सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
३८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
३--गुरु अस्त हो और ३ ग्रह नीच के हो, और जन्म लग्न कुंभ हो तो राजयोग
नष्ट हो ( जा० भ० ) ||
४--गुरु अस्त हो, एक भी ग्रह उच्च में न हो, दशम में पाप ग्रह हो तो राजयोग
नष्ट हो ( शंभु० ) ।
५-- लर्न में मकर का गुरु परम नीचगत हो तो राजयोग में भी उत्पन्न दरिद्री हो ( शंभू. ) । शुक्र का
६--शुक्र नीच या सिंह के नवांश में हो तो राजयोग नष्ट हो।
७--शुक्र परम नीच अंश में हो तो राजयोग: नष्ट होकर पतन हो (जा०भ० )r
८--शुक्र अस्त हो, या नीचगत हो, सब ग्रह केन्द्र में हों और शुभ ग्रह ६,८१२
भाव में हों तो सब राजयोग भंग हों ( शंभु० ) ।
९--शुक्र नीच का होने से राजयोग नष्ट होता है ( स$ चि० ) ।
चन्द्र का
१०--चन्द्र अस्त हो ४ ग्रह नीच या शत्रु क्षत्री हों, केन्द्र ग्रह शून्य हो या उसमें
शुभ ग्रह न हों तो राजयोग नष्ट हो ( जा० सं० )।
११-चन्द्रमा परम नीच अंश का हो या चन्द्र परम -नीच हो तो राजयोग
नष्ट हो ।
१२--चन्द्रमा तुला के १० अंश पर हो तो हजारों योगों को भंग करता है।
१३--नीच का हो तो भाग्य नष्ट करता है।
१४--चन्द्रमा या लग्न को एक भी ग्रह न देखे तो राजयोग नष्ट हो (शंभु०) ४
१५--क्षीण चन्द्र को पाप ग्रह देखते हों और शुभ ग्रह नहीं देखते हों और सूर्य
स्व नवांश में हो तो पहिले राज्य प्राप्त हो पश्चात् राजयोग नष्ट होकर दुःखी हो,
आशा नष्ट हो ( जा भ०-)।
१६--बलहीन चन्द्र चरराशि के अन्त भाग में, स्थिर राशि के आदि में, दविस्थभाव
राशि के मध्य में हो और कोई भी ग्रह लग्न में न हो तो राजयोग भंग हो (जा. पारि.)
इतर ग्रहों के योग
१७--मंगल सूर्यं शनि ३,६,११ स्थानों में हों, शुभः ग्रह केन्द्र में न हो या अस्तंगत
हो, या शुभ ग्रह सप्तम हो राहु लर्न में हो चन्द्र की दृष्टि उस राहु पर हो राजयोग
नष्ट हो ( जा० भ० )1 ;
मतांतर--सूर्यं मंगल शनि १,६,११ भाव में हों शेष पूर्वोक्तं ।
१८-¬सूर्यं उच्च का नीच नवांश में हो तो राजयोग नष्ट हो । इस योग में पाप
दुष्ट सूर्य लग्न में हो तो निश्चय राजभंग हो ( स० चि० ) ।
१९--सूये परम नीच का हो तो हजार राजयोग नष्ट हों ( स० चि० )। -
२०--छनम में राहु हो चन्द्र से दुष्ट हो तो राजयोग भंग हो ।
२१-५ ग्रह नीच के हों या अस्त हों तो राजयोग भंग हो ।
राजयोग: ३८९
२२--सब पाप ग्रह केन्द्र में हों नीच या शत्रु के घर के हों और सोम्य ग्रहों की उन पर दृष्टि न हो शुभ ग्रह ६,८,१२ भाव में हों तो राजयोग नष्ट हो (जा० भ०) । २३--इसी प्रकार नीच शत्रु राशि आर पाप षष्ठ्यंश वाले ग्रह राजयोग नष्ट करते हैं ( जा० पारि० )।
२४--९,१०,११ स्थानों के स्वामी नीच के हों तो सव राजयोग नष्ट हों ।
२५--उच्च के ग्रह नीचांशक में हों तो राजयोग नष्ट हो ।
२६--सब पाप ग्रह नीच के केन्द्र में हों ।
२७--सब पाप ग्रह ३,६,११ स्थानों में हों ।
२८--सौम्य ग्रह ६;८,१२ घरों में हों ।
२९--सोम्य ग्रह अस्तंगत हों या केन्द्र में न हों तो राजयोग नष्ट हो । ३०--घरों केन्द्रों में शुभ ग्रह न हों या केन्द्र में जो गृह हों वे अस्त व नीच में हों या शत्रु गृही हों ( जा० भ० ) । ३१--चारों केन्द्र शून्य हों शुभ गृह अस्त हों या नीच में हों या ४ गृह शत्रु क्षेत्री हों तो राज योग भंग हो ( जा० सं० ) ।
३२--चारों केन्द्रों में पाप ग्रह हों और द्वितीय में भी पाप ग्रह हों तो वह अति दरिद्री वंश वाले को भय प्रद है ( जा० सं० ) । ३३--राजयोग कारक ग्रह नीच शत्रुक्षेत्री या अस्त हो.या नीच या शत्रुक्षेत्री ग्रह से दृष्ट हो तो राजयोग भंग हो ( जा० पारि० ) ;
३४--दशम भाव में नीच का ग्रह हो तो राजयोग भंग हो ।
३५--शत्रु राशि में सब ग्रह हों चाहे नवांश में या वर्गोत्तम में हों तो राजयोग
नष्ट हो ( शंभु० ) ।
३६--वहुत ग्रह नीच में हों तो राजयोग नष्ट हो ( शंभु० ) । ३७--लग्न में एक भी ग्रह नीच का हो ओर दशम में पाप ग्रह हो तो राजयोग
नष्ट हो ।
३८--यदि ४,५ या ६ ग्रह एक स्थान में हों तो राजयोग नष्ट हो पर भिक्षुक हो।
३९--जितने राजयोग नाशक योग हैं, जितने रेका (दरिद्र) योग हैं, जितने प्रेष्य
( दूसरे की नौकरी ) योग और केमद्रुम योग हैं ये चारों प्रकार के योग शुभ नाशक हैं
{ जा० पारि० ) ।
४०--जन्म में उल्कापात हो या व्यतीपात योग हो या धरती कम्पायमोन हो, फट जावे या जन्म समय पूछल तारा का उदय हो तो राजयोग में भी उत्पन्न हुआ
दरिद्री होता है ( शंभु० ) 1
अध्याय १२
नाभस आदि योग
योग--जन्म कुंडली में जो ग्रह हैं उनका अधिकार एक-एक दूसरे ग्रह से दृष्टि
आदि द्वारा सम्बन्ध एवं ग्रहों की स्थिति के अनुसार ग्रहों का जो विशेष योग बनता हैः
