सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
नीरोगता : ३२३
च्या धनेश द्वादश या छठे भाव में हो जब चन्द्रमा शनि का योग हो ।
३--द्वितीयेश यदि नीच का हो ३, ६, ७, १२ स्थान में चन्द्र या गुरु किसी एक
से युक्त हो तो वाणी विफल हो ( ज्यो० शा० )।
४--धन भाव में चंद्र और शनि हो तो हकला के बोले ( ज्यो० शा० )।
५--बुध यदि धन स्थान में निर्वेल तथा पाप दृष्ट हो तो हकलाकर बोले
(स० चि० ) ।
६-- हितोयेश शक्ति हीन शुभ ग्रह हो जिस पर पाप दृष्टि हो तो वह बोलने में
हकलावे । त
७--हितीयेश निर्बल होकर कूर अश में हो और द्वितीय में क्रूर ग्रह होवे द्वितीयेश
पर कोई शुभ दृष्टि न हो पाप दृष्टि हो तो हकला कर बोले ।
_ पर--धन भाव में पाप युक्त शुक्र दुसरे द्रेष्काण में हो तो गूंगा हो । यदि तीसरे
द्रेष्काण में हो तो हकलावे ( शंभु० ) ।
९- शनि युक्त चंद्र पाप गृही हो और सूर्य मंगळ से दृष्ट हो तो वाणी को हरने
वाला है ( जा० सं० )।
गंगा १--बुध ४,८,१२ राशियों में कहीं हो, सूर्य चौथे भाव में हो चन्द्रमा से
दृष्ट हो । षष्देश पाप ग्रह से दृष्ट हो तो वह गूंगे स्वर वाळा हो ( शंभु० ) ।
२--शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में मंगल युक्त हो तो गूँगा हो।
३--बुध ९ या १२ राशि का शनि से पूर्ण दृष्ट हो तो गद्गद् वाणी वाला हो ।
( शंभु० ) ।
४--चतुर्थ भाव में चर राशि हो और उ&का स्वामी और मंगल ६,१२ भाव में
हो तो गूँगा हो ( वृ० पा० ) ।
५--द्वितीयेश गुरु से युक्त अष्टम में हो तो गूँगा हो यदि स्वस्थानी यो उच्च का
हो तो दोष नहीं करता ( जा० पारि० ) ।
६-यदि षष्ठेश बुध हो तो जिह्वा नष्ट हो ( शंभु० ) ।
७--चन्द्रमा वृष राशि में हो पाप ग्रह सव ऋक्ष सन्धि में हों तो गूंगा हो
( जा० पारि० ) ।
( ऋक्ष सन्धि-कर्क, वृश्चिक, मीन के अन्त में)
८--पंचमेश या गुरु मित्र में हो तो गूंगा हो ( जा० ल॑० )।
इसी प्रकार त्रिक आदि जनों का उनके भाव में गूँगा होने का योग आदि का
विचार करना जैसे--
दशमेश, गुरु या पंचमेश युक्त त्रिक में हो तो- पिता गूंगा 1
तृतीयेश गुरु या पंचमेश यक्त निक में हो तो--भाई गूंगा ।
चतुर्थेश, गुर या पंचमेश युक्त निक में हो तो- माता गूंगी ।
सप्तमेश, गुरु या पंचमेश युक्त त्रिक में हो तो--स्त्री गूंगी ।
इसी प्रकार और भी लोगों का विचार करना । इसी प्रकार प्रत्येक योग से भी
३२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
विचारना । उनके भाव को लग्न मान कर योग का विचार करना ।
९--यदि द्वितीयेश गुरु के साथ ८या १२ स्थान में हो तो गूँगा हो (स० चि०) ।
यहाँ यह शंका होती है कि ८ स्थान में गुरु और द्वितीयंश होने से द्वितीय स्थान पर
पूर्ण दृष्टि पड़ती है तो इसका वाणी पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा विचारणीय है ।
गुरु यह वाणी का स्वामी है अष्टम स्थान में पड़ने से उसका प्रभाव कम हो जाता है।
१०-यदि उपरोक्त योग में चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो बहुत दिनों में
बाळक बोल्ने लगेगा ( जा० पारि० ) ।
जिह्वा रोग १--द्वितीयेश और लग्नेश बलहीन क्रूरांशक गत हो तो जिह्वा वायु
पीडित हो ।
२-द्वितीयेश निर्वेछ पाप दृष्ट हो तो जीभ अस्थिर अर्थात चलायमान हो
( स° चि०) 1
सुन्दर नेत्र १--नेत्र २ ओर १२ भाव से विचारना । दूसरा भाव दाहिना नेत्र है १२वाँ भाव बाँया नेत्र है। नेत्र का कारक सूर्य है ।
२--बारहवे भाव का स्वामी शुभ युक्त होकर शुभ नवांश या शुभ षष्ठचंश में हो और शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो नेत्र अच्छे होंगे ( स० चि० ) । ३-१-२ स्थान में बलवान् गुरु चन्द्र क्रूर ग्रहों की दृष्टि न हो तो नेत्र सुन्दर हों ( ज्यो० शा० )।
४--हितीयेश शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो नेत्र पूर्ण व बली होंगे (स० चि०) । ५--द्वितीयेश दुष्ट स्थान में नहीं हो ओर द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो सुन्दर नेत्र हों ( स० चिं० ) ।
इ--लग्नेश लग्न में हो तो सुन्दर नेत्र हो ज्ञानी मंत्री या राजा हो सम्पदा युक्त हो ( जा० ०) | FE ७--लग्नेश गुरु व शुक्र युक्त केन्द्र मों हो । ८--छग्नेश उच्च में व मित्र क्षेत्री, शुभ ग्रह क्षेत्री होकर शुभ ग्रह से दृष्ट हो । ९--बली सूर्य दशम में हो तो नेत्र सुन्दर हो ( जा० सं० ) । १०--धनेश शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो या शुभाश में हो तो सुन्दर नेत्र हो ( जा० पारि० ) 1
११-नेत्र स्थान में शुभ ग्रह हो द्वितीयेश शुभ ग्रह युक्त हो या कारक शुभ ग्रह युक्त हो लग्नेश से भी युक्त दृष्टि हो तो बड़ी दृष्टि वाला हो (स० चि०) | १२--द्वितीयेश पर पाप ग्रह का प्रभाव न हो केन्द्र में. हो ओर शुक्र ( नेत्र स्वामी ) लाभ स्थान या केन्द्र में हो पाप ग्रहों को द नेत्र हे र i अ ह् ह दृष्टि न हो तो नेत्र निरोग रहे
नेत्र दोष १--दुसरे या बारहवें चन्द्र हो तो नेत्रों में दोष हो ( शंभु० ) । २--शुक्र पंचमेश ओर षष्टेश के साथ लन में हो ता राजा के कोप से नेत्र विकार हो ( जा० पारि० ) ।
नीरोगता : ३२५
३---बलवान् होकर शनि मंगल सूर्यं चन्द्र ये त्रिक और द्वितीय में हों तो बात
प्रकोप से नेत्र रोगी हो ( जा०्संट )॥ |
४--लग्नेश बहुत पाग ग्रह युक्त हो ओर शनि से दृष्ट हो तो नेत्र रोग हो ।
५--द्वितीयेश शनि मंगल से युक्त तथा गुलिक से भी युक्त हो तो नेत्र रोग हो ।
६--द्वितीय स्थान में बहुत पापग्रह हों और शनि से दृष्ट हों तों नेत्र रोग हो ।
७--हितीयेश जिसके अंशक में है यह पाप युक्त और पाप ग्रह की राशि में हो ।
८--द्वितीयेश सूर्य या मंगल हों और गुलिक पर सूर्यं की दृष्टि हो तो गर्मी से या
पित्त कफ के प्रमादों से नेत्र रोग हो ।
९--द्वितीयेश दृष्ट स्थान में शुभ युक्त हो तो बिना प्रमाद के नेत्र रोग हों ( स०
चि० ) इसी प्रकार इतर जनों के नेत्र का विचार उनके सम्वन्धी भावों से करना
जैसे पंचम स्थान को लग्न मान कर पुत्र का, सप्तम स्थान से स्त्री का इत्यादि ।
१०--धन भाव में पाप ग्रह हों द्वितीयेश पर शुभ दृष्टि हो तो निमीलित अक्षि
हो ( आधे खुले नेत्र जिसकी आधी दृष्टि हो अर्थात् मिकरा हो ।
११--द्वितीयश मंगल या सूर्य युक्त या दृष्ट हों तो नेत्र के कोने लाल रंग के
होंगे ( स० चि० )। द्
११--प्रहण कालीन सूयं लग्न में हो ओर पाप ग्रह ९,५ भाव में हो तो नेत्र दूर
करने वाला योंग है ( जा० सं० ) ।
१२--लग्नेश मंगल या बुध स्वक्षेत्री कहीं हों । उस मंगळ को बुध या बुध को
मंगल देखता हो तो नेत्र रोग हों ( प्रा० यो० )।
१३--लग्नेश मंगल या बुध के स्थान में हो और मंगल या बुध की दृष्टि हो
किसी भाव में हो तो नेत्र रोग हो ( जा० लं० ) ।
१४--द्वितीयेश पाप ग्रह होकर दृष्ट स्थान में हो तो बिना कोई प्रगट कारण के
नेत्र रोग हो ( स० चि० ) ।
नेत्र दोष १५--द्वितीयेश ओर नेत्र कारक पाप युक्त या दृष्ट हो तो दूषित दृष्टि
हो ( स० चि० ) ।
१६--लग्न से द्वादश भाव में मीन का सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में पीड़ा हो ।
यदि चन्द्र हो तो वाम नेत्र में पीड़ा हो ।
१७--लग्न में सिंह का शनि व शुक्र हो या दोनों द्वादश भाव में हों तो नेत्र
पीड़ा हो ( जा० सं०)। .
