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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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१०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

परन्तु ये मत अधिक मान्य नहीं हैं । उपरोक्त मत ही मान्य हैं।

अष्टक वर्ग रेखाओं का फल आगे दिया है ।

(४) तीनों खंड में बराबर रेखा हो तो जीवन सदा एक सा रहेगा । जिस खंड

में कम रेखा हों उस भाग में सुख कम होगा । बहुत ही कम रेखा हों तो उस भाग

में रोग संताप आदि से पीड़ा होगी । जिस भाग में बहुत रेखा हों वह भाग सुखदाई

एवं उन्नतिकारी होगा । अष्टक वर्ग की रेखा या शून्य पर से शुभत्व विचार

यहाँ रेखा शुभ और शून्य अशुभ बताया है।

रेखा बिन्दु शुभ अशुभ विचार ८-० ८-० ऊष +१ पूणं शुभ अधिक

  • ७+१ ७--१ +६/८ + ३/४ पौन शुभ अधिक

६५२ ६२ +४/ष + १/२ आधा शुभ अधिक

५+ हे श- रे --२॥/८ + १/४ पाव शुभ अधिक `

४--४ ४-४ +०|ऽ +° समफल सम

३+५ ३—५ २/७८ --१/४ पाव अशुभ अधिक

२+६ २६ ४८ --१/२ आधा अशुभ अधिक

१०७ १--७ --६|८ --३/४ पोन अशुभ अधिक

०+ ०_—ष _८|ष १ पूर्ण अशुभ अधिक

साधारण प्रकार से ८ रेखा पूर्ण शुभ फल । ६ रेखा पौन शुभ फल । ४ रेखा,

आधा शुभ फल । २ रेखा पाव शुभ फल ऐसे ही बिन्दुओं से अशुभ फल समझना ।

अर्थात्‌. किसी अष्टक वर्ग की राशि में पूरी ८ रेखा हो तो वहाँ पूर्ण शुभता होगी ।

यदि शुभ रेखा एक भी न हो पूरे ८ शून्य हों तो वहां पूर्ण अशुभता रहेगी । यदि ४

रेखा ओर ४ शून्य हो तो अच्छा और बुरा फल बराबर होकर सम फल होगा यदि ७

रेखा हों तो उसमें एक अशुभता आने से उस राशि में पौन शुभता की अधिकता रहेगी

यदि ७ विन्दु हों तो उसमें अशुभता तो अधिक रहेगी परन्तु पूरा अशुभ फ नहीं होगा पौन अशुभ फल होगा । जहा+चिल्व है वहाँ शुभता अधिक रहेगी । जहाँ-ऋण चिह्न है वहाँ अशुभता अधिक रहेगी । अब रेखाओं के अनुसार शुभाशुभ फल का विचार नीचे दिया है (१) रेखाफछ- नाना रोग, दुःख, भय, कष्ट, देशाटन ।

(२) रेखाफल--मन में संताप, राज भय, चोर हानि, धन हानि ।

(३) रेखाफल- मानसिक विफलता, यात्रा, शरीर कष्ट, दुःख, व्यसन । (४) रेखाफल--समफल, सुख और दुःख, धन का लाभ और व्यय ।

(४) रेखाफल--सन्तान सुख, धनागम, सन्त संगति, कल्याण, आरोग्य, नित्य सुख, विद्या लाभ ।

(६) रेखाफल--यश, घन, वाहन, साहस,, विजय, चित्त, घन लास. !

भष्टक वर्ग विचार : १०७

(७) रेखाफल--वाहन, सुख, धन एवं पद वृद्धि, पूर्ण सुख सम्पत्ति की वृद्धि 1 (ऽ) रेखाफल--राज सम्मान, श्रेष्ठ लक्ष्मी की प्राप्ति, सब मनोरथ सिद्ध, सुख दायक समय, कार्य पूर्ण ।

५ से अधिक रेखा ( शुभ ) जिस राशि में हो उस राशि में अपने अष्टक वर्ग में ग्रहों ग्रह वह सदा शुभ होता है । अल्प रेखा वाला ग्रह गोचर में दुष्ट फल देता है । ग्रहों के अनुसार अष्टक वर्ग का रेखा बिन्दु फल १. सूर्य रेखा--जिस भाव से उत्पन्न हुई सूर्य की रेखा हो तो शत्रुओं का पराजय, सहसा सिद्धि ।

“विन्दु अशुभ फल दायक, अधिक व्यसन करने वाला, रोग शोक देने वाला, बिना कारण राजा द्वारा उद्देग ।

२. चन्द्र रेखा--वस्त्र भूषण, भोजन प्राप्ति, राजा से सम्मान, अकस्मात्‌ उत्तम कमं की प्राप्ति\ ` :

“बिन्दु ' कष्ट फळ, शत्रुओं से कलह, दुष्ट स्वप्न, वित्त धन का नाश । ३. मंगल रेखा-सदा अथे को प्राप्ति, आरोग्यता,आयुष्य की वृद्धि, कांति की वृद्धि 1 “बिन्दु” सदा जठराग्नि का रोग, सिर पीड़ा, रक्त पित्त का रोग ।

४ बुध रेखा-सुख ओर मिष्ठान्न भोजन लाभ, दान कमं में धमं में रत, देव द्विज और अग्नि का पूजक ।

'बिन्दु' भंग, शत्रुओं से कलह, दुःस्वप्न दर्शन, नित्य असमय भोजन ।

५ गुरु रेखा--सदा धन सुख आदि तथा पुष्टि, स्त्री भोग दायक है शत्रु का नाश मनोत्साह अधिक,अतुळ विभव वस्त्र सुवर्ण सुख आदि की वृद्धि बंधु वर्ग से सौख्यछाभ ॥ “बिन्दु” कष्ट, धन और बुद्धि का नाश, मानसिक एवं घर की चिता,मागं में दुःख, वाहन से पतन, सर्वत्र कलह, अपने ही वचनों द्वारा अपमान, शत्रुओं से द्वेष के कारण

खर्च और साहस से कार्य हानि ।

६. शुक्र रेखा--राज सम्मान वृद्धि, कपट का लाभ, शरीर का सुन्दर सुख,

दीर्घायु, क्रीडा ( खेल ) में मग्न, ज्ञान प्राप्ति, अर्थ की सिद्धि, लक्ष्मी का लाभ, सुख

सम्पत्ति की वृद्धि ।

“बिन्दु! शत्रु से कष्ट, धन नाश, स्त्री को पीड़ा, कलह, भूमि का नाश, बुद्धिनाश, सदा अधिक खर्च, घोडे से गिरना, मार्ग में चोर भय आदि ।

७. शनि रेखा- श्रेष्ठ फल, नौकरों के हेतु धन, कार्य सिद्धि, राजा से मित्रता,

सत्पुरुषों से सम्बन्ध, भूमि की प्राप्ति, दुष्ट जनों से जय प्राप्त हो, स्नान, दान, पूजन में

प्रेम, राज आश्रय से मिष्ठान्न भोजन खेती तथा धान्य की वृद्धि हो ।

“बिन्दु! कष्ट, राज से भय, बन्धुजनों में पीडा की वृद्धि धातु शस्त्र या दुष्टजनों से

