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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

आयुर्दाय विचार : २२५

=-चन्द्र से सप्तम सूर्य मंगल हो या चन्द्र से सप्तम सूर्यं और लग्न में मंगल हो

[ स० चि० ]। ९-राह लग्न या अष्टम में हो चन्द्र से दृष्ट हो [ मान० ] ।

११ दिन में मृत्यु १०-मकर या कुम्भ में गुरु अष्टम घर में हो पाप ग्रह की

दृष्टि लग्न पर हो [ जा० भ० ]। ११-छन में राह लग्न या सप्तम में सूर्य मंगल

के साथ हो ।

१६ दिन में मृत्यु १२-छूग्न में शनि हो पाप गृह से दुष्ड हो [ जा० भ० ] ।

८ दिन ८ मास या ८ वर्ष में मृत्यु १३- ६-८-१२-२ घर में शनि शत्र क्षेत्री

हो [ मान० ] ।

२० दिन में मृत्यु .१४-चतुर्थ में राह ६-८ घर में चन्द्र हो [ मान० ] ।

१ मास में मृत्यु १५- लग्न से १२ वें घर में चन्द्र अष्टम में पाप गृह हो

[मान०]॥ १६-छरन से नवम में सूर्य, अष्टम में शनि, ११ वें घर में शुक्र हो ।

१७-लग्न से ६-८ घर में चन्द्र, सप्तम सूर्य हो तो माता-पिता का घन नाश कर

एक माह तक जिये [ मान० ]। १८- दशम में सूर्य या मंगल शनुक्षेत्री हो तो

आयु १ मास [ मान० ]। १९-लग्न में सूर्य, सप्तम में चन्द्र, अष्टम में पाप ग्रह

हो [ मान० ]।

आयु १ मास-२०- लग्न में मंगल १२वें में गुरु, छठे घर में शुक्र हो

[ मान० ]। २१-लग्न में क्षीण चन्द्र कूर ग्रह से दृष्ट हो २ या १२ घर में मंगल

हो । २२-६-८ घर या केन्द्र में मंगल के घर का सूर्य शनि चन्द्र युक्त हो [प्रा०

यो०] । २३-लग्नेश पाप गृह यक्त अष्टम में हो [ प्रा० यो० ]। २४-६-८ भाव में

शुभ गृह पाप गृह से दुष्ट हो [जा० पारि०]। २४-अन्य मत ६-८ भाव में शुभ गृह

हो वक्री पाप गृह से दृष्ट हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ प्रा० यो० ] [ जा० भ० ] 1

२६-छग्न या नवम में सूर्य, सप्तम में शनि, ११ वें गुरु शुक्र हो [ वृ० पा० ]। २७-

अष्टमेश अष्टम में और चन्द्रमा पाप युक्त हो उस पर शुभ दृष्टि न हो [ वृ० पा० ]

२८-सव पाप गृह ६-८ भाव में हों [ जा० सं० ]। २९-गुरु नीच में हो या मंगल के

घर का हो और संधित्रय [१] लग्न संधि [२] नक्षत्र संधि [३] दशा संधि में जन्म हो

[ स० चि० ]। ३०-अष्टम में सूर्यं मंगल शनि हो [ स» चि० ]। ३१-लग्न से

६ घर में शनि मंगल १२ स्थान में वुध, लग्न में चन्द्रहो । ३२-छग्न से नवम सूर्य,

अष्टम शनि और ११ वं शुक्र हो [ ल० चं० ]। ३३-६-८ घर में बुध गुरु या शुक्र

हो जिस पर बलवान्‌ पाप गृह की दृष्टि हो | व्‌» आ ]। ३४-लग्नेश पाप युक्त व

पराजित गृह युद्ध में पाप गह्‌ से हारा हो | वृ० जा० | ३५-लग्न में शनि पाप ग्रह

युक्त हो [ ल० च० ] । ३६-६-८ घर में शुभ गृह से बली पाप ग्रह दृष्ट हो लग्नेश

सप्तम में हो और पाप गृह से पराजित हो [ जा० पारि० ] । ३७-६-८ घर में चन्द्र

हो कूर गृहों से दृष्ट हो [ ज्यो> शा» ]। ३८-लानेश सप्तम में हो और पाप गहों

से युद्ध में पराजित हो [ ज्यो» शा० ] 1

आयु २ मास--३९-जिसके लग्न में या जन्म नक्षत्र में कतु का उदय हो उस

Ef १५

१२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

खान या नक्षत्र में जन्म हो तो २ महीने में मृत्यु हो [ स० चि ]। लग्न में केतु हो

त्तो दो महीने में मृत्यु [ प्रा० यो० ] । केवल लग्न में केतु होने से मृत्यु नहीं होती

अष्टम में सूर्य मंगल शनि हो और लग्न में केतु हो तो २ मास में मृत्यु होगी । जिसका

जन्म धूम्र केतु तारे के उदय नक्षत्र में हो वह्‌ २ मास में मरता है [ जा० भ० ] ।

२ या ६ मास में नृत्यु--४०-आपोक्लिम [ ३-६-९-१२ ] भावों में सभी गृह

बलहीन हों तो २ या ६ मास में मृत्यु हो [ स० चि० ] [ वि० प्रा० ]।

२-६-१२ मास आयु--४१-लग्न से १२, २, ८, ६ स्थान में पाप गृह हों

शुभ गूहों से युक्त न हों तो २, ६ या १२ मास में मृत्यु हो ।

२॥ मास में मृत्यु --४२-चन्द्र के नवांश में सप्तमस्थ मंगल हो शुभ दृष्ट

रहित हो तो ७७ वें नक्षत्र २॥ मास में मृत्यु हो [ जा पारि० ]। ४३-शनि मंगल और सूर्य पंचम में हो ( जा० पारि० )

३ पक्ष या ३ मास में ४४-जिसका जन्म ग्रहण व परिवेश ( शीड़ल ) के समय

हो लग्न में पाप ग्रह हो लग्नेश बलहीन हो तो ३ पक्ष या ३ मास में मृत्यु हो

(स० चि० )

३ मास में मृत्यु ४५-नवम में सूर्य, सप्तम शनि. लाभ में गुरु शुक्र हो ।

४६-षष्ठ में चन्द्र तृतीय में शनि हो लग्न में शुभ ग्रह की राशि हो ।

४ मास आयु ४७-लग्नेश अष्टम में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो (जा० भ०) ४८- लग्नेश लग्न में सव पाप ग्रह अदृश्याद्ध १ से ३ भाव तक हों (स०चि०)

४९- लग्नेश मंगल लग्न में हो सव पाप ग्रहों से दृष्ट हो ( स० चि० ) । परन्तु मंगल स्वक्षेत्री उच्च या मूल त्रि० का हो तो आयु कुछ अधिक होगी ।

५ मास आयु ५०-छरन में शनि सूर्य शुक्र हो १२ वां गुरु हो ।

६ या ८ मास आयु ५१--पाप ग्रह २, १२ या ६, ८, या ८, ९ या ६, १२ भाव में हो तो ६ या ८ मास में मृत्यु हो । ( जा० भ० )। ८या १२ मास आयु ५२-६ या ८ भाव में चन्द्र पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो शीघ्र मृत्यु होती है यदि ८ भाव को शुभ ग्रह देखे तो ६ महीने या वषं भर में मृत्यु

हो ( ल० च० ) ॥ द

८ मास में मृत्यु ५३-लग्न में मंगल, चतुर्थ में राहु, वारहवें शनि हो [मान०] । ५४-पाप ग्रह युक्त लग्नेश जन्म राशि पति सहित सप्तम भाव में हो पाप ग्रह से दुष्ट हो [ जा० सं० ] । |

९ मास में मृत्यु ५५-छग्न में पाप युक्त शनि हो तो ९ मास में मत्यु हो। १ वष आयु- ५६- देया ८ घर में एक भी पाप ग्रह हो जिस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो १ वषं में मृत्यु हो [जा० भ०] । ५७-छग्न में शनि हो और पाप युक्त दृष्ट न हो [जा० भ०] तो १ वर्ष आयु । पाप युक्त दृष्ट से ९ मास आयु । ५८- अष्टम में चन्द्र चौथे में राहु केन्द्र में पाप ग्रह हो ( ल० चं० ) । ५९-एक भी पाप ग्रह अष्टम में हो पाप ग्रहों से दृष्ट हो शत्रु क्षेत्री हो (ल० चं)। ६०-६ या ८ घर

आयुर्दाय विचार : २२७

में मंगल सूर्य शनि हो (छ० चं०)। ६१-चन्द्र से केन्द्र में पाप ग्रह हों शुभ ग्रह न हों (स० चि०) । ६२-- अष्टम में सुर्य मंगल और शनि शत्रु क्षेत्री हों (मान०)। ६३- लग्न में चन्द्र हो विना शुभ योग के पाप ग्रह केन्द्र में हों (सवै चि०)। ६४- ग्न में वलवान्‌ सूर्य या चन्द्र हो पाप गृह अष्टम या केन्द्र या कोण में हो [ स० चि० ]। ६५-सूय्य चन्द्र शुक्र लग्न में हो पाप गूह अष्टम में या केन्द्र कोण में हो (स० चि० )। ६६-जन्म राशि से अष्टम में सूयं हो उस पर शुक्र की दृष्टि हो

( प्रा० यो० ) । ६७-शनि और मंगल लग्न में, तीसरे घर में राहु हो ( मान० ) ।

६८--छग्न से सप्तम में शनि, वारहूवें भाव में गुरु शुक्र और राहु एकत्र हो (मान०) ।

६९-- क्षीण चन्द्र पाप युक्त १, ५, ७, ८, ९ भाव में हो शुभ ग्रह सेदृष्टन हो

( प्रा० यो० ) ।

१ वर्ष आयु--७०-अदृश्य भाग में पाप गूह दृश्य भाग में शुभ गृह हो लग्न में राहु हो ( प्रा० यो ) 1

२ वर्ष आयु--७१-चन्द्र शनि युक्त हो सूर्य चन्द्र शुक्र केन्द्र में हों, शुभ गूहों से भी भावित कयो न हो २ वर्ष में मृत्यु हो (मान०) । ७२-वक्री शनि मंगळ के घर का होकर केन्द्र या छटे आठवें घर में हो बली मंगल उसे देखता हो (मान०) [स०चि०] । ७३-बुध चन्द्र केन्द्र में हो अस्तंगत हो उसे मंगल शनि देखते हों [ जा० भ० ] [प्रा० यो०]। ७४-६-८ के स्वामी केन्द्र में हों, वक्ती शनि मंगल के घर का हो और वलवान्‌ मंगल की दृष्टि हो [स० चि०]। ७५-वक्रो शनि मंगल के स्थान में

या केन्द्र या ६-८ घर में हो वली मंगळ में दृष्टि हो [ल० चं] ।

अन्यमत--वक्रो शनि मंगल के घर मेष या वृश्चिक का हो चन्द्र १, ४, ७, १० या ६-८ भाव में हो बलवान्‌ मंगळ की दृष्टि हो । ३ वर्ष आयु--७६-जग्नेशसे चन्द्रमा अष्टम हो कृष्ण पक्ष का जन्म हो सव पाप

