सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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नाभस आदि योग : ४२३
६७-नालीक योग-पंचमेश नवम में, चन्द्र छाभेश से युक्त धन में हो तो राजा- धिराज, राज मान्य, षोड़श विद्या दान कर्ता, ५० वर्ष से अधिक जीवे । ६८-भद्र योग-गुरु चन्द्र दशम में हों, धनेश लाभ में हो और लग्नेश शुभ गूहों से युक्त हो तो मानस ज्ञान और सब कार्य में समर्थ, धनवान् हो 1
६९-नुप योग लग्नेश स्थित अश राशि का स्वामी, चन्द्र स्थित राशि युक्त हो राजयोग से दृष्ट हो तो आलोचन शक्ति युक्त मंडळाधिपति, धेयंवान्, सैन्याधिपति ' प्रसिद्ध तथा सुखी होता है ।
७०-धूम्र योग--मंगल स्थित अंश राशि का स्वामी त्रिकोण में शुक्र गुरु हो, ` दशभ में उच्च का शनि हो तो सुखी, सुख दाता, धैर्य गुण सम्पन्न, धनवान् राज पूज्य हो ।
७१-मृतयोग-अष्टमेश स्थित अंश राशि का स्वामी शुभ स्थान में शुभ ग्रह युक्त
हो, नवमेश उच्च स्थान में हो तो कर्ण समान दाता, धर्मात्मा, धनवान्, बलवान् हो
यह १९ वर्ष तक जीता है।
७२-गन्धर्वं योग-सप्तम से त्रिकोण में दशमेश हो, बली सूर्य उच्च में हो नवम
स्थान में चन्द्र हो, लग्नेश गुरु युक्त हो तो गन्धर्व विद्या, नंपुण्य, बलवान्, कीतिमान्,
भोगी हो ६५ वषं तक जीता है!
७३-चण्ड योग-लग्न में उच्च का ग्रह हो वह मंगल से दुष्ट हो और नवमेश
तृतीय स्थान में हों तो सेनाधिपति, वाहनाध्यक्ष, बलवान् ६० वषं तक जीवित रहे।
७४-नागेन्द्र योग-भाग्येश गुरु से दृष्ट होकर सप्तमेश स्थित राशि से नवम
राशि पर हो तो सुन्दर विद्वान् ६ वर्ष बाद यावत् जीवन सुखी रहे।
७५-मुकुट योग-नवमेश स्थित राशि से नवम स्थान में गुरु हो गुरु से नवम
स्थान पर शुभ ग्रह हो, दशम में शनि हो तो दुर्गाधीश, राजा कोल भिल्ल का स्वामी
दुर्मार्गी हो ।
७६-चित्र योग-धनेश नवम स्थान में, नवमेश लाभ में, लाभेश परमोच्च में हो
तो बुद्धिमान्, शास्त्र निपुण, कुशील हो, राजवंशज हो तो राजा हो ।
७७-वृष्टि योग-क्र्मं भावांश पति की मध्य स्थिति, चन्द्र उच्च स्थान में हो ।
जन्म रात्रि समय हो, लग्न में चर राशि हो तो व्यापारी, धनवान्, समर्थ २७ वर्ष के
बाद सुखी हो ।
७८-चन्द्रिका योग-षष्ठेश सहित नवमेश भाग्येश के अंश में सूर्यं से युक्त हो,
लग्न स्थिर हो षष्ठेश से दुष्ट हो तो शोर्यवान्, दाता, धनाध्यक्ष, कीतिमान्, मंत्री
१०० वर्ष तक आयु ।
9९-भूप योग-राहु स्थित अंश राशि का जो स्वामी हो उसके त्रिकोण स्थान में
उसका स्वामी हो इस पर मंगल की दृष्टि हो तो--शत्रु नाश कर्ता, सेनाधिपति,
राजेश्वर हो ३४ वर्ष के अनंतर राज्य भार वाही हो ।
८०-नासीर योग-ळग्नेश और गुरु चतुर्थ स्थान में, चन्द्र सप्तमेश के साथ एक
४२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
राशि में हो, छग्नेश शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो अन्नदान में रत, भोगवान्, स्थूल काय, ३३ वर्ष अनंतर शभ फल हो ।
८१-कऊन्तुक योग-दशमेश नवम में, धनेश लग्न में, द्वितीय और दशम पर शुभ अह की दृष्टि हो तो--चातुर्य युक्त वाणी, शत्रु नाश कर्ता, दान, धर्म, धन युक्त समर्थ
१०० वर्षे आयु । ८२-चन्द्रिका योग-मंगल पञ्चम स्थान में, भाग्येश स्थित राशि का स्वामी
भाग्य स्थान से पंचम हो तो अनेक स्त्रियों से रमण कर्ता, स्त्री संतति पुत्र शोक से
दुःख अनुभावक, सम वय में सुख का अनुशीलन होता है ।
८३ रसातल योग-व्ययेश परमोच्च भाग में हो शुक्र चतुर्थेश से दृष्ट होकर व्यय
स्थान में हो तो भूमि धन का रक्षणकर्ता राजा हो ।
८४-युग्म योग-चतुर्थेश नवम में शुभ ग्रहों स युक्त हो गुरु से दृष्ट हो तो जीवनभर सुखी रहे राजलक्ष्मी युक्त रहे ।
८५. अंगुल योग--पञ्चमेश स्थित अंश राशि का स्वामी उच्च स्थान में बुध
और दशमेश युक्त हो तो वस्त्र आभरण सहित गौ भूमि धन युक्त मध्यायु हो ।
८६. भव्य योग--दशम में चन्द्र हो, चन्द्र स्थित अंश राशि का स्वामी उच्च
स्थान में भाग्येश, धनेश से युक्त हो तो धन ऐश्वर्य संयुक्त, प्राज्ञ सुगुणवानू विद्या
निपुण हो । ८७. योगि योग--भाग्येश त्र्यंश में राज्येश हो, राज स्थान में गुरु हो तो सुखदाता, राज सभा में माननीय, स्त्रियों को प्रिय ४२ वर्ष से अधिक आयु । ८५८. गारुड़ योग--चन्द्र स्थित अंश राशि का स्वामी उच्च में हो शुक्ल पल में दिन का जन्म हो तो सज्जन पूजित, मृदुभाषी, शत्रु नाश कर्ता, वल्वान् ३४ वर्ष में विषय युक्त हो ता है ।
८९. देव योग--लग्तेश के त्र्यंश में भाग्येश हो और इतके नतांश का स्वामी भो साथ हो और जन्म दिन का हो तो ऐश्वर्यवान्, कोति युक्त; सुबुद्धि बलवान् हो ३२ वर्ष के पश्चात् फल हो ।
९०. धर्मे योग--गुरु शुक्र नवम भाव में लाभेश युवत हों धनेश से दृष्ट हो तो सेनापति, धनवान्, युद्धाभिलाषी, दाता, धार्मिक होता है । ९१. क्रोध योग-पञ्चमेश राहु युक्त हो मंगल से दृष्ट हो, लाभेश के अंश में हो ती पाप कमे, धन आगम, दान परायण, साहसिक घरोध दपं, भयान्वित होता है । ९२, अंग योग-केन्द्र त्रिकोण के स्वाभियों का त्रिशांशेश शुभ ग्रह हो तो-जोवन अर सुखी 'रहे । ओ त्रिशाशेश-मंगल हो तो-क्रोधी, शनि-क्रर स्वभाव । गुरु-पुराण फलश्वोता । बुध-जञानवान् । शुक्रःत्यागी ।
९३. मारत योग-राहु ३,६ या ११ भाव में हो और लग्न शुभ ग्रह से दृष्ट हो- तो इसमें भावोकत पाप फल नहीं होता । न 7
roo
नाभसं आदि योग : ४२५
अन्य-शुक्र से कोण में गुरु हो, गुरु से पांचवें चन्द्र से केन्द्र में सूयं हो तो मरुत योग होता है ।
फल-वाचाल विशाल हृदय, स्थूल, उदर-शास्त्र का ज्ञाता, धन सम्पन्न, क्रय-विक्रय में निपुण, राजा या राजा के सदृश धनी हो (जा० पारि०) ।
९४. थोमत योग-भाग्येश, राज्येश का परस्पर परिवर्तन हो और गुरु की दृष्टि
हो और लग्नेश से युक्त हो तो श्रीमान्, कार्यो में निपुण, भोक्ता, दाता, चिरायु हो ।
९५. दश योग-लग्न से ६,७ स्थानों में सब ग्रह वल युक्त हों तो प्रभू, धनवान् कीतिमान्, भोगवान् होता है
९६. इष्ट पाल योग-जन्म में सव ग्रह आपोक्लिम (३,६,९,१२) में हो तो राज्य
देने वाला होता है सुखी और पुण्यवान् हो ।
९७. अमोघ योग-सव शुभ ग्रह स्वोच्च या मूल त्रिकोण में हों तो राज सम्बन्धी
धन प्राप्त हो ।
९८. क्षेम योग-१,८,६,१० भाव के स्वामी स्वक्षेत्री हों तो कुट॒म्व क्षेत्र में
आसक्त हो, ऐश्वर्यवान् हो ।
९९. केशरी योग-चन्द्र के केन्द्र में गुर हो तो सिंह समान सव शत्रुओं का नाश
कर्ता, सभा में ढिठाई से बोलने वाळा, राजस वृत्ति का, दीघं जीवी, अति यशस्वी,
