वयुं चाद्वयुं च वसवः.. (१५) हे निवासस्थानदाता आदित्य देवो! तुम परिपक्व ज्ञान वाले हो. तुम अपने मन में कपटी और कपटहीन—दोनों प्रकार के लोगों को जानते हो. (१५) आ शर्म पर्वतानामोतापां वृणीमहे. द्यावाक्षामारे अस्मद्रपस्कृतम्.. (१६) हम अभिमुख होकर पर्वतसंबंधी एवं जलसंबंधी सुखों का वरण करते हैं. द्यावा-पृथिवी पाप को हमसे दूर ले जावें. (१६) ते नो भद्रेण शर्मणा युष्माकं नावा वसवः. अति विश्वानि दुरिता पिपर्तन.. (१७) हे निवासदाता आदित्यो! अपनी कल्याणकारी एवं सुखद नाव के द्वारा हमें सब पापों के पार पहुंचाओ. (१७) तुचे तनाय तत्सु नो द्राघीय आयुर्जीवसे. आदित्यासः सुमहसः कृणोतन.. (१८) हे शोभन-तेज वाले आदित्यो! हमारे पुत्रों और पौत्रों को एवं हमारे जीवन को बहुत लंबी आयु दो. (१८) यज्ञो हीळो वो अन्तर आदित्या अस्ति मृळत. युष्मे इद्धो अपि ष्मसि सजात्ये.. (१९) हे आदित्यो! हमारा यज्ञ तुम्हारे समीप ही वर्तमान है. तुम हमें सुखी करो. तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*
सजातीय बनकर हम सदा तुम्हारे भक्त रहेंगे. (१९) बृहद्वरूथं मरुतां देवं त्रातारमश्विना. मित्रमीमहे वरुणं स्वस्तये.. (२०) हम भक्तों के रक्षक इंद्र, अश्विनीकुमारों, मित्र एवं वरुण से सुदृढ़ तथा शीतातप वारण करने वाला घर अपनी रक्षा के लिए मांगते हैं. (२०) अनेहो मित्रार्यमन्नृवद्वरुण शंस्यम्. त्रिवरूथं मरुतो यन्त नश्छर्दिः.. (२१) हे मित्र, अर्यमा, वरुण एवं मरुद्गण! तुम हमें ऐसा घर दो जो हिंसाशून्य, पुत्रादि से युक्त, प्रशंसा योग्य व शीत, आतप, वर्षा—तीनों का निवारक हो. (२१) ये चिद्धि मृत्युबन्धव आदित्या मनवः स्मसि. प्र सू न आयुर्जीवसे तिरेतन.. (२२) हे आदित्यो! जो लोग मृत्यु के बहुत समीप हैं, उनके जीवन के लिए उनकी आयु बढ़ाओ. (२२) सूक्त—१९ देवता—अग्नि आदि तं गूर्धया स्वर्णीरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे. देवत्रा हव्यमोहिरे.. (१) हे स्तोताओ! सबके नेता प्रसिद्ध अग्नि की स्तुति करो. ऋत्विज् सबके स्वामी अग्नि देव के समीप जाते हैं एवं देवों को हव्य देते हैं. (१) विभूतरातिं विप्र चित्रशोचिषमग्निमीळिष्व यन्तुरम्. अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम्.. (२) हे मेधावी सौभरि! अधिक देने वाले, विचित्र-दीप्तिसंपन्न इस सोमसाध्य यज्ञ के नियंता एवं पुरातन अग्नि की स्तुति यज्ञपूर्ति के लिए करो. (२) यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्..(३) हे अतिशय-यज्ञपात्र, देवों में सर्वोत्तम देवों को बुलाने वाले, मरणरहित एवं इस यज्ञ के शोभनकर्त्ता अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. (३) ऊर्जो नपातं सुभगं सुदीदितिमग्निं श्रेष्ठशोचिषम्. स नो मित्रस्य वरुणस्य सो अपामा सुम्नं यक्षते दिवि.. (४) अन्न का पालन करने वाले शोभन धनयुक्त, उत्तम दीप्तिसंपन्न एवं श्रेष्ठ प्रकाश वाले अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. वे हमारे लिए द्युलोक में मित्र एवं वरुण के सुख का विचार करके तथा जल देवता के सुख के लिए यज्ञ करें. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
यः समिधा य आहुती यो वेदेन ददाश मर्तो अग्नये. यो नमसा स्वध्वरः.. (५) जो मनुष्य समिधा द्वारा, आहुतियों द्वारा, वेदाध्ययन द्वारा एवं सुंदर यज्ञ करते समय नमस्कार द्वारा अग्नि की सेवा करता है. (५) तस्येदर्वन्तो रंहयन्त आशवस्तस्य द्युम्नितमं यशः. न तमंहो देवकृतं कुतश्चन न मर्त्यकृतं नशत्.. (६) उसी के व्यापक अश्व वेगपूर्वक चलते हैं, उसी का यश सबसे अधिक दीप्त होता है और उसे देवकृत या मनुष्यकृत कोई भी पाप नहीं लगता. (६) स्वग्नयो वो अग्निभिः स्याम सूनो सहस ऊर्जां पते. सुवीरस्त्वमस्मयुः.. (७) हे बल के पुत्र एवं हव्य अन्नों के स्वामी अग्नि! हम तुम्हारे गार्हपत्यादि रूपों द्वारा शोभन अग्नि वाले बनेंगे. तुम शोभन वीरों वाले बनकर हमारी रक्षा करो. (७) प्रशंसमानो अतिथिर्न मित्रियोऽग्नी रथो न वेद्यः. त्वे क्षेमासो अपि सन्ति साधवस्त्वं राजा रयीणाम्.. (८) अग्नि प्रशंसा करते हुए अतिथि के समान स्तोताओं के हितैषी एवं रथ के समान इच्छित फल देने वाले हैं. हे अग्नि! तुम में उचित रक्षासाधन