गूह्‌ उस चन्द्र को देखते हों शुभ गृह की दृष्टि न हो तो ३ वर्ष में मृत्यु हो [स० चि०] ७७- गुरु लग्न से १२ वें घर या केन्द्र में पाप ग्रह युक्त हो लग्नेश ३-६-९ घर में कहीं हो [जा० भ०]। ७८-ककं लग्न में मंगळ और चन्द्रमा हों केन्द्र व अष्टम माव में कोई गृह न हो [जा० छ०]। ७९-गुरु अष्टम में मंगळ के घर का हो और सूर्य चन्द्र मंगल शनि की दृष्टि हो शुक्र की दृष्टि न हो [ स० चि० ] । मेष ओर कन्या "लग्न में ये योग संभव है । ८०--छश्न में शनि, सप्तम सूर्ये या अष्टम में मंगल हो

[स° चि०] । सूर्यं और मंगल तीसरे घर में होया पाप राशियो में हो जिन पर पाप दृष्टि हो तो बीमार रहे कठिनता से ३ वपं जिये [स० चि०]। ८२-मंगलू का घर

६-८ भाव या कहीं केन्द्र में हो उस पर शनि को दृष्टि हो ।

४ वर्षे आयु--८३-६-८ घर में चन्द्र शुभ और अशुभ ग्रह से दृष्ट हो [मान०]

[जा० सं०] । ५४-शन्रु क्षेत्री बध लग्न या ६ घर में हो [ मान० ] । ८५-शम्‌, क्षेत्री

बुध ६ या ८ घर में हो [मान०]। ८६-ककं का वुध ६-८ घर में हो उस पर चंद्र

की दृष्टि हो (जा० पारि०) । ८७-मंगळ केन्द्र में अस्तंगत हो शनि युक्त या दुष्ट हो

२२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

[स० चि०]। एउप्जछण्त से ६ या ८ घर में बुध हो क्रूर गृह से दृष्ट हो [छ० चं०]

८९--गंडांत में जन्म हो ६, ८, १२ भाव में पाप युक्त चंद्र हो उसे शुभ और पाप

ग्रह दोनों देखें [ स. चि. ]। ९०-लग्न में चन्द्र सप्तम राहु हां। ९१-१,६,८ भाव

में बुध हो । ५ वर्ष आयु--६२-लग्नेश अष्टम में अष्टमेश लग्न मे हो [जा० ल॑०] । ९३-

सूर्य चन्द्र बुध गुरु एक भाव में पड़े या चन्द्र मंगल शुक्र शनि एक भाव में पड़े या सूर्य

चन्द्र मंगल. शनि एक भाव में हो [ जा० म० ]। ९४-पूर्य चन्द्र मंगल गुरु या चन्द्र

मंगल गुरु शनि या सूर्य चन्द्र मंगल शनि एक भाव में एकत्र हो ( स० चि० ) ( जा०

पारि०) । ९५-राहु लग्न मे पाप गृह से युक्त या दृष्ट हो सव शुभ गृह दृश्य चक्र

में हों सब पाप गृह अदृश्य चक्र मे हों ( स० चि० )।

६ वर्ष आयु-९६-सिंह यां ककं का शुक्र, ६, २, १२ भाव में पाप दृष्ट हो शुभ

दृष्ट न हो ( जा० सं० ) । ९७-चंद्र के नवांश में शनि हो जिस पर चंद्र कीदृष्टि हो

और लग्नेश पर चंद्र की दृष्टि हो ( जा० पारि० )1'९८-ल्ग्नसे ६, ८ या २, १२

घर में शत्रु क्षेत्री सूर्य हो ( मान० ) । ९९-छग्न में सूर्य शनि, सप्तम में मंगल और

क्षीण चंद्र हो ( प्राण यो० ) |

६ या ८ वर्षे में मृत्यु-१००-मंग के क्षेत्र में गुरु हो ६, ८ घर में चन्द्र होतो

छठ या आठवें वर्ष मृत्यु हो ( मान० ) ।

७ वर्ष में मृत्यु १०१--छग्न और सप्तम में पाप ग्रह हो लग्नेश को पाप ग्रह

देखे चन्द्रमा लग्न में हो ( जा० सं० )। १०२--छग्न में पाश, पक्षी या श्ट खला

संज्ञक द्रेष्काण हो वह पाप ग्रह युक्त हो ( जा० सं० ) । १०३-छग्न में निगइ या

अहिघर पाश द्रेष्काण क्रूर ग्रह से युक्त हों और अपने स्वामी से दृष्ट न हो । द्रेष्काण

भुजग ककं का दूसरा, मीन का तीसरा, वृश्चिक का पहिला । पाश-वृष का पहिला,

मकर का पहिला दूसरा ! पक्षी-तुला का दूसरा, तीसरा, सिंह और कुंभ का पहिला ।

निगड़-मीन का तीसरा, वृश्चिक का पहिला, दूसरा । १०४- सूर्य, मंगल, शनि लग्न

में हों बलहीन हों चन्द्र या शुक्र के घर में हों गुरु की दृष्टि उन पर न हो (स०चिं०)

१०५-लग्न से सप्तम में पाप ग्रह हो (० चं० ) । १०६-छग्न में सूर्यं शनि मंगल

हो सप्तम में क्षीण चन्द्र हो गुरु की दृष्टि न हो(जा० भ०) । १०७- लग्न से सप्तम

भाव तक पाप ग्रह सप्तम से लग्न तक शुभ ग्रह हो लग्न में राहु हो ( जा० भ० ) |

१०८ ५, ११,८ राशि में राहु हो उसपर पाप ग्रह की दृष्टि हो ( जा० भ० ) ।

१०९- लग्नेश पाप युक्त केन्द्र में हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो और अष्टम स्थान में

पाप ग्रह हो।

६-७ वर्ष में मृत्यु ११०-लर्त में सूर्यं शनि मंगल क्षीण चन्द्र सप्तम में हो

( जा० भ० ) ।

७-८ वषं में मृत्यु १११- लग्न में सूये शनि मङ्गल हो वृष या तुला राशि का

चन्द्र सप्तम में हो गुरु की दृष्टि न हो तो ७ या ८ वर्ष में मृत्यु हो (जा० पारि०) ।

पाला -

आयुर्दाय विचार : २२९

६, ८ या १२ वर्ष में मृत्यु ११२- लग्नेश लग्न में हो शुभ युक्त हो और शनि और गुर से दृष्ट हो अष्टम में न हो । लग्न राशि संधि में हो तो ६, ८ या १२ वर्ष में मृत्यु हो । राशि संधि के अन्तिम ४ और पहिले के ४ में जन्म नहीं होना (स.चि.) । १ वर्ष से ८ वर्ष तक मृत्यु ११३- गुरु लग्न में हो युध ओर शुक्र मिथुन या तुला में हो पाष ग्रह से दृष्ट हो जो कि अष्टम स्थान में हो तो १ वर्ष से ८ वर्ष तक आयु होगी । ( स० चिं० ) । इसमें गोचर और दशा का भी बिचार कर जीवन का निश्चय करना । इस योग में पाठ यह भी है कि शुक्र मिथुन में और बुध तुला में हो । यहाँ जव शुक्र मिथुन में हो तो बुध तुला का नहीं हो सकता । ८ वर्ष आयु ११४- ६, ८ घर में शुभ ग्रह ५, ९ घर में पाप ग्रह हो और पाप ग्रहों से दुष्ट हो ( जा० भ० )। ११५- ६, ८ घर में चन्द्र हो शुभ ग्रहों की दृष्टि हो ( वृ० जा० ) । पाप दृष्टि हो तो शीघ्र मृत्यु होगी । ११६- चन्द्र बलहीन हो पाप ग्रह अष्टम में हो ( स० चिं० ) । ११७- वलहीन चन्द्र ६,८,१२ घर में हो । यदि वलहीन न हो परन्तु क्र ग्रह युक्त और शुभ ग्रह से दृष्ट हो ( स० चिं० ) । ११५० ३,७ राशि का गुरु लग्न में बुध या शुक्र युक्त पाप ग्रह से दृष्ट या अष्टम भाव में हो ( स० चिं० )। ३ वर्ष आयु या ८ वपं आयु ११९- लग्न में शनि, सप्तम सूर्य या अष्टम मंगल हो तो ३ वर्ष की आयु होती है परन्तु ऐसे योग में चन्द्र पर पाप दृष्टि न हो, राहु पर भी पाप दृष्टि न हो तो ८ वर्ष में मृत्यु हो ( सर्व चिं )। १२०- लग्नेश लग्न में कूर ग्रह युक्त, शनि से दृष्ट हो ( स० चि० ) यदि वहाँ गुरु हो तो यह फल नहीं होगा । १२१- गंडांत ( राशि संधि ) में जन्म हो ६, ८, १२ भाव में पापयुक्त चन्द्र हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो ( स० चि० ) । १२२- ६,८ घर में चन्द्र हो, मंगल के घर में गुरु हो। ९ वर्ष आयु १२३- लग्नेश पाप गृही हो वह चन्द्र से १२ वें घर में हो उस पर दूसरे पाप ग्रह की दृष्टि हो या चन्द्र के नवांश में हो ( स० चि० )। इस योग में उच्चता और दूसरी प्रकार की अच्छी स्थिति पर भी ध्यान रखना । ग्रहों की अच्छी

स्थिति से संकट होगा परन्तु मृत्यु नहीं होगी । यहाँ लग्नेश पाप ग्रह के घर में होकर छर्न में हो और चन्द्र से १२ वें घर में हो या लग्नेश किसी भी राशि में चन्द्रमा के नवांश में हो। १२४-सूर्य, शनि और शुक्र पापयुक्त हो और गुरु की दृष्टि न हो । ( जा० भ० ) । १२५-लग्न में अष्टमेश हो जिस पर शनि की दृष्टि हो, चन्द्र सप्तम में हो ( जा० भ० ) । १२६-सूर्य चन्द्र मंगल पञ्चम में हों ( जा० पारि० ) । १२७- लग्नेश से क्षीण चन्द्र अष्टम में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो ( स० चिं० ) । १२८-सूर्य और चन्द्र से शनि युक्त हो ( जा० भ० ) । १२९-सूय चन्द्र मंगल ये पञ्चम में बुध की राशि में हों (जा० भ० ) | १३०-छग्नेश पाप ग्रह चन्द्र से १२ वें भाव में पाप दृष्ट हो या ऐसे योगों में चन्द्र राशीश पापांशक में हो ( स० चिं० ) । १० वर्ष आय्‌, १३१-शनि मकर के नवांश में हो बुध से दृष्ट हो तो उसके

२३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शत्रु अधिक हों १० वर्ष में मृत्य, हो ( जा० पारि० ) । १३२-चतुर्थ में राहु ६,८