१८--द्वितीयेश निर्बल होकर धन स्थान में हो, लग्न व धन स्थान का स्वामी
६, ८, १२ भाव में हो तो नेत्र रोग हो परन्तु शुभ ग्रह के योग से थोड़ा सौख्य हो
(प्रा० यो०) ।
१९~ सप्तम में क्षीण चन्द्र हो तो नेत्र विकार हो या दरिद्री हो (प्रा० यो०) ।
२०--यदि मंगल बारहवें हों तो बांया नेत्र दूषित हो ।
यदि शनि वारहवें हों तो दाहिना नेत्र दूषित हो (जा० छं०) ।
३२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२१--नवम में चन्द्र और सूर्य हो तो नेत्र रोगी हो ओर धनी हो (जा० पारि०) ।
२२--पाप ग्रह युक्त चन्द्र लग्न में हो तो नेत्र की हानि हो (जा० भ०)।
२३--होदश भाव शुभ ग्रह युक्त हो, द्वादशेश केन्द्र या त्रिकोण में हो इसमें यदि
पाप ग्रह का योग हो तो नेत्र का विकार हो, द्रव्य की हानि, कृपण, कजंदार, पर स्त्री
से व्यसन, देश-देश फिरे (प्रा० यो०) ।
२४--मेष लग्न भें सूर्य हो तो नेत्र में रोग हो (जा० पारि०) या नेत्र में फुली
या लाल नेत्र वाला हो (ज्यो० शा०) ।
२५--ककं लग्न में सूर्य हो तो नेत्र में फुली, हो या छोटी आँख वाला हो
(ज्यो० शा०) ।
२६--दितीय भाव में चन्द्र हो जिस पर शनि की दृष्टि हो तो दोष पूर्ण नेत्र हो,
आँख में फुली हो (ज्यो० रह०) ।
२७--द्वितीय भाव या द्वितीयेश मंगल, शनि या गुलिक से युक्त हो तो नेत्र रोग
हो (स० चि०) ।
२८--द्वितीयेश की राशि का नवांश स्वामी पाप ग्रह युक्त हो चतुर्थ भाव में
दूसरा पाप ग्रह हो तो नेत्र रोग हो (स० चि०)।
२९--द्वितीयेश सूर्य मंगल या केतु के साथ हो और शनि व गुलिक की दृष्टि हो
तो उष्णता से बहुत नेत्र पीड़ा हो या पीलिया या और कोई शारीरिक रोग हो
(स० चि०) 1
नेत्र रोग ३०--द्वितीय भाव या द्वितीयेश पाप युक्त या पाप दुष्ट हो, सूर्य निर्वेल
हो पाप योग दृष्टि हो तो पाप ग्रहों के बळानुसार नेत्र पीड़ा हो। शुभ ग्रह वली हो
तो अच्छाई करेंगे (स० चिं०) ।
३५--छग्नेश व अष्टमेश षष्ठ में हो तो दाहिने नेत्र में रोग हो । अकेला शुक्र
छग्नेश होकर ६ या ८ भाव में हो तो दाहिने नेत्र में रोग हो (जा० ल॑०) ।
३२--लग्न व अष्टम स्थान में शुक्र हो क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो आँसू गिरने के
कारण नेत्र में पीड़ा हो (जा० ल॑०) 1
३३--'क्त्र ग्रह से युक्त या दृष्ट सूयं लग्न से ५, ९ या १२ भाव में हो तो नेत्रों
से विकल हो (जा० ०) ।
३४--सूर्य या चन्द्र व्यय भाव में हो शनि ५ या ९ भाव में सूर्य राशि या नवांश
मों नीच का हो या शत्रु अंश में हो और सप्तम या अष्टम घर में हो तो नेत्र पीड़ा
और दाँत का ददं हो (सवं चि०) ।
३५--व्यय या धन भाव चन्द्र और सूर्य से युक्त या दृष्ट हो तो नेत्र रोग हो
(फल०) ।
३६--सूर्य चन्द्र बुध शनि वारहवें घर में या मीन राशि में हों और मध्य स्थानः
में मंगळ हो तो हीन दृष्टि हो (मान०) ।
३७--सिंह लग्न में सूर्यं मंगल हो उस पर शुभ ओर अशुभ दोनों ग्रहों की दृष्टि
नीरोगता : ३२७
हो तो कातर नेत्र (बुदबुदाकार) हों (शंमु०) ।
र पयली चन्द्रमा वक्र ग्रह की राशि में या ६,१२ भाव में हो तो टेढ़ी दृष्टि हो
शभु० A
३९--कारक ओर भावेश दो शूभ ग्रह हों उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि न हो
शुभ दृष्टि न हो छूर दृष्टि हो (स० चि०)।
४०--सूर्य नवम पंचम में हो पाप ग्रह से दृष्टि हो उसके नेत्र मंद रहें पुष्ट न हो
अर्थात् मंद दृष्टि रहे (वृ० जा०) ।
४१--धन व्यय भाव में शुक्र या मंगल हो वहाँ चन्द्र भी हो तो नेत्र दोष कारक
हो (शंभु०) ।
४२--क्षीण चन्द्र ककं में हो उत पर शनि की दृष्ट हो या दशवें सातवें स्थित
पाप ग्रह की दृष्टि हो शुक्र की दृष्टि न हो तो छोटे नेत्र वाला या अल्प दृष्टि वाला
हो (जा ० लं०)।
४३--सूर्य के आगे मंगल गया हो तो उसके नेत्र कांति रहित हों अर्थात् माई से
छाये रहते हैं । (ज!० लं०) 1
४४--पष्ठेश वक्री ग्रह के साथ हो तो नेत्र रोग हो (शंभु०) 1
४५--लग्न में शनि से दुष्ट, मंगल व गुरु अथवा शुक्र बुध चन्द्र सहित हो तो
उष्णता से या शोक या काम विकार हो या शस्त्र से नेत्र रोग हो (शंभु०) ।
४६--धन या व्यय स्थान में चन्द्र मंगळ हो तो नेत्र दोष हो ।
४७-_व्यय भाव में शुक्र हो तो नेत्र पीड़ा हो (जा० सं०)।
रताँध १--शुक्र चन्द्रमा युक्त द्वितीयेश लग्न में हो तो रात्र्यंध हो (जा० पारि०)।
यदि द्वितीयेश उच्च ग्रह ओर शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो यह रोग न हो अर्थात् नेत्र
अच्छे रहें (जा० पारि०) । ९
२--सिह लग्न में सूर्य हो तो रतोंध का रोग हो (जा० पारि०) ।
३--चन्द्र सहित शुक्र ६,८.१२ भाव में हो तो रात्रि में अंधा हो (जा० सं०) ।
४- शुक्र चन्द्र और द्वितीयेश तीनों एकत्र हों तो निशांध हो (जा० पारि०) ।
५-जन्म में सूर्य और बुध त्रिक स्थानों मे हो तो रात्र्यंध हो ( शभु० ) ।
६-हीन बली सूर्य वक्री ग्रह की राशि में हो। या मंगल में आक्रांत कक राशि
