सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
ग्रहों की दृष्टि : १५१
मान लो सूर्य वृष के १५° पर है और चन्द्र तुला के २८° पर है। वृष से तुला ६ राशि अन्तर पर अर्थात् सातवें स्थान पर होने से सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो जाती है। अब देखना है कि इनकी दृष्टि दीर्घांश के भीतर है या नहीं। इसके लिए दोनों के अंश देखा। दोनों के अंशों में (२८-१५)=१३° का अन्तर है। सूर्य का दीर्घांश १५ है तो यह अन्तर १३ दीर्घांश के भीतर है, तो कहेंगे कि सूर्य की दृष्टि चन्द्र पर दीर्घांश के भीतर है। इसका कारण पूर्ण दृष्टि का पूरा फल होगा। ऊपर जो दृष्टि कोण के दीर्घांश बताये गये हैं वे इसी प्रकार विचारे जाते हैं।
युति Conjunction=जब-जब यह एक ही राशि पर और एक ही अंश पर हो तो वह युति दृष्टि योग कहलाता है। यदि दीर्घांश के अनुसार उसमें ८-१० अंश से अधिक अन्तर पड़ जायगा तो वह युति योग प्रभाव पूर्ण नहीं होगा।
पाश्चात्य पद्धति से दृष्टि विचार
जिस ग्रह या भाव की दृष्टि निकालना है तो दोनों का अंशों में अन्तर निकालो और उस अन्तर के अनुसार दृष्टि का फल विचार करो। द्रष्टा और दृश्य इन दोनों के बीच में अंशों का न्यूनाधिक अन्त होने पर उस अन्तर के अनुसार दृष्टि का विशेष नाम होता है और दृष्टि योग से फल का अनुभव उसी के अनुसार होता है। यह दृष्टि का शुभाशुभ फल उसी दृष्टि के अनुसार होगा।
यह विचार नहीं रखना चाहिए कि देखने वाला ग्रह शुभ होगा तो सदा शुभ फल देगा या पाप ग्रह होगा तो सदा अशुभ फल देगा। कभी-कभी अशुभ दृष्टि योग से शुभ ग्रह भी अशुभ फल देते हैं और अशुभ ग्रह शुभ फल देते हैं।
पाश्चात्य लोग कोई ग्रह बिलकुल शुभ या अशुभ है ऐसा नहीं मानते, परन्तु दृष्टि योग से शुभाशुभ फल देना मानते हैं। जैसा गुरु यह शुभ ग्रह है उसका सम्बन्ध चंद्र के साथ होने से अति शुभ फल देगा, इसके विरुद्ध शनि ये पाप ग्रह है सूर्य या चंद्र के साथ शुभ दृष्टि योग करने से शुभ फल देता है। इस कारण योररोपीय जातक ग्रंथों के आधार पर यहाँ दृष्टि योग समझाते हैं, जिसमें यह भी बताया है कि कौन दृष्टि योग शुभ या अशुभ है। दृष्टि योग सूचक संकेत के चिह्न भी दिये हैं, क्योंकि अंग्रेजी पंचाङ्कों में केवल दृष्टि योग के चिह्न ही दिये रहते हैं।
१५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| दृष्टियोग | ग्रहों का अन्तर | फल | चिह्न | दीर्घांश |
|---|---|---|---|---|
| दृष्टियोग नाम | राशि या अंश | |||
| १-साई केन्द्रयोग | ||||
| Semi Square or | ||||
| Semi Quartile | १३=४५ | अशुभ | ∠ या | |
| S □ | २-३ अंश | |||
| २-द्विरेकादश (द्विराश्यंतर) | ||||
| Sextile | २=६० | शुभ | * या |
- | २-३ ३-केन्द्र (वर्तुलपाद) Square | ३=९० | अति शुभ | □ | ४-५ ४-त्रिकोण (नवम-पंचम) Trine | ४=१२० | अति शुभ | △ | ४-५ ५-साई चतुष्टय राश्यंतर Sesqui quadrate | ४३=१३५ | अशुभ | ⊥ या ⊠ | २-३ ६-षड्स्क Quincunx | ५=१५० | अशुभ | ∇ या ∟ | २-३ ७-पूर्ण दृष्टियोग ( प्रतियोग ) प्रतियुति (सप्तम दृष्टि) Opposition | ६=१८० | अशुभ | ⊙ या ⊗ | ८-१० ८-युति दृष्टियोग ( युति योग ) Conjunction | ० राशि अंश | युति करने वाले ग्रह के शुभाशुभ | ⊙ | ८-१० | समान | धर्म पर अवल- म्बित है | | ९-एक राश्यंतर युति Semi Sextile | १=३० | सदा अच्छा | ∨ या S * | २-३ Semi Quintile | | | | १०-चक्र दशमांश Quintile | १३=३३ | | ⊥ | २-३ ११-चक्र पंचमांश Biquintile | २३=७२ | कुछ अच्छा | Q | २-३ १२-चक्र साई द्वितीयंश | ४३=१४४ | " | ± | २-३ १३-समकांति दृष्टियोग Parallel or Declination | जब नाईवृत्त युति से बराबर कांति समान अन्तर पर हो | | P | २
ग्रहों की दृष्टि : १५१
इन ग्रहों का योग अच्छा है—
(१) गुरु का—नेप. हर्षल. श. सृ. बु. या चं. के साथ अच्छा है।
(२) शुक्र का—बुध या चंद्र से योग अच्छा है।
(३) वृष—चंद्र का भी योग अच्छा है।
(४) शेष ग्रहों का योग कम या अधिक, स्थिति के अनुसार हानि कारक है।
युति योग—रवि-गुरु, गुरु-चंद्र, चंद्र-बुध, चंद्र-शुक्र, रवि-शुक्र इनकी युति अच्छी मानी जाती है।
जब २ या अधिक ग्रह एक राशि में जितने पास-पास हों उतना ही अधिक युति का प्रभाव होता है। जैसे वृष के ४° पर गुरु है और मेष के २६° पर सूर्य है। यहाँ सूर्य गुरु के पास जा रहा है उस समय वह संयोगी applying or approaching कहलायेगा। जब सूर्य गुरु के पास मिलकर उसके आगे बढ़ेगा अर्थात् गुरु के अंश से सूर्य के अंश अधिक बढ़ने लगे तब सूर्यवियोगी Separating ग्रह कहलायेगा। जब ग्रह वियोगी होता है तो वह संयोगी अवस्था से अधिक शक्तिशाली होता है। मान लो गुरु वृष के ४ अंश पर है और सूर्य वृष से १२° पर है तो गुरु और सूर्य का युत योग का अधिक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि वह वियोगी (उससे दूर हटने की) अवस्था है।
क्रांतिसाम्य दृष्टियोग
जब दोनों ग्रहों की स्पष्ट क्रांति (चाहे दोनों की क्रांति एक दिशा में या भिन्न दिशा में हो) अंशादि में समान आ जावे, उस समय क्रांति साम्य दृष्टियोग होता है। इसका परिणाम युति के परिणाम से भी अधिक महत्व का समझा जाता है।
प्रति योग—जयुष ग्रह की अयुष दृष्टि हो तो विशेष अयुष दायक होती है। ग्रहों का योग इस प्रकार विचार किया जाता है :—
(१) चंद्र का—सब ग्रहों के साथ, क्योंकि यह शक्तिशाली है।
(२) वृष का—शु. सृ. मं. गु. श. हर्षल और नेपच्यून के साथ।