भाव या केन्द्र में चन्द्र हो । १३३-सप्तम में राहु हो ( मान० )1

१०-१२ वर्ष में मृत्य, १३४-राहु सप्तम हो सूयं ओर चन्द्र की दृष्टि हो णुभ

गृह की दृष्टि न हो ( स० चिं० ) ।

१०-१२ यो १६ वर्ष आय्‌, १३४-पाप गूहों से दृष्ट राहु केन्द्र मे हो (ल०चं०) ।

राहु अन्य केन्द्र मे इतना अनिष्ट नहीं करेगा जितना कि लग्न और दशम मे. अनिष्ट

कारक है ।

११ वर्षे आय्‌, १३६-वुध सूयं के साथ हो शुभ दृष्ट हो ( जा० पारि० ) ।

१३७-शुभ दृष्ट भी बुध सूर्या चंद्र से यू क्त हो ( जा. सं.) । १३८-लग्न मे शनि

हो बुध सूयः चंद्र से युक्त हो पाप गृह की दृष्टि हो ( प्रा. यो. )। १३९-केन्द्र भाव

पाप गृह से युक्त हो शनि गुरु परस्पर एक दूसरे के स्थान मे हों अर्थात्‌ शनि की राशि

में गुरु और गुरु की राशि में शनि हो (जा० सं०)। १४०-शनिके घर का गुरु अष्टम

में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो ( प्रा० यो० ) । १४१-सूयं बुध साथ हो शुभ ग्रह से दृष्ट

न हो (स० चि) । १४२-सूय चन्द्रमा युक्त बुध हो पाप ग्रह से दृष्ट हो (जा० भ) ।

१२ वर्ष आय्‌, १४३-मंगल के घर में गुरु हो गुरुके घर में मंगल हो (मान०) ।

१४४- राहु लग्न से अष्टम में हो शुभ दृष्ट हो, शनि और सूय से दृष्ट हो (मान०) ।

१४५-शनि के घर में सूर्य, सूर्य के घर में शनि हो (मान०)। १४६-सिह में चन्द्र हो

सूय शनि युक्त अष्टम में हो शुक्र से दृष्ट हो (जा. पारि.) । १४७-शनि वृश्चिक के

नवांश में हो सूय से दुष्ट हो तो पिता से बैर करे १२ वर्ष में मृत्यु हो (जा. पारि) ।

१४८-सप्तम में राहुहो उसे शनि ओर सूर्य देखते हों शुभ ग्रह की दृष्टि न हो (प्रा.यो.)

(जा. भ.) । १४९-दशम मे राहु हो तो माता-पिता को पीड़ा देवे १२ वर्ष जीवे

(लू. चं) । १५०-सप्तम मे राहु सूय चन्द्र से दृष्ट हो शुभ गृह से दृष्ट न हो ( स.

चि.) । १५१-चन्द्र राशीश सूय शनि से युक्त अष्टम में हो (स. चि.) । १५२-

लग्नेश तथा जन्म राशीश लग्न से ६,८,१२ भाव में सूय य्‌क्त हो शुभ गृह युब॒त

या दृष्ट न हो (स. चि) । १५३- लग्न में मंगल अष्टम में गुरु हो ।

१३ वर्षो की आय्‌, १५४-तुला के नवांश में शनि हो गुरु की दृष्टि हो माता-

पिता का वैरी हो मृत्यु १३ वर्ष में हो ( जा. पारि. ) ।

१४ वर्षो आय्‌, १५५-कन्या के नवांश में शनि हो बुध से दुष्ट हो जातक क्रोधी

होकर १४ वष मे मरे (जा. पारि. ) ।

१४ वर्षो आय्‌ १५६-सिंह के नवांश में शनि हो राहु से दृष्ट हो तो शस्त्र से

घाव लगे १५ वष मे मृत्यु, (जा. पारि. ) हो ।

१६ वर्ण आय्‌, १५७-ककं के नवांश मे शनि हो गुरु से दृष्ट हो तो सपे भय हो

और १६ वर्ष मे मृत्य, हो (जा.पारि.) । १५८- लग्न से सप्तम में या नवम मे शत्रु

क्षत्री राहु हो (मान.) । १५९-लग्न से सप्तम मे' शत्रु क्षेत्री राहु हो ( छ. चं. ) ।

आयुर्दाय विचार : २३१

बिलिम

१६०-चन्द्र राशीश सूयः पाप यू क्त ६-८ घर में शुभ दृष्टि रहित हो लग्नेश आपो- ( ३-६-९ १२ घर ) में हो ( स. चि. )1

न १७ वर्ष आय्‌, १६१-५, ८ या ११ राशि के लग्न मे राहु हो गुरु यक्त या दृष्ट हो. पाप गूह से दृष्ट हो (स. चि.) । १६२-मिथुन लग्न के नवांश में शनि होः लग्नेश से दृष्ट हो वह ऐश्वय वान्‌ और रण शूर हो १७ वषं जिये ( जा. पारि, ) । १८ वषं आय्‌, १६३-लग्नेश अष्टम में अष्टमेश लग्न मे हो शुम योग रहित हो. या लग्नेश अष्टमेश ६,१२ घर में पंचमेश युक्‍त हो (स. चि.) । १६४-लग्नेण अष्टमेश परस्पर एक दूसरे के घर मों हो जिन पर कोई शुभ योग या दृष्टि न हो यो ये लग्नेश और अष्टमेश ६,१२ घर में हो गुरु युक्त न हो (स. चि. ) लग्नेश और अष्टमेश यदि अच्छी स्थिति मे हो तो आय्‌ बढ़ती है खराब स्थिति में हो तो आयु घटती है।

भाव

१६५-छगनेश अष्टमेण दोनों पाप गूढ परस्पर एक दूसरे के घर मे' हों या १२या ६ मे हो गुरु यूक्त न हो (जा. पारि. ) । १९ वर्ष मृत्यु (१६६) गुरु के नवांश में शनि हो राह से दृष्ट हो ओर लग्नेश पर शुभ दृष्टि न हो तो वह जन्मते ही मरे यदि लग्नेश उच्च का हो तो १९ वर्ष आय्‌ हो । १६७-सूयः अष्टम में हो चन्द्र शनि दोनों साथ किसी घर में हों। शुभ योग दृष्टि से बुरा प्रभाव घटेगा (स.चि)1

हो

२० वष' आय्‌ १६८-क्षीण चन्द्र हो कोई कूर गृह अष्टम मे हो, अष्टमेश केन्द्र में लग्नेश निर्वल हो [ जा. छ, 11 १६९- शुभ गृह ३, ६, ९, १२ घर में शनि व चंद्र दोनों ६-८ घर में हो [जा. ल॑.] । १७०-चन्द्रमा या राहु इन दोनों को छोड़

दोनों केन्द्र में हों मंगळ लग्न मे हो [ जा. लं. ] । १७२-लग्न में शुभ गृह यक्त लग्नेश हो अष्टमेश अष्टम में हो परन्तु कोई गृह उसे न देखता हो [ जा. लं. Ji १७३-केनद्र में पाप गूह हो, चंद्र या शुम गृह की दृष्टि होया ८ या १० भाव में चन्द्र हो [जा. पारि] । १७४-केन्द्र में पाप गृह हो, चन्द्र या दूसरे गूह की दृष्टि न हो और चन्द्र ६,८,१२ स्थान में हो [ स. चि. ]। १७५-लग्न में मंगल और सूय हो गुरु दशम मे चर राशि का हो चन्द्र ५ या ९ घर मे हो । १७६-क्षीण चन्द्र लग्नेश से अष्टम मे शुभ ग्रह की दृष्टि न हो पाप ग्रहों की दृष्टि हो [जा० पारि०]। १७७ चतुर्थ मे राहु केन्द्र मे चंद्र हो [मान० 11 १७८-स्थानादि वर्गों से परिपूर्ण वळी शुभ गृह केन्द्रों मे हो और लग्न से अग्टम मे कोई ग्रह न होवे (मान०) । २१ वर्ष आय्‌, १७९-गुरु मित्र क्षेत्री लग्न से १० या ११ घर मे, शुक्र शत्रु क्षेत्री २ या १२ घर मे हो (मान०) । १८०-पष्ठ मेः शुक्र हो तो २१ वर्ष मे शस्त्र से मृत्यु हो (जा. सं )। १८१-छरन मे पापे गही सूर्या पाप ग्रहों के मध्य मे हों । १८२- जन्म संध्या मे हों लग्नेश पाप युक्त ३,६,९,१२ घर मे हो और गुरु शुक्र केन्द्र मे हों।

३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२२ वर्ष आय्‌ १८३-लग्न मे कर्क का गुरु और सूय हो अष्टमेश केन्द्र मे हो

(जः. पारि,) । १८४- लग्न से गुरु पापग्रह यक्त और चन्द्र दृष्ट हो, लग्न से अष्टम

मे अन्य ग्रह हो (जा; रं )। १८५-लग्तेश अष्टमेश केन्द्र मे हो या अष्टम

मे' कोई ग्रह हो और केन्द्रों मे शुभ ग्रहं न होवे पाप ग्रह होवे ( स० चि० )1

१८६-छस्न में कीट राशि (वृश्चिक) में सुर्य गूरु हो अष्टमेश केन्द्रमे हो (त.चि.) ।

इस योग में' वृश्चिक लग्न मे सूरय दशमेश और गुरु २, ५ घर का स्वामी होता है

अष्टमेंण बुध होता है वह लग्न के सिवाय और किसी केन्द्र मे रहना असम्भव है ।

जब लग्न मे सूय है, बुध और गरु लग्न मे' वलवान्‌ हो जाते हैं इससे अधिक

शुभता आ जाती है इससे इस योग मे कुछ शंका होती है। १८७--गुरु लग्न मे

हो राहु युक्त चन्द्र सप्तम या अष्टम मेहो (स. चि.) । यहाँ चन्द्र राहु अष्टम मे

हो तो योग ठीक जंचता है, परन्तु सप्तम में शंका उत्पन्न करता है । क्योकि सप्तम ,

मे राहु है तो लग्न मे केतु गुरु के साथ हुआ । गुरु चंद्र केन्द्र मे होने से गजकेशरी