धन नाश, चित्त में उद्देग, भुमि का नाश, कलह, बुद्धि नाश, वाहन से हीन ।

इन रेखः या विन्दुओं का फल--इनकी संख्या अधिक हो तो अधिक फल होगा ।

संख्या अल्प होगी तो अल्प फल होगा ।

२०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

समुदाय रेखा अनुसार भाव फल

जिस भाव में ३० से अधिक रेखा हों वह शुभ । २५ से ३० रेखा हों तो मध्यम

'फल । २५ से कम रेखा हों तो वह भाव या राशि अशुभ है कष्ट प्रद होती है । जिस

राशि में ७ रेखा या कम हो उस महीने में ( उस राशि के सूयं में ) मृत्यु भय हो इस

के दोष निवारण के लिए उचित दान द्वारा शांति करायें।

८ रेखा--मृत्यु संभावना ।

९ रेखा--सर्प भय ।

१० रेखा- शस्त्र भय ।

११ रेखा--मिथ्या अपवाद का भय ।

१२ रेखा--जल में डूब कर मरने का भय ।

१३ रेखा- व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु से मृत्यु भय ।

१४ रेखा- मृत्यु भय या धमं अर्थ काम की हानि, अंग पीड़ा, व्याधि ।

'१५ रेखा--राजभय, या बडी आपत्ति ।

१६ रेंखा--अरिष्ट भय या राजभय अंग पीड़ा व्याधि ।

१७ रेखा--रोगभय या नाश, दुःख, हानि ।

१८ रेखा--कलहभय या धन हानि ।

१९ रेबा--प्रवास ( विदेश वास ), या कुपति एवं बंधु वर्ग से कष्ट ।

२० रेखा--बुद्धिनाश, कलह ।

२१ रेखा--रोग कष्ट, हृदय में दुःख या हृदय रोग

२२ रेखा--बन्धुओं को पीड़ा, अपमान, कार्य में निष्फलता, पराजय, दीनता,

चुद्धि भ्रष्ट । रे

२३ रेखा--स्वयं कष्ट, धमं काम तथा अर्थ की हानि ।

२४ रेखा--बन्धुओं की मृत्यु, अकस्मात धन हानि ।

२५ रेखा--बुद्धि हानि, हस्तागत द्रव्य की हानि ।

२६ रेखा--धन हानि, कलह क्लेश ।

२७ रेखा--धन हानि, समता दुःख सुख की समता, शुभाशुभ फल की समता ।

२८ रेखा--सर्वांश में हानि या धनागम सुख, मान प्राप्ति ।

२९ रेखा-- अनेक चिता से व्याकुल, या मनुष्यों में पूज्यता ।

३० रेखा--घन धान्य की पूर्ण प्राप्ति, र।ज पूज्यता, पुण्य, सुख, मान ।

३१ रेखा--धन, सुकृत और सुख प्राप्त ।

| ~ ___ ३२ रेखा-विशेष सम्मान ।

.। ३३ रेखा--समस्त सिद्धि, विशेष लाभ । | ३१ से ५६ तक--अधिक उत्तम फल की उत्तरोत्तर वृद्धि हो राज्य प्राप्ति कार्य

. सिद्धि बादि हो ।

अष्टक वर्ग विचार : १०९.

"पर्वं अष्टक वर्ग कुण्डली पर विचार

(१) जहाँ कुम्भ में २३ रेखा=कनिष्ट

फल । मीन में २६ वृष में २७, तुला में

३० रेखा है=मध्यम शुभ। ककं ६० सिंह

और मकर ३२=कुछ अधिक मध्यम से

शुभ । मेष और मिथुन ३७, धन ३९-्श्रेष्ठ

फल । वृश्चिक ४३ का अति श्रेष्ठ फल

होगा ।

(२) लग्न में ३७ रेखा होने से भाग्य￾वान्‌ होगा ।

« (३) सबसे लग्न की रेखा अधिक हो तो भाग्यवान्‌ होता है सबसे कम होने से

भाग्यहीन होता है 1

(४) दशम से एकादश में कम रेखा होने से लाभ अल्प व्याधि अधिक हो यहाँ

लान रेखा होने से लाभ आदि अधिक हो वहाँ दशम से लाभ में रेखा अधिक होने से शुभ है।

हृ (५) दशम से लग्न की रेखा अधिक होने से लाभ मान आदि अधिक होगा मध्यम

से मध्यम फल, हीन से भोग सम्पत्ति की हानि होती है यहाँ दशम से लग्न में अधिकः

रेखा है शुभ है लाभजनक है ।

(६) लग्न की दिशा--लग्न आदि १२ राशियों का सबं मागे से पूर्व आदि क्रम से'

तीन-तीन राशियाँ पूर्व आदि दिशा में जानना ।

जैसे पूर्वे-१-१२-११ भाव ] प्रत्येक दिशा के ३ राशियों का फल योग

दक्षिण--१०- ९-८ „ ( जहां अधिक हो उस दिशा में शुभ या पश्चिम--७- ६-५ ,, । लाभ । जहाँ हीन फल हो वहाँ अशुभ ।

उत्तर--४- ३-२ » J

यहाँ लग्न से लाभ तक ३७+ २७+ ३७=१०१ पूर्व यहाँ पश्‍चिम दिशा

दशम से अष्टम , २६+ २३+ ३२-८१ दक्षिण | में अधिक रेखा हैं वहाँ से सप्तम से पंचम , २९--४३ -- ३०१११ पश्चिम|छाभ होगा उससे कम रेखा

चतुर्थ से धन ,, २९+ ३२+ ३१-९१ उत्तर | उत्तर की हैं ।

यहाँ ५४ से ७५ तक क्षीण फल होता है । ७५ से ९० तक योग में मध्यम फल

और ६० के ऊपर उत्तम फल होता है । यहाँ दक्षिण दिशा में मध्यम फल है । शेष

दिशाओं में उत्तम फल है । उन २ दिशाओं से लाभ होगा ।

(७) जिस दिशा में रेखा अधिक हों वहाँ स्वोच्च आदि गत ग्रह भी हो उस दिशा

में कायं सिद्ध होता है ।

(८) धनेश जिस दिशा में हो वहाँ से घन लाभ । अष्टमेश जिस दिशा में हो वहाँ

मृत्यु । वहाँ धनेश चन्द्र नवम में दक्षिण है और अष्टमेश शनि तृतीय उत्तर में है ।

4१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अष्टक वर्ग रेखा का विशेष विचार

(१) शुक्र या पाप ग्रह की रेखा--सब शुभ फल देती है ।

(२) शुभ या पाप ग्रह का शुन्य--दुःख देने वाले हैं ।

(३) रेखा अधिक हो तो शूभ फल, बिन्दु अधिक हो तो अशुभ फल होता है रेखा

और बिन्दु समान हो तो--समफल प्राप्त होता है यदि गोचर में अन्तर न होवे तव ।

(४) १ रेखा अधिक--लक्ष्मी प्राप्त १ बिन्दु अधिक---उद्देग ।

२ रेखा अधिक--भोग प्राप्त २ विन्द्र अधिक--हानि ।

३ रेखा अधिक--सूख प्राप्त ३ बिन्दु अधिक--रोग ।

४ रेखा अधिक*न्चेक्रंवर्ती राजा हो ४ बिन्दु अधिक--मृत्यु भय ।

(५) ग्रह गोचर में श्रेष्ठ हो परन्तु अष्टक वग में मध्यम हो और अपनी दशा में

अधम हो तो बहुत खराब ही होता है ।

(६) अष्टक वर्ग से किसी शुभ आदि कार्य करते समय उस दिन का अष्टक वर्ग

बनाकर प्रत्येक ग्रह की रेखाओं का योग करके शुभाशुभ फल का विचार होता है ।

इसे लिये जिस कायं में जिस ग्रह का फल कहा है वह ग्रह जब श्रेष्ठ राशि में हो

तो उस कार्य को करना । जेसे चन्द्र बल सब कायं में देखा जाता है जब चन्द्रमा श्रेष्ट

