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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

अध्याय २२ : १२३

लग्न कुंडली

सूर्य रा०-२२°-३५'-१" दिया है अर्थात् मीन गत होकर मेष राशि पर सूर्य है। इससे जहाँ मेष का अंक १ लिखा है वहाँ सूर्य लिख दिया। अब चंद्र को देखा तो उस दिन ३१ घं० ४५ प० उपरांत मिथुन राशि में आया है। अपना इष्ट काल ३७ घं० ५२ प० ३०

वि० है यह ३१-४५ से अधिक है। इस कारण चंद्र मिथुन राशि पर आ गया है, इससे मिथुन के अंक ३ के कोठे में चन्द्र रखा।

शेष ग्रह साप्ताहिक ग्रह चक्र देखकर भरना पड़ता है। पंचांग में वैशाख शुक्ल ८ बुधवार का ग्रह स्पष्ट का चक्र दिया है और इसके पहिले चैत्र कृष्ण ३० (अमावस) मंगलवार का ग्रह स्पष्ट का चक्र दिया है। अपना जन्मसमय इन दोनों के बीच का है। दोनों चक्रों को देखो उनमें क्या अंतर है। चन्द्र और सूर्य ग्रह तो पहिले लिख चुके हैं, शेष ५ ग्रह और लिखना है।

वैशाख कृष्ण ३०

वैशाख शुक्ल ८

इन दोनों चक्रों में वे ग्रह जिनमें कोई अंतर नहीं है ये हैं—२ बु० ११ मं० ३ गु० २ श० ४ रा० १० के०। इस कारण ये ग्रह अपनी कुंडली में भी इन्हीं स्थानों में लिख देंगे। अब केवल शुक्र ग्रह लिखने को रह गया है, क्योंकि पहिली कुंडली में शुक्र बुधराशि में है और दूसरी कुंडली में शुक्र मिथुनराशि में आ गया है। यह कब बदला है पंचांग देखो। अब देखना है कि यह अपने इष्ट काल के पहिले बदला है या उसके उपरांत। पंचांग के तिथिपत्र के अंत में ये सब सूचनाएँ मिलती हैं।

पंचांग में वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को मिथुने शुक्र: २७-१७ लिखा है अर्थात् वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के २७-१७ इष्ट पर मिथुनराशि पर शुक्र आया है। इससे प्रगट हुआ कि इष्ट काल के प्रथम ही मिथुनराशि पर शुक्र आ गया है। इससे शुक्र को मिथुन

१२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

राशि पर ही लिखना पड़ेगा। इस प्रकार सब ग्रह लिख देने पर अपनी लग्नकुंडली तैयार हो गई।

लग्न कुंडली

चन्द्र कुंडली

अब चन्द्रकुंडली तैयार करना है। चन्द्र मिथुनराशि का है। इस कारण चन्द्र की राशि मिथुन, लग्न स्थान में लिखो और शेष राशियाँ क्रमानुसार भर कर, लग्नकुंडली के अनुसार ही ग्रह भर दो तो चन्द्रकुंडली बन जायगी। अर्थात् लग्न ८ की जगह चन्द्र की राशि ३ लिख कर शेष सब राशियाँ ग्रह सहित लग्नकुंडली के अनुसार ही लिख देना पड़ता है। चन्द्र कुंडली में केवल राशियों के स्थान में परिवर्तन हुआ है और कोई अंतर नहीं पड़ता जैसा ऊपर बताया है।

चन्द्रकुंडली को राशिकुंडली भी कहते हैं। मनुष्य के शरीर से जैसा लग्न का सम्बन्ध है उसी प्रकार चन्द्र का भी सम्बन्ध है। विशेष कर चन्द्रग्रह मन का चोतक है। जन्म के चन्द्र से गर्भाधान काल का लग्न से विशेष सम्बन्ध रहता है। इस कारण लग्नकुंडली के साथ-साथ चन्द्रकुंडली भी स्थापित की जाती है।

ऊपर जो कुंडली बनाने की रीति समझाई गई है यह कुंडली, जन्म (जन्म पत्र बनाना), वर्ष (वर्ष फल बनाना), प्रश्न (किसी प्रश्न के निर्णय करने के समय) इत्यादि के सम्बन्ध से जहाँ जैसी आवश्यकता हो बनाई जाती है और उस पर से फल कथन किया जाता है। इस कारण यह कुंडली बहुत महत्व की होती है, यह जितनी शुद्धता पूर्वक बनाई जा सके उतना ही शुद्ध फल होगा।

अध्याय २३

राशियाँ और कालाङ्क

कालाङ्क (काल पुरुष का अंग)

प्रत्येक राशियाँ का प्रभाव अंग के विशेष भाग में पड़ता है। काल पुरुष के किस अंग के विभाग में कौन राशि विशेष प्रभाव डालती है यह जानना चाहिये। कालपुरुष

राशियों और कालांग : १२५

के अंग और राशियों से सम्बन्ध है, इस कारण कालांग यहाँ बतलाते हैं। लग्न के विभाग के अनुसार लग्न से या मेष से क्रमानुसार गिनने पर शरीर में इन राशियों का स्थान कहाँ पड़ता है, नीचे बताया है।

लग्न मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुष मीन या राशि

मुख्य अंगसिरमुखकंधाहृदयपेटकमरवस्तिगुह्योन्मिषजांघघुटनाटांगपैर
गलाबाहुछातीकलेजामूत्रपिंड
FaceArmsBreastStomackHeartPelvisReinsPrivate partsThighKnees
neckanusectLegs
Feet

ऊपर चक्र में इन राशियों या भाव का प्रभाव अंग विशेष में बताया है, परन्तु इसके अतिरिक्त ये और भी अंगों पर प्रभाव डालते हैं इस कारण इनको और भी समझाते हैं।

१ मेष—इसका प्रभाव विशेष कर मस्तक पर पड़ता है। भौंह के ऊपर के भाग पर इसका प्रभाव जानाना। सिर और भेजा, मेधाशक्ति आदि इसके अंतर्गत हैं।

२ वृष—भींह के नीचे मुख, नेत्र, चेहरा, गला इसमें शामिल हैं। इसका प्रभाव ग्रीवा ( गर्दन ) तक है।