हैं एवं तुम धन के स्वामी हो. (८) सो अद्धा दाश्वध्वरोऽग्ने मर्तः सुभग स प्रशंस्यः. स धीभिरस्तु सनिता.. (९) हे शोभन-धन वाले अग्नि! यज्ञ करने वाला मनुष्य सत्यफल से युक्त बने. वह प्रशंसा के योग्य एवं स्तोत्रों द्वारा सेवनीय हो. (९) यस्य त्वमूर्ध्वो अध्वराय तिष्ठसि क्षयद्वीरः स साधते. सो अर्वद्भिः सनिता स विपन्युभिः स शूरैः सनिता कृतम्.. (१०) हे अग्नि! जिस यजमान का यज्ञ पूर्ण करने के लिए तुम ऊर्ध्वगति वाले बनते हो, वह निवासयुक्त वीरों का स्वामी बनकर अपना काम पूरा करता है, अश्वों द्वारा प्राप्त विजय को पाता है एवं शूरों व बुद्धिमानों द्वारा सेवित होता है. (१०) यस्याग्निर्विपुर्गृहे स्तोमं चनो दधीत विश्ववार्यः. हव्या वा वेविषद्विषः.. (११) जिस यजमान के घर में सबके द्वारा वरणीय रूप वाले अग्नि स्तोत्र व अन्न स्वीकार करते हैं, उसका हृदय देवों के पास जाता है. (११) विप्रस्य वा स्तुवतः सहसो यहो मक्षूतमस्य रातिषु. अवोदेवमुपरिमर्त्यं कृधि वसो विविदुषो वचः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे बल से युक्त एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि! बुद्धिमान् स्तोता के हव्यदान में यज्ञकर्त्ता का वचन देवों के नीचे एवं मानवों के ऊपर करो. (१२) यो अग्निं हव्यदातिभिर्नमोभिर्वा सुदक्षमाविवासति. गिरा वाजिरशोचिषम्.. (१३) जो यजमान हव्य देकर एवं नमस्कारों द्वारा शोभन बलयुक्त अग्नि उपासना करता है अथवा स्तुतियों द्वारा गतिशील तेज वाले अग्नि की सेवा करता है वह समृद्धिशाली बनता है. (१३) समिधा यो निशिती दाशददितिं धामभिरस्य मर्त्यः. विश्वेत्स धीभिः सुभगो जनाँ अति द्युम्नैरुरुदन इव तारिषत्.. (१४) जो मनुष्य इस अग्नि के आकार से अविभाज्य गार्हपत्यादि की ज्वलनशील समिधाओं के द्वारा सेवा करता है, वह अपने यज्ञकर्मों द्वारा शोभन संपत्ति वाला बनकर तेजस्वी यशों द्वारा सब मनुष्यों को इस प्रकार पार कर जाता है जैसे जल सब बाधाएं पार करके आगे बढ़ता है. (१४) तदग्ने द्युम्नमा भर यत्सासहत्सदने कं चिदत्रिणम्. मन्युं जनस्य दूढ्यः.. (१५) हे अग्नि! हमें वह धन दो जो घर में वर्तमान राक्षस आदि को पराजित करता है एवं पापबुद्धि मनुष्य के क्रोध को दबाता है. (१५) येन चष्टे वरुणो मित्रो अर्यमा येन नासत्या भगः. वयं तत्ते शवसा गातुवित्तमा इन्द्रत्वोता विधेमहि.. (१६) अग्नि के जिस तेज द्वारा वरुण, मित्र, अर्यमा, अश्विनीकुमार एवं भग सबको प्रकाश देते हैं. शक्ति द्वारा स्तोत्र जानने वालों में श्रेष्ठ हम इंद्र द्वारा सुरक्षित होकर अग्नि के उसी तेज की सेवा करते हैं. (१६) ते घेदग्ने स्वाध्यो३ ये त्वा विप्र निदधिरे नृचक्षसम्. विप्रासो देव सुक्रतुम्.. (१७) हे मेधावी अग्नि देव! तुम मनुष्यों के साक्षी एवं शोभन कर्म वाले हो. जो बुद्धिमान् ऋत्विज् तुम्हें धारण करते हैं, वे शोभन ध्यान वाले बनते हैं. (१७) त इद्देदिं सुभग त आहुतिं ते सोतुं चक्रिरे दिवि. त इद्वाजेभिर्जिग्युर्महद्धनं ये त्वे कामं न्येरिरे.. (१८) हे शोभनधन वाले अग्नि! वे ही यजमान तुम्हारे यज्ञ के लिए वेदी बनाते हैं, तुम्हें आहुति देते हैं, दीप्तिशाली दिन में सोमरस निचोड़ते हैं एवं बल द्वारा विशाल संपत्ति जीतते हैं, जो तुम्हारे प्रति अभिलाषा रखते हैं. (१८) eBook converter DEMO Watermarks*
भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा उत प्रशस्तयः.. (१९) हव्यों द्वारा तृप्त अग्नि हमारे लिए कल्याणकारी हो. हे शोभन धन वाले अग्नि! तुम्हारा दान हमारा कल्याण करने वाला हो. तुम्हारा यज्ञ और तुम्हारी स्तुतियां हमें कल्याण दें. (१९) भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहः. अव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धतां वनेमा ते अभिष्टिभिः.. (२०) हे अग्नि! संग्राम में हमारे प्रति अपना मन शोभन बनाओ. उस मन के द्वारा तुम युद्धों में शत्रुओं को पराजित करो. तुम दूसरों को पराजित करने वाले शत्रुओं के महान् बल को नीचा दिखाओ. हम हव्यों और स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी सेवा करेंगे. (२०) ईळे गिरा मनुर्हितं यं देवा दूतमरतिं न्येरिरै. यजिष्ठं हव्यवाहनम्.. (२१) प्रजापति मनु