राशि में हो तभी शुभ कार्य का आरम्भ करना । कष्टप्रद राशियों में शुभ कार्य नहीं

करना । उपनयन विवाह आदि कार्य में गुरु ग्रह की शुद्धता ली जाती है परन्तु वह भी

अष्टक वर्ग में शुद्ध हो तभी ग्रहण करना गोचर शुद्धि नहीं भी हो प रन्तु अष्टकवगं से

शुद्धि हो अर्थात्‌ उस राशि में अधिक रेखा हों तो वह समय शुद्ध समझना । अष्टकवगं

शुद्ध हो तो गोचर शुद्ध विचारने की आवश्यकता नहीं है ।

(७) जिसके समुदाय अष्टकवगं में दशवे भाव से एकादश भाव में अधिक रेखा हो

और एकादश से व्यय भाव में अल्प रेखा हो तथा व्यय से लग्न में अधिक रेखा हो तो

वह भोगवान सुखी और धनवान्‌ होता है ।

(८) जिस राशि में कम रेखा होने से अनिष्ट फल कहा है उस राशि के सम्वत्सर

सें जब उस राशि का मास (सौर मास) हो तथा उसी राशि में यदि चन्द्रमा झा जाय

इस प्रकार कम से कम ३ ग्रहों का योग उस राशि में हो तभी पूर्वोक्त फल की ( अर्थात्‌

पहिले जो सामूहिक रेखा का अच्छा या बुरा फल बता चुके हैं उसकी ) संभावना है । यदि उस राशि में और ग्रहों का संयोग हो जाय तब उक्त फल निश्‍चित रूप से समझना ।

( ९ ) जिस राशि में ३० से अधिक रेखा हो उस राशि के सम्वत्सर और मास एवं

नक्षत्र में धन पुत्र तथा अनेक सुख की वृद्धि हो ४० से अधिक रेखा हो तो धन पुत्रादि प्राप्ति के साथ ही पुण्य प्रतिष्ठा एवं सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है। ( १० ) जो ग्रह उच्च, मित्र गृही हो और जो केन्द्र कोण उप्रचय में हो, शुभवगं में हो, वलवान्‌ हो उनकी भी यदि अल्प रेखा हो तो हानिकारक हैं । (११) जो ग्रह नीच या पाप ग्रह के वर्ग में युक्त हो जो गुलिक राशि के स्वामी

अष्टक वर्ग विचार : १११

के साथ हो तो वे भी यदि अधिक रेखा वाले हों तो सब काल में शुभ फल देने वाले होते हैं । ( १२ ) जितनी रेखा समुदाय अष्टक वर्ग कुण्डली में लग्न में हों उतने वर्ष बीतने पर वाहन, धन पुत्र विशेष विद्या आदि प्राप्त हो यदि वह सम्पत्ति योग वाला हो । (१३) व्यय भावेश शनि की राशि में हो और लग्न, अष्टम का स्वामी निर्बल हो तो लग्न में जितनी रेखा हों उतने वपं की आयु का अनुमान करना । (१४) चतुर्थेश लग्न में और लग्नेश चतुर्थ में हो उन दोनों राशियों में यदि ३३ रेखा हों तो राजलक्ष्मी युक्त राजा हो । यदि ३०-३० ही रेखा हों तो ४० वर्ष पश्चात्‌ अधिकार प्राप्त हो ।

(१५) १--४-११ इन तीनों घर में ३० से अधिक रेखा हों तो तेजस्वी, बड़ा धनी हो ४० वर्ष के ऊपर राज्य मिले ।

(१६) २५ से ३० तक या अधिक रेखा यदि चतुर्थ ओर नवम राशि में हों तो

२८ वर्ष के पश्चात वाहन युक्त हो या यात्रा करे धन प्राप्त हो । (१७) उच्च ककं का गुरु चतुर्थ में ४० रेखा युक्त हो और लग्न में मेष का सूर्य

हो तो राजा हो लक्ष घोड़ों को अपने पास रखे ।

(१८) लग्न में ४० रेखा हो, धनु में गुरु, मीन में शुक्र, अपने उच्च में मंगल मौर कुम्भ में शनि हों तो सवं लक्षणों से युक्त सार्वभौम राजा हो ।

(१९) मेषादि तीन-तीन राशि में उनके अनुसार पूर्व आदि चारों दिशाओं में

अधिक रेखा वाली राशि की दिशाओं में धन आदि की वृद्धि हो ।

(२०) किसी ग्रह के अष्टक वर्ग में एक भी शुभ रेखा ग्रह न हो तो गोचर में जब यह ग्रह उस राशि में आये तो मृत्युभय हो ।

(२१) राशि जिसमें २५ से २८ तक शुभ रेखा हो वह मध्यम, २५ से कम रेखा

शोक या दुःख उत्पन्न करती है । ३० या अधिक शुभ रेखा सदा लाभदायक है ।

(२२) लग्न से १२ घरों तक सब घरों को देखो जिस-जिस भाव में अधिक रेखा

हो उन भावों सम्बन्धी काम करने में अच्छा फल देगा यदि रेखा कम हों तो कष्ट

होगा । इसमें ६-८-१२ घर को छोड़कर विचार करना ।

(२३) लग्न से शनि तक जितने घर हैं उन दोनों के स्थानों को मिलाकर सब

घर की शुभ रेखा जोड़कर ७ का गुणाकर २७ का भाग दो लब्धि में जो प्राप्त हो उन

वर्षो में जातक को रोग या कष्ट होगा ।

(क) इस प्रकार शनि से लग्न तक सब रेखा योग मे ७ का गुणा कर २७ का

भाग देने से लब्धि से उनके वषं में रोग आदि होगा ।

(ख) इसी प्रकार मंगल और राहु के बीच भी गिन कर उपरोक्त क्रिया द्वारा

विचार करना ।

इससे खराब अनहोनी बातों का समय प्रगट होगा ।

(२४) जिन घरों में शुभ ग्रह हो उनकी शुभ रेखा का योग कर ७ से गुणा कर

११२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२७ का भाग देना जो लब्धि हो उससे शुभता सूचक वर्ष प्रगट होगा उस समय जातक

को संतान, धन सुख आदि प्राप्त होंगे ।

(२५) जिस राषि में अधिक शुभ रेखा हैं उसमें सब शुभ काम करना उस विशेष

राशि, मास भाव आदि में अधिक शुभ रेखा देख कर शुभ कायं करना गोचर. में सूर्यादि

दुष्ट स्थानों में हों तो शुभ कार्य निषिद्ध है परन्तु अष्टक वर्ग के अनुस।र सूर्य आदि शुद्ध

हो अर्थात्‌ इनकी अधिक रेखा हों तो शुभ कार्य करना | क्योंकि गोचर का फल स्थूल

है अष्टक वर्ग का फल सूक्ष्म है अष्टक वर्ग की शुद्धिसे कार्य सिद्ध होता है । अष्टकवर्ग

के अनुसार जिस मास में शून्य पड़ा हो उस मास में कलह दुःख. आदि होता है अतः

शुभ कार्य नहीं करना ।.