३ मिथुन—दोनों हाथ, कंधे, भुजा, और छाती की ओर के भाग तक इसका प्रभाव है। इसका प्रभाव फेफड़े गला वाणी पर भी पड़ता है। दोनों छातियों में भी प्रभाव करता है। ग्रीवा और छाती के बीच के भाग पर इसका प्रभाव पड़ता है।

४ कर्क—हृदय, वित्त, दोनों छाती और जठर (पेट की अग्नि) पर प्रभाव पड़ता है।

५ सिंह—कुक्षि ( कूख-कोखा ), पीठ, पेट, हृदय, रक्त स्थान, कलेजा पर प्रभाव करता है।

६ कन्या—कमर, पेट की अंतर्द्वियाँ और जठर पर भी प्रभाव करता है।

७ तुला—मूत्राशय, गुदा, वस्ति, पेट; नाभि, कटि आदि पर इसका प्रभाव पड़ता है। नाभि के नीचे लिंग स्थान के ऊपर के भाग में इसका प्रभाव है। यह हाथ के पंजे पर भी प्रभाव डालता है। त्वचा पर भी प्रभाव करता है।

८ वृश्चिक—गुह्योन्मिष, मल मूत्राशय ( गुदा लिंग ) आदि पर इसका प्रभाव है।

९ धन—दोनों जंघाओं पर इसका प्रभाव है। शरीर का नाड़ी चक्र ( Artrial system ) धमनी चक्र आदि पर भी प्रभाव डालता है।

१० मकर—दोनों घुटने, हड्डी, हृद्वियों की संधि, पर प्रभाव डालता है।

१२६ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

११ कुम्भ—टाँग, घूटने के नीचे का भाग पिङ्गली आदि पर और रक्त के बहाव पर प्रभाव डालता है। मञ्जा तंतु और नेत्र पर भी प्रभाव डालता है।

१२ मीन—दोनों पैर के पंजें, पैर की अँगुली आदि पर प्रभाव करता है। यह आँत और पेट में भी प्रभाव करता है।

यह प्रभाव लग्न से या गत राशियों के अनुसार पड़ता है।

इनका उपयोग

मान लो किसी के जन्मसमय भेद का सूर्य हो, भेद का सूर्य उच्च का होता है (जैसा आगे बताया है) तो वह मनुष्य बड़े मस्तक वाला होगा। अपने मस्तक-बल से धनोपार्जन करेगा। यह मन्त्री आदि बड़े ओहदे पर भी हो सकता है।

किसी राशि में कोई पापग्रह (यह आगे समझाया है) हो तो उन राशियों से जिस अंग का बोध होता है, उस अंग में व्रण (फोड़े) आदि होंगे या उस अंग में कोई ग्रह जनित बाधा उपस्थित होगी, जैसे भेद का मंगल पड़ा है तो, भेद से सिर पीड़ित होगा। यदि जन्मकाल में, लग्न में भेद राशि हो और उसमें मंगल हो तो उसके सिर में चोट आदि का भय हो। जन्म समय जिस राशि में पाप ग्रह हों उस राशि का बतलाने वाले अंश में मसादि चिह्न होंगे। उसी प्रमाण से जिस राशि में पाप ग्रह हो या रवि-चन्द्र * पीड़ित हो उस राशि के अंग विभाग में रोग होगा।

भाव के अनुसार कालांग

ऊपर राशि के सम्बन्ध से कालपुरुष के अंग बताये हैं वे अंग लग्नादि भाव से भी सम्बन्ध रखते हैं और समस्त भाव के सम्बन्ध से भी शरीर के अंगों पर प्रभाव पड़ने का विचार किया जाता है।

जैसे मिथुन लग्न है यह जातक (जिसकी जन्मकुण्डली है) का सिर हुआ। उस स्थान पर कोई ग्रह नहीं हो तो सिर में कोई चिह्न होगा। मान लो लग्न में युध्द है, युध्द शुभ ग्रह होने से उसका कपाल या सिर सुन्दर होगा। दूसरे स्थान में कर्क राशि है और कोई ग्रह नहीं है वह मुख का स्थान है, इस कारण मुख स्वच्छ होगा। तीसरा स्थान कंघा या बाहु पर प्रभाव करता है, तीसरे में सिंह है और कोई ग्रह नहीं है तो बाहु स्वस्थ होंगे। छठा स्थान का प्रभाव कमर पर होता है। मान लो छठे भाव में वृश्चिक राशि है और इसमें चन्द्र है तो उसे खाज गजकर्ण आदि रोग कमर में होंगे, परन्तु चन्द्र शुभ ग्रह होने से अपनी दशा में उस रोग को अच्छा करेगा, इत्यदि, प्रकार से भाव के सम्बन्ध में भी विचार होता है।

  • दिप्पणी—सूर्य चन्द्र पाप ग्रह से युक्त हों या ग्रहण से युक्त हों या कोई ग्रह युद्ध में पराजित, केतु से धूम्रित ग्रह और उल्कापात वाला ग्रह पीड़ित कहलाते हैं। इसका स्पष्टीकरण पृथक् खण्ड में होगा।

राशियाँ और कालांग : १२७

राशि के सम्बन्ध से विचार करने में उस राशि पर कोई पाप या शुभ ग्रह प्रभाव करता है तो उस राशि के सम्बन्ध से वैसा अच्छा या बुरा फल होता है, जैसे वृष राशि पर कोई पाप ग्रह हो, पाप ग्रह होने से कंठ-विकार उत्पन्न करेगा क्योंकि वृषराशि कंठ आदि पर प्रभाव डालती है। पाप ग्रह उन राशियों के सम्बन्धी अंग में अपनी दशा में अपने पदार्थ द्रव्य आदि से रोग उत्पन्न करते हैं। ग्रहों के पदार्थ द्रव्य आदि आगे दिये हैं।