द्वारा स्थापित अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. सर्वाधिक यज्ञकर्त्ता, हव्य वहन करने वाले एवं ईश्वर अग्नि को देवों ने दूत बनाकर भेजा. (२१) तिग्मजम्भाय तरुणाय राजते प्रयो गायस्यग्नये. यः पिंशते सूनृताभिः सुवीर्यमग्निर्घृतेभिराहुतः.. (२२) हे स्तोता! तेज ज्वालाओं वाले, नित्य तरुण एवं सुशोभित अग्नि के प्रति हव्य-अन्न से संबंधित गाना गाओ. वे अग्नि शोभन एवं सत्य वचनों की स्तुति सुनकर एवं घृत की आहुति पाकर स्तोता को शोभन वीर्य देते हैं. (२२) यदी घृतेभिराहुतो वाशीमग्निर्भरत उच्चाव च. असुर इव निर्णिजम्.. (२३) घृत के द्वारा बुलाए हुए अग्नि जिस समय ऊपर तथा नीचे शब्द करते हैं, उस समय वे शक्तिशाली सूर्य के समान अपना रूप प्रकाशित करते हैं. (२३) यो हव्यान्यैरयता मनुर्हितो देव आसा सुगन्धिना. विवासते वार्याणि स्वध्वरो होता देवो अमर्त्यः.. (२४) प्रजापति मनु द्वारा स्थापित एवं दीप्तिशाली अग्नि अपने सुगंधि वाले मुख द्वारा हमारा हव्य देवों के पास भेजते हैं. शोभनयज्ञ वाले अग्नि यजमान को उत्तम धन देते हैं एवं देवों को बुलाते हैं वे मरणरहित एवं दीप्तिशाली हैं. (२४) यदग्ने मर्त्यस्त्वं स्यामहं मित्रमहो अमर्त्यः. सहसः सूनवाहुत.. (२५) हे बल के पुत्र, घृतों द्वारा आहूत एवं अनुकूल दीप्ति वाले अग्नि! मैं मरणधर्मा तुम्हारी उपासना से तुम्हारे समान मरणरहित हो जाऊं. (२५)
न त्वा रासीयाभिशस्तये वसो न पापत्वाय सन्त्य. न मे स्तोतामतीवा न दुर्हितः स्यादग्ने न पापया.. (२६) हे वासदाता अग्नि! मैं मिथ्या अपवाद के लिए तुम पर आक्रोश नहीं करूंगा और न पाप के लिए तुम्हारा अपमान करूंगा. मेरा स्तोता भी ऐसा नहीं करेगा. बुद्धिहीन शत्रु बनकर मुझे बाधा न पहुंचावें. (२६) पितुर्न पुत्रः सुभृतो दुरोण आ देवाँ एतु प्र णो हविः.. (२७) भली प्रकार भरणकर्त्ता अग्नि हमारे यज्ञगृह में हमारा हवि देवों को इस प्रकार पहुंचावें जिस प्रकार पुत्र पिता की सेवा करता है. (२७) तवाहमन ऊतिभिर्नेदिष्ठाभिः सचेय जोषमा वसो. सदा देवस्य मर्त्यः.. (२८) हे वासदाता अग्नि! तुम्हारे समीपवर्ती रक्षासाधनों द्वारा मैं मनुष्य सदा तुम्हारी प्रसन्नता पाने के लिए सेवा करूं. (२८) तव क्रत्वा सनेयं तव रातिभिरग्ने तव प्रशस्तिभिः. त्वामिदाहुः प्रमतिं वसो ममाग्ने हर्षस्व दातवे.. (२९) हे अग्नि! तुम्हारी परिचर्चारूपी कर्म द्वारा मैं तुम्हारी सेवा करूंगा. तुम्हें हव्य देकर एवं तुम्हारी प्रशंसा करके मैं तुम्हारी सेवा करूंगा. हे वासदाता अग्नि! ब्रह्मवादी तुम्हें मेरा उत्तमबुद्धिरक्षक कहते हैं. हे अग्नि! दान के लिए प्रसन्न बनो. (२९) प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तिरते वाजभर्मभिः. यस्य त्वं सख्यमावरः.. (३०) हे अग्नि! तुम जिस यजमान की मित्रता स्वीकार करते हो, वह तुम्हारे शोभन पुत्रों से युक्त रक्षाओं द्वारा वृद्धि पाता है. (३०) तव द्रप्सो नीलवान्वाश ऋत्विय इन्धानः सिष्णवा ददे. त्वं महीनामुषसामसि प्रियः क्षपो वस्तुषु राजसि.. (३१) हे सोम से सींचे गए, द्रवणशील, शकट रूपी नीड़ वाले, शब्द करते हुए, ऋतुओं में उत्पन्न एवं प्रज्वलित अग्नि! तुम्हारे लिए सोमरस दिया जाता है. तुम महती उषाओं के प्रिय हो एवं रात के समय सारी वस्तुओं में सुशोभित होते हो. (३१) तमागन्म सोभरयः सहस्रमुष्कं स्वभिष्टिमवसे. सम्राजं त्रसदस्यवम्.. (३२) हम सौभरि लोग रक्षा पाने के विचार से हजारों तेजों वाले, शोभनरूप युक्त, भली प्रकार सुशोभित एवं राजर्षि त्रसदस्यु द्वारा स्तुत अग्नि के पास आए हैं. (३२) ebook converter DEMO Watermarks*