अति वुद्धिमान् अपनी शक्ति से सव से जय प्राप्त करे ।
१००. आय योग-लर्नेश, गुरु, शुक्र ये ३ ग्रह केन्द्र में हों तो दीर्घाय् हो ।
१०१. उत्तम योग-सूयं से आपोविलम में चन्द्रमा बलवान् होकर बैठा हो तो
नीति कुशल, धनवान्, ज्ञानवान् कायं निपुण हो ।
१०२. धनाकर्षण योग-लग्नेश लाभ में लाभेश नवम मे, नवमेश सप्तम में, सप्तमेश पञ्चम में, पञ्चमेश द्वितीय में द्वितीयेशे लग्न में हो तो धन का आकर्षण
करता है।
१०३. मत्स्थ योग-लग्न और नवम में शुभ ग्रह, पञ्चम में शुभ अशुभ दानो हॉ
तथा ४,५ में पाप ग्रह हो तो काळ ज्ञाता, दयालु, गुण वुद्धि बळ रूप यशा विद्या और
तपस्या में युक्त ।
अन्य-लग्न से नवम पाप ग्रह, पञ्चम भाव पाप और शुभ युक्त, ४ या ८ भाव
में पाप ग्रह हो तो मत्स्य योग होता है उपरोबत फल (जा० पारि०) ।
१०४. उपचय योग-३,-,१०,११ स्थानों में सव शुभ प्रह हों तो जातक बहुत
धनवान् हो, दिन दिन वृद्धि हो, सौन्दर्य गुण युवत, मानयुक्त, कीतिवःन्, सुखी हो ।
१०४ अ. वसुमती योग-लग्न या चन्द्र से सव शुभ ग्रह उपचय में हों तो सदा |
अपने घर में रहे उसके पास बहुत धन रहे (फल० ) ।
१०५. कुछ बद्धेन -योग-सव शुभ ग्रह सूय चन्द्र स पञ्चम में हों तो आयुष्मान्
यारोग्यदान्, धनवान्, पुत्र पौत्रादि संयुक्त होता है ।
१०६. नौ योग-गुरु वलवान् होकर धनेश सहित मूल त्रिकोण में हो लग्नेश
४२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
उच्च में हो तो--उत्तम वंश जात, भूपति, घनवान् बलवान् हो ।
१०७. जल योग-सूर्य चन्द्रमा शानि केन्द्र मे हो या ९ या १२ भाव में हों और
अन्य ग्रह निर्बेल हों तो ऐश्वयं, ज्ञान, धन से हीन, पराया अन्न चाहने वाळा, चपल
अति दु:खी लोभी शीत प्रकृति होता है । १
५०८. काल सपं योग-राहु केतु जिस घर में हों उसके भीतर सब ग्रह हों एक
भी ग्रह बाहर न हो ।
फल---गरीब हो, दीर्घ जीवन न हो । यदि ३,४ ग्रह उच्च में हों और काल सर्प
योग हो तो गरीब तो न होगा परन्तु अधिक उन्नति शील न होगा । किसी की कुंडली
में काल सपं योग हो परन्तु केमद्रुम योगन हो ओर राजयोग हो जो केन्द्र और
त्रिकोण स्वामियों के योग से बने हों तो उन्नतिशील होगा ।
१०९. गज केशरी योग-चन्द्र से गुरु सातवें घर में हो ।
फल- आदरणीय, धनवान, दयालु उन्नतिशील बिना कोई पाप ग्रह के किसी
प्रकार के सम्बन्ध हुए यह योग हो तो उपरोक्त फल होता है । यदि पाप ग्रह का योग
वृद्धि हो तो उपरोक्त पूर्ण फल नहीं होगा ।
अन्य-लग्न या चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो ओर शुभ ग्रह मात्र से युत या दृष्ट हो
तथा अस्त नीच शत्रु गृही न हो तब गज केशारी योग होता है ।
फल--तेजस्वी, धनवान्, मेधावी, गुण सम्पन्न, राजप्रिय हो (वृ० पा०) ।
अन्य-चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो शुभ ग्रह से चन्द्र दृष्ट हो । शुभ ग्रह अस्त या नीच
के न हों तो गज केशरी योग होता है। फल-उपरोक्त (जा० पारि०) ।
११०. चन्द्र मंगल योग--चन्द्र से मंगल सातवें घर में हो अन्यमत से चन्द्र मंगल
एक साथ होतों ।
फल--कई शुभ उत्सव उसके घर में हों कीति मिले सुखी जीवन व्यतीत करे ।
१११. अमला योग या अमळ कीति योग-छम्न या चन्द्र से दशम स्थान में
शुभ ग्रह हो ।
फल--राजमाभ्य, भोगी, दानी, बंधुओं का प्रिय, परोपकारी, धर्मात्मा गुणी, आचारवान्, सौभाग्यवान्, धनी मृदु स्वभाव, भाषण के योग्य । ११२. महाभाग्य योग-मुरुष का दिन में जन्म लग्न और सूर्ये चन्द्र में विषम राशि या स्त्री का रात्रि में जन्म लग्न और सूर्य चन्द्र में सम राशि हो तव यह योग होता है। फल---सबको आनन्द देने वाळा, दानी, विख्यात, पृथ्वी क' राज करने वाला शुद्ध आचरण ५० वर्ष आयु । स्त्री इस योग में उत्पन्न हो तो धनी हो, पति दीघं जीवी हो पुत्र पौत्र भी दीघं जीवी हों भाग्यशाली अच्छे चरित्र वाली हो । ११३. सरस्वती योग-शुक्र गुरु और बुध त्रिकोण या दूसरे घर में हों गुरु भी
उच्च का स्वगृही या भिन्न गृही हो और वली हो तो वडा भारी बुद्धिमान् हो नाटक कविता करने या गद्य पद्य में अळंकार शास्त्र में निपुण हो, प्रवन्ध रचना शात्त्रार्थ करने में पारंगत, त्रिलोक में कीति फेले, बहुत धनी हो स्त्री और सन्तान युक्त भाग्य
नाभस आदि योग : ४२७
वान्, उन्नतशील और राजाओं में श्रेष्ठ, सबसे पूजित हो (फल०) । ११४. श्रीकंठ्योग-लग्नेश सूर्यं और चन्द्र केन्द्र वौर त्रिकोण में होकर उच्च स्वगृही या मित्र गृही हो तो रुद्राक्ष माळा से सुशोभित विभूति शरीर में लेपन करे महात्मा, सदा शिव की अराधना करने वाला, सदा सुनियम पालन करने वाळा, शिव व्रत में दीक्षित, साधुजनों का उपकार करने वाला, दूसरों के घर्म या विश्वास पर द्वेष भाव से रहित, बलवान् हो ।
११५. श्रीनाथ योग-शुक्र नवमेश हो, बुध केन्द्र या त्रिकोण में उच्च का स्वगृही
या मित्र गृही हो तो घनी, सरल वाक्य, चतुर, निपुण, शरीर में नारायण का चिह्न
शंख चक्र आदि चिह्नित, सदा गुणी, ईश्वर का नाम जिसमें हो ऐसे सुन्दर पद्य कहने
वाला, ईश्वर का पूजक, अच्छी स्त्री पुत्र युक्त, सबको प्रिय अति सुभग ।
अन्य-दशमेश दशम में स्वोच्च का हो या दशमेश नवमेश युक्त हो ।
फल- इन्द्र के समान राजा (वृ० पा०) ।
११६. विरिञ्च योग-यदि गुरु पञ्चमेश ओर शनि केन्द्र और त्रिकोण में होकर
उच्च स्वगृही या मित्र गृही हो ब्रह्म ज्ञान पराया, अतिशय बुद्धिमान्, दूसरे पवित्र
लेखों के अतिरिक्त वेदों का प्राधान्य देने वाला अर्थात् वैदिक मागं पर चलने वाला,
सब अच्छे गुणों से भूषित, सदा प्रसन्न, प्रख्यात, बहुत शिष्य हों, भाषण में सीम्य,
बहुत धन स्त्री और संतान युक्त ब्रह्म तेज से प्रकाशवान्, राजाओं से वंदित दीर्घायु
जितेन्द्रिय हो ।
११७. कुल पांस योग-(दरिद्र योग) केन्द्र में शुभाशुभ ग्रह हों, लग्नेश पर चन्द्र
की दृष्टि न हो या शुभ ग्रह पचमांशक में हों तो कुल को मरिन करता है विदेश
वासी, अपने घर से भ्रष्ट, पुत्र स्त्री रहित, दोषों के समूह से पीडित हो ।
११८. मालिका योग-लग्न से लगातार ५ घर में ५ ग्रह हों ।
षड् ग्रह योग-लग्न से लगातार ६ घर में ६ ग्रह हों ।। तो राजयोग होता है ।
सप्त ग्रह योग-लम्न से लगातार ७ घर में ७ ग्रह हों ( विना कोई शंकाके लाभ
अष्ट ग्रह योग-लग्न से लगातार ८ घर में ८ ग्रह हों | होता है ।
नव ग्रह योग-लग्न से लगातार ९ घर में ९ ग्रह हों |
११९. मालिकायोग -अन्यमत--किसी भी भाव से ७ भावों में ७ ग्रह हो तो उस