यहाँ उनके नाम दिये हैं ओर उनका फल बताया है। नाभस आदि अनेक इस प्रकार
के योग आगे दिये हैं ।
थोग के फल का समय
इन योगों का फल उस ग्रह की दशा में होता है । दशा आरम्भ काल में ग्रह स्पष्ट
के अनुसार यवनाचार्य ने ऐसे १५०० भेद कहे हैं कोई आचार्य पृथक असंख्य भेद
बतलाते हैं ।
१ आकृति योग के २० भेद
१. गदायोग--केन्द्र के पास मिले किसी दो भाव में सव ग्रह हों तो गदायोग
होता है । इसक्रे ४ भेद हैं ।
(१) लग्न और चतुर्थं में सब ग्रह, (२) चतुर्थं और सप्तम में सव ग्रह, (३)सप्तम
और दशम में सब ग्रह, (४) दशम और लग्न में सब ग्रह । यवनमत से इन चारों भेदो
के पृथक-पुथक नाम भी दिये हैं ।
(१) लग्न और चतुर्थ में सब ग्रह-गदा । (२) चतुर्थ और सप्तम में सव ग्रह-शंखः
(३) सप्तम और दशम में सब ग्रह-बच्चुक । (४) दशम और लग्न में सब ग्रह=ध्वज ।
नाभस आदि योगः ३९१
२. शकट योग- केन्द्र
३, विहंग योग--चतुथं और दशम में ४. श्युगाटक योग--लग्न, पञ्चम सब ग्रह हों । ओर नवम में सब ग्रह हों ।
५. हुल योग--लग्न छोड़कर परस्पर त्रिकोण में सब ग्रह हों।
इसके ३ भेद हैं (१) २, ६, १० स्थान में सब ग्रह ।
(२) ३, ७, ११ स्थान में सब ग्रह ।
(३) ४, ८, १२ स्थान में सब ग्रह ।
३९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
आरु गाटक के १, ५, ९ स्थान छोड़कर अन्य त्रिकोण में सब ग्रह ।
हल योग के उदाहरण:--
६. बज्न योग--सव शुभ ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब पाप ग्रह चतुर्थ
और दशम में हों ।
नाभस आदि योग; ३९३
मतांतर
कुछ विद्वानों का कहना है कि १,७ आव में शुभ ग्रह और ४,१० भाव में पाप ग्रह हों तो वच्ञ योग होता है। परन्तु सूर्य से चौथे स्थान अन्तर पर चुघ शुक्र आना असभव है । सब ग्रह केन्द्र में होने
से तो कमल योग होता है। यहाँ पाप और शुभ ग्रह का पृथक कारण हो गया है । चारों केन्द्र में इस प्रकार पाप-शुभ ग्रह के अनुसार ग्रह आना असंभव है इससे उपरोक्त हल योग पृथक-पृथक दो प्रकार से चताये हैं ।
७. यव योग--वह वज्र योग का उल्टा है अर्थात सब पाप ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब शुभ ग्रह चतुर्थ ओर दशम में हों ।
सतांतर--
यहाँ भी विद्वानों का कहना है कि १,७ भाव में पापग्रह और ४,१० भाव
में शुभ ग्रह हों तो वस्न योग होता है ।
यहाँ भी उपरोक्त विचार होता है कि सूर्य
से शुक्र बुध चौथेभाव में नहीं जा सकते
इस प्रकार तो कमल योग होता है । परन्तु 2
शुभ ओर पापग्रहों के विचार से यहाँ भी दो उपरोक्त प्रकार से योग बताये हुँ ।
८. कमल योग--चारों केन्द्र में शुभ-पाप ९. वापी योग--यह कमल योग का सभी ग्रह हों और पणफर आपोक्लिम उल्टा है । अर्यात. सभी ग्रह केन्द्र के में ग्रह न हों अर्थात् सब केन्द्र में ही हों बाहर हों। केन्द्र मे कोई ग्रह न हो केन्द्र के बाहर ग्रह न हों इसमें शुम-पाप के इसके भी २ भेद हैं ! क्रम का कोई विचार नहीं है, जैसा यहां (१)सब ग्रह २,५,८,११(पणफर) में ।
बताया है 1 (२)सब ग्रह ३,६,९,१२(अपो क्लिम) में।
यक त क्क pe ह
३९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
११. शर (इणु या इषु) योग-चतुर्थ
१०. यूप (यूपक) योग- लग्न से चतुर्थ से सप्तम तक सब ग्रह हों जैसा यहाँ
तक सब् ग्रह हों अर्थात्, १, २, ३ और बताया है अर्थात् लग्न से ४,५,६,७ भाव
४ भावों में सबग्रह हों । में सब ग्रह होना । ८
१२. शक्ति योग--सप्तम से दशम भाव १३. दंड योग--दशम भाव से लग्न
तक सब ग्रह हों अर्थात् लग्न से ७,८,९, तक सब ग्रह हों अर्थात लग्न से १०,११,
१० भाव में सब ग्रह हों । १२ और ९ स्थान में सब ग्रह हाँ ।
१४. नौका योग- लग्न से सप्तम तक १५ कूट योग--चतुर्थ भाव से दशम
प्रत्येक भाव में एक-एक गृह हो ७ भाव भाव तक प्रत्येक भाव में एक-एक करके ७
हक ७ गृह हों || गृह ७ स्थानों में हो ।
oo =
नाभस आदि योग : ३९%
१६--छत्र योग-सप्तम से लग्न तक १७--चाप (धमुष-कामुंक) योग-दश सब ग्रह हों । प्रत्येक भाव में गृह हों। भाव से चतुर्थं भाव तक सब गृह हों एक एक करके ७ गूह ७ स्थानों में हों ।
१८--अद्धंचंद्र योग-पूर्वोक्त नौका, कूट, छत्र और चाप में जो योग बताये हैं उनको छोड़ कर उनके विरुद्ध शेप किसी स्थान से लगातार सव गूह एक-एक करके
७ स्थानों में हों इसके ८ भेद हो जाते हैं।
[१] २ भाव से ८ भाव तक लगातार ७ घरों में १,१ गृह ।
[२] ३ भाव से ९ भाव तक लगातार ७ घरों में १,१ गृह ।
[३] ५ भाव से ११ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[४] ६ भाव से १२ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[५] ८ भाव से २ भाव तक लगातार ७ घरों में १-५ गृह ।
[६] ९ भाव से ३ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[७] ११ भाव से ५ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह ।