यस्य ते अग्ने अन्ये अग्नय उपक्षितो वयाइव. विपो न द्युम्ना नि युवे जनानां तव क्षत्राणि वर्धयन्.. (३३) हे अग्नि! जिस प्रकार वृक्ष में शाखाएं रहती हैं, उसी प्रकार तुम में गार्हपत्य आदि अन्य अग्नियां समाहित हैं. मनुष्यों के मध्य रहने वाला मैं तुम्हारी शक्तियां अपनी स्तुति द्वारा बढ़ाता हुआ अन्य स्तोताओं के सामने उज्ज्वल यश पाऊंगा. (३३) यमादित्यासो अद्रुहः पारं नयथ मर्त्यम्. मघोनां विश्वेषां सुदानवः.. (३४) हे द्रोहरहित एवं शोभन-दान वाले आदित्यो! सभी हव्यधारी मानवों के प्रति जिसे तुम प्रारंभ किए कर्म के अंत तक पहुंचाते हो, वह फल पाता है. (३४) यूयं राजानः कं चिच्चर्षणीसहः क्षयन्तं मानुषाँ अनु. वयं ते वो वरुण मित्रार्यमन्त्स्यामेदृतस्य रथ्यः.. (३५) हे शोभायुक्त एवं शत्रुओं को हराने वाले आदित्यो! तुम घातक मनुष्यों को नष्ट करो. हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा देवो! हम ही तुम्हारे यज्ञ के नेता होंगे. (३५) अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम्. मंहिष्ठो अर्यः सत्पतिः.. (३६) उत्तम दानी, स्वामी, सज्जनों के पालक एवं पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु ने मुझे पचास पत्नियां प्रदान की हैं. (३६) उत मे प्रयियोर्वयियोः सुवास्त्वा अधि तुग्वनि. तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्वसुर्द्दियानां पतिः.. (३७) शोभन निवास वाली सरिता के तट पर रहने वाले, काले रंग के बैलों को आगे बढ़ाने वाले, पूज्य, धनदान करने में समर्थ एवं दो सौ दस गायों के स्वामी त्रसदस्यु ने मुझे धन एवं वस्त्र दिए हैं. (३७) सूक्त—२० देवता—मरुद्गण आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थाता समन्यवः. स्थिरा चिन्नमयिष्णवः.. (१) हे प्रस्थान करने वाले मरुतो! आओ. तुम हमें मत मारना. तुम समानरूप से क्रोधित होने पर दृढ़ पर्वतों को भी कंपा सकते हो. तुम हमसे दूर मत रहो. (१) वीळुपविभिर्मरुत ऋभुक्षण आ रुद्रासः सुदीतिभिः. इषा नो अद्या गता पुरुस्पृहो यज्ञमा सोभरीयवः.. (२)
दीप्तिशाली निवासस्थान वाले एवं रुद्रपुत्र मरुतो! तुम ऐसे रथों द्वारा आओ, जिनके पहियों की नेमियां शोभन दीप्ति वाली हैं. हे बहुतों द्वारा अभिलषित मरुतो! मुझ सौभरि के प्रति मन में दयालु बनकर एवं अन्न लेकर आज यज्ञ में आओ. (२) विद्मा हि रुद्रियाणां शुष्ममुग्रं मरुतां शिमीवताम्. विष्णोरेषस्य मीळ्हुषाम्.. (३) हम कर्म वाले एवं कृपाजल से सींचने वाले रुद्रपुत्र मरुतों एवं विष्णु के उग्रबल को जानते हैं. (३) वि द्वीपानि पापतन्तिष्ठद्दुच्छुनोभे युजन्त रोदसी. प्र धन्वान्यैरत शुभ्रखादयो यदेजथ स्वभानवः.. (४) हे शोभन आयुधों वाले एवं विशिष्ट दीप्ति वाले मरुतो! तुम्हारे आने से जो कंपन होता है, उससे सारे द्वीप गिर पड़ते हैं, वृक्षादि स्थावर दुःखी होते हैं, द्यावा-पृथिवी दोनों कांप उठते हैं एवं गमनशील जल बहने लगता है. (४) अच्युता चिद्द्रो अज्ज्मन्ना नानदति पर्वतासो वनस्पतिः. भूमिर्यमेषु रेजते.. (५) हे मरुतो! जिस समय तुम युद्ध में जाते हो, उस समय अच्युत पर्वत एवं वनस्पतियां बार-बार शब्द करती हैं तथा धरती कांपती है. (५) अमाय वो मरुतो यातवे द्यौर्जिहीत उत्तरा बृहत्. यत्रा नरो देदिशते तनूष्वा त्वक्षांसि बाह्वोजसः.. (६) हे मरुतो! तुम्हारे बलपूर्वक गमन को स्थान देने के विचार से द्युलोक विशाल अंतरिक्ष से ऊपर चला गया है. उस अंतरिक्ष में बहुशक्तिसंपन्न एवं नेता मरुद्गण अपने शरीरों में दीप्ति आभरण धारण करते हैं. (६) स्वधामनु श्रियं नरो महि त्वेषा अमवन्तो वृषप्सवः. वहन्ते अहुतप्सवः.. (७) नेता, दीप्त, शक्तिशाली, वर्षारूप एवं कुटिलतारहित मरुद्गण हव्य अन्न पाने के लिए महती शोभा धारण करते हैं. (७) गोभिर्वाणो अज्यते सोभरीणां रथे कोशे हिरण्यये. गोबन्धवः सुजातास इषे भुजे महान्तो नः स्परसे नु.. (८) सौभरि आदि ऋषियों की स्तुतियों से सोने के बने रथ के मध्यभाग में मरुतों की वीणा प्रकट हो रही हैं. गाएं जिनकी माता हैं, शोभन जन्म वाले एवं महानुभाव मरुद्गण हमारे अन्न, भोग एवं प्रसन्नता के लिए दयालु हों. (८) प्रति वो वृषदञ्जयो वृष्णो शर्धाय मारुताय भरध्वम्. हव्या वृषप्रयाव्णे.