भाव सम्बन्धी मालिका योग होता है। यनि लग्न से लगातार ७ घर में ७ ग्रह हों तो
लग्न मालिका योग होगा । लग्न मालिका का फल-राजा अनेक हाथी घोड़े का स्वामी
घन आदि ७ भावों में हो तो-धनवान् पिता की भक्ति ओर गुणवान् मनुष्यों में
चक्रवर्ती हो ।
विक्रम मालिका-पराक्रमी राजा धनी और रोगी 1
सुखादि मालिका-बहुत देशों में भाग्यवान् बड़ादानी, राजा ।
पुत्रादि मालिका--यज्ञ करने वाला राजा वा कीतिमान् ।
षष्ट गृह मालिका--कभी धन सुख प्राप्त हो कभी दरिद्र हो ।
४२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सप्तम गृह मालिका- बहुत स्त्रियों का स्वामी और राजा ।
अष्टम गृह मालिका--दीर्घायु, दरिद्र, श्रेष्ठ और स्त्री से निश्चिन्त ।
घमं गृह मालिका--गुण निधान यज्ञ कर्ता तपस्वी समर्थ ।
कर्म गृह मालिका--राज्य स्त्री मणि का स्वामी सवं क्रिया में दक्ष ।
व्यय भाव मालिका--बहुत खचे करने वाला सर्वेत्र पुज्य ।
१२०. राजयोग--९ और १० भाव के स्वामी शुभ भाव में हों । फल-राजाो हो
हाथी घोड़े आदि भूषित भेरी शंख नाद युक्त छत्र धारण भाट मागध आदि से वंदित
प्रसिद्ध पुरुष कई प्रकार के उपहार से सेवित ।
१२१-शंख योग--केन्द्र या कोण के स्वामी शुभ भाव में हों। फल-कई सुन्दर
'स्त्रियो के साथ सब प्रकार का भोग भोगे सम्पत्ति से पूर्ण हो ।
अन्यमत-- (१) लग्नेश बली हो और पंचमेश और षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों
या भाग्येश बली हो । (२) या लग्नेश और दशमेश चर राशि में हों । फल“-दयालु,
पुण्यवान्, बुद्धिमान्, सुकर्मी, चिरजीवी । ( वु० पा० ) ।
अन्य० = (१) पंचमेश षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों लानेश बलवान् हो ।
(२) लग्नेश दशमेश चर राशि में हों भाग्येश बली हो ।
, फल--योग शील, दयालु, स्त्रीवान्, पुत्रवान, क्षेत्रवान्, पुण्य कर्मी, शास्त्र ज्ञान
द्वारा आचार और साधु क्रिया करने वाला, ८० वषं आयु ( जा० पारि० ) ।
१२२-प्रतमाँश योग--सब ग्रह अस्त नीच और शत्रु के अंश में हों तो फलभय दुःख ओर मृत्यु कर्ता है ।
१२३-गरलांश योग- लगन में सूर्यं और चन्द्र हो, सूर्य ग्रहण का समय हो
अमावस्या का चन्द्र (कुहू) और अमावस्या की संधि में जन्मा हो, और जब विष घटी हो तो कंद, शोक, ज्ञात या अज्ञात रूप से पेचीदे रोग हों जीवन को भय हो। १२४-बुधादित्य योग--बुध ओर सूयं साथ हो, धर्मात्मा, पण्डित, धनवान्, बहु पुत्रबान्, भृत्यों सहित तथा जितेन्द्रिय । पिछले जो १. आकृति, २. संख्या ३. आश्रय और ४. दल योग बतलाये हैं उन्हीं नाम के और भी भिन्न योग है जो नीचे दिये हुँ १२५-गदा--(१) आकृति योग का १ योग से भिन्न । चन्द्र द्वितीय स्थान में “गुरु शुक्र से युक्त हो नवमेश से दृष्ट हो । फल- लोक प्रधान, गुणाढच, सुभट ५२ वर्ष तक सुख अनुभव करे ।
अन्य ०--सभी पाप ग्रह आठवें भाव में हों चन्द्रमा शुक्र केन्द्र में हों तो-वह मनुष्य पागल या बुद्धि भ्रंश या मृगी वाला हो संतप्त रहे ( स० चि० )1
१२६-शकट योग--( १ आकृति योग के दूसरे योग से भिन्न ) गुरु से चन्द्र बारहवं, आठवें और छठे घर में कहीं हो परन्तु लग्न से केन्द्र में चन्द्र हो तो शकट योग नहीं होता । फल-अभाग्पवान् और जो एक बार हानि हो चुकी हो उसे फिर से प्राप्त करे पृथ्वी में साधारण और महत्त्वहीन हो अर्थात मानसिक दुःख प्राप्त हो तो “डालने योग्य न हो अत्यन्त दुःखी हो ( फल० )1
नाहव आदि योग : ४२९
अन्य ०--चन्द्र से छठे आठवें गुरु हो ळग्न से केन्द्र में न दो टी कट योग होता:
है । फल-राज्य कुल का भी दरिद्री हो अनेक कष्ट और प्रयाद दे नित्य यंतत्त रहे,
राजा का अप्रिय हो ( जा० पारि० ) ।
१२७-पद्म योग--( १ आकृति योग के द्वे योग से सिन्द ) छग्त दे, चन्द्र
से नवम स्थान में शुक्र से युक्त लाभेश हो तो १५ वर्ष के भीतर राज पूछित भोगी पुण्यवान् हो । <
१२६-दंड योग--( १ आकूति योग के १३वें से भिन्न ) ३,४६.९१२ इन
राशियों पर सब ग्रह हों । फल-राज पद मिले, बड़ा पुष्पवान् पृथ्वीएदि, तेजोमय,
सिंह के समान पराक्रम् वाला बड़े बड़े घनी लोगों से सेवित हो ( मान ) 1
अन्य०--तृतीय स्थानेश उच्च का हो गुद तृतीय स्थान में हो मुकर से दृष्ट हों तों
गौधन भूमि से समृद्ध ग्रामाधिपत्य हो ( ज्यो० शा० ) ।
१२९-छत्र योग--( १ आकृति योग के १६वें योग के अतिरिक्त, अन्य प्रकार
का ) १.२,७,१२ भाव में सब ग्रह हों तो अपने वंश में श्रेष्ठ होता है, राजा होता है ।
१३०-चाप योग-( १ आकृति योग के १७वें योग से भिन्न प्रकार का ) कुम्भ
में शुक्र, मेष में मंगल, और स्वगृही गुरु हो तो राजा होता है ( मान० ) 1
अन्य०-चतुर्थेश दशमेश का परस्पर परिवर्तन हो लग्नेश उच्च में हो तो = वर्ष
के भीतर राज कोषाध्यक्ष हो महापराक्रमी कुल पूजित हो ( ज्यो० झा० ) 1
१३१-चक्र योग-( १ आकृति योग के २०वें योग से भिन्न ) दशम में राहु,
दशमेश लग्न में, लग्नेश नवम में हो तो २० ग्राम का अधिपति, सेनाधिपति हो, जन
स्तुति को प्राप्त हो ।
१३२-विद्युत ( दामिनी.) ( २ संख्या के योग के दूसरे योग से भिन्न ) लग्नेश
के केन्द्र में उच्च का लाभेश शुक्र युक्त हो तो त्याग, भोग में आसक्त, घनाध्यक्ष प्रभु हो।
१३३-केदार ( २ संख्यायोग के चोथा योग से भिन्त ) सब ग्रह मेषादि द्वादश
राशियों में क्रम से किसी चर राशि में हों तो-व्यापारवान्, सुखवान्, वित्तवान् हो ।
१३४-गोल योग ( २ संख्या योग के सातवें योग से भिस्त ) पूर्ण चन्द्र गुरु शुक्र
से युक्त हो, नवम स्थान में बुध लग्नांश में हो तो विद्या विनय सम्पन्न ग्रामाधिकारी
चिरायु मिष्ठान्न भोजी हो ।
१३५-रज्जु योग-( ३ आश्रय योग के पहिले योग से भिन्त ) नवमेश के द्वादशांश में पंचमेश पूर्ण चन्द्र से युक्त हो तो-विशाळ नेत्र, धनवान्, मानवान्, कोतिमान्,
पूत्रवान्, मध्य आयु का हो ।
१३६-मुसल योग ( ३ आश्रय योग के दूसरे योग से भिन्न ) दशम राहु हो,
दशमेश उच्च में हो शनि से दृष्ठ हो तो विशाल नेत्र, निर्मल मुख, मंत्री, व्यापार से
धनाजंन ।
१३७-माला योग ( ४ दल योग के पहले योग से भिन्त ) २, ९, ११ भाव के
स्वामी क्रम से ९, ११, २ स्थान में हो तो ३३ वर्ष बाद मंत्री घनाधिपति बराधिपः
कीतिमान् होता है ।
Riess ses ear
४३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अन्य ०-शुभ माला-सव ग्रह॒ प्रचरित क्रम से ५, ६, ७ घर में हों तो जनाधिकारी
( गवनंर डायरेक्टर आदि ), राजा से सम्मानित, योगी, दाता, दूसरे के कार्य करने
में सहायक, अपने सम्बन्धियों से प्रेम, अच्छी स्त्री और पुत्र हो, धीर हो ( फल० ) ।