योग हो जाता है जो दीर्घ जीवन देता है । १८८-छग्न मे' त्रिशांश पति हो [मान.] ।

२४ वर्ष आयु १५९- लग्नेश अष्टम में पाप युक्त या दृष्ट हो शुभ दृष्ट न हो,

अष्टमेश द्वितीयेश और नवमेश से युक्त हो ( स० चि०) १ ९०-लग्नेश अष्टम में पाप

ग्रह युक्त हो अष्टमेश नवम भाव या लग्न में हो ( जा० लं० ) । १९१-लग्नेश अष्टम

में पाप युक्त या दृष्ट हो उक पर शुभ गृह की दृष्टि भी हो, अष्टमेश ९, २, १, भाव

में से कहीं हो ( स० चि० ) ।

२५ वर्षं आयु १९२- शनि द्विस्वभाव राशि का लग्न में हो, ५, १२ भाव के

स्वामी बलहीन हों ( जा० लं० ) । १९३-छगनेश दो पाप गूहों के वीच शुभ ग्रह रहित

हो ओर पिता के जन्म लग्न में जन्म हो ( स० चि० ) ।

२६-२७ वर्ष आयु १९४-म्त में शनि शत्रुक्षेत्री हो शुभ गृह आपोक्लिम ( ३, ६,

९, १२ )--में हों ( जा० पारि० ) । शनि का कट्टर शनु मंगल और सूर्य है । चन्द्र

भी शत्रु है परन्तु उतना कट्टर शत्रु नहीं है । क्योंकि चन्द्र का शनि सम है।

२७ वर्ष आ० १९५--हग्नेश और अष्टमेश अष्टम में पाप युक्त हो शुभ युक्त न

हों ( स० चि० ) । १९६--गुरु स्व स्थानी या स्व द्रेष्काण में हो ( जा० लं० ) ।

२७ या ३० वर्ष आ० १९७--छग्नेश और अष्टमेश के वीच चन्द्रहो और गुर १२

चें हों ( स० चि० ) । यहाँ चंद्र के एक ओर लग्नेश दूसरी ओर अष्टमेश होगा ।

२८वर्षे आ० १९८-अष्टमेश पाप गृह हो अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि हो जन्म राशि

अष्टम में हो जो पाप गूहों से दृष्ट हो ( जा० पारि० ) । १ ९९-अब्टमेश पाप गृह

हो पाप गुदर से दुष्ट हो या लग्नेश अष्टम में हो अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि हो

( स० चि० ) | २००--पाप गृह १,७, = भाव में, शुभ गृह केन्द्र के वाहर हों [ स०

चि० ] ¡ २०१-कस्न से या चन्द्र से अष्टम भाव का स्वामी केन्द्र में या व्यय भाव में

हो [ जा० ल० ] । २०२-पाप गूह १, २, ८ भाव में, शुभ प्र ह पणफर ओर आपो-

क्लिम मे हों अर्थात केन्द्र के बाहर हों [ स० चि० | ।

आयुर्दाय विचार : २३३

२९ वर्ष आयु २०३-चन्द्रमा का शनि से स्थान या दृष्टि से सम्बन्ध होकर अप्टम में हो सूर्य भी अष्टम में हो [ जा० पारि० ] 1 ३० वर्ष आयू २०४-ल्ग्न से १२वें भाव में बुध युक्त चंद्र हो अष्टमेश किसी केन्द्र में निर्वल शुभ गूहों से युक्त या दुष्ट हो [ स. चिं ]। २०५-लग्नेश व अध्टमेश दोनों वलहीन होकर केन्द्र में हों [ जा. ल. ]। २०६--सब शुभ गूह शुभ ग्रहों के नवांश में हों [ जा. ल. ] । २०७-केन्द्र में कोई शुभ गृह न हो अष्टम में कोई एक ग्रह हो [ जा. लं. ] । २०८-बल युक्त शुभ गृह केन्द्र म हों अष्टम में कोई ग्रह न हो [ जा. भ. ] । २०९-बुध वली होकर केन्द्र में हो अष्टम में ग्रह न हो [ जा. ल॑" ]। २१०-गुर यदि सूर्य चन्द्र से और चन्द्र शनि मंगल से दृष्ट हो शुक्र से दुष्ट न हो अष्टम में मंगल का घर हो [ ल. चं. | । २११-केन्द्र में शुभ ग्रह हो अष्टम में कोई भी ग्रह न हो व शुभ गूह की दृष्टि हो [ प्रा. यो. ]। २१२-स्थान आदि बल से परिपूर्ण बली शुभ गुह चारों केन्द्र में हो अष्टम में कोई गृह न हो । केन्द्र गत ग्रह पर शुभ दृष्टि हो [ मान. ] ।

३१ वषं आयु २१३-सूर्यं लग्न में २ पाप ग्रहों के बीच हो [ जा. लं. ]

३० या ४२ वर्ष आयु २१५-अष्टमेश केन्द्र में हो लग्नेण बलहीन हो [वृ. पा] । २१६-ऊग्नेश और अष्ठमेश में से कोई अष्टम में हो दूसरा बलहीन हो [ स. चिं ]। २१७-लग्न में वली पाप गृह हो शुभ गूह पणफर और आपोक्लिम में हो, अष्टमेश के नवांश में शनि हो [ स. चि. ]। २१८-पाप ग्रह एक दूसरे के घर में हो लग्नेश पर पाप दृष्टि हो निवळ चन्द्र १२ वें भाव में हो [ स. चि. ]। २१९-पाप गृह एक दूसरे के राशि गत होकर लग्न मे हो-और चन्द्रमा १२ वाँ हो [ स. चिं. ]। २२०- चंद्र और लग्नेश आपोक्लिम में हो और अष्टमेश पापयुक्त ओर बलहीन हो [स. चि] २२ और ३२ वर्ष आयु २२३-छग्नेश और अष्टमेश के वीच चन्द्र हो । गुरु लग्न से १२ वें हो तो २२ ओर ३२ वर्ष के भीतर मृत्यु हो [ स. चि. ]। 2 ३२ वर्ष आयु २२२-लग्नेश और चन्द्रमा आपोक्लिम में हो, चन्द्रमा निर्बल हो

कर ग्रहों से दृष्ट हो [ जा. ल॑. ] । २२१-छग्न निवंछ हो और पाप युक्त हो, क्षीण चद्र पाप युक्त हो अष्टमेश केन्द्र या अष्टम में हो ( जा. पारि. ) । २२४-हीन वळी ग्रह पाप युक्त लग्न में हो, क्षीण चंद्र सूय युक्त हो, अष्टमेश केन्द्र में पाप ग्रह अष्टम भाव में हो ( स. चि. ) । २२५-ऊग्नेश और अष्टमेश केन्द्र में हो कोई गृह अष्टम में हो और शुभ ग्रह केन्द्र में हो ( स. चि. ) । २२६-सू्य चंद्रयुक्त केन्द्र में हो अष्टमेश केन्द्र में हो, पाप ग्रह अष्टम में हों, लग्न में कोई ग्रह न हो ( स. चि. ) । २२७-अष्ट

मेश लग्न में हो लग्नेश वलहीन हो ( स. चि. ) ।

३३ वर्ष आयु २२८-चन्द्रमः, मंगल की राशि का लग्न में हो पाप ग्रहों से दृष्ट हो शुभ ग्रह केन्द्र में हो ( स. चि. )। मङ्गल की राशि लग्न में हो उसमें चंद्रमा हो अभ्य मत है कि पाप गूह ओर शुभ ग्रह केन्द्र के बाहर हो। ८२९-चन्द्रमा और अष्टमेश पाप युक्त होकर केन्द्र या कोण में हो दशम भाव स्थित पाप गृह की दृष्टि हो

२३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( स. चि. )। २३०-शनि और चन्द्र लग्न में हो मङ्गल कुम्भ का हो (स. चि. |।

३६ वर्ष आयु २३१-गुरु और शुक्र केन्द्र में हो लग्नेश पाप युक्त होकर आपो- बिलम में हो संध्या का जन्म हो (स. चि.) । २३२-बलहीन सूर्य दो पाप गूहों के

बीच शत्रु राशि में होकर लग्न में हो शुभ गृह से दुष्ट न हो (स. चि. ) । २३३

लग्न में चन्द्र और मङ्गल हो । केन्द्र और अष्टम में शुभ गृह न हो लग्न में मान्दि

हो (सः चिं. ) ।

३७ वर्ष आयु २३४-षण्ठ भाव में बुध हो ( जा. सं )। २३५-ऊग्न में सूर्य २

पाप गूहों के बीच हो लग्न से अष्टम में मिथुन का गुरु हो (स. चि.) । २३६-

मिथुन में लग्नेश हो, गुरु चतुर्थ में पाप गूहों के बीच हो (स. चि. )।

४० वर्ष आय्‌, २३७-बली बुध केन्द्र में हो लग्न से अष्टम स्थान शुभ गृह से

दृष्ट हो ( जा. ळं. ) । २३८-अष्टमेश लग्न मों हो अष्टम स्थान में कोई शुभ गूह न

हो ( जा. छं. ) । २३९-८ और १२ भाव में कूर गूह मध्य में क्रूर गृह ओर शुभ गृह

दोनों हों तो राजयोग होता है आय्‌, ४० वर्ष ( ल. च. ) । ९४०--वळी शुभ गूह केन्द्र में हो अष्टम में कोई गूह न हो तो ३० वषे आय, होती है शुभ गूह देखते हों तो ४० वर्ष की आय्‌, हो ( जा. भ. ) । २४१--गुरु त्रिकोण में एवं स्वगृही हो

( मान. ) ।

४२ वषं आय्‌, २४२--अष्टमेश लग्न में हो मंगल भी लग्न में हो या ८,१२ घर

में स्थिर राशि में हो ( स. चिं. )।

४४ वषं आय्‌, २४३--छग्न चर राशि में हो गुरु केन्द्र में शनि दशम में हो (स.

चिं.) । २४४--सूयं और शनि मकर राशि में छन्न से ३ या ६ घर में हो अष्टमेश

केन्द्र में हो ( जा. ल॑. ) । २४५--उच्च का मंगल लग्न में, गुरु सप्तम, शनि दशम

में हो तो धनवान व शास्त्रो हो । आय, ४४ वषं हो ( स. चिं. )। २४६--लग्नेश

पाप यक्त अष्टम में हो शुभ गृह केन्द्र में हो (स. चिं )।

४५ वषं आय्‌, २४७--छग्नेश पाप यक्त अष्टम भाव में, अष्टमेश पाप यक्त

छठे भाव में हो दोनों बलवान्‌ हों, शुभ दृष्टि रहित हों ( स. चिं. ) । २४८--चन्द्र

राशि का स्वामी लग्न से अष्टम में पाप यक्त हो और लग्नेश पाप यक्त षष्ठ में हो

दोनों बहीन हों शुभ दृष्टि रहित हों ( स. चिं. ) ।

आय्‌, ४८ वर्ष २४९--मकर लग्न में मंगल हो, दशम में तुला मों शनि और

गुरु हो तो वह धनी और कई विद्या का ज्ञाता हो ४८ वर्ष आय्‌ पावे [ स. चिं ]।

२५०--मेष लग्न में पूर्ण चंद्र हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो वह स्वामी या राजा हो ऐसे

चंद्र पर यदि पाप दृष्टि हो तो ४८ वर्ष आय्‌, हो [ स. चिं. ] ।

आय ५० वषं २५१--लग्न से ४ या १० घर में बुध हो १, ८, १२ घर में चंद्र

हो और गुरु शुक्र एक साथ हों । $

५२ वर्षे आय्‌, २५२--लग्न में शनि दूसरे गूहों से य्‌वत हो और चंद्र ८ या

१२ घर में हो तो वेदान्ती ओर घामिक होगा आय्‌, ५२ वषं की होगी [ स. चिं. | ।

आयुर्दाय विचार : २३५

२१३--दिस्वभाव ललल में शनि हो चंद्र ८ या १२ घर में हो। ५५ वषं आयु २५४--कर्क या सूर्यं छथ्न में हो, पाप युक्त चन्द्र दशम में हो गुरु केन्द्र में हो [ जा. लं. ]।