मान लो मिथुन राशि पर जन्मसमय चन्द्र या सूर्य है, उस पर शनि या मंगल की दृष्टि हो या वहाँ पर ये ग्रह हों तो छाती फेफड़ा सम्बन्धी रोग बमा आदि उत्पन्न करेंगे। कर्क का प्रभाव दोनों छाती पेट पाचन-इन्द्रिय पर भी होता है और स्त्रियों के शरीर में दुग्ध उत्पन्न करने के स्थान पर भी प्रभाव करता है। कर्क स्त्री राशि है, तो यह स्त्रियों के उस अंग सम्बन्ध से सब प्रकार की नैसर्गिक दुर्बलता उत्पन्न करता है। वहाँ कोई पाप ग्रह होने से रोग उत्पन्न कर देता है। सिंह का प्रभाव पेट में आहार-विहार पर भी होता है, पाप ग्रह के प्रभाव से पेट में रोग उत्पन्न करेगा। इस राशि वाले को गरम पदार्थ चाय शराब आदि त्यागना चाहिए और आहार-विहार नियमित रखना चाहिए। इसी प्रकार कन्या राशि के सम्बन्ध से संग्रहणी अंब, बड़कोष्ठ और पेट मूला उत्पन्न होता है। तुला मूत्राशय का विकार मधु मेह सब प्रकार के प्रमेह आदि उत्पन्न करती है। इस राशि से त्वचा सम्बन्धी रोग भी उत्पन्न होते हैं। वृश्चिक के सम्बन्ध से साथी का रोग इसे जल्दी लगता है। बुरे ग्रह का प्रभाव इस पर होने से गुणोद्भिन्न सम्बन्धी रोग होते हैं। धन में पाप ग्रह का प्रभाव होने से जाँघों में खून के विकार होते हैं। मकर राशि पर बुरा प्रभाव होने से सर्दी का विकार रक्ताभिषरण सम्बन्धी दोष संधि बात, बड़कोष्ठ का त्वचा रोग उत्पन्न होते हैं। कुम्भ में पाप ग्रह हो तो घुटना पैर मज्जा तंतु आदि पर प्रभाव डालता है। यह नेत्र विकार और रक्त दोष भी उत्पन्न करता है। मीन राशि पर पाप ग्रह का प्रभाव हो तो आंत के रोग, संधिवात ठंड के विकार, पेट या दबे भी उत्पन्न होते हैं।

ऊपर जो एक राशि के या भाव के अंग बतलाये हैं उसमें १ से १५° तक दाहिना भाग अंग का समझना और उपरान्त ३०° तक बायां भाग समझना। जब इन अंगों में दाहिने या बायें से किसी भाग पर ग्रह प्रभाव डालेगा, यह जानना है तो उस राशि के अंशों के २ भाग कर दो, आधा भाग पूर्वदिर्घ को दाहिना और उत्तरार्द्ध को बायं भाग समझना।

१२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय २४

राशि गुण-धर्म

प्रत्येक राशियों के पृथक्-पृथक् गुण और धर्म हैं। ये राशियाँ सम हैं या विषम, स्त्री हैं या पुरुष हैं, इनमें कौन तत्व की प्रधानता है, अल्प सन्तान या अधिक सन्तान देती है या बन्ध्या राशि है। स्वभाव क्रूर है या सौम्य है। इसका प्रभाव किस दिशा में होता है और बात पित्त कफ सम्बन्ध से इनकी प्रकृति कैसी है, ब्राह्मण आदि कौन जाति की यह सूचक है। इसका रंग क्या है, जाति कैसी है, किस समय वह राशि बलवान रहती है और जल थल वन आदि में कहीं विचरने वालों पर प्रभाव रखती है या उनमें से किस प्रकार के लोगों से इसका सम्बन्ध है यह सब राशियों के गुण धर्म जानने से प्रगट होता है।

इसका उपयोग आगे बहुत पड़ेगा, जैसे अनि और वायु वाली राशियों की आपस में मित्रता होती है। भूमि और जल वाली राशियों की मित्रता होती है, परन्तु औरों की आपस में मित्रता नहीं रहेगी। पुरुष राशियों की पुरुष से, स्त्री राशियों की स्त्री राशि वालों से मित्रता होगी। पंचम स्थान सन्तान सूचक है, उसमें मीन राशि हो तो यह मीन राशि बहुप्रसव होने से अधिक सन्तान होगी। यदि उस पर शुभ ग्रह की या इसके भाव स्वामी की इस पर दृष्टि हो (दृष्टि सम्बन्धी विचार आगे मिलेगा) तो अवश्य बहुत सन्तान होगी। इसी प्रकार प्रत्येक राशियों के सम्बन्ध से जब विचार करने की आवश्यकता होती है तो उन राशियों के गुण-धर्म पर अवश्य विचार करना चाहिये, इसी कारण इनका जानना आवश्यक है।

कोई प्रश्न, वर्ष या जन्म के समय विचारने में इनकी आवश्यकता होती है जैसे क्रूर राशि है तो क्रूर स्वभाव होगा, सौम्यराशि से सौम्य स्वभाव होगा। प्रश्नसमय चरराशि हो तो जिस सम्बन्ध से विचार कर रहे हो वह चलता-फिरता होगा, स्थिर राशि होने से वह स्थिर होगा। यदि उस समय राशि द्विस्वभाव राशि का लग्न हो तो दोनों मिला हुआ फल अर्थात् कभी चलता कभी स्थिर होगा। कौन चोर है, चोर की जाति आदि निर्णय में, राशि की जाति स्त्री है या पुरुष, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि व घन कहाँ होगा, कर्क राशि है तो जल समीप होगा इत्यादि बातों के विचारने में यह सहायक होता है। इस कारण राशियों का गुण-धर्म चक्र आगे दिया है।

राशि गुण-धम : १२९

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८४

१३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान वण्ड

राशियों के भिन्न-भिन्न नाम

कभी-कभी राशियों के चालू नाम के अतिरिक्त और भी नाम ज्योतिष ग्रन्थों में उपयोग में आते हैं, उन्हें भी जान लेना चाहिए।

  1. १ मेघ—अज, वस्त, प्रथम, क्रिय।
  2. २ वृष—उत्सा, गौ, तानुरि, मुक्कम।
  3. ३ मिथुन—बोध, न्युगम, जिलुम, तृतीय।
  4. ४ कर्क—बांद्र, कुलीर, चतुर्थ।
  5. ५ सिंह—कंठीरव, लेप।
  6. ६ कन्या—पाथोन, षष्ठी, अबला, तन्वी।
  7. ७ तुला—जूक, वणिक, सप्तम, तौलि।
  8. ८ वृश्चिक—कौप्य, अष्टम, कोज, अलि।
  9. ९ धन—जैव, धनु, तौक्षिक, चाप।
  10. १० मकर—आकेकर, दशम, चक्र।
  11. ११ कुंभ—हृद्दरोग, घट।
  12. १२ मीन—रिक्त, क्षय, अन्तिम।