(३) शुक्र का—सृ. मं. गु. श. ह. और ने. के साथ
(४) सूर्य का—मं. गु. श. ह. और ने. "
(५) मंगल का—गु. श. ह. और ने. "
(६) गुरु का—श. ह. और ने. "
(७) शनि का—ह. और ने. "
(८) हर्षल का—ने. "
(९) नेपच्यून का किसी भी ग्रह के साथ योग नहीं होता क्योंकि वह सबसे कम चलने वाला है।
१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अपवाद— वक्की ग्रह का दूसरे ग्रहों के साथ योग हो सकता है। हर्षल जब वक्की होता है तब उसका योग किसी भी ग्रह के साथ या चन्द्र के साथ भी हो सकता है।
पाश्वत्या मत्त से ग्रहों के दीप्तांश।
( १ ) बु. गु. शु. श. ह.—जब संयोगी हों=६°, वियोगी में ८° दीप्तांश। मान लो शुक्र शनि का युति योग है। यह योग संयोगी है, जब शुक्र शनि से ६° अन्तर पर होगा तो उस दृष्टि का प्रभाव होगा और दोनों का योग होकर शुक्र ८° चला जायगा तब तक इसका प्रभाव रहेगा। इसी प्रकार सब ग्रहों का विचारना।
( २ ) सूर्य का दीप्तांश अधिक है, संयोगी में १२° और वियोगी में १७° है। ये दीप्तांश केवल युतियोग, द्विराशि अन्तर योग, त्रिकोण योग और प्रतियोग में विचारना।
( ३ ) छोटे-छोटे दृष्टि योगों के दीप्तांश।
( १ ) एक राशि अन्तरयोग, ७२° अन्तरयोग, १४४° अन्तरयोग में संयोगी में २° और वियोगी में ३°
( २ ) साढ़े केन्द्रयोग, साढ़े चतुष्टयराश्यंतरयोग में, संयोगी ३°, वियोगी ४°
( ३ ) सूर्य और चन्द्र के दृष्टि योग में इन दीप्तांशों से १° और अधिक लेना।
( ४ ) सम क्रान्तियोग में २° से अधिक नहीं लेना। मान लो मंगल की क्रान्ति १३° उत्तर और शनि की ११° दक्षिण है तो इन दोनों का सम क्रान्तियोग हुआ। इसी प्रकार भाव के भी दीप्तांश होते हैं।
ग्रहों का परिचय : १५५
अध्याय २६
ग्रहों का परिचय
क्रम ग्रह सूर्यं से सूयंकी अपनी पृथ्वी से पृथ्वी से कितने मध्यम
अन्तर परिक्रमा धुरी पर कितने लाख मील दूर है व्यास
मील का समय घूमने का गुना मील में
लाख में समय बड़ा है बड़ा अन्तर छोटा
अन्तर
१ सूयं ० ० २५३ दिन ३००० ९३- ९.८ ८६००००
२ बुध ३५७ ८७.९७ दिन २४ घं. ६ मि. बे, १३६९ ४७० २९९२
३ शुक्र ६६८ २२४.७० दि. २३३ घं. ०.९ १६१० २३६ ७६६०
४ पृथ्वी ९२३ ३६५.९८ दि. २४ घं. १ ० ० ७९१८
घं. मि. से.
५ मंगल १४७ ६८६.९८ दि. २४-३७-२२ ०.१५ २४७६ ३३८ ४२११
६ गुरु ४८२२ ११८६ वर्ष १० घं. १२८१ ५९७२ ३६३२ ८६०००
७ शनि ८८५० २९.४६ वर्ष १०३ घं. ७०६ १०२३६ ७३७३ ७०५००
८ हर्शल १७७१० ८४.२ वर्षे १० घं. ३८ मि. ६४ १९४६६ १५९५४ ३१७००
९ नेप. २७७५० १६४.७८ १० घं ४९ मिः 5३ २८९२८ २६५७३ ३४५००
वषं
१० चंद्र ० पृथ्वी की २७३ दिन डँ २४० २२१ २०००मील
परिक्रमा हजार
२९-५३ दि.
ग्रहों का आकार और परिक्रमा मार्ग एक दूसरे से मिलान करने के लिए सूयं का
व्यास २ फुट मान कर उसी अनुपात से प्रत्येक ग्रहों का आकार और परिक्रमा मार्ग
का व्यास नौचे चक्र में समझाया है । चित्र संख्या ३ भी देखो ।
ग्रह बुध शुक्र पृथ्वी मंगल गुरु शनि हर्शल नेपच्यून
वृत्त (मार्ग) का १६४ २८४ ४३० ६५४ ३ मील € मील १॥ मील २॥ मील
व्यास फुट फ़ुट फुट फुट आकार राई का मटर बडा बड़े मामूली छोटी मामूली बड़ा
दाना बटांना अल्पीन सन्तरा नारंगी बेर बेर
का सिर
पृथ्वी की सूर्य से दूरी वास्तव में ९ करोड़ से कुछ अधिक है। यह लम्बाई ऊपर
बताये क्रम से अनुमान करने पर ४३० फुट का आधा २१५ फुट हुआ । सूयं की दूरी
१५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
इस प्रकार अनुमान कर सकते हैं कि १ रेलागाड़ी प्रति घण्टे ३० मील के हिसाब से पृथ्वी से चले तो ३३६ वर्ष में वह सूर्य के पास पहुँचेगी।
मंगल और गुरु के बीच सूर्य की परिक्रमा करते हुए और भी कई छोटे-छोटे ग्रह हैं। यदि उन को भी उपर्युक्त अनुपात से लघु आकार में समझने के लिए विचार करो तो व्यास १००० से १२०० फुट के भीतर लगभग ४० दाने रेत के बराबर हैं। छोटे-छोटे तो और भी अधिक हैं।
सूर्य से इतर ग्रहों की दूरी आदि का अनुमान करने से प्रगट हो जायगा कि जिस ग्रह का छोटा चेरा है वह भी ग्रह परिक्रमा पूरी कर लेता है और जिसका परिक्रमा-मार्ग बड़ा है उसे परिक्रमा पूरी करने में अधिक समय लगता है।
किसी ग्रह का परिक्रमा-मार्ग कितना ही छोटा या बड़ा हो परन्तु ३६०° में हँ मार्ग बटा रहता है जिसमें १२ राशियाँ होती हैं।
ग्रहों के भिन्न-भिन्न नाम—
यहाँ ग्रहों के मुख्य-मुख्य नाम संक्षेप में दिये हैं।
१ सूर्य=रवि, भानु, भास्कर, हेलि, भानुकर, भानुमान्, दीप्तरेषम, चंडाशु, अहस्कर
२ चन्द्र=सोम, शीतरषिम, मन्त्र, शीताशु, मृगांक, ग्ली, कलेश, चन्द्रमा।
३ मंगल=कुज, शोम, शूर, वक्र, लोहितान्, पापी, आर, आवनेय।
४ बुध=चन्द्रपुत्र, ज्ञ, चित्तु, सौम्य, चान्द्र, बोधन, शान्त, श्यामयात्र, अतिदीर्घ।
५ गुरु=बृहस्पति, जीव, अंगिरा, देवगुरु, वाचस्पति, ईज्य, प्रशान्त, निर्वेशशर्वध।
६ शुक्र=भृगु, सित, वैश्यगुरु, उत्तान, भार्गवसूनु, काण, कवि, अचल।
७ शनि=अर्कपुत्र, छायात्मज, यम, सौरि, असित, नील, पंगु, कोण।
८ राहु=कूर, कृष्णांग, तम, अशुर, संहिकेय, कपिलाक्ष, दीर्घ, अगु, स्वर्मानु, विद्युदुद।
९ केतु=शिशि, ध्वज, शनिसुत, यमाल्मज, प्राणहर, अतिपापी, गुलिक, मादि।
१० दृष्टल=यूरनेत्र, वारुणी, प्रजापति।
११ नेपच्यून=वरुण।
अध्याय ३०
ग्रह-गुणधर्म
जिस प्रकार राशियों के गुणधर्म बता चुके हैं उसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के गुणधर्म हैं। इनके अध्ययन करने से प्रगट होगा कि इन ग्रहों से क्या-क्या गुण प्रगट होते हैं, और ये ग्रह किस प्रकार प्रभाव उत्पन्न करते हैं और उनसे क्या-क्या विचारा जा