५७ वर्ष आयु २५५--लग्नेश धन में गुरु यक्त हो, अष्टम में राहु या केतु हो [ स. चिं. ] । २५६--धन का गुरु लग्न में, अष्टम में मंगल राहु हो[स. चिं. ]। ५८ वषं आय्‌, २५७--अष्टमेश सप्तम में चन्द्रमा पाप यूक्त ६, ८ भाव पें हो [ स. चिं. ]। २५८--लग्नेश युक्त चन्द्र ६, ८, १२ भाव में हो लग्नेश शनि के नवांश में हो [ जा. लं. ]। २५९--छग्न से ३, ५, ९, ११ भाव में कहीं गुरु शत्रु ` क्षेत्री हो [ मान. ]।

६० वर्ष आय्‌ २६०--लग्न में गुरु और तृतीयेश हो किसी केन्द्र में कुंभ राशि हो जिसमें पाप ग्रह हो वह ब्रह्म ज्ञानी, योगी ओर सुखी होकर ६० वर्ष आय पावे [ स. चिं, || २६१--लग्नेश बारहवें हों अष्टमेश लग्न में हो अष्टम में पाप गृह हो तो वह नीच हो अपमान से अपने कुटुम्ब के आश्रित रहे आय्‌, ६० वर्ष हो [सःचिं.] । २६२--दशम में शुक्र हो बुध गुरु ओर चंद्र से दृष्ट हो गुरु पञ्चम में हो वह धनी होकर राजा होगा आय्‌, ६० वर्ष होगी [ स्वं चिं. ]॥ २६३--लग्न में शनि, चौथे चंद्र, सप्तम मंगल, दशम सूय' हो बुध गुरु शुक्र में से कोई केन्द्र में हो तो वह स्वामी या राजा हो आय्‌ ६० वर्ष हो [ स. चिं, ] । ६० वर्ष आय्‌, २६४--लग्न में शुक्र, केन्द्र में बुध शनि, और ३ , ११ भाव में शेष गृह हों वह स्वामी होकर ६० वर्षा जिये [ स. चिं. ] । २६५--छग्न से चतुर्थ में कोई गृह हो, गुरु और शुक्र केन्द्रों में हों या लग्न में हों तो अच्छा स्वभाव हो आय, ६० वर्ष हो [ स. चिं. ]। २६६--बुघ गुरु शुक्र यो शुभ गूह केन्द्र में हों चन्द्रमा उच्च का हो लग्नेश बली होकर लग्न में हो [ जा. ल॑. ] । २३७--च द्र स्वस्थान या लग्न में हो सप्तम में शुभ प्रह हो [ जा. ळं. ] । २६८--वृष का चंद्र लग्न मे हो और शुभ गृह स्वस्थानी हों [ जा. ल॑. ] २६९--पाप ग्रह युक्त लग्नेश त्रिक मे' हो शुभ ग्रह अष्टम स्थान छोड़कर ओर कहीं हों [ जा. लं. ] । २७०--लग्नेश व जन्म राशीश दोनों सूयं से युक्त लग्न के अष्टम स्थान मे' हों और गुरु केन्द्र मे न हो [ जा. लं ]।

६४ वष आय्‌ २७१--दिन मे' जन्म हो चंद्र से अष्टम भाव मे पाप ग्रह हो तो मध्याय्‌, ६४ वर्षा की हो [ जा. लं. ] । ६५ वर्ष आय्‌, २७२--चंद्रमा ककं का लग्न मे हो, नीच का शनि सप्तम सूया हो तो श्रेष्ठ ज्ञानी हो ६५ वषः आय्‌ हो [ स. चिं. ] । २७३-शनि नीच का होकर केन्द्र या कोण मे हो या सूय शुभ ग्रह युक्त केन्द्र मे हो तो वह समझदार अगुवा हो आय्‌, ६५ वर्ष हो [ स, चिं. ]।

६६वर्ष आ. २७४--लग्नेश और चंद्र राशीश अष्टम मे हों अष्टमेश केन्द्र मे हो वह मान और घन यक्त मनुष्यों का नेता हो, आय्‌ ६६ वष की हो [सःचिं]।

२३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२७४--लग्न मे गुरु सूय और बुध हो, चंद्र १२ वें हो, शनि मीन का हो तो धनी,

शास्त्र मे निपुण होकर ६६ वर्ष जीयो [ स. चि. ] । २७६--लग्न मे उच्च का चंद्र

हो शनि नीच का होरवि सप्तम हो तो धनवान होकर ६६ वर्षा जोये [ स. चिं. ]।

६० या ६६ वर्षा आय्‌, २७७-- लग्नेश तथा तत्काल होरेश अष्टम में हो तो

कीति और धनय्‌ क्त राजा हो, आय्‌, ६६ वर्ष हो । नंदोक्त मत से ६० वर्ष आय, हो

[ स. चिं. |।

६८ वर्ष आय्‌, २७८--सूया और चंद्र दशम में, शनि लग्न म॑, गुरु चतुर्थ मे

हो तो राजा हो ६८ वर्ष आय्‌ हो [ स. चिं. ] ।

७० बषः आय्‌, २७९--मंगछ पंचम मे, शनि नीच का, सूयं सप्तम हो [ स.

चिं. ]। २८०-केवल गुरु लग्नेश से केन्द्र में हो [ स. चिं. ] । २८१- गुरु केन्द्र

में हो, चन्द्र लग्न में हो या अपने अंश मे हो या मीन या ककं राशि का हो अष्टम घर

खाली हो ( स. चि. ) । २०२-- बहुत वली शुभ ग्रह केन्द्र मे. हो अष्टम में कोई शुभ

ग्रह न हो उस पर लग्नेश की दृष्टि हो ( स. चि. ) । २८३-छग्न या चन्द्र दोनों क्रूर

ग्रहों के योग या दृष्टि से रहित हो, लग्न में गुरु हो, केन्द्र में शुभग्रह हो अष्टम भाव

में काई ग्रह न हो । ( जा. लं. ) । २८४--लग्न में सूर्य अपने शत्रु या मङ्गल युक्त हो

गुरु बलहीन हो चन्द्रमा लग्न से १२ वें या ५ वे स्थान मों हो। २८५--लग्न म गुरु

और ३, ६, ११ घर में पाप ग्रह हो लग्नवर्ती गुरु पर पाप ग्रह की दृष्टि न हो । शुभ

ग्रह केन्द्र में हों अष्टम में कोई ग्रह न हो ( जा. भ. )। २८६--नीच का शनि केन्द्र

या त्रिकोण में, शुभ ग्रह केन्द्र में या सूयं और बुध केन्द्र में हो तो ज्ञानी, धमं पीड़ित

होकर ७० वर्ष जिये ( स. चि. ) । २८७-लग्न में गुरु नवम घर में चन्द्र हो उस

पर पाप गृहो की दृष्टि न हो,सब गृह केन्द्र में हों अष्टम में कोई गृह न हो (मान.) ।