अध्याय २५

ग्रह विचार

भाव फल विचार करने के लिए आवश्यक बातें।

किसी भाव का फल जानने के लिए इन बातों के विचार करने की पहिले बड़ी आवश्यकता होती है।

  1. १—ग्रह शुभ है या पाप ग्रह।
  2. २—उस भाव का स्वामी कौन है।
  3. ३—भाव-स्वामी पाप ग्रह है या शुभ ग्रह है।
  4. ४—उस भाव पर कौन-कौन शुभ या पाप ग्रह की दृष्टि है।
  5. ५—उस भाव का स्वामी और उस भाव में स्थित ग्रह इन दोनों की मैत्री।
  6. ६—उस भाव में स्थित ग्रह उच्चबल ( ऊँचाबल ) या न्चबल ( नीचाबल ) का है।
  7. ७—वह अपने घर में है ( स्वगृही ) या मूल त्रिकोण में है।

ग्रह विचार : १३१

८—उस ग्रह के गुण धर्म क्या हैं ।

इत्यादि बातें विचार कर ग्रह फल कहना पड़ता है, इस कारण इन सबको आगे समझायेंगे ।

ग्रहों का शुभस्त पापत्व, स्वगृह ( अपना घर ) या भाव स्वामी विचार ग्रहों की उच्च नीच मूल त्रिकोण राशियाँ, ग्रहों की मंजी, ग्रहों की दृष्टि, ग्रहों के गुण-धर्म आदि आवश्यक बातें प्रत्येक ज्योतिषी को स्मरण रखनी चाहिए, बिना इसके जाने काम नहीं चलता ।

(१) ग्रह का शुभाशुभत्व विचार

ग्रह ३ प्रकार के हैं (१) शुभग्रह (२) पाप ग्रह या क्रूर ग्रह ( अशुभ ग्रह ) और (३) मिश्रग्रह ।

१ शुभ ग्रह benefic—गुह और शुक्र सर्वत्र शुभ ग्रह समझे जाते हैं ।

२ पाप ग्रह malefic—रवि, मंगल, शनि, राहु, केतु, हर्षल और नेपच्युन । ये अशुभ ग्रह हैं इस कारण इनको पाप या क्रूर ( दुष्ट ) ग्रह कहते हैं । ये सर्वत्र पाप ग्रह ही समझे जाते हैं ।

३ मिश्र ग्रह mixed—बुध और चन्द्र ये संयोगवश कभी पाप ग्रह कभी शुभ ग्रह समझे जाते हैं, इस कारण इनको मिश्र ग्रह कहते हैं । वास्तव में ये दोनों शुभ ग्रह ही हैं, परन्तु जब ये पाप ग्रह के साथ होते हैं तो पाप ग्रह और अकेले या शुभ ग्रह के साथ रहते हैं तो शुभ ग्रह कहलाते हैं । इनके सम्बन्ध में विशेष विचार नीचे दिया है ।

(१) बुध—यह शुभ ग्रह से युक्त ( साथ ) या दुष्ट ( शुभ ग्रह की दृष्टि उस पर हो ) या शुभग्रह से किसी प्रकार सम्बन्ध हो तो शुभ फल देता है । पाप ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो अशुभ फल देता है । बुध अकेला हो और अस्तंगत ( सूर्य के साथ ) न हो तो शुभ फल देता है ।

(२) चन्द्र—शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक शुभ है, इसके उपरान्त पाप ग्रह समझा जाता है । किसी के मत से चन्द्र शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक मध्यम बलवान होता है, परन्तु उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होने से बलिष्ठ होता है । शुक्ल दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण बलवान होता है । कृष्ण पक्ष की पञ्चमी के आगे १० दिन तक बलहीन होता है ।

(२) ग्रहों का स्थान या स्वगृह Planetary ownership or Lord of houses स्वगृह—अपना घर । स्वक्षेत्र अपना स्थान । गृह—घर ।

यद्यपि ग्रह सूर्य के आस पास घूमते हैं, परन्तु सुविधा के लिए पृथ्वी के आसपास आकाश में चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि क्रमानुसार घूमते हुए मान लिए गए हैं । देखो चित्र संख्या ५ ।

इन ग्रहों में सूर्य और चन्द्रमा का एक-एक अपना (निजी) घर है, और ग्रहों के

१३२ : सचिन्द्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

२-२ घर राशि चक्र में हैं। इन घरों को स्वगृह कहते हैं। कौन कौन राशि किस प्रकार किस ग्रह के वांटे में आईं आगे समझाते हैं।

पृथ्वी के सबसे निकट ग्रह चन्द्र है; इसका प्रभाव सीधे मन पर अर्थात् हृदय पर पड़ता है। राशि चक्र में कालांग विषय में बता चुके हैं कि हृदय का छोटका राशि कर्क है, इस कारण चन्द्र का स्वस्थान कर्क राशि मानी गयी है।

चन्द्र के आगे सबसे शक्तिशाली ग्रह सूर्य है। सूर्य का प्रभाव आत्मा पर पड़ता है और सिंह राशि आत्मा का सूचक है, इस कारण सिंह राशि सूर्य का स्वस्थान माना गया है। कर्क के उपरान्त सूर्य की सिंह राशि आती है। सूर्य के पास बुध है इस कारण उनके दोनों बाजुओं की राशि मिथुन और कन्या इन दोनों का स्वामी बुध हुआ अर्थात् बुध को ये २ घर मिले। यह सूर्य के पास होने से बुध को युवराज कहते हैं।

बुध के उपरान्त शुक्र ग्रह है, इसे दोनों ओर की २ राशियाँ वृष और तुला मिलीं, इस कारण शुक्र इन २ राशियों का स्वामी हुआ। शुक्र के आगे मंगल है, इसे आगे की २ राशियाँ मेष और वृश्चिक मिलीं इस प्रकार इन २ राशियों का स्वामी मंगल हुआ।

इसके आगे गुरु है उसे आगे की २ राशियाँ मीन और धन मिलीं, इस प्रकार गुरु इन २ राशियों का स्वामी हुआ।

चित्र-७१ ग्रहों के घूमने का क्रम और स्वराशि

गुरु के आगे आकाश में छोर पर शनि है, इसे आजू-बाजू की शेष २ राशियाँ कृष और मकर मिलीं। चित्र संख्या ७१ और ७२ देखने से ये सब समझ में आ जायगा कि किस क्रम से कौन २ राशियों का स्वामी कौन ग्रह हुआ। चित्र संख्या ७१ में बताया है कि यह किस प्रकार घूम रहे हैं और इनको २-२ राशियों किस