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सोम की वर्षा से सींचने वाले अध्वर्युगण! वर्षा करने वाले मरुतों की शक्ति बढ़ाने के लिए हव्य अर्पित करो. इस हव्य के द्वारा मरुद्गण वर्षाकारक एवं उत्तमगति वाले बनते हैं. (९) वृषणश्वेन मरुतो वृषप्सुना रथेन वृषनाभिना. आ श्येनासो न पक्षिणो वृथा नरो हव्या नो वीतये गत.. (१०) हे नेता मरुतो! सेचन-समर्थ अश्वों से युक्त, वर्षाकारक रूप से युक्त एवं वर्ष की नाभियुक्त रथ पर चढ़कर हव्य के समीप इस प्रकार शीघ्र आओ, जिस प्रकार बाज पक्षी आता है. (१०) समानमञ्ज्वेषणां वि भ्राजन्ते रुक्मासो अधि बाहुषु. दविद्युतत्यृष्टयः.. (११) इन मरुतों का रूप प्रकट करने वाला आभरण समान है, इनकी भुजाओं में तेजस्वी सुनहरे हार विराजते हैं. इनके हाथों में आयुध चमकते हैं. (११) त उग्रासो वृषण उग्रबाहवो नकिष्टनूषु येतिरे. स्थिरा धन्वान्यायुधा रथेषु वोऽनीकेष्वधि श्रियः.. (१२) उग्र, वर्षाकारक एवं शक्तिशाली भुजाओं वाले मरुद्गण अपने शरीर की रक्षा का कोई यत्न नहीं करते. हे मरुतो! तुम्हारे रथों पर धनुष एवं बाण स्थिर है. सेना के अग्रभाग में तुम्हारी ही विजय होती है. (१२) येषामर्णो न सप्रथो नाम त्वेषं शश्वतामेकमिद्धुजे. वयो न पित्र्यं सहः.. (१३) जल के समान सब ओर विस्तृत एवं दीप्तिशाली मरुतों का नाम एक है, फिर भी वे स्तोताओं के भोग के लिए उसी प्रकार यथेष्ट हैं. जिस प्रकार पिता से मिला हुआ अन्न होता है. (१३) तान्वन्दस्व मरुतस्ताँ उप स्तुहि तेषा हि धुनीनाम्. अराणां न चरमस्तदेषां दाना मह्ना तदेषाम्.. (१४) हे अंतरात्मा! उन मरुतों की स्तुति करो एवं वंदना करो. मरुतों का दान महिमायुक्त है. महान् मरुतों की अपेक्षा हम उसी प्रकार छोटे हैं, जिस प्रकार किसी महान् स्वामी का हीन सेवक होता है. (१४) सुभगः स व ऊतिष्वास पूर्वासु मरुतो व्युष्टिषु. यो वा नूनमुतासति.. (१५) हे मरुतो! तुम्हारी रक्षा प्राप्त करके स्तोता प्राचीनकाल में शोभन धनवाला बना था. जो स्तोता है, वह अवश्य तुम्हारा भक्त बनता है. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
यस्य वा यूयं प्रति वाजिनो नर आ हव्या वीतये गथ. अभि ष द्युम्नैरुत वाजसातिभिः सुम्ना वो धूतयो नशत्.. (१६) हे नेताओ एवं सबको कंपित करने वाले मरुतो! जिस हव्यधारी यजमान का हव्य भोग करने के लिए तुम आते हो, वह तुम्हारे दीप्तिशाली अन्नों एवं अन्न के भोगों द्वारा तुम्हारे सुखों को चारों ओर विस्तृत करता है. (१६) यथा रुद्रस्य सूनवो दिवो वशन्त्यसुरस्य वेधसः. युवानस्तथेदसत्.. (१७) रुद्रपुत्र, जल के कर्त्ता एवं सदा युवा मरुद्गण द्युलोक से आकर हमें चाहें, हमारी स्तुति में इतना प्रभाव हो. (१७) ये चार्चन्ति मरुतः सुदानवः स्मन्मीळहुषश्चरन्ति ये. अतश्चिदा न उप वस्यसा हृदा युवान आ ववृध्वम्.. (१८) जो शोभनदान वाले यजमान मरुतों की पूजा करते हैं एवं जो वर्षाकारक मरुतों की हव्य द्वारा सेवा करते हैं, हम उन दोनों प्रकार के हैं. हे युवा मरुतो! हमें धन देने का निश्चय मन में करके हमसे मिलो. (१८) यून ऊ षु नविष्ठया वृष्णः पावकाँ अभि सोभरे गिरा. गाय गा इव चर्कृषत्.. (१९) हे सौभरि ऋषि! तुम नित्य तरुण, वर्षाकारक एवं पवित्रकर्त्ता मरुतों की स्तुति अतिशय नवीन वाक्यों द्वारा उस सुंदर रूप से करो, जिस प्रकार किसान अपने बैलों की प्रशंसा करता है. (१९) साहा ये सन्ति मुष्टिहेव हव्यो विश्वावसु पृत्सु होतृषु. वृष्णश्चन्द्रान्न सुश्रवस्तमान् गिरा वन्दस्व मरुतो अह.. (२०) मरुद्गण समस्त योद्धाओं द्वारा आह्वान करने पर शत्रुओं को हराते हैं. हे सौभरि! इस समय बुलाने योग्य मल्ल के समान, वर्षाकारक, सबको प्रसन्न करने वाले एवं परम यशस्वी मरुतों की स्तुति शोभनवचनों द्वारा करो. (२०) गावश्चिद्घा समन्यवः सजात्येन मरुतः सबन्धवः. रिहते ककुभो मिथः.. (२१) हे समान क्रोध वाले मरुतो! तुम्हारी माता गाएं भी समान जाति एवं समान बंधु वाली होने के कारण दिशाओं के रूप में एक-दूसरों को चाटती हैं. (२१) मर्तश्चिद्धो नृतवो रुक्मवक्षस उप भ्रातृत्वमायति. अधि नो गात मरुतः सदा हि व आपित्वमस्ति निध्रुवि.. (२२) हे नृत्य करने वाले एवं वक्षस्थल पर सोने के आभूषण धारण करने वाले मरुतो! मनुष्य ebook converter DEMO Watermarks*