अशुभ माला-सब ग्रह प्रचलित क्रमसे ८, ६या १२ घर में हों तो कुमार्गी,
दुःखी, दूसरों को त्रास देने वाला, कृतघ्न, डरपोक, ब्राह्मणों का अभक्त, लोक से
शापित, कलह प्रिय होता है ( फल० ) 1
१३८-खड्भ योग-नवमेश धन भाव में हो, धनेश नवम में हो, लग्नेश केन्द्र या कोण
में हो तो खग या खड्ग योग होता है। फल-वेद के अर्थ झो जानने वाला, सभी
"शास्त्र तथा ज्योतिष और तंत्रों के तत्व को जानने वाला, बुद्धि प्रताप बल पराक्रम से
सुखी रहे । मत्सरता विरहित, अपने पराक्रम में श्रेष्ठ, कार्य कुशल, कृतज्ञ ।
१३९-वंशावतार-शुक्र और गुरु केन्द्र में हों, शनि उच्च का होकर केन्द्र में हो,
चर लग्न में जन्म हो । फल-पुण्य चरित्र वाला, तीर्थ सेवी, कलाविद, काम में आसक्त,
सामयिक, जितेन्द्रिय, वेद तत्त्व ज्ञाता, वेद शास्त्र का अधिकारी, राज्य श्री वाला ।
१४०-कूमं योग-शुभ ग्रह ५, ६, ७, भाव में और पाप ग्रह ३, ११, १ भाव में
अपने उच्च में हों । फल-राजा, धीर, धर्मात्मा, गुणी, यशस्वी, उपकारी, नेता,
सुखी ( वृ० पा० ) ।
अन्य०-शुभ ग्रह स्वगृही उच्च या मित्रांशक का ५, ६, ७ घर में हो और पाप
ग्रह लाभ या लग्न में मित्र गृही या उच्च का हो तो कूर्म योग होता है (जा० पा०)।
फल-विख्यात कीति, राज सुख भोगी, धर्मात्मा, सुत गुणी, धैयंवान्, सुखी, वक्ता
परोपकारी, मनुष्यों का नायक ( राजा ) ( जा० पा० )।
१४१-कुसुम योग ( ३३ कुसुम योग से भिन्न ) स्थिर राशि लग्न में हो, शुक्र केन्द्र मै और चन्द्रमा त्रिकोण में शुभ ग्रह युत हो और शनि दशम में हो । फल-राजा या राजा के तुल्य, दाता, भोगी, सुखी, कुल में श्रेष्ठ, गुणी विद्वान् ( वृ० पा० ) | अन्य० स्थिर लग्न हो शुक्र केन्द्र में हो चन्द्रमा शुभ युक्त त्रिकोण या पांचवे भाव में हो और शनि दशम में हो ।
फल-दानी, राजा से पूजित, भोगी, उत्तम कुल में उत्पन्न राजाओं में मुख्य, समस्त लोको में यशस्वी प्रतापी राजा ( जा० पा० )।
१४२-कल्पद्रुम-लग्नेश तथा लग्नेश जिस राशि में हो उसका स्वामी फिर वह जिस राशि में हो उसका स्वामी और उसका नवांशपति ये सब यदि केन्द्र त्रिकोण में या अपने २ उच्च में हों । फल-पब सम्पत्ति से युक्त राजा, धर्मात्मा, बली, युद्ध-प्रिय और दयालु ।
१४३-बुध योग-छग्न में गुरु, गुरु से केन्द्र में चन्द्र, चन्द्र से दूसरे राहु हो, पराक्रम से तीसरे स्थान में सूर्य और मंगल हो तो बुध योग होता है। फछ-राज श्री से युक्त, विशेष वली, बड़ा नामी, शास्त्र ज्ञाता, व्यापार में चतुर, वृद्धिमान, शत्रु रहित । १४४-लग्च अघियोग-छग्न से ६, ७ और ५ स्थान में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह से
नाभस भादि योग : ४३१
युक्त या दृष्ट न हो, चतुर्थ में भी पाप ग्रह न हो तो लग्नाधि योग होता है। फल- बहुत शास्त्रों का रचने वाला, विद्या से विनीत, बहुत बल का अधिकारी, मुख्य,
निष्कपट, महात्मा, लोक में यश वित्त गुण से युक्त ( जा० पा० )।
अन्य०-लग्न से ७, ८ भाव में शुभ ग्रह हो उस पर पापग्रह की दृष्टि या योग न
हो तो लग्नाधियोग होता है । फल-बड़ा ही विद्वान्, महात्मा ओर सुखी (वृ० पा०) |
१४५-(१) हरि योग-छग्नेश से २, ८, १२ घर में शुभ ग्रह हों ( जा० पा० )।
अन्य-द्वितीयेश से २, ८, १२ घर में शुभ ग्रह हो ( जा० पा० ) ।
(२) हर योग-प्तमेश से ४, ९, ८ घर में शुभ ग्रह हो ( वृ० पा० ) |
अन्य०-सप्तमेश से ४, ९, ८ घर में यथा संभव गुरु चन्द्र वुध हो (जा० पा०)।
(३) ब्रह्म योग-लाभेश से ४, १०, ११ घर में शुभ ग्रह हो (वृ- पा०) ।
अन्य०-छग्नेश से ४, १०, ११ घर में सूर्य शुक्र मंगल हो ( जा० पा० )।
तो इन तीनों योगों में उत्पन्न सुखी विद्वान्, धन पुत्रादि से युक्त हो (वृ० पा०) ।
अन्य-सभी शास्त्रों का ज्ञाता सत्यवादी, सफल, सुख भोगी, प्रिय वादी, काम
शील, शत्रुजित्, उपकार कर्ता, पुण्य कर्मी ( जा० पा० ) ।
१४६-दन्य, खल और महायोग-छग्न से आरम्भ होकर १२ भाव तक भावेशों
की जोड़ी से होने वाले ६,६ योग बनते हैँ ।
१-दन्य योग-इसमें ६,८,१२ भाव के स्वामियों से ३० योग बनते हैं ।
१-वारहवें भाव का स्वामी शेष किसी भी ११ भावों में हो परन्तु द्वादशेश
जहाँ हो उस भाव का स्वामी १२ वें भाव में हो । ११ भेद
२--षष्ठेश शेप १० किसी भाव में (१,२,३,४,५,७,८,९,१० या ११) भाव
में हो और उसका स्वामी छठे भाव में हो । १० भेद
३--अष्टमेश शेष ९ भावों में से किसी में हो (१,२,३,४,५,७,९,१०,११)
भाव में से किसी में हो और उस भाव का स्वामी ८ बें भाव में हो। ९ भेद
योग ३०
२--खल योग
१--तीसरे भाव का स्वामी शेष १,२,४,५,७,९,१० ओर ११ इन ८ भाव
में से कहीं हों और उस भाव का स्वामी तीसरे भाव में हो । ८ भेद
योग ८
३-महायोग
१--लग्तेश शेष २,४,५,७,९,१० या ११ इन ७ भाव में कहीं हो ओर
उस भाव का स्वामी लग्न में हो । ७ भेद
२--दूसरे भाव का स्वामी शेष ६ घर ( ४,५,७,९,१० या १) भाव) में
हो और उसका स्वामी दूसरे भाव में हो । ६ भेद
३--चतुर्थेश शेष ५ घर ( ५,७,९,१० या ११ भाव ) में से किसी में हो
और उसका स्वामी चतुर्थं में हो । ५ भेद
४३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४--पंचमेश शेष ४ घर ( ७,९, १०, या ११ भाव ) में से किसी में हो
ओर उसका स्वामी पंचम भाव में हो । ४ भेद
५-सप्तमेश शेष ३ घर ( ९, १० या ११ भाव ) में से किसी में हो और
उस भाव का स्वामी सप्तम में हो । ३ भेद
६-नवमेश शेष २ घर ( १० या ११ भाव ) में से किसी घर में हो परन्तु
उसका स्वामी (जहाँ नवमेश है) ९ भाव में हो। | हि
७-दशमेश ११ वें भाव में हो और उसका स्वामी अर्थात्: ग्यारहवें भाव
का स्वामी दशम भाव में हो | १,
फल:-- सव मिलाकर योग हो गये ६६
१-दैन्य-मूखं, दूसरों की बुराई करने वाला, दुष्ट कृत्य करने वाला, अपने शत्रुओं
से दुःखित, ऋरोक्ति बोलने वाला, चंचल मन, सब कार्यो में बाधा ।
२-खल-कभी क्रोधी दुवंचन बोलने वाला, कभी नम्र भाषी, कभी सब प्रकार
की उन्नति प्राप्त करे कभी बहुत दुःख आपत्ति,दरिद्रतो या इसी प्रकार के कष्ट भोगे ।
३-महायो ग-देवी के आशीर्वाद से युक्त, ध॑न का «वामी, विचित्र रंग की वस्तु
धारण करे, सुवर्ण अलंकार से विभूषित, राजा से बहु मान्य, कीमती उपहार प्राप्त हो
और कुछ भी अधिकार उसे प्राप्त हो, वाहन, घन और संतान प्राप्त हो ।
१४७-चामर आदि १२ योग ।
ये योग पूर्व कथित योगों से भिन्न हैं।
' लग्न में १२ भाव के १२ योग बनते हैं ।
वह भाव शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो या अपने उच्च या स्वक्षेत्र में हो तब ये