ग्रह विचार : १३३

प्रकार से मिली हैं। चित्र ७२ में स्पष्ट रूप से समझ में आ जायगा कि ग्रहों को किस प्रकार राशियाँ मिली हैं।

चित्र-७२ ग्रहों की स्व राशि

इस प्रकार ये राशियाँ, इन ग्रहों के स्वस्थान हुए और इन्हीं स्थानों के स्वामी ये ग्रह हुए। स्वगृह को स्वक्षेत्र भी कहते हैं। जो ग्रह अपने स्थान में होता है वह स्वगृही या स्वक्षेत्री कहलाता है।

ग्रहों के स्वस्थान या स्वक्षेत्र

गृह स्वामीसूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतुहर्षिलनेपच्यून
स्वस्थान१०१२१११२
की राशियाँ१२११

भावस्वामी या गृहस्वामी Sign ruled by the planet

जिस भाव अर्थात् जिस स्थान में ये राशियाँ रहती हैं उस भाव या स्थान के जो ग्रह स्वामी होते हैं वे ऊपर चक्र में बताये हैं। ये ग्रह स्वामी कहलाते हैं, इनको गृह स्वामी भी कहते हैं। गृहस्वामी का उदाहरण देकर समझाते हैं।

यहाँ लग्न वृषिचक्र है तो वृषिचक्र राशि का स्वामी मंगल होता है, मंगल वृषराशि में बैठता है, वृष राशि शुक्र का स्व-गृह (घर) है, इसलिए कहेंगे कि लगनेश मंगल शुक्र के

१३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

घर में बैठता है दूसरे भाव में घन राशि है घन का स्वामी गुरु होता है। यह गुरु अपने ही घर में बैठता है तो कहेंगे द्वितीयेश गुरु स्व-गृही या(स्वलेनी) है। तीसरे भाव में मकर राशि है, इसका स्वामी शनि होता है। यह शनि, बुध के घर में है, क्योंकि जहाँ शनि बैठता है वहाँ कन्या राशि है और कन्या का

स्वामी बुध होता है। यहाँ तृतीय शनि बुध स्थानी है। चतुर्थ भाव में कुम्भ राशि है जिसका स्वामी शनि होता है। यह शनि बुध के घर में है। चतुर्थ भाव में राहु बैठता है तो कहेंगे राहु शनि के घर में बैठता है, और चतुर्थेश शनि बुध के घर में है। पंचम में मीन राशि है जिसका स्वामी गुरु होता है, गुरु पंचमेश होकर घन-भाव में बैठता है। षष्ठ में मेष राशि है। इसका स्वामी मंगल है। इससे कहेंगे कि षष्ठेश मंगल सप्तम में है और मंगल के स्थान में सूर्य बैठता है। सप्तम में वृष राशि है जिसका स्वामी शुक्र होता है। इससे यह शुक्र का घर है, इसमें मंगल और बुध बैठे हैं। यहाँ बुध, पाप ग्रह मंगल के साथ होने से पाप ग्रह माना जायगा। सप्तमेश शुक्र द्वादश भाव में स्वरस्थानी ( अपने घर का ) है। अष्टम में मिथुन राशि है यह बुध का घर है, क्योंकि मिथुन का स्वामी बुध होता है। इस घर का स्वामी बुध मंगल के साथ, शुक्र के घर में बैठता है। नवम भाव में चन्द्र स्वगृही है, क्योंकि कर्क राशि यहाँ है जिसका स्वामी चन्द्र होता है। दशम भाव में सिंह राशि है जिसका स्वामी सूर्य षष्ठ भाव में मंगल के घर में बैठता है। दशम भाव में केतु है, यह सूर्य के घर में बैठता है। एकादश स्थान में बृध स्थानी (के स्थान में) शनि है, क्योंकि यहाँ कन्या राशि है जिसका स्वामी बुध होता है। द्वादश भाव में स्वरस्थानी शुक्र है यहाँ तुला राशि है जो शुक्र का ही घर है।

स्वामित्व का और भी विचार

कुंडली में मुख्यतः चन्द्र सूर्य और लग्न से फल के विचार में ध्यान दिया जाता है। द्वितीय स्थान से नेत्र ज्योति, कुट्टम्ब और विद्या का भी विचार होता है। तीसरे स्थान से कंठ, वस्त्र, कर्ण, आशुषण, चतुर्थ से बाहुन भू सम्पत्ति आदि, पंचम से ईश्वर प्रेम विद्या मंत्र आदि, षष्ठ से भूल्य, व्यसन, रोग आदि का विचार होता है। इन सब स्थानों से किंश-किंस बात का विचार होता है आगे बताया जायगा, यहाँ तो इससे ग्रहों का प्रभत्व विचारना है, इस कारण संक्षेप में थोड़ा विचार किया गया है।

सब ग्रहों से सूर्य अधिक प्रभावशाली है, इस कारण उसे राजा कहा है। राजा सूर्य के स्थान सिंह से दूसरी राशि कन्या है। दूसरे स्थान से कुट्टम्ब विद्या आदि का

ग्रह विचार : १३५

विचार होता है। इस कारण सूर्य के युवराज वृध को यह स्थान ( कन्या राशि ) मिला। सूर्य से तीसरा तुला है, तीसरे से कण्ठ स्वर और वस्त्रादि का विचार होता है। यह सांसारिक सुखों का स्थान होने से दैत्यगुरु शुक्र को यह स्थान मिला, क्योंकि शुक्र सांसारिक सुखों के स्वामी माने गये हैं। सूर्य से चतुर्थ स्थान में वृश्चिक है। चतुर्थ से वाहन शू सम्पत्ति आदि का विचार होता है, वह स्थान सेनापति मंगल को मिला। मंगल शूभिपुत्र है, जमीन वाहन आदि का स्वामी है। सूर्य से पंचम धन है जिससे ईश्वर प्रेम विद्या आदि का विचार होता है, इससे गुरु को जो विद्या ईश्वर प्रेम आदि का दाता है, यह स्थान मिला। अन्त में सूर्य से षष्ठ स्थान में मकर है। षष्ठ स्थान रोग दुःख आदि का प्रगट करता है, इसीसे रोग दुःख आदि के स्वामी शनि को यह स्थान मिला।