२८८--यदि केन्द्र में सूय मङ्गल और शनि व षष्ठेश हो और ८ या १२ भाव में गुरु

और चन्द्रन हो वह विद्वान्‌ मानी ज्ञानी योग्य तत्पर होकर ७० वर्ष जियेगा (स. च.) ।

७० वर्ष से ऊपर दीर्घायु २८०९-शुभाशुभ सभी गृह लग्न से ६ भाव तक होया

सप्तम से व्यय तक होवें तो दीर्घायु ७० से ऊपर हो। यदि अन्य प्रकार होंतो

विपरीत फल ( स. चि. ) ।

७२ वर्ष आयु २९०-शुभ गृह लग्न या चन्द्र से केन्द्र में हों लग्न के दशवे स्थान

में स्थित क्रूर गृहो से युक्त या दृष्ट न हो ( जा. छ. ) ।

७३ वर्ष आयु २९१--चन्द्र शुभ गृहों के षडवरं में हो, सव शुभ गूह बली हों

लग्नेश को कूर गूह देखते हों ( जा. ल. ) ।

८४ वर्ष की आयु २९२--सब शुभ गृह बलवान होकर लग्न से पहिले घर में हों

और सब पाप गृह आगे के ६घरों में होकर बलवान्‌ हों तो अच्छा स्वभाव उन्नतिशील

और आनन्दमय होकर ८० वर्ष जियेगा ( स. चि. ) । २९३- चन्द्र गुरु युक्त केन्द्र मे

हो शुभ गृह से दुष्ट हो ओर दूसरे ग्रह अपने स्वभाव को छोड़ कडू दूसरे घरों में हों

( स. चि. ) । २९४- गुभ ग्रह अपने मूल त्रिकोण मे हों गुरु उच्च का लग्न में हो

आयुर्दाय विचार : २३७

लग्नेश पूर्ण वली हो (जा. ल. )। २९५--छरन से १ या ९ घर में शुभ गह हो, ककं लग्न में गुरु हो ( जा. ल. )। २९६-लग्न से पाँचवें स्थान में या केन्द्र में क्रूर ग्रहों के नवाँश में सम्पूर्ण ग्रह हों ( जा. ल॑. ) । २९७-सब गृह पांचवें स्थान में हों ( जा. लं. ) । २९८-शुभ गृह अपने मूल त्रिकोण या उच्च में हों ( जा. भ. ) । ८५ वर्ष आयु २९९--गुरु लग्न में हो केन्द्र में सूर्य मंगल शनि तीनों गुरु के नवांश मे हों लग्न से अष्टम स्थान छोड़कर अन्य स्थान में शेष सव गृह हो (जा.लं) । ८६ वर्ष आयु ३००-शुथ गृह केन्द्र में हो पाप गृह ८, ६ घर में हो, चन्द्र ५ घर में हो (स. चि. ) । ३०१-गुरु चन्द्रमा युक्त केन्द्र में शुभ दृष्ट हो सभी गृह दशम भाव से अपर ११.१२ भाव में हों ( स. चि. )1 ८७ वर्ष आयु ३०२-वुध लग्न में, चन्द्र कोण में शनि नवम मे हो (स. चि.) । बुध लग्न में होने से दिग्बल प्राप्त होता है । १००-वर्षे आयु ३०३-लग्नेश से केन्द्र में गुरु हो पाप ग्रह केन्द्र या कोण में न हो वह सुखी होकर १०० वर्ष जिये (स. चि.) पाप गृह केन्द्र या कोण में बुरे होते है परन्तु मंगल और सूर्य दशम में, शनि सप्तम में अच्छे होते हैं राजयोग उत्पन्न करते हैं। ३०४-सूर्य और मंगल लग्न में हो या अष्टम में हो गुरु केन्द्र में हो तो यह धनी और मनुष्यों का स्वामी होकर १०० वर्ष जिये (स. चि. )। ३०५--तुला लग्न में जन्म हो व्यय में सूर्य हो (वृ. पा.) । ३० ६-पूर्ण चन्द्र लग्न में हो शुभ ग्रह शुभ राशि के नवांश मे' होकर लग्न से २ या १२ घर में हो तो सदा लक्ष्मी युक्त रहे आयु १०० वर्ष हो ( जा. ळं. ) | ३०७-पंचम में चन्द्र, मिकोण में गुरु/दशम में मंगल हो (मान.) ३०८-उच्च ककं का गुरु लग्न में हो उच्च का शुक केन्द्र में हो (मान.) । ३०९-१,६,८ भाव में चन्द्र न हो कूर ग्रह स्वक्षेत्री हो, दशम में वली-बली ग्रह हो ( मान. ) । ३१०-शुक्र और गुरु दोनों केन्द्र में हो (जा. लं.) । ३११-१ या ९ घर में शनि ९्या १२ घर में चंद्रहो । ४१२-९ या १२ राशि लग्न में हो केन्द्र में शुक्र या गुरु हो । लग्न से केन्द्र या ५, ९ स्थानों में कूर ग्रह न हो ८ या ९ दोनों भावों को शुभ ग्रह देखते हों (जा. लं. ) । ३१३-मीन का शुक्र लग्न में गुरु केन्द्र, में हो लग्न से अष्टम भाव में चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट हो (जा. ल.) । ३१४-लग्नेश अष्टम में, चन्द्रमा दशम में हो गुरु बळी हो लग्न से नवम स्थान में सव ग्रह हो (जा. ळं. )। ३१५-कर्क राशि मेः ३, ६, “१, घर मे गुरुव चन्द्र दोनों हों केन्द्र मे शुभ ग्रह युक्त शुक्र या बुध हो (जा. छ. )। ३१६-छग्न में शुक्र चन्द्र हो, नवन पंचम मे गुर, सप्तम मे बुध हो ( मान. ) । ३१७-लग्न से दशम या पंचम में गुरु, बुध, चन्द्र और शुक्र हो तो धन से परिपूर्ण वेद मे पारंगत हो, आयु १०० वपं हो (मान.) । ३१८-लग्न में धन रागि का नवाँ नवांश हो, केन्द्र में शुभ ग्रह किसी राशि के पहिले नवांश में हो ( जा. लं. )1 ३१९-लन में मीन राशि अंत्यांश होवे और केन्द्र में ४ ग्रह हों (स. चि.) । ३२०- चन्द्रमा लग्न में कर्काश या मीन व कक का होवे उसके साथ कोई ग्रह व हों केन्द्र में ४ ग्रह हो ( स. चि )। ३२१- सिंह छग्न से ४ ग्रह त्रिकोण में होवे ( स. चि. )1

४ २३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१०० वर्ष से अधिक आयु ३२२-यहाँ वहाँ ३ ग्रह ५, ९, ८ भाव या केन्द्र में

हों या यदि ५ ग्रह केन्द्र में हों तो वह धनी, सत आचरण वाला होकर १०० वर्ष से

अधिक जिये ( स. चि. )। ३२३-लग्न में मंगळ मिथुन के पूर्वा में हो, दूसरे आधे

में गुरु हो, बुध और शुक्र केन्द्र में हो। अर्थात्‌ मंगल गुरु बुध शुक्र केन्द्र में हो तो

१०० वर्षे से अधिक आयु हो सुखी ओर धनवान हो ( स. चि. ) । ३२४-कन्या का

उत्तराद्ध लग्न हो पूर्वादध में बुध हो या ३ ग्रह उच्च में हों (स. चि. ) ।

१०८ वर्ष आयु ३२५-मीन का अन्तिम नवांश लग्न में हो और ३ ग्रह केन्द्र में

हों ( मीन का अन्तिम नवांश बड़ा बलवान्‌ होता है धन देता है )। ३२६- लग्न

सिंह हों ओर ४ ग्रह ४ या ९ घर में हो (स. चि'. ) । ३२७--बुध लग्न में हो. गुरु

ककं में हो, ३ ग्रह उच्च के हों [स. चि. ]। ३२८--मंगल मकर में हो गुरु कर्क

मे हो दसरे सब ग्रह केन्द्र में हों | स. चि. ]। गरु ककं में मंगल मकर में उच्च का

होता है ।

१२० वर्ष आयु परमायु -२९-लग्न से व चन्द्र से आठवे स्थान में कोई ग्रह न

हो और शुक्र व गुरु ये दोनों बली हों तो पूर्णायु पावे ( जा० ल॑० ) । ३३०-लग्न

मकर का पराद्ध १५० से ऊपर होवे उसके पूर्वाद्ध १५० के भीतर मंगल लग्न में हो

और चन्द्रमा गुरु युक्त केन्द्र में हो (स० चि० )। ३३१-मंगल मिथुन लग्न के पूर्वार्द्ध

में हो, लग्न मिथुन का उत्तराद्ध॑ हो । या धन के पूवाद्धं में गुरु उत्तराद्ध में लग्न हो,

केन्द्र में शनि शुक्र चंद्र सहित हो तो परमायु हो । ३३२--बुध लग्न के अन्त्य नवाश में

हो, लग्न में शनि, केन्द्र मे गुरु व शुक्र हो पाप गृह ३,६,११ भाव मे हों तो परमायु

हो ( स० चि० ) । ३३३--मीन नवांशक लग्न मे हो, वृष का चन्द्र होरा आदि ५

वर्ग मे अपने वर्ग का हो अन्य सभी गृह उच्च के हों (स०चि०) । ३३४-केन्द्र मे सब

शुभ गृह हों लग्नेश वलवान्‌ हो या गुरु दृष्ट हो ( वृ० पा० )। ३३५--लग्नेश केन्द्र

मे गुरु शुक्र से युक्त दृष्ट हो तो पूर्णायु हो ( वृ० पा० ) । ३३६--लग्नेश अष्टमेश

सहित ३ गृह उच्च मे हों आठाँ भाव पाप गृहों से रहित हों तो पूर्णायु हो (वृ. पा') ।

परमायु या पूर्णायु ३३७--लग्नेश वली हो भाव मे ३ गृह स्वगृही, मित्र क्षेत्री

या उच्च के हों ( वु पा० ) । ३३८-अष्टमेश या शनि अपने उच्च या राशिस्थ किसी

गृह से युक्त हो ( व्‌ पा० ) । ३३९-शुभ गृह केन्द्र त्रिकोण मे हों पाप गूह ३,६,११

मे हों लग्नेश बली हो (वृ० पा०) । ३४०--६, ७, ८ भाव मे शुभ गूह ३, ११ मे

पाप गृह हों। ३४१-ऊग्नेश केन्द्र मे हो, अष्टमेश सूर्य का मित्र हो पाप गृह ६,१२ भाव

मे हो ( वृ० पा० ) । ३४२-अष्टम मे पाप गूह हो दशमेश उच्च का हो । ३४३--

हिस्वभाव लग्न हो लग्नेश केन्द्र मे या कोण मे उच्च या स्वक्षेत्री ही ( वृ० पा० ) ।

३४४-द्रिस्वभाव लग्न हो वली लग्नेश से २ पाप गूह केन्द्र मे हों तो पूर्णायु पावे

(वृ० पा०) । ३४५--लग्न मे धन राशि का दूसरा होरा हो गृह अपने २ उच्च में

हों बुध २४ अंश पर वृष राशि में हो ( जा० ल॑० ) । ३४६-चन्द्रमा लग्न से ११ वें

घर में ,गुरु शुक्र केन्द्र में हों ( जा० लं० ) । ३४७--लग्न से ३,६,११ स्थानों में सब

आयुर्दाय विचारे : २३९

कूर गृह शुभ के नवांश में हों शुभ गों से युद्ध में जीते गये हों ( जा० लं० ) । इस योग मे लग्नेश व मंगल दोनों अष्टम में हो तो पूर्णाय नहीं होगी । ३४८--लग्नेश व गुरु केन्द्र में हो ५,९,८, व केन्द्र में कूर गृह न हो ( जा० ल॑० ) । ३४९--पाप गहू लग्न से ९या ५ घर में हों शुभ ग,ह गुरु की राशि या नवांश में हों ( जा० ल० )। ३५०--सव ग,ह लग्न से ९ स्थान में हों ( जा० ल॑० ) । ३५१--सब क्रूर ग ह. कूर राशियों में शुभ ग,ह सव शुभ राशियों में हों लग्नेश बली हो ( जा० ल॑० )। ३५२-- अष्टमेश अष्टम में हो । अष्टमेश से केन्द्र या त्रिकोण में कोई शुभ ग,ह हो ( ज्यो० र० )। ३५३--लग्न से अष्टमेश ६ ८,१२ भाव में हो जहाँ अष्टमेश हो उस घर का स्वामी अष्टम में हो ( ज्यो० र० ) । ३५४--लग्नेश केन्द्र में गुरु या शुक्र से युक्त या दृष्ट हो। ३५५--लग्न से शनि ६,८, ११ घर में हो लग्नेश दशमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो। ३५६-चन्द्र उच्च का मित्र ग,ही मूल त्रिकोण में हो उस पर गुरु या शुक्र की दृष्टि हो । ३५७-गुरु शुक्र केन्द्र में, शनि लग्न से ५,६,८,११ घर में हो । २५८-शनि लग्नेश या अष्टमेश होकर एक या अधिक शुभ गृहों से युक्त हो । ३५९-शनि अष्टमेश के साथ हो या अष्टमेश की शनि पर दृष्टि हो ।

१२० वर्ष से ऊपर आयु ३६०--कर्क लग्न में गुरु-चंद्र हो बुध, शुक्र केन्द्र में हों ३,६,११ भाव में अन्य ग्रह सूर्य मंगल हो तो गणितागत आयु से भी अधिक आयु मिले (स. चि. ) ।

८०० वर्ष आयु ३६१--सूर्य लग्न में मंगल युक्त या सूर्य अष्टम में, गुरु केन्द्र में हो तो लक्ष्मी का गुणी होकर ८०० वर्ष जीये (स. चि ) ।

१००० वर्ष आयु ३६२--कुंभ लग्न में सूय हो, २,१२ घर मे गुरु हो तो रसायन एवं योग क्रिया द्वारा १००० वर्ष जीवे और वह ऊँचे दर्जे का योगी हो ( स. चि. ) । ३६३--सिंह लग्न में गुरु हो, शुक्र बारहवां या कर्के में और बुध दुसरे में या कन्या . में हो पाप ग्रह ३,६,११ घर में हो तो १००० वर्ष जीवे । मतांतर-बुध के स्थान में चन्द्र किया है ! (स. चि. ) ।

१० गुणी आयु ३६४--लग्न कुंभ हो, गुरु मीन का, शुक्र व्यय में ओर सूर्य लग्न में हो तो रसायन सेवन आदि से गणितागत आयु से दशगुणी आयु पावे (स. चि.) ।

२००० वर्ष आयु ३६५--लग्न में शनि, चतुर्थ में सूर्य और मंगल हों, शेष ग्रह दूसरे में हों, राहु बारहवें हे ( स. चि. )। शनि लग्न में बहुधा बालारिष्ट करता है

परन्तु जब वच जाता है तो दीर्घायु करता है। यहाँ कुछ शंक। हो जाती है कि शेष ग्रह चन्द्र वुध गुरु शुक्र केतु दूसरे में होना कहा है जब सूर्य चतुर्थ में हो तो बुध दूसरे में होना कठिन है राहुवारहवें में है तो केतु ६ में होगा । इस प्रकार शेष ३ ही ग्रह दूसरे में रहेंगे । सम्भव है कि बहुत प्राचीन काल में बुध सूयं से इतने अन्तर पर रहा हो । ३६६--मेष छरन हो उच्च का सूयं शुभ ग्रह युक्त हो, गुरु दशम में हो, मंगळ सप्तम,

२४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

पूणं चन्द्र १२ वाँ हो तो रसायन शास्त्र की सहायता से २००० वर्ष तक जीवे ( स.