क्रमानुसार १२ भाव के १२ योग बनते हैं ।
१२ योग--
(१) चामर, (२) घेनु, (३) शौर्य, (८) जलधि, (५) छत्र, (६) अस्त्र, (७)काम,
(ऽ) आसुर, (९) भाग्य, (१०) ख्याति, (११) सुपारिजात, (१२) मुसल । इनके फल--
(१) चामर-शुक्ल चन्द्र के अनुसार प्रतिदिन महत्व बढे, शीलवान्, प्रसिद्ध, जनपति, दीर्घजीवी, श्री देवी का निधि हो ।
(२) घेनु-अच्छा भोजन, पानी प्राप्त, धनी, सब बात में अच्छी प्रकार से विद्या प्राप्त, कुटुम्ब से विभूषित, बहुत सुवणं, रत्न, धन अन्नादि से पूर्ण कुवेर देव समान प्रकाशित हो ।
(३) शौयं-भाइयो से जो स्वतः कीतिलाभ कर चुके हों, प्रशंसित और विक्रम
ऐसा प्राप्त हो जिससे दूसरे प्रशंसा करें और वह श्रीराम के समान प्रकाशित हो जिसे राज कार्य निरत ओर अति यशस्वी, प्रत्येक मनुष्यों का प्यारा हो । (४) जलधि-( अम्बुधि )-अन्न, घन, यौ से धनी, बंधु से पूर्ण, सुन्दर घर अच्छी स्त्री, रत्न कपड़े और आभुषण प्राप्त हों । आदरणीय और उच्च पद प्राप्त हो,
दाद आदि बॉय : ४३३
सुख स्थिर और अंत तक रहे । हाथी, घोड़ा आदि वाढून पर बात करे, राजा से
सम्मानित, ब्राह्मण ओर देव॑ के लिए भक्ति, सड़क पर कुओँ, दाळाव आदि बतवने में
उत्सुकता पूवंक अपने को लगावे ।
(५) छत्र-अच्छी स्त्री, ओर संतान प्राप्त, सुखी, बरी, प्रसिद्ध, दुन्दर भाषा,
“विद्वानू, राजा का मंत्री, तीक्ष्ण बुद्धि, आदरणीय 1
(६) अस्त्र-अपने बड़े बळी शत्रु को बलपूर्वक दमन करें, अपने बर्ताव में छूर ओर
अभिमानी, अंग में ब्रण के चिल्ल, शरीर बलिष्ठ, विवादकारी ( झगडा ) ।
(७) काम -दूसरे की स्त्री की ओर दृष्टि भी न डाले, अच्छी स्त्रो, संतान ओर
बंधु युक्त, अपने स्वतः के गुण से अने पिता से अधिक्र प्रकाशित ओर उच्च पद को
प्राप्त ।
(८) आसुर--दूसरे का काम विगाड़े, चुगल खोर, अपने स्वतः के कार्य में अपने
कार्य बनोने में लगा हुआ, दरिद्री परन्तु जिद्दी, नीच कोय कर्ता, अपने स्वत: उपद्रवी
काम करने में दुःखी रहें ।
(९) भाग्य--पालकी में चले,साथ अच्छे वाजे ब॒जते रहें ऊपर चौरी डोलती रहे,
कभी अंत न होने वाला द्रव्य प्राप्त, प्रसिद्ध पुरुषों से वंदित, धर्म मागं में स्थित, मित्र
देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा कर उचित रीति से प्रसन्न करे, अपना आचार पालन
करे, सव कुल का छोकाचार पालन करे सुहूद न हो ।
(१०) ख्पाति--राजा हो छोगों से अनुमोदित आचरण करके अरनो प्रजा को
रक्षा करे, धन, संतान, स्त्री से भाग्यवान्, विशाल ख्याति प्राप्त करे, ओर उन्नति
शील हो ।
(११) पारिजात--नित्य मंगल कार्यों के वीच रहे, राजा हो, जमा किए हुए घव
का स्वामी हो, बहुत कुटुम्ब हो, सत्कथा श्रवण करे, विद्वान् हो, कुछ न कुछ शुभ कार्य
करता रहे ।
(१२) कुशल- बहुत कष्ट से उपाजित द्रव्य का स्वामी हो, अनादर हो उसका
धन स्थिर न रहे, अपना घन उचित कायं में बचें करे.। अपनी अन्त को दशा में कुछ
निश्चय पूर्वेक स्वर्ग प्राप्त हो, वह उजड्ड,अविच[रणीय, चंचल चित्त का हो 1
(१४८) अब आदि १२ योग
यदि १२ भावों के स्वामी लग्न से विचारने पर लग्न के आगे ६,५,१२ वें घर में
हों या यदि भाव पाप युक्त या पाप दृष्ट हो तो लग्न से १२ भाव तक विचारने से
१२ योग बनते हैँ
१--अब योग, २-निःस्व, ३ पृति, ४--कुह, ९ पामर, ६--दषं, ७--
दुष्कृति, ८--सरल, ९--निर्भाग्य, १ ०-दुर्योग, ११-३रिद्र योग, १ २-विप्रल योग ।
फल--
(१) अव योग- अप्रसिद्ध हो, अतिदरिद्री, अल्पजीवी, दुष्ट लोग उपे तुच्छ दृष्टि
से देखें, दुष्ट आचरण, कुरूप, स्वतः डमाडोल स्थिति ।
(] २-
४३४ ; सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२) निःस्व योग--सुवचन शून्य हो, बन्ध्या स्त्री मिले, बुरे साथियों के बीच रहे,
बुरे दांत, आँख हों, बुद्धि से हीन, अल्प संतान, विद्या रहित, शक्ति रहित, उसके शत्रु
उसका धन लूट लेवें । j
(३) मृति योग--शत्रू उसे जीत लेवें, भाइयों से रहित, लज्जा रहित, धन और
शक्ति हीन, श्रम से जो अनुचित कार्यों के करने से उत्पन्न हो, थका हुआ, उत्तेजित
मनोवृत्ति का हो ।
(४) कुहृ--मातृ, वाहन, भित्र, सुख, भूषण, बंधु इनसे रहित, स्थिति शून्य, पूवं
प्राप्त स्थान भी खों देवे, नीच स्त्री से प्रेम ।
(५) पामर-दुःखी जीवन, .अविचारणीय, झूठ बोलने वाला, वंचक, (दगाबाज)
संतान हानि हो, या संतान ही न हो, नीच जनों का प्रयोग करे, नास्तिक, अधिक
खान-पान करने वाला ।
(६) हर्ष योग-सुख, भोग, भाग्य, दृढ़ अंग युक्त, शत्रू ओं से जीते, पाप कर्म से
डरे, उसका मित्र हो वह प्रसिद्ध मुखिया हो, द्युति मित्र, कीति और संतान प्राप्त हो।
(७) दुष्कृति योग-स्त्री की हानि हो, पर स्त्री रत, बिना विचारे, आवारा,
विचरता रहे, प्रमेह आदि गुह्य रोग हों, राज से पीड़ा, बंघुजनों से परित्यक्त उसके £
कारण दुःख भोगे ।
(८) सरल योग-दीर्घायू, दृढ़ मति, निभंय, श्रीमान् विद्या सुत धन युक्त, आरंभ
में ही व्यापार में सफलता प्राप्त करे, शत्रुओं को दमन करे, निर्मल ख्याति हो ।
(९) निर्भाग्य योग-अपनी पैत्रिकी सम्पत्ति जमीन आदि सब नष्ट करे, साधु और
गुरुजनों का निदक, अघामिक, पुराने और पहिने हुए कपड़े पहिने, अभागी, बहुत दुःख
का पात्र हो । ५
(१०) दुर्योग-कोई कायं अपने शरीर की महानता से करे तो असफलता हो,
मनुष्यों की दृष्टि में लघु, दूसरों का द्रोही, अति स्वार्थी, केवल अपने पेट के पांलन की
चिन्ता करे, अपने घर से सदा गैर हाजिर रहे, और बाहर देशों में रहे 1
(११) दरिद्र योग-कर्ज से लदा, क्रूर, दरिद्र शरोमणि, कर्ण रोगी, सौभ्रात्र हीन, (अच्छे भाई से रहित) पाप या अपराध के कायं में चित्त, चालाकी से वात करें, दूसरों
से नीचता का व्यौहार करे ।
(१२) विमल योग-कम खर्च करे अधिक बचावे, प्रत्येक के साथ अच्छा सुखी, स्वतन्त्र और आदर का पात्र, अपने अच्छे गुणों के कारण प्रसिद्ध । दुर्योग पर विचार-यदि ६,८ यः १२ घर के स्वामी बली होकर केन्द्र या कोण में हों और १,१०,४ ओर ९वें घर का स्वामी बल हीन हो या अस्त हो और ६,८, १२वें घर में हो तब अशुभ फल होता है ।
परन्तु उपरोक्त के विपरीत हो अर्थात् ६,5,१२वं घर का स्वामी वलवान् होकर
केन्द्र या कोण में न हो और १,४,९ या १०वें घर का स्वामी ६,८,१२बे घर में न हो
और बली हो ओर अस्तंगत न हो तो शुभ फल होगा-वह भाग्यवान् होगो, धनवान्,
नाथस आदि योग : ४३५
गुणी राजा, सुखी और धार्मिक हो ।
पंच महापुरुष योग—