में चन्द्र हो या धन के अंत्य नवांश में हो तो अंधा योग है सूर्य की दृष्टि हो तो
रात्रि अंध, शनि की दृष्टि हो तो दिवा अघ होता है ( शंभु० ) ।
जन्म से अंधा १-सूर्ण और शुक्रदोनों से युक्त होकर लग्नेश मिक में हो तो जन्म
से अंधा हो ।
इसी प्रकार इतर जनों का विचार करना जैसे
दशमेश सूर्य शुक्र युक्त दशम भाव से निक ह हो-पिता जन्मांध ।
तृतीयेश सूर्य शुक्र युक्त तीसरे भाव से त्रिक मे हो-भाई जन्मांध ।
३२८ * सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चतुर्थेश सूर्य शुक्र युक्त चतुर्थ भाव से त्रिक में हो-माता जन्मांध ।
पंचमेश सूर्य श् क्र युक्त पाचवे भाव से त्रिक में हो-पुत्र जन्मांध ।
सप्तमेश सूर्य शुक्र युक्त सातवें भाव से त्रिक में हो-स्त्री जन्मांध (जा० लं०) ।
२--एक और २ स्थान के स्वामी किसी स्थान में चन्द्र के साथ ६, ८, १२ भाव
में हों या १.२,७ स्थान में चन्द्र सूर्य [स्थत हों, शनि और मंगल से दृष्ट हों ।
३-२ स्थान में शनि और ६ स्थान में लग्नेश हो ओर व्यय स्थान स्थित तीन
ग्रहों से दृष्ट हो या इनके साथ स्थित हो ( ज्यो० शा० ) ।
४-द्वितीयेश सूर्य शुक्र और लग्नेश युक्त हो तो जन्मांध हो तथा ६,८,१२ भाव
में हो तो भो उपरोक्त फल (स० चिं०) ।
वा के साथ सूर्ण हो ओर द्वितीयेश दुष्ट स्थान में हो तो जन्मांध हो
स० चि० )।
६-सिंह लग्न में जन्म हो उसमें शनि हो तो नेत्रहीन हो यदि शुक्र हो तो जन्मांध हो (मान०) ।
७-सूर्य शुक्र से युक्त हो तो जन्म से अंधा हो (जा० ल०) ।
अंधा १-सिंह लग्न में सूयं चन्द्र हो उन्हें शनि मंगल देखे तो अंधा हो(जा०पारि०) __ २--सूयं मंगल शनि चन्द्र २,६,८,१२ भाव में हो तो अपने बली ग्रह के धातु दोष से अंधा हो (शंभू । '
३--सूर्य लान में,चन्द्र द्वादश भाव में शुभ दृष्टि रहित हो तो अधा हो (जैमिनी): ४--पंचम चतुर्थ में पाप ग्रह हो विशेषतः चन्द्रमा,८,१२भाव में हो तो अंधा हो इन पर पाप॑ दृष्टि हो तो अंधा हो शुभ दृष्टि होने से दोष नहीं है (स० चि०) । #--भाप ग्रह ४ या ५ घर में हो और चन्द्र ६,८,१२ भाव में हो तो अंधापन हो कोई शुभ दृष्टि न हो और पाप दृष्टि हो तो निश्चय अंधापन हो (स० चि०) । ६-“छग्न में सूर्य राहु ग्रह न हो और ५;९ भाव में पाप ग्रह शनि मंगल हो तो अंधा हो (बृ० जा०) ।
७-लग्न से चतुर्थ में शनि कूर ग्रहों से दृष्ट हो तो अधा हो (जा० छ०) । ८-<-लग्न से दूसरे घर में सूर्यं हो तो अंधा हो (मान०) । ९--सूर्य चन्द्रमा तीसरे भाव या केन्द्र में हो, मंगल केन्द्र में हो या पाप राशि में पाप ग्रह से दृष्ट हो । ६८,१२ भाव में शुभ ग्रह, सूर्यं दशम में ही तो अंधा हो(शंभु) । १०-सूर्य मंगल व शनि ये ८, ६, २, या १२ स्थान में क्रम से हो तो अंधा हो (वृ० जा०) ।
११--सूर्ये नवम पञ्चम स्थान में हो पाप ग्रह की दृष्टि हो (वृ० जा०) । १२-छन्न में चन्द्र ग्रहण युक्त हो तो आँख का गढा नष्ट हो (जा० लं०) । १३-सूयं व चन्द्र वारहवें व छठे स्थान में हो तो नेत्र नष्ट हो (आ० छं२) । १४--सूर्य ओर चन्द्र दोनों बारहवें भाव में दृष्टि रहित हो तो दोनों आंख से अंधा हो (जा० पारि०) ।
नीरोगता : ३२९
१५--पाप ग्रह ६,८ भाव में हो तो अंधा हो । छठे भाव में पाप ग्रह बाई आँख
और आठवें में हो तो दाहिनी आँख से अंधा हो (जा० पारि०)।
१६--मंगल द्वितीयेश होकर सूर्य, चन्द्रमा से ८ वें भाव में हो और शनि इया १२
वें भाव में हो तो अधा हो (जा० पारि०) ।
१७--चन्द्र ६,5१२ भाव में हो ।
१८--चन्द्रमा छठे, सूर्यं आठवें, शनि वारहवें, मंगल दूसरे भाव में हो तो निश्चय
अंधा हो (जा० पारि०)। *
१९--लग्नेश युक्त द्वितीयेश ६,८,१२ भाव में हो
२०--१,२,७,९ और ५ के स्वामी ६,५,१२ भाव में हों और शुक्र लर्न से संबंध
रखता हो तो नेत्रहीन हो (जा० पारि०) :
२१-१,२,६,८,१२ भाव में चन्द्र मंगल शनि हो तो शरीर में वात रोग हो
और अंधा हो ( जा० भ०) ।
२२-लग्न में गुरु सप्तम शनि हो तो वात से पीड़ित हो अंत में अन्धा हो
(जा० भ० | 1
२३-द्वितीय भाव में या द्वितीयेश पाप ग्रह दृष्ट युक्त हो तो नेत्र नष्ट होंगे
( स० चि० ) 1
ग्रहों के योग प्रभाव से भिन्न-भिन्न प्रकार से ग्रहों के गुण धर्म के अनुसार रोगादि
से नेत्र नष्ट हों । जैसे मान लो दूसरे भाव में मंगल पाप युक्त या दृष्ट है तो अग्नि,
पित्त गर्मी या अचानक घटना से या अस्त्र-शस्त्र द्वारा पीड़ित होकर नेत्र नष्ट हों यदि
शनि हो तो बात रोग से पीड़ित होकर नेत्र नष्ट हो इत्यादि प्रकार से विचार लेना ।
२३-धनेश या व्ययेय या शुक्र व. लग्नेश से युक्त होकर त्रिक में हो तो अंधा हो
( जा० रू० ) ।
२४-द्वितीय भाव में शुक्र युक्त चन्द्र हो तो अंधा हो ( जा० ल॑० ) ।
२५--सूर्य या चन्द्र मिल कर ककं या सिंह में हो ओर मंगल और शनि की
दृष्टि हो तो दृष्टि नाश हो ( स० चि० )।
यदि शुभ अशुभ दोनों ग्रह की दृष्टि हो तो दूषित नेत्र हों । यदि केवल शुभ युक्त
या दृष्ट हो तो कोई हानि नहीं होगी । परन्तु बाद में नेत्रों को हानि पहुंचेगी (स.चि.)