चिं. ) । ३६७--गुरु और बुध कोण में मंगल वृष का लग्न में हो चन्द्र गौपुरांश में हो

( स, चि. ) । ३६८--शुक्ल पक्ष में दिन का जन्म हो गुरु केन्द्र में या ककं या लग्न में

हो, सप्तम मंगल हो, चोथा सूर्य हो ( स. चि. ) ।

१०००० वर्ष आयु ३६९ लग्न दिन का हो, शुक्ल पक्ष हो गुरु केन्द्र में हो और

कर्क लग्न हो मगल सप्तम हो, शनि चतुर्थ में हो ( स. चि. ) । ३७०--जब गुरु शनि

मंगल ओर शुक्र एक दूसरे से कोण या केन्द्र में हो (स. चि. ) 1

(१) ये सब चाहे लग्न से या चन्द्र से केन्द्र गों हों ये सव किसी भी केन्द्र या

चारों केन्द्रों मों हों यह एक योग हुआ । (२) दूसरा योग एक दूसरे से त्रिकोण में हों।

एक अयुत वषं आयु ३८१--गुरु शनि शुक्र का अन्योन्य केन्द्र स्थित सम्बन्ध हो

या त्रिकोण में हो तो एक अयुत वषं जीवे (स. चि. ) । ६०००० वर्ष आयु ३७१--लग्न सिंह हो शुभ ग्रह चारों केन्द्रों में हों पाप ग्रह

३-६ और १२ भाव में हों (स. चि. )। ६ अयुत वषं आयु ३७३-_चारों केन्द्रों में शूभ ग्रह हों पाप ३,६,११ भाव में हों लग्न सिंह हो (स. चि. )।

अनगिन्ती वर्ष आयु ४७४ मेष के अण्तांश लग्न में गुरु या शुक्र हो चन्द्रमा वृष

के मध्य नवांश में हो मंगल सिंहासनांश में हो तो मंत्र बल से असंख्य वषं जीवे ( जा०

पारि. ) । ३७४--मेष के अन्त्यांश लग्न में गुरु या शुक्र हो, चन्द्रमा वृष का या धन

के मध्यांश में होवे मंगल सिंहासनांश में हो ( स. चिता. )। अन्य-गुरु या शुक्र मेष

के अंत में लग्न में हो, चन्द्र वृष का या धन के पुर्वाद्ध में हो मंगल सिंह के नवांश में

द्रो। ३७५--लग्न में बुध कन्या के अंत नवोश में हो, सप्तम में गुरु गोपुरांश में हो या

शनि मृद्धांश में हो ( स. चि. ) षष्ठ्यंश का १९ वाँ अंश मृद्दांश है ।

युगों तक आयु ३७६--सब शुभ या पाप ग्रह इकट्ठे केन्द्र या त्रिकोण में हो तो

वह तुरंत मरे । यदि बच जावे तो मन्त्र सिद्धि से कई युग तक जीवे (स. चि. ) ७

ग्रहों के एकत्र होने. का योग २। दिन से अधिक नहीं होता । ३७७--गुरु केन्द्र में,

शति ११ वें, सूर्य दुसरे, चन्द्र सप्तम, मंगल नवम हो तो मन्त्रों से कई हजार युगों तक

जीवे । २७८--गुरु केन्द्र में गोपुरांश में हो, शुक्र कोण में पारावतांश में हो, लग्न ककं

हो तो युगों तक जीवे ( स. चि- ) । ३७९--सूयं गुरु मंगल ये शनि के नवांश में

हों या नवम भाव में या उसके नवांश में बलवान्‌ हों लग्न में चन्द्रमा हो तो लक्ष्मी

युक्त युगांत आयु पावे ( जा. पारि, )। ३८०--गुरु केन्द्र में शनि लाभ में सूर्य धन

स्थान में केतु सप्तम म, मंगळ नवम में हो तो मन्त्र बल से युगांत आयु पावे (स.चि.)।

३८१--केन्द्र में शुक्र गोपुरांश में, गुरु त्रिकोण में पारावतांश में हो, लग्न ककं हो तो

य॒गांत आयु हो ( स. चि. )। ३८२--मकर लग्न में मंगल से लेकर सूर्य तक ग्रह हों

तीसरे में गुरु हो दिन का जन्म हो (स. चि. )।

आयुर्दाय विचार : २४१

दिव्य आयु ३८३--सब शुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों सब पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में हों अष्टम भाव में शुभ ग्रह की राशि हो [ वृ० पा० ]। अमित आयु ३८४--कके लग्न व कर्कांश होवे गुरु केन्द्र में, मंगल सप्तम में हो विशेष कर शुक्र सिहासनांश में हो तो रसायन आदि से अमित आयु हो [ स' चि. ] ।

असंख्य आयु ३८५--शुऋ देवलोकांशक में, मंगल केन्द्र में, गुरु सिहासनांश में केन्द्र गत हो तो असंख्य आयु पावे [ स. चि ]। ३८६--उत्तमाँश गत बुध केन्द्र में, शुक्र पारावतांग में गुरु स्वर्ग लोकांश में हो तो असंख्य आयु पावे [ स. चि ] । आयु बढ़ावे ३८७-शुक्र का उत्तमांश होकर केन्द्र में हो । शनि पारावतांश में हो और गुरु स्वर्ग लोकांश में होकर केन्द्र में हो तो औषधियों द्वारा अपनी आयु बढ़ावे

[स. चि ]।

“अमित आयु ३८८--कर्क लग्न हो उसमें चन्द्र और गुरु हो बुध शुक्र केन्द्र में हों ३, ६, ११ भाव में सूर्यं मंगल शनि राहु पाप ग्रह हों तो अमित आयु हो [ वृ. पा ] मुनि योग ३८९-यदि गुरु चन्द्र आदि पाप ग्रह शनि तक परमोच्च में हो तो उसे ज्ञान प्राप्त होकर मुनि के बरावर हो या विद्या के कारण उसका मान हो [स. चि.] । जव सव ग्रह उच्च में होंगे तो बुध उच्च को नहीं हो सकता जव बुध उच्च में हो तो सूर्य शुक्र उच्च में नहीं हो सकते । ३९०--शनि देवलोकांश में, मंगल पारावतांश में और लग्न में सूयं सिंहासनांश में हो तो वह मुनि तुल्य होगा [ वृ' पा. ]। ३९१-- मेष लग्न हो, सूर्यं मकर में या दशम में हो, गुरु कक में चतुर्थ स्थान में हो ३, ६, ११ में पाप ग्रह हो तो बड़ा मुनि होगा [स. चिः ]। २९२--चन्द्रमा क्षीण न हो मित्र गृही या उच्च का होकर लग्न या लाभ स्थान में हो, नवमेश बलवान होकर सूयं के साथ हो तो वह बड़ी आयु वाला मुनि होगा । ३९३--कर्क से मकर तक सब ग्रह गुरु चन्द्रादि होवें इस बीच में जिनके उच्च हैं वे उच्च राशियों में होवें तो वह मुनि तुल्य होगा [ स. चि- ]। ३९४--सूर्य बुध युक्त स्थिर राशि में, चन्द्रमा बुध का, शुक मिथुन का गुरु कर्क का लग्न में, शनि तुला का हो तो मुनि तुल्य हो [ स. चि. ]।

३९५--चन्द्रमा देव लोकांश में, मंगल पारावतांश में, लग्न में धुर्य सिहासनांश में

हो [ स. चि. ]।

देव तुल्य ३९६--छग्न से लेकर क्रम से शनि सूर्य चन्द्र मंगल होवें वैशे- पिकांशो में भी होवें तो देव तुल्य हो [ जा. पारि. ]। ३९६- त्रिकोण में पाप ग्रह न हो केन्द्रं में शुभ ग्रह न हो अष्टम भाव में भी पाप ग्रह न होवे तो मनुष्य देवता के तुल्य हो [ स. चि. ] । ३९८--शुक्र देवलोकांश में हो, मंगल केन्द्र में हो, गुरु सिहा-

सनांश में हो तो देव तुल्य होगा [ स. चि. ]।

ऋषि योग ३९९--सूर्य वुध सिंह में हो, चन्द्र वृष में, शुक्र मिथुन में, शनि तुळा

में ककं लग्न में गुरु हो [ स. चि. ]।

इन्द्रपद पावे ४००--वृष लग्न में शुक हो, गुरु वेन्द्र में हो और दूसरे ग्रह

३, ६, १०, १ भाव में हों वह रसायन और मन्त्र बल से इन्द्र पदवी को प्राप्त करे

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२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

[ स. चि. ] । ४०१--चन्द्रमा वृष का विशेषतः लग्न में बुध गुरु शुक्र से युक्त हो, शेष ग्रह धन भाव में हों [ स. चि ]। ४०२--गुरु स्वगृही लग्न या दशम भाव में हो, मिथुन का शुक्र केन्द्र में हो तो रसायन आदि प्रयोगों से बहुत वर्ष जिये और इन्द्र पद पावे [ स. चि. ]। ४०३--गुरु स्वग[ही लग्न में हो, मिथुन में कोई ग्रह न हो शुक्र केन्द्र में हो तो वह रसायन शास्त्र की सहायता से कई वर्ष जीवे इन्द्र लोक पावे [ स. चि. ]। गुरु केन्द्र में कन्या में होने से नीच का होता है मीन में होतो अच्छा है [ स. चि. ]