सूर्य और चन्द्र को छोड़कर शेष ५ ग्रह स्वगृही या उच्च होकर केन्द्र में पड़ तो ५ प्रकार के पञ्च महापुरुष योग होते हैं । यदि सूर्य या चन्द्र के साथ ये योग पड़ें तो फल घट जाता है । अर्थात् सूर्य चन्द्रमा सहित मंगल आदि कोई ग्रह उक्त प्रकार से हो तो राजा नहीं करते केवल अपनी दशा में शुभ फल देते हैं ।
कुछ का मत है कि लम्ब से केन्द्र का इन योगों में विचार होता है चन्द्रमा से भी केन्द्र में इन योगों का विचार करना ।
(१) रुचक योग—मंगल स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
(२) भद्र योग—बुध स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
(३) हंस योग—गुरु स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
४३६ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(४) मालेय—शुक्र स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
(५) शासक योग—शनि स्वगृही या उच्च का होकर केन्द्र में हो ।
अथ मत्त से स्वगृही, उच्च के अतिरिक्त मूल त्रिकोण का भी विचार करना ।
पाँचों योगों का फल संक्षिप्त में
जिसके १, २, ३, ४ या पाँचों योग हों उसका फल ।
(१) जिसके उपरोक्त १ ही योग हो—माध्यवान् हो । (२) इनमें २ योग हों तो—राजा तुल्य हो । (३) तीन योग हों तो—राजा हो । (४) चार योग हों तो—राजेश्वर हो । (५) जिसके पाँचों उपरोक्त योग हों तो राजेश्वर से भी श्रेष्ठ हो ।
पंचमहापुरुष योग का फल
(१) रुचक योग—मुँह लम्बा, परम उत्साही, निर्मल कांति, वलवान्, सुन्दर भ्रुकुटी कृष्ण केश, सब वस्तुओं में रुचि, संग्राम प्रिय, रक्तश्याम वर्ण, शत्रु को जीतने वाला, विवेकी, चोरों का पोषक (सरदार) क्रूर स्वभाव, दुर्बल जंघा, ब्राह्मणों का भक्त, हाथ में वीणा, वज्र. धनुष, पाश, वृष चिह्न और चक्र रेखा से युक्त, युक्त विचार तथा अभिचार (मारण मोहन आदि) में चतुर, लम्बाई में १०० अंगुल मुख की लम्बाई में, तुल्य कटि प्रदेश वाला, तौल में एक हजार तुला तुल्य, विन्ध्य और सन्नांचल प्रदेश का शासक होकर ७० वर्ष की आयु, शस्त्र या अग्नि के आघात से स्वर्ग जाता है । (वृ० पा०) । दीर्घायु, स्वच्छ कांति, सधिर और बल से पूर्ण, साहसी, प्रत्येक कार्य में सफलता उत्तम भ्रुकुटी, नील केश, सम हाथ, पैर, मंत्रश्र, कीर्ति पवित्र, अरुणता युक्त श्याम वर्ण, शूरवीर शत्रुनाशक, शंख समान कंठ, बड़ा पराक्रमी, क्रूर स्नेही, ब्राह्मण गुरु से विनय युक्त घुटना पिडली जंघा से दुबला, जिसके हाथ पैर में खटवांग, पाश, वृष, धनुष, शर, चक्र, वीणा विद्या इनके चिह्न होते हैं, सीधी अंगुली वाला, सलाह लेने में कुशल, अकेला ही हजारों के तुल्य, मध्यम कटि, सह्य, विन्ध्य पर्वत उज्जयनी देश का राजा, आयु ७० वर्ष के लगभग शस्त्र और अग्नि से चिह्नित, देव मंदिर के समीप देह त्याग करने वाला (मान०) ।
(२) शत्रु योग—सिंह समान प्रतिभावान्, उच्च वक्षःस्थल, हाथी सदृश गमन, स्थूल
नाभस अदि योग: ४३७
और लम्बी भुजा, पंडित, चतुरस्त्र योग क्रिया जानते वाळा, सत्य गुणी, सुन्दर पर,
सुन्दर दाड़ी मूछ, भोगी, शंख, चक्र, गदा शर हाथी ध्वजा हल, इन रेखाओं से चिह्नित
हाथ ओर पेर वाला सुन्दर नासिका, शास्त्र ज्ञाता, काले ओर घुंघराले केश, सब कार्यों
में स्वतंत्र, अपने परिवार को पालने वाला, मित्रादि जन भी उसके धन का उपयोग
करते हूँ । वह तौल में पूर्ण और २० तुला होता है । स्त्री पुत्रादि से युक्त सकुशल,
वह मध्यदेश का पालक होकर १०० वषं जीता है (वृ० पा०)।
तौल का अनुमान-वतंमान रुपया-१ क्षं । ४ कर्ष=१ पळ ।
३०० पल>१ तुला, २० तुला=१ भार. ।
१२०२ तोला=१ तुला (१५ सेर) (व्० पा०) ।
सिह समान चेहरे वाला, मत्त हाथी की चाल, पुष्ट उन्नत वक्षस्थल, सुन्दर मोटी
सुडौल भुजा, कामी, ऊँचा, कोमल, सूक्ष्म रोओं से युक्त कपोल, विद्वात्, कमल से
कोमल हाथ पैर, सत्वाधिक्य युक्त, योग मार्ग का ज्ञाता हाथ पैर में शंख, खड्ग, हस्ती
गदा, पुष्प वाण ध्वजा चक्र कमल हल आदि के चिह्न यात्रा मागं में मत्त हाथियों के
जल से भूमि गीली करने वाला, उत्तम केशर के समान गंध युक्त अङ्ग बाला, मनोहर
शब्द युक्त, उत्तम दोनों भौंह, अति बुद्धिमान्, शास्त्र का जानने वाला मान ओर भाग्य
से युक्त जिसके रहस्य कार्य छिपे हुए हों, उत्तम जिसका पेट, धमं मार्गे में निरत,
उत्तम ललाट से युक्त, वड़ धीर, काले घुंघराले केश । काम करने में स्वतंत्र, स्वजनों
पर भी क्षमा न करने वाला और उसके विभव को दूसरे ही अथिजन भोगते हैं, प्रयत्न
से तुळा में सोने चाँदी के भार को तोलने वाळा अथवा रुपया मोहरों की गिन्ती की
तो कहे कौन तराजू से भी तौलने से वड़ी कठिनाई से आवे जिसके लाखों मन सोना
चाँदी यों ही पड़ा रहे । स्त्री पुरुषों के सुख से युक्त ८० वर्ष तककान्यकुब्ज देश का
राज्य भोगने वाला (मान०) ।
(३) हंस योग--हंस के समान शब्द, सुन्दर मुख, उन्नत नासिका, कफ प्रकृति,
मधु समान पिंगल वणं नेत्र, लाल नख, तीक्ष्ण बुद्धिः पुष्ट कपोळ, गोल मस्तक, सुन्दर
पैर वाला राजा होता है । उसके हाथ पैर में मत्स्य, अंकुश, धनुष, शंख कमळ, खटिया
सदृश रेखाओं के चिह्न होते हैं । कामी होता है स्त्रियों से तृप्ति नहीं होती, लम्बाई
में ९,६ अंगुल, जल क्रीड़ा का प्रेमी, सुख पूर्वक गङ्गा और यमुना के मध्यवर्ती देश का
पालक होकर १०० वर्ष तक जीवित रहकर वन में शरीर त्याग करता है (वृ०पा०)।
अरुण मुख, उन्नत नासिका, सुन्दर चरण, सुन्दर अङ्ग, गौरांग, पुष्ट कपाळ, रक्त
नख, हंस कैसा शब्द, श्लेष्म प्रकृति, शंख, कमळ, अंकुश, मत्स्य, माळा युग्म, खट्वांग
घट इन चिल्लो से युक्त पांव, मधुर नेत्र, गोल सिर, जलाशयों में प्रीति, अति कामी,
` स्त्रियों से कभी तृप्ति न हो ६० अंगुल ऊँची देह ६० वर्ष की आयु (मान०) ।
(४) माळव्य योग-सुन्दर ओंठ, कृश कटि, चन्द्र के समान सुन्दर कांति, शरीर
में सुगन्ध वाला, सामान्य रक्त वर्ण मझोला कद, सुन्दर और स्वच्छ दांत हाथी के
समान स्वर, घुटने तक लम्बी बाहु वाळा, मुख लम्बाई में १३ ओर विस्तार में १०
४३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अंगुल ७० वर्ष तक सिंधु और मालव देशों में सुख पूर्वक पालन करके स्वर्ग जाता है (वृ० पा०)।
पतले ओंठ, समान अंग, पतली कमर, लाल अंग, संधि रहित, चन्द्र समान कांति, ह्रस्ति समान लम्बी नाक, सुन्दर कपोल, उत्तम नेत्र, संग्राम में विख्यात पराक्रम, आजानु वाहु, ७० वर्ष तक राज्य करने वाला। १३ अंगुल लम्बा मुँह, दोनों कान का अन्तराल १० अंगुल चौड़ा। अपने अष्ट पुत्र के साथ लाट नामक देश, मालव देश, सिंध नाम देश, परियात्र पर्वत पर्यंत राज्य भोगने वाला (मान०)।