२६--व्ययेश पाप युक्त अशुभ षष्ठांश गत पाप ग्रह से सम्बन्धी हो तो नेत्र
नाश हो ( स० चि० ) ।
२७--लग्न से पञ्चम के पद में स्थित राहु पर गुरु की दृष्टि हो तो नेत्र नाश
हो ( जैमिनि ) ।
२८--लग्न में क्रुर राशि और लग्नेश क्रूर ग्रह की राशि में हो ( जा० लं० )1
२९--सू्ये चन्द्र दोनों करग्रह के मध्य में हों जसे लग्न में सूर्य या चन्द्र हो व्यय
में मंगल, द्वितीय भाव में शनि हो ये अंशों में समीप हों जैसे सूर्य चन्द्र यदि १०-१२
३३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अंश में हों तो शनि १५ अंश में मंगल ८ अंश में हो तब कहेंगे कि क्र ग्रहों के मध्य में है ।
३०--सूर्य या चन्द्र से सातवें स्थान में मंगल पृष्ठोदय राशि में हो । उपरोक्त तीनों योगों में कोई हों तो वह नेत्र से अंधा दुष्ट कर्म कर्ता, पराये घर में रहने वाला या पर स्त्री यामी और शरीर का पतला होता है । इन तीनों योगों में चन्द्र वली हो तो अच्छे विचार वाला हो ( जा० ले० )। ३१--तुला लग्न में सूये हो तो अंधत्व और दरिद्र हो ( ज्यो» शा० )। ३२--लग्नमें सिंह का शुक्र व शनि हो तो नेत्र हानि हो ( जा० सं० ) । ३३--दशम या छठे भाव के स्वामी लग्न में, शुक्र और धनेश से युक्त हो तो राजा के कोप से नेत्र उखाड़े जावें ( स० चिं० ) । ३४--उपरोक्त योग में १० और ६ भाव के स्वामी नीचांशक से या पाप युक्त हो तो भी वही फल ( स० चि० )1 ; . ३५--१० और ६ भाव के स्वामी जिन ग्रहों के नवांश में यदि दृष्ट स्थान में लग्नेश से युक्त हो तथा शुक्र और २,१२ भावेशों से युक्त होकर द्वादश स्थान में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो नेत्र में प्रमाद हो ( स० चि० ) । ३६--लग्नेश, षष्ठेश की राशि के नवांश स्वामी के साथ हो दशमेश, दुष्ट स्थान में हो, द्वितीयेश १२ वें भाव में शुभ दृष्टि रहित हो तो नेत्र हानि हो ( सऽचि० )। ३७--यदि १०,६,२ भाव के स्वामी लग्न में हो या वे नीच नवांश में पाप युक्त हों तो राजा से उसकी आँख नष्ट हो ( स० चि० )1 द्वितीयेश ओर दशमेश का योग अच्छा है परन्तु जव वे पष्ठेश के साथ रहते हैं तो नेत्र का भय होता है । यदि वे रवामी पापयुक्त होकर नीच नवांश में हों तो भी नेत्र को भय होता है । तब आँख निकालने का दण्ड नहीं होता परन्तु किसो अधिकारी वर्ग के व्यवहार से नेत्र हानि हो सकती है । ३८--शक्षेत्री चन्द्र ३ पाप ग्रह युवत हो शुभ दृष्टि हीन हो तो नेत्र नाश हो ( जा० सं० ) ।
३९--नवमेश यदि शुभ ग्रह है तो जातक अदृष्टि हो ( ज्यो शा० ) । काना १--सूर््य चन्द्रमा में से एक छठे दूसरा व्यय स्थान में हो शुभ दृष्टि रहित हो एक आँख से काना हो उसक्री स्त्री भी कानी हो ( स० चि० ) | २-पंचम भाव में यदि अस्त का मंगल या शुक्र हो तो काना हो (जा० सं०) । ३--धन भाव में पाप युक्त शुक्र हो तो काना हो या भेद दृष्टि हो ( शंभु० ) । ४-ऱसूर्य लग्न या सप्तम भाव में हो शनि से दृष्ट हो या शनि सूर्य के साथ हो तो दाहिनी आँख नष्ट हो ।
५--यंदि लग्नस्य या सप्तमस्थ सूर्य, राहु और मगल से युक्त हो तो बाई आँख . उच्ट हो।
— पृथे और चन्द्रमा बारहव हों, ६,८,१२ भाव में पाप ग्रह हों तो षष्ठ स्थानी
नीरोगता : ३३१
\
ग्रह वाम नेत्र का नाश करे और अष्टमस्थ ग्रह दक्षिण नेत्र का नाश करे (जा. पारि.) ।
७--सूर्य व्यय में हो तो दाहिनी आँख से, चन्द्र व्यय में हो तो बाई आँख से
काना हो ( जा० पारि० )।
८--व्यय में मंगल हो तो बाम नेत्र से, शनि हो तो दक्षिण नेत्र से काना हो
( स० चि० )।
९--जन्म लग्न मीन राशि के होरा में सूयं हो तो दाहिने नेत्र से काना हो
चन्द्रमा मीन राशि के होरा में हो तो बामनेत्र से काना ( कान० )
१०--चन्द्रमा शुक्र सहित व्यय भाव में हो या सप्तम में हो तो वाम नेत्र से हीन
हो ( स० चि० ) ।
११--लग्न में मंगळ या चंद्र हो गुरु या शुक्र से दृष्ट हो तो काना हो (जा. लं.)
१२--लग्न से सप्तम स्थान स्थित मंगल को सिंह राशि में स्थित चन्द्र देखे या
ककं राशि में स्थित सूर्यं देखे और नवमेश १,८,५,१० इन राशियों में कहीं हो तो
काना हो ( जा० ल॑० ) । 9
१३-व्यय में मंगल हो तो वाम नेत्र और वाम कर्ण में रोग हो, खोटे कर्म से
ब्रणादि हो, कमर घाव तथा स्त्री की अधिक अंगता शो ( जा० सं० ) ।
नेत्र में चिन्ह--१--षष्ठेश या चंद्र कूर ग्रह युक्त होक़र अदृश्याद्ध॑ में हो तो नेत्र
में कोई विशेष चिन्ह हो ( जा० ल॑० ) 1
२- सूर्य के आगे बुघ गया हो तो नेत्र में चिन्ह हो ( जा० ल॑० ) ।
३--चन्द्रमा और मंगल दोनों एक ही नवांश में हों तो नेत्र में कोई छोटा सा
चिन्ह हो ( जा० ल॑०) ।
ये योग कारक ग्रहों के बल के अनुसार भी विचारना । सातवें स्थान के भोग्यांश
से लेकर लग्न के भुक्तांश तक ६ भाव को अदृश्याद्ध कहते हैं ।
बधिर १--सप्तम में शनि मंगल, लग्न में राहु, बुध हो तो दोनों कान से बहिरा
हो, अतिसार की पीड़ा, हाथ पैर में पसीना आना या शीत रोग हो ( शंभु० ) ।
` २--पाप ग्रह ९,११,३ और ५ भाव में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो उनमें
जो बलवान् हो उसके धातु के विचार से बहिरा हो ( वृ० जा० )।
३--शनि सूयं व चन्द्र ये ३,५,९,११ भाव में हों शुभ ग्रह युत दुष्ट न हो तो
बहिरा हो या कर्ण रोगी हो ( जा० भ० ) 1 र
४--पष्ठेश शुक्र लग्न में हो चन्द्रमा एवं पाप ग्रह की उस पर दृष्टि हो तो
दाहिना कान विरूप या वधिर हो ( शंभु० ) ।
५---चन्द्रमा और पाप ग्रह ऋक्ष सन्धि में हो शुभ ग्रह को दृष्टि न हो तो जड़
( बधिर ) हो ( जा० पा० ) ।
६-- द्वितीय किंवा द्वादश भाव में शुक्र या मंगल हो या १,२,४ लग्न में चन्द्र हो
तो कणं रोग, वधिरत्व, पंगुपना आदि विचारना ।
७ - सूर्यं मंगळ चन्द्र में से कोई ४,६,८,१२ स्थानों में से किसी स्थान में हो
३३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
और शत्रु ग्रहों से दृष्ट हो तो वधिर हो ( ज्यो० शा० )।
८-र्पाप ग्रह ३,५,११ भाव में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो कणं नाश हो
{ जा० सं० ) ।
९--मंगल शुक्र २ व १२ भाव में हो तो कणं का हरण हो ( जा० सं० ) ।
१०--बुध छठा हो शुक्र दशम हो रात्रि का अन्म हो तो बाँये कान से बड़े ऊँचे
स्वर से सुनेगा ( शंभु० ) ।
कर्ण रोग १--२ या १२ भाव में शुक्र या मंगल हो तो कर्ण पीड़ा हो या आँख
के गढ़े में विकार हो ( शंभु० ) ।
२--तीसरे घर में मंगल हो प्रेत पुरीशांश में हो तो कान का रोग हो (षष्ठ्यंश
का १२ वाँ अंश प्रेत पुरीशांश है वह बुरा है ( स० चिं० )।
३--जूतीयेश क्रूर आदि षष्ठ्यंश में हो तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० ) ।
४--तीसरा और ग्यारहवाँ भाव गुरु शनि और मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो
कर्ण पीड़ा हो ( फल० )।
५--तृतीय भाव में मंगल से युक्त गुलिक, हो ( जा० पारि० ) ।
६--नृतीय भाव पाप युक्त या दृष्ट हो तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० ) ।
७--तृतीयेश जिसकी राशि में हो वह तथा जिसके अंश में हो वह केन्द्र में पाप
युक्त या दृष्ट हो तो कान का रोग हो ।
८--मंगल तीसरे नवांश में हो तो कर्ण रोग हो ( स० चि० ) ।
९--तृतीग्रेश और मंगल दोनों लग्न में हों तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० )।
१०--दितीयेश लग्नेश के साथ हो और गुलिक मांदि आदि भी साथ हों तो
कात का रोग हो ( स० चि० ) ।
११--तृतीय भाव का स्वामी जहाँ हो उस भाव का स्वामी यदि अष्टम में हो तो कर्ण रोग हो । जैसे मिथुन लग्न में तृतीयेश सूर्ये यदि दशम भाव में मीन का है जिसका स्वामी गुरु यदि अष्टम में हो तो कर्ण पीड़ा हो ( स० चि० ) ¦ कर्ण हीन--नवम भाव में नीच का शुक्र राहु युक्त हो तो कान से रहित हो (स० चि० ) ।
कान कटे १- छग्न में द्वितीयेश शनि या मंगल युक्त हो तो कान कटे । २--पषष्ठेश ओर धनेश लग्न में हों, शनि मंगल कर्म भाव में हो तो कान फरे या कटे ( स० चिं० ) !