(२६) पाप ग्रह स्वगृही है तो उस भाव के फल को बढ़ावेगा यदि शत्रु स्थान या

नीच में हो तो पतन या हानि करे।

शुभ ग्रह भी यदि दुष्ट स्थान ६-८-१२ भाव में यदि उच्च का भी हो तो हानिः

करेगा । गत राशि का स्वामी जिस ग्रह के साथ हो वह भी अनिष्ट करता है ।

परन्तु अष्टक वर्ग में रेखा अधिक हो तो शुभ फळ देता है और शुभदायक ग्रह भी

रेखा कम हो तो शुभ फल नहीं देते ।

यदि ग्रह शुभ उच्च या स्वगृही हो अधिक रेखा हो तो फल को दुगुना करता है

अन्यथा होने से उसी क्रम से हीन फल देते हैं ।

!( २७ ) जातक की कुण्डली में अन्योन्य योग हो जैसे लग्नेश धन भाव में धनेश

लग्न में हो जिससे उन्नति प्रकट होती है, तो सर्वाष्टक में लग्न में जितनी रेखा पड़ती

, हों उतने वर्ष के पश्चात्‌ भाग्योन्नति हो । मान लो लग्न में २९ रेखा और धन में ३०

रेखा हो तो उसकी उन्नति २९ या ३० वर्ष में होगी ।

( २८ ) एकादश स्थान में एवं लग्न में बरावर रेखा हों तो रेखा तुल्य वर्ष

बीतने पर राजा से मान धन ओर विद्या की उन्नति हो ।

( २९ ` यदि मकर या कुंभ लग्न हो लग्न में व्ययेश हो, लग्नेश और अष्टमेश

निर्बल हों तो सर्वाष्टकवर्ग में जितनी रेखा लग्न में पड़े उतनी ही आयु हो। .( ३० ) सूर्यं अष्टक कुण्डली में लग्न में जितनी रेखा हों उतने वषं में जातक

की उत्नति होगी ।

„ (३१) चन्द्र और लग्न में बरावर रेखा हो तो उतने वर्ष बीतने पर राजा से

सान धन विद्या आदि प्राप्त हो ।

( ३२ ) लग्न व एकादश में ३०-३० से अधिक रेखा हों तो ४० वर्ष बाद बहुत उन्नति हो और अनेक अधिकार प्राप्त हों ।

( ३३ ) लग्न, नवम, दशम एवं लाभ में ३० रेखा से अधिक हो तो जातक सुखी एवं भाग्यवान्‌ हो ।

( ३४ ) यदि लग्न में २० से कम रेखा हो और तीसरे भाव में ४० से अभिक

रेखा हों तो जातक उच्चाधिकारी होता है ।

अध्टक वर्ग विचार : ११२

अष्टक वर्ग से गोचर फल विचार

( १ ) प्रत्येक ग्रहों को अष्टक वर्ग रेखा से गोचर में फल का विचार करने में

जब वह ग्रह गोचर में किसी राशि में आता है तो उसके अष्टक वगं में देखना कितनी

रेखा हैं यदि १, २ या ३ रेखा हो तो उसका फल अच्छा नहीं होगा ४ रेखा हो तो

उसका फल अच्छा नहीं होगा ५ रेखा हो तो मध्यम फल होगा । ५ से अधिक्न रेखा हो

तो उत्तम फल होगा।

जैसे सूर्य अष्टक वर्ग में कर्क में ३ रेखा पड़ी है इसमें गोचर में कर्क के सूर्य में

अच्छा फल नहीं होगा ।

(२ ) जिस राशि में शून्य हो एक भी रेद्या न हो जब सूर्य उस राशि में जायेगा

तो रोग भय अपवाद आदि होंगे ।

(३ ) इसी प्रकार चन्द्र अष्टक वर्ग द्वारा चंद्र का, मंगळ अष्टक बर्ग द्वारा मंगल

का गोचर फल विचार करना । 4

(४) गोचर का शनि जब उस राशि में आता है जिसमें रेखा नहीं है तो रोग

शत्रु भय आदि उत्पन्न करता है । ५

(१) रेखा यदि बिन्दु से कम हो तो दुःख हो (दिव्य शस्त्र आदि का भय हो'।

_ (२) जहा ५ रेखा से अधिक हो यहाँ शुभ फल कहना जितनी रेखा अधिक हो

उत्तना लाभ हो । * *

(३) किसी ग्रह के अष्टक वर्ग से उसकी राशि से फलाफल विचारना जैसे मंगल

के अष्टक वर्ग में कर्क राशि में ५ शून्य और ० रेखा है । रुशमें नुफ रंखा से २ शून्य

अशभता के अधिक है तो उस राशि में मंगळ ३ अशुभता अधिक रहेगी । घन ४ रेखा

० बिन्दु है तो इस राशि भी में डे शुभतो अधिक होने से घन का मंगल गोचर है सदा

शुभ रहेगा । इस प्रकार शुभाशुभ विचार लेना । यहाँ मंगल जब १ गोचर में इन

राशियों में जायगा तो इस प्रकार फल होता है--

मिथुन में रेखा ५ बिन्दु ३ शेष २ रेखा--शुभ भाग बचने से-मेष का मंगल शुभ होगा

कक में ३ रेखा ५ बिन्दुशेष २बिदु १अशुभ अधिक होने से-वृष का मंगल अशुभ होगा

सिह में ४५ ५२ » र ररेखा-शुभ अधिक होने से-मिथुन में शुभ होगा

६ बिन्दु-अशुभअधिक होने फल सदा अशुभ होगा कन्या मे ., ७ ,, »