ग्रह गुणधर्म : १४७
सकता है। ये ग्रह किस धातु से सम्बन्ध रखते हैं, उनका तत्व क्या है, गुण कैसा है किस प्रकार की पीड़ा करते हैं, कहीं पीड़ा करते हैं, कौन ग्रह किस कुटुम्बी का सूचक है, किस दशा में विशेष प्रभाव करते हैं, इत्यादि बातें आगे दिए हुए चक्र से प्रगट होंगी।
इन सब बातों का विचार कर फल अनुमान करना होता है। जैसे चोरी के प्रश्न में विचार करना है, तो चोर की कौन जाति होगी, क्या अवस्था होगी, माल किस प्रकार के स्थान में रखा होगा इत्यादि बातें राशि और ग्रह गुणधर्म के अनुसार विचार करना पड़ता है। ग्रह शरीर के किस स्थान पर, किस तत्व का प्रभाव, किस धातु द्वारा करता है या आजीविका किसके द्वारा मिलेगी। वह ग्रह कैसे दोष उत्पन्न करेगा, किस अंग में पीड़ा करेगा इत्यादि बातें ग्रह की स्थिति के अनुसार बुद्धि से विचारना पड़ता है।
ग्रह के गुणधर्म का उपयोग फल विचारने में काम आता है। फलित विषय में समय-समय पर इसका उपयोग होगा। इस कारण ग्रहों के गुणधर्म ध्यान में रखना चाहिए।
इनकी शैली आदि के सम्बन्ध में इस प्रकार भी विचार होता है—तत्व का योग—वायु ( शनि ), अग्नि ( मंगल ) और पृथ्वी तत्व ( बुध ) ये एक ही राशि के होने से आधी ( तूफान ) आदि उत्पन्न करते हैं। अग्नि ( मंगल ) और आकाश ( गुरु ) से भूकम्प अग्नि ( सूर्य या मंगल ) और जल तत्व ( चन्द्र या शुक्र ) से वर्षा।
ग्रह गुण धर्मचक्र—
| गुणधर्म | सूर्य | चंद्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | शरीर | आत्मा | मन | शारीरिक | वाणी | ज्ञान | कामदेव | दुःख | दुःख |
| (चित्त) | शक्ति | (विद्या) | बुद्धि | (सांसा-) | (विपत्ति) | ||||
| (पराक्रम) | रिक् | मुख |
| २ | पदवी | राजा | रानी | सेनापति | युवराज | मन्त्री | मन्त्री | प्यादा | (सेवक) |
|---|
३ | धातु | हड्डी | रक्त | पर्वा | त्वचा | भस्तिष्क | वीर्य | नसं | ---|---|---|---|---|---|---|---|---|--- ४ | तत्व | अग्नि | जल | अग्नि | पृथ्वी | आकाश | जल | वायु | ५ | त्रिदोष | पित्त | कफ | पित्त | सम | सम | कफ | वात | वात | | (प्रकृति) | | | | | | |
| ६ | वर्ण(रंग) | रक्त | शुक्ल | रक्त | हरा | पीत | ध्वेत | कृष्ण | कृष्ण | धूम्र |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ७ | जाति | क्षत्रिय | वैश्य | क्षत्रिय | शूद्र | विप्र | विप्र | शूद्र | स्नेहक | स्नेहक |
| ८ | अवस्था | बृद्ध | युवा | युवा | बाल | बृद्ध | युवा | बृद्ध | बृद्ध | बृद्ध |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | लिंग | पुरुष | स्त्री | पुरुष | नपुंसक | पुरुष | स्त्री | नपुंसक | स्त्री | पुरुष |
| १० | दिशा | पूर्व | वायव्य | दक्षिण | उत्तर | ईशान | आग्नेय | पश्चिम | नैऋत्य | नक्षत्र |
|---|
५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा- प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
गुणघमं सूयं चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु
११ गुण सत्त्वगुण सत्त्त० तमो० रजो० सत्त्व? रजो० तमो० तमो०
१२ धातु सुवर्ण कांसा गेर सुवर्ण रत्न रूपा लोह लोह लोह
१३ रस तिक्त लवण कटु कदु मधुर अम्ल तिक्त तिक्त तिक्त
(सबरस) (कषाय)
१४ काल मध्याह्व अपरात्त मध्याह्न पूर्वाह्न पूर्वाह्न अपराह्न संध्या संध्या संध्या
(बली) बली : (रातः) (प्रातः)
१५ स्वभाव स्थिर चर उग्र मिश्र मृदु लघु तीक्ष्ण तीक्ष्ण
१६ भुमि पशुभूमि आद्रेंभू, दग्ध० शमशान ग्राम जल० ऊषर ऊषर ऊषर
१७ पाद चतुष्पद सपं चौपाया पक्षी द्विपद द्विपद पक्षी सपं पक्षौ
(अपद) (मनुष्य)
१८ आकार चौकोन स्थूल चौकोन गोल गोल खंड(अद्धं- दीर्घ दीघं पुच्छ
१९ मणि
चन्द्राकार)
माणिक मोती प्रवाळ पन्ना पुष्पराग हीरा नीलम पिरोजा लसण
२० स्वभाव उम्र सौम्य उग्र शुभ शुभ शुभ पाप पाप पाप
२१ चर
आदि
स्थिर चर चर द्विस्वभाव स्थिर चर पक्षी चर पक्षी
(स्थिर) (स्थिर)
२२ स्थान वन जल वन ग्राम ग्राम ग्राम संधि विवर विवर
२३ „» देव- जल°o अग्नि क्रीड़ा भण्डार शय्या गंज ढेर) विल बिल
स्थान
२४ ग्रहभेद मूलग्रह धातुग्रह धातु जीव० जीव० मूल धातु धातु धातु
२५ ऋतु ग्रीष्म वर्षा ग्रीष्म शरद हेमन्त बसंत शिशिर शिशिर शिशिर
२६ जरू
२७ पीड़ा-
स्थान
शुष्क सजल शुष्क जलराशि जलराशि सजल शुष्क शुष्क शुष्क
में सजल में सजल
सिर या छाती या पीठ हाथ पैर कमर गुप्त घुटना
मुख गला पेट स्थान जांघ
२८ फल अयन में मुहूत॑ दिन ऋतु महीना पक्ष वर्ष
समय
२९ कारक पिता माता भाई मामा संतति स्त्री खच मृत्यु
३० दृष्टि ऊर्ध्वं सम ऊध्वं तिरछी सम तिरछीअधो अधो अघो
ग्रह गुणधर्म : १५९
ग्रहों के कल्पित स्वरूप के चित्र
चित्र संख्या ७४
चित्र संख्या ७५
चित्र संख्या ७६
चित्र संख्या ७७
चित्र संख्या ७८
चित्र संख्या ७९
चित्र संख्या ८०
चित्र संख्या ८१
चित्र संख्या ८२
किस ग्रह से क्या विचारना (संक्षेप में)
१ सूर्य से—आत्मा, पिता, स्वभाव, नीरोगता, सामर्थ्य और लक्ष्मी का विचार ।
२ चन्द्र से—चित्त, माता, प्रसन्नता, बुद्धि, राजा, सर्पति का विचार ।
३ मंगल से—पराक्रम, माई पुत्र, भाई बिरादर, रोग गूण, पृथ्वी ।
४ बुध से—विद्या, विवेक, वाणी, मामा, मित्र दांध्य ।
५ गुरु से—बुद्धि, ज्ञान, पुत्र, धन, शरीर की पुष्टि ।
१६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
६ शुक्र से—कामदेव, स्त्री, वाहन, भूषण, सुख
७ शनि से—आयु, जीवन, मृत्यु का कारण विपत्ति !