इतरजनो का विचार--ऐसा ही विचार पितू आदि का उनके भाव को ठग्न मान कर करना । भावेश ओर उन-उन भाव के कारक ग्रहों के साथ युक्त होने से पितृ आदि का पूर्ण विच्छेद हुआ होगा ऐसा विचारना । हीनांग १--हूयं से सप्तम में मंगल, दशम में चन्द्र और हितीय में शनि होतो वह हीन शरीर का होगा ( जा० सं० ) । २-९ भाव में पाप दृष्ट मंगळ हो तो अंगहीन हो ( शंभु० ) ।
नोरोगता : ३३३
३--शनि दुसरे में, बुध सप्तम, चन्द्र दशम में हो तो उसके अंग कुरूप हों ।
यदि इस योग में, योग पंदा करने वाले ग्रह-युद्ध में हरा दिय जावें (पराजित हों) नीच
शत्रु, या नीचांशक में हो तो शारीरिक अवयव की हानि निश्चयपूर्वक हो (स० चि०)।
४--शनि चतुर्थ, मंगल सप्तम, चंद्र दशम हो तो कोई अंग की हानि या अंग में
कुरूपता हो ( स० चि० ) !
५--शनि सप्तम में हो या राहु मंगल के साथ निर्बल होकर ९ भाव में हो तो अंगहीन हो ( जा० पा० ) ।
६--छग्न से चन्द्रमा १० में, मंगल सप्तम, सूर्य दुसरे में हो तो अंगहीन हो ( जा० पारि० )।
७--हादश भाव में चन्द्र हो तो अंगहीन हो लोगों का घात करने वाला हो
( प्रा० यो० ) ।
हड्डी टूटे १--लग्नेश सहित द्वितीयेश दुष्ट स्थान में हो तो हड्डी टूटे (स.चि.) । २--राहु नवम में हो तो कोई हड्डी ट्टे, नख कुरूप हो । शंभु० ) ।
३--तीसरे भाव में शनि युक्त मंगल हो तो अस्थिभंग दुष्ट करना और विकार
हो । तीसरे भाव में शुभ राशि हो तो उपरोक्त फल न हो ।
लंगडा १--जन्म लग्न में मीन राशि पर चन्द्र हो उस पर मंगल की दृष्टि हो
तो लंगड़ा हो ( जा० पारि० ) ।
२--शनि और चन्द्र दोनों १,४,८,१०,१२ राशियों में से किसी में हो क्र ग्रह
युक्त होकर लग्न से नवम स्थान में हो तो लंगड़ा हो ।
२--लग्न से ८ और ९ इन दोनों स्थान के स्वामी पाप युक्त होकर क्रुर ग्रह से चतुथं स्थान में हों तो पंगु हो ।
४--ल्ग्न से छठे स्थान में शनि मंगल से युक्त राहु हो ।
५--या मंगल शनि युक्त सूर्य में छठे स्थान में हो तो पंगु हो ।
६-छग्न में बारहवें स्थान में शनि व षप्ठंश क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो पंगु
हो (जा० ल०) ।
७--ककं का चन्द्र शनि युक्त हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो पंगु हो (जा०सं०)।
पेर कटे १--दशम में राहु शनि बुध हो तो पेर कटे (जा० छं०)।
२--मंगल लग्न में हो या मंगल के नवांश में लग्न हो ओर क्षीण चन्द्रमा के साथ
हो तो पद छेदन हो (स० चि०)।
३-सूर्यं यदि शुक्र गुरु से दृष्ट हो, शनि मंगल से या राहु से युक्त हो तो पैर
कटे (स० चिञ) ।
पैर का रोग १-शति लग्न से ६ या ८ भाव में हो तो पैर में रोग हो (जा०लं०)
२--षष्ठ स्थान में शनि शुक्र दोनों हों तो पाँव में रोग हो (जा० छ०)।
३--व्यय भाव और धन भाव से भी मेत्रों सदृश पेर का विचार करना व्यय भाव
से बायां, घन भाव से दाहिना पैर विचारना । जब व्ययेश बुरा हो बुरा योग दृष्टि हो
३३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नोच, शत्रु गृही, कूर अंश या करूर वर्ग में हो बांये पैर में रोग हो । इसी प्रकार धन
भाव में हो तो बांये पैर में रोग हो ।
हाथ कटे १--शनि गुरु सहित नवम या तृतीय स्थान में हो, सूर्य अष्टम या द्वादश
स्थान में हो तो हांथ कटे ।
२--चन्द्र ७ या ८ घर में हो मंगल या गुरु से युक्त हो ।
३--नवम में शनि, तीसरे में गुरु हो ।
४--शनि अष्टम और गुरु द्वादश में हो ।
५-दशम भाव में राहु शनि और बुध हो ।
६--षष्ठेण जब शुक्र और सूर्य युक्त हो या शनि राहु युक्त कूर षष्ठ्यंश में हो
(स० चि०)।
७- शनि सूर्य की राशि में और मंगल गुरु की राशि में हो शुभ ग्रह से युक्त न
हो तो भुजदंड का छेदन हो (जा० स०)।
शनि, मंगल या सूय की राशि में पाप युक्त हो तो भुजदण्ड का खण्ड हो
जा० सं०) ।
र हस्त पीड़ा १--छग्न से ६ या ८ घर में सूयं चन्द्र शनि तीनों हों तो हाथ में
पीड़ा हो (जा० लं०) ।
लूला--छठ स्थान में सूर्य मंगल शनि हो ।
कुनखी हाथ पर चोट--तीसरे घर में राहु शनि युक्त हो तो कुनखी हो या
दाहिने हाथ पर लकड़ी की चोट या वायु से पीड़ा हो (शंभु०) 1
हाथ पैर कटे १--कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा सप्तम में हो तो हाथ कटाये (स०चि)।
२--शनि युक्त शुक्र छठे भाव में हो और शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो एक भुजा
और एक पाँव का खण्डन हो (जा सं०) ।
३--बुध मंगल बलवान् हो छठे भाव में हो तो वह चोर हो और इस काम में
उसके हाथ पर काटे जावें (शंभु) ।
४--कर्के में शनि, मकर में मंगल हो वह चोरी के प्रसंग में दण्ड से हाथ पैर
काटे जावें (शंभु०) ।
५--राहु सूर्य मंगल चन्द्र अष्टम में हो तो सब हाथ पाँव से खंडित हो (जा०सं०)
६-छग्न या छठे घर में बुध और मंगल हो तो चोर हो, हाथ पैर नष्ट हो
(मान०) ।
हाथ पैर दुगुने--बुध लग्न से त्रिकोण में हो और सब ग्रह जहाँ कहीं निबेल हो
सो २ मुंह ४ पेर ४ हाथ वाला हो (जा० पारि०) |
बिना हाथ पेर सिर १--पंचम नवम और लग्न का द्रेष्काण पाप ग्रह युक्त हो तो
जातक क्रम से बिना हाथ, पैर, सिर का होवे (जा? पारि०) ।
बिना सिर--छच्न के द्रेष्काण में मंगळ हो, शनि सूर्य और चन्द्र उसे देखते हों सी बिना सिंर वाला हो (जा० पारि०)।
नीरोगता : ३३५
हस्तहीन--यही योग पंचम में हो तो हस्तहीन हो (जा० पारि०) ।
सिर कटे १--क्रूर षष्ठ्यंश में शनि लग्न में हो सप्तम भाव राहु से युक्त हो
दशम में शुक्र हो ऐसा योग हो तो सिर कटे ।
१--क्षीण चन्द्र हो, राहु से दृष्ट शनि हो तो सिर कटे (स० चि०) ।
३--राहु शनि की राशि में हो और चन्द्रमा सूर्य की राशि में हो तो फरसा से
सिर का घात हो (जा० स०)।
४ राहु ककं राशि पर चन्द्रमा सिंह राशि पर हो तो सिर कटे (जार सं०) ।
५-अष्टम में सूर्यं चंद्र दोनों हों तो सिर कटे या अपने अङ्ग को काटने वाला हो (जा० सं०)।