[८] १२ भाव से ६ भाव तक लगातार ७ घरों में १-१ गृह 1
३९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नाभस आदि योग : ३९७
१९--समुद्र ( जलधि ) योग-द्वितीय २०--चक्र योग--लग्न से एकादशं भाव तक १-१ घर छोड़कर सभी गूह अर्थात् १,३,५,७,९,११ इन भावों में गृह हों यह समुद्र का उल्टा है ।
(६) वजू, (७) यव, (८) कमल, (९) वापी योग पर बिचार प्राचीन ग्रंथों के अनुसार वस्न आदि योग लिखे गये हैं परन्तु सूर्य से चौथे घर में बुध तथा शुक्र कंसे हो सकते हैं सूर्य से बुध या शुक्र २८ अंश और ४८ अंश से अधिक दूरी पर नहीं हो सकते अर्थात् सूर्य से बुध शुक्र दूसरे या तीसरे भाव से अधिक द्र नहीं हो सकते । भारतवषं में इन योगों का होना असंभव जान पड़ता है । कुछ विद्वानों का कहना है कि सूर्य से बुध शुक्र चौथे स्थान पर इस प्रकार हो सकते हँ कि सूर्य अंतिम २९ अंश के अंत में एक भाव में हो ओर २ राशि छोड़कर चौथे ठिकाने थोड़े अंश से बुध या शुक्र हो । २ संख्या योग--इसके ७ भेद हैं । पूर्वोक्त योगों में से कोई योग न हो तब इन योगों का विचार करना । १-वीणा (वल्ली-वल्लकी) योग यदि ७ स्थानों में सव ग्रह हों । २-दाम ( दमनिका-दामनी-रज्जू ) योग-केवल ६ स्थानों में सब ग्रह हों। ३- पाश योग = केवल ५ स्थानों में सब ग्रह हों । ४-केदार योग = केवल ४ स्थानों में संव ग्रह हों । ५-शूल योग = केवल ३ स्थानों में सब ग्रह हों । ६-युग योग = केवल २ स्यान में ही सव ग्रह हों ७-गोल (गोलक) योग-केवछ १ स्थान में ही सब ग्रह हों। विचार-संख्या योद की प्राप्ति में आकृति योग हो तो संख्या योग का फल नहीं दोगा आकृति योग का ही फल होगा । संख्या योग के भेद १. एक-एक ग्रह पृथक रहने से-७ भेद । २. २ ग्रह साथ रहने से -२३ भेद । ३. ३ ग्रह साथ रहने से -३५ भेद। ४. ४ ग्रह पाथ रहने से -३५ भेद । ५. ५ ग्रह साथ रहने से -२१ भेद । ६. ६ ग्रह साथ रहने से - ७ वंद । ७. ७ ग्रह साथ रहने से - १ भेद ।
योग १२७
३९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
इनके भेदों के उदाहरण
१. एक ग्रह एक ही स्थान में होने से ७ होते हैं अर्थात् पृथक एक ही ग्रह रहने
सब ७ योग ७ ग्रहों के होते हैं (वीणा योग) ।
२. दामनी योग > २ ग्रह एक साथ होने से २१ भेद होते हैं--
१ सूर्यं चंद्र ८ चंद्र बुघ १५ मंगल शनि
२ सूर्यं मंगल १ चंद्र गुरु १६ बुध गुरु
३ सूर्य बुध १० चंद्र शुक्र १७ बुध शुक्र
४ सूर्य गुरु ११ चंद्र शनि १८ बुध शनि
५ सूर्य शुक्र १२ मंगल बुघ १९ गुरु शुक्र
६ सूर्य शनि १३ मंगल गुरु २० गुरु शनि
७ चंद्र मंगल १४ मंगल शुक्र २१ शुक्र शनि
३. ३ ग्रह एक साथ होने से ३५ भेद हो जाते हैं ( पाश योग के )
१ सूः च. मं. ८ सूः मं. शु. १५ सू. शु. श. २२चं. बु. शः २९ मं. गु. शु.
२ सू. चं. बु.
३ सू. चं. गु.
४सू. चं. शु.
५ सू. चं.श.
६ सू. मं. बु.
७ सू. मं. गु.
९ सू.मं. शः १६ चं. मं. बु. २२चं.गु.शु. ३० मं. गु. श,
१०सू. बु. गु. १७चं. मं. गु. २४ चे, गु. शः ३१ मं. शु. श.
११सू. बु. शु. १८ चं. मं. शु. २५चं.शु.श. २२ वु. गुः शु,
१२सू. बु. श. १९ चं. मं. शः २६ मं. वु. गु. ३३ वु. गु. शः
१३सू. गु. शु. २० चं. बु. गु. २७ मं. बु. शु. ३४ बु. शु, श.
१४.सू. गु. श. २१ चं. वु. शु. २८ मं. वु. श. ३५ गु. शु. श.
४, केदार योग--४ ग्रह एक साथ रहने से ३५ भेद हो जाते हैं सूर्यं सहित २०
-भेद, चंद्र सहित १० भेद, मंगल सहित ४ भेद, बुध सहित एक भेद सब ३५ भेद
१ सू. चं. मं, बु.
२ सू. चं. मं. गु.
३ सू. चं. मं. शु.
४ सूः चं. मं. श
५ सू. चं. बु. गु.
६सु. चं. बु. शु.
७ पू. चं. बु. श.
८ सू, चं. गु. श.
९ सू. चं. गु. श.
१० सू. चं. शु. श.
११ सू, मं. बु. गु.
१२ सू. मं. बु. शु.
१३ सू. मं. बु. श.
१४ सू. मं. गु. शु.
१४ सू. मं. गु. श.
१६ सू. मं शु. श.
१८ सू. बु. गु. शु.
१८ सू. बु. गु. श.
१९ सू. बु. शुः श.
१० सू. गु. शु. श.
२१ चं. मं. बु. गु.
२२ चं. मं. बु. शु.
२३ चं. मं. बु. श,
२४ चं. मं. गु. शु.
२५ चं. मं. गु. शः
२६ चं. मं. शुः श.
२७ चं. बु. गु. शु.
२८ चं. वु. गु. श.
२९ चं. वु. शुः शः
३० चं. गु. शु. शः
३१ म॑. बु. गुः शुः
३२ सं. बु. गु. शः
३३ मं. बु. शु. शः
३४ मं. गु. शु. श.
३५ बु. गु. शु. शः
५, शूल योग के भेद--५ ग्रह एक साथ होने ये २१ विकल्प होते है ।
नाभस आदि योग : ३९९
. वु. गु २ सू. चं. मं. वु. ८ सू. चं. वुः गु. श, १५ सू. वु. गु, शु. श,
३ सू. चं. शु ९ सू. चं. बु. शु. श. १६ च. मं. बु. गू. शु.
डे सू. च॑,
मं. बु. श १० सू. चं. गु. शु. श. १७ चं. मं. बु. गु. श,
५ सू.
मं. गु. शु ११ सू. मं, वु. गु. शु. १८ चं. मं. बु. शु, शे.
६ सः चं.
चं. मं. गु. श १२ सू. मं. बु. मु, श १९ चं. मं. गु. शु. श.