८ राहु से—पितामह ( दादा ) का विचार ।
९ केतु से— मातामह ( नाना ) ।
अध्याय ३१
ग्रहों का प्रभाव
१ सूर्य—यह सब ग्रहों से बलवान ग्रह है, क्योंकि यह सब ग्रहों का चालक है और इसी में सब ग्रहों को तेज मिलता है । यह बहुत पद दर्शक, दैवी शक्ति, आत्मा, अर्पन देवता, सरकार राज्य दरबार आदि कार्य का कारक ग्रह है । सब राशियों में बलवान सिंह राशि का स्वामी है । यह कुण्डली में बलवान होता है तो ऐश्वर्य शौर्य, मान, कीर्ति, दैवी व नैसिक सदगुण आरोम्य, अधिकार ये सब प्राप्त होते हैं । रवि के प्रभाव से मनुष्य उदार, सत्य काम की अभिलाषा करने वाला, प्रतिभा सम्पन्न, गरीबों पर दया करने वाला होता है ।
रवि निर्बल होता है तो अभिमानी, अपनी बढ़ाई करने वाला अधिकार का दुश्-पयोग करने वाला होता है । मनुष्य शरीर में हृदय, रक्त का अभिसरण, जीवन शक्ति, हृदय का विकार, पित्त विकार, नेत्र रोग, पेट के नीचे विकार प्रगट करता है ।
२ चन्द्र—यह पृथ्वी का उपग्रह है । इसका प्रभाव कुण्डली में बहुत महत्व का है । जिस प्रमाण से यह बलवान होता है उसी अनुसार दैहिक और मानसिक बल देता है । कर्क राशि का स्वामी है । राशिचक्र में प्रमण करते समय जन्म समय या प्रसन्न काल में यह जिस राशि पर हो उसके अनुसार फल उत्पन्न करता है । जन्म समय जिस राशि पर चन्द्र हो उस राशि के अनुसार स्वभाव मानसिक प्रगल्भता आदि उत्पन्न करता है जिसका जन्म कर्क लगन में हो, लगन में चन्द्र हो तो उस पर अधिक प्रभाव करता है । वह मनोविकार के आधीन रहता है और नवीनता उसे प्रिय होती है, अर्थात् उसकी आयुष्य भर में मनोविकार को प्रधानता रहती है और उसके सम्बन्ध से अच्छे बुरे कार्य का सम्बन्ध जन्म समय के चन्द्र की स्थिति पर अवलम्बित है । चन्द्र का प्रभाव शरीर के पेट स्तन, मेढा, लाला, लालोत्पादक पिंड आदि पर होता है और उस सम्बन्धी विकार उत्पन्न करता है । पूर्ण चन्द्र शुभ होने से अच्छा है शुभ फल देता है, परन्तु क्षीण चन्द्र अशुभ ग्रह समझा जाता है ।
ग्रहों का प्रभाव : १६१
३ मंगल—यह आकार आदि में पृथ्वी सरीखा है, इसी से इसे भूमिपुत्र कहते हैं। वह रक्षिद्र का प्रभाव बताते हुए तामड़ रंग का चमकते हुए दिखाता है। यह मंगल स्वभाव से क्रोधी, चुगुलखोर और मूठा होता है। यह निर्बल हो तो उस समय स्वभाव में झुटाई, चुगुलखोरी; क्रोधीपना, दुष्टता और क्रोध के कार्य प्रगट करता है। यह अनिष्ट हो तो उष्णता का विकार, भयंकर व विरोधिक ज्वर, प्लेग, कालरा, माता आदि स्पृशजंय रोगों से दुःख उत्पन्न करता है।
४ बुध—यह चन्द्र सरीखा महत्व का है, यह अपने बल के अनुसार मानसिक एवं बौद्धिक उन्नति दर्शाता है। जब यह चन्द्र के साथ त्रिकैलाश दृष्टि योग करता है तो उसकी बुद्धि सामर्थ्य अच्छी होती है। यह ग्रह चातुर्य, धार्मिक दशा, शोधक बुद्धि, शास्त्रीय विषय में प्रवेश, वाणी में मिठास आदि का कारक है। बुध अनिष्ट होता है तो सिर दुखना, लड्डखड़ाते या तुलताते बोलना, और कई प्रकार के मानसिक त्रास रोग प्रगट करता है।
यह ग्रह दूसरे ग्रह के साथ युक्त या दृष्ट हो तो जैसा वह ग्रह शुभ हो उसी प्रमाण से फल उत्पन्न करता है। इसका फल विचारते समय यह कौन राशि पर है और इस पर कौन ग्रह की कौती दृष्टि है आदि बातों का पूर्ण विचार करना होता है।
५ गुरु—सब ग्रहों में बड़ा है और इसके ४ चन्द्र (उपग्रह) हैं। उनमें से एक तो लगभग अपनी पृथ्वी के बराबर है। यह अति शुभ दायक ग्रह है। न्याय प्रियता सब अच्छे गुण या अच्छी वार्त और सुख का स्रोतक है। यह शुभ ग्रह है। जिसकी कुंडली में लग्न चन्द्र या बुध इनसे गुरु का शुभ योग होता है तो वह जातक उदार मन, न्यायी, प्रामाणिक, स्वच्छ हृदय का होता है, परन्तु अशुभ दृष्टि योग से साम्प्रतिक अड्चन बड़े लोगों की अप्रसन्नता आदि प्रगट करता है। यह ग्रह रक्तदोष, यकृत का विकार आदि उत्पन्न करता है। गुरु जहां हो उस स्थान की हानि करता है, परन्तु जिस भाव पर उसकी दृष्टि हो यह दृष्टि शुभ समझी जाती है, भाव की बृद्धि करती है।
६ शुक्र—यह दूसरे ग्रहों की अपेक्षा अधिक प्रकाशवान दिखाता है। यह बुध के साथ हो तो काव्य, ललित कला, चित्र कला, वाचन कला आदि में प्रवीण होता है। शुक्र लग्न में हो तो मुह मनमोहन होता है। उत्तम भाषण शैली, मिलनसार स्वभाव सबसे मिलने वाला, कपड़े आदि स्वच्छ रखता है। शुक्र जन्मकुण्डली में निर्बल हो तो, हलकापन, निरुज्ज, भयानक शब्द प्रिय आदि अवगुण करता है। शुक्र में बुध राशि की अपेक्षा तुला राशि में अधिक बलवान होता है और शुभ फल देता है ये पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो अशुभ फल उत्पन्न करता है।
यह मूलाशय का विकार, उपदेश आदि विकार, अपने दुर्व्यसन के कारण या अनौचित्य पर चलने के कारण होने वाले रोग वीर्यपात या उससे होने वाली दुर्बलता आदि विकार उत्पन्न करता है।
११
१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