तुला में १ , ७ » » ६ बिन्दु-अशुभ अधिक होने से तुला का सदा अशुभ होगा

वश्चिक मैँ४,, ४ ,, » ० बिन्दु-शुभाशुभसम है वृश्चिक में मध्यमफल शुभ होगा

धन में ५ ,, ३ » ४ २ रेखा-शुभ अधिक होने से-धन का मंगल शुभ होगा

मकर में २,, * # » * बिन्दु-अशुभ अधिक होने से-मकर का मगल अशुभ होगा

कुंभ में२ + ५» » र बिन्दु-अशुभ अधिक होने से- कुंभका मंगल अशुभ होगा

मीन में २ ,, ६ » » ४ बिन्दु-अशुभ अधिक होने से-मीन का मंगल अशुभ होगा

भेष में ४ „ ४ » २२ ० बिन्दु-सम फल होने से--मेष में मध्यफल

बुधमें , ४ ४ „ रै विन्दु-अशुभ अधिक होने से वप का मंगल अशुभ होगा

ता 11 च

११४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

इसी प्रकार गोचर में वह ग्रह जिस राशि में हो इस ग्रह के अष्टक वर्ग रेखा

बिन्दु से उसका शुभाशुभत्व का ज्ञान कर लेना ।

( ४ ) यदि वर्ष का विचार करना हो तो गुरुके अष्टक वर्ग से विचार करना

यंदि मास का विचार करना हो तो सूर्य के अष्टक वर्ग से विचार करना

यदि दिन का विचार करना हो तो चन्द्र के अष्टक वर्ग से विचार करना।

(५ ) रेखा या बिन्दु का विश्वाज्ञान

रेखा या बिन्दु = है > २॥-१० विश्वा । रेखा या विन्दु में २॥ का गुणा कर्ने से

उसका विश्वा का ज्ञान होता है । जैसे ५ रेखा % २।-१२।। विशवा शुभ फल ३ बिन्दु

है ३% २॥-७॥ विश्वा अशुभ फल होगा । परन्तु जिस क्रम से रेखा या बिन्दु अष्टक￾वर्ग चक्र में है उसी क्रम से शुभ या अशुभ फल होगा ।

अब अष्टक वर्ग की रेखा द्वारा जन्म कुण्डली के सम्बन्ध से गोचर फल

विचार करते हैं--

सम्बत्‌ २०१८ फाल्गुन अमावस्या

मंगलवार का गोचर चक्र लगन कुण्डली जन्म की

“को NA { RD 0026५ १ हे. च. मं. गु. } 0

(१) गोचर में सूर्य कुम्भ राशि में है। सूर्य अष्टक मे कुम्भ में ३ रेखा है जो कष्ट सूचक है 1 लग्न कुंडली म कुंभ राशि घमं भाव में है। इससे धर्म भाव सम्बन्धी विचारणीय बातों में कष्ट या दुःख होगा। (२) गोचर में चन्द्र कुंभ राशि में है। चन्द्र अष्टक में कुंभ में २ ही रेखा हैं जो अतिकष्ट सूचक है । जम्म में यह कुभ राशि घमं भाव में है इससे धर्म सम्बन्धी विचा- रणीय बातों की हानि होगी और दु:ख होगा । 5 (३) गोचर में मंगल भी कुंभ में है। मंगल के अष्टक में कुंभ राशि की ३ ही रेखा हैं जन्म में कुंभ राशि धर्म भाव में है। इससे धर्म भाव की विचारणीय वातो का कष्ट होगा ।

(४) गोचर में गुरु भी कुंभ राशि में हे । गुरु अष्टक में कुंभ को ४ ही रेखा हैं जिसका फल समता सूचक है । जन्म में यह कुंभ राशि धर्म भाव में है जिससे धमं भाव

5” च

अष्टक वर्ग विचार : ११५

सम्बन्धी विचारणीय बातों में समता रहेगी ।

यहाँ उपरोक्त चारों ग्रहों का धर्म भाव सम्बन्धी बातों में कष्टप्रद फल होगा ।

केवळ गुरु समता सूचक शेष पाप गृह का प्रभाव दुःख भय ही होगा ।

(५) गोचर में शुक्र मीन का है। शुक्र के अष्टक में मीन में ४ रेखा हैं जिसका

फल सम ( मध्यम ) है । जन्म में मीन राशि दशम भाव में है। इससे दशम भाव

सम्बन्धी फल कमं, व्यापार आदि में समता रहेगी ।

(६) गोचर में बुध मकर का है । बुध अष्टक में मकर की २ ही रेखा हैं जो

कष्टप्रद है। जन्म में मकर राशि अष्टम भाव में हैं। इससे अष्टम भाव सम्बन्धी

विचारणीय बातों का कष्ट ही रहेगा ।

(७) गोचर में शनि मकर का है शनि अष्टक में मकर में ५ रेखा हैं जो शुभ का

सूचक है । जन्म में मकर राशि अष्टम में है इससे अष्टम भाव की विचारणीय बातों

का सुख ही रहेगा ।

यहाँ गोचर में मकर राशि में बुध और शनि दोनों हैं एक का फल खराब एक का

अच्छा हे इससे शुभाशुभ फल होगा ।

किसःकिस भाव से किन-किन बातों का विचार होता है यह अन्यत्र दे चुके हैं

इससे यहाँ संक्षिप्त विचार किया है।

(८) यहां पर बात ध्यान देने की है कि सूर्य अष्टक० में सूर्य की कन्या में ६

रेखा और मकर में ७ रेखा है । जन्म में कन्या राशि चतुर्थ भाव में है । जव कन्या का

सूथं होगा सुख की अधिक वृद्धि हो । जन्म में मकर राशि अष्टम भाव में है। जब

मकर का सूर्य होगा रोगादि दूर होकर स्वास्थ्य ठीक रहेगा ।

(९) चन्द्र अष्टक वर्ग में सिह में ६ रेखा हैं धन में ७ रंखा हैं । जन्म में सिंह

राशि भ्रातृ स्थान में है सिह चन्द्र में भाइयों का अति सुख होगा । धनु भाव सप्तम

में है जव सप्तम में चन्द्र आयेगा सप्तम भाव सम्वन्धी वातों का बहुत सुख होगा ।

(१०) बुध अष्टक वर्ग में वृश्चिक में ८ रेखा हैं जन्म में यह पष्ठ भाव में है वृश्चि-

क का बुध हो तो शत्रुओं का नाश होकर पष्ठ भाव सम्बन्धी बातों में बहुत'सुख होगा।

(११) गुरु अष्टक वर्ग धन में ७ रेखा हैं। जन्म में घन राशि सप्तम में है धन

का गुरु होने पर सप्तम भाव सम्बन्धी बातों का अधिक सुख देगा ।

(१२) शनि अष्टक वर्ग में वृष में २ ही रंखा हैं बहुत अशुभ है। जन्म में

बूषराशि व्यय स्यान में है । वृष के शनि में अधिक खर्च का कष्ट उठाना पड़ेगा ।

(१३) मंगळ अष्टक में कन्या में एक ही रेखा है । जन्म में कन्या राशि चतुर्थ में है

इससे कन्या फे'मंगल में अति कष्ट होगा एवं चतुर्थ भाव सम्बन्धी बातों की हानि होगी ।

इसी प्रकार ग्रहों के अष्टक वर्ग रखा संख्या पर से समझ लेना कि गोचर में कोन

ग्रह किस राशि में अच्छा होगा कब बुरा होगा और वह किस भाय सम्वन्ध से अच्छा

या बुरा फल प्रगट करेगा ।

११६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

भौर भो विचार

(१) जन्म समय जो राशि और नवांश हो, जव गोचर में ग्रह उस घर में उतना

अन्तर पार करके जाता है तो उस भाव का अच्छा या बुरा जैसा फल हो प्रगट करता है।

(२) किसी ग्रह के अष्टक वर्ग में सवसे अधिक रखा हो तो देखो कि वह किस

भाव में है और भाव की गिनती कारक ग्रह लग्न मान कर करो ।

(३) ग्रह चाहे शुभ हो या अशुभ अधिक रखा हो तो उस भाव के फल को बढ़ाता है अर्थात्‌ अच्छा फल देता है । यदि ग्रह कोई ऐसे भाव में जावे जिसमें शुभ रखा न हों