७ सू. मं. शु. श. १३ सू. मं. बु. शु. श २० चं. बु. गु. शु. श. चं. बु. गु. शु. १४ सू. मं. गु. शु. श. मं बु. गु. शु, शः ५ ° २१ ६. युग योग में ६ ग्रह एक साथ होने से ७ भेद हो गये हैं । १ सूर्य चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु शुक्र ५ सुयं, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि २ सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शनि ६ सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि है सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र, शनि ७ चन्द्र, मंगल: बुध, }
७.
४ सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, त शनि RST गोल योग--७ ग्रह एक स्थान में होने से १ ही भेद होता है। १. सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि । ३. आश्रय योग--चर-स्थिर-द्विस्वभाव में उत्पन्न इन तीन प्रकार की राशियों के आश्रय होने के कारण “आश्रय योग” कहे जाते हैं । १--रज्जू योग-सभी ग्रह चर राशियों में हों। २~~मूसल योग-सभी ग्रह स्थिर राशियों में हों। ३--नल योग-सभी ग्रह॒ द्विस्वभाव राशियों में हों । ४. दल योग-इसके २ भेद हैं । १--माला (सरग) योग-सव शुभ ग्रह केन्द्र में हों पाप ग्रह केन्द्र में न हों । २--सपं योग-सब पाप ग्रह केन्द्र में हों शुभ ग्रह केन्द्र में न हों । यहाँ तीनों केन्द्रों में सब शुभ ग्रह हों और पाप ग्रह केन्द्र के बाहर हों तो माला योग होता है । इसके ५, विरुद्ध सपं योग है जिसमें तीनों केन्द्रों में पाप ग्रह हों और शुभ- ग्रह केन्द्र के बाहर हों ।
इन योगों के फल पर विचार
१--संख्या योग की प्राप्ति में आकृति योग भी हो तो आकृति योग फल देगा । संख्या योग का फल नहीं होगा । - २--आश्रय योग में आकृति योग हो जावे तो आकृति योग ही फल देगा । रै--दल योग में संख्या योग की प्राप्ति हो तो दछ योग ही फल देगा । ४--दल योग और आश्रय योग मिल्वां हो तो उपरोक्त दल योग सरीखा साधारण फल होगा ।
५---संख्या योग में पूर्वोक्त आश्रय योग भी हो तो आश्रय योग ही फल देगा । संख्या योग का फल नहीं होगा । आश्रय योग न हो तब संख्या योग फल देगा ।
६--आश्रय योग में-शुभ ग्रह शुभ फल देते हैं पाप ग्रह पाप फल देते हैं आश्रय योग में उत्पन्न प्राणी कुछ विख्यात होता है ।
४०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१. आकृति योग के फल
१--गदा-सदा धनोद्योगी, यज्ञ करने वाला, शास्त्र और संगीत में निपुण, स्वर्णे
रत्न आदि धनों से युक्त (वृ० पा०) । शस्त्र योग में प्रवीण, शीघ्र कहे हुए शब्द के
अर्थ में तत्पर, यज्ञ करने वाला, धनी और सम्पन्न (ल० चं०) । अनेक शास्त्र और
अनेक मंत्रों में तत्पर, गाने बजाने में चतुर, यज्ञ करने वाला, उग्र वेर करने वाला
शत्रुओं से युक्त, भूषण सहित, स्त्रियों वाळा (जा० भ०) ।
२--शकट~गाड़ी, रथ, छकड़े आदि के काम आजीवन करे, नित्य रोगी, उसकी
स्त्री निंदा योग्य हो (वृ० जा०) । दीन हीन, मित्र और वैभव युक्त कृश खोटी स्त्री
को प्राप्त, त्याग करने वाला (जा० भ०) । निधि के काम में निपुण, स्थिर द्र व्य, सुखी,
प्रसन्न मुख, और नेत्रों वाला, सदा ही तप्त, मूर्ख, कुभार्या वाला, रोगों से व्याकुळ
कष्ट युक्त जीविका, दरिद्री, भाइयों से हीन [छ० चं०]। रोगी, कुनखी मूखं, गाड़ी से
जीविका, निर्धन, मित्र आदि जन से रहित [वु० पा०] ।
३--विहग [पक्षी]-पराये भोजन से पर कायं को जाने-आने वाला और भ्रमण
करने वाला, कलह करने वाला [त्रु जा०] । भोगों सहित, त्यागों से उत्पन्न सोख्य
वाला, यात्रा में प्रीति, नित्य ही परदेश जाने वाला, बहुत बोलने वाला [जा० भ०]।
घूमने में अत्यन्त रुचि, प्रसन्न, सुरत से जीविका प्राप्त होने वाला, निकृष्ट और लड़ाई
प्रिय वाळा [ल० चं०]। भ्रमण शीळ, परतंत्र, दूत, सुरत से जीविका करने वाला,
ढीठ, झगड़ालू [वृ० पा०] ।
४--श्यगाटक-वुढ़ापे तक सुखी [वृ० जा०]। उत्कृष्ट राजा, साहंसी, युद्ध का
इच्छुक, सौख्य युक्त, बडा बुद्धिमान्, पहली स्त्री से बेर करने वाला [जा० भ०] ।
हंसने में सुखी, सुन्दर स्त्री वाला, राजा से डरने वाला, लड़ाई में प्रसन्न, धनवान्, स्त्री
का दास [ल० चं०] । कलह कारक, योद्धा, सुखी राजा का प्रिय, सुन्दरी पत्नी, धनी,
स्त्री का द्वेषी [वृ० पा०]।
५--हरू-कृषि कर्म या पशु पालन आदि करे [वृ० जा०] । दूत, साध ओर
मित्रों से रहित, खेती से आजीविका, अत्यन्त दुःखों का भोगी, क्लेशो को प्राप्त, धन
हीन [जा० भ०] । बहुत भोजन करने दारी, ८रिद्री, कृषि कर्म से वजित, उद्देग युक्त,
दुःखित और दास [७० चं०] । वहु भक्षी, दरिद्र, कृषक, दुःखी, भाई वन्धुओं से युक्त [वृ० पाश] । ६. वच्च--वालक वृद्ध और प्रथम अवस्था में सुखी, युवावस्था में दुःखी, सब का