७ शनि—इसके चहूँ ओर ३ बलय और ८ चन्द्र (उपग्रह) हैं। मानो छोटी सूर्य माला ही हो, इसी कारण इसे सूर्यपुत्र कहते हैं। जन्मसमय शनि बलवान हो तो कुशा-ग्रसति, मार्मिक, कठोर और क्रुण, डरपोक, दृढ़, थोड़ा बोलने वाला, हिंसाव किताव से खर्च करने वाला, उद्योगी और सम्य स्वभाव का होता है। शनि निर्बल हो तो संशय युक्त, दुष्ट, अधम, क्रोधी स्वभाव का होता है। सब ग्रहों में शनि अधिक पाप फल देने वाला है। शनि रवि, चन्द्र या लून के साथ अशुभ दृष्टियोग करता हो तो दन्त विकार, नाना प्रकार के रोग जो अधिक समय तक रहने वाले हों, संधिवात, पक्षाघात, कुछ बहरापन आदि रोग दर्शाता है।
संक्षेप में शनि ये डर, उदासीनता और मृत्यु का खोतक ग्रह माना जाता है। शनि जहाँ पर हो उस स्थान को बृद्धि करता है, परन्तु जिस भाव को देखता है उसकी हानि करता है।
८ हर्षल—(प्रजापति) यह अनेक आकस्मिक विचित्र प्रकार की घटना घटित करने वाला ग्रह है। साधारण प्रकार से ये पाप ग्रह है। इसी प्रकार वह कई प्रकार के चामत्कारिक और कल्पना जिसकी न हो सके ऐसा फल उत्पन्न करता है। जिस कुण्डली में यह बलवान हो तो अच्छे प्रकार के शुभ फल दर्शाता है। निर्बल होने पर संगार के नाना प्रकार के कष्ट और स्त्री-सुख या प्रातु-सुख में न्यूनता लाता है। अगड़ा और विचित्र प्रकार के भ्रमण सम्बन्धी कार्य प्रगत करता है।
जिसकी कुण्डली में लून चंद्र या बुध इस ग्रह से शुभ दृष्टि योग करता हो तो उसकी वृद्धि और मानसिक उन्नति अच्छी प्रकार की प्रगत होती है। उसे विशेष कर आध्यात्मिक, गूढ़, फलित ज्योतिष, सामुद्रिक आदि शास्त्रीय विषय में प्रवेश या इतर विषय में योग्यता बढ़ती है।
९ नेपच्यून—वर्षण—इस ग्रह का धर्म पानी सरीखा अस्थिर है और सर्व साधारण पन से यह ग्रह अधिक अशुभ फल उत्पन्न करता है। बार-बार विचार बदलना, विश्वास करने अयोग्य, अस्थिरता आदि गुण प्रकट करता है। यह ग्रह कुण्डली में जब बलवान हो या इसपर शुभग्रह की दृष्टि हो या बुध, चंद्र, से शुभ दृष्टि योग करता हो, उस समय बुद्धि की तीव्रता बढ़ेगी। अन्तर्दृष्टि में या दैवी दृष्टि में विचार करने की प्रेरणा मन में बढ़ती है, मन आध्यात्मिक मार्ग की ओर झुकता है। यदि वह कुण्डली में घुरे स्थान में या पीड़ित हो तो घुरी वासना, मत्सर, लोभ, आदि की ओर ले जाने वाले विचार उत्पन्न करता है।
इस ग्रह के प्रभाव से दूसरे की नकल शीघ्र करने में निपुण होता है। इससे जल तत्व से लाभ, गायन, तंतु वाद्य, काव्य, गूढ़ शास्त्र में प्रवेश, स्वप्न सृष्टि के विचित्र अनुभव दर्शाता है। यह जल राशि (कर्क या मीन) में बलवान होता है। यह बुध के साथ अशुभ दृष्टि योग करता हो तो मछवा तंतु में लोभ उत्पन्न करता है। चन्द्र के साथ पीड़ित हो तो शागीरक व मानसिक स्वास्थ्य नहीं रहता।
ग्रहों का प्रभाव : १६३
राहु-केतु
इन दोनों ग्रहों में राहु का ही महत्त्व है, क्योंकि राहु से सदा ६ राशि अंतर पर केतु रहता है। राहु को छोड़कर केतु कहीं नहीं जा सकता। दोनों ग्रह सदा बन्धी रहते हैं और उनकी गति सदा एक-सी रहती है। जब राहु या केतु के बीच चन्द्र काति वृत्त पर आ जाता है उस समय उसका शर शून्य या बहुत थोड़ा रहता है, तभी ग्रहण सम्भव होता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्र आ जाने से जब सूर्य नहीं दिखता तो सूर्य ग्रहण होता है और सूर्य व चंद्र के बीच पृथ्वी आने से चंद्रग्रहण होता है। ये दोनों अपकाश ग्रह राहु-केतु बड़े महत्त्व के हैं, इस कारण इनकी गणना ग्रहों में की जाती है।
राहु का मुख्य धर्म मारना है। यह क्रूर ग्रह तीसरे स्थान में हो तो भाइयों का, चतुर्थ में माता का, पंचम में संतति का, सप्तम में स्त्री का, दशम में पिता का मारक होता है। यह पापग्रह है। दांत आँठों के बाहर या बड़े धनुषाकार दिखे तो राहु का प्रभाव समझना। यह लग्न व ६, ७, १२ स्थान में नाशकर्ता होता है। राहु बलवान हो तो, उन्नत दशा में लाता है।
इनका फल विचार—
राहु केतु जिस भाव में हों और जिस-जिस भावस्वामियों के साथ हों उसीके अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं। इनका कोई विम्ब न होने के कारण दूसरों का प्रभाव ग्रहण कर शुभाशुभ फल देते हैं। ये तमोगुणी हैं। केन्द्र में हों और त्रिकोण से सम्बन्धित हो या त्रिकोण में हो और केन्द्र से सम्बन्धित हों तो शुभकारक होते हैं। राहु केतु जिस स्थान में हों या जिस भावशे के साथ हों उस भाव की वृद्धि करते हैं। परन्तु कोई ग्रह अच्छा भी हो तो भी राहु के साथ रहने से दुःश फल होता है। राहु केतु २ या ११ भाव के स्वामी हों तो जिस ग्रह के साथ रहते हैं वैसा इनका स्वभाव हो जाता है अर्थात् शुभ ग्रह के साथ शुभ और पाप ग्रह के साथ अशुभ हो जाता है।
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अध्याय ३२
भाव-परिचय
पहले बतला चुके हैं कि द्वादश भाव के स्थान स्थिर हैं और वे स्थान लग्न स्थान से गिने जाते हैं। उन भावों के विशेष नाम नीचे कुण्डली में बताये गये हैं।
कुंडली में ग्रहों की स्थिति बदलती रहती है, परन्तु भाव वे ही रहते हैं। भाव में कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु इन भावों में जो राशियाँ रहती हैं, वे लग्न की स्थिति के अनुसार सदा बदलती रहती हैं।
१६४ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
भाव के नाम
लग्न कुण्डली