पेट फटे--कृष्ण पक्ष का चंद्र राहु बुध से युक्त हो सूयं से भी अस्त हो (स०चि०) कुक्षि छेदन--शनि लग्न में, शुभ दृष्टि रहित, राहु सूर्य से युक्त क्षीण चन्द्रमा होवे तो कुक्षिं फटे (स० चिं०) ।
जंघा कृश १--दशम में पाप ग्रह हो तो जंघा या घुटना कृश अर्थात् कमजोर हों (स० चिं) ।
अँगुली जुड़ी १--लग्न में पाप युवत चन्द्र हो तो पैर की भेंगुलियां वाम पद का कोई भाग जुड़ा हो या बाँये हाथ मे ऐसा हो (शंभु०) ।
अंग विकल १--सूयं से दूसरे स्थान में शनि, दशम में चन्द्र सप्तम मंगल हो तो अंग विकल हो (स० चिं०) ।
२--दशम में चन्द्रमा, सप्तम में बुध, दूसरे में शनि हो तो शरीर विकलांग (अंग
कला रहित) हो (स० चिं०) ।
३--केतु या राहु लग्न में हो छग्नेश दुष्ट स्थान में हो तो उसकी दशा में जब उसके ६ स्थान के स्वामी की अन्तदंशा हो तो अंग में विकलता हो (जा० पारि०) 1
४--पाप ग्रह शुभ ग्रह के नवांश में होकर षष्ठ भाव में हो और पाप ग्रह से
दृष्ट हो तो उसकी मृत्यु हो या उसे विकल शरीर वाला करे (जा० सं०) ।
५--व्ययेश बली होकर क्र या नीच अंश में हो तो शरीर में विकलता या
कुरूपता हो (स० चिं०) ।
६---व्यय में बहुत पाप ग्रह होवें, व्ययेश शनि, राहु या माँदि से युक्त हो तो
शरीर में विकलता हो (स० चिं०)
७--गुरु शनि के साथ हो, अद्ध चंद्र दशम में हों, सप्तम में मंगल हो तो विकल
हो (जा० पारि०) ।
८--केन्द्र में क्रूर ग्रह या सूर्य चन्द्र हों ।
कुव्ज १--चन्द्रमा पहिले या पिछले नवांश में तीसरे भाव में हो, शनि चोथा हो,
रूम्तेश शत्रु गृही हो, मंगल क्षीण चन्द्रमा के साथ हो तो कुब्ज (कुबड़ा) हो (शंभु०) ।
२--चन्द्रमा अपनी राशि का होकर लग्न में हो उस पर शनि ओर मंगल की
दृष्टि हो तो कुबड़ा हो (जा० पारि०) 1
३३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
वामन १--चन्द्रमा राशि के पहिले या पिछले नवांश में हो शनि चतुर्थ दृष्टि से
देखे, शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो और लग्नेश अल्पराशि में हो तो उसका वामन (छोटा)
शरीर हो (शंभु०) ।
२--पृष्टोदय राशियों में स्थित चन्द्र को लग्न से चतुर्थ में स्थित शनि देखता हो
और लग्नेश मेष राशि में हो तो शरीर वामन हो (पृष्टोदय राशि-मेष वृष कक, धनु,
मकर) (जा० लं०) ।
३--मकर का अन्त्य का (९ रा-२७-० से ३०-०) लग्न हो उसे शनि चन्द्र और
सूर्य देखते हों तो वामन हो (जा० पारि०) ।
ऊँचा शरीर १--मंगल बुध ये दोनों परस्पर सातवीं दृष्टि से देखते हों अर्थात्
मंगल को बुध, बुध को मंगल सप्तम दृष्टि से देखता हो तों लम्बी देह वाला हो
(जा० लं०) ।
पतला शरीर १--क्रूर ग्रह केन्द्र में हो तो विकट अर्थात् पतले शरीर का हो ।
२--एक ही राशि में सूरय केन्द्र में हों तो पतले शरीर का हो ।
३--लग्न में शक्र हो, शनि से दृष्ट हो तो कटि के नीचे का भाग पतला हो ।
४--चतुर्थ में शुक्र हो ओर गुरु युक्त होकर शनि या मंगल या बुध कहीं होतो
कटि के नीचे का अंश व बाहु व पेर पतले हों (जा० ल॑०) ।
दुबला १--सूर्य चन्द्रमा एक दूसरे के घर या नवांश में हों तो शरीर में दुबलापन
हो (स० चि०) ।
२- जन्म राशि का स्वामी, लग्नेश के साथ लग्न से त्रिक स्थान में हो तो दुर्वछ हो (जा० ल०) ।
३-दूसरे में सूर्यं शनि हो, दशम चन्द्र, सप्तम मंगल हो तो वह हीन देह का
हो (जा० म०) ।
४--मेष का चन्द्र शनि युक्त हो बारहवां सूर्य हो लग्न में वक्री ग्रह न हो, मंगल
केन्द्र में न हो तो शरीर कृश हो (शंभु०) ।
५--छग्नेश गुरु हो और अष्टम में शनि हो तो बहुत दुबला पतला हो जीवन
कष्ट में बीते ।
६--शनि राशि स्थान में हो तो दुबला हो ।
३ह में दुर्गन्ध १--शुक्र शनि की राशि में हो तो देह से दुर्गन्ध आवे । २--पषष्ठेश मिथुन कन्या या मकर राशि में हो तो देह में दुर्गन्ध हो । ३- केन्द्र में बुध युक्त शुक्र मिथुन या कन्या राशि में हो । ४-शुक्र व शनि दोनों अपने त्रिशांश में हों या हृद्दा में हों तो देह से दुर्गन्ध आवे ४<-मेष लग्न में चन्द्र हो तो मुख से दुर्गन्ध आवे । ग्रहों की दीप्तादि अवस्था का भी विचार कर फल कहना (जा० लं०) । ६--शुक्र पाप राशि पाप हृद्दा में या चन्द्र क्षेत्र में हो चन्द्रमा मेष का षष्ठेश बुध लग्न में हो तो उसके मुख से दुर्गेन्ध आवे । (शंभु०) ।
नीरोगता : ३३७
भय विचार अरिष्ट
भय विचार--अष्टम घर भय का द्योतक है और लग्न शारीरिक बनावट का
आधार है, षष्ठ घर कर्जे, रोग ओर शत्रु का है । इस कारण सब भय इन घरों से
और इनके स्वामियों से प्रगट होते हें ।
अनेक भय--लग्न में क्रूर ग्रह को लग्नेश बल रहित होकर उसके पीछे कहीं हो
तो अनेक भयों से युक्त हो । देह या मन की व्यथा से युक्त हो (जा० ल॑०) ।'
विष भय १--यदि दूसरा भाव पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हो या दूसरा भाव क्रांश
में हो या उसका स्वामी पाप युक्त यां पाप दुष्ट हो तो विषली औषधियों से धोखा
दिया जायगा (स० चि०) ।
२--तीसरे भाव में कोई ग्रह नीच, शत्रु गृही, अस्तंगत, पाप दृष्ट हो तो विष
प्रयोग से या विष भक्षण से विष का प्रभाव हो इसके अभाव में धन का नाश हो
(जा० पारि०) ।
३-राहु से युक्त लग्नेश हो तो निश्चय ठगेदी से विष का भय हो (जा० पारि०)
सर्प भय १--राहु सपं बताता है । "जस राशि में राहु है उसके स्वामी के सहित
तृतीयेश लग्न में राहु युक्त हो तो सर्प भय हो (स० नि०)।
२--ढितीयेग जहाँ हो उसका स्वामी लग्न में राहु युक्त हो तो सर्प का भय हो
(स० चिं० ) ।
३--तृतीय स्थान में राहु गुलिक से युक्त या दृष्ट हो तो सपं का भय हो
(स० चिं० )। ।
४--तीसरे भाव में शुक्र हो राहु से दृष्ट हो उसमें यदि शनि की भी दृष्टि हो
तो सहोदर भगिनी दुविष से मरे और सपं का भी भय हो ( जा० सं० ) । /
५--तीसरे भाव में शक्र हो शनि से दृष्ट हो तो सर्प भय हो ( शंभु० ) 1
इन योगों में बलवान् शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो काटने से अच्छा हो जायगा ।
६--अष्टम में चन्द्र और मंगल शत्रु गृही हो तो सर्प भय ।