प्यारा, अति शूर [वृ० जा०] । पहिली अवस्था में जीविका को प्राप्त, अंत में सौख्य
को प्राप्त, भाग्यवान्, जवानी में भाग्यहीन, काम-क्रोध युक्त [जा० भ०]। सुखी
सौभाग्यवान्, शूर मध्य अवस्था में भाग्यहीन, स्नेह रहित विष्द्ध करने वाला, दुष्ट
[छं० चं०] वाल्य और वार्धक्य में सुखी, शूर, सुन्दर, निस्पृह, भाग्यहीन, खल और
लोगों का विरोधी [वृ० पा०[ 1
७. यव--पराक्रमी, वाल वृद्ध अवस्था में दुःखी, तरुण अवस्था में सुखी [वृ०जा०]
इन सब योगों के पूर्ण फल आगे दिये हैं ! ठ
~
नामस आदि योग : ४०१
जवानी में धमं काम अर्थ सम्पत्ति सहित, नम्रता सहित, सदा उत्साही, श्रेष्ट बत्ति वाला शांत चित्त क्रोध रहित [जा० भ०] । दाता, स्थिर चित्त, प्रतापी, नियमों से यक्त, मध्य अवस्था में सुख, और पुत्रों से युवत [ल० च॑०]। योग में वृत नियम सुकमं में तत्पर, मध्यावस्था में सुखी, धन पुत्र से युक्त, दाता, स्थिर बुद्धि [वृ० पा०] । ८. पद्य [कमल]-सवंत्र निदित, कीति और अगणित सुख, ग् ण, विद्या एवं पराक्रम वाला ( वृ० जा० ) । सदा बड़े हर्ष वाला, बलवान्, सुन्दर कांति, यशवान, राजा के वंश में उत्पन्न बड़ी आयु वाला ( जा० ० )। स्थिर आयु वाला, बड़ी कीति युक्त, मनोहर शुभ पुत्रों से युक्त, गुण और मद से भी युक्त ( छ० च० ) । धनी, गुणी, दीर्घायु, विख्यात यश, शुद्ध, सैकड़ों सु कमं करने वाला राजा ( वृ० पा० )।
९. वापी--वहुत काल तक थोड़े सुख वाला, भूमि में घन गाड़ने वाला, कृपण ( वृ० जा० ) । बड़ी आयु, अपने वंश में प्रतापी, सौख्य युक्त, अत्यन्त धीर, पंडित, सुन्दर वाणो, श्रेष्ठ मन, फूलों की वाटिका करने वाला, थोड़ा सुख ( जा० भ० ) धन संग्रह में चतुर, स्थिर धन, स्थिर सुख, पुत्रवान्, नृत्य नाटक आदि से सुखी राजा होता है ( वृ० पा० ) । बहुत काल तक थोड़ा सुख वाला, धन बढ़ाने वाला, कृपण ( जा० पारि० ) ।
१०. यूप--दानी, प्रमाद न करने वाळा, उत्तम यज्ञ करने वाला ( वु० जा० } धैर्यवान् उदार, यज्ञ कमं में तत्पर, अनेक विद्या और श्रेष्ठ विचार करने वाला लक्ष्मी युक्त ( जा० भ० ) आत्म रक्षा में रत; त्यागी, सुखी, सत्य और कृतों से युक्त विशिष्ट ओर मंत्रवादी ( छ० च० ) आत्मज्ञानी, यज्ञ कर्ता, स्त्री से सुखी, बलवान्, ब्रत नियम
को पालन करने वाला, विशिष्ट पुरुष होला है ( वृ० पा० ) ।
११. शर (वाण)--जीव घाती, कंद खाने का मालिक, बाण, बन्दूक, गोली आदि
का बनाने वाला ( वृ० जा० )। अति हिंसा करने वाला, शिल्प का जानने वाला,
दुःखों से सन्ताप को प्राप्त, शिल्प के कार्य से दुःखी ( जा. भ, ) वाणों का वमाने'
वाळा, चोरों की सेवा करने वाळा, माँस खाने वाळा, मृगों को वाँधने वाला, हिंसक,
कारीगरियों को जानने वाला (ल॑. चं.) । शर बनाने वाला, जेल का मालिक, शिकार
से धन वाला, मांस भक्षी, हिंसक, कुशिल्पकार ( वृ. पा. ) ।
१२. शक्ति--नीच कमं करने वाला आलसी, योग और धन से वर्जित (व्. जा.) ।
नीच ॐच मनुष्यों से प्रीति करने वाला, आलसी, सौख्य और धन से रहित, बिवाद
और युद्ध में उसकी विशाल बुद्धि का सौख्य थोड़ा होता है ( जा. भ: ) । अति आयु
वाला, युद्ध में निपुण, सौभाग्यवान्, नीच, दुःखी दरिद्री ( ल. चं. )। घन हीन, निष्फल जीवन, दुःखी, नीच, आलसी दीर्घायु, युद्ध में निपुण, सुन्दर रूप ( वृ. पा. ) ।
१३. दंड--पुत्रादि से रहित, दास कमं करने वाला (वृ. जा.) | दीन हीन उन्मत्तों
से मित्रता को प्राप्त हुए सुख वाला, सेवकों से बेर करने वाला, अपने कुटुम्वियो से
बैर करने वाला, स्त्रो, पुत्र, धन, मित्रों से हीन, बुद्धि रहित (जा. भ.) । दरिद्री, नष्ट
1 २६
४०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सुत ओर स्त्री वाला, बन्धुओं से बाहर, निर्धनी, नीच और दुखित (ल. चं.) । पुत्र
स्त्री, धन से हीन, निदेय, अपने परिजन से व्यक्त दुःखी, नोचों का सेवक (वृ. पा.) ।
१४. नौका--यशस्वी, कभी दुःखी, कमी सुखी, कुपण (वु. जा.) । प्रसिद्ध लोभी
ओर भोग सौख्य से रहित, क्लेश पाने वाळा, निरंतर चंचल चित्त, चोरी से उत्पन्न
धान्य से जीविका (जा. भ.) । ऐश्वयंवान्, बहुत आयु वाला, प्रसिद्ध यशी, कूपण,
मलिन, क्षुब्ध और चंचल (ल. चं.) । जलोत्पन्त मोती आदि से जीविका, बहुत आशा
करने वाला, विख्यात, दुष्ट, कंजूस, मलिन, लोभी (वृ. पा.) ।
१५. कूट--झूठ बोलने वाला, बंधन स्थान का रक्षा करने वाला (वृ. जा.) । वन
में वास करने वाला, पहलवान्, भीलों से प्रीत करने वाला, धनहीन, निदित कर्म करने
वाला, धर्म अधर्म के ज्ञान रहित, कपटी (जा. भ.) । मिथ्या बोलने वाला, मूर्ख, कूर,
कपटी, बंधुओं का पालन करने वालो, दरिद्री और पर्वत में वास करने वाला
(छ. चं.) । मिथ्या भाषी, जेल का अधिकारी, धन हीन, शठ, क्रूर दुर्ग स्थान में रहने