भी तुम्हारी मित्रता पाने के लिए तुम्हारे पास आता है. इसलिए तुम हमारे पक्ष के बनकर बोलो. अत्यंत धारण करने योग्य यज्ञ में तुम्हारा बंधुत्व सदा वर्तमान रहता है. (२२) मरुतो मारुतस्य न आ भेषजस्य वहता सुदानवः. यूयं सखायः सप्तयः.. (२३) हे शोभन दान वाले, सखा एवं गतिशील मरुतो! तुम अपनी ओषधि हमारे समीप लाओ. (२३) याभिः सिन्धुमवथ याभिस्तूर्वथ याभिर्दशस्यथा क्रिविम्. मयो नो भूतोतिभिर्मयोभुवः शिवाभिरसच्चद्विषः.. (२४) हे सुख देने वाले एवं शत्रुशून्य मरुतो! जिन रक्षासाधनों द्वारा तुम समुद्र की रक्षा करते हो, जिनके द्वारा स्तोताओं के शत्रुओं को नष्ट करते हो, जिनसे तुमने गौतम को कुआं दिया था, सब प्रकार का कल्याण करने वाले उन्हीं रक्षासाधनों द्वारा हमें सुरक्षा प्रदान करो. (२४) यत्सिन्धौ यदसिक्न्यां यत्समुद्रेषु मरुतः सुबर्हिषः. यत्पर्वतेषु भेषजम्.. (२५) हे शोभन यश वाले मरुतो! सिंधु तथा असिक्नी नदी समुद्रों एवं पहाड़ों में जो ओषधियां हैं. (२५) विश्वं पश्यन्तो बिभृथा तनूष्वा तेना नो अधि वोचत. क्ष्मा रपो मरुत आतुरस्य न इष्कर्ता विह्रुतं पुनः.. (२६) वे सब ओषधियां पहचानकर हमारे शरीर की चिकित्सा के लिए ले आओ. हे मरुतो! हम लागों के बाधा वाले अंक को इस प्रकार पुनः ठीक करो, जिससे रोगी का रोग दूर हो जाए. (२६) सूक्त—२१ देवता—इंद्र वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे.. (१) हे अपूर्व इंद्र! हम रक्षा पाने की इच्छा से तुम्हें सोमरस द्वारा पुष्ट करके इस प्रकार बुलाते हैं, जैसे कोई गुणी मनुष्य को बुलाता है. तुम संग्राम में भांति-भांति के रूप धारण करते हो. (१) उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्. त्वामिद्ध्वयवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२) हे इंद्र! हम यज्ञकर्म की रक्षा के लिए तुम्हारे पास आते हैं. युवा, उग्र एवं ebook converter DEMO Watermarks*
शत्रुपराभवकारी इंद्र हमारे सामने आवें। हे इंद्र! तुम्हारे मित्र हम लोग सेवा करने योग्य एवं सबके रक्षक तुम्हारा वरण करते हैं। (२) आ याहीम इन्द्रवोऽश्वपते गोपत उर्वरापते। सोमं सोमपते पिब.. (३) हे अश्वों के स्वामी, गायों का पालन करने वाले, उपजाऊ भूमि के स्वामी एवं सेनापति इंद्र! यहां आओ और सोमरस पिओ। (३) वयं हि त्वा बन्धुमन्तमबन्धवो विप्रास इन्द्र येमिम। या ते धामानि वृषभ तेभिरा गहि विश्वेभिः सोमपीतये.. (४) हे बांधवों वाले इंद्र! हम बांधवहीन विप्र तुम्हारे समीप मित्रता से आते हैं। हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम अपने समस्त तेजों के साथ सोमरस पीने के लिए आओ। (४) सीदन्तस्ते वयो यथा गोश्रीते मधौ मदिरे विवक्षणे। अभि त्वामिन्द्र नोनुमः.. (५) हे इंद्र! गाय के दूध-दही से मिले हुए मदकारक एवं स्वर्गप्राप्ति के हेतु तुम्हारे सोमरस में हम पक्षियों के समान निवास करते हैं एवं तुम्हारी स्तुति करते हैं। (५) अच्छा च त्वैना नमसा वदामसि किं मुहुश्चिद्धि दीधयः। सन्ति कामासो हरिवो ददिष्ट्वं स्मो वयं सन्ति नो धियः.. (६) हे इंद्र! हम तुम्हारे अभिमुख होकर इस स्तोत्र द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम्हारी बहुत सी अभिलाषाएं हैं। तुम दान करने वाले हो। हम एवं हमारे यज्ञकर्म तुम्हारे ही समीप हैं। (६) नूत्ना इदिन्द्र ते वयमूती अभूम नहि नू ते अद्रिवः। विद्मा पुरा परीणसः.. (७) हे इंद्र! तुम्हारी रक्षा पाकर हम नवीन ही रहेंगे। हे वज्रधारी इंद्र! पहले हम तुम्हें सब जगह व्याप्त नहीं जानते थे, पर इस समय जान गए हैं। (७) विद्मा सखित्वमुत शूर भोज्य१मा ते ता वज्रिन्नीमहे। उतो समस्मिन्ना शिशीहि नो वसो वाजे सुशिप्र गोमति.. (८) हे शूर इंद्र! हम तुम्हारी मित्रता एवं भोज्य को जानते हैं। हे वज्रधारी इंद्र! हम तुम्हारी ये ही दोनों वस्तुएं मांगते हैं। हे निवासस्थानदाता एवं शोभन टोप वाले इंद्र! हमें गाय आदि से युक्त सभी धनों से संपन्न करो। (८) यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु वः स्तुषे। सखाय इन्द्रमूतये.. (९) हे मित्र ऋत्विजो! जो इंद्र प्राचीन समय में यह सारा धन हमारे लिए लाए थे, तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*