ब्रह्म पद पावे ४०४--ककं लग्न हो, धनु के नवांश में हों, गुरु कर्क को हो ३-४ ग्रह केन्द्र में हों तो ब्रह्मपद पावे [ जा. पारि. ]॥ ४०५--छग्न वर्गोत्तम हो और वृष हो, ३, ११ भाव में शुक्र हो और गोपुरांश में हो तो ब्रह्मपद पावे [ स. चि. ] । ४०६--कुंभ लग्न में गुरु हो, बुध गोपुराँश में पञ्चम भाव में हो तो ब्रह्मपद पावे [ स. चि. ]। ४०७--लग्न ककं हो, शनि तुळा का, गुरु मकर का, चन्द्र वृष का हो तो योग साधन और मन्त्र सिद्धि से ब्रह्म पद पावे [ स. चि. ]। परमपद प्राप्ति ४०८--धनु लग्न में मेष का नवांश हो, शुक्र लग्न में हो गुरु सप्तम हो चन्द्र कन्या का हो तो वह परम पद पावे [ स. चि. ]। ४०९--जन्म में धनु राशि में मेष का नवांश हो अर्थात ८-१-२० लग्न हो उसमें गुरु हो, सप्तम भाव में शुक्र हो कन्या राशि में चन्द्र हो तो वह परम पद पाबे अर्थात मोक्ष पावे [ जा. पारि. ] । ४१०-३, ११ भाव में शुक्र गोपुरादि शुभांशक में हो, वृष लग्न वर्गोत्तम हो, धनु लग्न में मेषांशः का हो [ स. चि. ]। ४११--छमन में गुरु कुंभ का हो; पंचम बुध गोपुरादि अंशक में हो तो ब्रह्मपद पावे [स, चि. ]। योगज आयु पर विचार यहाँ जो योगज आयुर्दाय कहा है वह शुभ कर्म करने वाले यशस्वी व पथ्य भोजन करने वाले एवं शुभाचरण वाले मनुष्यों को कहा है । धर्मिष्ट मनुष्यों का ही ग्रहों का बलाबल विचार कर आयु के योग पर विचारना । गणित से जो आगु बताई है यदि हानि कारक ग्रह दशा कुंडली में हो तो वह आयु संभव नहीं होती : वह आयु तव संभव होगी जव हानिकारक ग्रहों की दशा को शांत करने वाली स्थिति हो । सवं ग्रह अरिष्ट भंग योग १--गुरु बलवान्‌ होकर लग्न में हो तो सब आपत्तियों को दूर करता है [ स. चि. ]। २- केन्द्र में बुध गुरु या शुक्र बलवान्‌ हों पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों [ स. चि. ]। ३_-चन्द्र शत्रु राशि में भी हो यदि वह शुक्र या बुध के साथ और शुभ द्रेष्काण में हो तो सब आपत्तियाँ दूर होंगी । [ स. चि. ] | ४---चंद्र यदि ६ या = भाव में हो, यदि चन्द्र मास के शुक्ल पक्ष में रात का जन्म हो, चन्द्रमा पर शूभ दृष्टि हो या यदि कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो और चन्द्रमा पर पाप दृष्टि न हो तो सब अरिष्ट से रक्षा होगी [ स. चि. ]। ५--पूर्ण चन्द्र हो शुभ ग्रह के अंशक में शुभ

आयुर्दाय विचार : २४३

राशि में और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश हो [स. चि.] । ६-गुरु तेज भ्रकाशवान हो और केन्द्र में हो तो सव आपत्तियों से रक्षा करेगा [स. चि. ]॥ ७--गुरु छुध शुक्र चन्द्र यदि शुभ नवांश में हों तो अरिष्ट दूर हो [ स. चि. ] 1 ये सौम्य गृह या सौम्य नवांश या सौम्य द्रेष्काण में हों [ मान. ] । ८--जन्म लग्नेश शुभ ग्रह केन्द्र में शुभ दृष्ट हो [ स. चि. ]। ९--राहु लग्न से ३, ६, ११ घर में पाप रहित हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो । १०--पूर्ण चन्द्र शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो पाप युक्त न हो [ स. चि. ]। ११--पूर्ण चन्द्र पर सव पाप या शुभ ग्रहों की दृष्टि हो । १२-- रून में शुभ राशि हो जिसमें शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रह की दृष्टि हो और शुभ ग्रह वलवान्‌ हो पाप ग्रह निर्बल हों [ स. चि. ]। १ ३--राहु मेष वृष का कर्क लग्न में हो [ जा. पारि. ]। १४ चन्द्रमा वल्हीन हो परन्तु शुभ वर्ग में हो और उस पर शुभ दृष्टि हो । १५--पूर्ण चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर उच्च का या स्वगृही हो या मित्र के वर्ग में या स्ववर्गमें हो शत्रु दृष्टि से रहित और पाप योग दृष्टि रहित हो तो कठिन अरिष्ट भी दूर हो [स.चिं.] । १६- चन्द्र राश लग्न में शुभ दृष्ट होवे तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो चन्द्र उच्च में हो [स. चिं.] । १७--चन्द्रमा पाप राशि में हो उस राशि के स्वामी की दृष्टि हो शुभ ग्रह के अंशादि में हो [ स. चिं. ] । १८--चन्द्र से ६, ७, ८ स्थानों में शुभ ग्रह हो ।

अरिष्ट भंग

१९--अष्टमेश चन्द्रमा शुभ ग्रहों के द्रेष्काण में हो तो सदा रक्षा करता है क्लेश होकर भी बच जाता है [स. चिं.] । २०- लग्नेश अति बली हो शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर केन्द्र में हो पाप दृष्टि रहित हो तो भाग्यवान्‌ दीर्घायु हो, अरिष्ट दूर हों [स. चि.] । २१-ळमग्नेश शुभ या पाप ग्रह हो परन्तु उसे अपने अंशक सहित शुभ ग्रह देखते हों [स. चिं.]। २२--लगनेश बलवान्‌ होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो, केन्द्र गत शुभ ग्रहों से दृष्ट हो पाप ग्रहों से दृष्ट न हो तो अरिष्ट दूर होकर दीर्घायु हो लक्ष्मी युक्त रहे [जा.पारि.] । २३-पापग्रह बलहीन हों शुभ ग्रह पूर्ण बली हों, लग्न में शुभ ग्रहों की राशि हो ओर लग्न को शुभ ग्रह देखते हों [जा.भ.] । २४--पाप ग्रह शुभ राशि में हों, शुभ ग्रह भी शुभ राशि में बैठकर उन पाप ग्रहों को देखते हों [ जा. भ. ]। २५--सम्मूणं ग्रह ३, ५, ७, ८, ११ राशियों में हों [ जा. भ. ] । २६--३,६,११ भाव में केतु मकर कुम्भ मोन राशि का हो [जा. भ.] । २७--३,६, ११ भाव में उच्च राशि का सूर्य हो पाप ग्रह से ग्रसित न हो [जा,भ.] । २५--३,६, ११ भाव में से किसी एक राशि में सब ग्रह हों [ जा. भ. ]। २९-- चतुर्थ में गुरु धन या मीन राशि में हो उस पर बलवान्‌ चंद्र की दृष्टि हो [जा. भ.] । ३०---वक्री शुभ ग्रह लग्न या केन्द्र में हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो [ छ. चं. ]। ३१--समस्त ग्रह शीर्षोदय ५, ६, ७, ८, ११, ३ राशियों में शुभ ग्रह के अंशक में हों [ श. चि. ] ३२--यपाप ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और शुभ वर्ग में हों [ स. चि. ]।

२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३३--शनि तुला कुम्भ या मकर में हो या १, ३, ८ भाव मेंहो[ल. चं. ]।

FT) 3? | | १, ३, ६ गा [ मान, ] 1

३४--चन्द्रमा ६, ८ भाव में हो किसी ग्रह की दृष्टि न हो [वृ.जा.] । ३५--चन्द्रमा

६,८ भाव में हो व बुध गुरु शुक्र के नवांश में हो [ जा.शा. ]। ३६--गुरुया शुक्र

१, ४, १०, ५, ९ या ११ भाव में हो [मान.| । ३७-एक भी उच्च का ग्रह केन्द्र में

हो [मान-] । ३८--लग्न में बुध हो तो हजार दोष दूर करता है शुक्र हो तो १०

हजार और गुरु हो तो १ लक्ष दोष शांत करता है [ मान. ] । ३९--स्वक्षेत्री या

उच्च का गुरु केन्द्र त्रिकोण में हो [ मान. ]।

४०--लम्नेश बली होकर ३,११ या केन्द्र में हो [मान.]। ४१--अष्टम घर में

चन्द्र हो बुध गुरु शुक्र के द्रेष्काण में हो [मान.] । ४२--छठे घर में चन्द्र शुभ ग्रह के

द्रेष्काण में हो शुभ ग्रह वली हो [मान.] । ४३--पूर्ण बली चन्द्र दो सौम्य ग्रहों के

बीच हो [मान.] । ४४--तत्काल युद्ध में जीतने वाले शुभ ग्रह पर शुभ ग्रह की दृष्टि

हो [मान.] । ४५--जन्म लग्न से ३,६,११,१२ भाव मे केतु हो [मान.] । ४६--ब्रुध

गुरु शुक्र त्रिकोण में हों [मान.] । ४७--पष्ठ में राहु सभस्त ग्रहों से दृष्ट हो [जा.सं.] ।

४८--चन्द्र से ६,८ स्थानों में शुभ ग्रह हों पाप ग्रह न हों चन्द्र शुभ ग्रह से युक्त हो

शुभ ग्रह के द्रेष्काण में हो [ प्रा. यो. ]। ४९--पूर्णं चन्द्र शुभ ग्रह युक्त १२ वें

स्थान में हो [प्रा. यो.| । ५०--चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि का हो उस पर लग्नेश की

दृष्टि हो अन्य ग्रह की दृष्टि न हो | प्रा. यो. ]। ९१--चन्द्र से गुरु दशम, बुध

शुक्र द्वादश, पाप ग्रह एकादश घर में व लग्नेश तृतीय, चतुर्थ या दशम में हो, या

एकादश स्थान में हो, चन्द्र शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो [ जा. भरण |। ५२--जन्म

राशीश बलिष्ट हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो [ प्रा. यो. ]। ५३-रात्रि का जन्म हो

चन्द्र पूर्ण हो वृप या कर्क राशि का [ उच्च या स्वगृही ] या वृष ककं के नवांश में

हो शुभ ग्रह की दृष्टि हो [ जा. भ. ] । ५४--त्रिपुष्कर योग पूर्ण हो [ जा. भ: ] !

त्रिपु्कर योग तिथि वार नक्षत्र

२ शनिवार विशाखा या

७ मंगलवार उत्तरा फाल्गुनी या

१२ रविवार पूर्व भाद्रपद, पुनर्वसु, कृतिका, उत्तराषाढा

जव तिथि वार नक्षत्र उपरोक्त हो तब यह योग होता है।

५५--पुष्य नक्षत्र के दूसरे या तीसरे चरण, रोहिणी के दूसरे चरण में चन्द्र

शुभ ग्रह से युवत या दृष्ट हो [ मान. ] । ५६--केन्द्र में कर्क या मेष का चन्द्र हो उस

पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो यदि चन्द्र क्षीण भी हो तो अरिष्ट भंग हो [ जा. भ. ]।

५८--क्षीण चन्द्र सप्तम में हो शभ ग्रह लग्न में हो केन्द्र में दो-दो ग्रह हों [जा-भ.] ।

ए८--पूर्ण चन्द्र हो और लग्न में गुरु हो [ प्रा. यो. ]। ५९--साप ग्रह शुभ ग्रह के

८ड वर्ग में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो [ मान. ] । ६०--सूर्य उपचय स्थान में हो पाप

बत न हो [ मान. ]।