वाला ( वृ. पा. ) ।
१६. छत्र--अपने जनों को सुख देने वाला, बुढ़ापे में सुखी ( वृ. जा. ) । चतुर
राजाओं का कार्य करने वाळा, दयाव!न् बाळगने और बुढ़ापे में सव सौख्य को प्राप्त,
श्रेष्ठ छत्र और चामर को प्राप्त करने वाला (जा. भ.)। उत्तम वुद्धि, दयालु, बडी,
आयु, भाइयों का आश्रयी, बाल्यावस्था में सुखी ( ल. चं. ) । अपने कुटुम्वियों का
पोषक, दयालु, अनेक राजाओं को मान्य, श्रेष्ठ बुद्धि, आदि अंत वयस में सुखी,
दीर्घायु ( वृ. पा. ) ।
१७. चाप (घनुष)--संग्राम में शूर, वाध्य व वृद्धावस्था में सुखी ( वृ. जा. )
बालपन ओर बुढ़ापे में सौख्य पाने वाला, बनों और पतों में रहने वाला, बड़ा अभि-
सानी, गर्वे की उन्मत्तता से आपत्ति को प्राप्त, धनुषधारी ( जा. भ. ) । मध्यावस्था
में भाग्यहीन, गुप्त काम को नोकर रखने वाला, वन में रत, झूठ ही कलंक लगाने
वालो, चोर, कामुक ( ल. चं. ) । मिथ्यावादी, जेल का अधिकारी, चोर, धूतं, बन
बिहार प्रिय, भाग्यहीन ओर वयस के मध्य में सुबी ( वृ. पा. ) ।
१५. अद्ध चन्द्र ( अद्धं शशि)--पुमग, सर्वजन प्रिय, दर्शनीय वस्तुओं मे श्रेष्ठ,
सेना, आमरण, धन वस्त्रादि सहित, मनुष्यों के उत्सव के अर्थ चन्द्रमा समान होता है
( जा. भ. ) । बली, राजा को प्रिय, कांत, सुवण और रत्नों से अलंकृत, सेनापति,
सौभाग्यवान् (ल. चं.) । सेनापति, सुन्दर राज मान्य, बलवान्, सुवणं रत्न आदि धन
से युक्त ( वृ. पा. ) ।
१९. समुद्र--राजा तुल्य ऐश्वर्यवान् और भोगवान् ( वृ. जा. ) । दानी धे्यवात्,
सुन्दर, शीलवान, दयावान्, राजा से सोख्य प्राप्त, धन्यवाद के योग्य ( जा. भ. ) ।
बहुत द्रव्य वाळा, रत्नों से युक्त, पुत्रवान्, भोगवान्, जनों को प्रिय, स्थिर चित्त तथा
सुबी (ल. चं. ) । बहुत रत्न आदि धन से पूर्ण, भोगी, लोकप्रिय, सुपुत्रवान्, स्थिर
न भौर सुशील ( वृ. जा. ) ।
नाभस आदि योग : ४०३
२०, चक्र--तपोज्ञानादि से राजाओं से प्रणाम करने योग्य ( वृ. जा. ) । लक्मी- चान्, रूप वाला, बड़ा प्रतापी, बारम्बार भेंट (नजर) लेने वाला, उस राजा का यश समग्र धरती पर होता है ( जा. भ. ) । सम्पूर्ण राजा जिसके चरण कमलों को सेवा 22 का) महाराजा हो ( ज. चं. ) । अनेक राजाओं से वंदित चक्रवर्ती राजा हो वृ. पा. )।
२. संख्या योग का फल
१. वीणा (वल्ली)--सूक्ष्म दृष्टि, वारीकी से विचार करने वाला, नाच और गीत प्रिय ( वृ. जा. ) । धन युक्त, . शास्त्र के पार जाने वाला, बहुत जनों का पालन करने वाळा, अनेक सौख्य सहित, चतुर, गान विद्या में निपुण ( जा. भ. ) । नृत्य, गीत का प्रिय, नेता, बहुत नौकरों वाखा, धनी, सुखी, कार्यों में निपुण ( ल. चं. ) । गीत, नृत्य और वाद्य में प्रम, सुखी, धनी, नेता, वहुत नौकरों वाला ( वृ. पा. ) । २. दाम ( दामिनी )--उदार, परोपकार में तत्पर, पशुपालक, ग्रामाधिपति ( वृ. जा. ) । आनम्द को प्राप्त, पुत्रों से युक्त, धैरयवान्, विद्वान्, आभूषण और कोष से संतोष को प्राप्त, विराजमान, शील से युक्त, उदार बुद्धि, श्रेष्ठ ( जा. भ. ) । उपकारी धनी, मुखं, पशु, पुत्र और समृद्धियों से युक्त, रत्नों से परिपूर्ण ( च. च. )। परोपकारी, नीति से घनोपाजंक, महा ऐश्वर्यवान्, विख्यात, पुग्न रत्न आदि से युक्त विद्वान् ( वृ. पा. ) ।
३. पाश--असन्मागं से धन संग्रह, इसके वंधु भृत्य भी ऐसे ही कर्ता होते हैं ( वृ. जा. ) । दीन के समान, वुराई करने में तत्पर, बंधन से दुःख, बहुत बोलने वाला, कपट युक्त, क्रोधी, अनेक अनर्थ करने वाला वन में प्रीति (जा. भ. ) । कार्य में निपुण, प्रपंची, बहुत वोलने वाला, भाइयों की सेवा करने वाला, विशीळ, बहुत भक्षण करने वाला, दासों से युक्त ( ल, चं. ) । वंधन भागी, कायं में दक्ष, प्रपंची, बहुत चोळने वाला, अधिक परिवार वाला ( वृ. पा. ) 1 ४. केदार--कृषि कर्ता, बहुतों का उपकार कर्ता ( वृ. जा. ) । सत्य युक्त, धन- वान्, नञ्ज, खेती में प्रीति, आदर से उपकार करने वाला, धैर्यवान्, श्रेष्ठ आचरण ( जा. भ, ) । सत्य युक्त, धनवान्, नम्र, खेती में उत्कंठा, उपकार करने में आदर रखने वाला, धेर्यवान्, विशेषतः धीर मनुष्यों कसे आचार वाला ( मान. ) । बहुतों का उपकारी खेती, करने वाला, सत्यवक्ता, सुखी, चंचल, धनवान् ( वृ. पा. ) । ५. शुल--शुर, रण में अंग में चोट, अत्यन्त धन की इच्छा करने वाला, दरिद्री ( वृ. जा. ) । युद्ध और विवाद में तत्पर, वडा शूर वीर, क्रूर स्वभाव, कठोर चित्त, धनहीन, संसारी मनुष्यों को शुळ के समान होता है ( जा. भ. ) । तीक्ष्ण,
आलसी, निधंनी, हिस्र, शुर, बाहर निकाला हुआ, संग्राम में लब्ध शब्द वाला (ल.चं.) ।
तीक्ष्ण स्वभाव, आळसी, निर्धन, हिसक, समाज के बाहर, शूर, युद्ध नें विजयी (वृ.पा.) । ६. युग--धन रहित, पाखंडो, (तीनों मार्ग से वहिष्कृत) ( वृ. जा. )। पाखण्ड