इस प्रकार सूर्य राजा है जिसके समीप रानी चन्द्र है। सूर्य की रानी चन्द्र को इसलिये कहा है कि चन्द्र स्त्री ग्रह है और पृथ्वी के समीप होने से इसका सबसे बड़ा प्रभाव पड़ता है। सूर्य आत्मा है, चन्द्र मन है इस कारण सम्बन्ध होने से चन्द्र को रानी कहा है। इनके समीप युवराज वृध है। युवराज के वाजु से मंत्री शुक्र, फिर इसके बाद सेनापति मंगल को स्थान मिला है। इसके बाद मंत्री गुरु है और अन्त में शनि दास को स्थान मिला है। यही चित्र संख्या ७२ में बताया है।

अध्याय २६

ग्रह की उच्च नीच राशियाँ Exaltation and Debilitation or fall

जिस प्रकार प्रत्येक ग्रह का स्वस्थान होता है उसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों का एक और विशेष महत्व का स्थान माना हुआ है। यह अधिकार ग्रह की उच्चता सूचित करता है। कोई भारी अधिकार प्राप्त मनुष्य अपने अधिकार का पूर्ण उपयोग कर किसी को विशेष लाभ पहुँचा सकता है, परन्तु वह अधिकार चले जाने पर किसी को भी कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता।

इसी प्रकार ग्रह के अधिकार सम्बन्ध का विचार अर्थात् उच्चता का विचार इससे होता है। इस उच्चता की पूर्ण अवधि को अर्थात् पूर्ण अधिकार होने को—deep exaltation कहते हैं। अधिकार हीन हो जाने पर—नीच कहलाता है। उस नीचता की पूर्ण अवधि को परम नीच deep debilitation or deep fall कहते हैं। परम नीच ग्रह होने पर लाभ तो कुछ नहीं कर सकता, परन्तु नीचतापूर्ण कार्य करने की ओर उसका झुकाव हो जाता है।

१३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

परम नीच की अवधि पूर्ण होने पर ग्रह क्रमशः उच्चता की ओर बढ़ने लग जाता है और अन्त में परम उच्च पद को प्राप्त होता है। ऐसे ग्रह की स्थिति को आरोही Ascending कहते हैं।

ग्रह उच्चता की पूर्ण अवधि प्राप्त कर फिर क्रमशः नीचता की ओर जाने लगता है ऐसे ग्रह को अवरोही Descending कहते हैं। क्रमशः घटते-घटते अन्त में ग्रह पुनः नीचता की पूर्ण अवधि को प्राप्त होता है।

परम उच्च से परम नीच का अन्तर सदा ६ राशि (१८०°) रहता है। उच्च का अधिकार स्वगृह की अपेक्षा बड़ा होता है। जैसे मेष यह अग्नि तत्व की राशि है, मंगल भी अग्नि तत्व का ग्रह है, मंगल का स्वगृह भी अग्नि तत्व का है रवि मेष राशि में रहता है तो अग्नि तत्व में आने से अधिक प्रबल हो जाता है, इस कारण मेष राशि रवि की उच्चता की राशि मानी गई है। रवि मेष राशि का होगा तो कहेंगे कि रवि उच्च का है। उच्चता की अन्तिम अवधि (सूर्य की) मेष राशि के १०° तक है। मेष के १०° के भीतर जब रवि होता है तो कहेंगे कि रवि परम उच्च का है। इसके उपरान्त रवि नीचे की ओर जाने लगता है।

मेष से ६ राशि उपरान्त तुला है, इस पर सूर्य आयगा तो कहेंगे कि नीच का सूर्य है। तुला के १०° के भीतर सूर्य आने से कहेंगे सूर्य परम नीच का है। तुला के १०° उपरान्त रवि उच्च की ओर जाने लगता है।

इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों के सम्बन्ध में समझना। प्रत्येक ग्रहों की उच्च-नीच राशियों पुष्क-पुष्क हैं। उच्च और नीच के बीच सदा ६ राशि का अन्तर रहता है।

ग्रह की उच्च नीच राशियाँ

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतु
उच्च राशिमेषवृषमकरकन्याकर्कमीनतुलावृषवृश्चिक
परम उच्च अंश१०२८१५२७२०२०२०
रारा

परमोच्च राशि ०-१०° १-३° ९-२८° ५-१५° ३-५° ११-२७° ६-२०° १-२०° ७-२०° अंश

नीच राशितुलावृश्चिककर्कमीनमकरकन्यामेषवृश्चिकवृष
परम नीच अंश१०२८१५२७२०२०२०
रा

परम नीच ६-१०° ७-३° ३-२८° ११-१५° ९-५° ५-२७° ०-२०° ७-२०° १-२०° राशि अंश

हर्षाल—यह ग्रह वायु राशि का है। मिथुन तुला में अच्छा माना जाता है। कुंभ राशि में विशेष कर बलवान होता है।

ग्रह की उच्च नीच राशियाँ १३७

नेपच्यून—यह ग्रह जल राशि का है। कर्क वृश्चिक और मीन में वलवान होता है। जल राशि मीन में अत्यन्त वलवान होता है।

राहु केतु—कोई राहु का उच्च धन और केतु का उच्च वृष भी मानते हैं।

उच्च नीच—उच्च नीच राशियाँ ग्रहों के मन्दोच्च से सम्बन्ध रखती हैं जिनका उपयोग सिद्धांत ग्रंथ में दिया है।

इसके अतिरिक्त ग्रहों का उच्च-नीच विचार दूसरे प्रकार से भी होता है। सूर्य चन्द्र आदि ग्रहों का पृथ्वी से अन्तर सदैव समान नहीं रहता। कभी-कभी ग्रह पृथ्वी के समीप आ जाते हैं कभी दूर चले जाते हैं, क्योंकि सब ग्रह अण्डाकार मार्ग से सूर्य के आस-पास परिक्रमा कर रहे हैं।