जैसे यहाँ लग्नकुण्डली में वृश्चिक लग्न है तो तब स्थान ( लग्न ) में वृश्चिक का अंक ८ रहेगा और इसी क्रम से शेष भावों में राशियों के अंक लिखे रहेंगे जैसा यहाँ लग्नकुंडली में दिया है।
इसको इस प्रकार पढ़ेंगे कि ( तीसरा ) सहज स्थान में केतु मकर का है ( चौथे ) सुहृद स्थान में कुम्भ का मंगल है, ( षष्ठ ) रिपु स्थान में मेष का सूर्य है, ( सप्तम ) जाया स्थान में वृष का बुध और शनि हैं, ( अष्टम ) मृत्यु स्थान में मिथुन का चंद्र गुरु और शुक्र है, ( नवम ) धर्म स्थान में कर्क का राहु है। शेष स्थानों में कोई ग्रह नहीं है।
तन स्थान में वृश्चिक राशि, घन स्थान में धनु राशि, सुत स्थान में मीन राशि दशम भाव या कर्म स्थान में सिंह राशि, आय भाव में कन्या राशि, और व्यय भाव में तुला राशि है। इस प्रकार इन भावों के वर्णन में विशेष नाम का ही उपयोग होता है।
इन १२ भावों के जो प्रचलित नाम हैं इन्हें कंठस्थ कर लेना चाहिये, परन्तु इनके अतिरिक्त और भी नाम हैं जो कभी-कभी उपयोग में आते हैं उनके नाम नीचे दिए हैं।
१ तनु भाव—लग्न, होरा, मूर्ति, उदय, सिर, अंग, वपु, कल्प।
२ घन भाव—कुट्टम्ब, वाक्, पित्त, वित्त, स्व, अर्थ, कोष; अक्षि ( नेत्र )।
३ सहज भाव—सहोत्थ, गल, दुःखचय, प्राता, पराक्रम।
४ सुहृद भाव—मुख, दैवम, पाताल, हृत्, ( हृदय ), वाहन, मातृ, ( माता ) रसातल, बंधु, अम्बु, कर्ण, हिबुक, सौर्य, तुर्य, मान, नोर, सप्त, गृह।
५ सुत भाव—आत्मज, मंत्र, विवेक, शक्ति, उदर प्रवेश, प्रभाव, प्रतिभा, धी, बुद्धि, तनुज, तनय, विद्या, वाक् स्थान।
६ रिपु भाव—रोग, क्षत, अरि, व्यसन, चोर, विघ्न।
७ जाया भाव—चित्तोत्थ, काम, मदन, भर्ता, कलत्र, दधि, सूप, धून, अस्त, स्मर, जाभिन्न या मित्र।
भाव परिचय : १६५
न मूल्य भाव—भरण, रंध्र, आयु, अंतक, गुण, सूत्रकृच्छ्र, गुहा, क्षीर, छिद्र, ग्राम्य, निघन, लय; स्थान ।
९ धर्म भाव—पैतृक, भाग्य, गुरु, तप; लाभ, शुभ, दया, मार्ग, अर्जित ।
१० कर्म भाव—आज्ञा, मान, खं, आस्पद, दशम, व्योम, ताल, मेघूरण ।
११ आय भाव—लाभ, प्राप्ति, आगम, भव, सर्वतो भद्र ।
१२ व्यय भाव—रिफ्त, अंत्य, विनाश, लन का अन्त्य खण्ड, प्रांत्य, अंतिम, रिःफ । भाव संज्ञा—
उपर्युक्त भावों के नाम क्रमशः बताये हैं परन्तु विशेष परिस्थिति के अनुसार इनके विशेष नाम भी हैं जिनको जानना आवश्यक है । नीचे बताया है कि किस-किस भाव की क्या विशेष संज्ञा है । यहाँ भाव के नाम न लिखकर उनके क्रम सूचक अंक दिए हैं ।
भाव
लनकुण्डली
- (१) केन्द्र, कंटक या चतुष्टय १,४,७,१०
- (२) पणफर २,५,८,११
- (३) आपोदिलम ३,६,९,१२,
- (४) उपचय ३,६,१०,११,
- (५) अपचय ( जो उपचय नहीं ) १,२,४ ५,७,८,९,१२
- (६) चतुरस्र ४,८ ।
- (७) त्रिक ६,८,१२
- (८) त्रिकोण ५,९
- (९) त्रिविकोण ९
इन सबको उदाहरण देकर समझाते हैं ।
१ केन्द्र (१) लन में वृश्चिक (४) चतुर्थ भाव में कुंभ राशि का सं० (७) सप्तम भाव में वृष का वृ० श० (१०) दशम में सिंह राशि है, ये सब राशियां और ग्रह (८,११,२,५, राशियां और सं० वृ० श० ग्रह) केन्द्र में हैं ।
२ पणफर—(२) में धन राशि, (५) में मीन, (८) में मिथुन, (११) भाव में
कन्या राशि है । इन स्थानों की राशियां पणफर में हैं । अष्टम में चन्द्र गुरु शुक्र हैं । ये ग्रह भी पणफर में हैं ।
लनकुण्डली
१६६ . सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
३ आपोक्लिम--(३) में मकर का केतु, (६) में मेष का सुर्य, (९) में ककं का राहु और (१२) में तुला राशि ये सब आपोक्लिम में हैं।
केन्द्र अर्थात् वीच के स्थान से दुसरा पणफर और तीसरा आपोक्लिम का घर होता है, जैसा यहाँ समझा चुके हैं ।
४ उपचय, ५ अपचय--यहां कुंडली
में जहां उ० लिखा है वह उपचय स्थान है
शेष जहां + है वे अपचय स्थान हैं। यहां लग्न कुण्डली में उपचय में (३) में मकर
का केतु, (६) में मेष का सूयं, (१०) में
सिह और (११) में कन्या राशि है । शेष
बचे हुए स्थान अपचय कहलाये ।
६ चतुरस्न-- किसी भी स्थान से चौथा और आठवां चतुरस्र कहलाता है, जैसे मंगल से शनि और बुध चतुर्थ में और कन्या राशि (११ भाव) अष्टम में हैं ये मंगल से चतुरल् में हुए । इसी प्रकार किसी भी स्थान से चौथा आठवां स्थान गिनने से जो आवे वह चतुरस्र कहलाता है ।
७ त्रिक--किसी भी स्थान से ६-८ और १२ वें स्थान त्रिक स्थान कहलाते हैं, जैसे मंगर से छठा ककं का राहु नवम भाव में है। मंगल से आठवां लाभ भाव में कन्या राशि है । मंगल से बारहवें मकर का केतु तृतीय भाव में है । ये सब मंगल के त्रिक स्थान में हुए ।
८ विकोण--किसी भी स्थान से नवम स्थान और वहां से पंचम स्थान त्रिकोण कहलाता है । एक दूसरे से नवम पंचम राशियाँ इस प्रकार होंगी । १, ५, ९। ३, ७, ११ । ४, ८, १२ । ये राशियां एक दूसरे से त्रिकोण में हैं । जैसे मंगछ से पंचम में चन्द्र गुरु शुक्र है और चंद्र से नवम स्थान में कुंभ का मंगळ - है तो १ वह स्थान जहाँ ग्रह हैं वहां से १ गिना, वहां से(५) पांचवें स्थान में मिथुन का चन्द्र है और वहाँ से (९) नवम स्थान में मंगल है, इस प्रकार ये स्थान एक दूसरे से त्रिकोण में हुए, क्योंकि यहाँ इनसे त्रिकोण बनता है । इसी प्रकार किसी भी स्थान से 1०१०९ स्थान गिनो तो वे दोनों स्थान त्रिकोण में पड़ते हैं । १ स्थान तो केवल उस स्थान को गिनने के लिये था, यहां बचे हुए २ ही स्थान त्रिकोण के होते हैं जैसा कुंभ का मंगल और मिथुन को चन्द्र एक दुसरे से त्रिकोण में हूँ । ९ त्रित्रिकोण--किती स्थान से नवम स्थान नित्रिकोण कहलाता है, जैसे चन्द्र से मंगल नवम स्थान में है तो कहेंगे कि चन्द्र से त्रित्रिकोण में मंगल है ।