(५) शशक योग—छोटे-छोटे दांत और छोटा मुख किन्तु शरीर छोटा नहीं होता, शूरवीर पतली कमर, सुन्दर जांघ, बुद्धिमान, वन और पर्वत पर विहार करने वाला, शत्रुओं के छिद्र को जानने वाला सेना नायक, कुछ ऊँचे दांत वाला, चंचल, धातु वादी, स्थियों में आसक्त, दूसरे का धन पाने वाला, हाथ पैर में माला, वीणा मृदंग और शस्त्र के समान रेखा के चिह्न। पृथ्वी के अनेक भाग में ७० वर्ष तक सुख पूर्वक राज्य करके अंत में स्वर्ग को जाता है ( वृ० पा० )।
छोटे दांत और मुख, चिर काल तक किसी पहाड़ पर घूमने वाला, क्रोधी, शठ, शूरवीर, निर्जन वन में घूमने वाला वन पर्वत आदि स्थानों के तथा नदी तट पर रहने में प्रीति, अतिथि जनों में प्यार रखने वाला, सर्वत्र प्रसिद्ध, न अति लघु, न अति लम्बा हो अनेक प्रकार की सेना रखने वाला, उन्नत दंत, धातु वाद में कुछ चतुर चंचल नेत्र, स्थियों में आसक्त, दूसरों का धन हरने वाला, मातृ भक्त, उत्तम जांघ, पतली कमर उत्तम बुद्धि, पर छिद्र देखने वाला, हाथ पाँव में पलंग, शंख, शस्त्र मृदंग माला वीणा आदि रेखा हों। ७० वर्ष तक राज्य करने वाला यह शशक नाम का हो राजा होता है।
प्रवृज्या ( संन्यास या फकीरी योग )
प्रवृज्या योग—जिस योग के होने से जातक घर छोड़ कर दूसरे सम्प्रदाय में चला जाता है यह योग के अनुसार नाना प्रकार के साधु, भिक्षुक, संन्यासी आदि हो जाते हैं इस योग के प्रभाव से राजवंशी भी चरद्वार छोड़ कर वन वासी बन जाता है।
प्रवृज्या योग—एक राशि में ४ या अधिक ग्रह एकत्र होने से यह प्रवृज्या योग जाता है।
एक राशि का आशय—सब ग्रह समीप २ हों उन में कुछ ही अंशों का अन्तर हो। जैसे वृष राशि के १ अंशपर कोई ग्रह है दूसरा ग्रह वृष के २९ अंश पर है। इनमें अंशों का बहुत अन्तर पड़ जायगा। ग्रह चाहे दूसरी राशि में भी हो परन्तु बहुत अल्प अन्तर हो तो भी इस योग का प्रभाव होगा। जैसे कोई ग्रह वृष के २९॥ अंश है दूसरा ग्रह मिथुन के १ अंश पर है। यहाँ दोनों ग्रह समीप २ हैं अल्प अन्तर है यहाँ दूसरे भाव में ग्रह होने पर भी सामीप्य के कारण योग होगा। इस प्रकार ४ ग्रह अल्प अन्तर से समीप हों तो यह प्रवृज्या योग हो जाता है।
=
नाभस आदि योग : ४३९
कोन ग्रह क्या प्रवज्या करते हैं
१-खूयं अधिक बली हो तो--तपस्वी दूध कंद मूल फल खाकर तप करे ( वृ० जा० ) । वानभ्रस्थ तपस्वी जो वन पर्बतों में रहता है ( जा० पारि० )। साधुओं का स्वामी या मुखिया जिसने दीक्षा ली हो ऐसा योगी ( फळ० ) । वैखानस संन्यासी, तपस्वी अग्नि होत्र करने वाला वन पव॑तों में नदी किनारे आश्रम बनाकर तपस्या करने वाला, सूर्य का आराधक ( जा० भ० )। २--वल्वान् चन्द्र-कपाली-(संन्यासी हिसा से रहित भस्म से सफेद देह, कपालों को धारण करने वाला शिव जी की दीक्षा वाळा । सोम सिद्धान्त में तत्पर कपालो है ( जा० भ० ) । कापालिक व शैव कनफड़ा ( वृ० जा० ) । तीथं आदि में भटकते फिरने वाला यात्री ( फल० ) । गुरु ( राजश्रीयुक्त तपस्वी ) ( जा० पारि० ) । ३--वलवान् मंगल--छिंगी संन्यासी, गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला अपनी बुद्धि से देवताओं की उपासना करने वाला, शिखा रहित, पांडु वस्त्र पहिरने वाला, भीख माँगने वाला, लाल कपड़ा पहिरने वाला, इन्द्रियों को जीतने वाला सन्यासी होता है ( जा० भ० ) बौद्ध धर्म का साधू बनेगा और बुरा सलाहकार बनायेगा ( फलछ० ) । शाक्य ( दुराचारवान्, कुशील, वंचक ) साधू ( जा० पारि० ) । ४--वलवान् बुध-दंडी संन्यासी (कपट करने वाला, गारुड़ी मन्त्र का आराधक मयुर तंत्र के मत में स्थित, मांस खाने वाला दंडी कहलाता है) ( जा० भ० ) । साधु जो भिन्न २ मत के विषय में कुछ नहीं जानता ( फल० ) । जीवक (उदर पुति करने वाला, भोजन में तत्पर, बहुत बोलने वाल') साधु ( जा० पारि० )। एक दंडी और यती ( वृ० जा० ) |
५--बलवान् गुरु-यती, तपस्वी, एक दंड या ३ दंड का धारण करने वाला, गेरुवा कपड़े पहिरने वाला, वानप्रस्थ धमं सहित, ब्रह्मचर्यं को प्राप्त, तीथो में स्नान करने वाला ( जा० भ० )। वेदान्ती तत्ववेत्ता प्रसिद्ध साधु ( फल० ) । आजीविक
वैष्णव ( वृ० जा० ) । भिक्षु ( एक दंडी निरन्तर उपनिषद् का तत्वज्ञ महात्मा ) । ६->-वलवान् शुक्र-चक्र का धारण करने वाळा पशुपति पक्ष की दीक्षा में स्थित, सदा व्रत करने वाला ( जा० भ० ) । रोगी साधु बनेगा जो जीविका के लिए साधुवेश धारण करता है जाति वहिष्कृत ( फल० ) । चक्रांकित ( वृ० जा० ) । चरक ( नाना
देश प्रवासी श्रेष्ठ यति ) ( जा० पारि० ) ।
७--बली शनि-नंगा संन्यासी, पाखंड व्रत में स्थित,नग्न ब्रत धारण करने वाला
श्रावक मत में स्थित कठिन तपस्या करने वाला ( जा० भ० ) । जाति से वहिष्कृत
साधु ( फछ० )। विवास ( सदा नंगा रहने वाला, विना वस्त्र के रहे ) ।
१-एएक् स्थान में ४ बली ग्रह-नित्य वनवास करने वाला होता है चाहे वह राज
वंशी क्यों न हो ।
एक स्थान में ५ वली ग्रह--नित्य कंदमूल खाने वाला अति शान्त स्वभाव
जितेन्द्रिय हो ।
४४० : रविम ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
एक स्थान में ६ बली ग्रह—राज कुल का भी हो तो भी नित्य पर्वत में शिला तल बास कर तपस्या करने वाला होता है।
२—संन्यास योग में राहु युक्त हो या कूर्पाश्वक में गुल्फिक युक्त हो तो संन्यास में विफलता होने है। अर्थात् संन्यास त्याग दे।
३—प्रवज्या कारक ग्रहों में २,३ ग्रह बली हों तो पहिले एक प्रकार की फकीरी लेगा फिर दूसरे प्रकार की, पश्चात् तीसरे प्रकार की। प्रथम जिस ग्रह की अंतर्देशा होगी तब उस ग्रह के अनुसार प्रवज्या होगी दूसरे की अंतर्देशा आने पर पहिली दीक्षा त्याग कर वर्तमान ग्रह की दीक्षा लेगा। इसी प्रकार ग्रहों के प्रभाव से एक छोड़ कर दूसरी ग्रहण करता रहेगा।
४—प्रवज्या कारक बली ग्रह अस्तंगत हो तो अदीक्षित अर्थात् बिना गुरु मंत्रों-पदेश के संन्यास या फकीरी लेगा परन्तु उस सम्प्रदाय में उसकी भक्ति या प्रेम होगा। या मुँह से कहे या विचार करे कि मैं दीक्षा लूँगा परन्तु उसमें प्रेम होते हुए भी दीक्षा न लेवे यदि ग्रह निर्बल हो ( उच्चादि बलहीन हो ) और सूर्य के साथ अस्त हो तो सूर्य जन्म प्रवज्या होगी अर्थात् वह तपस्वी होगा।
५—युद्ध में पराजित ग्रह को—मंगल आदि ग्रहों में एक ही अंश पर ग्रह रहने से ग्रह युद्ध समस्या जाता है। इसमें शुक्र उत्तर या दक्षिण में हो दोनों में विजयी समस्या जाता है अन्य ४ ग्रह बुध गुरु मंगल और शनि में जो उत्तर में रहता है वह जयी समस्या जाता है और दक्षिण वाला पराजित समस्या जाता है इस प्रकार जो ग्रह युद्ध में पराजित हो उसकी प्रवज्या में जातक उस प्रवज्या को ग्रहण कर छोड़ देता है। यदि न पराजित हुआ हो तो बलीग्रह की अंतर्देशा में दीक्षा पावे।