७--लग्नेश षष्ठेश राहु या केतु युक्त हो तो सर्प को पीड़ा, चोटादि भय हो
( जा० पारि० ) ।
शवान भय १--धन स्थान में पाप युक्त या पाप दृष्ट शनि हो कुत्ता काटने का
भय हो ( स० चिं० ) ||
२--द्वितीयेश शनि युक्त या दृष्ट हो तो कुत्ता काटने का भय हो ( स० चिं० )॥
३--शनि मंगल युक्त हो तो कुत्ते से भय हो ( स० चिं० ) 1
४--षष्ठेश मंगल युक्त हो तो कुत्ते से भय ( स० चिं० ) ।
५--लाभ में शनि, राहु, बुध हो तो कुत्ते के काटने की व्यथा हो ( शंभु० ) ।
६- लग्नेश और षष्ठेश दोनों ६ भाव में हों तो १० और १९ वर्ष में कुत्ते का
भय हो ( वू० पा० ) ।
(] २२
३३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
कीट भय १--चन्द्रमा त्रिकोण में सूर्य युक्त हो तो विषले कीड़े के काटने का
अय हो ( स० चिं० ) ।
हाथी भय १--षष्ठेश गुरु से युक्त हो तो हाथी का भय हो ।
२--शनि गुरु युक्त हो तो हाथी का भय हो ( स० चिं०. ) ।
चौपाया भय १--तृतीयेश युक्त गुरु लग्न में हो तो चौपाया (पशु) से भय हो।
२--शनि षष्ठेश हो और राहु या केतु युक्त हो तो पशु से भय हो (स० चिं०) ।
३--तृतीयेश और गुरु लज में राहु से युक्त हों या राहु जिस राशि में हो उसके
स्वामी से युक्त हों तो गाय बैल आदि पशु से भय हो ( जा० पारि० )।
श्युंगी पशु भय १--पष्ठेश शनि सूर्य युवत हो तो सींग बाले पशु से भय हो
( स० चिं० )।
अश्व भय १--षषण्ठेश चन्द्र से युक्त हो तो घोड़ा से भय हो ( स० चिं० )।
मृग से भय १-षष्ठेश, शनि राहु या केतु युक्त हो तो मृग से भय हो (स. चिं.) ।
२--अष्टमेश षष्ट में और द्वादशेश लग्न में हो ओर चन्द्र षष्ठेश के साथ हो
तो ८ वर्ष में मृग से भय हो ( बु० पा० ) ।
वाहन भय १-अष्टमेश लग्नेश चतुर्थेश से युक्त हो तो वाहन से मृत्यु हो
(स० चिं०) ।
२--मंगल युक्त चन्द्र केन्द्र या अष्टम में हो या क्षीण चन्द्र चोथे हो ओर अष्टम
भाव में भी कोई ग्रह हो तो वाहन से भय हो ( स० चिं० )
वृक्ष भय---चन्द्रमा सप्तम में हो और तीसरे में मंगल हो तो १८ वर्ष में वृक्ष से
गिरे ( जा० सं० )।
पक्षी से भय व अग्नि भय १---६-८ भाव में राहु हो उससे ८ वें शनि हो १-२
वर्ष में अग्नि से भय हो तथा तीसरे वर्ष में पक्षी से भय हो ( वृ० पा० ) ।
विचार---इन सब योगों में योगकर्ता ग्रह अपने उच्च का या स्वगृही न हो तब
उवत फल होगा । ग्रह में उच्चादि अच्छी स्थिति होने पर एवं शुभ ग्रह से सम्बन्ध
होने पर उनके फल में ग्रह बल के अनुसार कमी हो जायगी ।
जल में डूबे १--चतुर्थेश जिसकी राशि में है वह चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट हो
तो कुआँ नदी आदि में गिरे ।
२--निर्बेछ्ठ छग्नेश चतुर्थ में हो, नीच के सूर्य से या पाप ग्रह से युक्त तथा जलचराधिप ग्रह से युक्त हो चतुर्थेश बलहीन हो तो जल में डूबे ( स० चिं० ) ।
३--चतुथं में कोई नीच का ग्रह पाप युक्त हो, छट भाव में पाप यकत नीच का
ग्रह हो और ये जळ राशि में हो चतुर्थेश बळ हीन हो तो ताछाब कुआँ आदि जला- शय में गिरे ।
४--निबेल ळानेश चतुर्थ में हो या वह पाप युक्त होकर अपने नीच में हो ओर सूर्य युक्त हो बलहीन चतुर्थश जळ राशि में हो तो जळ में डबे। :
नीरोगता : ३२९
५--सप्तमेश लग्नेश युक्त चतुर्थं में हो और दशमेश से दुष्ट हो तो कुआँ तांछाब
जदी आदि में गिरे ।
६---चतुर्थेश का नवांश स्वामी सप्तमेश या चतुर्थेश युक्त या दृष्ट हो तो भी उपरोक्त फल हो ( स० चिं० ) ।
७--कन्या राशि में सूर्य चन्द्र दोनों हों ओर पाप ग्रह से दुष्ट हों तो जल में
डूबने से मरण हो ( जा० सं० ) ।
८--कर्क पर शनि और मकर पर चंद्र हो तो उपरोक्त फल ( जा० स० )।
६--चतुरस्थ ग्रह नीच राशि में या अस्त हो तो कूप ताळाब आदि में गिरे
( जा० पा०) 1
१०--चतुर्थेश नीच का, अस्त, चतुर्थ भाव में शत्रुगृढी जल राशि का हो
चतुर्थेश हीन बल हो तो कुआँ के किनारे जल समूह में गिरे ( स० चि० ) ।
१ --तृतीयेश गुरु युक्त लग्न में हो ओर जल राश का लग्न हो तो जल से
भय हो ( स० चि० ) ।
१२--धन भाव में चन्द्र हो तो जळ से भय हो ( शंभु० ) ।
१३--छमग्नेश और षष्ठेश चन्द्र के साथ हो तो जल से भय हो ( स० चि० ) ।
१४ -व्यय में चन्द्रमा से युक्त शनि व राहु या केतु हो तो जळ से पीड़ा हो
( जा० सं० ) ।
१५--शनि मंगल राहु से युक्त हो या शनि चतुर्थ भाव में हो तो जल से भय
हो (स० चि० ) ,
१६--लग्न में चन्द्र पाप राशि का पाप ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो जछ से भय हो
(शंभु० )।
१७--जलचर लग्न हो तो जल भें डूबने का भय हो ( जा० पारि० ) ।
१८--चतुर्थ में शनि राहु हो तो वाँध व जछ से व ऊपर से गिरने से व अपने
शरीर से मृत्यु ( जा० सं० ) । ;
१९--यदि शनि अष्टम में क्षीण चन्द्र युक्त हो तो पिशाच पीड़ा हो और पानी
में बहने का भय हो ।
२०--६ या ८ भाव में सूर्य हो और उससे १२वें चन्द्र हो तो ५ और ९ वर्ष में
जल भय हो ( वृ० पा० ) ।
अग्नि भय या विष आदि भय १--छाभ में मंगळ सूर्य हो तो वह अग्नि विष या
अस्त्र चोट से युक्त या पीड़ित हो ( शंभु? ) ।
२--मंगल नवम हो तो अग्नि व विष से पीड़ित हो ( शंभु० )।
३--व्यय में सूर्य व मंगल हो तो अग्नि पीड़ा हो ।
४---गुरु षष्ठ भाव में, शनि अष्टम हो सूयं कक में हो जित पर मंगल की दृष्टि
हो तो अग्नि भय हो ( जा० सं० ) ।
५--लगन में पाप ग्रह पाप राशि का पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अग्नि से दग्ध हो (शंभु)।
३४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
६--लर्त द्रेष्काण के विभाग में सिर स्थान में राहु मंगल या शनि होवे तो सिर स्थान में अग्नि, शस्त्र व काष्ठ से भय हो ( शंभु० ) ।
७--९,७,८,२ भाव में सूर्य से युक्त द्वितीयेश हो मंगल से दुष्ट हो या पाप ग्रह मंगल उपरोक्त राशि में होकर सूर्य से दृष्ट हो तो विस्फोट (ब्रण) या अग्नि का भय हो ( स० चि० ) ।