सूर्य चंद्र का विग्य साधारण प्रकार से देखने में एक समान दिखता है, परन्तु ध्यान से देखोगे तो जहाँ पृथ्वी की दूरी समीप या अधिक हो जाती है तो विग्य के आकार में कुछ अन्तर प्रगट होने लगता है, कभी कुछ बड़ा कभी छोटा प्रगट होता है। पृथ्वी की कक्षा से जो विन्दु समीपवर्ती प्योति से बहुत दूर है उसे उच्च कहते हैं और जो पास है उसे नीच कहते हैं। सूर्य दिसम्बर के अन्त में अपनी कक्षा में नीच में होता है और जून के अन्त में उच्च का होता है। सूर्य चंद्र उच्च होते हैं तो पृथ्वी से सबसे लम्बी दूरी पर होते हैं और उस समय उसका विग्य छोटा दिखता है। जब सूर्य चंद्र पृथ्वी के पास होते हैं तब नीच होता है उस समय विग्य बड़ा दिखता है, ऐसे समय में ग्रहण हुआ तो खप्रास ग्रहण होता है। परन्तु यहाँ ऊपर जो ग्रहों की परम उच्च राशि अंश और परम नीच राशि अंश बताये गए हैं वे स्थिर कर लिए गए हैं और उनमें कभी परिवर्तन नहीं होता। इस कारण ऊपर बताये चक्र के अनुसार ही सदा उच्च नीच ग्रहण करना।

(३) ग्रहों का मूल त्रिकोण

जिस प्रकार ग्रहों का विशेष अधिकार उच्च के सम्बन्ध में पहिले बता चुके हैं उसी प्रकार एक और ग्रह का अधिकार है उसे मूल त्रिकोण कहते हैं। यह अधिकार उच्च से कुछ कम होता है। नीचे चक्र में बताया है कि किस राशि के कितने अंश पर होने से ग्रह मूल त्रिकोण में होता है। कुछ ग्रह की राशियाँ स्वक्षेत्र भी हैं, मूल त्रिकोण भी हैं और उच्च भी हैं, इसका स्पष्टीकरण करने के लिए यह भी चक्र में बतलाया है कि कितने अंश तक मूल त्रिकोण और कितने अंश तक उच्च या स्वक्षेत्र हैं। स्वक्षेत्र अधिकार से मूल त्रिकोण अधिकार बड़ा होता है।

साधारण प्रकार से ग्रहों के मूल त्रिकोण की राशि—

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतु
राशिसिंहवृषमेघकन्याधनतुलाकुंभकुंभसिंह

१३६ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

मूल त्रिकोण चक्र

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
मूल त्रिकोण राशिसिंहवृषमेषकन्याधनतुलाकुंभ
उच्च के अंशXX१५XXX
मूल त्रिकोण के अंश२०२७१२१०१०१५२०
स्वक्षेत्र अंश१०X१८२०१५१०

मूल त्रिकोण के अंशों में किसी-किसी का मतभेद है, परन्तु राशियों के बारे में कोई मतभेद नहीं है। यहाँ वृहस्पराशरी मत से मूल त्रिकोण के अंश दिए हैं।

चक्र का स्पष्टीकरण

सूर्य सिंह राशि में २०° तक मूल त्रि० होता है, शेष १०° उसके स्वक्षेत्र का है। चंद्र वृष के ३° तक उच्च उपरान्त २७° तक मूल त्रि० होगा। मंगल मेष के १२° तक मूल त्रिकोण, शेष स्वक्षेत्र होगा। बुध कन्या के १५° तक उच्च, उपरान्त १०° तक मूल त्रिकोण, शेष ५° स्वक्षेत्र। गुरु धन के १०° तक मूल त्रिकोण, उपरान्त स्वक्षेत्र होगा। शुक्र तुला के १५° तक मूल त्रिकोण, उपरान्त स्वक्षेत्र होगा। शनि कुंभ के २०° तक मूल त्रिकोण, उपरान्त स्वक्षेत्र होगा।

मूल त्रिकोण के विचार से ही ग्रह की नैसर्गिक मैत्री स्थिर हुई है, यह आगे बताया जायेगा।

अध्याय २७

ग्रहमैत्री Friendship

कुण्डली में ग्रहों की मैत्री का विचार होता है। यदि ग्रह अपने घर या मित्र के घर में होता है तो बलवान होता है। शत्रु के घर में बलहीन हो जाता है। यह सब विचारने के लिए देखना पड़ता है कि ग्रह जिस स्थान ( घर ) में बैठता है वह उसका

ग्रहमैत्री : १३९

मित्र, शत्रु या सम है, इस कारण ग्रहों की मैत्री जानना आवश्यक है। सम का अर्थ है कि वह न तो मित्र है और न शत्रु है, उदासीन ग्रह है।

मैत्री दो प्रकार की है—(१) नैसर्गिक मैत्री (२) तात्कालिक मैत्री। नीचे नैसर्गिक मैत्री चक्र दिया है, उससे जान सकते हैं कि कौन ग्रह का कौन मित्र या शत्रु है।

नैसर्गिक मैत्री चक्र Natural friendship—

ग्रहमित्र friendशत्रु enemyसम neutral
१ रवि केचंद्र, मंगल, गुरुशनि, शुक्र, राहुबुध
२ चंद्र ,,रवि, बुधराहुमंगल, गुरु, शुक्र, शनि
३ मंगल ,,रवि, चंद्र, गुरुबुध, राहुशुक्र, शनि
४ बुध ,,रवि, शुक्र, राहुचंद्रमंगल, गुरु, शनि
५ गुरु ,,रवि, चंद्र, मंगलबुध, शुक्रशनि, राहु
६ शुक्र ,,बुध, शनि, राहुरवि, चंद्रमंगल, गुरु
७ शनि ,,शुक्र, बुध, राहुरवि, चंद्र, मंगलगुरु
८ राहु ,,बुध, शुक्र, शनिरवि, चंद्र, मंगलगुरु

स्पष्टीकरण—

रवि का मित्र चंद्र, मंगल, गुरु है, जब रवि, चंद्र की राशि (कर्क) या मंगल की राशि (मेष, वृश्चिक) या गुरु की राशि (धन, मीन) में से किसी राशि में हो तो कहेंगे रवि मित्रगृही है। सूर्य का शत्रु शनि, शुक्र है, जब रवि इनके घर में अर्थात् मकर, कृत्त (शनि की राशि) या तुला, वृष (शुक्र गृह) में होगा तो कहेंगे सूर्य शत्रु क्षेत्री है या शत्रु गृही है। जब बुध के गृह मिथुन या कन्या राशि में से किसी में सूर्य होगा तो कहेंगे सूर्य समक्षेत्री है। इसी प्रकार दूसरे ग्रहों की भी मैत्री का विचार चक्र के अनुसार होता है। इस मैत्री में कोई परिवर्तन नहीं होता। इस कारण इसे नैसर्गिक मैत्री कहते हैं। यह मैत्री स्वाभाविक है।