में पूरी प्रीति, लज्जा रहित, धमे कर्म रहित, पुत्र और धन से हीन, अयोग्य, ज्ञान
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४०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
से शुन्य ( जा. भ. )। पाखण्डी, द्रव्यहीन, माता पिता से वर्जित, मलिन ( छ.चं. ) ।
पाखण्डी, निर्धन, समाज के बाहर, माता, पुत्र और धर्म से हीन ( वृ. पा. ) ।
७. गोल ( गोलक )--निर्धन, मलीन, अज्ञानी, निद्य, शिल्पी, आलसी, भ्रमण
करने वाला ( वृ. जा. )। विद्यावळ उदारता और सामर्थ्यं इन सबसे रहित अनेक
दुःखों को प्राप्त, सदा परदेश जाने वाला, अनेक प्राणियों से प्रीत, अन्याय से युक्त
( जा. भ. ) । विद्या धन और मान से हीन, अति दुःखी मलीन, (छ. चं.) । वलवान्
घन हीन, विद्या और ज्ञान से शून्य, मलीन और दुःखी ( वृ. पा. ) ।
३. आश्रय योग के फल
१. रज्जु--ईर्ष्यावान्, निरंतर परदेशवासी, मागं चलने में बहुत रुचि [वृ. जा.]।
श्रेष्ठ रूप, दुःख का भागी, दुष्ट कामों में निरंतर उत्साही, परदेश में विचरने वाला,
धन को प्राप्त [ जा. भ. ]। परदेश में द्रव्य का भागो, सुरूपवान्, दान में तत्पर क्रूर
' और दुष्ट स्वभाव [ छ. च. ]। भ्रमण शील, सुन्दर, परदेश जाने में सुखी, कूर, दुष्ट
स्वभाव [ वृ. पा. ]।
२. मुसलमानी, गवित, धनवान्, बहुत कायं करने वाला [ वृ. जा. ] । अनेक
ज्ञान और ध्यान युक्त, पुत्र और लक्ष्मी स राज तेज शोभा को प्राप्त, राजा का
आश्षित, हषं युक्त, हषं की उत्कर्षता से पूर्णता को प्राप्त [ जा. भ. ] । राजाओं से
पूज्य, घन से युक्त, प्रसिद्ध पुत्र वाला, राजा को प्रिय, स्थिर चित्त वाला, कर्मों से
युक्त, [ ल. चं. ]। मानी, ज्ञानी, धनी, राजमान्य, विख्यात, बहुत पुत्र वाला स्थिर
चित्त वाला [ वृ. पा. ]।
३. नर--व्यंग [ कोई अंगहीन ] दुढ़ निश्चय वाळा, धनवान् सब कार्यों में सूक्ष्म
दृष्टि [ वृ. जा. ]। निरंतर रत्नों के सहित, अपने घर में हो, राजा से प्रीत करने
बाळा, पुण्यवान् देह, सदा कीति सहित [ जा. भ. ]। स्थूल देह, निपुण, धन का
संचय करने वाला, बंधुओं का प्यारा, सुरूपवान् [ ल. चं. ]। हीन व अधिक अग
वाढा, घन संग्रह कारी, अति चतुर बंधुओं का प्रिय और सुन्दर [ वृ. पा. ]।
४. दल योग के फल
१. सरग [ माळा ]--भोगी [ अनेक अच्छे भोग वाला | [ वृ. जा. ] । पुत्र ओर
मित्रों युक्त, श्रेष्ठ आभूषण युक्त, अनेक वाहुन युक्त, स्त्रियों में क्रीड़ा करने वाला
[ जा. भ. ]। वस्त्र वाहन और भोग आदि से युक्त, कांत और मित्रों को प्रिय,
सदा, सुखी [ ल. चं. ] । नित्य वाहन वस्त्र भोग आंदिकों से सुखी, सुन्दर, बहुत स्त्री
वाला [ वृ. पा. ]।
२. सपं--नाना प्रकार के अच्छे भोग-भोगने वाला [ वृ. जा. ]। पराये अन्न का
भोगने वाला, क्रोधी, दरिद्री, निद्रा का उत्साही, बड़े वेग सहित, अमंगल कारी, खाटे
व्यवहार वाळा, पराई बड़ाई करने वाला [ जा, भ. ]। क्रूर, दरिद्री, दुःखित, सदा
, पर का अन्न खाने वाला, दीन और विषम पुरुष हो [ ल. चं. ] ।
नाभस आदि योग : ४०५
चंद्र कृत सुनफा अनफा आदि योग १. अधियोग--चन्द्र से ६,७,८ भाव में शुभ ग्रह गुरु शुक्र हो। ये ग्रह ,तीनों स्थानों में या २ स्थानों में झा एक ही स्थान में हों तब भी अधियोग हो जाता है। इसके ७ भेद है--सव शुभ ग्रह [१] छठे भाव में, [२] सप्तम भाव में, [३] अष्टम भाव में, [४] ६,७ भाव में [५] ६,८ भाव में, [६] ७,८ भाव में या [७] चन्र {से ६,७८ घर में हो।
यहाँ बुध यदि मंगल या शनि के साथ हो तो पाप ग्रह हो जाता है। सूर्य के साथ वहुधा बुध रहता है वह बुरा नहीं माना जाता । राहु केतु भी चन्द्र के बिन्दु मात्र हैं इनके साथ भी बुध रहने से दोष नहीं आता ।
इससे ३ प्रकार के अधियोग हो जाते हैं । १. शुभ अधियोग--शुभ ग्रह से ६,७,८ घर में हो बुध गुरु शुक्र इनमें से पृथक पृथक या एक दूसरे के साथ हो परन्तु साथ में कोई पाप ग्रह न हो तव यह योग होता है।
२. मिश्र अधियोग--शुभ ग्रह गुरु बुध शुक्र कोई पाप ग्रह के साथ होकर चन्द्र से ६,७,८ घर में क्रमशः या किसी दूसरे प्रकार से हों । ३. पाप अधियोग--चन्द्र से ६,७,८ घर में पाप ग्रह केवल हो ।
फल->
१--शुभ अधियोग-राज्य का राजा या धनवान् या जिमीदार हो । २--मिश्र अधियोग-मिनिस्टर सेक्रेटरी या कोई उच्च स्थान प्राप्त करे । ३--पाप अधियोग-कोई फौज या पुलिस में उच्च स्थिति प्राप्त करे । २. सुनफा योग
चन्द्र से दूसरे स्थान में सूर्य को छोड़कर दूसरे मंगळ आदि ग्रह हों तो सुनफा योग होती है ।
अन्यमत--चस्द्र के केन्द्र और नवांश से भी इस योग का विचार होता है जैसे- १--चन्द्र से चतुर्थ में मंगल आदि ग्रह में से एक या अधिक ग्रह हो तो सुनफा योग हो जाता है ।