८--तीसरे भाव में सूर्य या मंगल हो तो हड्डी ट्टे, विष का भय, अग्नि दाह आदि का भय हो।
यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस स्थान के चर्म में भिन्नता कर देता है (शंभु.) ।
९--पंचम मंगल हो तो अग्नि व शस्त्र की पीड़ा हो संतान वराबर मरती रहे, मनुष्य दुःखित रहे ( शंभु० ) ।
१०--नवमेश षष्ठ में हो, षष्ठेश से दृष्ट हो, और षष्ठेश के साथ शनि व मंगल हो तो चोर व अग्नि से पीड़ित रहे ( स० चिं० )। ११--१ ओर ६ के स्वामी राहु युक्त या केन्द्रमै हो तो सिर ददं भय, सिर में चक्कर आने की शिकायत या चोर अग्नि या दाँत का भय हो ( स० चि० )1
१२--छग्नेश शनि से युक्त या दृष्ट हो तो अग्नि शस्त्र का या गिरने से सिर में ब्रण हो ( स० चि० )।
पत्थर की चोट शस्त्र आदि से पीड़ित १--नवम में सूर्य चन्द्र हो तो काष्ठ से पत्थर से तथा शस्त्र से पीड़ा हो (शंभु० )।
२-चतुर्थेश सूर्यं और शनि युक्त हो मंगल से दृष्ट हो, शुभ दृष्ट न हो तो पत्थर से चोट लगने का योग है ( स० चिं० ) 1
३--लग्नेश मंगल लग्न में पाप युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर की चोट या खंड ` आदि से सिर में ब्रण हो (स० चि० )। ४ व्यय भाव बुध से युक्त हो तो शत्रु से व पत्थर काष्ट, लोह, श्वूग वाले जीव या पवन आदि से वाधा हो ( जा० सं० )1 चोर ठग या राज भय १--लग्नेश शनि से युक्त य! दृष्ट हो तो निश्चय ठग चोर व राजा से भय हो ।
२--छग्न में राहु शनि मंगल युक्त हो । ३-- लग्नेश अष्टम में राहु या केतु युक्त हो । ४-लग्न में राहु त्रिकोण में गुलिक और अष्टम में मंगल केतु युक्त या मंगल शनि युक्त हो या इसमें वृहज्जीव हो या अष्टमेश स्थित राश्यंशेश राहु युक्त हो तो ठग चोर या राजा से भय हो । (वृहज्जीव-शनि मंगल युत राहु को कहते हैं) ( स० चि० ) । ५-- द्वितीयेश के साथ पाप युवत सूर्य हो तो राजा के कोप का भय हो (सर्णच) ७- लग्नेश पाप युक्त हो रून में राहु हो तो ठग चोरों से भय हो।
_ नीरोगता : ३४१
| ८--छग्न में पाप ग्रह गुलिक त्रिकोण में हो या लग्न व लग्नेश गुलिक युक्त हो
तो ठग और चोरों से भय हो (स चिं)।
चोर दुःख--लग्नेश, बुध, गुरु, शुक्र व चन्द्र यदि नीच के, अस्तंगत, पराजित,
पापाक्रांत, वक्री, अनुवक्री, आगे वक्री होने वाला हो और त्रिक में हो तो चोर दुःख,
पीड़ा, दरिद्र, रोग, भ्रमण, शत्र भय, वस्त्रहीन आदि अपनी दशा में करें । चोर और प्रेत भय १--लग्न में बुध केतु हो पाप दृष्टि हो तो चोर और प्रेत
आत्माओं से भय हो (स० चिं०) ।
पिशाच पीड़ा १--राहु और शनि यें पिशाच के सूचक हैं जिस पर पिशाच हो
वह उदास बलहीन, भयानक स्वप्न से पीडित, लगातार मानसिक भय, उत्तेजना,
अजीर्ण कभी-कभी दस्त और चक्कर आते हैं।
२-ण्लग्त में शनि राहु हो तो पिशाच की पीड़ा हो (स० चि०) ।
३--द्वितीय में शमि व राहु हो तो भूत पिशाच आदि कृत रोग हो (जा०स०) । ४--पष७ठ में राहु केतु पाप दृष्ट होकर क्रूर नवांश में हो तो पिशाच पीड़ा हो (स० चिं०) ।
५--चन्द्र लगन में हो और राहु ग्रस्त हो (ग्रहण का समथ हो) और त्रिकोण में
पाप ग्रह शनि मंगल हो तो उस पर पिशाच की वाधा लगी रहे (वृ० जा०) ।
६--अष्टम में निवळ चन्द्र, शनि सहित होवे तो पिशाच और जल से उत्पन्न
पीड़ा हो ।
७--क्षोण चन्द्र अष्टम में मंगल, राहु य! शनि में से किसी से युक्त हो तो भी
उपरोक्त फल हो (स० चि०) ।
८--उपरोक्त प्रकार से क्षीण चन्द्र दुष्ट स्थान में हो तो पिशाच की पीड़ा हो
और मृत्यु हो ( स० चि० ) ।
अर्थात् क्षीण चन्द्र मंगल राहु या शनि युक्त होकर ६-८*१२स्थान में हो तो
पिशाच पीडा या पागलपन से मृत्यु हो ।
९--क्षीण चन्द्र अष्टम में राहु युक्त हो और दूसरा भाव पाप युक्त हो तो
पिशाच पीड़ा से मरे ( स० चि० ) 1
अध्याय ११
राजयोग
राज योग का अर्थ--राज कुल में या . दुसरे कुल में जन्मा मनुष्य राज्य करे
अर्थात् अधिकार प्राप्त करे या राज्य का कारवार करे अति द्रव्यवान् हो ।
राजा का अर्थ--मुखिया या अधिकारी, कई मनुष्यों के ऊपर जिसका राजा के
समान अधिकार प्राप्त हो, शक्ति धन बल आदि जिसके पास हो ।
राज योग का अभि प्राय--राज योग का यह अभिप्राय नहीं है कि वह अवश्य ही
राजा हो जाएगा । परन्तु राज योग का अर्थ यह है कि जिसके जन्म काल में राजयोग
पड़ा है वह भाग्यवान् होता है ।
जो भाग्य भाव फल कहे हैं वह सब ऐश्वयं आदि का निश्चय राज्य योग से होता
है । उन योगों के कारण जन्म की सफलता होती है ऐसे योग राज योग में वतलाये हैं।
राज योग कारक ग्रहों का जेसा वल हो उसी योग्यतानुसार अधिकार या सरकारी
अधिकार या राज घराने में नोकर या व्यापारी होगा ।
किसी दरिद्र के घर में जन्मे किसी बालक को राज योग हो तो उसका आशय यह नहीं है कि वह राजा ही होगा परन्तु वह भाग्यवान होगा खाने पीने से तंग न रहेगा अपने कुल में श्रेष्ठ होगा । राजा का अर्थ यहाँ अधिकारी लेना चाहिये । राजा तो
अब होते ही नहीं परन्तु राज्य के बड़े-बड़े अधिकारी होते हैं ।
यवनाचार्य का मत है कि किसी गरीब के घर में किसी सन्तान को राजयोग हो तो उसे अरिष्ट होगा नहीं जीवेगा । यदि वच गया तो राजा के समान अधिकारी होगा ।
यवन एवं इतर आचायो ने कई राजयोग कहे हैं जिनमें राजा के समान अधिकार और शक्ति मिलती है । वह केवल उन्हीं लोगों को मिलती है जो राज घराने के हैं । परन्तु यदि ऐसा राजयोग पाप ग्रहों का ऐसे लोगो को प्राप्त हो जो राज घराने के नहीं हैं, उनकी मृत्यु होती है ।
जीवशर्मा का कहना है कि पाप ग्रह उच्चवर्ती होने से राजा नहीं होता किन्तु धनवान् होता है।
राज योग कई प्रकार के हँ । राजयोग कारकांश और जन्म लग्न दोनों से विचा- रना, एक आत्मकारक और पुत्र कारक से दूसरा लग्नेश और पंचमेश ते । इन दोनों के परस्पर सम्वन्ध और बल के अनुपार ही पूर्ण आधा या चतुर्थांश फल होता है । १ उच्च के ग्रह का फल
१ ग्रह उच्च का--कदयं ।
२ ग्रह उच्च का--बड़ा उत्कट काम करता है ।