भाव परिचय : १६७
इसी प्रकार लगन से या किसी भाव विशेष से दूसरे भाव या ग्रह कितने स्थानान्तर पर हैं विचार कर भाव संज्ञा ऊपर बताए अनुसार निश्चित करना ।
भाव स्वामी Lord of the house
जिस भाव में जो राशि है उस राशि का जो स्वामी होगा वही ग्रह भावस्वामी कहलाता है । भाव स्वामी को भावेश्वर, भुवन पति, भावेश या भाव अधिपति भी कहते हैं ।
भाव स्वामी का भाव सम्बन्ध से भी पृथक्-पृथक् नाम होता है, जैसे:—लगन का स्वामी-लगनेश, द्वितीय भाव का स्वामी-द्वितीयेश या धनेश, ११वाँ लाभ स्थान है उसका स्वामी लाभेश इत्यादि ।
भाव स्वामी के विशेष योग Special aspects of the Lords of the houses ( अध्याय २८ का दृष्टि योग भी देखो )
१ भावेश योग—जब दो या अधिक भावेश ( भाव स्वामी ) का योग होता है तो भावेश योग कहते हैं ।
जब कोई त्रिकोण ( त्रिक ६-८-१२ भाव के स्वामी ) जब-जब दूसरे भावों से योग करते हैं तो अनिष्ट फल देते हैं ।
केन्द्रेश ( केन्द्र भाव का स्वामी ) व त्रिकोणेश ( त्रिकोण भाव का स्वामी ) का योग शुभ फल देता है । ये स्थान के अनुसार फल देते हैं । ( त्रिक ) ६, ८, १२ भाव में भावेश निर्बल होता है ।
२ भावेश दृष्टि योग—जब दो या अधिक भावेश एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि सं देखते हैं तो भावेश पर दृष्टि योग करते हैं । त्रिक भाव का स्वामी, जिस भावेश पर दृष्टि करता है उस भावेश के फल को निर्बल कर देता है ।
३ त्रिकोण योग—जब दो भावेश एक दूसरे के त्रिकोण ( नवम पंचम स्थान ) में हों तो उसे त्रिकोण योग कहते हैं । ये योग लक्ष्मी, राज वैभव, विभूति, कीर्ति देने वाला होता है । केन्द्रेश और त्रिकोणेश का त्रिकोण योग श्रेष्ठ होता है ।
४ केन्द्र योग—दो भावेश परस्पर केन्द्र में हों तो केन्द्र योग होता है। यह योग महत्व सूचक है । एक ग्रह के केन्द्र स्थान से दूसरा ग्रह भी केन्द्र में हो तब यह योग होता है ।
५ लाभ योग—दो भावेश एक दूसरे पर तृतीय एकादश योग करते हों तो उसे लाभ योग कहते हैं । यह बहुत सम्पत्ति देने वाला होता है । एक ग्रह जहाँ हो उससे दूसरा ग्रह ग्यारहवें स्थान में हो तो दूसरे ग्रह से पहिला ग्रह तीसरे स्थान में पड़ता है । इस प्रकार जब एक ग्रह से गिनने पर दूसरा ग्रह ग्यारहवें स्थान में हो तब यह योग होता है ।
६ द्विद्विधा योग—जब दो भावेश एक दूसरे से दूसरे या बारहवें स्थान में हों तो यह योग होता है । यह योग दरिद्रता सूचक है ।
७ षड्पत्क योग—दो भावेश एक दूसरे से छठे या आठवें स्थान में हो तो यह योग होता है । यह दुःख और कष्ट देता है ।
१६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
८ अन्योन्य आश्रय योग—दो भाव के स्वामी जब एक दूसरे के भाव में हों तब यह योग होता है, जैसे लगनेश लाभ स्थान में हो और लाभेश लग्न में हो तो यहाँ लगनेश और लाभेश का अन्योन्य आश्रय योग हुआ। इसे परिवर्तन योग भी कहते हैं।
९ युति—जब दो भावेश एक ही राशि के एकही अंश पर हों तो उसे युति कहते हैं।
१० षड्भांतर या प्रति योग—जब एक भावेश एक दूसरे से ६ राशि के अंतर पर हो अर्थात् एक दूसरे के सम्मुख हो तब यह योग होता है।
इन योगों का वर्णन दृष्टि विचार में भी हो चुका है, परन्तु भाव से सम्बन्ध होने के कारण यहाँ दिया है। यहाँ केवल मुख्य-मुख्य योग ही दिये हैं, क्योंकि योग अनेक हैं।
योग—ग्रहों का ऐसी परिस्थिति में आ जाना जिससे वह दूसरे ग्रह, भाव या राशि से किसी प्रकार सम्बन्धित होकर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर देवे जिससे कोई विशेष फल उत्पन्न होने की सम्भावना हो। ऐसे अनेक योगों का वर्णन फलित ज्योतिष में दिया है।
यहाँ इन्ही योगों को उदाहरण देकर समझाते हैं :—
इस कुण्डली में षष्ठ भाव का स्वामी मंगल और अष्टमेस बुध है, ये त्रिक भाव के स्वामी हैं। मंगल सहज भाव में है और मंगल से दूसरा स्थान चतुर्थ भाव है जिसमें बुध है। यहाँ मंगल और बुध का (६) द्विर्दिक्ष्य योग हुआ। क्योंकि मंगल से बुध दूसरा और बुध से मंगल बारहवाँ है। यह योग द्रविष्टा सूचक है। इस पर भी त्रिक भाव के स्वामियों का इस प्रकार योग होना अनिष्ट कारक है।
यहाँ चन्द्र सप्तम भाव में है, मंगल से यह गिनने पर पंचम स्थान होता है, इस कारण मंगल से नवम पंचम (३) त्रिकोण योग हुआ। यह योग अच्छा है, परन्तु यह त्रिकोण के स्वामियों का योग नहीं हुआ।
शनि लाभ स्थान में है वह चतुर्थ्या (केन्द्र का स्वामी) है, इससे पंचम स्थान में शुक्र तृतीय भाव में है तो शनि और शुक्र का नवम पंचम होने से (३) त्रिकोण योग हुआ। यहाँ शुक्र सप्तमेस (केन्द्र स्वामी) है, इस कारण यहाँ केन्द्र के अधिपतियों का (शनि और शुक्र का) त्रिकोण योग हुआ। यह योग अच्छा है।