नैसर्गिक मैत्री में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि कई ग्रहों की परस्पर मैत्री तो ठीक है (जैसे रवि का मित्र गुरु है तो गुरु का भी मित्र रवि है), परन्तु सब ग्रहों का ऐसा सम्बन्ध नहीं है। कोई ग्रह किसी से मैत्री तो मानता है, परन्तु दूसरा ग्रह उससे शत्रुता रखता है। जैसे चंद्र, बुध से मैत्री रखता है, परन्तु बुध, चंद्र से शत्रुता रखता है। इसी प्रकार परस्पर मैत्री में कहीं-कहीं विरोध पड़ता है, वह नीचे के चक्र में समझाया है जिसका ध्यान रखना चाहिए।

१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

  • मैत्री सम्बन्ध सूचक चक्र

जहाँ परस्पर मैत्री में कोई अन्तर नहीं है

ग्रहका मित्र शत्रु सम

१ रवि का चं. मं. गु. . श. शु. रा. -

२चंद्रका रवि राहु लट

३ मंगल का र. गु. राहु शुक्र

४ बुध का शु. रा. न —

४५ गुरुका र. मं. — ण. रा.

६ णुक्रकाबु.श- रा. रवि मं

७3 शनि का शु. रा: रवि गुरु

८ राहु का बु. शु. श. चं. मं. र. गुरु

नैसर्गिक मैत्री की उत्पत्ति

ग्रहों की नैसगिक मैत्री मूल त्रिकोण के सम्बन्ध से स्थापित हुई है । मूल त्रिकोण

मुल त्रिकोण चक्र

जहाँ मैत्री में भिन्नता है ।

ग्रहका मित्र शत्रु सम

१रविका -- वुध

२चंद्रका वुध -- मं.गु.शु.श.

३ मंगल का चंद्र बुध शनि

४बुध का र. चं. ` चन्द्रम. गु. श.

शगुरुका चन्द्र बु.शु. --

६ शुक्रका -- ! चन्द्र गुरु

७शनिका वुध चं.मं. --

८राहुका 7 = `>

के स्थान से २-१२,५-९,४-८ स्थान पर

और उच्च के स्थान पर उस ग्रहका

अच्छा प्रभाव पड़ता है, इस कारण उस

स्थान के स्वामी से मित्रता होती है और

शेष स्थान पर विरुद्ध प्रभाव पड़ता है ।

इस कारण शेष स्थान के स्वामी से शत्रुता

होती है । यदि एक प्रकार से मित्र भाव

और दूसरे प्रकार से शत्रुभाव आवे तो

उसे सम समझना । जहाँ दोनों प्रकार से मित्र-भाव आवे वहाँ मित्र समझना नीचे चक्र में यही समझाया गया है।

रवि, चन्द्र मित्र १ वार-मित्र, शेप ग्रह

चिल्ल ‡= २ वार मित्र = मित्र `

%५=१वार, =,

० = मित्र शन्रु=सम

Ee पल

[ मित्र ‡- मित्र-मित्र मित्र + शत्रुच्सम

(शेष)

मित्र शत्र स्थान सम

६ ३+% १०१ ७

उच्च

दस्थात

मित्र स्थान

स्थान २ १२ ९५ ४

मूल ण

त्रिको क्रम गह

राशि ६

सिह

१ सूय

FX

S °

स्वामी ब.

मेष मंगल ३

मं. ग,

ए? छ?

ग्रहमैत्री : १४१

का र

Crop

७” पर?

स्वामी मं.

राशि शुक्र कुम्भ

चं. र.

शनि के । समान राहु कुम्भ ८

१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस चक्र में मित्र और उच्च स्थान के सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दोनों स्थानों में से किसी स्थान में रवि या चंद्र १ ही बार आ जावे तो मित्र होते हैं, परन्तु दूसरे ग्रह इन स्थानों में २ बार आवे तब मित्र होते हैं, १ बार आने से सम होते हैं, शेष शत्रु होते हैं। जैसे मंगल का विचारना है, गुरु २ स्थान (१२-६) में आया है तो मित्र हुआ, परन्तु रवि, चंद्र १ ही बार, ५ रवि, ४ चंद्र आने से मित्र हुआ। शुक्र १ बार आया है, इसी प्रकार शनि उच्च में १ ही बार आया है तो शत्रु। शं. सम हुए। शेष बुध वषा वह शत्रु हुआ। इसी प्रकार सबकी मैत्री विचारना।

तात्कालिक मैत्री Temporal friendship

जिस प्रकार कोई किसी का मित्र होने पर भी तात्कालिक परिस्थिति के कारण विरोध या समता का भाव दिखाता है या शत्रु रहने पर भी तात्कालिक अवस्था के अनुसार कभी मित्रता कभी समता दर्शाता है, इसी प्रकार ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री रहने पर भी परिस्थिति के अनुसार मैत्री में परिवर्तन हो जाता है। इसको तात्कालिक मैत्री कहते हैं, अर्थात् तात्कालिक अवस्था के अनुसार जो मैत्री होती है उसे तात्कालिक मैत्री कहते हैं। मित्र=२, ३, ४ और १२, ११, १० वें स्थान के ग्रह शत्रु=१, ५, ६, ७, ८, और ९ वें स्थान के ग्रह जन्म कुंडली या किसी कुंडली में कोई ग्रह जहाँ पर भी हो उस स्थान को छोड़

कर आगे के ३ स्थान और पीछे के ३ स्थानों में रहने वाले ग्रह उस ग्रह के तात्कालिक मित्र हो जाते हैं। शेष स्थान में रहने वाले ग्रह उसके शत्रु हो जाते हैं।

अर्थात् किसी विशेष स्थान से दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान में और दशम, ग्यारहवें और बारहवें स्थान में रहने वाले ग्रह मित्र हो जाते हैं, शेष स्थान के ग्रह शत्रु होते हैं। जैसे यहाँ पर शनि सप्तम स्थान में है, उससे कौन-कौन स्थान के ग्रह मित्र शत्रु होंगे अगर कुण्डली में बताया है।

यहाँ इसको और भी उदाहरण देकर तात्कालिक मैत्री समझाते हैं।