६—राजयोग प्रवज्या योग दोनों बलवान् हों तो वह विरुद्ध फल योग पर साधु होकर भी राजा हो।
७—फर्क ग्रहों में जिसका बल अधिक होगा उसकी दीक्षा पहिले होगी पश्चात् दूसरों की होगी।
८—यदि ग्रह बलवान् हो तो उसकी दीक्षा मरने तक रहे।
यदि ग्रह निर्बल हो तो उसकी दीक्षा लेकर छोड़ देवे।
सब ग्रह बली हों—तो नित्य भोजन त्याग कर नंगा-रह कर योग मार्ग में तत्पर हों।
९—एक स्थान में ५,६ ग्रह हों तो वह दरिद्रों और मूर्ख भी होता है।
१०—अन्यमत है कि प्रवज्या कारक ग्रहों में दशमेक्ष भी होंवे, दशमेक्ष के वर्ग का साधु होगा।
अन्य प्रकार से प्रवज्या योग
१—जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि पर रहता है उसका स्वामी जन्मेश कहलाता है। जन्म समय जन्मेश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो और चन्द्रमा शनि को देखे तो प्रवज्या योग होता है इसमें भी शनि चन्द्र में से जो बली हो उसकी अंतर्देशा में प्रवज्या होगी ( बु० जा० )।
नाभस आदि योग $ ४४१
२-जन्मेश निबंछ हो उस पर बलवान् शनि की दृष्टि हो ( बृ० जा० ) |
३-शनि चन्द्र के द्रेष्काण में हो या शनि व मंगल के नवांश में हो केवल शनि की दृष्टि हो ओर कोई ग्रह की दृष्टि न हो तो शनि युक्त प्रवज्या होगी (वृ० जा०)।
४-चन्द्र निबंछ हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो विशेष कर शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो भाग्य हीन हो ( वु० जा० )।
५-गुर नवम स्थान में हो, गुरु चन्द्र ओर लग्न इन तीनों को शनि देखता हो । इसमें यदि पूथं कथित राजयोग का लक्षण भी हो तो भी जातक राजा होकर तीथकर हो अर्थात् बुध आदि के समान स्वयं सम्प्रदाय चलाने वाला हो या शास्त्र कहने वाला होगा ( वु० जा० ) ।
६-शनि नवम हो और उसे कोई ग्रह न देखे । यदि उसे राजयोग भो पड़ा हो
तो वह राजा होने पर भी फकीरी दीक्षा पायेगा, ऐसे योग में कोई राजयोग न हो तो
इस प्रवज्या का फल होगा ( वृ० जा० ) ।
७-९, १२ या ४ राशि लग्न में हो, उस पर शनि की दृष्टि हो ओर गुर नवम
स्थान में हो तो अपना राज्य छोड़कर देश-देशान्तर घूमे भ्रमिष्ट हो (प्रा० यो०) । ८-लग्नेश या केवल शनि की दृष्टि हो अन्य की दृष्टि न हो या शनि को लगेज
देखे लग्नेश को शनि देखे बलरहित हो तो प्रवज्या योग हो | ( स० चिं० ) |
९-चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो उसपर शनि की दृष्टि हो ( स० चिं० )।
१०-चन्द्रमा यह शनि के व मंगल के अंशक. में हो शनि से दृष्ट हो या चन्द्रमा
शनि सहित हो तो संन्यास योग हो ( स० चि० ) ।
११-छग्नेश पर और ग्रहों की दृष्टि न हो, लग्नेश की दृष्टि शनि पर न हो
और शनि भी बलहीन लग्नेश को न देखे तो दीक्षा लेकर संन्यासी होता है (जा.भ-)।
१२-लग्नेश शनि के द्रेष्काण में हो, मङ्गल व शनि के नवांश में हो उसपर शनि
की दृष्टि हो तो वह कुटिल दुष्ट शील पाखंड का मंडन करने वाला तपस्वी होता है ( जा० भ ) ।
१३-नवम पंचम भाव में शुभ ग्रह हो और कोई ग्रह न देखता हो तो संन्यासी हो ( जा० भ० ) ।
१४-चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो उसपर मङ्गल और शनि की दृष्टि हो तो वह साधु हो ( फल० ) ।
१५-चन्द्रमा मङ्गल के नवांश में हो अर्थात् नवांश स्वामी मंगल हो और शनि
की दृष्टि हो तो मंगल से जो वे प्रगट हो उसी वर्ग का साधु हो ( फल० )।
१६-जन्म राशीश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो केवल शनि की दृष्टि हो तो वह साधु हो (फल) ।
१७-दशम में बलवान् ३ ग्रह स्वोच्चादि वर्ग स्थित हों दशमेश अधिक बली हो तो वह यती या उसके समान शीलवाला हो ।
१८-दशमेश बलहीन सप्तम में हो तो वह दुराचारी हो ।
१९-प्रब्रज्या कारक ग्रहों के बीच द्वितीयेश ओर सप्तमेश हो तो वह काम बुडि
४४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
होता है । (जा. पारि.)
२०-प्रवज्या प्रद ग्रह सूये शनि मंगल से युक्त हो तो धन पुत्र स्त्री से रहित सन्यासी हो ।
२१-शुभ नवांश में सूये हो और वह उच्च के अन्त भाग में स्थित ग्रह को देखता
हो तो वह युवा या बालावस्था में संन्यासी हो । (जा. पारि.)
२२-शुक्र और बुध बलहीन होकर लग्न को देखें तो दरिद्र हो । (जा. पारि.)
२३-कोई ग्रह उच्च राश्यंश में युक्त होकर चन्द्र को देखता हो तो भिक्षुक (संन्यासी) हो । ८
२४-बहुत ग्रह एक स्थान में होकर लग्न को देखें तो दीक्षित हो।
२५-जहाँ चन्द्र हो उस राशि के स्वामी को शनि या लग्नेश देखते हों तो दीक्षित
हो (प्रवज्या हों) ।
२६-यदि चन्द्रमा मंगल की राशि में हो शनि के द्रेष्काण में हो शनि उसे देखता . हो तो सन्यासी हो । :
२७-तवम भाव में चन्द्र हो उसे कोई ग्रह न देखता हो तो राजयोग में उत्पन्न
होने पर भी दीक्षित राजा हो (जा० पारि०) 1 अन्य विचार
२८-एक राशि में इस प्रकार ग्रह हो ।
सुर्य, चन्द्र, गुरु, बुध ) तो बल्कल धारी फल भोजी सन्यासी हो । या मगल, बुध, शुक्र शनि ? या चन्द्र गुरु शुक्र शनि ]
२९-चन्द्र क्षीण हो प्रवज्या योग हो लग्नेश चन्द्र को देखे तो जातक दुःखी तपस्वी, शोक तप्त, धन जन रहित, कष्ट से भोजन पाने वाला हो ।
३०-प्रवज्या योग में राजयोग होवे तो बुरा प्रभाव घट जायगा वह दीक्षित साधु शील राजा बना रहेगा जिसे सव नमन करेंगे । ३१-यदि ४ ग्रह जिनमें एक दशमेश भी हो केन्द्र या त्रिकोण में हो या ३ बल- चान् ग्रह अच्छे घर में पड़ें हो तो वह सिद्ध सन्यासी होगा । ३२-भ्रवज्या कारक ग्रहों में अधिक शुभ ग्रह हों और अच्छे घर में हों तो उसका सव लोग मान करेगे। यदि ऐसा न हो तो उसका कोई मान न करेंगे । ३३-जव दशमेश ४ और ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह मुक्ति प्राप्त करेगा ।
३४-यदि राशि का अन्त उदय हो रहा हो और उसका स्वामी शुभ ग्रह हो गुरु कैन्द्र या त्रिकोण में हो तो भी मुक्ति प्राप्त करेगा । ३५-अवज्या योगों में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हो तो संन्यास लेने पर भंगहो जावे। ३६-अवज्या योग में ग्रह युद्ध में पराजित ग्रह की भी प्रवज्या भंग हो जायगी अर्थात् वह फकीरी लेकर उसे छोड देगा । जितने ग्रह पराजित हैं उन सब की प्रवज्या छुटती जायगी केत्रल जीते हुए की प्रवज्या रहेगी ।
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