या बहुत कम रेखा हों तो उल्टा फल्न देगा अर्थात्‌ उस भाव का बुरा फल प्रगट कर गा।

(४) चन्द्रमा या लग्न से ३-६-१०-११ घर में या अपने घर में या उच्च में या

मित्र गृही या त्रिकोण में ग्रह हो अधिक रेखा होने से अष्टक वर्ग में वह पूर्ण फल देगा।

(५) परन्तु जो अपव्यय अर्थात्‌ १,२,४,५,७,५,९,१२ स्थानों में हो या नीच में

या पाच गृही हो तो पूर्ण फक्त नहीं देगा ।

अष्टक वर्ग का त्रिकोण शोधन

` श्रस्मेक ग्रह के अष्टक वर्ग से प्राप्त शुभ र खाओं के योग का त्रिकोण करना पड़ता

है उसके पश्चात्‌ त्रिकोण शोधन से प्राप्त संख्या का ऐकाधिपत्य शोधन करना पड़ता है

. त्रिकोण शोधन की सुगमता के निमित्त आगे बताये अनुसार त्रिकोण की ३-३

राशियों का एक चक्र बना रो जिससे भुळ न होने. पाये । १,५,९ पहिला २,६,१० दूसरा ३,७,११ तीसरा और ४-८-१२ राशियां चोथे त्रिकोण की हैं। ..

इस चक्र में प्रत्येक ग्रहों के अष्टक वर्ग की शुभ राशियों का योग प्रत्येक राशि के

नीचे छिख दो । जेसे सूर्य अष्टक वर्ग में मिथुन में ५ रेखा है तो सूर्य के चक्र में मिथुन

के नीचे ५ लिख दो । ककं में ३ रेखा हैं तो जिस त्रिकोण में ककं राशि हो वहाँःकर्क॑

के नीचे ३ लिख दो। सिंह के नीचे ४ लिख दो इसी प्रकार सव राशियों के नीचे

सूर्य के अंक लिख दो। पश्चात्‌ चन्द्र आदि सत्र ग्रहों के अंक लग्न सहित भर दो।

त्रिकोण शोधन के लिए ३ बातों का ध्यान रखो ।

(१) त्रिकोण की ३ राशियों में से किसी एक राशि की संख्या रेखा की कम हो

तो उस अल्प रेखा की तीनों संख्या को उस त्रिकोण की तीनों संख्याओं में से घटा देना । इस प्रकार घटाने से जो अंक बचे वही त्रिकोण शोधन का अंक हुआ ।

(२) यदि उस त्रिकोण की रेखा संख्या में तीनों संख्या में से किसी में शून्य हो तो

बहु संख्या ज्यों की त्यों रहेगी - क्योंकि सवसे छोटा अंक० जब सव में से घटाया

जायगा तो कोई अन्तर नहीं आयगा वही संख्या रहेगी ।

(३) यदि उस त्रिकोण में तीनों संख्या बराबर हो तो सव ० हो जायगा क्योंकि

सबसे छोटा वही अंक है सव घटाने से ० ही बचेगा ।

अभिप्राय यह हे कि त्रिकोण की सबसे छोटी संख्या उस त्रिकोण को तीनों

संख्याओं में से घटाने से जो बचे वही अंक त्रिकोण शोधन का हुआ । आगे चक्र देखने

से सव समझ में आ जायेगा ।

अब्टक वर्ग विचार : ११७

त्रिकोण शोधन चक्र

त्रिकोण

राशियाँ

१ सूर्य रेखा

-अल्प रंखा

त्रिकोण शोधत

२ चन्द्र रखा

--अल्प रखा

त्रिकोण शोधन

३ मंगल रोखा

अल्प रेखा

त्रिकोण शोधन

४ बुध रखा

-अल्प रखा

त्रिकोण शोधन

५ गुरु रखा

—अल्प रखा

त्रिकोण शोधन

६ शुक्र रोखा

अल्प रेखा

त्रिकोण शोधन

७ शनि रेखा

अल्प रेखा

त्रिकोण शोधन

८ लग्न रेखा

--अल्परंखा

त्रिकोण शोधन

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यहाँ सूर्थ रेखा में प्रथम त्रिकोण में सबसे छोटा अंक ४ है इससे ४ को उस

त्रिकोण के तीनों अंकों से घटाया तो शेष में १ सिंह और धन में ० आया यही त्रिकोण

शोधन का अंक हुआ । दूसरे त्रिकोण में सबसे छोटा अंक २ होने से यहाँ के नीचे

अंकों से २ घटाया तो वृष में २ कन्या में ४, मकर में ० आया यही त्रिश शो० का

अंक है। तीसरे त्रिकोण मे सबसे छोटा २ है उसे घटाया चतुर्थ में छोटा ३ है उसे

घटाया । इस प्रकार घटाने से जो बच रहा वही त्रिकोण शोधन का अंक आया ।

११८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ऐकाधिपत्य शोधन .

अष्टक वगग में प्राप्त प्रत्येक ग्रहों को रेखाओं का त्रिकोण शोधन के पश्चात्‌ ऐका-

धिपत्य शोधन करना पड़ता है। जिन ग्रहों की राशियाँ ( दोस्वगृह ) हैं केवल उन्हीं

का ऐकाधिपत्य शोधन करना पड़ता है। सूर्य चन्द्र को १-१ राशि है इससे उनकी

राशि का शोधन नहीं होता ।

ऐकाघिपत्य शोधन के नियम ये हैं :---

(१) जिस राशि में ग्रह है वह सग्रह राशि हुई । जिस राशि में कोई ग्रह नहीं

हैं वह अग्रह राशि हुई । इसका ध्यान रखकर शोधन करना पड़ता है। किसी ग्रह की २

राशियाँ हैं उनमें ही विचार करना पड़ता है कि अग्रह हैं यहा सग्रह ओर उनके त्रिकोण

शोधन के पश्चात्‌ प्राप्त अंक, दोनों एक बरावर है या छोटा बड़ा अंक हैँ ।

(२ ) जब दोनों अग्रह राशि हो और दोनों के अंक समान हों तो दोनों अंक

लुप्त हो जाथंगे अर्थात्‌ दोनों में ०-० अङ्क रखना पड़ेगा ।

` (३) दोनों राशि अग्रह हों उनमें एक राशि से दूसरी संख्या बड़ी हो तो=

( अधिक-अल्प ) = शेष को बड़ी संख्या के स्थान में रखो छोटी संख्या पूर्ववत्‌ होगी ।

(४ ) एंक सग्रह दूसरा अग्रह दोनों के सभान अंक हों तो अग्रह ० हो जायेगा ।

सग्रह पुर्वेवत्‌ रहेगा ।

(५) दोनों में से चाहे कोई एक अग्रह हो या सग्रह या दोनों सग्रह या अग्रह हों

परन्तु किसी में ० हो तो दोनों ० रख दो ।

(६) अग्रह बड़ा सग्रह छोटा अंक हो तो ( बड़ी संख्या-छोटी संख्या ) शेष संख्या

भंग्रह की होगी: । सग्रह पूर्ववत्‌ रहेगा ।

(७) सग्रह बड़ा अग्रह छोटा अंक हो तो अग्रह ० हो जायगा,सग्रह पूर्ववत्‌ रहेगा ।

(८) दोनों सग्रह हो तो कोई परिवर्तन नहीं होगा ।

(९) यह ध्यान रहे कि सूर्य चन्द्र का ऐकाधिपत्य शोधन नहीं होता क्योंकि इनकी

एक-एक ही स्वराशि हैं । इनका जो अंक त्रिकोण शोधन से प्राप्त हुआ था वहीं अंक

कके और सिंह राशि में ऐकाधिपत्य शोधन चक्र में रख देना चाहिये ।

इसमें कुछ मतान्तर है-जातक पारि० में बताया है कि दोनों में से किसी में शून्य

हो तो दोनों संख्या पूर्ववत्‌ रहेगी यह उपरोक्त ५ के विरुद्ध है जैसे मेष में ० वृश्चिक