लाभ भाव का स्वामी बुध (चतुर्थ) केन्द्र में है। धर्म का भाव स्वामी चंद्र भी केन्द्र (सप्तम) में है। यहाँ दोनों भावेश केन्द्र में हैं और एक दूसरे के केन्द्र में भी हैं तो यह (४) केन्द्र योग हुआ। यह अच्छा योग है।
भाव परिचय : १६९
जब कोई ग्रह एक दूसरे से चतुर्थ या सप्तम में हो तो एक दूसरे से केन्द्र में होते हैं, क्योंकि जो एक के चतुर्थ है वह दूसरे से दशम में पड़ता है और जो एक दूसरे से सप्तम में है वह दूसरे से भी सप्तम होता है। लग्नकुण्डली में १, ४, ७, १० स्थान में रहने वाले ग्रह केन्द्र में कहलाते हैं, परन्तु एक ग्रह से दूसरे ग्रह के स्थान का अन्तर भी ४, ७, १० स्थान की दूरी पर होने से पहिले ग्रह के केन्द्र में दूसरा ग्रह है ऐसा कहेंगे।
यहाँ शनि जो तृतीयेश और चतुर्थेश होकर लाभ स्थान में है, इससे तीसरे स्थान में लगनी (लग्न का १) गुड बैठता है जो धनेश और पंचमेश है। इन दोनों ग्रहों का (५) तृतीय एकादश योग है, क्योंकि शनि से गुड तीसरा और गुडसे शनि ग्यारहवाँ है। यह सम्पत्तिदाता योग हुआ।
षष्ठेश मंगल तृतीय भाव में है। मंगल से षष्ठ स्थान में सूर्य अष्टम भाव में बैठता है यह सूर्य दशमेश है। यहाँ षष्ठ और दशम भाव स्वामी और मंगल और सूर्य का (७) षड्पटक योग हुआ जो कष्टदायक है।
गुरु लग्न में वृश्चिक के १०° पर है और चन्द्र सप्तम भाव में वृष के १०° पर है तो गुरु और चन्द्र का (१०) षड्मान्तर योग या प्रतियोग हुआ।
मंगल भकर के २२° पर है और शुक्र भी भकर के २५° पर है तो मंगल और शुक्र की (९) युति हुई। यदि शुक्र भी भकर के २२° पर होता तो पूर्ण युति होती। परन्तु दोनों के अंशों में केवल ३° का अन्तर है अर्थात् दीप्तांश के भीतर है तो यह भी युति कहलायगी।
इस कुण्डली में लाभ भाव में बुध के स्थान में शनि बैठता है और चतुर्थ में शनि के स्थान में (कुंभ राशि में) बुध बैठता है यह (८) अत्योन्म आश्रय योग हुआ। इसे परिवर्तन योग भी कहते हैं। इसी प्रकार और भी ग्रहों का योग विचारना।
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अध्याय ३३
भाव विचार
जब कोई ग्रह किसी भाव में जाता है तो उस भाव के सम्बन्ध से ग्रह के फल का विचार होता है, इस कारण इन भावों से क्या-क्या विचार किया जाता है यहाँ बतलाते हैं।
१ प्रथम भाव—इसे लग्न, सूर्य, उदय या पूर्व भी कहते हैं। इस स्थान का नाम सनु है। इस स्थान से स्वभाव, प्रकृति, मन, स्वरूप, आगुण्य और इतर शारीरिक
१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
दुःख सुख का विचार होता है। शरीर की दुर्बलता, पुष्टता, शरीर का रंग, शील, आकृति, शरीर के लहसन, मत्ता, तिल आदि चिह्न, आरोग्य, शरीर लक्षण आदि का विचार होता है। इसका मुख्य प्रभाव मस्तक पर है।
२ द्वितीय भाव—इसे घन स्थान कहते हैं। इससे जातक ( जिसका जन्म हुआ है और जिसके सम्बन्ध में विचारना है ) की सम्पत्तिक स्थिति का बोध होता है। इस भाव से कोष ( खजाना ), सोना, रत्न आदि की प्राप्ति, मित्र, वस्त्र, कुटुम्ब व स्त्री पुत्र का सुख और पूर्व अर्जित घन, अब्ध कार्य, विहृत्ता, लेखन, पट्टुच, वाणी, नेत्र और खाद्य पदार्थ आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव कण्ठ, नेत्र और मुख पर होता है।
३ तृतीय स्थान—इसे सहज ( साथ में उत्पन्न हुए ) स्थान या प्रातःस्थान व पराक्रम-स्थान भी कहते हैं। इससे आई बहिन, भाइयों का सुख, पास के सम्बन्धियों का सुख या थोड़ी यात्रा रेल, बैल गाड़ी आदि की, पराक्रम ( साहस ), सेवक, चाचा, मामा, दासी, हाथ कान सम्बन्धी रोग, कान के गहने आदि का विचार होता है। इसका मुख्य प्रभाव हाथ, बाहू, कन्धा और कान पर होता है।
४ चतुर्थ स्थान—इसे सुदृढ़, पाताल और सुख स्थान भी कहते हैं। इस भाव से सुख-दुःख का, माता का, स्थावर सम्पत्ति का, आयुष्य के दिन का, क्षेत्र, गृह ( घर ) भूमि, वगीचा, तालाब, चौपाया, मित्र, सुख, वन्धु, उद्यम, ससुर, नानी और छाती का विचार होता है। इसका प्रभाव छाती और पेट पर होता है।
५ पंचम स्थान—इसे सुत भाव कहते हैं। इससे संतति, गर्भ, विद्या, शील-स्वभाव, मन्त्र, उपासना, सट्टा, लाटरी या इसी प्रकार के व्यवहार में यश, अपयश, आनन्द और बुद्धि का विचार होता है। इसका प्रभाव हृदय और पीठ व कुक्षि पर होता है।
६ षष्ठ भाव—इसको रिपु स्थान भी कहते हैं। इससे शत्रु, मामा, मौसी, होने वाला रोग, सेवक, अपने अधीन कार्य करने वाले, ऊंट, घोड़े, भैंस आदि पशु चोर भय, संग्राम, क्रूर कर्म, वधन भय, सौतेली माँ, अपयश, हात्ति, रोग, चिन्ता और शङ्का आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव कमर, अंत, नाभि और पेट पर होता है।
७ सप्तम भाव—इसे अस्त या कलत्र या जाया-स्थान कहते हैं। इससे स्त्री, स्त्री-सुख, विवाह, व्यापार, गमन, अश्लीली झगड़े, साक्षीदार, प्रगट शत्रु या प्रतिद्वन्दी, संग्राम, विवाद, वाणिज्य, प्रवास या स्थानान्तर, जारकर्म, कलह आदि का विचार होता है। स्त्री का पति या पतिसुख का भी विचार इसी से होता है। इसका प्रभाव वस्ति, मूषपिंड और कमर पर भी होता है।