रक्षा के लिए मैं उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं. (९) हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत. आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्.. (१०) हरि नामक अश्वों के स्वामी, सज्जनों के पालक व शत्रुओं को दबाने वाले इंद्र की स्तुति वही व्यक्ति कर सकता है, जो प्रसन्न होता है. वे धनस्वामी इंद्र स्तोताओं के लिए सौ गाएं और घोड़े लाए थे. (१०) त्वया ह स्विद्युजा वयं प्रति श्वसन्तं वृषभ ब्रुवीमहि. संस्थे जनस्य गोमतः.. (११) हे वर्षा करने वाले इंद्र! हम तुम्हारी सहायता से गायों के कारण होने वाले संग्राम में ललकारने वाले शत्रुओं को जीतेंगे. (११) जयेम कारे पुरुहूत कारिणोऽभि तिष्ठेम दूढ्यः. नृभिर्वृत्रं हन्याम शूशुयाम चावेरिन्द्र प्र णो धियः.. (१२) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम युद्ध में शत्रुओं को जीतेंगे एवं दुष्टबुद्धि लोगों को पराजित करेंगे. हम नेता मरुतों की सहायता से वृत्र को मारेंगे एवं यज्ञकर्मों में वृद्धि करेंगे. हे इंद्र! हमारे यज्ञकर्मों की रक्षा करो. (१२) अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि. युधेदापित्वमिच्छसे.. (१३) हे इंद्र! तुम अपने जन्मकाल से ही भाइयों से हीन, बिना नेता वाले एवं बांधवहीन हो. तुम जो मित्रता चाहते हो, उसे युद्ध द्वारा प्राप्त करते हो. (१३) नकी रेवन्तं सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः. यदा कृणोषि नदनं समूहस्यादित्पितेव हूयसे.. (१४) हे इंद्र! तुम केवल धनवान् व्यक्ति को ही अपनी मित्रता के लिए स्वीकार नहीं करते, इसका क्या कारण है? ऐसे लोग शराब पीते हैं एवं तुम्हारा विरोध करते हैं. जब तुम अपने स्तोता को संपत्ति देते हो, उस समय वह तुम्हें ऐसे पुकारता है, जैसे कोई अपने पिता को पुकारता है. (१४) मा ते अमाजुरो यथा मूरास इन्द्र सख्ये त्वावतः. नि षदाम सचा सुते.. (१५) हे इंद्र! तुम जैसे देव की मित्रता के प्रति अज्ञानी बनकर हम सोमरस निचोड़ना न छोड़ दें. हम सोमरस निचोड़ने के बाद एक जगह बैठेंगे. (१५) मा ते गोदत्र निरराम राधस इन्द्र मा ते गृहामहि. दृळ्हा चिदर्यः प्र मृशाभ्या भर न ते दामान आदभे.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे गाएं देने वाले इंद्र! तुम्हारे सेवक हम धनरहित न हों एवं किसी दूसरे से धन न मांगें. हे स्वामी इंद्र! तुम हमें स्थिर धन दो. तुम्हारे दिए हुए धन को कोई नष्ट नहीं कर सकता. (१६) इन्द्रो वा घेदियन्मघं सरस्वती वा सुभगा ददिर्वसु. त्वं वा चित्र दाशुषे.. (१७) मुझ हव्यदाता सौभरि को क्या इंद्र ने यह धन दिया है? क्या शोभन धनवाली सरस्वती ने मुझे संपत्ति दी है? हे राजा चित्र! यह धन क्या केवल तुम्हें दिया है? (१७) चित्र इद्राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीमनु. पर्जन्य इव ततनद्धि वृष्ट्या सहस्रमयुता ददत्.. (१८) बादल जिस प्रकार वर्षा द्वारा धरती को सभी संपत्तियों से युक्त बनाते हैं, उसी प्रकार राजा चित्र सरस्वती नदी के किनारे रहने वाले अन्य राजाओं को हजारों धन देकर प्रसन्न करते हैं. (१८) सूक्त—२२ देवता—अश्विनीकुमार ओ त्यमह्व आ रथमद्या दंसिष्ठमूतये. यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी आ सूर्यायै तस्थथुः.. (१) हे शोभन-आह्वान वाले एवं प्रकाशित मार्ग वाले अश्विनीकुमारो! सूर्या को पत्नीरूप में वरण करने के लिए तुम जिस रथ पर बैठे थे, मैं अपनी रक्षा के निमित्त उसी अतिसुंदर रथ को बुलाता हूं. (१) पूर्वापुषं सुहवं पुरुस्पृहं भुज्युं वाजेषु पूर्व्यम्. सचनावन्तं सुमतिभिः सोभरे विद्धेषसमनेहसम्.. (२) हे सौभरि ऋषि! कल्याणकारिणी स्तुतियों द्वारा पूर्ववर्ती स्तोताओं को पुष्ट करने वाले, यज्ञ में शोभन आह्वान वाले, बहुतों द्वारा अभिलषित, सबके रक्षक, युद्धों में आगे रहने वाले, सबके द्वारा सेव्य, शत्रुओं से द्वेष करने वाले एवं पापरहित इस रथ की स्तुति करो. (२) इह त्या पुरुभूतमा देवा नमोभिरश्विना. अर्वाचीना स्ववसे करामहे गन्तारा दाशुषो गृहम्.. (३) हे अनेक शत्रुओं को पराजित करने वाले, दिव्यगुणयुक्त एवं हव्यदाता यजमान के घर जाने वाले अश्विनीकुमारो! हम इस यज्ञकर्म की रक्षा के लिए तुम्हें अपने सामने बुलायेंगे. (३) युवो रथस्य परि चक्रमीयत ईर्मान्यद्वामिषण्यति. अस्माँ अच्छा सुमतिर्वां शुभस्पती आ धेनुरिव धावतु.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे रथ का एक पहिया स्वर्गलोक में चलता है एवं दूसरा तुम्हारे साथ चलता है. हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कल्याणकारिणी बुद्धि इस प्रकार हमारे समीप आवे, जिस प्रकार गाय बछड़े के पास आती है. (४) रथा यो वां त्रिवन्धुरो हिरण्याभीशुरश्विना. परि द्यावापृथिवी भूषति श्रुतस्तेन नासत्या गतम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! ऐसा प्रसिद्ध है कि सारथि के तीन स्थानों वाला एवं सोने की लगामों वाला तुम्हारा रथ द्यावा-पृथिवी को अपने प्रकाश से चमकाता है. तुम उसी रथ से हमारे पास आओ. (५) दशस्यन्ता मनवे पूर्व्यं दिवि यवं वृकेण कर्षथः. ता वामद्य सुमतिभिः शुभस्पती अश्विना प्र स्तुवीमहि.