में २ हैं चाहे सग्रह या अग्रह हो दोनों पुंवत्‌ रहेंगे अर्थात्‌ मेप ० वृश्चिक में २ ही

ऐका० शो० में रहेगा ।

ऐकाधिपत्य शोधन में मतान्तर

त्रहत्पाराशरी, शंभु होरा प्रकाश आदि के अनुसार ऐकाधिपत्य शोधन करना यहाँ

दिया है परन्तु इसमें कुछ का मत भिन्न है ।

(३) यहाँ दोनों अग्रह राशि हों और संख्या बड़ी छोटी हो तो बड़ी से छोटी को

घटाकर शोष को बड़ी संख्यां के नीचे रखना छोटी पूर्ववत्‌ रहेगी, बताया है। कई छोटी

अष्टक वर्ग विचार : ११९

संख्या को लुप्त कर ० रख देते हैं बड़ी संख्या को छोटी के बराबर कर देते हैं। कोई छोटी के बराबर बड़ी संख्या कर देते हैं ।

(५) दोनों अग्रह या दोनों सग्रह हों या एक अग्रह दसरा सग्रह हो किसी एक में

० हवो तो दोनों में शून्य हो जाना बताया गया है । परन्तु जातक पारिजात आदि में बताया दै कि दोनों में से किसी में शून्य रहे तो ज्यों का त्यो रहेगा । शोधन नहीं |

होगा । चाहे दोनों में से किसी में या दोनों में ग्रह हो या न हो ।

(६) सग्रह छोटी अग्रह बड़ी हो तो बड़े से छोटा घटाकर शेष अग्रह में रहेगा

सग्रह वसा ही रहेगा । परन्तु अन्य का मत है कि छोटी संख्या दोनों में रहेगी अर्थात्‌

सग्रह की संख्यां जो हो वही संख्या अग्रह में रहेगी ।

ऐकाधिंपत्य शोधन चक्र

स्वामी मंगल शुक्र बुध गुरु शनि

राशि १८ ३ ७ ३ ६ १ प १० ११ ग्रह 9 सू० चट

श० गु०

सूयं श्रि शो०

ऐका० शो०

चन्द्र त्रि शो०

ऐ० शोधन

मंगल त्रि० शो०

ऐका० गो०

बुध त्रि० शो०

ऐका० शो०

गुरु० त्रि० शो०

ऐका० शो०

शुक्र त्रि० शो०

ऐका० शो०

शानि०त्रि०्शो ०

ऐका० शो०

लर्न त्रि० शो ०

ऐका० शो०

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यहाँ प्रत्येक ग्रहों की रेखाओं का त्रिकोण शोधन करने के पश्चात्‌ जो अंक प्राप्त

हुए हैं वे दिये है । इन्हीं अंकों का ऐका० शोधन करना है । सूयं में राशि ८ में मंगर है

= मग्र हृ में ४, मेष सग्रह में १ है । यहाँ सग्रह बड़ा, अगह छोटा है तो सम्नह के ४

१२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फोलत खण्ड

पूर्वेबत्‌ रहेंगे अग्रह का १ लुप्त होकर ० हो गया। २-७ राशि में७ में ० हैतो

दोनों में ० हो गया । ३-६ राशि दोनों अग्रह हैं बड़ी संख्या ४ से छोटी है ३ घटाया

१ रह! यह १ बड़ी संख्या ४ के स्थान में रहा । छोटी ३ पूर्वेवत्‌ रही । ९-१२ राशि

दोनों में ० होने से ० ही रहा है। १०-११ राशि में से ० होने से दोनों शून्य हो गये ।

चन्द्र में १-८ राशि में से १ में ० होने से दोनों में ० हो गया इसी प्रकार २-७

राशि में से १ में शून्य होने से दोनों में ० हो गया। ३-६ राशि दोनों अग्रह हैं एक

बड़ा एक छोटा है बड़ी २ में से १. घटाया १ रहा। बड़ी के स्थान में १ हो गया छोटी

'संख्या १ पूर्ववत्‌ रही । ९-१२ राशि में १ में ० होने से दोनों में ० हो गया इसी `

प्रकार १०-११ राशि में भी ० हो गया ।

मंगळ में १-८ राशि में ० होने से ० हो गया २-७, ३-६, ९-१२ राशि में भी

इसी प्रकार ० हो गया १०-११ राशि दोनों सग्रह हैं पूर्ववत्‌ १-१ ही रहा । बुध

और गुरु में एक में ० होने से सव में शून्य हो गया.। शुक्र में ९-१२ राशि मे १२

सग्रह राशि में एक छोटा अंक है बड़ा २ में छोटा १ घटाया १ बचा वह अग्रह २ के

स्थान में १ हो गया सग्रह एक पूर्ववत्‌ रहा । शनि में १-८ राशि में एक अग्रह, एक

सग्रह है दोनों का १-१ समान अंक है तो अग्रह० हो गया सग्रह १ वहीं रहा । ३-६

राशि दोनों अग्रह है समान अंक ३-३ हैं तो दोनों ० हो गये ९-१२ राशि में १२

राशि सग्रह छोटी, अग्रह बड़ी है । बड़ी २ से छोटी १ संख्या को घटाया तो १ बचा

वह अग्रह संख्या हुई । सग्रह १ पूर्ववत्‌ रही । २-७ राशि और १०-११ राशि में एक

स्थान में शून्य होने से दोनों ० हो गया ।

लग्न में १-८ राशिमें अग्रह २ छोटी सग्रह ४ बड़ी संख्या है तो अग्रह. २ का० हो

गया सग्रह ४ वसा ही रहा । शेष में एक स्थान में शून्य होने से सब स्थानों में शून्य

हो गया । इसमें ककं और सिंह राशि के अंकों को विना शोधन किए रख दिया है।

ऐकाधिपत्य शोधन के पश्चात्‌ बचे हुए अंक में राशि गुणक ओर ग्रह गुणक द्वारा

राशिपिड और ग्रहपिड बनाकर योगपिड बनाना पड़ता है । इसमें ककं व सिंह के भी

अंक लेना ऐका० शो० में जिनको नहीं लिया था:

राशि गुणक

राशि ।१।२।३।४।५।६।७।८।९।१०।११।१२

गुणक ।७।१०।८।४।१०।५।७।८।९।५।११।१२

प्रत्येक राशि को भिन्न-भिन्न बल प्राप्त होता है इसके लिए राशि गुणक द्वारा

जाना जाता है । किसी राशिकी ऐकाधिपत्य शोधन के पश्चात्‌ जो रेखा बच रहे उस

सख्या में उस राशिके गुणक का गुणा करना पड़ता है जिस में ० रेखा बची हों उसका

गुणनफल ० ही आयेगा । जसे मिथुन में सूरय का ऐ० शो० शेष ३ है मिथुन का गुणक

८.है । इससे ३ > ८-२४ आया । इसे उसके नीचे रखा । कन्या का ऐका० शो० १ है

अन्या का गुणक ५ हैं १% ५: ५ आया । वृश्चिक में ४ है गुणक वृश्चिक का ८ है

अष्टक वर्ग बिचार : १२१

४% ८=३२ उसके नीचे लिखा । इसी प्रकार सव अंकों में राशि के अनुसार राशि गुणक

का गुणा कर रखा है। ग्रह गुणक

ग्रह । सूर्य । चन्द्र मंगल । वुध । गुरु । शुक्र । शनि ।

गुणक । ५। ५। ८।५।१०। ७ | ५ ॥

जिस-जिस राशि में ग्रह हो उसके ऐका० शोधन की रेखा में जो-जो ग्रह हो उन-उन

का उस अंक में गुणा कर रखना यदि एक से अधिक ग्रह एक ही राशिमें हों तो प्रत्येक

ग्रह के गुणक से गुणा कर सवका योग वहां रखना । जहाँ रेखा न हो वहाँ ० रखना ।

जैसे राशि ५ में शनि है, १० में गुर, ११ में चन्द्र बुध १२ राशि में सूर्य शुक्र है इनके

नीचे ऐकाधिपत्य शोधन. अंक ० है इससे इन सब के नीचे शून्य रहा । केवल मंगल

वृश्चिक में है जिसकी ऐका० शो० के पश्चात्‌ ४ रेखा बची है । मंगल का गुणक ८ है

४> ८-३२ अंक ग्रह गुणक को वहां रख दिया । शुक्र का देखो मौन राशि में सूर्य

और शुक्र है ऐ का० शो० अंक १ बना था । सूर्य का गुणक ५ है १२ ५-५ । शुक्र

का गुणक ७ है १३ ७- ७, ५+ ७२१२ ग्रह गुणक मीन का शुक्र के अष्ट ० में आया

इसी प्रकार सबका समझ लेना ।

'राशिपिण्ड बनाना

प्रत्येक राशियों के गुणक दिये हैं। यदि किसी राशि में ऐकाधिपत्य शोधन के

पश्चात्‌ जो अंक बचा हो उस अंक में उस राशि का गुणा करना सम्पूर्ण राशियों में

इस प्रकार गुणा करने से जो अंक प्राप्त हो उन सब का योग करना वही राशिपिंड है।

जै>े मंगळ का लो, कर्के में एक का गुणक ४ है १५४४, सिंह में एक बचा है सिंह

का गुणक १० है १»८१०-१० । मकर में १ बचा है गुणक ५ है १३६ ५3५ कुंभ में

१ है कुंभ का गुणक ११ है १९११११ शेष में ० है । इन सब संख्या ४+ १०+*

--११ का योग किया=३० आया यही राशि पिंड हुआ । इसी प्रकार सबका राशि

पिंड बना लेना ।

ग्रहपिंड बनानां

प्रत्येक ग्रहों के गुणक दिये हैं जिन राशियों में प्रह हो और ऐकाधिपत्य शोधन का

अंक बचा हो उस अंक में उस ग्रह के गुणक से गुणा करना। उस राशि में जितने ग्रह

हों सबका पुथक-पृथक गुणा कर सबका योग रखना । पश्चात्‌ सम्पूर्ण राशियों के इस

प्रकार प्राप्त अंकों का योग कर रखना वही ग्रहपिड है । जैसे मंगल का लिया, सिंह

राशि में शनि है उसमें ऐका० शो० का बचा हुआ १ अंक है । शनि का गुणक ५ है।

१)(४८-५ मकर में गुरु है इसमें १ अंक है। गुरु गुणक १० है। १५१०-१० । कुंभ

में २ ग्रह चन्द्र और बुध है । कुंभ में १ अंक बचा हे । चन्द्र गुणक ५ है १२८ ५-५

बुध गुणक ५ है । १२ ५=५ हुआ । दोनों को जोड़ा ५१५९-1० आया । शेष राशियों

भै ऐ० शो० अंक ० है । अव सब का योग किया ५4 १०४।०=२५ यह सर्व योग २५

ग्रह पिंड हुआ । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों के ग्रह गुणक द्वारा ग्रहपिड बना लेना ।

१२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

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अष्टक वर्ग विचार : १२५

जातक पारिजात के मत से ऐकाधिपत्य शोधन करना त्रिकोण शोधन में कोई अन्तर नहीं है परन्तु ऐकाधिपत्य शोधन में कुछ अन्तर है । यहाँ ऐका० शो० के नियम फिर से दिये जाते हैं । (१) दोनों अग्रह समान अंक-दोनों के अंक लुप्त होंगे ०-० होगा । * (२) दोनों अग्रह अंक भिन्न हों-छोटी के बरावर बड़ी संख्या कर देना । (३) एक अग्रह दूसरा सग्रह-समान अंक=अग्रह ० होगा । सग्रह पूर्ववत्‌ । *$ (४) किसी में ० हो चाहे अग्रह या सग्रह हो परिवर्तन नहीं होगा । # (५) अग्रह बड़ा सग्रह छोटा-छोटी संख्या के बराबर दोनों में रहेगा । (६) सग्रह बड़ा अग्रह छोटा-सग्रहृ पूर्ववत्‌ रहेगा ।अग्रहलुप्त ० होगा । (७) दोंनों सग्रह में परिवर्तन नहीं होगा । + चिल्ल में पूर्व बताये नियम से अन्तर है । ऐकाधिपत्य शोधन चक्र स्वामी मंगल शुक्र बुध गुरु शनि, राशि १८ २७ ३६ ९ १२ १० ११ ग्रहृ . « में. 5३ लग्न, . सू. गु. चं.

शु. ES सूयं भ्रि०शो० १४ २० TEC

ऐका० शो० ०४ २० ३ ३ ० ० ० १

चन्द्र निण्गो७ ०३ ०१ ५१ ५ २ ० २ ० ऐ० शो० ०३ ०१ १ १ २ ० २ ०

मंगल त्रि शो० ०२ २० २० १ ० १ १ ऐका० शो० OR २6 ३१० सप ? १ बुधभिएगो० ०४ २० जज एका० शो० ०४ ०० ४ ० ० ० ० २

गुरु त्रि0 शो० ०१ ०२ १० ३ ० १ ० ऐका० शो० ०१ ०२ ee १० ३ ० १ ० _ >. गुक्न त्रि शो ४० ०५ २० २ १ 1 o ऐका० शो० ४० ०५ २ ० १ १ १ ० शनि त्रि शो० ११ ०३ ३ ३ २ १ ¥ ० ऐका० शो० ०० ०३ ० ० १ १ ४ ०

ल्नव्रिणिशोी २४ २० 10 पृ २ ल्ल °. ऐका० शो० ०४ २० १ ० ०--० २ ०