२--या चन्द्र जिस नवांश पर हो उससे दूसरी राशि पर मंगल आदि ग्रह हो तो भी सुनफा योग हो जाता है सुनफा योग मंगळ बुध गुरु, शुक्र शनि इन पांचों ग्रह से ही होता है।
इसके ३१ भेद हैं । टं १--चन्द्र से दूसरे घर में मंगल बुध गुरु शुक्र शनि-५ भेद
२--२ ग्रह योग [१] मं. बु. [२] मं. गु. [३] म॑ शु, [४] मं. श., [५] वृ. गु, [६] बु. शु. [७] बु. श., [=] गु. शुः, [९] गु. श., [१०] शु. श, १० भेद 1 ,
४०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
३--३ ग्रह के भेद
[१] म. बु. गु. । [२] मं. बु. शु. । [३[ मं. वु. श. । [४] मं. गु. शु. ।
[५] मं गु. श,। [६] मं. शु. श. । [७] बु. गु. शु. । [५] बु. गु. श. ।
[९] बु, शुः श. । [१०] गु. शुः श. । १० भेद
४-४ ग्रह के भेद—
[१] मं. बु. गु. शु. । [२] सं. बु. गु. श. । [३] मं. बु. शु. श. । न
[४] मं. गु. शु. श, । [५] वु. गु. शु. श । ५ भेद
५-५ ग्रह का भेद--
मं. बु. गु. शु. श. । १ भेद
सुनफा के ३१ भेद के अनुसार अनफा के भी ३१ भेद होते हैं । योग ३१
३. अनफा योग--चन्द्र से १२वें स्थान में सूर्य को छोड़कर और कोई मंगल आदि ग्रह में से कोई हो तो अनफा होता है ।
मतांतर--चन्द्र से केन्द्र व नवांशकं में भी इस योग का विचार होता है जैसे [१] चन्द्र से दशम स्थान में मंगल आदि ग्रह में से एक या अधिक ग्रह हो तो अनफा
होता है। या [२] चन्द्र जिस नवांश पर हो उससे १२वीं राशि पर मंगल आदि ग्रह हो तो अनफा योग हो जाता है।
इसके भी सुनफा योग सदृश ३१ भ्रेद हो जाते हैं । सुनफा में चन्द्र से दूसरे स्थान पर जैसे योग बनते हैं उसी प्रकार अनफा योग से भी चन्द्र से १२वें स्थान में ग्रह होने से उपरोक्त बताये प्रकार से ३१ भेद हो जाते हैं। इन दोनों 'योगों में केवल स्थान के भेद का ही अन्तर है परन्तु योग के ३१ भेद पूर्ववत् हैं। इस प्रकार दोनों के मिलाकर ६२ भेद हो जाते हैं ।
४. दुरुरा--चन्द्र से दूसरे और वारहवे दोनों स्थानों में ग्रह हों तव वह योग होता है ।
अन्यमत--चन्द्र के केन्द्र और नवांश से भी इस योग का विचार होता है जैसे-- १. चन्द्र से चतुर्थ और दशम दोनों स्थान में ग्रह हो तो दुरुधरा योग हो जाता है। या २. चन्द्र जिस नवांश में हो उससे दूसरे और वारहवें दोनों स्थानों में ग्रह हो तो दुरुधरा योग हो जाता है । इन तीनों योग में योग कारक ग्रह के साथ सूर्ये भी हो तो योग का प्रभाव नहीं रहता ।
दुरुधरा योग के १०८ भेद हो जाते हैं जो आगे दिये हैं । दुरुधरा के १०८ भेद
चन्द्र से एक दूसरे भाव में दूसरा बारहवें भाव में या दूसरा बारहवें भाव में और पहिला दूसरे भाव में।
[२] २ ग्रह योग के २० भेद--
नाभस आदि योग : ४०७
[१] मं- बु. [१] बुः मं. [१] बु. ग्. [५] ग् बु. [|] ग्_ शु. [=] शु. गु. [२] मं. ग.. [२] ग्. सं. [६] बु. शु. ६] श्. बु. [९] गू. शः [१] श, गु. [३] मं. शु. [३] शु. मं. [७] बु. श. ]७] श. बु. [१०] शु. श. [१ ०] शु. श. [४] मं. श. [४] श. म॑. । यहाँ २ ग्रह के १० योग हैं और इन योगों के विरुद्ध १० योग ओर हैं जिनको मिलकर सव २० योग हो जाते हैं। (२) ३ ग्रह के योग के ६० भेद हैँ । दूसरे भाव में एक और १२वें भाव में २ ग्रह या इसके विरुद्ध १२वें भाव में १ ग्रह और दूसरे भाव में २ ग्रह। इस प्रकार ३० योग होते हैं और उनके विरुद् योग ३० हुये । सव मिलकर ६० योग हो जाते । १- मं०-बु ० गु० १--वु०-मं० गु० १०>-गु०-मं ० बु० २--मं ०-बु ० शु० २--बु ०-में ० शु० २--शु ०-मं ० बु० ३--मं०-वु० श° ३-बु०--न्सं० शब ३--श०-मं० बु० ४--मं०-गु० शु० ४--गु०-मं० शु० इ--शु०-मं० गु० भू--में ०-गु० श० ५—गु०-मं० श० प्र---श ०-मं ० गु० ६--मं०-शु० श० ६--शु०-मं० श० ६--ण०-मं० गु०
७--बु०-गु० श० ७--गु०-बु० शु० ७--शु०-वु० गुण
८--बु०- गु० श० ८--गु०-बु० श० ८--श०-बु० ग्,०
९--बू ०-शु ० श० ९--शु ०-बु ० श० $६--श ०-बु ० शु० १ ०-गु०-शु० गण १ ०-शु०-गु० श० १०-शण०-गु० शु० यहाँ ३ ग्रह के योग १० हैं तीनों ग्रहों को पृथक् २ करने से एक योग के ३ भेद हो जाते हैं इस प्रकार १० योग के ३० भेद हो जाते हैं। उपरोक्त बताये प्रकार से विरुद्ध ३० भेद और हो जाते हैं सव मिलकर ३ ग्रह के ६० भेद हो जाते हैं । ४ ग्रह के योग
२ ग्रह दूसरे भाव में २ ग्रह वारहवें भाव में--इसके ३० भेद
१--मं ० बु०-गु० शु० १—यु° शु०-मं० बु०
२-मं० बु०-गु० श० २-गु० श०-मं० बु०
३--मं० बु०-शु० श० ३--शु० श०-मं० बु० (४) म? गु०-बु० शु (४) बु० शु०-में० गु० (५) मं० गु०-वु० श० (५) बु० शर-मं० गु० (६) मं० गु०-शु० श० (६) शु० श०-मं० गु०
(७) मं शु०-बु० गु० (७) बु० गु०-मं० शुर
(=) मं० शु०-बु० श० (<) बू० श०-मं० शुर
(९) मं० शु०-गु० श० (९) गु० श-मं० शु०
(१०)मं० श्०-बु० गु० (१०)बु० गु०-मं० श०