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने प्राचीनकाल में द्युलोक का जल राजा मनु को देकर हल द्वारा जौ की खेती करना सिखाया था. हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! आज उत्तम स्तोत्रों द्वारा हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (६) उप नो वाजिनीवसू यातमृतस्य पथिभिः. येभिस्तृक्षिं वृषणा त्रासदस्र्यवं महे क्षत्राय जिन्वथः.. (७) हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! यज्ञ के मार्ग द्वारा हमारे पास आओ. हे धन देने वाले अश्विनीकुमारो! इसी मार्ग द्वारा तुमने त्रसदस्यु के पुत्र तृक्षि को महान् संपत्ति देकर तृप्त किया था. (७) अयं वामद्रिभिः सुतः सोमो नरा वृषण्वसू. आ यातं सोमपीतये पिबतं दाशुषो गृहे.. (८) हे नेताओं एवं स्तोताओं को धन बरसाने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारे लिए यह सोमरस पत्थरों की सहायता से निचोड़ा गया है. तुम सोमपान के लिए आओ और हव्यदाता यजमान के घर में सोम पिओ. (८) आ हि रुहतमश्विना रथे कोशे हिरण्यये वृषण्वसू. युञ्जाथां पीवरीरिषः.. (९) हे धन बरसाने वाले अश्विनीकुमारो! सोने की लगाम से युक्त, आयुधों के कोश के समान एवं आनंददाता रथ पर चढ़ो तथा हमें विशाल अन्न दो. (९) याभिः पक्थमवथो याभिरध्रिगुं याभिर्ऋभुं विजोषणम्. ताभिर्नो मक्षू तूमश्विना गतं भिषज्यतं यदातुरम्.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन रक्षासाधनों द्वारा पक्थ, अध्रिगु एवं सोमरस द्वारा विशेषरूप से प्रसन्न करने वाले बभ्रु की रक्षा की थी, उन्हीं रक्षासाधनों द्वारा तुरंत शीघ्र गति से हमारे समीप आओ तथा रोगी का इलाज करो. (१०) यदध्रिगावो अध्रिगू इदा चिदह्नो अश्विना हवामहे. वयं गीर्भिर्विपन्यवः.. (११) हे युद्ध में शत्रु का शीघ्र वध करने वाले अश्विनीकुमारो! यज्ञकर्म में शीघ्रता करने वाले एवं मेधावी हम लोग दिन के इसी प्रथम भाग में स्तुतिवचनों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. (११) ताभिरा यातं वृषणोप मे हवं विश्वप्सुं विश्ववार्यम्. इषा मंहिष्ठा पुरुभूतमा नरा याभिः क्रिविं वावृधुस्ताभिरा गतम्.. (१२) हे कृपावर्षा करने वाले अश्विनीकुमारो! सब देवों द्वारा वरण करने योग्य एवं भिन्नभिन्न रूप वाले हमारे आह्वान को सुनकर उन सब रक्षासाधनों के साथ आओ. हे हव्य चाहने वाले, अधिक धन देने वाले एवं युद्धों में अनेक शत्रुओं को हराने वाले अश्विनीकुमारो! जिन रक्षासाधनों द्वारा तुमने कुएं का जल बढ़ाया था, उन्हीं के साथ यहां आओ. (१२) ताविदा चिदहानां तावश्विना वन्दमान उप ब्रुवे. ता ऊ नमोभिरीमहे.. (१३) इस प्रातःकाल में मैं उन अश्विनीकुमारों की वंदना करता हुआ उनकी स्तुति करता हूं एवं स्तोत्रों द्वारा उन दोनों से धनसंपत्ति मांगता हूं. (१३) ताविद्दोषा ता उषसि शुभस्पती या यामन्नुद्रवर्तनी. मा नो मर्ताय रिपवे वाजिनीवसू परो रुद्रावति ख्यतम्.. (१४) हम जल की रक्षा करने वाले एवं प्रशंसायोग्य मार्ग पर चलने वाले अश्विनीकुमारों को रात्रि, उषा एवं दिवस—सभी कालों में बुलाते हैं. हे अश्विनीकुमारो! हमारे शत्रुओं को अन्न एवं धन मत देना. (१४) आ सुग्म्याय सुग्म्यं प्राता रथेनाश्विना वा सक्षणी. हुवे पितेव सोभरी.. (१५) हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! मुझ सुखयोग्य के लिए तुम प्रातःकाल के समय रथ द्वारा सुख लाओ. मैं सौभरि ऋषि अपने पिता के समान ही तुम्हें बुलाता हूं. (१५) मनोजवसा वृषणा मदच्युता मक्षुङ्गमाभिरूतिभिः. आरात्ताच्चिद्भूतमस्मे अवसे पूर्वीभिः पुरुभोजसा.. (१६) हे मन के समान शीघ्र गतिशील, धन बरसाने वाले, शत्रुनाशक एवं बहुतों के रक्षक अश्विनीकुमारो! अपने शीघ्रगामी रक्षासाधनों द्वारा हमारी रक्षा के लिए हमारे पास आओ. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*